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मंगलवार, 4 सितंबर 2012

भारत में बांग्लादेशी मिथक व यथार्थ








असम में बोडो व मुसलमानों के बीच हिंसा, जिसके पीछे बांग्लादेशी घुसपैठियों का हाथ बताया जा रहा है, के कई दूरगामी परिणाम होंगें। इस हिंसा में लगभग अस्सी जानें गईं हैं। हिंसा अब भी जारी है और विस्थापितों की संख्या चार लाख से भी अधिक हो गई है। विस्थापित हुए लोगों में से कितने मुसलमान और कितने बोडो हैं, इस संबंध में कोई स्पष्ट आंकडे उपलब्ध नहीं हैं परंतु क्षेत्र में काम कर रहे सामाजिक कार्यकताओं का अनुमान है कि इनमें से अस्सी प्रतिशत मुसलमान व 20 प्रतिशत बोडो हैं. हिंसाग्रस्त क्षेत्र से जो थोड़ी बहुत जानकारी छन कर आ रही है, उससे ऐसा लगता है कि हिंसा पीडि़तों के लिए स्थापित किये गये शरणार्थी शिविरों में स्थितियां बहुत खराब हैं, विशेषकर मुस्लिम शरणार्थी अमानवीय स्थितियों में रहने के लिए विवश हैं। इस बीच, इस घटनाक्रम के संबंध में कई अलग-अलग किस्म की रायें सामने आ रहीं हैं। भाजपा नेता जोर देकर कह रहे हैं कि हिंसा के पीछे बांग्लादेशी घुसपैठिये हैं। उनकी संख्या एक से लेकर दो करोड़ या उससे भी ज्यादा बताई जा रही है. कहने की आवश्यकता नहीं है कि ये आंकडे कल्पना की उड़ान भर हैं. ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि कथित बांग्लादेशी घुसपैठियों ने अतिक्रमण किया है, स्थानीय निवासियों की जमीनें छीन लीं हैं और इससे उपजे असंतोष के कारण ही, समाज में उनके प्रति घृणा का वातावरण बन गया है। यही नफरत हिंसा का मूल कारण है. दरअसल, असम का घटनाक्रम एक ऐसा उदाहरण है जहाँ हिंसा से भी अधिक भयावह है, हिंसा-जनित विस्थापन.
चुनाव आयुक्त एच.एस.ब्रहमा, जो कि स्वयं बोडो हैं, ने तो यहां तक कहा है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या में भारी वृद्धि के कारण वे आक्रामक हो गये हैं और स्थानीय रहवासियों पर हिंसक आक्रमण कर रहे हैं। कुछ अन्य लोगों का कहना है कि बोडो स्वायत्तशासी क्षेत्रीय परिषद के गठन के बावजूद, अतिवादी बोडो समूहों ने अपने हथियार समर्पित नही किये हैं, जो कि परिषद के गठन की मांग को मंजूर करने की  आवश्यक शर्त थी। भाजपा नेतृत्व का एक हिस्सा इस विवाद को राष्ट्रीयता से जोड रहा है। इसका कहना है कि असम में चल रहा संघर्ष, भारतीयों और बांग्लादेशियों के बीच है। यह भी कहा जा रहा है कि इन बांग्लादेशियों से मताधिकार छीन लिया जाना चाहिए और उन्हें चुनावों में मत देने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए.  वैसे भी, उनमें से अधिकाशं लोगों को “डी“ अर्थात डाउटफुल या संदेहास्पद मतदाता घोषित कर दिया गया है। भाजपा और उसके सहयोगियों का आरोप है कि कांग्रेस, घुसपैठियों को प्रोत्साहन दे रही है ताकि वह उनका इस्तेमाल वोट बैंक बतौर कर सके। कुछ बोडो संगठनों ने यह धमकी दी है कि शरणार्थी शिविरों में बड़ी संख्या में रह रहे मुसलमानों को उनके गांवों में लौटने नहीं दिया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने अपनी रपट में कहा है कि असम में बांग्लादेशियों के बड़े पैमाने पर घुसपैठ की खबरों में सच्चाई नहीं है और असम की हिंसा, बोडो जातीय समूहों व असम में लम्बे समय से निवासरत मुसलमानों के बीच का विवाद है.
 इसके पहले कि हम इस मुद्दे पर चर्चा करें कि असम में रह रहे मुसलमान घुसपैठिये हैं, प्रवासी हैं या वहां लंबे समय से रह रहे बंगाली हैं, हम असम के घटनाक्रम के बाद हुई कुछ दुखद घटनाओं पर प्रकाश डालना चाहते हैं।
असम हिंसा के बाद, घृणा से लबरेज कई ई-मेलों व वेबसाइटो के माध्यम से, देश के अन्य हिस्सों में निवासरत उत्तर-पूर्व के रहवासियों को यह चेतावनी दी गई कि असम का बदला उनसे लिया जावेगा. नतीजे में देश के कई हिस्सों और विशेषकर बैंगलोर से बड़े पैमाने पर उत्तर-पूर्व के निवासी अपने गृह-प्रदेशों के लिए रवाना हो गये. जिन वेबसाइटों ने इन कुत्सित अफवाहें को हवा दी, उन्हें भारत सरकार द्वारा ब्लाक कर दिया गया। यह आरोप भी सामने आया कि इनसे बहुत सी वेबसाइटें पाकिस्तान से संचालित कीं जा रही थीं परंतु यह भी सही है कि कम से कम बीस प्रतिशत वेबसाइटें हिन्दुत्व समूहों द्वारा संचालित थीं. विहिप व अन्य हिन्दुत्व समूहों ने पर्चों के माध्यमों से यह दुष्प्रचार किया कि असम में बांग्लादेशी घुसपैठिये, हिन्दुओं पर हिंसक हमले कर रहे हैं। इस मामले में मुस्लिम कट्टरपंथी समूह भी पीछे नहीं रहे और उन्होंने मुंबई के आजाद मैदान में एक विरोध रैली का आयोजन किया, जिसके दौरान भीड़ के एक हिस्से द्वारा टीवी चैनलों की ओ.बी वैनों में आग लगा दी गयी और पुलिसकर्मियों पर हमले किये गये। मुंबई के पुलिस आयुक्त अरूप पटनायक ने स्थिति पर अत्यंत धैर्यपूर्वक और समझदारी से बहुत जल्द काबू पा लिया परंतु साम्प्रदायिक तत्वों और इस मुद्दे पर राजनीति करने के इच्छुक सत्ताधारी दल के एक तबके को यह रास नहीं आया और श्री पटनायक को उनके पद से मुक्त कर दिया गया.  धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ताओं और मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा, श्री पटनायक द्वारा की गई प्रभावी व धैर्यपूर्ण कार्यवाही की प्रशंसा कर रहा है।
जहां तक बांग्लादेशी घुसपेठियों का मुद्दा है, कई अनुसंधानकर्ताओं ने पिछली सदी के जनसंख्या संबंधी आंकड़ों के विस्तृत अध्ययन व विश्लेषण द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि क्षेत्र में रह रहे मुसलमान या तो विभाजन के पूर्व बंगाल से आये रहवासी हैं या सन् 1947 में विभाजन के समय वहां बसे हुए लोग हैं या सन् 1971 के बांग्लादेश युद्ध के दौरान भारत भाग कर आये शरणार्थी हैं। सन् 1985 का असम समझौता इस क्षेत्र में रह रहे  सभी लोगों को वैध निवासी का दर्जा देता है और इस श्रेणी में अधिकांश मुसलमान भी आ जाते हैं। इसके बाद भी कुछ मुसलमान असम में आये हैं परन्तु ये सब आर्थिक बदहाली के चलते अपना घर-बार छोड़ने पर मजबूर हुए हैं.   
 असम की जनंसख्या के चरित्र में बदलाव पिछली एक सदी से भी लम्बे समय में आया है। अंग्रेज शासकों ने एक नीति के तहत, तत्कालीन बंगाल में खेती की जमीन पर बढते दबाव को कम करने के लिए, बंगालियों को असम में बसने के लिए प्रेरित किया था। असम में सन् 1971 के बांग्लादेश युद्ध के समय आखिरी बार बड़ी संख्या में नये प्रवासी बसे। उसके बाद से बहुत कम संख्या में नये प्रवासी असम में आये हैं. जहां तक बड़े पैमाने पर घुसपैठ का प्रश्न है, ऐसा होने के कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। असम समझौते में यह प्रावधान है कि सन् 1971 के पहले तक वहां बसे सभी प्रवासी, वैध भारतीय नागरिक माने जायेंगे। अधिकांश मुसलमान इसी श्रेणी में आते हैं। जनगणना आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि सन् 1971 के बाद से क्षेत्र की जनसंख्या में कभी भारी वृद्धि दर्ज नहीं की गई। संपूर्ण भारत, असम राज्य व धूबरी, धीमाजी व करबी अबलोंग जिलों में सन् 1971 से 1991 के बीच की अवधि  में जनसंख्या की दशकीय वृद्धि दर क्रमशः 54ण्51ए 54ण्26ए 45ण्65ए 107ण्50 एवं 74ण्72 रही है। सन् 1991 से 2001 के दशक में यही आंकडे 21ण्54ए 18ण्92ए 22ण्97ए 19ण्45 व 22ण्72 रहे. सन् 2001-2011 के लिये ये आंकडे क्रमशः 17ण्64ए 16ण्93ए 24ण्40ए 20ण्30 एवं  18ण्69 थे. “मिथ ऑफ बांग्लादेशी एण्ड वाइलेंस इन आसाम“ में शिवम विज कहते हैं कि असम में प्रवास एक लम्बे समय में, शनैः शनैः हुआ है और सन् 1971 के बाद जनसंख्या में वृद्धि थम गई है।
अगर हम असम के दो जिलों- धीमाजी व करबी अबलोंग - की दशकीय आबादी वृद्धि दर को देखें तो यह स्पष्ट हो जावेगा कि इन दोनों जिलों व पूरे असम में, आबादी “मुस्लिम-बहुल सीमावर्ती“ जिले धूबरी की तुलना में कहीं तेजी से बढ़ी है। इसके बावजूद, इन जिलों में बहुत कम मुस्लिम आबादी है। इन दो जिलों में हिन्दू आबादी का प्रतिशत क्रमशः 95ण्94 व 82ण्39 है। यद्यपि इन जिलों की आबादी में तेजी से वृद्धि हुई तथापि आज भी मुसलमान, आबादी का मात्र 1ण्84 व 2ण्22 प्रतिशत हैं। यह तब जबकि 1961ण्71 में धीमाजी की आबादी 103ण्42 प्रतिशत बढ़ी और 1951ण्61 में करबी अबलोंग की 79ण्21 प्रतिशत। इन आंकड़ों से यह दिन के उजाले की तरह साफ है कि असम की उच्च दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर के पीछे, बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ नहीं वरन् कोई और कारण है। असम के कोकराझार जिले- जो बोडो क्षेत्रीय परिषद का मुख्यालय है - में जनसंख्या वृद्धि दर में कमी आई है। सन् 2001-11 में कोकराझार की दशकीय वृद्धि दर सबसे कम, अर्थात 5ण्19 प्रतिशत थी। यह दर सन् 1991-2001 में 14ण्49 प्रतिशत थी।
यथार्थ को स्वीकार कर और असम की आबादी संबंधी आंकड़ों के गहरे विश्लेषण से ही हम असम हिंसा की प्रकृति को समझ सकते हैं। यह एक तरह का जातीय संघर्ष है जिसमें एक जातीय समूह दूसरे जातीय समूह का दमन कर इलाके में  अपना वर्चस्व कायम करना चाहता है. आर्थिक विकास की कमी और  बढती बेरोजगारी ने खेती की जमीन पर दवाब बढा दिया है. और नतीजे में श्भूमि पुत्रश् आन्दोलन उठ खड़ा हुआ है. इस समय न केवल हिंसा पर रोक लगाने की जरूरत है वरन दोनों समुदायों के बीच सध्भव की कायमी और क्षेत्र में आधारभूत संरचना के विकास की भी आवश्कता है ताकि सभी नागरिकों को आगे बडगे के अवसर मिल सकें.


 -राम पुनियानी


मंगलवार, 7 अगस्त 2012

असम हिंसा : क्या हो स्थायी हल


पिछले दिनों निचले असम के कोकराझार और तीन अन्य जिलों में हुई व्यापक हिंसा के बारे में समाचारपत्रों में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। जुलाई के पहले सप्ताह में शुरू हुई हिंसा, जिसने 19 जुलाई के बाद जोर पकड़ लिया, में 58 व्यक्ति मारे गए। वर्तमान में इस इलाके में एक असहज शांति व्याप्त है। इस हिंसा ने चार लाख से अधिक लोगों को शरणार्थी बना दिया है। इनमें से तीन लाख मुसलमान हैं। शरणार्थी 27 अलगअलग राहत शिविरों में रह रहे हैं। समाचारपत्र, सामान्यतः, केवल घटनाओं का विवरण देते हैं, उनके पीछे के कारणों का विश्लेषण नहीं करते और न ही समाचारपत्रों में किसी मसले के गहन अध्ययन पर आधारित सामग्री प्रकाशित होती है।
जब मुख्यमंत्री तरूण गोगोई से किसी ने कहा कि असम जल रहा है तो वे आगबबूला हो गए। श्री गोगोई, सच यह है कि असम वास्तव में धूधूकर जल रहा है। असम समस्या की जड़ें कोकराझार में बोडो व मुसलमानों के बीच हिंसा और बोडो क्षेत्रीय परिषद में आए दिन होने वाले विवादों से कहीं गहरी हैं। ये दोनों तो असम के आंतरिक सामाजिक संघर्ष के बाहरी लक्षण मात्र हैं। असम में तब तक शांति स्थापित नहीं हो सकती जब तक कि बांग्लादेशी मुसलमानों के राज्य में घुसपैठ करने संबंधी झूठे प्रचार पर रोक नहीं लगती।
सन 1980 के दशक में चला एएएसयू आंदोलन और उसके बाद हुआ नेल्ली नरसंहार, इस आंतरिक टकराव का पहला प्रकटीकरण थे। नेल्ली में बांग्लाभाषी मुसलमानों (तथाकथित बांग्लादेशियों) और ललुंग कबीलाईयों के बीच हिंसा हुई थी जिसमें 3000 से अधिक मुसलमान मारे गए थे। बांग्लादेशी होने का आरोप लगाकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। इस जनसंहार से पूरे असम के मुसलमानों में इतना आतंक व्याप्त हो गया था कि जब मैं इस घटना की जांच के लिए असम पहुंचा तब एक भी असमिया मुसलमान कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं था।
सन 2008 में मुसलमानों और बोडो के बीच हिंसा का एक और दौर हुआ जिसमें 55 लोग मारे गए। जिन मुसलमानों को बांग्लादेशी बताया जा रहा है उनमें से अधिकांश ब्रिटिश शासनकाल में असम में बसे थे। नेल्ली में बंगाली मुसलमानों ने मुझे बताया कि उनके पुरखे सन 1930 या उसके भी पहले वहां आकर बसे थे और उन्हें खाली पड़ी जमीनों पर खेती करने के लिए लाया गया था। ये लोग बहुत मेहनती हैं जबकि असमिया अहोम और पहाड़ी कबीलाई ललूंग आरामतलब हैं और खेती में ज्यादा मेहनत करना नहीं चाहते। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नेल्ली में 3000 से अधिक मौतों के बावजूद घटना की कोई आधिकारिक जांच नहीं हुई। यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि 3000 मासूमों को क्रुरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिए जाने के घटनाक्रम की जांच करवाने तक की जरूरत महसूस नहीं की गई।
दक्षिणपंथी भाजपा इस मामले में आग में घी डालने का काम करती रही है। वह बिना किसी आधार के अत्यंत अतिश्योक्तिपूर्ण आंकड़े प्रस्तुत कर यह आरोप लगाती रही है कि बड़ी संख्या में बांग्लादेशी मुसलमान असम में बस रहे हैं। सन 1980 तक असम में आरएसएस की कोई खास पकड़ नहीं थी परंतु अब गांवगांव तक उसका फैलाव हो गया है और उसके कार्यकर्ता रातदिन मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच खाई खोदने के काम में जुटे हुए हैं। वैसे असम में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक सौहार्द का लंबा इतिहास रहा है। इन सौहार्दपूर्ण रिश्तों के निर्माण में एक ओर शक्रदेव तो दूसरी ओर आजम फकीर ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं थीं।
असम ही नहीं, भाजपा को पूरे देश में कहीं भी हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्ते नहीं भाते। अपनी हिन्दुत्ववादी राजनीति को आगे ब़ाने के लिए भाजपा हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच नफरत की दीवार खड़ी करने के लिए बांग्लादेशियों के मसले का इस्तेमाल करती रही है। असम में साम्प्रदायिक सौहार्द के लम्बे इतिहास के चलते भाजपा के लिए असमिया मुसलमानों पर निशान साधना लगभग असंभव था। इसलिए उसने बांग्लादेशी मुसलमानों का मिथक ईजाद किया। इसका अर्थ यह नहीं है कि असम में बांग्लाभाषी मुसलमान नहीं हैं और यह भी सही है कि हाल के वषोर्ं में कुछ बांग्लाभाषी मुसलमान असम में आकर बसे हैं । इनमें से कुछ बांग्लादेश से आए हैं और कुछ पिश्चम बंगाल से।
परंतु अधिकांश बांग्लाभाषी मुसलमान ब्रिटिश काल से असम में बसे हुए हैं और वैज्ञानिक तरीके से एकित्रत किए गए ऐसे कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं जिनसे यह पता चल सके कि वास्तव में कितने बांग्लादेशी प्रवासी पिछले कुछ दशकों में असम में आए हैं। वहां कोई नेशनल पापुलेशन रजिस्टर भी नहीं है। पूरा मसला प्रचार और केवल प्रचार पर आधारित है और इसके जरिए आमजनों को विभाजित करने और उनके मन में तरहतरह की भ्रांतियां फैलाने में साम्प्रदायिक तत्वों को सफलता मिली है। इस आरोप, कि कांग्रेस सरकार बांग्लादेशी मुसलमानों को असम में बसने की इजाजत इसलिए दे रही है ताकि उसका वोट बैंक ब़ सके, ने गैरकांग्रेसी राजनैतिक दलों को प्रभावित किया है।
असम तब तक हिंसा और तनाव के झंझावातों में फंसा रहेगा जब तक कि बांग्लाभाषी मुसलमानों के असम में बसने संबंधी आरोपों का पुरजोर व प्रभावी ंग से खण्डन नहीं होता। ऐसा भी नहीं है कि केवल बांग्लादेशी या बांग्लाभाषी मुसलमान असम में आ रहे हैं। हिन्दीभाषी बिहारी भी बड़ी संख्या में असम में बस गए हैं। राजस्थान के मारवाड़ी भी वहां हैं और उनका उत्तरपूर्वी राज्यों के व्यापारव्यवसाय पर लगभग पूण्र नियंत्रण है। परंतु कतिपय राजनैतिक कारणों से फोकस केवल बांग्लादेशी मुस्लिम प्रवासियों पर ही किया जा रहा है।
इस समस्या का एक अन्य कारण है बोडो क्षेत्रीय परिषद की स्थापना। यह परिषद ऐसे इलाके में शासन कर रही है जहां बोडो आबादी केवल 29 प्रतिशत है और अन्य लोगों में वे बांग्लाभाषी मुसलमान शामिल हैं जिन्हें ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेजों द्वारा जूट की खेती करने के लिए वहां बसाया गया था। वे सौ से अधिक वषोर्ं से वहां रह रहे हैं। केन्द्र सरकार ने अतिवादी बोडो आंदोलनकारियों से, जो कि एक स्वतंत्र बोडो राज्य की मांग कर रहे थे, समझौता करने की खातिर बोडो क्षेत्रीय स्वायत्त परिषद की स्थापना को मंजूरी दी थी।
प्रश्न यह है कि बोडो परिषद बनाकर उसे संबंधित इलाके के विकास संबंधी और अन्य निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार कैसे दिया जा सकता है जबकि क्षेत्र में बोडो, कुल आबादी का केवल 29 प्रतिशत हैं। परिषद की स्थापना से सभी गैरबोडो नाराज हैं और वे चाहते हैं कि इस परिषद को भंग कर दिया जाए। उनकी शिकायत है कि उन्हें विकास में उनका उचित हिस्सा नहीं मिल रहा है। दूसरी ओर, बोडो अपनी आबादी इतनी ब़ाना चाहते हैं कि वे उस इलाके में बहुसंख्यक हो जाएं और इस आधार पर बोडो परिषद के गठन को औचित्यपूर्ण ठहराया जा सके।
हिंसा के पीछे एक अन्य कारण यह है कि समझौते के अनुसार, बोडो अतिवादियों को अपने हथियार समपिर्त करने थे परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया और आज भी ये अतिवादी अपनी बंदूकें लिए क्षेत्र में घूमते रहते हैं और गैरबोडो रहवासियों को आतंकित करते हैं। बोडो अतिवादियों को आज भी आग्नेय अस्त्र आसानी से उपलब्ध हो रहे हैं और सरकार ने मुख्यतः राजनैतिक कारणों से उनसे ये अवैध हथियार जब्त करने की कोई कोशिश नहीं की है। असम की सरकार एक गठबंधन सरकार है, जिसका एक हिस्सा बोडो नेशनल फ्रंट भी है और इस कारण मुख्यमंत्री, बोडो को नाराज नहीं करना चाहते।
कोकराझार में हिंसा 6 जुलाई को तब शुरू हुई जब मोटरसाईकिलों पर सवार और बंदूकों से लैस चार बोडो युवक एक गांव में पहुंचे और दो मुसलमानों की हत्या कर भाग गए। जिला प्रशासन ने उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की क्योंकि जिले के डिप्टी कमिश्नर और कलेक्टर, दोनों ही बोडो हैं। इसके बाद अज्ञात लोगों (जिन्हें बंगाली मुसलमान माना जा रहा है) ने चार पूर्व अतिवादी बोडो को मार डाला और फिर बड़े पैमाने पर हिंसा शुरू हो गई। अब जाकर जिले के डिप्टी कमिश्नर और कलेक्टर को हटाया गया है और कलेक्टर का निलंबन भी कर दिया गया है।
अगर यही कार्यवाही पहले कर दी जाती तो बड़े पैमाने पर हुआ खूनखराबा और तबाही रोकी जा सकती थी। परंतु मुख्यमंत्री, जिला प्रशासन की अकर्मणयता के मूक दशर्क बने रहे और उन्होंने अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की। जब हिंसा फैलने लगी तब मुख्यमंत्री ने केन्द्र सरकार से सहायता मांगी और सेना की तैनाती किए जाने का अनुरोध किया। परंतु सेना के इलाके में पहुंचने तक बहुत देर हो चुकी थी और हिंसा नियंत्रण के बाहर हो गई थी। इस सिलसिले में प्रधानमंत्री डॉ़ मनमोहन सिंह की इस बात के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने न केवल मुख्यमंत्री को हिंसा रोकने के लिए कड़ी कार्यवाही करने के निर्देश दिए वरन वे स्वयं भी प्रभावित इलाके में पहुंचे। प्रधानमंत्री की यात्रा के पहले तक मुख्यमंत्री ने हिंसाग्रस्त क्षेत्र में जाने की जहमत नहीं उठाई थी।
यह महत्वपूर्ण है कि असम में दंगे भड़कने की यह पहली और आखिरी घटना नहीं है। अगर त्वरित और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आगे भी खूनखराबे, आगजनी और दंगों का दौर चलता रहेगा। सबसे पहला कदम, जो कि तुरंत उठाया जाना चाहिए, वह है बोडो अतिवादी युवकों का नि:शस्त्रीकरण। इन युवकों तक आग्नेय अस्त्र किस रास्ते से पहुंच रहे हैं इसका पता लगाकर उस पर रोक लगाई जानी चाहिए। बोडो युवकों को खुलओम हथियार लेकर घूमने और गैरबोडो रहवासियों को आतंकित करने की इजाजत कोई सरकार नहीं दे सकती।
बोडो अतिवादी, गैरबोडो निवासियों से जबरिया पैसे की वसूली भी करते हैं और जो लोग पैसे देने से इंकार करते हैं उनके पशु और अन्य घरेलू सामान लूट लिया जाता है। इस तरह की घटनाओं के कारण जनता में भारी आक्रोश है। यह कहना मुश्किल है कि सरकार बोडो अतिवादियों से हथियार छीनने के लिए प्रभावी कदम उठा सकेगी या नहीं क्योंकि बोडो, सत्ताधारी राजनैतिक गठबंधन के हिस्से हैं।
दूसरे, बोडो क्षेत्रीय परिषद की स्थापना से उत्पन्न समस्याओं से निपटने की भी जरूरत है। बोडो कुल आबादी के एकतिहाई से भी कम हैं परंतु क्षेत्र का शासन उनके हाथ में है। एक तरीका तो यह हो सकता है कि बोडो क्षेत्रीय परिषद में गैरबोडो सदस्यों को पर्याप्त संख्या में शामिल किया जाए। क्षेत्र के अल्पसंख्यक समुदाय को शासन के पूरे अधिकार सौंपना, केन्द्र सरकार का एक अन्यायपूर्ण कदम था। मुसलमानों के अतिरिक्त वहां कोच्ची, राजभोंगशी, संथाल और आदिभाषी भी हैं हालांकि गैरबोडो में मुसलमानों की संख्या सबसे अधिक है। अतः या तो बोडो क्षेत्रीय परिषद की स्थापना के लिए फरवरी 2003 में किए गए समझौते को रद्द किया जाना चाहिए या परिषद में गैरबोडो प्रतिनिधियों को उनकी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए।
तीसरे, बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ के बारे में अतिश्योक्तिपूर्ण प्रचार का प्रभावी खण्डन किया जाना चाहिए और वैज्ञानिक आंकड़े देश के सम्मुख प्रस्तुत किए जाने चाहिए। बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ के बारे में दुष्प्रचार से न केवल असम बल्कि पूरे देश में अकारण तनाव फैल रहा है।
ये कुछ कदम हैं जो हालात को बेहतर बनाने के लिए तुरंत उठाए जा सकते हैं। इस समस्या को केवल कानून और व्यवस्था की समस्या मानना भूल होगी। यह एक राजनैतिक समस्या है जिसका राजनैतिक हल निकाला जाना चाहिए। कुछ बोडो नेता अत्यंत गैर जिम्मेदाराना बयान जारी कर रहे हैं और यह दुर्भाग्यपूण्र है कि नेशनल काऊंसिल आफ चर्चिस ऑफ इंडिया के महासचिव श्री रोजर गायकवाड़ ने यह बेसिरपैर का वक्तव्य जारी किया है कि बांग्लादेशी मुसलमानों ने असम में दस हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है। यह गैरजिम्मेदारी की हद है।
यह सचमुच दुःखद है कि असम के पड़ोस में स्थित म्यानामांर में वहां के सैनिक शासकों द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों का बड़े पैमाने पर कत्ल किया जा रहा है और इसके लिए भी उसी बहाने का उपयोग किया जा रहा है जिस बहाने से भारत में बंगाली मुसलमानों को मारा जा रहा है। यह स्थिति इसलिए भी और दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि हमारा देश एक प्रजातंत्र है। हां, एक महत्वपूर्ण फर्क यह है कि भारत में केन्द्र सरकार और विशेषकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने असम में भड़की हिंसा की आग को बुझाने के लिए प्रभावी कदम उठाए हैं जिनमें तीन सौ करोड़ रूपये के राहत पैकेज की घोषणा शामिल है। म्यानांमार में तो वहां की सैनिक तानाशाह सरकार क्रुरतापूर्वक रोहिंग्या मुसलमानों को मौत के घाट उतार रही है और अपनी इस कार्यवाही को औचित्यपूर्ण भी ठहरा रही है।
किसी भी क्षेत्र में बाहर से आकर लोगों के बसने को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है परंतु इस अप्रवासन का राजनैतिक हित साधन के लिए दुरूपयोग नहीं होना चाहिए और न ही आंकड़ों की बाजीगरी की जानी चाहिए। शांति स्थापना के लिए राजनैतिक परिपक्वता तो आवश्यक है ही यह सुनिश्चित किया जाना भी जरूरी है कि असम में एक शताब्दी से भी अधिक समय से रह रहे जातीय व भाषायी समूहों को सुरक्षा मिले और प्रगति व समॢद्धि में हिस्सेदारी भी।

डॉ़ असगर अली इंजीनियर
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