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शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

आतंक के कैंसर में जकड़ी दुनिया

हमारी वर्तमान दुनिया की एक बड़ी त्रासदी यह है कि भारी संख्या में मासूम लोग आतंकवाद की भेंट चढ़ रहे हैं। आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए सुरक्षा आदि के उपायों पर जो भारी खर्च हो रहा हैए वह भी पूरी तरह से अनुत्पादक है। इससे भी बड़ी मुसीबत यह है कि आतंकवाद को धर्म से जोड़ दिया गया है। लगभग दो सप्ताह पहले ;जुलाई 2016,अमरीका के ओरलैंडो स्थित पल्स क्लब में 49 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस भयावह घटना की दो व्याख्याएं की जा रही हैं.पहला, यह जिहादी आतंकवाद है और दूसरा, यह एक ऐसे व्यक्ति की करतूत है जो समलैंगिकों से घृणा करता था। एक टिप्पणीकार ने लिखाए 'ऐसा लगता है कि वह इस्लामिक कट्टरतावाद और समलैंगिकों के प्रति घृणा दोनों से प्रेरित था' 'आतंकवाद या समलैंगिकों से घृणा उत्तर है 'दोनों।
एक अन्य घटना में आईएस द्वारा बगदाद में किए गए एक बम धमाके में 119 लोग मारे गए। गत एक जुलाई को बांग्लादेश में 28 लोगों की हत्या कर दी गई। जिन लोगों ने अपनी जानें गंवाई, उन्हें विदेशी बताया जा रहा है। कुछ रपटों के  अनुसार, आतंकवादी हमलावर आईएस से नहीं बल्कि जमात.उल.मुजाहिदीन से जुड़े हुए थे। एक टिप्पणीकार का कहना है कि इन दिनों आईएस और अलकायदा में भारतीय उपमहाद्वीप में अपने खूनी पंजे फैलाने की प्रतियोगिता चल रही है। बांग्लादेश में इस्लामिक अतिवाद की जड़ें जमायत.ए.इस्लामी और उसकी कट्टरवादी विद्यार्थी शाखा इस्लामी छात्र शिबिर में हैं।
इन सारी विद्धवंसात्मक गतिविधियों में क्या समानता है? सतही तौर पर देखने से ऐसा लग सकता है कि ये सब इस्लामवादी आतंकवाद से जुड़ी हुई हैं। इस्लामवादी आतंकवाद शब्द 9/11 की त्रासदी के बाद से प्रचलन में आया है परंतु यदि हम थोड़ी गहराई से पड़ताल करेंगे तो हमें इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में कई अन्य कारक भी नज़र आएंगे। ओरलैंडों की घटना का संबंध अमरीका की गन संस्कृति से है। इस घटना के बाद अमरीकी कानून निर्माताओं को भी यह लगने लगा है कि आग्नेय अस्त्र रखने संबंधी कानूनों में परिवर्तन किया जाना चाहिए। ओरलैंडों की घटना भयावह थी परंतु इससे मिलती.जुलती छोटी.मोटी घटनाएं अमरीका में होती रहती हैं और उनका इस्लामिक आतंकवाद से कोई संबंध नहीं होता। हां, बगदाद के आतंकी हमले का संबंध निश्चित तौर पर इस्लामिक स्टेट से था।
जहां तक बांग्लादेश में हो रहे आतंकी हमलों का प्रश्न हैए ऐसा प्रतीत होता है कि वे बांग्लादेश की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय कट्टरवादी तत्वों की करतूते हैं। वहां लंबे समय से हत्याओं और आतंकी हमलों का दौर चल रहा है। कई प्रगतिशील.धर्मनिरपेक्ष व उदारवादी ब्लॉग लेखकों और हिन्दुओं की हत्याएं हो चुकी हैं। बांग्लादेश में हो रही आतंकी घटनाओं का संबंध किसी बाहरी संगठन से नहीं है बल्कि वे वहां के राज्य और समाज की राजनीति में बढ़ती कट्टरता को नियंत्रित करने में असफलता का परिणाम है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत.तीनों में कट्टरता और सांप्रदायिकता बढ़ रही है और इससे अतिवाद को प्रोत्साहन मिल रहा है।
पाकिस्तान में ज़िया.उल.हक के शासनकाल में इस्लामिक कट्टरवाद को आधिकारिक मान्यता मिली। अपनी तानाशाही स्थापित करने के लिए ज़िया.उल.हक ने सामंती ताकतों और मुल्लाओं के साथ गठजोड़ किया और मौलाना मौदूदी ;देवबंदी इस्लाम, के सिद्धांतों को प्रोत्साहन दिया। इस प्रक्रिया को पाकिस्तान का इस्लामीकरण कहा जाता है। इस इस्लामीकरण के केंद्र में था सामाजिक व्यवहार और नियमों को शरिया की मौलाना मौदूदी की व्याख्या के अनुरूप गढ़ने की कोशिश। वहां सामंती.दकियानूसी सोच को बढ़ावा दिया गया और महिलाओं व नागरिक स्वतंत्रताओं का दमन किया गया। भारत में धर्म के नाम पर राजनीति, सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा के रूप में सामने आई, जिनके शिकार धार्मिक अल्पसंख्यक बने। इसी विचारधारा का एक दूसरा पहलू है हिन्दुत्वादी संगठन, जो मालेगांवए मक्का मस्ज़िद ;हैदराबाद, अजमेर और समझौता एक्सप्रेस धमाकों के लिए ज़िम्मेदार बताए जाते हैं। सांप्रदायिक.कट्टरवादी विचारधारा का लक्ष्य है शरिया या अतीत की महान परंपराओं के नाम पर देश पर पूर्व.आधुनिक, सामंती मूल्य लादना, जो जाति,वर्ग व लिंग के आधार पर भेदभाव को मान्यता देते हैं।
जहां तक अलकायदा और आईएस के आतंकवाद का सवाल हैए उसकी जड़ें कच्चे तेल के संसाधनों पर कब्ज़ा ज़माने की राजनीति में हैं और इसमें अमरीका की नीतियों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। अमरीका ने पाकिस्तान में ऐसे मदरसों की  स्थापना करवाई जिनमें विद्यार्थियों के दिमाग में कट्टरवादी वहाबी इस्लाम के मूल्यों को ठूंस.ठूंस कर भरा गया। इन मदरसों में विद्यार्थियों को सिखाया गया कि काफिरों को मारना ही जिहाद है। इस तरह के संगठन यह मानते हैं कि उनसे असहमति रखने वालों को जिन्दा रहने का हक नहीं है। उन्होंने साम्यवाद का विरोध किया, अफगानिस्तान पर सोवियत कब्ज़े के खिलाफ संघर्ष किया और अब वे काफिरों की हत्या को अपना धर्म मानते हैं। पाकिस्तान के इस्लामीकरण की जो प्रक्रिया ज़िया.उल.हक के शासनकाल में शुरू हुई थी, उसे अलकायदा और उसके साथी संगठनों ने जारी रखा। अलकायदा ने आईएस की विचारधारात्मक नींव का निर्माण किया। हिलेरी क्लिन्टन ने इस सब में अमरीका की भूमिका की अत्यंत सारगर्भित व्याख्या की है। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि अमरीका, कई तरीकों से आतंकवादी समूहों का समर्थन करता आ रहा है।
वर्तमान समय में दो प्रकार के आतंकवाद हमारी दुनिया को खौफज़दा किए हुए हैं। एक का उद्देश्य है
पूर्व.आधुनिक मूल्यों की पुनर्स्थापना। इनमें शामिल हैं पाकिस्तान व बांग्लादेश ;मौलाना मौदूदी, भारत ;हिन्दुत्व और म्यांमार व श्रीलंका। म्यांमार और श्रीलंका में बौद्ध धर्म की एक विशिष्ट व्याख्या का इस्तेमाल,हिंसा को उचित ठहराने के लिए किया जा रहा है। दूसरे प्रकार का आतंकवाद वह है जिसे तेल के संसाधनों पर कब्ज़ा करने की वैश्विक राजनीति से समर्थन और सहयोग मिल रहा है। यह त्रासद है कि दोनों ही प्रकार के आतंकवादए धर्म, विशेषकर इस्लाम, के नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे धर्म के आधार पर अपनी कुत्सित हरकतों को उचित बताते हैं।
हर धर्म में कई धाराएं होती हैं। जैसे इस्लाम में जहां एक ओर उदारवादी व समावेशी सूफी परंपरा है, तो दूसरी ओर वहाबी कट्टरता भी है। उसी तरह हिन्दू धर्म में भक्ति परंपरा है, तो ब्राह्मणवाद भी है। अमरीका ने पश्चिम एशिया में अपने राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए इस्लाम के वहाबी संस्करण का इस्तेमाल किया। ज़िया ने अपनी तानाशाही स्थापित करने के लिए मौदूदी का सहारा लिया। हिन्दू राष्ट्रवाद.हिन्दुत्व ने अपने राजनीतिक एजेंडों की पूर्ति के लिए नव.ब्राह्मणवाद को अपना हथियार बनाया। विभिन्न धर्मों की अलग.अलग धाराओं के अस्तित्व में बने रहने से कोई खास समस्या नहीं होती। समस्या तब होती है जब राजनैतिक शक्तियां अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए इनमें से एक या अधिक धाराओं का इस्तेमाल करना शुरू कर देती हैं। इस तथ्य को यदि हम समझ लेंगे तो हम आतंकवाद से सफलतापूर्वक मुकाबला करने की ओर एक कदम बढ़ा लेंगे। हमें यह समझना होगा कि आतंकवाद,दरअसलए धर्म का केवल लबादा ओढ़े हुए है। उसके असली उद्देश्य राजनैतिक हैं। 
  -राम पुनियानी

शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

किसानी को बलिदान करने की एक शासकीय साजिश

बाराबंकी। वर्तमान में  भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनव्र्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम वास्तव मे किसानों और गावों मे रहने वाले खेतिहर उद्योगो, कुटीर उद्योगो पर आधारित ग्रामीणो को उनके पीढियो से प्राप्त खेती किसानी को बलिदान करने की एक शासकीय साजिश है।
  अखिल भारतीय किसान सभा द्वारा आयोजित किसानो की उपजाऊ जमीन के अधिग्रहण के खिलाफ आन्दोलन की रणनीति बनाने की बैठक को सम्बोधित करते हुए ह्यूमन राइट लाॅ नेटवर्क के अधिवक्ता विष्णु शुक्ला ने कहा कि सत्ताधारी दल, भूमाफियाओ को सुविधापूर्वक भूमि हस्तांतरण सुनिश्चित कर सके और किसान और उनके आश्रित उसका विरोध भी न कर सके इसके उद्देश्य की पूर्ति हेतु कानून पास किया गया है। मौजूदा कानून में पुराने कानून को ही घुमा फिराकर लाया गया है तथा पुराने कानून की 61 धाराये ज्यांे की त्यांे इसमे दोहरायी गयी है तथा इसमें प्राइवेट संस्थाओ को उनके लाभार्जन के लिए भूअर्जन की व्यवस्था है तथा किसानो व खेती पर आश्रितो के लिए स्थायी रोजगार उपलब्ध करवाने की कोई न तो ठोस योजना है और न ही अर्जित जमीन पर क्रियान्वित योजना मे उनकी कोई भागीदारी ही है।
    लखनऊ से आए हुए किसान नेता ज़ैद अहमद फारूखी ने कहा कि हरित क्रान्ति, श्वंेतक्रान्ति, पीली क्रान्ति, के बावजूद हमारी अर्थव्यवस्था क्यों नही सुधर रही है इसका सीधा सा जवाब है कि हमारी सरकारो का किसानो और कृषि आधारित उद्योगो के साथ सौतेलापन व्यवहार है क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका और उसकी साम्राज्यवादी सहयोगी ताकतो ने देश व दुनिया मे आतंक मचा रखा है, उसके नतीजे मे देश के पेट्रोलियम पदार्थ महंगे हो रहे हैै, मशीनरी महंगी  हो रही है और आधुनिक कृषि मंहगी होती जा रही है जिससे कृषि आधारित उद्योगो का नुकसान हो रहा है।
    भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी लखनऊ के नेता खालिद ने कहा कि बाराबंकी के किसानो के समर्थन मेे राजधानी मे भी आन्दोेलन चलाया जाएगा। बाराबंकी पार्टी के सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि सरकार अगर नही चेतती है तो 21 अक्टूबर को जेल भरो आन्दोलन प्रारम्भ किया जाएगा। वही पार्टी के सहसचिव रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि जनपद के विभिन्न ग्राम पंचायतो में 16 अक्टूबर से कृमिक भूख हडताल जारी की जाएगी और 20 अक्टूबर तक जारी रहेगी।
        बैठक को मो0 आमिर ,रशीद खाॅ, शिव बहादुर वर्मा(पूर्व जिला पंचायत सदस्य), डा0 कौसर हुसैन, डा0 उमेश चन्द्र, पुष्पेन्द्र कुमार सिंह, अमर सिंह प्रधान, नीरज कुमार एडवोकेट, राम नरेश वर्मा, बाबू गिरीशचन्द्र, विपतराम, प्रदीप सिंह, व आनन्द सिंह ने सम्बोधित किया और संचालन किसान सभा के जिला अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने किया।

नीरज वर्मा
मंत्री
अखिल भारतीय किसान सभा
बाराबंकी।


गुरुवार, 2 अगस्त 2012

अब हम चुप रहेंगे


हिन्दुवत्व वादी शक्तियां अगर बम विस्फोट करें तो वह राम राज्य का स्वागत करती नजर आती हैं जिसके ऊपर सरकार इंटेलिजेंस ब्यूरो, ए.टी.एस और एस.टी.ऍफ़ हलकी घटना बता कर अपना बचाव करती हुई नजर आती हैं अगर कोई विस्फोटक की घटना घटती है तो सबसे पहले इंडियन मुजाहिद्दीन कोई न कोई खान या मुसलमान का नाम आ जाता है।
पुणे बम विस्फोट सीरियल बम विस्फोट में रंगे हाथ जख्मी पकडे गए व्यक्ति का नाम शिवानन्द पाटिल है। आर.एस.एस का कार्यकर्ता है इसलिए विस्फोट होने के बाद खुफिया एजेंसियों की छठी इन्द्री ने बता दिया था कि इसमें इंडियन मुजाहिद्दीन का हाथ है लेकिन अब वह शरमाये-शरमाये से नजर आ रहे हैं। हमारा इलेक्ट्रोनिक मीडिया चुप्पी साढ़े हुए हैं। हेमंत करकरे की हत्या से लेकर अधिकांश विस्फोट हिन्दुवत्व वादी संगठनो ने ही किये हैं किन्तु सांप्रदायिक सोच के कारण अल्पसंख्यकों को ही फंसाया जा रहा है। असीमानंद के 164 सी.आर.पी.सी के बयान के बाद स्तिथि साफ़ होनी चाहिए थी किन्तु हिन्दुवत्व वादी संगठनो की एक भारी संख्या नौकरशाही से लेकर खुफिया एजेंसियों में है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

रविवार, 8 जुलाई 2012

आतंक की राजनीति-मुस्लिम नौजवानों पर निशाना

देश की खुफिया एजेंसी द्वारा मुस्लिम नवजवानों का उत्पीडन गिरफ्तारियां पूरे देश में बढ़ रही हैंमुस्लिम नौजवानों को बिना किसी आरोप के पुलिस कस्टडी में कर लेती हैमारती पिट्टी है और टॉर्चर करती है और अंत में कई वर्षों के लिये जेलों में डाल दिया जाता हैबहुत से नौजवान कस्टडी में ही मर जाते हैं, अभी हाल ही में कतील सिद्दीकी नाम का व्यक्ति रहस्यमय परिस्तिथियों में यरवदा जेल पुणे में मार डाला जाता हैवह पिछले नवम्बर को गिरफ्तार किया गया था और जेल में मारा जाता था जो की अभी तक रहस्य बना हुआ है
फसीह मोहम्मद के बारे में अभी सब कुछ शांत है (घटना में शामिल था या नहीं) यह इंजिनियर सउदी अरब में उठा लिया जाता है उसके द्वारा घटना में शामिल होने के इनकार के बावजूद यू.पी. सरकार द्वारा कोई भी जिम्मेदारी भरा प्रयास नहीं किया गया कि उसके एक भारतीय नागरिक होने के कारण कुछ जरुरी कदम उठातीउसका परिवार न्याय के लिये इधर-उधर भटक रहा है
उर्दू पत्रकार सै. काजमी आतंक के आरोप में अब भी जेल में हैं जबकि अब भी उनके विरुद्ध पुलिस द्वारा आरोप पत्र दाखिल करना हैतारिक कासमी खालिद मुजाहिद को सोची समझी रणनीति के तहत कचहरी सीरियल बम विस्फोट में घरों से पकड़कर बाद में फर्जी बरामदगी दिखाई गयीप्रतापगढ़ के शौकत अली के विरुद्ध .टी.एस द्वारा साक्ष्य तैयार करने के उद्देश्य से फर्जी नाम से उसे लश्कर--तैयबा का एरिया कमांडर पत्र भेजकर नियुक्त किया गया और फिर उसे गिरफ्तार करने की तैयारी चल रही थी कि .टी.एस का भांडा फूट गया
ये सिर्फ बानगी भर है, अधिकृत रिपोर्ट बताती है कि कई मुस्लिम नौजवान भारतीय जेलों में कैद हैंमुस्लिम नागरिकों के साथ उत्पीडन यातनाएं बढ़ी है जहाँ अल्पसंख्यक अपने ही घर में सुरक्षित महसूस नहीं करता हैंजिस कारण अन्याय के विरुद्ध और आतंकी कौन है ? बताने के लिये एक संगठन बना कर मीटिंग करने का निर्णय लिया गया हैउक्त मीटिंग 9 जुलाई को कांस्टीट्यूशनल क्लब नई दिल्ली में होगी
मीटिंग में विभिन्न स्तरों पर एक त्वरित हल के लिये कार्ययोजना बनायीं जाएगी तथा "आतंक की राजनीति-मुस्लिम नौजवानों पर निशाना " गोष्ठी होगीगोष्ठी को श्री मुलायम सिंह यादव, श्री .बी बर्धन, श्री एच.डी. देवगौड़ा, श्री शरद यादव, श्री प्रकाश करात, श्री डी राजा, श्री गुरुदास गुप्ता, श्री मणिशंकर अय्यर, श्री हनुमन्त राव, श्री रामविलास पासवान समाज के वरिष्ठ प्रतिनिधि संबोधित करेंगे

शनिवार, 29 अक्टूबर 2011

आतंक का वास्ता राजनीति से है और धर्म का मानवता से-2

भारत में अंग्रेज शासकों की ‘फूट डालो और राज करो‘ की नीति व इतिहास को साम्प्रदायिकता के चश्मे से देखने के कारण हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच पहले से ही आपसी शंका व घृणा का भाव था, इस्लाम के बारे में पश्चिमी दुष्प्रचार ने भारत में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को और गहरा किया। सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने हिन्दू धर्म के नाम पर जो तर्क दिए हैं वे अत्यंत बेहूदा और आधारहीन हैं। भारत में किए गए अधिकतर आतंकी हमले किसी एक समुदाय को निशाना बनाकर नहीं किए गए थे। इसके कुछ अपवाद हैं साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और असीमानंद द्वारा मस्जिदों या ऐसे स्थानों पर किए गए बम विस्फोट, जहाँ मुसलमान बड़ी संख्या में इकट्ठा थे। दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला 11.9.2001 को न्यूयार्क में हुआ था और इसमें सभी धर्मों और देशों के नागरिक मारे गए थे। पाकिस्तान में अल्कायदा द्वारा मारे गए लोगों की संख्या हजारों नहीं तो कम से कम सैकड़ों में जरूर होगी। यह मान्यता मूखर्तापूर्ण है कि मुस्लिम शासकों ने भारत में इस्लाम का प्रचार करने के लिए देश पर कब्जा किया था। भारत में सम्राट अशोक को छोड़कर किसी राजा ने धर्मप्रचार नहीं किया। केवल अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार किया और वह भी शांतिपूर्ण तरीकों से। भारत में इस्लाम को फैलाया सूफी संतों ने और हिन्दू धर्म की निष्ठुर जाति प्रथा के चंगुल से निकलने के लिए दलितों ने बड़ी संख्या में इस्लाम को गले लगाया। इस तर्क में कोई दम नहीं है कि हिन्दुओं को मारकर और ढेर सारे बच्चे पैदा कर मुसलमान, भारत को दारुल इस्लाम बनाना चाहते हैं। पिछले साठ सालों में भारत की कुल आबादी में मुसलमानों के प्रतिशत में मात्र 0.8 की वृद्धि हुई है जबकि इसी अवधि में आदिवासियों का प्रतिशत 7.5 से बढ़कर 8.5 हो गया है। इन दोनों समुदायों की आबादी की अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि दर के पीछे गरीबी और अशिक्षा है न कि अपने समुदाय की आबादी बढ़ाने का कोई सोचा-समझा षड्यंत्र।
“सभ्यताओं के टकराव“ के सिद्धांत से ही जन्मी है यह मान्यता कि सभी आतंकी मुसलमान होते हैं। यह मानने में किसी को कोई गुरेज नहीं हो सकता कि अमरीका द्वारा स्थापित किए गए मदरसों में मुस्लिम युवकों को निर्दयता से निर्दोष पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को मारने के लिए प्रायोजित किया गया था परंतु हमें यह भी याद रखना चाहिए कि भारत में हुए आतंकी हमलों के बाद पकड़े गए अधिकांश मुस्लिम युवक, अंततः निर्दोष साबित हुए।
यह सोचना भी गलत है कि भारत में आतंकी हमलों में केवल हिन्दू मारे जाते हैं। 26.11.2008 के आतंकी हमले में मारे गए मुसलमानों का प्रतिशत, आबादी में उनके प्रतिशत से कहीं अधिक था। हालिया (13.7.11) हमले में भी दोनों समुदायों के लोग मारे गए। यह कहना कि आतंकवाद की समस्या का हल हिन्दुओं में एकता स्थापित करना और हिन्दू पार्टी को समर्थन देना है, राजनैतिक प्रचार के अतिरिक्त कुछ नहीं है। भारत ने अपनी इच्छा से धर्मनिरपेक्ष राज्य बने रहना स्वीकार किया था। हमारे
संविधान निर्माताओं ने बहुत सोच-समझकर इस्लामिक या हिन्दू राष्ट्र के सिद्धांत को खारिज किया था।
हम यह नहीं भूल सकते कि हेमन्त करकरे की सूक्ष्म जाँच के फलस्वरूप प्रज्ञा सिंह ठाकुर से लेकर असीमानंद तक तथा आर0एस0एस0 के एक प्रमुख नेता इन्द्रेश कुमार के आतंकवादी हमलों में शामिल होने के अकाट्य सुबूत सामने आए हैं। इस्लाम के नाम पर लोगों के दिमागों में ज़हर भरने का काम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक महाशक्ति कर रही है, जिसका लक्ष्य अपने राजनैतिक उदेश्यों की पूर्ति है। हमारे देश में हिन्दुत्व की विचारधारा की पोषक वे शक्तियाँ हैं जो हमारे देश के बहुवादी एवं प्रजातांत्रिक चरित्र का गला घोंटना चाहती हैं। बहुवाद व प्रजातंत्र हमारे स्वतंत्रता संग्राम की थाती हैं। आतंकवादी हमलों का बदला लेने या पाकिस्तान पर हमला करने की बातें शुद्ध पागलपन हैं और ऐसा कोई भी कदम, भारतीय उपमहाद्वीप को बर्बादी के रास्ते पर ले जाएगा।
किसी एक समुदाय पर आतंकवाद का पोषक होने का आरोप लगाना गलत है। कुछ असीमानंदों या दयानंदों के कारण पूरा हिन्दू समुदाय आतंकवादी नहीं हो जाता।

-राम पुनियानी
समाप्त
मोबाइल: 09322254043

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

आतंक का वास्ता राजनीति से है और धर्म का मानवता से-1

दिनांक 13 जुलाई 2011 को मुंबई में हुए आतंकी बम विस्फोटों के बाद से हमारे देश में घृणा फैलाने समाज को बाँटने वाली ताकतें एक बार फिर अपना सिर उठा रही हैं। धार्मिक राष्ट्रवाद के पैरोकार अपना पुराना राग एक बार फिर अलापने लगे हैं। वे धर्म, विशेषकर इस्लाम और मुसलमानों, को आतंकवाद से जोड़ रहे हैं और चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए हिन्दुओं को एक होना होगा, हिन्दू पार्टी को समर्थन देना होगा, मुसलमानों को नागरिकता से वंचित करना होगा और भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करना होगा (सुब्रह्मण्यम् स्वामी, डीएनए, 16 जुलाई 2011)
स्वामी का कहना है कि आतंकवाद, दरअसल, हिन्दू धर्म पर इस्लामिक हमला है और इस्लाम, भारत पर काबिज होना चाहता है। अतः यह जरूरी है कि आम हिन्दुओं की मानसिकता हिन्दूवादी बनाई जाए, अयोध्या वाराणसी में भव्य मंदिरों का निर्माण हो, संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द किया जाए और हिन्दुओं द्वारा दूसरे धर्मों को अपनाने पर प्रतिबंध हो परंतु हिन्दू धर्म अपनाने के इच्छुक गैर-हिन्दुओं पर कोई रोक हो। भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाया जाना जरूरी है और उतना ही जरूरी है मुसलमानों को मताधिकार से वंचित किया जाना। यह लेख मूलतः आर0एस0एस0 के एजेन्डे को ही प्रतिबिंबित करता है, इसकी भाषा अत्यंत कटु आक्रामक है। अपने गठन से लेकर आज तक आर0एस0एस0 ने देश में केवल और केवल घृणा फैलाई है। लगभग पिछले एक सौ सालों से हिन्दू धर्म, संघ की राजनैतिक विचारधारा का मूलाधार रहा है। आर0एस0एस0 को अपने इस अभियान में अमरीकी दुष्प्रचार से भी मदद मिल रही है। 9/11 के बाद से अमरीका ने एक नए शब्दइस्लामिक आतंकवादको गढ़ा और पूरी दुनिया में मुसलमानों और इस्लाम को बदनाम करने का जबरदस्त अभियान चलाया।
आतंकवाद सैकड़ों साल पुराना है परंतु अल्कायदा के अस्तित्व में आने के बाद से यह वैश्विक स्तर पर चर्चा और बहस का विषय बन गया है। अल्कायदा और तालिबान के लड़ाकों को अमरीका द्वारा स्थापित किए गए मदरसों में प्रशिक्षण मिला। पिछली सदी के आखिरी तीन दशकों में, पश्चिम एशिया के तेल संसाधनों पर कब्जा, अमरीकी सामरिक रणनीति का महत्वपूर्ण अंग रहा है। अमरीकी सरकार ने पश्चिम एशिया के देशोंपर हमले करने के लिए कई बहाने गढ़े। सच तो यह है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमरीका ने इजराइल के निर्माण के बीज बोए ही इसलिए थे ताकि पश्चिम एशिया पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए उसे इस क्षेत्र में एक वफादार पिट्ठू उपलब्ध रहे। पश्चिम एशिया में मुसलमानों का बहुमत है। इन देशों में से कुछ के तानाशाहों और शेखों ने अमरीका से हाथ मिला लिया। कैसी विडंबना है कि दुनिया केसबसे बड़े प्रजातंत्रों में से एकके दोस्त, पश्चिम एशिया और दुनिया के अन्य हिस्सों पर राज कर रहे निर्दयी तानाशाह हैं।
अमरीका हमेशा से ऐसे मौकों की तलाश में रहा जिनका इस्तेमाल वह दुनिया के विभिन्न देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए कर सके। तेल-उत्पादक क्षेत्र में अपनी पैठ जमाने के लिए ही अमरीका ने ईरान की प्रजातांत्रिक मोसाडिक सरकार का तख्ता पलटा। मोसाडिक सरकार, तेल के कुओं का राष्ट्रीयकरण करना चाह रही थी और इससे अमरीका और इंग्लैंड की तेल कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ता। इसके कुछ वर्षों बाद, सोवियत सेनाओं ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया। रूस के विरुद्ध युद्ध में झोंकने के लिए जुनूनी मुस्लिम युवकों की जरूरत थी और इसके लिए पाकिस्तान में मदरसे स्थापित किए गए। इन मदरसों में मुस्लिम युवकों के दिमाग में यह भरा गया कि हर गैर-मुस्लिम काफिर है और काफिरों को मारना जेहाद है। जबकि सच यह है कि इस्लाम में काफिर का अर्थ होता है सच को छिपाने वाला और अपनी पूरी ताकत से किसी लक्ष्य को पाने का यत्न, जेहाद कहलाता है।
इसके साथ-साथ सेम्युल हटिंगटन केसभ्यताआंे के टकरावके सिद्धांत का जमकर प्रचार किया गया। इस सिद्धांत के अनुसार, सोवियत संघ के पतन के बाद, हमारी दुनिया में टकराव कम्युनिस्ट गुट अमरीकी गुट के बीच नहीं वरन् पिछड़ी हुई इस्लामिक सभ्यता और उन्नत पश्चिमी सभ्यता के बीच होगा।
इस सिद्धांत ने इस्लाम की छवि को गहरा आघात पहुँचाया। इस्लाम को एक पिछड़े हुए धर्म के रूप में देखा जाने लगा जिसके अनुयाई दकियानूस और हिंसक हैं। मदरसों से ऐसे नौजवानों की टोलियाँ तैयार होकर निकलने लगीं जो किसी की जान लेने में जरा भी संकोच नहीं करती थीं। अमरीका ने कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनों को आर्थिक मदद दी और उन्हें असलहा भी उपलब्ध करवाया। ईरान में अयातुल्लाह खौमेनी के सत्ता सँभालने के बाद अमरीकी मीडिया ने इस्लाम को दुनिया के लिए नया खतरा बताना शुरू कर दिया। 9/11 के हमले के लिए ओसामा बिन लादेन अल्कायदा को जिम्मेदार ठहराए जाने के बाद से तो इस्लामिक आतंकवाद शब्द का प्रयोग जम कर होने लगा। कहने की जरूरत नहीं कि तो इस्लाम और ही कोई अन्य धर्म निर्दोष, निहत्थे लोगों की हत्या करने की इजाजत देता है। आई0आर00, लिट्टे, उल्फा और खालिस्तानियों ने अपने राजनैतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए निर्दोषों का खून बहाया परंतु उनकी गतिविधियों को कभी ईसाई, हिन्दू या सिक्ख धर्म नहीं जोड़ा गया। इस्लाम और मुसलमानों के दानवीकरण की प्रक्रिया का चरम था वह डेनिश कार्टून, जिसमें पैगम्बर मोहम्मद को अपनी पगड़ी में बम छिपाकर ले जाते हुए दर्शाया गया था।

क्रमश:
-राम पुनियानी

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

हर हिंदू शांतिप्रिय होता है लेकिन हिंदूव्त्व वाला हिंदू आतंकी होता है

आज कुछ मित्रों के साथ बैठे हुए चाय के साथ गपशप हो रही थी किी एक मित्र ने नया जुमला ढूँढ निकाला किी हर हिंदू शांतिप्रिय होता है लेकिन हिंदूव्त्व वाला हिंदू आतंकी होता है. इस पर कई मित्रो ने तस्दीक़ करते हुए कहा किी जब कोई आतंकी घटना होती तो उसकी जाँच मदरसों से शुरू होती है जबकि यह भी वास्तविकता है किी संघ क कार्यालय और उसके सहयोगी संगठन आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त रहे हैं और लिप्त हैं. जाँच उनकी भी होनी चाहिए और अगर द्विपक्षिशेय जाँच हो तो सही आतंकी पकड़े जाएँगे और और आतंकी घटनाओं पर रोक लग सकती है. प्रगया ठाकुर से लेकर असीमनंद तक भगवा आतंकवाद के एक लंबी श्रंखला है. और अपने आकाओं को खुश करने क लिए यह लोग आतंकी घटनायें करते रहते हैं और पाकिस्तान विरोध क नाम पर पूर्व मानसिकता क आधार पर ज़बरदस्ती एक दिशा में जाँच कर कुछ प्रतिफल ना मिलने पर भी कुछ लोगों को जेल भेज कर घटना का खुलासा कर इतिश्रि कर लेते हैं हद तो यहाँ तक हो गयी किी 15 अगस्त 2000 की पूर्व संध्या पर साबरमती बम विस्फोट कांड में कोई पुख़्ता सबूत ना होने क बावजूद भी अभियुक्तों क बयान के आधार पर आरोप पत्र दाखिल कर दिए गये क्योंकि जिस वाद की जाँच की दिशा ही मदरसे की ओर से ही शुरू की गयी थी यदि सही विवेचना हुई होती तो वास्तविक आतंकी पकड़े जाते और आतंकवाद क ख़ात्मे की ओर हमारा एक कदम होता.

सुमन
लोकसंघर्ष

सोमवार, 2 मई 2011

हाय ! ओबामा तूने अपने अब्बा हुजूर को मार डाला


अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने 1979 में अफगानिस्तान में साम्यवादी सरकार को उखाड़ फेकने के लिये बहुत सारे मुस्लिम नवजवानों को गुमराह करके धार्मिक युद्ध का नाम देकर लड़ने के लिये प्रेरित किया था। अमेरिकी कुख्यात खुफिया एजेंसी सी.आई.ए ने हथियार ट्रेनिंग रुपया देकर नवजवानों को आतंकवाद के रास्ते पर जाने के लिये शिक्षित दीक्षित किया था। 1989 में अफगानिस्तान से सोवियत फौजों की वापसी हो गयी। जिससे सी.आई.ए द्वारा भावनात्मक रूप से गुमराह किये युद्धरत जवान बेरोजगारी में आना शुरू हो गए। इन नवजवानों के पास आतंक फैलाने के अतिरिक्त कोई दूसरा हुनर नहीं था। सी.आई.ए ने हथियारों की सप्लाई के बदले में व धन प्राप्त करने के लिये अवैध रूप से अफीम की खेती भी शुरू करवाई अफीम की खेती के पश्चात अफीम से मार्फीन व हेरोइन का निर्माण व तस्करी को भी संरक्षण दिया।
उन्ही युद्धरत नवजवानों में सउदी अरबिया निवासी ओसामा बिन लादेन भी था। ओसामा बिन लादेन ने अमेरिकी शोषण तंत्र को समझा और अमेरिका के भयंकर विरोध में चला गया और उसने वही हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए जो अमेरिकी दूसरे देशों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से करते हैं। चाहे वर्ल्ड ट्रेड सेण्टर पर बम गिराने के बाद 9/11 की घटना हो जिसमें लगभग 3000 लोग मारे गए थे कि घटना को अंजाम देने का आरोप भी ओसामा बिन लादेन पर आया।
सोमवार (2 मई) की रात एक बजे अमेरिकी सरकार व सी.आई.ए ने पकिस्तान सरकार को बगैर सूचना दिए इस्लामाबाद से 60 किलोमीटर दूर एबदाबाद में ओसामा बिन लादेन सहित चार लोगों को मार डाला। ओसामा की दो पत्नियों सहित 6 बच्चों को गिरफ्तार कर लिया ओसामा की लाश को अमेरिकी प्रचार एजेंसियों के अनुसार इस्लामिक रीति-रिवाजों के अनुसार समुद्र में दफना दिया गया है। दो अमेरिकी हेलीकाप्टर ने इस ऑपरेशन में भाग लिया जिसमें एक हेलीकाप्टर को मार गिराए जाने की बात आई है वहीँ यह भी कहा जा रहा है कि अमेरिकियों ने स्वयं ही इसे नष्ट किया है। ओसामा के सिर में गोली मारी गयी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के समय से ओसामा अमेरिकियों के नजदीक रहा है इस रिश्ते से बराक हुसैन ओबामा का अब्बा हुजुर हो सकता है और 1989 से जब ओसामा अमेरिकियों के लिये अनुपयोगी हो गया और प्रतिरोध पर उतर आया तो उसकी हत्या उसके घर में जाकर कर दी गयी है। ओसामा के पकिस्तान में रहने की सूचना वहां की सरकार, आई.एस.आई और उनके आकाओं को भी रही होगी आज जब अमेरिकी मध्य एशिया में फंसे हैं तो ओसामा का वध करके दुनिया के विरोधी राष्ट्राध्यक्षों को भी एक नया सन्देश जारी किया जा रहा है रहने सबसे ज्यादा दिक्कत पकिस्तान की सर्व भौमिक तथा संप्रभु सरकार की है जिसकी बगैर जानकारी के राजधानी इस्लामाबाद के नजदीक ऑपरेशन हो रहा हो और उनको सूचना न हो। अब आप इस बात से अंदाजा लगा लीजिये कि पकिस्तान में कैसी संप्रभु सरकार है। सी.आई.ए की उपशाखा आई.एस.आई को भी इस ऑपरेशन की भनक नहीं लगी। अमेरिकन साम्राज्यवादी शक्तियों के आगे संप्रभुता नाम की चीज नहीं है। उसके हित ही महत्वपूर्ण है। मुंबई आतंकी घटना के समय हमारे देश से भी अमेरिका की कुख्यात खुफिया एजेंसी एफ.बी.आई ने चश्मदीद गवाह अनीता उददैया को सरकार की जानकारी के बगैर अमेरिका लेकर चले गए थे और बाद में वापस छोड़ गए थे। अमेरिकी और खुफिया एजेंसी सी.आई.ए पाकिस्तान समेत अधिकांश देशों को अपना उपनिवेश बना रखा है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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