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बुधवार, 31 अगस्त 2016

हिन्दुवत्व वादी राष्ट्र देश के लिए खतरा

  सांसद अली अनवर संबोधित करते हुए
 



 मज़हब पर आधारित राष्ट्र का निर्माण हमलोगों ने नहीं किया था. जिन लोगों ने मज़हब के आधार पर राष्ट्र का निर्माण किया था उनके टुकड़े  हो रहे हैं. हमने एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र का निर्माण किया था इसलिए हम एक हैं. जो शक्तियां हिन्दुवत्व वादी राष्ट्र बनाना चाहती हैं. उनका वास्तविक मंसूबा देश के टुकड़े-टुकड़े करना है.
यह उदगार आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ के राष्ट्रीय अध्यक्ष व सांसद अली अनवर ने बाराबंकी जनपद के बेलहरा कस्बे में आयोजित पसमांदा एवं शोषित अधिकार सम्मलेन को संबोधित करते हुए कहा कि 1940 में चालीस हज़ार पसमांदा मुसलमानों ने इंडिया गेट पर प्रदर्शन करते हुए धर्म पर आधारित राष्ट्र के निर्माण का विरोध किया था. 
                   श्री अनवर ने कहा "हिन्दू हो या मुसलमान पसमांदा समाज है एक समान" के नारे के साथ हमको मस्जिदों व कब्रिस्तानो में बराबारी चाहिए देखने में आता है कि बहुत जगह पर हलालखोर, भाठीयारो या निचले दर्जे के लोगों को कब्रिस्तान में लोग गाड़ने से मना करते हैं और मस्जिदों का भी बंटवारा कर रखा है. उन्होंने आगे कहा हलालखोर व हरामखोर में अंतर करना पड़ेगा तभी समाज में सभी लोगों को सम्मान मिल सकेगा. 
प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए
सभा को संबोधित करते हुए आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ के प्रदेश अध्यक्ष वसीम राईन ने कहा कि बिहार की तरह से पिछड़ा वर्ग आरक्षण में 18 % अति पिछड़ों को आरक्षण उत्तर प्रदेश में भी दिया जाए. वहीँ जनसभा की संयोजिका नाहिद अकील ने कहा कि " वोट हमारा राज तुम्हारा नहीं चलेगा-नहीं चलेगा ."संसद और विधानसभाओं में पसमांदा समाज को आबादी के हिसाब से प्रतिनिधित्व दिया जाए. 
         जनसभा को जनाब हाजी निसार राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पसमांदा मुस्लिम महाज़, जनाब मोहम्मद खालिद सचिव मुस्लिम मजलिसे मुशावरात व तारिक सिद्दीकी आदि ने संबोधित किया. जनसभा में कारी सत्तर, अनीसुल अंसारी, मोहम्मद हसन, फहीम अंसारी, मुजक्किर सिद्दीकी, रुखानी, जनाब शकील बेलहरी आदि प्रमुख लोग उपस्थित थे.

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

धर्म के नाम पर अधर्म का उन्माद

 अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में गत् 19 मार्च को फरख़ंदा नामक· एक 27 वर्षीय मुस्लिम लड़की को  स्वयं को धर्म के ठेकेदार बताने वाले मुस्लिम उन्मादियों की  हज़ारों की  भीड़ द्वारा जि़ंदा जला कर मार डाला गया तथा उसकी जली हुई क्षत-विक्षत लाश को काबुल नदी में इन्हीं उन्मादी आसामाजिक तत्वों द्वारा फेंक दिया गया। उन्मादियों का आरोप है कि इस युवती ने कुरान शरीफ को जलाकर इस धार्मिक किताब के साथ बेअदबी की थी। जबकि दूसरी ओर लड़की के भाई नजीबुल्ला मलिकज़ादा तथा फरख़ंदा के पिता ने ऐसे सभी आरोपों को  झूठा करार दिया है। फरख़ंदा के परिजनों  का कहना है कि वह पांचों वक्त की नमाज़ नियमित रूप से अदाक रती थी। उसने इस्लामिक स्टडीज़ में डिप्लोमा भीकर रखा था। इतना ही नहीं बल्कि वह नियमित रूप से कुरान शरीफ की तिलावत भी किया करती थी तथा अपने धर्म व धार्मि· पुस्तकों का दिल से सम्मान करती थी। लिहाज़ा उसपर लगाए जाने वाले सभी आरोप झूठे व निराधार हैं। कुरान शरीफ जलाए जाने की घटना से फरख़ंदा का कोई लेना-देना नहीं है। जबकि संयुक्त राष्ट्र ने इस घटना के संबंध में अपनी जांच के बाद यह पाया है कि फरखंदा मानसिक रोगी थी। इस युवती को भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डालने व उसके बाद उसे जलाए जाने व उसके शव को नदी में फेंके जाने जैसी अमानवीय घटना ने अफगानिस्तान सहित पूरे विश्व के मानवता प्रेमियों को विचलितकर दिया है। इस घटना के विरोध में अफगानिस्तान में उदारवादी वर्ग के लोग खासतौर पर महिलाओं द्वारा ज़बरदस्त रोष व्यक्त किया जा रहा है।

                इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का एक दु:खद पहलू यह भी था कि जिस समय धर्मांध लोगों कीउग्र भीड़ द्वारा फरखंदा को पीटा व जलाया जा रहा था उस समय अफगानिस्तान पुलिस के कर्मचारी तमाशाई बने इस पूरे घटनाक्रम को देख रहे थे। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गऩी ने भी इस घटना को एक जघन्य अपराध बताया है। तथा पूरे घटनाक्रम की जांच के लिए आयोग गठित करने का आदेश दिया है। राष्ट्रपति गऩी ने यह भी स्वीकार किया कि जिस पुलिस ने तालिबानों के विरुद्ध संघर्ष करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की  है वही अफगान पुलिस ऐसी घटनाओं से निपटने हेतु पूरी तरह से प्रशिक्षित नहीं है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अफगान पुलिस का 90 प्रतिशत ध्यान तालिबान विरोधी लड़ाई की ओर रहता है जबकि यह उनकी संवैधानिक भूमिका  नहीं है। बहरहाल सूत्रों के  मुताबिक· फरखंदा की इस बेरहम हत्या के आरोप में 21 लोगों को गिरफ्तार  किया गया है जिनमें 8 तमाशबीन पुलिस·र्मी भी शामिल हैं। इस घटना के विरुद्ध अफगानिस्तान की महिलाओं के  गुस्से का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि  जो मुस्लिम महिलाएं आमतौर पर शव यात्रा में शामिल नहीं होतीं तथा किसी शव यात्रा में उन्हें मर्दों के साथ कब्रिस्तान में जाने की  इजाज़त नहीं होती उन्हीं महिलाओं ने बड़ी संख्या  में फरखंदा की शव यात्रा में न केवल शिरकत कीबल्कि उसके  शव को नहलाने-धुलाने से लेकर उसके ताबूत को कंधा देने व उसके अंतिम संस्कार यानी  कब्र में उतारने तक में आक्रोशित मुस्लिम महिलाएं नकाब पहने हुए अग्रणी भूमिका में रहीं। शव यात्रा के  पूरे मार्ग में महिलाओं द्वारा अल्लाह ओ अकबर की सदाएं बुलंद की गईं तथा प्रदर्शन रूपी इस शव यात्रा में सरकार से यह मांग की गई की महिलाओं तथा मानवता के विरुद्ध इस प्रकार का जघन्य अपराध अंजाम देने वाले समस्त अपराधियों व उनके समर्थको को ·ड़ी सज़ा दी जाए। इस घटना से एक बात और साबित हो रही है कि अफगानिस्तान की जो पुलिस उन्मादी भीड़ के हाथों से एक लड़कीको जि़ंदा नहीं बचा सकी वह पुलिस तालिबानों अथवा अन्य समाज विरोधी दुश्मनों से अफगानिस्तान की जनता को आखिरकैसे बचा सकती है? इस घटनाका सीधा सा अर्थ यही निकलता है कि पुलिस ऐसे हालात से निपटनेके लिए कतई सक्षम नहीं है।

                कुरान शरीफ को  जलाने अथवा इसके साथ बेअदबी करने के  हादसे तथा ऐसी घटनओं के विरुद्ध जनता का उन्माद पहले भीकई बार दुनिया के कई देशों में भड़कते हुए देखा जा चुका है। अफगानिस्तान में ही अमेरिका द्वारा संचालित बगराम जेल में 2012 में कुरान शरीफ के जलाए जाने की घटना ने अमेरिकी सेना के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी हिंसा का रूप धारण कर लिया था। पांच दिनों तक यह हिंसा अफगानिस्तान के विभिन्न भागों में फैली हुई थी। इस हिंसा में 30 लोग मारे गए थे। इसी प्रकार नवंबर 2014में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में लाहौर से 60 किलोमीटर की  दूरी परकोट राधा किशन नामक स्थान पर एक ईसाई दंपत्ति को मुसलमानों की उन्मादी भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डाला गया तथा बाद में उनकी लाशों को ईंट के  भट्टे में झोंककर जला दिया गया था। इस दंपत्ति पर भी यह आरोप था कि इसने कुरान शरीफ को जलाया तथा बाद में जले हुए कुरान के पन्नों को कूड़ेदान में फेंक दिया । हालांकि  इस मामले ने भी बाद में एक विवाद का रूप ले लिया था। ऐसी खबरें आईं थीं कि ईसाई दंपति पर कुरान शरीफ के अपमान का आरोप लगाने वाले एक मौलवी ने जानबूझ कर रंजिश के तहत ईसाई दंपत्ति पर ऐसा इल्ज़ाम लगाया था। यह घटनाएं ये सोचनेके लिए मजबूर करती हैं कि क्या धर्म के नाम पर उन्माद फैलाने वाली उग्र भीड़ को यह अधिकार हासिल है कि वह जब चाहे किसी के भी विरुद्ध ऐसे गंभीर व संवेदनशील आरोप मढ़कर उसे सामूहिक हिंसा का निशाना बनाए? उसे पीट-पीट कर मार डाले और उसकी लाश को स्वयं आग के हवाले कर दे? यदि यह मान भी लिया जाए कि कुरान शरीफ का अपमान अथवा बेहुरमती करने वाले ऐसे अपराध करते भी रहे हैं तो भी क्या इस्लाम धर्म या इसकी शिक्षाएं इस बात की इजाज़त देती हैं कि कुरान शरीफ के साथ बदसलूकी करने वालों को किसी उग्र भीड़ द्वारा इसी प्रकार की कुर्र्ता पूर्ण  सज़ाएं दी जाएं?

                कभी ऐसी घटनाओं को लेकर तो कभी हज़रत मोहम्मद अथवा इस्लाम विरोधी कार्टूनों के प्रकाशन को लेकर मुसलमानों की इस प्रकार की  उग्र व उन्मादी भीड़ के सड़को पर उतरने व हिंसा पर उतारू होने ·ीअने· घटनाएं विश्व ·े विभिन्न देशों में होती रही हैं। ज़ाहिर है ऐसी सभी घटनाओं के पीछे मुसलमानों की कटरपंथी व रूढ़ीवादी सोच तथा ऐसी सोच का पोषण करने वाले धर्मगुरु शामिल रहते हैं। यही लोग अपनी तकऱीरों के द्वारा अपने वर्ग के  अनुयाईयों मेंआकरोष  भड़काते हैं। भले ही एसे धर्मगुरु यह क्यों न समझते हों कि वे इस प्रकार का उन्माद व उत्तेजना फैला·र तथा किन्हीं एक-दो व्यक्तियों पर ऐसे दोष मढ़कर उनके विरुद्ध भीड़ को हिंसा पर उतारू होने हेतु वरगलाकर अपने धर्म की सेवा कर रहे हों अथवा पुण्य लूट रहे हों या अपने लिए जन्नत जाने का मार्ग प्रशस्तकर रहे हों। परंतु वास्तव में इस प्रकार की हिंसक प्रतिक्रियाएं न केवल धर्म व इस्लामी शिक्षाओं के विरुद्ध हैं बल्कि  इस प्रकार की हिंसक घटनाओं से इस्लाम धर्म कलंककित होता है। ऐसी ही  ज़हरीली सोच ने पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गर्वनर सलमान तासीर की हत्या उन्हीं के अंगरक्षक द्वारा सिर्फ इस लिएकरा दी थी क्योंकि सलमान तासीर पाकिस्तान में लागू ईश निंदा कानून पर पुनर्विचार किए जाने के पक्षधर थे। इस घटना के बाद भी एक सवाल यह पैदा हुआ था कि मलिक  मुमताज़ हुसैन कादरी द्वारा सलमान तासीर का  अंगरक्षक होने के बावजूद उनकी हत्याकर देना कहां का धर्म है? क्या इस्लाम धर्म इस बात की इजाज़त देता है कि किसी के अंगरक्षक के रूप में उसकी सुरक्षा कादायित्व संभाल रहे व्यक्ति द्वारा स्वयं अपने ही स्वामी की हत्या किए जाने जैसा घृणित अपराध किया जाए? और इससे अधिक अफसोसनाक यह कि कादरी द्वारा इस घिनौने अपराध को अंजाम देने के बाद पाकिस्तान की अदालत में पेशीके समय उसी हत्यारे पर फूल बरसाए गए तथा उसका कट्टरवादी मुस्लिम समाज द्वारा जिनमें तमाम वकील भी शामिल थे, ज़ोरदार स्वागत किया
ऐसी घटनओं को रोकने के लिए विश्वस्तर पर मुस्लिम धर्मगुरुओं के संगठित होने तथा ऐसे उन्मादको रोकने हेतु अपने-अपने अनुयाईयों को  नियंत्रित करने व उन्हें सहनशीलता का  पाठ पढ़ाए जाने की बहुत सख्त ज़रूरत है। यदि कहीं इस प्रका र का  ईश निंदा संबंधी अपराध होता भी है तो स्थानीय न्याय व्यवस्था तथा स्थानीय शासन व प्रशासन पर भरोसा करते हुए संबंधित घटना से कानूनी तौर पर निपटने की ज़रूरत है। निश्चित रूप से कुरान शरीफ इस्लाम  का सबसे पवित्र व सम्मानित धर्म ग्रंथ है। इसका अपमान मुसलमानों में स्वभाविक रूप से ग़ुस्सा पैदा कर सकता है। परंतु यही इस्लाम धर्म और यहीकुरान शरीफ मानवता का पाठ भी पढ़ाता है। निहत्थे पर ज़ुल्म  करने से भी रोकता है। महिलाओं पर अत्याचार करना या किसी के शव को जलाया जाना या उसे जि़ंदा जला दिया जाना इस्लामी शिक्षा  का हिस्सा कतई नहीं है। न ही ऐसे घृणित अपराध अंजाम देकर दुनिया  का कोई भी धर्मगुरु या कोई मुसलमान जन्नत में जाने या पुण्य ·मानने का दावा कर सकता है। ऐसे कृत्य पूरी तरह से इस्लाम विरोधी व मानवता विरोधी हैं।
  -तनवीर जाफरी

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का 'विदेशियों' से घृणा करो जिहाद

हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का उन समुदायों.जिन्हें वे 'विदेशी' बताते हैं.को कलंकित करने का तरीका बहुत दिलचस्प है। व्ही.डी. सावरकर ने अपनी पुस्तक 'हिन्दुत्व' में लिखा है 'लोगों को एक राष्ट्र के रूप में एकजुट करने और राष्ट्रों को राज्य का स्वरूप देने में कोई भी चीज इतनी कारगर नहीं है जितनी कि सबका शत्रु एक ही होना। घृणा बांटती भी है और एक भी करती है।' सावरकर ने मुसलमानों और ईसाईयों के रूप में उस शत्रु को ढूंढ निकाला। ये वे समुदाय थे, जिनके पवित्रतम तीर्थस्थल सिंधुस्तान अर्थात सिंधु नदी से अरब सागर तक में फैले भूभाग,से बाहर थे। हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों ने इस शत्रु का निर्माण करने में बहुत मेहनत की है। यह अलग बात है कि यह शत्रु काल्पनिक अधिक है वास्तविक कम, पौराणिक अधिक है ऐतिहासिक कम। पहले उनके निशाने पर केवल मुसलमान थे परंतु सन् 1998 में एनडीए के सत्ता में आने के बाद से, उन्होंने ईसाईयों को भी हिन्दुओं का धर्मपरिवर्तन करवाने के नाम पर कटघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया।
हिन्दू संगठन बड़े सुनियोजित ढंग से उन मुद्दों को चुनते और प्रचारित करते हैं,जिनका इस्तेमाल 'विदेशी समुदायों' पर कीचड़ उछालने के लिए किया जा सकता है। पहले उनके शीर्ष स्तर के नेता, चुनिंदा लोगों को प्रशिक्षित करते हैं। फिर ये प्रशिक्षित प्रचारक, उन मुद्दों को स्थानीय स्तर पर ले जाते हैं। वे मुद्दों को बढ़ाचढ़ा कर प्रस्तुत करते हैं और कभी.कभी नये मुद्दों का आविष्कार भी कर लेते हैं। इन मुद्दों पर वे तब तक लगातार बोलते रहते हैं जब तक कि कम से कम कुछ लोगए खतरे को वास्तविक और गंभीर न मानने लगें और संबंधित समुदाय के प्रति नकारात्मक रवैया न अपना लें। जब ऐसे लोगों की संख्या पर्याप्त हो जाती है तब उन्हें काल्पनिक'शत्रु' पर हमला करने के लिए उकसाया जाता है।
सबसे पहले कुछ'कट्टरपंथी तत्व'किसी ऐसे मुद्दे को उठाते हैंए जिसके जरिये'शत्रु' समुदाय को बदनाम किया जा सके। अगर उस मुद्दे पर विपरीत प्रतिक्रिया होती है और मीडिया में उसकी निंदा की जाती है तो उसे वहीं छोड़ दिया जाता है। इसका उदाहरण है पब जाने वाली महिलाओं पर हमले या वैलेन्टाइन डे मनाने का विरोध। परंतु यदि किसी मुद्दे या हिंसक हमले पर जनविरोध नहीं होता, उसकी निंदा नहीं की जाती, तब कोई स्थापित हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन उस मुद्दे को उठाना शुरू कर देता है। उससे संबंधित नया साहित्य तैयार किया जाता है और काल्पनिक तथ्यों के सहारे उसे अधिक मसालेदार बनाया जाता है। फिर उस मुद्दे पर व्यापक अभियान छेड़ दिया जाता है ताकि'शत्रु समुदाय' के प्रति अविश्वासए घृणा और गुस्से का वातावरण निर्मित किया जा सके। अंत में, उस मुद्दे को भाजपा, राज्य व शासन के स्तर पर उठाती है। हिंदू राष्ट्रवादी संगठन, दरअसल,किसी बास्केटबाल या फुटबाल टीम की तरह काम करते हैं। खिलाड़ी ;संगठनद्ध, बॉल ;मुद्दे को ड्रिबिल करते हुए फारवर्ड खिलाड़ी तक ले जाते हैं ताकि वह गोल कर सके। बाबरी मस्जिद का मुद्दा भी इन विभिन्न चरणों से गुजरा। सन् 1949 में वहां राम की मूर्तियां स्थापित की गईं और मस्जिद के दरवाजे, मुसलमानों के लिए बंद कर दिए गए। केवल एक पुजारी को अंदर जाकर स्थापित की गई मूर्तियों की पूजा करने की इजाजत दी गई। फिर,  विहिप ने'रामजन्मभूमि मंदिर' को आम लोगों के लिए खोले जाने की मांग को लेकर सन् 1986 में अभियान शुरू किया। यह अभियान इतना सफल हुआ कि आज बड़ी संख्या में लोग यह जानते हैं कि भगवान राम का जन्म ठीक.ठीक किस स्थान पर हुआ था भले ही उन्हें यह नहीं मालूम कि राम कब.यहां तक कि किस सदी में.जन्मे थे। मंदिर मुद्दे के आंदोलन ने इस 'तथ्य' को स्थापित किया कि मुसलमान बादशाहों ने मस्जिदों का निर्माण करने के लिए मंदिरों को ढहाया। ऐसा दावा किया गया कि देश में कम से कम ऐसी 3000 मस्जिदें हैं जिन्हें मंदिरों के मलबे पर खड़ा किया गया है। इन मस्जिदों की सूची कभी सामने नहीं आई। इसका कारण स्पष्ट था। सूची न होने के कारण कभी भी किसी भी मस्जिद को मंदिर की जगह बनाया गया होना बताना आसान था।
उसी तरह, गुजरात के सन् 2002 के मुस्लिम.विरोधी दंगे भी अचानक नहीं हुए थे। यह कहना कि ये दंगे ट्रेन आगजनी की क्रिया की प्रतिक्रिया थे,असलियत पर पर्दा डालना है। दरअसल, मुसलमानों और ईसाईयों को अलग.अलग बहानों से,हिन्दुओं का शत्रु बताने का क्रम तब से जारी था जब से भाजपा वहां पहले चिमनभाई पटेल के गुजरात जनता दल के साथ मिलकर और बाद में अपने बलबूते पर सरकार चला रही थी।
हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का 'गौहत्या विरोधी अभियान' भी इसी तर्ज पर चलता है। किसी भी ऐसे वाहन को जिसमें मवेशी ले जाए जा रहे हों और जिसका मालिक या ड्रायवर मुसलमान हो, को रोक लिया जाता है। वाहन के मुसलमान ड्रायवर या मालिक की पिटाई की जाती है और मीडिया में यह प्रचार किया जाता है कि मुसलमान, गैरकानूनी ढंग सेए गायों को काटने के लिए ले जा रहे थे। यह तब भी होता है जब मवेशी गायें हों ही ना या जब गायों को किसी ऐसे व्यक्ति के पास ले जाया जा रहा होए जिसने उन्हें वैध तरीके से पालने के लिए खरीदा हो। यह सब ऐसे स्थानों पर किया जाता है जहां हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को राजनैतिक संरक्षण उपलब्ध हो या कम से कम जहां के पुलिस अधिकारी और मीडिया उनके साथ सहानुभूति रखते हों। इस कड़े परिश्रम के बदले, हिंदू राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं को 'जब्त' किए गए मवेशी इनाम के रूप में मिल जाते हैं।
इसी तरह के अभियानों के जरिये यह धारणा लोगों के मन में बैठा दी गई है कि मुसलमानों की कई बीवियां होती हैं, वे ढेर सारे बच्चे पैदा करते हैं और जल्दी ही उनकी आबादी,हिन्दुओं से ज्यादा हो जायेगी। यह भी कहा जाता है कि वे देश के प्रति वफादार नहीं हैं और उनकी वफादारी केवल उनके धार्मिक नेताओं और पाकिस्तान के प्रति है। यह भी आरोप लगाया जाता है कि वे आक्रामक और हिंसक समाजविरोधी तत्व हैं जो अपनी ही महिलाओं का शोषण करते हैं और जिनके नैतिक और सामाजिक मानदंड एकदम अलग हैं।
ईसाईयों को इस आधार पर बदनाम किया जाता है कि उनका पवित्रतम तीर्थस्थल भारत के बाहर, जेरूसलेम में है और वे हिंदुओं को तेजी से ईसाई बना रहे हैं। किसी व्यक्ति के अपनी इच्छा से ईसाई बनने को भी मुद्दा बना लिया जाता है। इस मसले को लेकर हिंसा और अतिश्योक्तिपूर्ण दावों के आधार पर कई जिलों में अभियान चलाए गए। जब भाजपा ने राज्यों में और एनडीए ने केन्द्र में सत्ता संभाली, तब ईसाईयों के खिलाफ हिंसा और तेज कर दी गई। गुजरात के डांग और मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में ईसाईयों पर हमले की घटनाओं में नाटकीय वृद्धि हुई। और फिर,प्रधानमंत्री ने धर्मपरिवर्तन पर राष्ट्रीय बहस का आव्हान किया।
हिंदुत्व को प्यार से क्यों नफरत है?
हिंदुत्ववादियों को यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगता कि दो समुदायों के सदस्यों के बीच सद्भाव या प्रेम के रिश्ते बनें। उन्हें यह बिल्कुल नहीं भाता कि हिंदुओं और 'शत्रु समुदायों'के आराधना के तरीकोंए संस्कृति या सभ्यता में कुछ भी समान हो। वे बिल्कुल नहीं चाहते कि दोनों समुदायों के सदस्य एक ही मोहल्ले में रहें या उनमें आपसी वैवाहिक रिश्ते बने। हिंदुत्व पर अपनी पुस्तक में सावरकर लिखते हैं,'हमारे और हमारे शत्रु के बीच जितनी समानतायें होंगीए, हमारे लिए शत्रु का विरोध करना उतना ही मुश्किल होता जायेगा। जिस शत्रु से हमारी कुछ भी समानता न होए उसका हम सबसे मजबूती से विरोध कर सकते हैं।' किसी भी प्रकार की समानता न बन सके और यदि होए तो उसे समाप्त कर दिया जाये, इसके लिए दूसरे समुदायों को बदनाम करने के अभियान चलाये जाते हैं, जिनमें हिंसा का भी इस्तेमाल होता है। छोटे.मोटे अंतरों जैसे खानपान की आदतों, को बढ़ाचढ़ा कर प्रस्तुत किया जाता है। यह धारणा कि मुसलमान व ईसाई 'हम' से एकदम अलग हैं उन इलाकों में अधिक मजबूत है जहां सांप्रदायिक हिंसा का इतिहास है। इसका सबसे ताजा उदाहरण मुजफ्फरनगर है। सितंबर 2013 में वहां भड़की हिंसा के पहले तकए इलाके के जाटों और मुसलमानों की एक जैसी परंपराएं और सामाजिक रीतिरिवाज थे। वे एक ही बोली बोलते थे और यहां तक कि दोनों में ही सगोत्र विवाह पर प्रतिबंध था। अंतर केवल एक था.और वह यह कि वे अलग.अलग जगहों पर अपने खुदा की इबादत करते थे। दंगों के बाद जब हम मुजफ्फरनगर गए तो हमने पाया कि वहां के हालात एकदम बदल चुके हैं। गांवों के लोग अब 'वे' और 'हम' की भाषा में बात करने लगे थे। सांप्रदायिक हिंसा की हर घटना के बाद,संबंधित शहर में मिलीजुली आबादी वाले मोहल्ले कम हो जाते हैं और लोग ऐसे इलाकों में रहना पसंद करने लगते हैं जहां उनके समुदाय के लोग अधिक संख्या में हों। सन् 1993 के दंगों के बाद मुंबई में भी यही हुआ। मीरा रोड और मुंबरा में मुसलमानों की बड़ी.बड़ी बस्तियां बन गईं। इन बस्तियों में आपको ढूंढने पर भी कोई हिंदू घर नहीं मिलेगा। हाल में प्रवीण तोगडि़या ने एक ऐसे मुसलमान के विरूद्ध हिंसा करने के लिए भीड़ को उकसाया जिसने एक हिंदू इलाके में फ्लैट खरीदा था। यहां तक कि यह धमकी भी दी गई कि अगर उसने यह फ्लैट नहीं छोड़ा तो फ्लैट पर जबरन कब्जा कर लिया जायेगा।
हम जिस समुदाय को हिन्दू कहते हैं, वह, दरअसल एक विविधवर्णी समाज है,जिसके सदस्य कई भाषाएं बोलते हैं, 33 करोड़ अलग.अलग देवी.देवताओं की आराधना करते हैं व जिसमें नास्तिक भी शामिल हैं। उनके विभिन्न समूहों के अलग.अलग दर्शन हैं, जिनमें मूलभूत अंतर हैं। उनके कई धार्मिक ग्रंथ हैं और वे असंख्य जातियों में विभाजित हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म की कोई सर्वमान्य परिभाषा देना बहुत कठिन है। हिंदुत्व का लक्ष्य यह था कि जहां एक ओर इस विविधता के महत्व को कम किया जाएए वहीं दूसरी ओर, जातिगत ऊँचनीच को मजबूती दी जाए। सावरकर के शब्दों में,'अगर भारत को अपनी आत्मा के अनुसार अस्तित्व में बने रहना है,चाहे आध्यात्मिक तौर पर या राजनैतिक दृष्टि सेए तो उसे वह ताकत नहीं खोनी चाहिए जो राष्ट्रीय और नस्लीय एकता से मिलती है।' जातिगत ऊँचनीच को बनाए रखते हुएए राष्ट्रीय और नस्लीय एकता स्थापित करने के लक्ष्य को पूरा करने का तरीका सावरकर ने 1923 में हिंदुत्व पर लिखी अपनी पुस्तक में बताया है। उनका कहना है कि देश में उन लोगों की रगों में एक खून बह रहा है जिनकी पुण्यभूमि सिंधुस्तान में है। हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों ने एक खून और नस्लीय शुद्धता पर आधारित राष्ट्रवाद की इस अवधारणा को हिटलर से लिया है।
एक समस्या यह थी कि इस एक खून वाले सिद्धांत से वह वर्ग प्रभावित नहीं होता जो जाति के पिरामिड के सबसे निचले पायदान पर था और जिसका दर्जा जानवरों से भी नीचा था और जिसे रोजाना अपमान झेलने पड़ते थे। इसलिए इस विविधतापूर्ण समाज को हिन्दू राष्ट्र के सांचे में ढालने के लिए यह जरूरी था कि एक समान शत्रु का निर्माण किया जाए। इस लक्ष्य की प्राप्ति में हिंसा के इस्तेमाल से हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को कोई परहेज नहीं था।
यही कारण है कि इन संगठनों के लिए अंतर्धार्मिक विवाह एक बड़ा मुद्दा हैं। अगर अंतर्धार्मिक विवाह होंगे तो वे हिंदुओं जैसे विविधवर्णी समुदाय को एक राष्ट्र व एक नस्ल का स्वरूप नहीं दे सकेंगे। सावरकर ने बहुत पहले कहा था कि अपने शत्रु और स्वयं में किसी भी प्रकार की समानता को ढूंढने से राष्ट्र कमजोर होता है। उनकी पुस्तक में म्लेच्छों द्वारा साधुओं की लड़कियों का अपहरण करने की चर्चा है। विभाजन के बाद हुए खूनी दंगों के पश्चात, भारत में पहला बड़ा सांप्रदायिक दंगा, जबलपुर में सन् 1961 में हुआ था जब ऊषा भार्गव नाम की एक लड़की, एक बड़े मुस्लिम बीड़ी व्यापारी के लड़के के साथ भाग गई थी। मीडिया में इस घटना का बहुत आक्रामक ढंग से प्रस्तुतिकरण हुआ और यह आरोप लगाया गया कि मुस्लिम युवक ने ऊषा भार्गव के साथ बलात्कार किया है। इस दुष्प्रचार से तंग आकर ऊषा भार्गव ने आत्महत्या कर ली। सन् 1998 में गुजरात के पंचमहल जिले के रणधीकपुर और बारडोली में अंतर्धार्मिक विवाहों के बहाने दंगे भड़काये गये। विहिप ने बिना किसी सुबूत के यह आरोप लगाया कि रणधीकपुर में मुस्लिम युवक, हिन्दू लड़कियों को अगवा कर उनके साथ बलात्कार कर रहे हैं। उस छोटे से गांव में रहने वाले 60.70 मुस्लिम परिवारों को अपनी जान बचाने के लिए गांव से भागना पड़ा। वे तीन महीनों तक अपने गांव नहीं लौट सके। बारडोली में जून 1998 में वर्षा शाह और हनीफ मेमन ने शादी कर ली। इसके बाद इस भाजपा शासित प्रदेश में हिंदुत्व की विचारधारा के अनुरूप, यह कानून बना दिया गया कि अंतर्धार्मिक विवाह के पंजीकरण के पूर्व,  प्रशासन से अनुमति लेना आवश्यक होगा। अगर किसी हिंदू राष्ट्रवादी संगठन को ऐसा विवाह होने की सूचना मिलती है तो वे इतना हंगामा खड़ा कर देते हैं कि अगर लड़का.लड़की और उनके माता.पिता विवाह के लिए राजी हों तब भी विवाह नहीं हो पाता। हाल में अहमदाबाद में मुस्लिम महिलाओं के लिए आयोजित एक कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों ने बताया कि गुजरात में अंतर्धार्मिक विवाह करना असंभव है। हमें बताया गया कि ऐसे युगलों के लिए एकमात्र रास्ता यह है कि वे किसी दूसरे राज्य में भाग जायें और वहां शादी कर लें। परंतु इससे उनके परिवार और विशेषकर 'शत्रु समुदाय' के परिवार की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। उन्हें अपना कामकाज भी छोड़ना पड़ता है। किसी दूसरे राज्य में जाकर रोजगार पाना आसान नहीं होता और ना ही अपने परिवार से नाता तोड़ लेना और मुसीबत के समय अपने समुदाय से सहायता मिलने की उम्मीद समाप्त कर लेना सब के लिए संभव होता है।
बाबू बजरंगी को ऐसे प्रेमी युगलों को अलग करने में विशेषज्ञता हासिल थी। तरीका बहुत आसान था। लड़के के विरूद्ध अपहरण और बलात्कार का मामला दर्ज करो और गुजरात पुलिस को उसके पीछे लगा दो। उसे पकड़ने के बाद उसका इस ढंग से 'इलाज' करो कि प्रेमी युगल के सामने अलग होने के सिवाए कोई रास्ता न बचे।
-इरफान इंजीनियर

सोमवार, 3 मार्च 2014

संघी विचारधारा और पीएम की कुर्सी के बीच झूलते मोदी

सन् 1999 से 2004 तक स्वघोषित रूप से प्रतिबद्ध स्वयंसेवकों के नेतृत्ववाली वाली एनडीए सरकार का दुस्साहस एक समय इतना बढ़ गया था कि उसने भारतीय संविधान की समीक्षा के लिए एक आयोग का ही गठन कर दिया था ताकि, उसमें से स्वतंत्रता, समानता और न्याय (जो वस्तुतः फ्रांसीसी क्रांति की देन हैं), जैसे विदेशी मूल्यों को निकाला जा सके। उस समय संघ परिवार की ही एक शाखा विश्व हिंदू परिषद के नेता आर्चाय धर्मेद्र और गिरिराज किशोर ने तो एक कदम आगे बढ़कर संविधान में किये जाने वाले परिवर्तनों को भी सुझा दिया था परन्तु आयोग के सदस्यों को लगा कि अगला चुनाव जीतने के बाद ही संविधान बदला जाए। लेकिन भाजपा नेतृत्व का संविधान बदलने का मुंगेरीलाल का यह सपना पूरा नहीं हो सका क्योंकि वह आम चुनाव के बाद सत्ता से बेदखल हो गयी थी।
                                                     कहा जाता है कि इतिहास के पास पुराने सवालों का जवाब देने का एक तरीका यह भी होता है कि वह नित नए सवाल उठाता रहे। जिस तरह आज देश की मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों की जमातें नमो-नमो का दिन रात जाप कर रही हैं, इन पुराने सवालों के जवाब में नए सवालों का उठाया जाना बहुत ही जरूरी हैं। आज जब प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए मोदी की छटपटाहट लगातार बढ़ रही है,
मोदी को इन सवालों से दो चार होना ही पड़ेगा कि वह स्वाधीनता, समानता, धर्मनिरपेक्षता और न्याय जैसे आधारभूत सामाजिक मूल्यों में कोई विश्वास करते हैं अथवा नहीं? वस्तुतः उनके वैचारिक राजनैतिक पूर्वज, संघ परिवार के दार्शनिक और मार्गदर्शक बी.डी सावरकर ने मनुस्मृति को ही नियमों और कानूनों का आधार माना था। जैसा कि खुद सावरकर ने अपनी एक पुस्तक के अध्याय ‘मनुस्मृति और महिलाएं’ में लिखा है ‘मनुस्मृति वह ग्रंथ है जो वेदों के पश्चात हमारे हिंदू राष्ट्र के लिए अत्यंत पूजनीय है तथा प्राचीनकाल से हमारी संस्कृति, आचार, विचार और व्यवहार की आधारशिला बन गयी है। यह ग्रंथ सदियों से हमारे राष्ट्र के एहिक एंव पारलौकिक यात्रा का नियमन करता आया है। आज भी करोड़ों हिंदू जिन नियमों के अनुसार जीवन
यापन तथा व्यवहार-आचरण कर रहे हैं वे नियम तत्वतः मनुस्मृति पर ही आधारितहै। आज भी मनुस्मृति हिंदू नियम है’ (सावरकार समग्र, खंड 4 पृष्ठ संख्या 415)
                                                            बहरहाल, हम सभी इससे वाकिफ हैं कि मनुस्मृति में शुद्रों और महिलाओं के लिए क्या प्रावधान हैं। मनुस्मृति में कहा गया है कि यदि शुद्र किसी ब्राह्मण को धर्मोपदेश देने का दुस्साहस करे तो राजा को उसके कान और मुंह में गरम तेल डाल देना चाहिए (आठ/272 मनुस्मृति)। यह तो मात्र एक नमूना मात्र है जिसे मोदी के वैचारिक प्रतिनिधि और संघ के स्वयंसेवक कानून का आधार मानते हैं। आज मोदी अपनी सभाओं में खुद को चाय वाला या पिछड़ा कह कर वोट मांग रहे हैं, और पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से वे खुद को राजनीतिक अछूत बता कर वोटरों से वोट मांग रहे हैं, क्या मोदी को पता भी है कि
मनुस्मृति के अनुसार शुद्रों के साथ क्या व्यवहार किया जाता है?
                                                                        एक बात और, मोदी लगातार राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रवाद की बातें करते हैं। अपनी सभाओं में तिरंगे के खातिर जान देने की बातें तक करते हैं। परंतु, जिस राजनीतिक धारा से मोदी आते हैं उसका इतिहास इन सारी धारणाओं के एकदम ही विपरीत रहा है। संघ परिवार के बहुत सारे लोगों का मानना था कि आजाद के बाद भारत का विलय नेपाल में हो जाना चाहिए, क्योंकि नेपाल दुनिया का एक मात्र हिंदू राष्ट्र है। खुद सावरकर ने नेपाल नरेश को स्वतंत्र भारत का ‘भावी सम्राट’ घोषित किया था। (ए.एस भिंडे-बिनायक दामोदर सावरकर, व्हीर्लस विंड प्रोपोगेंडा 1940, पृष्ठ संख्या 24)। मोदी जिस तिरंगे को
भारत की शान कहते हैं उस तिरंगे को संघ परिवार ने कभी स्वीकार ही नहीं किया। आजादी के पहले तो संघ के स्वयंसेवकों ने तिरंगे को कई बार फाड़ा और जलाया भी था। जाने माने समाजवादी नेता एन.जी गोरे 1938 में घटित ऐसी ही शर्मनाक घटना के गवाह रहे हैं जब हिंदुत्ववादियों ने तिरंगे को फाड़ा और जलाया था। क्या मोदी जैसे कथित राष्ट्रवादी को ऐसी घटनाओं पर दुख नहीं पहंुचता है? क्या संघ के इस शर्मनाक कृत्य के लिए मोदी को माफी नहीं मांगनी चाहिए?

                                             गुजरात में मोदी के ही शासन में इतना बड़ा जनसंहार हुआ जिसमें मुसलमानों
को जानवरों की तरह मारा और काटा गया। परंतु चुनाव आते ही मोदी धर्मनिरपेक्ष हो गए। अभी हाल ही में अहमदाबाद में साबरमती के पास ‘बिजनेस विद हारमोनी’ नाम के एक मुस्लिम बिजनेस कांक्लेव का उद्घाटन करते हुए मोदी ने कहा कि समाज के विकास के लिए एकता जरूरी है और हिंदू तथा मुस्लिम
विकास की गाड़ी के पहिए हैं। खुद मोदी और संघ परिवार का कृत्य और विचार इस बयान के हमेशा विपरीत रहा है। हिंदु राष्ट्र में मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक ही माना गया। जिस तरह से मुस्लिम शासकों ने शासित हिंदुओं की रक्षा के लिए जजिया कर का प्रावधान किया ठीक उसी तर्ज पर संघी विचारधारा में, मुस्लिम आबादी को हिंदु राष्ट्र में उसके द्वारा दिए गए कर पर ही सुविधा मुहैया करवाने का प्रावधान है। आज भी मोदी के साथी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में हिंदू युवा वाहिनी के नेता योगी आदित्यनाथ खुले मंच से ऐसी ही बातें करते है
                                                वस्तुतः मोदी आज दो राहे पर खड़े हैं जहां एक रास्ता सावरकर के दर्शन पर आधारित राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का है तो दूसरा पीएम की कुर्सी का। खैर मोदी ने इतिहास की जानकारी के लिए विष्णु पांड्या और रिजवान कादरी को अपना सिपहसालार बनाया है। मोदी को चाहिए कि वे संघ के इन काले कारनामों को जानें और संघ से अपना नाता तोड़ लें। तभी पीएम की कुर्सी वाला रास्ता उनके लिए आसान होगा नही ंतो संघ से नाता नहीं तोड़ने वाले आडवाणी की तरह पीएम का उनका टिकट भी कभी कंफर्म नहीं हो पाएगा।
-अनिल यादव
क.न. 55 मुस्लिम बोर्डिग हाउस
इलाहाबाद विश्वविद्यालय इलाहाबाद
मो .न.09454292339

रविवार, 12 जनवरी 2014

एक था शहर 'मुजफ्फर नगर'

एक था शहर 'मुजफ्फर नगर' मुजफ्फर नगर दंगा पीड़ितों के शिविर से लौटकर

पिछले महीनों में उन्होंने अपने घर छोड़े,गांव छोड़ा और अपनी पुस्तैनी जमीनों से ज़िंदगी का नाता भी छूट गया. हर रोज उनके लिए मुश्किलें हैं, शहर की,सरकार कीए मौसम की, बाज़ार की इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल है कि साम्प्रदायिक दंगों के बाद किसी शहर की सूरत में कोई बदलाव आता है. शायद वक्त के साथ लोगों के चेहरों से खौफ थोड़ा उतर जाता है. शायद वह खौफ कहीं बहुत भीतर गुजर जाता है. कहना यह भी मुश्किल है कि चार महीने पहले हुए मुजफ्फर नगर दंगे के वक्त स्टेशन के बाहर टंगी यह बड़ी वाली होर्डिंग थी या नहीं.जो फिलहाल नई.नई सी दिख रही है और जिस पर लिखा है. हर.हर मोदी, घर.घर मोदी. बहुत कम समय में यह भी कहना मुश्किल है कि होर्डिंग पर लिखा यह सिर्फ तुकबंदी है या हर घर में
मोदी को पैदा किए जाने की कवायद. हर शहर अपनी छोटी.छोटी चीजों के जरि, सवाल पैदा करता है और अपने छोटे.छोटे प्रतीकों में जवाब देता है.शहरों के मोड़ पर लगी होर्डिंगें शहर की कलाई पर बधी घड़ियां होती हैं जो शहर की संस्कृति और राजनीति के मिजाज का समय बताती हैं.ऐसा क्यों होता है कि जिन शहरों में दंगे होते हैं  वहां मोदी की होर्डिंग                                  का  कद   बढ़ जाता है.ऐसा क्यों होता है कि ऑटो के स्टीयरिंग पर चिपका किसी मस्जिद का फोटो उधड़ जाता है.हमशक्ल दिखते लोगों के बीच वह कौन सा संतुलन है जो कुछ दिनों के भीतर इतना बिगड़ जाता है कि वे अपने पड़ोसी का कत्ल कर देते हैं. हाजिरा खातून जिन पडोसियों के घर रोटियां खाती थी वे इतने उन्मादी कैसे हो गए कि खा़तून को अपना गांव खेड़ी छोड़ना पड़ गया. इन सवालों के जवाब संसद के दरवाजे खोलकर आते हैं. जहां देश का हर नागरिकए धर्म और जाति में बांटकर वोट बन जाता है जो संसद जाने की तैयारी में जुटी पार्टियों के लिए एक 'ओट' का काम करता है'
पिछले चार महीने से मुजफ्फर नगरए दंगे होने और दंगे गुजर जाने के बाद का शहर बना हुआ है दंगाईयों के उन्माद कुछ दिनों के थे अब उन्माद के बाद का भय है,असुरक्षा है और कहीं पनाह न मिल पाने की बेबसी और एकजुट रहने का साहस है
  दंगे में पीड़ित ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के लोग अपना गांव छोड़कर कई किलोमीटर दूर चले आए हैं उनके घर छूट चुके हैंए जानवर भी छूट चुके हैं कई लोगों से बात करते हुए ऐसा लगा कि वे खुद को भी छोड़ आए हैंए उनके साथ बस एक मुसलमान चला आया है शिविरों में मौलवियों का भाषण जिसे और मजबूत बना रहा है उनके बच्चे, उनका परिवार है और उन सबके साथ उनके गांवों का भुगता हुआ का डर है किन्हीं सड़क के किनारे उन्होंने झुग्गियां बना ली हैं  कई.कई गांव एक साथ हो गए हैं हजार झुग्गियों वाले गांवए जिसने आसमान और जमीन के बीच लाल.नीली पालीथीन से खुद को ढक लिया है एक साथ और एकजुट होना शायद उनके भय को थोड़ा कम करता हैण् हिन्दू उन्मादियों जो मुजफ्फर नगर की स्थानीयता में जाट हैं,उनसे खुद को उन्होंने बचा लिया है सरकारों के लिए उनका जीवन.मौतए भय.आक्रोश, उजड़ना.बसना २०१४ के चुनाव में किन्हीं तारीखों का सवाल है सभी पार्टियां इस सवाल को ठीक ढंग से हल कर लेना चाहती है            
जनवरी की ज्यादातर सुबहें धुंध भरी होती होती हैं कुहरे की धुंध और ठंड में यह शहर मुजफ्फर नगर उत्तर.भारत के सबसे ज्यादा ठंडे शहरों में से एक है. इसी बरस कुछ देहाती इलाकों में पारा शून्य तक पहुंच चुका है. यहां ४ जनवरी के पहले की रातें और भी ठंडी रही है. इन्हीं किन्ही रातों में दंगा पीड़ितों के कैम्पों से कई बच्चों के ठंड से मरने की ख़बरें अखबारों में आई हैं.जिसके बाद मौसम और भी सर्द होता गया और वोटमार पार्टियों की राजनीति और भी गर्म होती गई है.अलग.अलग पार्टियों के काफिले यहां घूम रहे हैं. सब यहां रोटियां सेंकना चाहते हैं और राहत शिविरों के लोग अपने चूल्हे पर रोटी छोड़कर यह देखने के लिए जुट रहे हैं कि बात.बेबात से रोटियां कैसे सेंकी जाती हैं. थोड़ी देर बाद भूख उन्हें फिर से उनकी झुग्गियों की तरफ लेकर चली जाती है. इस बीच मौत की संभावनाएं और बढ़ती गई है. कई बच्चों को निमोनिया ने जकड़ रखा है. इन मौतों को ठीक.ठीक सरकार के द्वारा की गई हत्या नहीं कहा जाता क्योंकि ऐसी हत्याएं ईश्वर की मंजूरी के बिनाह पर होती हैं. जबकि इतनी सारी हत्याओं के बाद ईश्वर को भी हत्यारा कहना मुमकिन नहीं. वोट की राजनैतिक विद्रूपताओं ने पिछले कुछ वषों में प्राकृतिक आपदाओं और मौसमों के बदलाओं को अपने सियासती संभावनाओं में तब्दील करने की प्रवृत्ति अपनाई है.साम्प्रदायिक दंगे में हुई हत्याओं से उपजी जन असुरक्षाए सरकारों और पार्टियों के लिए राजनैतिक रूप से सुरक्षा और सुविधा मुहैया कराती है. यह अखबारों के लिए ख़बरए गैर.सरकारी संगठनों के लिए 'समाज.सेवा', राजनैतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं के लिए जन 'पक्षधर' होने का समय है. वे सब व्यस्त हैं और एक मामूली हो चुकी सड़क की अहमियत बढ़ गई है. कई सफेद गाड़ियां उन पर घूम रही हैं.  
४ जनवरी वह आखिरी तारीख थी जब मुजफ्फर नगर के दंगा पीड़ितों को अपने कैम्प खाली कर देने का आदेश सरकार ने दिया था. एक कैम्प की कुछ झुग्गियां उठकर सांझक के कब्रिस्तान में जा चुकी हैं. यह अखबार की खबर है जिसने सरकार की भाषा में लोगों के शिविरों में बसने पर आपत्ति सी दर्ज की है. अमर उजाला अहमियत देते हुए अपनी पहली ख़बर में शिइर में बसे पीड़ित लोगों फटकार रहा है.उसका ऐसा मानना है कि मुख्यमंत्री यह तय करेगा कि राज्य में कौन कहां रहेए कहां न रहे, जिए या मर जाए.जनता ने उसे पांच साल के लिए यह अधिकार दे रखा है. झुग्गियों में बसने की बेबसी को दुसाहस की तरह दर्ज किया गया है. मौत और हत्याओं के पहले कब्रिस्तान में बसना एक प्रतीक सरीखे है. जैसे दफ्न होने से पहले अपनी कब्र का मुआयना कर लेना, जैसे कब्र में जाने की पूरी तैयारी खुद करना, जैसे दंगे में बचकर सरकारी आदेश से मर जाना. कई कैम्प के लोगों ने कैम्प छोड़ने से मना कर दिया है. लगातार पुलिस की गाड़ियां आकर झुग्गियां हटाने का दबाव बना रही हैं. प्रदेश का मुख्यमंत्री झुग्गियों में बसे लोगों को भाजपा और कांग्रेस के लोग कह रहा है.क्योंकि सरकार ने दंगे में हुई हत्याओं के मुआवजे दे दिए हैं. पर हत्याओं और मौतों की संभावनाओं से उपजे व्यापक भय का कोई मुआवजा किसी सरकार के पास नही है. किन्ही और हत्याओं के बाद सरकार फिर से उनकी मौत के मुआवजे दे सकती है. सरकारों का यही चलन है वह जिंदा लोगों के लिए कुछ नहीं करती. मुआवजे देकर वह लोगों के लाशों की कीमत अदा कर देती है.अलग.अलग हत्याओं में मारे गए लाशों की दरें तय कर दी जाती हैं. जो दो लाख से पांच लाख तक हो सकती है.
मलकपुर कैम्प दंगा पीड़ितों का सबसे बड़ा कैम्प है. कुल छः वार्डों का कैम्प और हजार से ज्यादा झुग्गियों वाला कैम्प. दोनों किनारों पर अस्थाई रूप से दो मस्जिदें भी बनाई जा चुकी हैं. इसलिए अस्थाई रूप से अल्लाह को भी यहां रहने की मजबूरी सी है और उसकी गवाही में ३२ लोगों की मौतें इस ठंड में यहां हो चुकी हैं. लोगों की जिंदगियां बचाने में जैसे वह असफल सा रहा हो. बोराखुर्द, कैथल, सिसोली अलग.अलग गांवों के लोग अब पड़ोसी हो चुके हैं. ये सब के सब पीड़ित हैं और सब के सब मुस्लिम समुदाय के लोग हैं. यह कहते हुए मोदी,आडवानी और भाजपा के नेताओं का वह वाक्य याद आता है जिसे आतंकवाद और मुस्लिम के लिए वे अक्सर अपनी जन सभाओं में दुहराते रहते हैं. जिस समुदाय के आतंक में ये मुसलमान,झुग्गियों में रहने पर विवश हैं वे सब के सब हिन्दू हैं और शायद हिन्दू होने का उन्हें गर्व भी है. कैम्प छोड़ने के सरकारी आदेश पर बाते करते हुए अयूबए यासीन और सादिक खुद को अलाव से गर्म कर रहे हैं. कुछ झुग्गियों में चाय बन रही है और कुछ चूल्हों पर रोटियां सेंकी जा रही है. इन अस्थाई कैम्पों से जो बच्चे पढ़ने के लिए बगल के स्कूलों में जाते थे वे आज नहीं गए हैं. नजदीकी कस्बे में जो कुछ लोग मजदूरी के लिए जाते थे उनका काम आज बंद है. सरकार के आदेश को न मानने के लिए एक साथ और एकजुट रहना जरूरी है.सरकार उन्हें उनके घर लौटने का दबाव बना रही है. अनवर बताते हैं कि दंगे के कुछ दिन बाद उनका भाई काशिम घर के हालात देखने के लिए गांव की तरफ गया और दो महीने से नहीं लौटा.फिलहाल अनवर अपने भाई के न लौटने की आशंकाओं से घिरे हैं पर पड़ोसी उनकी आशंका को यकीन की तरह मान रहे हैं.उन्हें यकीन है कि अब वह कभी नहीं लौटेगा. यह उनकी असुरक्षा के प्रमाण हैं और यही वजहे हैं कि वे अपने गांव नहीं लौटना चाहते. कैम्पों में रहना मुश्किल हैए अस्थायी जिंदगियां बसर करना दुरूह भी पर यह सब जीवन बच जाने के बाद की बातें हैं.
शम्सुद्दीनए मलकपुर कैम्प के पांच नम्बर वार्ड में रहते हैं. वे कहते हैं कि वे सभी वार्डों में रहते हैंए वे घूमते रहते हैं और अपनी स्थितियों के साथ शिविर के और परिवारों का जायज़ा लेते रहते हैं. वे नज़्म लिखते हैं और शिविर के बच्चों को नजदीक के मदरसे में भेजने के लिए कहते हैं.एक अस्थायी जिंदगी में यह स्थायीत्व सा प्रयास है. वे हमे स्थानीय और उर्दू भाषा में मिश्रित अपनी लिखी एक नज्म सुनाते हैं. जिसके मायने हैं कि लफंगे, चौधरी हो गए हैं. चुनाव और वोट की राजनीति गुंडों का त्योहार बन गई है. जब इनका काम निकल जाता है तो नेता अपनी नज़र घुमा लेते हैं और ओड़ी.सोड़ी बात करते हैं. शमसुद्दीन कहते हैं कि हमे कोई सरकार नहीं बचाएगी. जब हमे कैम्पों से हटा दिया जाएगा तो हर जगह ऊपर आसमान है और नीचे जमीन हम इसी के बीच कहीं ठहर जाएंगे. यह एक बड़ा दायरा है और इसके बीच ठहरना नाउम्मीदी की हद तक गुजर जाने की बयानी है.कैम्प से कुछ लोग आज आसपास के गांवों की तरफ गए हैं. ताकि समर्थन जुटाया जा सके. ताकि कैम्प हटाने से बचाया जा सके. ज्यादातर महिलाएं चूल्हे पर कुछ न कुछ पका रही हैंए जैसे वे पकाती आई हैं. थोड़ी आग और थोड़ा धुआं हर झुग्गी पर दिख रहा है.
नूरपुर खुरगान कैम्प में राहुल गांधी के बड़े.बड़े पोस्टर लगे हुए हैं. किसी दिन की गुनगुनी धूप में यहां आकर राहुल गांधी ने अपना 'फर्ज अदा' कर दिया हैण् बच्चों को कपड़े बांटे गए हैं जिस पर 'कांग्रेस' लिखा हुआ है.इसी 'कांग्रेस'को पहनकर वे दिनभर झुग्गियों और सड़कों पर घूमते हैं. बच्चों के लिए यह ठंड से बचने की मजबूरी है और उनकी पीठ कांग्रेस के प्रचार के लिए जरूरी है. २०१४ के गर्मियों तक सभी पार्टियों को इस तरह के पीठ की जरूरत है.भाजपा कुछ पीठों को नंगा करती है और कुछ पार्टियां उसे ढक देती हैं. इस तरह से नंगा करने वाला भाजपा का और नंगा होने वाला ढंकने वाले का हो जाता है. साइस्ता इस कैम्प के पहले छोर पर रहती है. वे बागपत के तिलवाड़ा गांव से हैं.वे मानती हैं कि सब गड़बड़ हैं, कांग्रेस थोड़ी ठीक है. उसने ही हमारी थोड़ी मदद की है. उनके पति मोहसिन पेंटर का काम करते थे. पिछले तीन महीने से वे इसी कैम्प में रह रही हैं..यहां से उनके नातेदारों के घर नजदीक हैं.गांव में कुल दस घर मुस्लिमों के थे. दंगे के भय से सब चले आए. सब के सब अब नूरपुर कैम्प की झुग्गियों में रह रहे हैं. वे गांव जाने के बजाय यहां मरने को बेहतर मानती हैं. वे कहती हैं कि यहां अपने लोग हैं. कम से कम मरने के बाद वे दफन तो कर देंगे. कम से कम हमारी इज्जत तो बची रहेगी.उनके पड़ोस की झुग्गी डूंगर गांव मुजफ्फर नगर की है. दंगे के वक्त जब रात में वे लोग भागे तो अपने साथ एक बूढ़े को न ला सके. बाद में उन्हें पता चला कि मेरू नाम के उस बूढ़े को फासी लटकाकर मार दिया गया. दंगाई उनके जानवर अपने घर लेकर चले गए. इन सबके पास गांव में जमीने नहीं थी. जितना बड़ा इनका घर था उतनी ही बड़ी कुल जमीन थी.पर वह जमीन इन झुग्गियों से बड़ी थी और स्थाई भी. मौत और हत्याओं के भय से अपने घर को फिर से पाने की उम्मीद उन्होंने छोड़ दी है.ज़ाकिर कहते हैं कि आने वाले चुनावों के चलते यह सब और ज्यादा बढ़ सकता है.वे बेहद गरीब लोग हैए बहुत कम पढ़े.लिखे, मुसलमानों की स्थिति के लिए बरसों पहले बनाई गई सच्चर कमेटी की फाइलों में दर्ज ये वे लोग हैं जिनके हालात पिछले कई सालों से सरकारें सुधारने का वायदा कर रही थी और कर रही हैं.अपने जीवन के अनुभवों से उन्होंने चुनाव, हिंसा और भय को पढ़ लिया है. इस बार ये समाजवादी पार्टी से नाराज है और कांग्रेस को ठीक मान रहे हैंए इसके पहले नाराज हुए थे तो बहुजन समाज पार्टी की तरफ गए थे. वे अपनी हालातों और प्रायोजित दुर्घटनाओं के चलते पार्टियां बदल देते हैं पर इस सब के बीच जो स्थायी बचा रह जाता है वह है उनके हालात.
इसके अगले पड़ाव में कुछ ही दूरी पर एक मदरसा है. जिसके बगल में बनाए गए कैम्प को मदरसा कैम्प कहा जाता है. यह पिछले कैम्पों से छोटा है. शाहीन, फातिमा, ज़ोया ये बच्चियां है जिनकी ठंड और बीमारी से मौत हो चुकी है. इसके अलावा भी और कई बच्चे मर चुके हैं.वैदा और अनवरी खा़तून सरकारी आदेश से क्रोधित हैं.वे कहती हैं कि इस मौसम में कैम्पों में रहना हमारी चाहत नही है, यह हमारी मजबूरी है. यहां हम सब एक साथ हैं. अगर सरकार ने हमे यहां से भी हटाया तो हम कहां जाएंगे पर उनमे निराशा या हताशा के भाव नहीं हैं.वे एक मोटा सा डंडा उठाती हैं और कहती हैं कि हमने तय कर लिया है कि अगर हमे हटाया गया तो हम कहीं नहीं जाएंगे.हम सरकार को मार देंगे या मर जाएंगे. मर्दों से यह न होगा, हम ही लड़ेंगे उनसे, हम यहीं पर रहेंगे.
           - चन्द्रिका   

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

क्या यह सच है ?

थु है ऐसे हिन्दु हृदय सम्राटो पर.....
कड़वा सच आप के सामने हैं. मोदी की भतीजी का पति मुस्लिम क्यों है ? मोदी केमुख्यमंत्री निवास में रसोइया फरीद
भाई ही क्यों ? क्या अपनों के हाँथ
का बना खाना अच्छा नहीं लगता मोदी को ? बीजेपी के शाहनवाज हुसैन
जी की पत्नी मुरली मनोहर
जोशी जी की बेटी ही क्यों ? बीजेपी के मुख़्तार अब्बास
नकवी की पत्नी वी.एच.पी के अशोक सिंघल
जी की बेटी ही क्यों? लाल कृष्ण अडवानी की बेटी ने
दूसरी शादी की तो मुस्लिम के साथ क्यों की ? सुब्रमनियम स्वामी की बेटी सुहासिनी ने
मुस्लिम से शादी क्यों की ?शिव सेना बाल ठाकरे की पोतीने मुस्लिम से
शादी क्यों की ? समझ से परे है ! मुझे सिर्फ सुब्रमनियम
स्वामी की बेटी सुहासिनी हैदर का पता था ,
जो आई बी एन सेवन में
विदेशी मामलों की डेस्क एडिटर है. शाहनवाज़ की बीबी का नाम शायद रेणु है यह
पता था लेकिन वह जोशी जी कि बेटी है यह
इससे ही पता चला. इसी तरह मुख्तार अब्बास
नकवी की बीबी हिन्दू है यह तो मालूम था ,
जिसके कारण इन्हें पार्टी प्रवक्ता बनाया गया है
- लेकिन वह विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष
अशोक सिंघल की बेटी है , नहीं जानता था. शायद इसी कारण नकवी दो दिन पहले कुम्भ में
नरेंद्र मोदी की केंनवासिंग करने सन्त समाज के
बीच गए थे. इससे तो संघ परिवार के बड़े बड़े अलम्बरदार
एक्सपोज हो गए. नकवी और शाहनवाज़ का प्रवक्ता होने
का भी राज़ भी इससे खुलता है.

फेसबुक से साभार  

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

नई सामाजिक पहचानो को महत्व देना आवश्यक है .


यह हिन्दू वह मुसलमान यह पंडित , वह ठाकुर , यह यादव , वह हरिजन आदि जैसे संबोधन अभी आम समाज में जनसाधारण की एक प्रमुख पहचान बने हुए है | एक  दूसरे को इन्ही पहचानो , खासकर जातीय पहचानो के आधार पर ही संबोधित करने , बातचीत करने और हँसी -- मजाक करने का चलन गाँव से लेकर कस्बो तक में भी बना हुआ है |
बताने की जरूरत नही है कि ऐसे संबोधनों , पहचानो के साथ एक दूसरे के प्रति सदियों से बैठी उच्च व निम्न भावनाओं , लगावो के एकता व  अलगावो के तथा दूरियों व नजदीकियों के दृष्टि कोणों का भी परिलक्षण , प्रसफुटन  होता रहता है |
नि:सन्देह ऐसे प्रस्फुटन आधुनिक समाज में मौजूद पिछड़ेपन के पिछड़े संबंधो के प्रस्फुटन व परिलक्षण है ! इसमें भी कोई दो राय नही कि आज के समाज में खासकर भारत , पाक ,लंका , जैसे तमाम पिछड़े देशो में आधुनिक युग के साथ -- साथ भारी पिछडापन अभी भी मौजूद है |
जनसाधारण में पुराने युगों के आर्थिक -- सामाजिक आधार व सम्बन्ध अपने टूटते बदलते रूप व गुण के वावजूद खासी हद तक मौजूद है | उदाहरण --- इस देश में विभिन्न जातीय , पेशो व जातीय संबंधो ( खासकर शादी -- व्याह के संबंधो )
जातीय छोटे -- बड़ाई अलगाव -- दुराव आदि के रूप में तथा हिन्दू -- मुस्लिम , धार्मिक , साम्प्रदायिक  अलगाव -- दुराव के रूप में |
लेकिन आम समाज में आधुनिक युग के नए -- नए कामो -- पेशो के पहचानो को तथा उनसे बने व बन रहे नए सामाजिक संबंधो को वैसी प्रमुखता न मिल पाने और उनमे पुराने युगों की पहचानो , संबंधो को ही ज्यादा प्रमुखता मिलने का प्रमुख कारण क्या है  ? क्या उसका कारण समाज में विद्यमान पिछडापन ही है ? नही ! इसके अलावा इसका एक दूसरा  सर्वप्रमुख  कारण आधुनिक युग के उन राजनितिक व प्रचार माध्यमी प्रयासों में निहित है , जो लोगो में इन्ही पहचानो को प्रमुखता से बैठाने का काम करता रहता है | आधुनिक युग के पेशो , पहचानो व संबंधो समस्याओं को प्रमुखता नही देता है |
कहा जा सकता है कि इसमें वर्तमान दौर के राजनितिक व प्रचार माध्यमी हिस्सों की भूमिका कही ज्यादा है | हालाकि यह उन्ही की जिम्मेदारी थी कि वे समाज के शासकीय व प्रभावकारी हिस्से होने के नाते पिछड़ी स्थितियों , पहचानो व संबंधो को प्रमुखता से खड़ा करते | राष्ट्र व समाज के पिछड़ेपन को खत्म करते | पुराने युग की पहचानो को हटाने -- मिटाने के साथ नए युग की पहचानो को पनपाते बढाते | लेकिन उन्होंने अपने इस ऐतिहासिक
राजनितिक , सामाजिक एवं प्रगतिशील दायित्व को नही निभाया | उल्टे उन्होंने अपने धनाढ्य वर्गीय एवं परम स्वार्थी अर्थनीति तथा सत्ता स्वार्थी राजनीति के तहत आम जनता में उन्ही पुरानी पहचानो को ही बढावा देने का काम करते रहे | खासकर पिछले 30 -- 35 सालो से तो धर्म , जाति , इलाका भाषा के नए पुराने मुद्दों को उठाकर सत्ता स्वार्थी राजनीति को खड़ा करने का काम  होता रहा है | उसके जरिये जनसाधारण को धर्म , सम्प्रदाय जाति -- उपजाति तथा इलाका -- भाषा आदि की गोलबंदी में बाटने -- तोड़ने का काम करते रहे है और करते भी जा रहे है |
वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में विश्व कूटनीति के अमेरिकी व यूरोपीय विशेषज्ञ  इसी राजनीति को विश्व पैमाने पर बढावा देने में दशको से लगे हुए है | वे इस कूटनीति को उसी तरह से बढाने और फैलाने में लगे हुए है जिस तरह वे नई आर्थिक नीतियों को साम्राज्यी पूंजी और साम्राज्यी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हितो , स्वार्थो अनुसार पूरे विश्व में फैलाने बढाने में लगे हुए है | इसका सबूत यह भी है कि अमेरिका ने उदारीकरणवादी , वैविक्रानवादी तथा निजीकरणवादी आर्थिक  नीतियों को अन्तराष्ट्रीय स्तर पर बढावा देने के साथ 80 के दशक से ही धर्म , सम्प्रदाय , नस्ल , इलाका जाति , भाषा ,लिग के पहचानो की कूटनीति को भी फैलाना -- बढाना तेज किया गया |
90 के दशक के एकदम शरुआत में ही अमेरिकी विद्वान् व कूटनीतज्ञ सैम्युअल हटीगटन ने बहुचर्चित पुस्तक '' सभ्यताओं का संघर्ष '' के जरिये इसे और ज्यादा फैलाने  तथा औचित्यपूर्ण साबित करने का काम किया | पिछले 30 -- 40 सालो से अमेरिका व उसके सहयोगियों द्वारा इसी कूटनीति को अर्थनीति के साथ चरण -- दर -- चरण आगे बढाया जाता रहा है |
स्वाभाविक बात है कि तब से आज तक देश की विभिन्न राजनितिक पार्टिया एवं प्रचार माध्यमी स्तम्भ अन्तराष्ट्रीय अर्थनीति व कूटनीति के सहयोगी बनकर नई आर्थिक नीतियों को निरंतर आगे बढाने का काम कर रहे है | धर्म सम्प्रदाय , जाति -- उपजाति तथा इलाका -- भाषा की पहचानो को उभारने के साथ -- साथ आधुनिक युग की पहचानो को मजदूरों -- किसानो तथा विभिन्न कामो ,, पेशो की पहचानो व संबंधो तथा समस्याओं को उपेक्षित करते रहे है | उसे दबाते रहे है |
इसीलिए हिन्दू धर्मवादी , मुस्लिम धर्मवादी या फिर विभिन्न जातियों की जातिवादी , अगड़ावादी , पिछड़ावादी , और दलितवादी राजनीत करने में लगी पार्टियों और उनके नेताओं से जनसाधारण में आधुनिक युग की नई पहचानो को प्रमुखता देने की अब कोई उम्मीद नही की जा सकती | फिर उनसे इस बात की भी कोई उम्मीद नही की जा सकती है कि वे अब जनसाधारण में एकता , बराबरी और भाईचारगी को स्थापित करने का कोई प्रयास भी कर सकते है |
इन स्थितियों में जनसाधारण के बीच जनतांत्रिक दृष्टिकोण व व्यवहार खड़ा करने की जिम्मेदारी स्वंय  जनसाधारण तथा उसके उन प्रबुद्ध व ईमानदार लोगो पर आ गयी है | जिन्हें इस कूटनीति ने भ्रष्ट न किया हो | यह कार्यभार जनसाधारण के उन हिस्सों पर आ गया है , जो आधुनिक समाज में किसी व्यक्ति या समुदाय को प्रमुखत: उसके धार्मिक , जातीय व इलाकाई दृष्टि से न देखते हो |
बल्कि उसकी जगह वे उसे प्रमुखत: आधुनिक युग के तथा इस राष्ट्र के एक सदस्य के रूप में देखते हो | पुराने युगों  की पहचानो व संबंधो के आधार पर नही बल्कि आधुनिक युग के बन रहे व बढ़ रहे सम्बन्धो के आधार पर देखते है |
इसका यह मतलब कदापि नही कि पुराने युग की पहचान या सम्बन्ध खत्म हो गये है | नही ! ऐसी बात एकदम नही है | पुराने युग के संबंधो , पहचानो के अंतरविरोधो को जानना , समझना और उसका यथासंभव समाधान करना भी नितांत आवश्यक है | लेकिन क्या उन्ही पिछड़ी पहचानो व दृष्टिकोणों के साथ यह काम किया जा सकता है ?  एकदम नही ! उन आधारों पर तो आपसी भाईचारे का थोथा नारा लगाया जा सकता है , लेकिन दरअसल उसे स्थापित नही किया जा सकता | कोई भी व्यक्ति या संगठन यह काम आधुनिक युग की पहचानो दृष्टिकोणों को अपनाने तथा आत्मसात करने के साथ ही कर सकता है | उसी के जरिये ही कर सकता है |, जन साधारण समाज में एकता , भाईचारगी व बराबरी का बिदा उठाने वाले किसी भी व्यक्ति या संगठन को यह जरुर समझना होगा कि एक सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य की प्रमुख व बुनियादी पहचान आखिर क्या है ? एक धार्मिक , जातीय या इलाकाई समुदाय के रूप में लोगो के जीवन की बुनियादी आवश्यकताओ की पूर्ति नही हो सकती | उनकी पूर्ति समाज में मौजूद कामो के बटवारे और उन पर एक दुसरे की निर्भरता के जरिये ही हो सकती है और हो रही है | यह आपूर्ति हिन्दू -- हिन्दू , मुस्लिम -- मुस्लिम या ऐसे ही विभिन्न जातियों , इलाको के लोगो के जुडावो से नही बल्कि एक किसान , मजदूर , व्यापारी , अध्यापक , डाक्टर , वकील , उद्योगपति आदि के जुड़ाव में हो रही है | मतलब साफ़ है कि व्यक्ति या समुदाय का जीवन उसके हिन्दू या मुस्लिम होने से नही चल रहा है , बल्कि उसके किसान , मजदूर , दुकानदार , अध्यापक आदि होने के नाते चल रहा है | इन्ही कामो व पेशो से इनके बुनियादी जीवन की बुनियाद टिकी हुई है |
अत: सामाजिक जनतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि जनसाधारण के विभिन्न सामाजिक समुदायों में एक दूसरे के प्रति बैठे सदियों से पुराने दृष्टिकोण को बदलने की जरूरत है |
साथ ही उनके बीच मौजूद अन्तर्विरोध को जानने और पाटने -- घटाने का भी प्रयास किया जाए |
इसकी आवश्यकता इसलिए भी है कि वर्तमान समाज में विभिन्न सामाजिक समुदायों के जनसाधारण का आर्थिक आधार कमोवेश एक जैसा होता जा रहा है |
साथ ही टूटता भी जा रहा है | उन्हें महगाई , रोजी - रोजगार के संकटों में धकेलता जा रहा है | छोटी -- मोटी  सम्पत्तियों के मालिको को भी सम्पत्तिहीन  करता जा रहा है |
टूटते आर्थिक आधारों के साथ उन्हें एक ही प्लेटफार्म पर जमा करता जा रहा है | आधुनिक युग की अपनी बुनियादी समस्याओं के लिए एकजुट होने के आधार मुहैया कराता जा रहा है | लेकिन बिडम्बना यह है कि उनमे सदियों पुरानी धार्मिक , जातीय व अन्य सामाजिक अन्तर्भेद मौजूद है और अब उसका धन -- पूंजी सत्ता -- सरकार के लिए किया जा रहा  स्वार्थी व विखंडनवादी इस्तेमाल उनके इस प्लेटफार्म के बीच भारी दीवार खड़ी करता जा रहा है | लोगो में पुरानी सामाजिक पहचानो व संबंधो को नए रूपों में और नए -- नए हथकंडो से जगाता और उन्हें बाटता जा रहा है | इसीलिए भी आज जनसाधारण समाज के लिए नई पहचानो व संबंधो को जानना व समझना और उन्हें आत्मसात करना आवश्यक एवं अपरिहार्य हो गया है |


-सुनील दत्ता
 .पत्रकार

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

भारत में बांग्लादेशी मिथक व यथार्थ








असम में बोडो व मुसलमानों के बीच हिंसा, जिसके पीछे बांग्लादेशी घुसपैठियों का हाथ बताया जा रहा है, के कई दूरगामी परिणाम होंगें। इस हिंसा में लगभग अस्सी जानें गईं हैं। हिंसा अब भी जारी है और विस्थापितों की संख्या चार लाख से भी अधिक हो गई है। विस्थापित हुए लोगों में से कितने मुसलमान और कितने बोडो हैं, इस संबंध में कोई स्पष्ट आंकडे उपलब्ध नहीं हैं परंतु क्षेत्र में काम कर रहे सामाजिक कार्यकताओं का अनुमान है कि इनमें से अस्सी प्रतिशत मुसलमान व 20 प्रतिशत बोडो हैं. हिंसाग्रस्त क्षेत्र से जो थोड़ी बहुत जानकारी छन कर आ रही है, उससे ऐसा लगता है कि हिंसा पीडि़तों के लिए स्थापित किये गये शरणार्थी शिविरों में स्थितियां बहुत खराब हैं, विशेषकर मुस्लिम शरणार्थी अमानवीय स्थितियों में रहने के लिए विवश हैं। इस बीच, इस घटनाक्रम के संबंध में कई अलग-अलग किस्म की रायें सामने आ रहीं हैं। भाजपा नेता जोर देकर कह रहे हैं कि हिंसा के पीछे बांग्लादेशी घुसपैठिये हैं। उनकी संख्या एक से लेकर दो करोड़ या उससे भी ज्यादा बताई जा रही है. कहने की आवश्यकता नहीं है कि ये आंकडे कल्पना की उड़ान भर हैं. ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि कथित बांग्लादेशी घुसपैठियों ने अतिक्रमण किया है, स्थानीय निवासियों की जमीनें छीन लीं हैं और इससे उपजे असंतोष के कारण ही, समाज में उनके प्रति घृणा का वातावरण बन गया है। यही नफरत हिंसा का मूल कारण है. दरअसल, असम का घटनाक्रम एक ऐसा उदाहरण है जहाँ हिंसा से भी अधिक भयावह है, हिंसा-जनित विस्थापन.
चुनाव आयुक्त एच.एस.ब्रहमा, जो कि स्वयं बोडो हैं, ने तो यहां तक कहा है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या में भारी वृद्धि के कारण वे आक्रामक हो गये हैं और स्थानीय रहवासियों पर हिंसक आक्रमण कर रहे हैं। कुछ अन्य लोगों का कहना है कि बोडो स्वायत्तशासी क्षेत्रीय परिषद के गठन के बावजूद, अतिवादी बोडो समूहों ने अपने हथियार समर्पित नही किये हैं, जो कि परिषद के गठन की मांग को मंजूर करने की  आवश्यक शर्त थी। भाजपा नेतृत्व का एक हिस्सा इस विवाद को राष्ट्रीयता से जोड रहा है। इसका कहना है कि असम में चल रहा संघर्ष, भारतीयों और बांग्लादेशियों के बीच है। यह भी कहा जा रहा है कि इन बांग्लादेशियों से मताधिकार छीन लिया जाना चाहिए और उन्हें चुनावों में मत देने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए.  वैसे भी, उनमें से अधिकाशं लोगों को “डी“ अर्थात डाउटफुल या संदेहास्पद मतदाता घोषित कर दिया गया है। भाजपा और उसके सहयोगियों का आरोप है कि कांग्रेस, घुसपैठियों को प्रोत्साहन दे रही है ताकि वह उनका इस्तेमाल वोट बैंक बतौर कर सके। कुछ बोडो संगठनों ने यह धमकी दी है कि शरणार्थी शिविरों में बड़ी संख्या में रह रहे मुसलमानों को उनके गांवों में लौटने नहीं दिया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने अपनी रपट में कहा है कि असम में बांग्लादेशियों के बड़े पैमाने पर घुसपैठ की खबरों में सच्चाई नहीं है और असम की हिंसा, बोडो जातीय समूहों व असम में लम्बे समय से निवासरत मुसलमानों के बीच का विवाद है.
 इसके पहले कि हम इस मुद्दे पर चर्चा करें कि असम में रह रहे मुसलमान घुसपैठिये हैं, प्रवासी हैं या वहां लंबे समय से रह रहे बंगाली हैं, हम असम के घटनाक्रम के बाद हुई कुछ दुखद घटनाओं पर प्रकाश डालना चाहते हैं।
असम हिंसा के बाद, घृणा से लबरेज कई ई-मेलों व वेबसाइटो के माध्यम से, देश के अन्य हिस्सों में निवासरत उत्तर-पूर्व के रहवासियों को यह चेतावनी दी गई कि असम का बदला उनसे लिया जावेगा. नतीजे में देश के कई हिस्सों और विशेषकर बैंगलोर से बड़े पैमाने पर उत्तर-पूर्व के निवासी अपने गृह-प्रदेशों के लिए रवाना हो गये. जिन वेबसाइटों ने इन कुत्सित अफवाहें को हवा दी, उन्हें भारत सरकार द्वारा ब्लाक कर दिया गया। यह आरोप भी सामने आया कि इनसे बहुत सी वेबसाइटें पाकिस्तान से संचालित कीं जा रही थीं परंतु यह भी सही है कि कम से कम बीस प्रतिशत वेबसाइटें हिन्दुत्व समूहों द्वारा संचालित थीं. विहिप व अन्य हिन्दुत्व समूहों ने पर्चों के माध्यमों से यह दुष्प्रचार किया कि असम में बांग्लादेशी घुसपैठिये, हिन्दुओं पर हिंसक हमले कर रहे हैं। इस मामले में मुस्लिम कट्टरपंथी समूह भी पीछे नहीं रहे और उन्होंने मुंबई के आजाद मैदान में एक विरोध रैली का आयोजन किया, जिसके दौरान भीड़ के एक हिस्से द्वारा टीवी चैनलों की ओ.बी वैनों में आग लगा दी गयी और पुलिसकर्मियों पर हमले किये गये। मुंबई के पुलिस आयुक्त अरूप पटनायक ने स्थिति पर अत्यंत धैर्यपूर्वक और समझदारी से बहुत जल्द काबू पा लिया परंतु साम्प्रदायिक तत्वों और इस मुद्दे पर राजनीति करने के इच्छुक सत्ताधारी दल के एक तबके को यह रास नहीं आया और श्री पटनायक को उनके पद से मुक्त कर दिया गया.  धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ताओं और मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा, श्री पटनायक द्वारा की गई प्रभावी व धैर्यपूर्ण कार्यवाही की प्रशंसा कर रहा है।
जहां तक बांग्लादेशी घुसपेठियों का मुद्दा है, कई अनुसंधानकर्ताओं ने पिछली सदी के जनसंख्या संबंधी आंकड़ों के विस्तृत अध्ययन व विश्लेषण द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि क्षेत्र में रह रहे मुसलमान या तो विभाजन के पूर्व बंगाल से आये रहवासी हैं या सन् 1947 में विभाजन के समय वहां बसे हुए लोग हैं या सन् 1971 के बांग्लादेश युद्ध के दौरान भारत भाग कर आये शरणार्थी हैं। सन् 1985 का असम समझौता इस क्षेत्र में रह रहे  सभी लोगों को वैध निवासी का दर्जा देता है और इस श्रेणी में अधिकांश मुसलमान भी आ जाते हैं। इसके बाद भी कुछ मुसलमान असम में आये हैं परन्तु ये सब आर्थिक बदहाली के चलते अपना घर-बार छोड़ने पर मजबूर हुए हैं.   
 असम की जनंसख्या के चरित्र में बदलाव पिछली एक सदी से भी लम्बे समय में आया है। अंग्रेज शासकों ने एक नीति के तहत, तत्कालीन बंगाल में खेती की जमीन पर बढते दबाव को कम करने के लिए, बंगालियों को असम में बसने के लिए प्रेरित किया था। असम में सन् 1971 के बांग्लादेश युद्ध के समय आखिरी बार बड़ी संख्या में नये प्रवासी बसे। उसके बाद से बहुत कम संख्या में नये प्रवासी असम में आये हैं. जहां तक बड़े पैमाने पर घुसपैठ का प्रश्न है, ऐसा होने के कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। असम समझौते में यह प्रावधान है कि सन् 1971 के पहले तक वहां बसे सभी प्रवासी, वैध भारतीय नागरिक माने जायेंगे। अधिकांश मुसलमान इसी श्रेणी में आते हैं। जनगणना आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि सन् 1971 के बाद से क्षेत्र की जनसंख्या में कभी भारी वृद्धि दर्ज नहीं की गई। संपूर्ण भारत, असम राज्य व धूबरी, धीमाजी व करबी अबलोंग जिलों में सन् 1971 से 1991 के बीच की अवधि  में जनसंख्या की दशकीय वृद्धि दर क्रमशः 54ण्51ए 54ण्26ए 45ण्65ए 107ण्50 एवं 74ण्72 रही है। सन् 1991 से 2001 के दशक में यही आंकडे 21ण्54ए 18ण्92ए 22ण्97ए 19ण्45 व 22ण्72 रहे. सन् 2001-2011 के लिये ये आंकडे क्रमशः 17ण्64ए 16ण्93ए 24ण्40ए 20ण्30 एवं  18ण्69 थे. “मिथ ऑफ बांग्लादेशी एण्ड वाइलेंस इन आसाम“ में शिवम विज कहते हैं कि असम में प्रवास एक लम्बे समय में, शनैः शनैः हुआ है और सन् 1971 के बाद जनसंख्या में वृद्धि थम गई है।
अगर हम असम के दो जिलों- धीमाजी व करबी अबलोंग - की दशकीय आबादी वृद्धि दर को देखें तो यह स्पष्ट हो जावेगा कि इन दोनों जिलों व पूरे असम में, आबादी “मुस्लिम-बहुल सीमावर्ती“ जिले धूबरी की तुलना में कहीं तेजी से बढ़ी है। इसके बावजूद, इन जिलों में बहुत कम मुस्लिम आबादी है। इन दो जिलों में हिन्दू आबादी का प्रतिशत क्रमशः 95ण्94 व 82ण्39 है। यद्यपि इन जिलों की आबादी में तेजी से वृद्धि हुई तथापि आज भी मुसलमान, आबादी का मात्र 1ण्84 व 2ण्22 प्रतिशत हैं। यह तब जबकि 1961ण्71 में धीमाजी की आबादी 103ण्42 प्रतिशत बढ़ी और 1951ण्61 में करबी अबलोंग की 79ण्21 प्रतिशत। इन आंकड़ों से यह दिन के उजाले की तरह साफ है कि असम की उच्च दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर के पीछे, बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ नहीं वरन् कोई और कारण है। असम के कोकराझार जिले- जो बोडो क्षेत्रीय परिषद का मुख्यालय है - में जनसंख्या वृद्धि दर में कमी आई है। सन् 2001-11 में कोकराझार की दशकीय वृद्धि दर सबसे कम, अर्थात 5ण्19 प्रतिशत थी। यह दर सन् 1991-2001 में 14ण्49 प्रतिशत थी।
यथार्थ को स्वीकार कर और असम की आबादी संबंधी आंकड़ों के गहरे विश्लेषण से ही हम असम हिंसा की प्रकृति को समझ सकते हैं। यह एक तरह का जातीय संघर्ष है जिसमें एक जातीय समूह दूसरे जातीय समूह का दमन कर इलाके में  अपना वर्चस्व कायम करना चाहता है. आर्थिक विकास की कमी और  बढती बेरोजगारी ने खेती की जमीन पर दवाब बढा दिया है. और नतीजे में श्भूमि पुत्रश् आन्दोलन उठ खड़ा हुआ है. इस समय न केवल हिंसा पर रोक लगाने की जरूरत है वरन दोनों समुदायों के बीच सध्भव की कायमी और क्षेत्र में आधारभूत संरचना के विकास की भी आवश्कता है ताकि सभी नागरिकों को आगे बडगे के अवसर मिल सकें.


 -राम पुनियानी


रविवार, 8 जुलाई 2012

आतंक की राजनीति-मुस्लिम नौजवानों पर निशाना

देश की खुफिया एजेंसी द्वारा मुस्लिम नवजवानों का उत्पीडन गिरफ्तारियां पूरे देश में बढ़ रही हैंमुस्लिम नौजवानों को बिना किसी आरोप के पुलिस कस्टडी में कर लेती हैमारती पिट्टी है और टॉर्चर करती है और अंत में कई वर्षों के लिये जेलों में डाल दिया जाता हैबहुत से नौजवान कस्टडी में ही मर जाते हैं, अभी हाल ही में कतील सिद्दीकी नाम का व्यक्ति रहस्यमय परिस्तिथियों में यरवदा जेल पुणे में मार डाला जाता हैवह पिछले नवम्बर को गिरफ्तार किया गया था और जेल में मारा जाता था जो की अभी तक रहस्य बना हुआ है
फसीह मोहम्मद के बारे में अभी सब कुछ शांत है (घटना में शामिल था या नहीं) यह इंजिनियर सउदी अरब में उठा लिया जाता है उसके द्वारा घटना में शामिल होने के इनकार के बावजूद यू.पी. सरकार द्वारा कोई भी जिम्मेदारी भरा प्रयास नहीं किया गया कि उसके एक भारतीय नागरिक होने के कारण कुछ जरुरी कदम उठातीउसका परिवार न्याय के लिये इधर-उधर भटक रहा है
उर्दू पत्रकार सै. काजमी आतंक के आरोप में अब भी जेल में हैं जबकि अब भी उनके विरुद्ध पुलिस द्वारा आरोप पत्र दाखिल करना हैतारिक कासमी खालिद मुजाहिद को सोची समझी रणनीति के तहत कचहरी सीरियल बम विस्फोट में घरों से पकड़कर बाद में फर्जी बरामदगी दिखाई गयीप्रतापगढ़ के शौकत अली के विरुद्ध .टी.एस द्वारा साक्ष्य तैयार करने के उद्देश्य से फर्जी नाम से उसे लश्कर--तैयबा का एरिया कमांडर पत्र भेजकर नियुक्त किया गया और फिर उसे गिरफ्तार करने की तैयारी चल रही थी कि .टी.एस का भांडा फूट गया
ये सिर्फ बानगी भर है, अधिकृत रिपोर्ट बताती है कि कई मुस्लिम नौजवान भारतीय जेलों में कैद हैंमुस्लिम नागरिकों के साथ उत्पीडन यातनाएं बढ़ी है जहाँ अल्पसंख्यक अपने ही घर में सुरक्षित महसूस नहीं करता हैंजिस कारण अन्याय के विरुद्ध और आतंकी कौन है ? बताने के लिये एक संगठन बना कर मीटिंग करने का निर्णय लिया गया हैउक्त मीटिंग 9 जुलाई को कांस्टीट्यूशनल क्लब नई दिल्ली में होगी
मीटिंग में विभिन्न स्तरों पर एक त्वरित हल के लिये कार्ययोजना बनायीं जाएगी तथा "आतंक की राजनीति-मुस्लिम नौजवानों पर निशाना " गोष्ठी होगीगोष्ठी को श्री मुलायम सिंह यादव, श्री .बी बर्धन, श्री एच.डी. देवगौड़ा, श्री शरद यादव, श्री प्रकाश करात, श्री डी राजा, श्री गुरुदास गुप्ता, श्री मणिशंकर अय्यर, श्री हनुमन्त राव, श्री रामविलास पासवान समाज के वरिष्ठ प्रतिनिधि संबोधित करेंगे

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

सैनिक तानाशाही

हाल में म्यानामार के अराकान राज्य में रोहिंग्या मुसलमानों और बौद्घों के बीच हुए दंगों की खबर ने पूरे विश्व को चौंका दिया। इन दंगो में 100 से अधिक मुसलमान मारे गये और करोड़ो की संपत्ति नष्ट हो गई। अमन (एशियन मुस्लिम एक्शन नेटवर्क), जिसका फैलाव पूरे एशिया में है, ने इस क्षेत्र में शांति स्थापना की पहल करने का निर्णय लिया। म्यानामार (बर्मा) की छवि एक शांतिपूर्ण देश की है और वहां इस बड़े पैमाने पर दंगे होने की अपेक्षा किसी को नहीं थी।
यह तय किया गया कि म्यानामार के तीनों प्रमुख धार्मिक समुदायों अर्थात बौद्ध, मुस्लिम और ईसाई, के बीच अंतर्धार्मिक संवाद का आयोजन किया जावे। म्यानामार में मुसलमान, कुल आबादी का लगभग 10 प्रतिशत हैं। यांगोन (जिसे पहले रंगून कहा जाता था) में मुसलमानों की आबादी 20 प्रतिशत के आसपास है। यांगोन एक समय म्यानामार की राजधानी था परन्तु अब वह देश का सबसे बड़ा व्यावसायिक केन्द्र है। राजधानी अन्यंत्र स्थापित कर दी गई है।
अंतर्धार्मिक संवाद का आयोजन यांगोन में किया गया था। यांगोन मंझोले आकार का एक सुंदर शहर है। यहां खूब साफसफाई है और हरियाली भी बहुत है। यांगोन की आबादी लगभग 60 लाख है अर्थात मुंबई से करीब आधी। यहां मुंबई की तुलना में भीड़भाड़ बहुत कम है और जिंदगी की धीमी रफ्तार और भरपूर हरियाली इसे मुंबई से अलग करती है। मुंबई के विपरीत, यांगोन में गगनचुंबी इमारतें नहीं हैं। सबसे ऊंची इमारतों में दो होटलें शामिल हैं जो 25 मंजिला हैं। अन्य इमारतों में पांच से लेकर पंद्रह मंजिलें तक हैं। एक समय मुसलमान, यांगोन के काफी प्रभावशाली समुदायों में शामिल थे। उनमें से अधिकांश व्यापारी थे। अकेले सूरत शहर से इतनी बड़ी संख्या में मुसलमान वहां गये थे कि यांगोन में आज भी एक सुंदर सूरती मस्जिद है।
म्यानामार का मुस्लिम समुदाय अत्यंत विविधतापूर्ण है। बर्मी मूल के मुसलमानों की संख्या बहुत कम है। अधिकांश मुसलमान भारत के विभिन्न हिस्सों से आये प्रवासी हैं जो उस वक्त म्यानामार में बसे थे जब वह भारत का हिस्सा था। वहां बड़ी संख्या में तमिल, गुजराती, बंगाली और बोहरा मुसलमान हैं। उर्दू बोलने वाले मुसलमानों की संख्या बहुत कम है। अब तो सभी मुसलमान बर्मी भाषा बोलते हैं। अपने मुस्लिम नाम के अतिरिक्त इन सभी के बर्मी नाम भी हैं और सार्वजनिक जीवन में वे अपने बर्मी नाम व मुस्लिम समुदाय में अपने इस्लामिक नाम से जाने जाते हैं। उदाहरणार्थ, एक व्यक्ति का बर्मी नाम है चिटको ओ.ओ. और उसी व्यक्ति का इस्लामिक नाम है मो. नसीरउद्दीन। यही परंपरा वहां रह रहे थाईलैंड के मुसलमान भी अपनाते हैं।
यांगोन में दो स्थान सबसे प्रसिद्ध हैं। पहला, मुगल बादशाह बहादुरशाह ज़फर की कब्र और दूसरा, बर्मा का सबसे बड़ा बौद्ध पैगोडा। मैने दोनों स्थल देखे। बहादुरशाह जफर की कब्र अब भारत सरकार द्वारा बनवाई गई एक मस्जिद के अंदर है। उनकी इस असली कब्र का पता तब चला जब 199293 में मस्जिद के निर्माण के लिए खुदाई की जा रही थी। अंग्रेजों ने उन्हे गुप्त रूप से दफनाया था और असली स्थान से कुछ दूरी पर एक बड़ी सी प्रतीकात्मक कब्र बना दी थी। दोनो कब्रें आज भी हैं। मैं बहादुरशाह ज़फर की कब्र पर गया और भारत के इस महान स्वाधीनता संग्राम सेनानी को श्रद्घांजली दी। इस स्थल की सरकार द्वारा बहुत अच्छी तरह से देखभाल की जा रही है।
गोल्डन बौद्ध पैगोडा, बौद्धों का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है और यांगोन का एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण भी। असल में यह बहुत सारे बड़ेछोटे पैगोडा का काम्पलेक्स है और यहां हमेशा भीड़ बनी रहती है। अधिकांश इमारतों पर सोने की पर्त च़ी है जिससे ये बहुत सुंदर और आकर्षक लगती हैं। काम्पलेक्स के चारों ओर घनी हरियाली है। यहां बैठ कर अत्यंत शांति का अनुभव होता है। यह दुःखद है कि बुद्ध के इस देश में मानव रक्त अकारण बहाया गया। अब भी कोई नही जानता कि दंगो में कुल कितने लोग मारे गये। भगवान बुद्ध दया और अहिंसा की प्रतिमूर्ति थे परन्तु उनके ही अनुयायियों ने निर्दोषों का खून बहाने में तनिक भी संकोच नही किया। किसी भी धर्म के आदर्शों और उसके अनुयायियों के क्रियाकलापों में हमेशा बड़ा अंतर रहता है।
जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं, बर्मा एक शांतिपूर्ण देश है और यहां के तीनों प्रमुख धार्मिक समुदायों के सदस्य आपसी प्रेम और सद्भाव से रहते आये हैं। बर्मा के पश्चिमी प्रांत अराकान में सेना के सत्ता संभालने के बाद समस्याएं शुरू हुईं। यांगोन की अपनी यात्रा के पहले दिन 22 जून को मैं एक ईसाई शिक्षण संस्था में गया। मैंने वहां अंतर्धार्मिक संवाद और उसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। संवाद का लक्ष्य एकदूसरे को समझना है, एकदूसरे का मतांतर करना नहीं। धमांर्न्तरण की तो बात ही नहीं की जानी चाहिए। इससे संवाद की मूल आत्मा ही खतरे में पड़ जाती है। मैंने अंतर्धार्मिक व अंतर्सांस्कृतिक संवाद की अवधारणा पर विस्तृत प्रकाश डाला और इस बात पर जोर दिया कि विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक समुदायों के बीच सतत संवाद चलते रहने से समस्याएं या तो उत्पन्न ही नहीं होंगी और यदि होंगी भी तो जल्दी ही सुलझ जाएंगी।
हम लोगों ने इस मौके पर रोहिंग्या मुसलमानों के हालात पर चर्चा नहीं की वरन मुख्यतः अंतर्धार्मिक संवाद के सैद्घांतिक पक्ष पर विचार किया। इससे भी कई मुद्दों को स्पष्ट करने में मदद मिली। दंगाप्रभावित प्रांत में मार्शल लॉ लागू है और कफ्र्यू लगा हुआ है। वहां किसी को भी जाने की इजाजत नही है। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्रसंघ के
प्रतिनिधि को भी प्रभावित इलाके से बेंरग वापस कर दिया गया था। इस स्थिति में मेरे पास इसके सिवा कोई चारा न था कि मैं इस मुद्दे पर यांगोन के निवासियों से ही चर्चा करुं। यांगोन में काफी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान निवास करते हैं।
मुझे यह बताया गया कि यह आरोप सही नहीं है कि कुछ मुसलमानों ने एक बौद्ध लड़की के साथ बलात्कार किया था। सच तो यह है कि एक मुस्लिम युवक और बौद्ध नवयुवती आपस में प्रेम करते थे। उन्होंने विवाह कर लिया और स्थानीय निवासियों के गुस्से से बचने के लिए अपने घर छोड़ कर भाग गये। दो मुसलमान लड़कों ने इस युगल के विवाह और उसके बाद उनके वहां से भागने में मदद की। ठीक ऐसा ही कुछ जबलपुर में सन 1961 में हुआ था। एक मुसलमान लड़के और हिन्दू लड़की ने विवाह करने का निश्चय किया परन्तु अफवाह यह फैला दी गई कि लड़के ने लड़की के साथ जबरदस्ती की है। इसके बाद भड़के दंगों में 100 से अधिक लोग मारे गये और करोड़ो की संपत्ति स्वाहा हो गई।
यही कुछ राखियान प्रांत में भी हुआ परन्तु यह दंगो की असली वजह नहीं थी। दंगो की असली वजह थी रोहिंग्या मुसलमानों की नागरिकता का मसला। मैं इस मुद्दे पर आगे प्रकाश डालूंगा। बहरहाल, शादी करने वाला लड़का और उसकी मदद करने वाले दोनों लड़के पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए गये। जिस लड़के ने शादी की थी, वह पुलिस हिरासत में मर गया और कई रोहिंग्या मुसलमानों का यह आरोप है कि उसे शारीरिक यंत्रणा देकर मारा गया।
इससे भी अधिक दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जिन दो लड़कों ने विवाह करने में अपने साथी की मदद की थी उन्हे मृत्युदंड दिया गया है और जल्दी ही उन्हे फांसी दे दी जायेगी। यह केवल सैनिक तानाशाही में ही हो सकता है, किसी भी ऐसे देश मे नहीं, जहां कानून का राज है। किसी व्यक्ति के मामले की सुनवाई चंद दिनों में निपटा कर उसे मृत्युदंड दे देना कैसे न्यायपूर्ण हो सकता है। किसी भी व्यक्ति को मृत्युदंड देने से पहले की न्यायिक कार्यवाही महीनों और कबजब सालों तक चलती है। इस घटना से यह साफ है कि सैनिक तानाशाहों को मानवाधिकारों से कोई मतलब नहीं रहता।
बर्मा के मुसलमानो के लिए अभी सबसे जरूरी है इन दोनों लड़कों की जान बचाना। समुदाय का नेतृत्व इस सिलसिले में गहन विचारविमर्श कर रहा है। मैंने उन्हें सलाह दी कि वे अच्छे वकील की सेवाएं लें और ऊंची अदालतों में अपील करें। मैने उनसे यह भी कहा कि एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाओं से भी इस मुद्दे पर अभियान चलाने का अनुरोध किया जा सकता है।
दूसरा महत्वपूर्ण मसला है दंगा पीड़ितों को राहत पहुंचाने का। सरकार किसी को भी दंगा पीड़ित तक सीधे राहत पहुंचाने की इजाजत नही दे रही है। सरकार की यह शर्त है कि राहत सामग्री एक सरकारी संस्था को सौंप दी जाए जो कि उसे प्रभावित लोगों तक पहुंचाएगी। मुसलमानों का कहना है कि उन्हें यह भरोसा नही है कि सरकारी एजेंसी को सौंपी गई राहत सामग्री असली पीड़ितों को मिलेगी। कुल मिलाकर, रोहिंग्या मुसलमान परेशानियां भोग रहे हैं और उन्हें राहत की तुरंत आवश्यकता है। परन्तु स्वयंसेवी संस्थाओं को उन तक राहत पहुंचाने की इजाजत नहीं दी जा रही है।
आराकान (राखियान) प्रांत में रहने वाले रोहिंग्या मुसलमान बाहर से आकर यहां बसे हैं ठीक उसी तरह जैसे बर्मा के अन्य इलाकों, विशेषकर रंगून को प्रवासी मुसलमानों ने अपना घर बना लिया है। एक समय अराकान में मुसलमानों का राज था और इसलिए भी वहां बड़ी संख्या में मुसलमान आकर बस गये। परन्तु म्यानामार की वर्तमान सैनिक सरकार का कहना है कि उनमे से अधिकांश पिछले कुछ वर्षों में ही वहां आकर बसे हैं। सरकार उन्हें नागरिक नहीं मानती। दूसरी ओर, रोहिंग्या कहते हैं कि वे पिछले सौ सालों से भी अधिक समय से अराकान में रह रहे हैं।
यह कुछकुछ हमारे देश की असम और बांग्लादेश की समस्या की तरह है। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के नेताओं का आरोप था कि बांग्लादेशी मुसलमान बड़ी संख्या मे असम में बस रहे हैं और जल्दी ही वे वहां के बहुसंख्यक समुदाय बन जाएंगे। इसी प्रचार के चलते नेल्ली दंगे हुए जिनमें 4,000 बंगाली मुसलमान मारे गये। बंगाली मुसलमानों का भी यह कहना है कि वे घुसपैठिए नहीं हैं वरन पिछली सदी के तीसरे दशक के आसपास असम में आकर बसे थे और यह भी कि उनकी संतानें कई पीयिों से असमिया स्कूलों में पॄ रहीं हैं।
म्यानामार की सैनिक सरकार, रोहिंग्या मुसलमानों को नागरिक का दर्जा देने को तैयार नही है। इन लोगों का कहना है कि सन 1982 तक कोई समस्या नहीं थी और वे हर चुनाव में अपना मत देते थे। केंद्रीय सरकार में अराकान प्रांत से पांच मंत्री हुआ करते थे। इनमें से कई मुसलमान सऊदी अरब व अन्य देशों में काम कर रहे हैं परन्तु उनके पास बर्मा का पासपोर्ट नहीं है।
वे अवैध रूप से सीमा पार कर पड़ोसी बांग्लादेश मे घुस जाते हैं और वहां से अवैध पासपोर्ट बनवाकर खाड़ी के देशों मे काम करने चले जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि सऊदी अरब में वर्क परमिट पर कम से कम पांच लाख रोहिंग्या मुसलमान काम कर रहे हैं। यांगोन मे रहने वाले कई मुसलमानों के पास भी नागरिकता संबंधी दस्तावेज नहीं हैं। उन्हें पहचानपत्र तो दिये गये हैं परन्तु पासपोर्ट नही दिया जाता है। यह भी बर्मा में ब़ते विवाद का एक कारण है।
हिंसा की जड़ में ये सब कारक थे। एक मुस्लिम लड़के और बौद्ध लड़की के भाग जाने की घटना तो मात्र वह चिंगारी थी जिसने पहले से सुलग रही आग को भड़का दिया। स्थानीय बौद्ध, रोहिंग्या मुसलमानों को जरा भी पसंद नही करते। उन्हें वे उसी रूप में देखते हैं जिसमें एएएसयू तथाकथित बांग्लादेशी मुसलमानों को देखती है। परन्तु भारत और म्यानामार में एक बहुत महत्वपूर्ण अंतर यह है कि भारत एक प्रजातंत्र है और म्यानामार, सैनिक तानाशाही। भारत में समस्याओं का हल प्रजातांत्रिक तरीकों से निकाला जा सकता है। इंदिराजी ने ऐसी कोशिश की थी परन्तु उससे न तो बंगाली मुसलमान संतुष्ट हुए और न ही असम के निवासी। म्यानामार में तो प्रजातंत्र ही नही है। और इसलिए आंग सांग सू की ने कहा है कि इस समस्या को तब तक नही सुलझाया जा सकता जब तक कि बर्मा में प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना नही हो जाती और नागरिकता संबंधी अधिकारों का निर्धारण संवैधानिक प्रक्रिया से नहीं होने लगता। अभी तो बर्मा में संविधान ही नहीं है इसलिए ऐसा लगता है कि इस समस्या का जल्द ही कोई हल निकलने वाला नही है।

-डॉ. असगर अली इंजीनियर

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

ई-मेल का खेल

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के धर्म निरपेक्ष होने के दावे उस समय खोखले दिखाई पड़ते हैं जब मुसलमानों की देश भक्ति को शक की निगाहों से देखा जाता है। देश में जब भी आतंकवादी धमाके होते हैं तो मुसलमानों को शक की निगाहों से देखा जाता है। इस मामले में मुसलमानों को लपेटने में मीडिया की अहम भूमिका होती है। क्योंकि मामले को इतना लपेटकर पेश किया जाता है कि मुस्लिम चेहरों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है। आप के सामने लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ माना जाने वाले मीडिया की कुछ तस्वीर पेश करते हैं-
7 सितम्बर 2011 को दिल्ली हाईकोर्ट ब्लास्ट को इस तरह से पेश किया किया जैसे कि सिर्फ एक समुदाय विशेष को टारगेट किया जा रहा है। धमाके के जाँच में जुटी जाँच एजेंसियों को कोई सबूत मिले बगैर ही हमलावरों का स्कैच जारी कर दिया गया। मुस्लिम नामोें वाले संगठनों का हौव्वा खड़ा किया गया। जाँच के नाम पर मुसलमानों को परेशान किया गया। इस आतंकवादी घटना को अंजाम देने की जिम्मेदारी वाला ई मेल आतंकवादी संगठन हूजी की तरफ से आया, ऐसा बताया गया। बाद में पता चला कि यह ई मेल जम्मू कश्मीर के किश्तवाड़ से आया था। दिल्ली बम ब्लास्ट के आरोप में दो मुस्लिम छात्रों को गिरफ्तार किया गया। ई मेल की वास्तविकता को जाँचे वगैर पुलिस और मीडिया द्वारा इस ब्लास्ट का संबंध हूजी से जोड़ दिया गया। लेकिन कई सवालों को दबा दिया गया। मसलन यह कि विस्फोट हूजी ने अंजाम दिया तो उसने अपना नाम ग़लत क्यों लिखा। क्या इसके सदस्य इतने कायर हैं कि अपने संगठन का नाम नहीं लिख सकते। इससे पहले कई और धमाकों को लेकर भी हूजी पर आरोप लगते रहे हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट मामले में दूसरा ईमेल गुजरात के अहमदाबाद से आया बताया गया। इसमें मनु नाम के एक हिन्दू युवक का नाम सामने आया। ख़बरों के अनुसार अमरीकी जाँच एजेंसी एफ0बी0आई0 ने इस मामले में सईद-अल-हवरी का नाम चुना। इसमें बताया गया कि गुजरात के कई शहर आतंकवादियों के निशाने पर हैं। इस युवक के बारे में न तो किसी मीडियाकर्मी ने मामले को उठाया और न ही प्रशासन ने।
कल्पना कीजिए कि मनु या शनि शुक्ला के अलावा अगर कोई मुसलमान होता तो मीडिया का रवैया कैसा होता, इस ख़़बर को कई नज़रों देखा जाता। किश्तवाड़ में पकड़े गए दो नौजवान जो मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखते हैं जिनकी उम्र 18 साल से कम है उन पर आरोप लगाए गए कि इंटरनेट के माध्यम से धमकी भरा ईमेल भेजा। लेकिन ख़बरों में उनके नाबालिग होने का जिक्र नहीं किया गया। अंग्रेजी के एक बड़े अखबार ने 15 सितम्बर के प्रकाशन में कश्मीर और पश्चिम से इंडियन मुजाहिदीन और हूजी ईमेल के हवाले से गिरफ़्तारी की ख़बर प्रकाशित की। दोनों ख़बरों में शनि शुक्ला वाली खबर इस तरह है कि मजाक में ईमेल भेजने के सिलसिले में युवक को गिरफ्तार किए जाने की खबर दी गई थी।
तीसरा ईमेल जिसके बारे में कहा जाता है कि इंडियन मुजाहिदीन ने भेजा है जो छोटू मिनानी (chotoominani5@gmail.com) के नाम से भेजा गया है। इसके बारे में जाँच इस नतीजे पर पहुँची है कि इसे पश्चिमी बंगाल और झारखंड की सीमा पर स्थित पाकोड़ नामक स्थान से भेजा गया था। कोलकाता पुलिस ने शनि शुक्ला को इस मामले में गिरफ्तार किया जिसकी उम्र 14 साल है। अखबारों में उसके नाबालिग होने की खबर को महत्व दिया गया।
उल्लेखनीय है कि इंडियन मुजाहिदीन के नाम से भेजे गए उक्त ईमेल का सन्देश पिछले सभी ईमेल संदेशों से भिन्न था। इस मेल में कहा गया था कि दिल्ली हाईकोर्ट ब्लास्ट हमने किया था न कि हूजी और न ही अन्य किसी ने। इस ईमेल में साफ लिखा गया था कि हमने जानबूझकर बुधवार का दिन चुना क्योंकि इसी दिन कोर्ट में जनहित याचिकाओं की सुनवाई होती है, जिसकी वजह से कोर्ट में अधिक भीड़ होती है।
दिल्ली हाईकोर्ट ब्लास्ट के जाँच के मामले में नया मोड़ उस समय आया जब चश्मदीद गवाह ने यह खुलासा किया कि बम एक कोरियर पैकेट में सफेद कपड़े में लपेट कर रखा गया था। फिलहाल सरकारी अधिकारी इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं। पुलिस और मीडिया ने मुसलमानों की छवि को खराब निश्चित रूप से किया है जिसकी वजह से एक टोपी और दाढ़ी वाले आदमी को शक भरी नजरों से देखा जाता है।
हालाँकि आतंकवादी हमले को हम किसी भी रूप में स्वीकार नहीं कर सकते। आतंकवाद का न कोई चेहरा, न कोई मजहब होता है। इसे रोकने के लिए जायज कदम उठाने चाहिए। आतंकवाद की आड़ में किसी विशेष वर्ग को टारगेट बनाने के बजाए लोगों को आपस में जोड़ने की बात करनी चाहिए। जिससे कि लोगों में भाई-चारा व प्रेम बना रहे और मुल्क में शांति कायम रहे।

-अबु ज़फ़र
मो.09540147251
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