भारत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
भारत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

आतंक के कैंसर में जकड़ी दुनिया

हमारी वर्तमान दुनिया की एक बड़ी त्रासदी यह है कि भारी संख्या में मासूम लोग आतंकवाद की भेंट चढ़ रहे हैं। आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए सुरक्षा आदि के उपायों पर जो भारी खर्च हो रहा हैए वह भी पूरी तरह से अनुत्पादक है। इससे भी बड़ी मुसीबत यह है कि आतंकवाद को धर्म से जोड़ दिया गया है। लगभग दो सप्ताह पहले ;जुलाई 2016,अमरीका के ओरलैंडो स्थित पल्स क्लब में 49 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस भयावह घटना की दो व्याख्याएं की जा रही हैं.पहला, यह जिहादी आतंकवाद है और दूसरा, यह एक ऐसे व्यक्ति की करतूत है जो समलैंगिकों से घृणा करता था। एक टिप्पणीकार ने लिखाए 'ऐसा लगता है कि वह इस्लामिक कट्टरतावाद और समलैंगिकों के प्रति घृणा दोनों से प्रेरित था' 'आतंकवाद या समलैंगिकों से घृणा उत्तर है 'दोनों।
एक अन्य घटना में आईएस द्वारा बगदाद में किए गए एक बम धमाके में 119 लोग मारे गए। गत एक जुलाई को बांग्लादेश में 28 लोगों की हत्या कर दी गई। जिन लोगों ने अपनी जानें गंवाई, उन्हें विदेशी बताया जा रहा है। कुछ रपटों के  अनुसार, आतंकवादी हमलावर आईएस से नहीं बल्कि जमात.उल.मुजाहिदीन से जुड़े हुए थे। एक टिप्पणीकार का कहना है कि इन दिनों आईएस और अलकायदा में भारतीय उपमहाद्वीप में अपने खूनी पंजे फैलाने की प्रतियोगिता चल रही है। बांग्लादेश में इस्लामिक अतिवाद की जड़ें जमायत.ए.इस्लामी और उसकी कट्टरवादी विद्यार्थी शाखा इस्लामी छात्र शिबिर में हैं।
इन सारी विद्धवंसात्मक गतिविधियों में क्या समानता है? सतही तौर पर देखने से ऐसा लग सकता है कि ये सब इस्लामवादी आतंकवाद से जुड़ी हुई हैं। इस्लामवादी आतंकवाद शब्द 9/11 की त्रासदी के बाद से प्रचलन में आया है परंतु यदि हम थोड़ी गहराई से पड़ताल करेंगे तो हमें इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में कई अन्य कारक भी नज़र आएंगे। ओरलैंडों की घटना का संबंध अमरीका की गन संस्कृति से है। इस घटना के बाद अमरीकी कानून निर्माताओं को भी यह लगने लगा है कि आग्नेय अस्त्र रखने संबंधी कानूनों में परिवर्तन किया जाना चाहिए। ओरलैंडों की घटना भयावह थी परंतु इससे मिलती.जुलती छोटी.मोटी घटनाएं अमरीका में होती रहती हैं और उनका इस्लामिक आतंकवाद से कोई संबंध नहीं होता। हां, बगदाद के आतंकी हमले का संबंध निश्चित तौर पर इस्लामिक स्टेट से था।
जहां तक बांग्लादेश में हो रहे आतंकी हमलों का प्रश्न हैए ऐसा प्रतीत होता है कि वे बांग्लादेश की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय कट्टरवादी तत्वों की करतूते हैं। वहां लंबे समय से हत्याओं और आतंकी हमलों का दौर चल रहा है। कई प्रगतिशील.धर्मनिरपेक्ष व उदारवादी ब्लॉग लेखकों और हिन्दुओं की हत्याएं हो चुकी हैं। बांग्लादेश में हो रही आतंकी घटनाओं का संबंध किसी बाहरी संगठन से नहीं है बल्कि वे वहां के राज्य और समाज की राजनीति में बढ़ती कट्टरता को नियंत्रित करने में असफलता का परिणाम है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत.तीनों में कट्टरता और सांप्रदायिकता बढ़ रही है और इससे अतिवाद को प्रोत्साहन मिल रहा है।
पाकिस्तान में ज़िया.उल.हक के शासनकाल में इस्लामिक कट्टरवाद को आधिकारिक मान्यता मिली। अपनी तानाशाही स्थापित करने के लिए ज़िया.उल.हक ने सामंती ताकतों और मुल्लाओं के साथ गठजोड़ किया और मौलाना मौदूदी ;देवबंदी इस्लाम, के सिद्धांतों को प्रोत्साहन दिया। इस प्रक्रिया को पाकिस्तान का इस्लामीकरण कहा जाता है। इस इस्लामीकरण के केंद्र में था सामाजिक व्यवहार और नियमों को शरिया की मौलाना मौदूदी की व्याख्या के अनुरूप गढ़ने की कोशिश। वहां सामंती.दकियानूसी सोच को बढ़ावा दिया गया और महिलाओं व नागरिक स्वतंत्रताओं का दमन किया गया। भारत में धर्म के नाम पर राजनीति, सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा के रूप में सामने आई, जिनके शिकार धार्मिक अल्पसंख्यक बने। इसी विचारधारा का एक दूसरा पहलू है हिन्दुत्वादी संगठन, जो मालेगांवए मक्का मस्ज़िद ;हैदराबाद, अजमेर और समझौता एक्सप्रेस धमाकों के लिए ज़िम्मेदार बताए जाते हैं। सांप्रदायिक.कट्टरवादी विचारधारा का लक्ष्य है शरिया या अतीत की महान परंपराओं के नाम पर देश पर पूर्व.आधुनिक, सामंती मूल्य लादना, जो जाति,वर्ग व लिंग के आधार पर भेदभाव को मान्यता देते हैं।
जहां तक अलकायदा और आईएस के आतंकवाद का सवाल हैए उसकी जड़ें कच्चे तेल के संसाधनों पर कब्ज़ा ज़माने की राजनीति में हैं और इसमें अमरीका की नीतियों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। अमरीका ने पाकिस्तान में ऐसे मदरसों की  स्थापना करवाई जिनमें विद्यार्थियों के दिमाग में कट्टरवादी वहाबी इस्लाम के मूल्यों को ठूंस.ठूंस कर भरा गया। इन मदरसों में विद्यार्थियों को सिखाया गया कि काफिरों को मारना ही जिहाद है। इस तरह के संगठन यह मानते हैं कि उनसे असहमति रखने वालों को जिन्दा रहने का हक नहीं है। उन्होंने साम्यवाद का विरोध किया, अफगानिस्तान पर सोवियत कब्ज़े के खिलाफ संघर्ष किया और अब वे काफिरों की हत्या को अपना धर्म मानते हैं। पाकिस्तान के इस्लामीकरण की जो प्रक्रिया ज़िया.उल.हक के शासनकाल में शुरू हुई थी, उसे अलकायदा और उसके साथी संगठनों ने जारी रखा। अलकायदा ने आईएस की विचारधारात्मक नींव का निर्माण किया। हिलेरी क्लिन्टन ने इस सब में अमरीका की भूमिका की अत्यंत सारगर्भित व्याख्या की है। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि अमरीका, कई तरीकों से आतंकवादी समूहों का समर्थन करता आ रहा है।
वर्तमान समय में दो प्रकार के आतंकवाद हमारी दुनिया को खौफज़दा किए हुए हैं। एक का उद्देश्य है
पूर्व.आधुनिक मूल्यों की पुनर्स्थापना। इनमें शामिल हैं पाकिस्तान व बांग्लादेश ;मौलाना मौदूदी, भारत ;हिन्दुत्व और म्यांमार व श्रीलंका। म्यांमार और श्रीलंका में बौद्ध धर्म की एक विशिष्ट व्याख्या का इस्तेमाल,हिंसा को उचित ठहराने के लिए किया जा रहा है। दूसरे प्रकार का आतंकवाद वह है जिसे तेल के संसाधनों पर कब्ज़ा करने की वैश्विक राजनीति से समर्थन और सहयोग मिल रहा है। यह त्रासद है कि दोनों ही प्रकार के आतंकवादए धर्म, विशेषकर इस्लाम, के नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे धर्म के आधार पर अपनी कुत्सित हरकतों को उचित बताते हैं।
हर धर्म में कई धाराएं होती हैं। जैसे इस्लाम में जहां एक ओर उदारवादी व समावेशी सूफी परंपरा है, तो दूसरी ओर वहाबी कट्टरता भी है। उसी तरह हिन्दू धर्म में भक्ति परंपरा है, तो ब्राह्मणवाद भी है। अमरीका ने पश्चिम एशिया में अपने राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए इस्लाम के वहाबी संस्करण का इस्तेमाल किया। ज़िया ने अपनी तानाशाही स्थापित करने के लिए मौदूदी का सहारा लिया। हिन्दू राष्ट्रवाद.हिन्दुत्व ने अपने राजनीतिक एजेंडों की पूर्ति के लिए नव.ब्राह्मणवाद को अपना हथियार बनाया। विभिन्न धर्मों की अलग.अलग धाराओं के अस्तित्व में बने रहने से कोई खास समस्या नहीं होती। समस्या तब होती है जब राजनैतिक शक्तियां अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए इनमें से एक या अधिक धाराओं का इस्तेमाल करना शुरू कर देती हैं। इस तथ्य को यदि हम समझ लेंगे तो हम आतंकवाद से सफलतापूर्वक मुकाबला करने की ओर एक कदम बढ़ा लेंगे। हमें यह समझना होगा कि आतंकवाद,दरअसलए धर्म का केवल लबादा ओढ़े हुए है। उसके असली उद्देश्य राजनैतिक हैं। 
  -राम पुनियानी

रविवार, 26 जून 2016

मंडल के बाद का भारत और पिछड़ा वर्ग

  देश में हर साल 7 अगस्त ‘सामाजिक न्याय दिवस’ के रूप में मनाया जा रहा है। 7 अगस्त सन् 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का आदेश दिया था। मंडल आयोग की रिपोर्ट में प्रमुख रूप से 13 अनुसंशाओं का वर्णन है जिसमें अभी तक दो अनुसंशाएँ ही लागू हो पाई हैं। भारतीय संविधान के भाग-3 में वर्णित मौलिक अधिकार  के अनु. 16(4) के तहत OBC को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण तथा अनु. 15(4) के अनुसार शिक्षण संस्थानों में 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। अतः मंडल कमीशन की अनुसंशाएँ आकाश से टपक कर खजूर में लटक गई हैं। बीते 22 सालों में देश की परिस्थितियों में कई राजनैतिक, आर्थिक तथा सामाजिक बदलाव हुए हैं। दलित-पिछड़ों का राजनैतिक उभार अब ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक परिलक्षित होता है, बावजूद इसके मंडल कमीशन की सभी संस्तुतियों का लागू न होना एक संदेह को जन्म देता है। आखिर कौन सी मजबूरियाँ हैं जिन्होंने आबादी के सबसे बड़े हिस्से को उसके वाजिब राजनैतिक, आर्थिक तथा शैक्षिक अधिकारों से वंचित कर रखा हैं? आरक्षण और सामाजिक न्याय कैसे एक-दूसरे के पूरक है? मंडल कमीशन ने कैसे जाति-आधारित शोषित समाज को एक बड़े वर्ग के रूप में परिवर्तित कर दिया? इन सबकी पड़ताल करना जरूरी हो जाता है।
    भारत को आजादी मिलने के बाद पिछड़े तबकों (ST/SC/BC/Minoritis) ने अपने हक-हकूक के लिए आवाज उठाना शुरू कर दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के ऊपर काफी दबाव था कि वे देश के शोषित तबके को उसका वाजिब हक प्रदान करें। डॉ. भीमराव अंबेडकर अपने अथक प्रयासों से देश के दलितों और आदिवासियों के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान कर गए,  लेकिन ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ के लिए संविधान  में एक आयोग के गठन की संभावना के अलावा और कुछ नहीं था। संविधान का अनु. 340 पिछड़े वर्गों की दशाओं के विश्लेषण के लिए एक आयोग की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
    अनु. 340(1)- राष्ट्रपति भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सामाजिक तथा शिक्षित दृष्टि से पिछड़े वर्गों की दशाओं, वे जिन कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं, उनके अन्वेषण के लिए और उन कठिनाइयों को दूर करने तथा उनकी दशा सुधारने हेतु संघ या किसी राज्य द्वारा जो उपाय किए जाने चाहिए, उनके बारे में सिफारिश करने के लिए, आदेश द्वारा एक आयोग नियुक्त कर सकेगा जो ऐसे व्यक्तियों से मिलकर बनेगा जिसे वह ठीक समझे और ऐसे आयोग की नियुक्ति वाले आदेश में आदेश द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया परिनिश्चित की जाएगी।
    अनु. 340(2)- इस प्रकार नियुक्त आयोग स्वयं को निर्देशित विषयों का अन्वेषण करेगा और राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देगा, जिसमें उसके द्वारा पाए गए तथ्य उपवर्णित किए जाएँगे और जिसमें ऐसी सिफारिशें की जाएँगी जिन्हें आयोग उचित समझे। अनु. 340(3)  राष्ट्रपति द्वारा इस प्रकार दिए गए प्रतिवेदन की एक प्रति, उस पर की गई कार्रवाई को स्पष्ट करने वाले ज्ञापन सहित, संसद के प्रत्येक सदन में रखा जाएगा। अतः प्रतिशत अनु. 340 के अनुदेश के तहत 1953 में काका कालेलकर के नेतृत्व में एक ‘बैकवर्ड क्लासेस कमीशन’ का गठन हुआ जो ‘पिछड़े’ वर्गों व जातियों की पहचान करेगा, भारत के समस्त समुदायों की सूची बनाएगा और उनकी समस्याओं का निरीक्षण करेगा तथा उनकी बेहतरी के लिए कुछ ठोस प्रस्ताव लाएगा, ऐसे प्रावधान उसमें किए गए। काका कालेलकर आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1955 में केंद्र सरकार को सौंप दी लेकिन स्वनामधन्य समाजवादी प्रधानमंत्री नेहरू ने इसे लागू करना आवश्यक नहीं समझा। काका कालेलकर के ऊपर भी यह आरोप लगता है कि उन्होंने जान-बूझ कर ऐसी सिफारिशें प्रस्तुत कीं जो केंद्र सरकार को रास नहीं आईं। हालाँकि राज्य सरकारों को ये अथारिटी मिल गई कि वे स्वयं पिछड़े वर्गों की सूची तैयार करें और इन्हें ‘विशेष अवसर की सुविधा’ प्रदान करें। (स्रोत- भारतीय संविधान, डी.डी. बसु)
    काका कालेलकर कमीशन की नाकामियों के चलते दूसरे ‘बैकवर्ड क्लासेस कमीशन’ के गठन की जरूरत पड़ी। 1 जनवरी 1979 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के समय राष्ट्रपति के आदेशानुसार बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में दूसरा ‘बैकवर्ड क्लासेस कमीशन’ का गठन हुआ जिसके अन्य सदस्य आर.आर. भोले, दीवान मोहनलाल, एल.आर. नाईक तथा के. सुब्रमण्यम थे। पूरे देश में यह आयोग ‘मंडल आयोग’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मंडल कमीशन ने दिसंबर 1980 में अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी।
    मंडल कमीशन के प्रमुख उद्देश्य थे- सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को चिह्नित करने के लिए मानकों को निश्चित करना, उनकी प्रगति के लिए महत्वपूर्ण अनुसंशाओं को प्रस्तावित करना, उनकी दशा सुधारने हेतु पदों और नियुक्तियों में आरक्षण क्यों जरूरी है, इसका निरीक्षण करना और कमीशन द्वारा प्राप्त तथ्यों को रिपोर्ट के रूप में प्रस्तुत करना। सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को चिह्नित करने के लिए मंडल कमीशन ने कुल 11 मानकों को अपनाया जिन्हें प्रमुखतया 3 समूहों में वर्गीकृत जा सकता है- सामाजिक, शैक्षिक तथा आर्थिक। इस प्रकार मंडल कमीशन ने 1931 की जनगणना के अनुसार 52 प्रतिशत पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की अनुसंशा की। (नोट- इस 52 प्रतिशत पिछड़े वर्ग की आबादी में अल्पसंख्यकों की कुल आबादी 16.6 प्रतिशत का 52 प्रतिशत अल्पसंख्यक पिछड़े वर्ग को भी कुल आरक्षण 27 प्रतिशत में समाहित किया गया)। यहाँ मंडल कमीशन की प्रमुख अनुसंशाओं का उल्लेख किया जा सकता है-
    अनु. 15(4) और 16(4) के तहत 50 प्रतिशत आरक्षण की सीलिंग है औरSC/ST को उनकी आबादी के अनुपात में 22 प्रतिशत मिला हुआ है। अत प्रतिशत कमीशन OBC  के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण प्रस्तावित करता है।  अनु. 15(4) और अनु. 29(2) (अल्पसंख्यकों को सरंक्षण) राज्य के ऊपर कोई वैधानिक प्रतिबन्ध नहीं करता यदि वह सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान बनाए। इसी तरह अनु. 16(4) राज्य को नहीं रोकेगा यदि राज्य राजकीय नौकरियों तथा नियुक्तियों में सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व न होने से पदों तथा नियुक्तियों में उनके लिए आरक्षण की अनुसंशा करे।
    - सरकारी नौकरियों में शामिल OBC   उम्मीदवारों को प्रोन्नति में भी 27 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों के अधीन चलने वाली वैज्ञानिक, तकनीकी तथा प्रोफेशनल शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए OBC   वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाय।
    - OBC  की आबादी वाले क्षेत्रों में वयस्क शिक्षा केंद्र तथा पिछड़े वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए आवासीय विद्यालय खोले जाएँ। OBC छात्रों को रोजगारपरक शिक्षा दी जाय।
    - OBC की विशाल आबादी जीविका के लिए पारंपरिक तथा जातिपरक पेशों में लगी हुई है। इनकी दयनीय आर्थिक हालत को देखते हुए इन्हें संस्थागत वित्तीय, तकनीकी सहायता देने तथा इनमें उद्यमी दृष्टिकोण विकसित करने के लिए वित्तीय,  तकनीकी संस्थाओं का समूह तैयार किया जाय।
    - प्रत्येक जातिपरक पेशे के लिए सहकारी समितियाँ गठित की जाएँ जिनके तमाम कार्यकर्ता, कर्मचारी और अधिकारीगण उसी जातिगत पेशे से जुड़े होने चाहिए।
    - जमींदारी प्रथा को खत्म करने के लिए भूमि सुधार कानून लागू किया जाय क्योंकि पिछड़े वर्गों की बड़ी जमात जमींदारी प्रथा से सताई हुई है।
    - सरकार द्वारा अनुबंधित जमीन को न केवल ST/SC  को दिया जाये बल्कि OBC  को भी इसमें शामिल किया जाय। OBC के कल्याण के लिए राज्य सरकारों द्वारा बनाई गई तथा चलाई जा रही तमाम योजनाओं, कार्यक्रमों को लागू करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाय। केंद्र और राज्य सरकारों में OBC  के हितों की सुरक्षा के लिए अलग मंत्रालय-विभाग स्थापित किए जाएँ। आयोग की अनुसंशाओं का क्या परिणाम निकला, उन्हें कहाँ तक लागू किया गया, इसकी समीक्षा 20 वर्ष के बाद की जाय। 1990 में जब प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन को लागू किया तो उच्चवर्णीय बुर्जुआ ताकतों को अपने राजनैतिक-आर्थिक वर्चस्व में एक जोर का झटका लगा नतीजन इन प्रतिक्रियावादी ताकतों ने वी.पी. सिंह की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। इन ताकतों ने आरक्षण विरोधी आन्दोलन पूरे देश में चलाया जिसका नेतृत्व देश के कथित एलीट, उच्चकुलक, सामंत, डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षकों ने किया। इसी समय देश में दो महत्वपूर्ण राजनैतिक तथा आर्थिक बदलाव हुए। धार्मिक उन्माद को पूरे देश में इतना प्रचारित-प्रसारित किया गया कि कमंडल के आगे मंडल कमजोर पड़ गया। राजनीति का धार्मिक आधार पर धु्रवीकरण कर दिया गया अर्थात हिन्दू बनाम मुसलमान। लेकिन असलियत कुछ और थी, धर्म आधारित राजनीति का नेतृत्व हमेशा प्रभु वर्ग ने किया है जो हर धर्म का सबसे ऊपरी तबका होता है, अर्थात धर्म के निचले पायदान में पाए जाने वाले लोगों का राजनैतिक व्यवस्था के निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में कोई योगदान नहीं रहता। उनका इस्तेमाल धार्मिक उन्माद फैलाने में, भिन्न-भिन्न धार्मिक पहचान के आधार पर एक दूसरे को लड़ाने में किया जाता है। यदि मंदिर-मस्जिद विवाद से दुष्प्रभावित समूहों के आँकड़े ईमानदारी से इकट्ठे किए जाएँ तो सबसे ज्यादा निम्नवर्णीय-सर्वहारा लोग ही होंगे। इस प्रकार सामंती ताकतों तथा प्रभु वर्ग ने अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए पूरे प्रयास किए। दूसरा महत्वपूर्ण बदलाव आर्थिक था- देश में उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण को खुशी-खुशी लाया जाता है। पब्लिक सेक्टर का डि-रेगुलराइजेशन आरम्भ हो जाता है। शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषयों को आम बजट में कोई खास जगह नहीं दी जाती है। इन दोनों का तेजी से निजीकरण शुरू हो जाता है। देश की निजी कंपनियों को अपार प्रोत्साहन दिया जाता है और उन्हें किसानों से कई गुना अधिक सब्सिडी दी जाती है। पब्लिक सेक्टर तथा सरकारी संस्थानों के निजी हाथों में चले जाने से वहाँ आरक्षण का कोई स्कोप ही नहीं बचता है, अतः देश की प्रतिक्रियावादी ताकतों ने अपने निजी हितों के सरंक्षण में देश की प्रगति पर कुठाराघात कर दिया। जबकि इन प्रतिक्रियावादी ताकतों को आरक्षण को दक्षिण अफ्रीका में लागू “।AFFIRMATIVE ACTIONß के रूप में देखना चाहिए। जब दक्षिण अफ्रीका में अश्वेतों ने अपने अधिकारों के लिए आन्दोलन शुरू किया और राजनैतिक,  आर्थिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक यानी हर क्षेत्र में हिस्सेदारी की माँग की तो वहाँ के बुर्जुआ वर्ग ने स्वयं बढ़कर उन्हें आर्थिक, राजनैतिक तथा शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण दे दिया। दक्षिण अफ्रीका में अश्वेत बहुसंख्यक हैं अतः उनके हक-हकूक को किनारे करना देश को पतन के रास्ते पर ले जाना है। देश की प्रगति के लिए सभी देशवासियों की प्रगति आवश्यक है, आज वहाँ श्वेत तथा अश्वेत दोनों मिलकर देश की उन्नति में लगे हुए हैं। दक्षिण अफ्रीका को सन् 1992 में आजादी मिली और आज वह अफ्रीका महादेश के एक विकसित देश के रूप में उभर रहा है। लेकिन भारत ने वो मौका खो दिया। यहाँ का अल्पसंख्यक, बुर्जुआ वर्ग अपने टूटते वर्चस्व को बचाने के लिए अपना अंतिम प्रयास कर रहा है और देश को पूँजीवादी शक्तियों के हाथ बेचने के लिए तैयार बैठा है।
    इन्हीं प्रतिक्रियावादी ताकतों ने नब्बे के दशक में देश को धार्मिक उन्माद की भट्टी में झोंक दिया, और चली आ रही मिश्रित अर्थव्यवस्था की ‘शाक थेरेपी’ कर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में बदल दिया। इन्होंने मंडल कमीशन की रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी कि यह रिपोर्ट पूरी तरह ‘असंवैधानिक’ है। 1992 में इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार केस में नौ जजों की खंड-पीठ ने मंडल कमीशन रिपोर्ट की असंवैधानिकता को पूरी तरह से खारिज कर दिया और सरकार को निर्देश दिया कि ‘राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग’ को क्रियान्वित करे। 1 फरवरी 1993 को 5 सदस्यों वाले आयोग का गठन हुआ, जिसके प्रथम चेयरमैन जस्टिस आर.एन. प्रसाद बने। इंदिरा साहनी केस ने दो आवश्यक मुद्दों की तरफ ध्यान खींचा- 1- पिछड़े वर्ग को, हिन्दू धर्म के अन्दर की अनेक जातियों को उनके पेशे, गरीबी, स्थान विशेष में निवास करना और अशिक्षा के कारण चिह्नित किया जा सकता है। 2- पिछड़ा वर्ग में आने के लिए क्रीमी लेयर का प्रावधान कर दिया। यदि पहले मुद्दे की तरफ देखा जाय तो कोर्ट इस बात को मानता है कि पिछड़े वर्गों को हिन्दू धर्म के अन्दर देखा जा सकता है, यानी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि पिछड़े वर्ग में आने वाली जातियाँ हिन्दू धर्म को मानने वाली हैं। ऐसा इसलिए कि इस वर्ग को आरक्षण उनके पेशे, गरीबी, स्थान विशेष में निवास करना और अशिक्षा के कारण दिया गया है, न कि उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर। इस मुद्दे पर और भी बहस की जरूरत है। दूसरा मुद्दा ‘मलाई की परत’ का है जो बुर्जुआ वर्ग की पिछड़े वर्गों के खिलाफ एक साजिश थी। क्योंकि मंडल कमीशन की रिपोर्ट में कहीं भी ‘मलाई की परत’ का उल्लेख नहीं है। अतः क्रीमी लेयर का बंधन लगाकर बुर्जुआ वर्ग ने देश के बहुसंख्यक सर्वहारा वर्ग के बीच बन रही एकता को तोड़ दिया। मंडल कमीशन की दूसरी सिफारिश ‘केंद्र और राज्य सरकारों के अधीन चलने वाली वैज्ञानिक, तकनीकी तथा प्रोफेशनल शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए व्ठब् वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए 27  प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाय’ को, केंद्रीय संस्थानों में 2007 में लागू किया गया। लेकिन विश्वविद्यालयों तथा अन्य एलीट शिक्षा संस्थानों में जातिवादी प्रशासन के वर्चस्व के चलते इसे पूर्ण रूप से लागू नहीं किया जा सका। एक आंकडे के मुताबिक पूरे देश के केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में OBC  कोटे से मात्र 2 प्रोफेसर हैं। देश के विभिन्न मंत्रालयों, अन्य स्वायत्तशासी संस्थाओं तथा पब्लिक सेक्टर में OBC  क्लास-1 नौकरियों में 4.69 प्रतिशत, क्लास-2 में 10.63 प्रतिशत, क्लास-3 में 18.98 प्रतिशत तथा क्लास-4 में 12.55 प्रतिशत हंै। इन दो अनुसंशाओं के अतिरिक्त अन्य अनुसंशाओं मसलन भूमि सुधार तथा OBC को आर्थिक रूप से सबल बनाने के लिए केंद्र-राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित अनुदान आदि को ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया। मंडल कमीशन की अनुसंशाओं को लेकर देश के प्रमुख राजनैतिक दलों का क्या रवैया रहा, इसे जानना भी जरूरी है। प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस ने पिछड़े वर्ग को राजनैतिक चारे के रूप में इस्तेमाल किया है। 1992 में जब कमीशन की सिफारिशों को लागू किया गया तो कांग्रेस की तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार ने इसका श्रेय लेने की कोशिश की। क्रीमी लेयर के बंधन के खिलाफ कुछ नहीं किया गया। OBC  वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए विश्वविद्यालयों में 27 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाय’ को केंद्रीय संस्थानों में 2007 में लागू किया गया तो सामान्य वर्ग के लिए 27 प्रतिशत अतिरिक्त सीटों को बढ़ा दिया गया तथा OBC वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए 27  प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए अवधि निश्चित की गई। कहीं-कहीं तो इसे 2012 तक नहीं लागू किया जा सका। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में यह 2011 में लागू हुआ। 2012 के पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 4.5 प्रतिशत का अल्पसंख्यकOBC  कार्ड खेला लेकिन असफल रही। दूसरी प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी भाजपा धर्म आधारित सांप्रदायिक राजनीति करती है। उसने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। प्रमुख वामपंथी दल माकपा तो अभी तक OBC को ‘सामाजिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़ा मानती है और क्रीमी-लेयर के बंधन का समर्थन करती है (माकपा का प्रेस वक्तव्य, 17 मई, 2006)। पश्चिम बंगाल में माकपा की 34 साल तक सरकार रही लेकिन OBC  को एक वर्ग के रूप स्वीकार नहीं कर पाई जिससे माकपा के चाल, चरित्र और चेहरे में उच्चवर्णीय-उच्च वर्गीय ठसक देखी जा सकती है। माकपा ने 2011 में OBC के लिए 17 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जिसमें सभी मुसलमानों को ‘पिछड़े वर्ग’ के रूप में देखा गया है। अन्य राजनैतिक दल जिनका नेतृत्व दलित-पिछड़ा वर्ग के लोगों के हाथों में है, उन्होंने मंडल कमीशन को राजनैतिक औजार के रूप में इस्तेमाल किया है। हालाँकि पिछले साल बिहार के चुनाव में इन दलों के महागठबंधन ने कमंडल ताकतों को परास्त किया है। देश का सर्वहारा वर्ग निरादर तथा गरीबी से ग्रसित है। वर्तमान  समय की जरूरत है कि ST/SC  के आरक्षण के साथ OBC  की राजनैतिक-आर्थिक उन्नति के लिए मंडल कमीशन की रिपोर्ट को पूर्णतया प्रतिशत लागू किया जाय। OBC आरक्षण का विस्तार सभी सामाजिक तथा शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तक होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार OBC  के रिजर्वेशन के लिए क्रीमी लेयर के रूप में जो आर्थिक रेखा खींच दी गई है वह संविधान के महत्व को कम कर रही है तथा ये पूरी तरह से अ-संवैधानिक है।
    ‘क्रीमी-लेयर’ शब्द न तो संविधान और न ही मंडल कमीशन की रिपोर्ट में अंकित है इसलिए क्रीमी-लेयर की कटेगरी को पूरी तरह से खत्म कर देनी चाहिए।ST औरSC कमीशन की भाँति OBC आरक्षण के कार्यान्वयन की देख-रेख हेतु संसदीय सब-कमेटी बने। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग कोST और  SC कमीशन की तरह पूर्ण संवैधानिक शक्तियाँ प्रदान की जाएँ जिससे OBC हेतु आरक्षण के साथ खिलवाड़ करने वाले को कड़ी से कड़ी सजा मिल सके और चेयरमैन के पद पर अवकाश प्राप्त न्यायाधीश की जगह राजनीति, शिक्षा या मीडिया क्षेत्र के महत्वपूर्ण लोगों की नियुक्ति हो। आरक्षण के दायरे का विस्तार निजी क्षेत्रों में किया जाए, जिसमें प्रमुख रूप से लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया में और NGOs में दलित-पिछड़ों की भागीदारी को सुनिश्चित किया जाय। राष्ट्रीय न्यायिक आयोग का गठन हो तथा उसमें आरक्षण के सिद्धांत को पूरी तरह से लागू किया जाना चाहिए। देश के सभी धार्मिक संस्थानों का सरकारीकरण कर दिया जाय, पुजारी पद के लिए ओपन कम्पटीशन हो। जाति-आधारित जनगणना जल्द से जल्द करवाई जाए। जिससे सभी शोषित तबकों के बीच मजबूत गठजोड़ हो। यही गठजोड़ बुर्जुआ, पूँजीवाद, सामंतवाद तथा जातिवाद से लड़कर सामाजिक क्षेत्र में मानववाद तथा आर्थिक क्षेत्र में समाजवाद को पुनः प्रतिस्थापित करेगा।

को उनकी आबादी के अनुपात में 22 प्रतिशत मिला हुआ है। अत प्रतिशत कमीशन OBC  के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण प्रस्तावित करता है।  अनु. 15(4) और अनु. 29(2) (अल्पसंख्यकों को सरंक्षण) राज्य के ऊपर कोई वैधानिक प्रतिबन्ध नहीं करता यदि वह सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान बनाए। इसी तरह अनु. 16(4) राज्य को नहीं रोकेगा यदि राज्य राजकीय नौकरियों तथा नियुक्तियों में सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व न होने से पदों तथा नियुक्तियों में उनके लिए आरक्षण की अनुसंशा करे।
 -अनूप पटेल
मोबाइल: 09999277878
लोकसंघर्ष  पत्रिका  के जून अंक 2016  में प्रकाशित

बुधवार, 13 जनवरी 2016

आतंक का शीर्षासन

भारत पाकिस्तान के संबंधों के बीच आतंकी घटनाएं महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है. कहा यह जाता है कि पाकिस्तानी सेना व खुफिया एजेंसी आई एस आई के ऊपर राजनैतिक नेताओं की कमांड ढीली रहती है और भारत विरोध में यह दोनों संगठन महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं. महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि पूरी दुनिया में आतंकी संगठनो को पैदा करने का काम अमेरिका और उसकी खुफिया एजेंसियां करती हैं और जब आतंकी संगठन गठित करने का उद्देश्य पूरा हो जाता है तो उसका विनाश करने के लिए भी वही आते हैं.
          प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान को पठानकोट आतंकी घटना के सबूत उपलब्ध कराये. पाकिस्तान सरकार ने सबूतों को इनकार किया लेकिन आज वहीँ पाकिस्तान ने पठानकोट हमला मामले में जैश-ए- मोहम्मद के तीन आतंकियों को गिरफ्तार किया है। जियो टीवी के हवाले से तीन आतंकियों को गिरफ्तार करने की खबर आई है। इस हमले को लेकर पाक में कई जगहों पर छापे मारे गए हैं। जैश के कई ठिकानों पर छापा मारा गया है। गिरफ्तार व्यक्तियों में अजहर मसूद का रिश्तेदार भी है.
                दूसरी तरफ मुंबई के सीनियर जर्नलिस्ट बलजीत परमार का कहना है कि 26 दिसंबर के दिन दाउद लाहौर में ही था। उनका कहना है कि वो न केवल लाहौर में था बल्कि रावलपिंडी पैलेस भी पहुंचा था। परमार का दावा है कि डॉन इस शादी समारोह में पूरे परिवार के साथ शरीक हुआ था। इतना ही नही इस समारोह में शामिल होने के लिए भारत का एक कारोबारी और मुंबई से कुछ लोग भी पहुंचे थे। परमार 80 के दशक में दाउद से दो बार मिलने का दावा भी कर चुके है। यह समाचार आतंकी लोगों के राजनीतिक गठजोड़ को दर्शाता है. दोनों समाचार परस्पर एक दूसरे के विरोधी हैं. इनका विश्लेषण करना सरल नहीं है. अगर यह खबर सही है तो हमारे प्रधानमंत्री अगर शादी समारोह में रुकते तो दाउद से भी मुलाकात हो जाती और गृह मंत्री राजनाथ सिंह को दाउद को ढूंढने की जरूरत नहीं होती.

आतंक या आतंकवाद का सीधा सम्बन्ध साम्राज्यवाद से है. साम्राज्यवाद जनता को भय में रखने के लिए पहले आतंकी संगठनो को जन्म देता है और अपना उद्देश्य पूरा होते ही वह जनता के समक्ष अपनी ताकत दिखाने के लिए नष्ट भी करता है. पूरी दुनिया में आतंकियों को हथियार सप्लाई करने का काम साम्राज्यवादी देश ही करते हैं. आतंक और आतंकवाद को समाप्त के नारे के साथ लाखों लोगों को बेघर बार होना पड़ता है. लाखों जाने जाती हैं और उनकी हड्डियों पर साम्राज्यवादी शक्तियां अपने नाटक का प्रदर्शन करती हैं.
                भारत पाक संबंधों में मुख्य समस्या साम्राज्यवादी अमेरिका है. उसी के इशारे पर आतंकवाद का पदमासन से लेकर शीर्षासन होता रहता है.  
पाकिस्तान और अपने देश की सरकारें जनता को भ्रमित करने के लिए तथा छद्म राष्ट्रवाद को पैदा करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाती हैं. जिससे जनता का ध्यान महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी से हट सके. 

सुमन 

सोमवार, 28 सितंबर 2015

नेपाल में लगे 'मोदी मुर्दाबाद'

प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी की अनावश्यक विदेश यात्राओं ने भारत की छवि और विदेश नीति को जबरदस्त हानि पहुंचाई है. जिसका नतीजा है कि नेपाल की राजधानी काठमांडू में सोमवार को भारत विरोधी प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने  'मोदी मुर्दाबाद' और 'भारतीय विस्तारवाद मुर्दाबाद' जैसे नारे लगाए। फेसबुक से लेकर गूगल तक की यात्राएं भारत के प्रधानमंत्री पद की गरिमा तथा गंभीरता को कम कर रही हैं. देहात में कहा जाता है कि यदि बार-बार ससुराल भी जाओगे तो आखिर में खुरपा व खारा लेकर सास कह देगी कि दामाद जी जरा भैंस के लिए घास छोल लाओ. यही स्तिथि भारतीय प्रधानमंत्री ला रहे हैं. 
नेपाल ने बीते हफ्ते ही नया संविधान अपनाया है जिस पर भारत ने कथित तौर पर आपत्ति जताई है। भारत ने नेपाल के नए संविधान में सात बदलावों की मांग की थी, जो नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है भारत की विदेश नीति किसी भी मुल्क के अन्दर आंतरिक हस्तक्षेप करने की नहीं रही है किन्तु नयी विदेश नीति में विस्तारवादी रवैये को भी शायद अपनाया है इसीलिए नेपाल में हो रहे विरोध प्रदर्शन वर्तमान सरकार की विदेश नीति की हंसी उड़ा रहे हैं. हद तो यहाँ तक हो गयी है कि नेपाल जाने वाले इंडियन आयल के टैंकरों को रोक दिया गया है जिसके बाद नेपाल में लोगों को वाहन कम इस्तेमाल करने और तेल बचाने की सलाह दी गई है। अगर यही विदेश नीति जारी रही तो नेपाल की जनता का भारत के साथ मधुर सम्बन्ध रख पाना संभव नहीं होगा और वह चीन की तरफ झुकाव होगा जिससे भारत को आर्थिक व राजनीतिक नुकसान होगा. जिसकी भरपाई संभव नहीं होगी. नेपाल के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता के मुताबिक चीन से सीमा पर दो रास्ते फिर से खोलने का अनुरोध किया गया है। इस तरह से नेपाल चीन की तरफ बढ़ रहा है और प्रधानमंत्री गूगल और फेसबुक के मुख्यालय के चक्कर लगा रहे हैं. जहाँ से भारत को कोई लाभ नहीं होना है और अगर गरिमा और गंभीरता प्रधानमंत्री पद की कम हुई तो वहां के कर्मचारी भी नरेन्द्र मोदी मुर्दाबाद के नारे लगाने लगेंगे लेकिन प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को अपने पद की गंभीरता याद नहीं है. विदेशों में भी वह देश की राजनीति में कटाक्ष करने से बाज नहीं आ रहे हैं. 

सुमन 

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

गांधी के अहिंसक जादू ने सारी दुनिया को प्रभावित किया


गौतम बुद्ध के बाद यदि किसी भारतीय ने विश्व के चिंतन को प्रभावित किया है तो उसका नाम है मोहनदास करमचन्द गांधी। जहां गौतम बुद्ध के दर्शन और चिंतन का प्रभाव एशिया महाद्वीप के देशों तक सीमित था वहीं महात्मा गांधी ने दुनिया के सभी महाद्वीपों को प्रभावित किया है। महात्मा गांधी के विचारों ने एशिया के अलावा अफ्रीका, यूरोप और अमरीका को भी प्रभावित किया।
इस तथ्य को अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने भारत प्रवास के दौरान भी स्वीकारा। उन्होंने बार-बार कहा कि मैं दो महान व्यक्तियों से प्रभावित हूं-एक महात्मा गांधी और दूसरे अमरीका के डाॅ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर। डाॅ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर स्वयं भी महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित थे। उन्होंने अमरीका में गांधी की अहिंसक रणनीति के अनुरूप अश्वेतों के साथ होने वाले भेदभाव के विरूद्ध आंदोलन किया था।
महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर नेल्सन मंडेला ने भी दक्षिण अफ्रीका के मूल निवासियों को वहां के गोरे शासकों की जंजीरों से मुक्त कराया था। उसी तरह अमरीका के डाक्टर मार्टिन लूथर किंग ‘जूनियर’ ने गांधी की अहिंसक रणनीति को अपनाकर वहां के काले लोगों को नागरिकता के वे सब अधिकार दिलाये थे, जो उन्हें प्राप्त नहीं थे। यूरोप के अनेक देशों के अनेक चिंतकों ने यह महसूस किया है कि शान्ति और अहिंसा के रास्ते पर चलकर ही इंसान सुकून का जीवन जी सकता है।
मेरे पास एस किताब है जिसका शीर्षक है
“Mahatma Gandhi as Germans see him” (महात्मा गांधी जर्मनों की नजर में)। यह किताब महात्मा गांधी की जन्म शताब्दी (अक्टूबर 2, 1969) के अवसर पर प्रकाशित हुई थी। किताब में जर्मनी के 10 जाने माने विद्वानों के विचार शामिल किए गए हैं। किताब की भूमिका पश्चिमी जर्मनी के तत्कालीन चांसलर (चांसलर का पद हमारे देश के प्रधानमंत्री के समकक्ष है) ने लिखी है। विद्वानों के लेखों के साथ किताब में उन ग्रन्थों की सूची प्प्रकाशित की गई है जो गांधी के बारे में जर्मन भाषा मेंप्रकाशित हुए हैं। जर्मन भाषा में गांधी जी के बारे में 112 ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं। सूची के प्रारंभ में लिखा गया है कि सूची में प्रमुख ग्रन्थों को ही शामिल किया गया है।
चांसलर कुर्टजर्ग किसिंगर लिखते हैं ‘‘गांधी दुनिया के उन महान लोगों में से एक हैं जिनने मानव मात्र की सेवा की है और राष्ट्रों के शांतिपूर्ण ढंग से स्वतंत्र रहने के अधिकार के लिये संघर्ष किया है। बुरी तरह से विभाजित यूरोप गांधी के विचारों से प्रभावित है। हम जर्मनी के निवासी, महात्मा गांधी पर उतनी ही श्रद्धा करते हैं जितनी की भारतवासी करते हैं।’’
कुर्टजर्ग अपनी भूमिका में कहते हैं कि कुछ समय पहले जवाहरलाल नेहरू ने टेगौर की जन्मशती के अवसर पर प्रकाशित किताब में लिखा था कि गांधी एक चमकदार प्रकाशपुुंज की तरह भारत के आकाश में चमके थे और उनके प्रकाश से सारे भारतवासी जाग्रत हो उठे थे। वे गांधी की तुलना टैगोर से करते हैं। गांधी का प्रभाव वैसा नहीं था जैसा भूकंप का होता है वरन् उनका प्रभाव वैसा था जैसे पहाड़ों के पीछे से सूर्याेदय का होता है। सच पूछा जाए तो यदि टैगोर एक चिंतक थे तो गांधीजी एक मैदानी व्यक्ति थे। जहां टैगोर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के प्रतीक थे वही गांधी त्याग और सादगी के जीते जागते उदाहरण थे। परन्तु दोनों सच्चे अर्थों में भारतीय थे। ये शब्द एक ऐसे व्यक्ति के हैं जो गांधी के उत्तराधिकारी बने। नेहरू, गांधी के महानतम शिष्य होने के बावजूद अनेक मुद्दों पर गांधी से सहमत नहीं होते थे और विरोधी विचार रखते थे। गुरू-शिष्य का यह नाता भी अद्भुत था। वैसे गांधी ने यूरोप के इतिहास पर तूफानी प्रभाव नहीं डाला था परन्तु उनके विचारों ने यूरोप में एक ऐसी ज्योति जलाई है जो सदियों तक प्रकाश देती रहेगी’’। इस किताब में जर्मनी के महान चिंतकों के विचार शामिल किए गए हैं। इन सब चिंतकों ने गांधी को अपने-अपने नजरिए से समझने और पहचानने का प्रयास किया है। जैसे एक धार्मिक मामलों के विद्वान ने गांधी के व्यक्तित्व के धार्मिक पहलुओं को भारत की उच्च धार्मिक एवं आध्यात्मिक परंपराओं के संदर्भ में समझने का प्रयास किया है। राजनीतिक विषयों के विशेषज्ञ ने गांधी के राजनीतिक विचारों की अपने ढंग से मीमान्सा की है। समाज शास्त्रियों ने जनता पर गांधी के जादुई प्रभाव का विष्लेषण किया है। गांधी के व्यक्तित्व के उस रूप को समझने का प्रयास किया है जो आम लोगों को गांधी के तरफ चुंबक के समान खींचता था। आध्यात्मिक विषयों के ज्ञाता ने पूरे विश्व पर गांधी के आध्यात्मिक प्रभाव को समझाने का ईमानदार प्रयास किया है। किताब में उन बातों को समझने का प्रयास किया गया है जिसके चलते दुनिया ने शांति के लिए एक नया रास्ता खोजने की आवश्यकता महसूस की। लेखकांे ने गांधी को एक आदर्शवादी महानायक के रूप में नहीं समझा परन्तु एक व्यवहारिक आदर्शवादी व्यक्ति माना। इस व्यक्ति को पैदा हुए सौ साल बीत गए हैं। अपने लंबे जीवन में वे जिन समस्याओं से जूझे हैं उनने भी नया रूप धारण कर लिया है। एक दुबले पतले व्यक्ति, जो हमेशा अपने आधे शरीर को सफेद कपड़े से ढंके रहते थे, उससे एक अजीब असाधारण ज्योति निकलकर आम आदमी में नई चेतना का संचार करती रही। उनके विचारों से विश्व  भिन्न-भिन्न तरीकों से प्रभावित हुआ है।
अब इस बात की कल्पना असंभव है कि ताकत से दुनिया की समस्याएं हल हो सकती हैं। एक लंबे अंतराल और अनुभव के बाद विश्व इस नतीजे पर पहुंचा है। जंगल के कानून के दिन लद गए हैं। अनेक पीढि़यों के प्रभावशाली प्रयासों के कारण आम आदमी की दैहिक ताकत अब अप्रासंगिक हो गई है। मानव की इस सोच के विकास में गांधी की अद्भुत भूमिका है। जहां आम आदमी ने गांधी के इस संदेश को अपना लिया है वहीं राष्ट्रों ने अभी तक इसे पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया है। शायद कुछ समय लगेगा जब राष्ट्रों के चिंतन से ‘ताकत’ के उपयोग की बात पूरी तरह से समाप्त हो जायेगी, भले ही ऐसी स्थिति के निर्माण में समय लगे। जर्मनी समेत यूरोप का आम आदमी अब गांधी के इस विचार को आत्मसात करने लगा है। सुकरात ने अपने विचारों की प्रासंगिकता अपनी मृत्यु से सही सिद्ध की थी। उसी तरह गांधी जी ने भी अपनी ‘‘मृत्यु’’ (हत्या) से अपने विचारों की उपयोगिता और प्रासंगिकता सिद्ध कर दी थी।
किताब में शामिल अन्य लेखों के शीर्षक हैं बुद्ध से गांधी, भारत की महान आत्मा, महात्मा गांधी का भारत के धार्मिक इतिहास में स्थान, महात्मा और सविनय आन्दोलन, इतिहास में गांधी की भूमिका और स्थान, गांधी के आध्यात्मिक संदेश की प्रकृति और प्रभाव एवं गांधी जी की धरोहर।
जर्मनी, जिसने दो विश्व महायुद्धों की विभीषिका की त्रासदी भुगती है, शांति और अहिंसा का मतलब समझने लगा है। जर्मनी ने दुनिया के सबसे ज्यादा क्रूर व्यक्ति (हिटलर) के काले कारनामे भुगते हैं। वहां के लोग अब अपने बीच एक और हिटलर पैदा नहीं होने देना चाहते हैं। हिटलर ने जर्मनी को वैचारिक रूप से बांट दिया था। हिटलर ने यहूदियों के प्रति जबरदस्त घृणा पैदा की थी। इतिहास का सबक है कि घृणा पर आधारित मनुष्य और राष्ट्र ज्यादा दिनों तक जिन्दा नहीं रह सकते हैं। जर्मनी के नागरिक जीना चाहते हैं। इसलिये वे गांधी की तरफ देख रहे हैं। जर्मनी के महान नागरिक अलबर्ट आइंस्टाईन, जिन्हें जर्मनी से इसलिये भागना पड़ा था क्योंकि वे यहूदी थे, ने गांधी की मृत्यु पर कहा था ‘‘आने वाली पीढि़यां विश्वास नहीं करेंगी कि हाडमांस का ऐसा आदमी कभी पैदा हुआ था।’’
गांधी का प्रभाव अफ्रीका महाद्वीप पर अद्भुत था। अफ्रीका के महानतम नागरिक नेल्सन मंडेला सच्चे अर्थों में गांधी के शिष्य थे। दक्षिण अफ्रीका पर मुट्ठीभर गौरों का राज था। ये गोरे शासक वहां के मूल निवासियों पर तरह-तरह के जुल्म करते थे। गोरे शासक इन मूल नागरिकों को इंसान नहीं समझते थे। उनके साथ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भेदभाव होता था। गांधी जी ने स्वयं उनके हकों के लिये आंदोलन किया था। बाद में वहां पर अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस की स्थापना हुई। इसके नेतृत्व में वहां के मूल निवासियों, जिन्हें काले कहा जाता था, ने एक लंबा संघर्ष किया। इस संघर्ष के प्रमुखतम नेता नेल्सन मंडेला थे। उनका फैसला था कि देश की आततायी सरकार के विरूद्ध अहिंसा के रास्ते से लड़ा जाएगा। एक लंबे समय तक मंडेला और उनका संगठन अहिंसक तरीके से संघर्ष करता रहा। परन्तु जब उनने देखा कि वहां की सरकार दिन प्रतिदिन और क्रूर होती जा रही है और तरह-तरह की ज्यादतियां करती जा रही है तो मजबूर होकर मंडेला को अहिंसा का रास्ता त्यागना पड़ा। ऐसा करने के पहले उनने बापू से क्षमा मांगी थी। अहिंसा का रास्ता त्यागने के बाद उन्होंने कहा था कि वे भले ही अहिंसा का रास्ता त्याग रहे हैं परन्तु उनके नये आंदोलन का स्वरूप ऐसा होगा जिसमें शत्रु तक की हत्या नहीं की जायेगी और न ही किसी इंसान को पीड़ा पहुंचाई जाएगी। उन्होंने लगभग बापू से माफी मांगते हुए कहा कि हिंसक आंदोलन के चार प्रकार हो सकते हैं-पहला तोड़फोड़, दूसरा गुरिल्ला युद्ध, आतंकी गतिविधियां और खुली क्रांति। इनमें से हम सिर्फ तोड़फोड़ का रास्ता अपनाएंगे और कोशिश रहेगी कि एक बूँद खून न बहे। मंडेला अपने वचन पर कायम रहे। वैसे तो जब वे शांतिपूर्ण आंदोलन करते थे तब उनकी और उनके समर्थकों की आयेदिन गिरफ्तारी होती थी। परन्तु आंदोलन का रूप बदल देने के कारण मंडेला और उनके समर्थकों पर जुल्मांे का पहाड़ टूट पड़ा। अपने अनेक समर्थकों के साथ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार ने उन्हें 27 वर्ष तक जेल में रखा। जेल में उन पर तरह-तरह के जुल्म किये गये। उन्हें अनेक बार जेल से छोड़ने का प्रलोभन दिया गया परन्तु वे हमेशा कहते थे कि जब पूरा दक्षिण अफ्रीका एक तरह का जेल है तो अकेले मेरी मुक्ति से क्या होगा। जब तक दक्षिण अफ्रीका पर से गोरी सरकार का साया नहीं हटता है तब तक मेरी मुक्ति बेमानी है। और वे अंततः जेल के बाहर उस समय आए जब पूरे देश  की सत्ता वहां के मूल निवासियों के हाथ में सौंपने का निर्णय हुआ।
इसी तरह, अमरीका के महान नेता डाक्टर मार्टिन लूथर किंग ‘‘जूनियर’’ तो सौ प्रतिशत गांधी के शिष्य थे। वर्षों पूर्व अब्राहम लिंकन ने वहां के काले नागरिकों को गुलामी के अभिशाप से मुक्त कर दिया था उसके बावजूद अमरीका में काले निवासियों के साथ भेदभाव किया जाता था। बसों में, दफ्तरों, सिनेमा हाल में, कारखानों में, ऐसी कोई जगह नहीं थी जहां भेदभाव नहीं होता था। बसों में कुछ सीटों पर लिखा रहता था ‘‘सिर्फ गोरों के लिये’’। एक दिन एक काली महिला गोरों के लिए आरक्षित सीट पर बैठ गई और धमकियों के बावजूद, पुलिस द्वारा ताकत का प्रयोग करने के बाद भी बार-बार उस सीट पर बैठती रही। उसके बाद अमरीका में एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन प्रारंभ हो गया। उस आंदोलन का नेतृत्व किया डा. किंग ने। आज से 50 वर्ष पूर्व डा. किंग के नेतृत्व में अमरीका की राजधानी वाशिनगटन में एक विशाल प्रदर्शन हुआ था। इस प्रदर्शन में लगभग 2 लाख लोगों ने भाग लिया। विशाल जनसमुदाय को संबोधित करते हुए जो भाषण डा. किंग ने दिया था, उसने दुनिया के इतिहास में स्थान बना लिया है। वह भाषण ‘‘आई हेव ए ड्रीम’’ (मेरा एक सपना है) के शीर्षक से सारी दुनिया में प्रसिद्ध है। महात्मा गांधी, डा. किंग के प्रेरणा पुरूष थे। महात्मा गांधी के संदेश को समझने और उसे आत्मसात करने के लिये डा. किंग ने अपनी पत्नी और कुछ प्रमुख सहयोगियों के साथ भारत की यात्रा की थी। अमरीका से रवाना होने के पूर्व उन्होंने कहा था कि मैंने अनेक देशों की यात्रा की है पर मैंने इन सभी देशों की यात्रा एक पर्यटक की हैसियत से की थी, परन्तु भारत मेरे लिये एक तीर्थस्थान है। भारत इसलिए तीर्थस्थल है क्योंकि वह महात्मा गांधी की जन्मभूमि और कर्मभूमि है। इसलिए मैं भारत एक तीर्थ यात्री के रूप में जा रहा हूँ। डा. किंग ने काले लोगों के अधिकारों के लिये अनेक आंदोलन किए। ऐसे ही एक आंदोलन की सफलता के बाद डा. किंग के एक सहयोगी ने कहा कि वे भारत की यात्रा पर क्यों नहीं जाते और स्वयं इतिहास के उन क्षणों को नहीं जीते हैं जिन क्षणों में महात्मा गांधी ने भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी। सुझाव के अनुसार वे भारत की यात्रा पर निकल पड़े और 9 फरवरी 1959 को बम्बई पहुंचे। बम्बई से वे दिल्ली पहुंचे, जहां प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनके सम्मान में एक भोज का आयोजन किया। नेहरू के साथ भोज के बाद डा. किंग ने चार घंटे बिताए। भारत के भ्रमण के दौरान हमारे यहां के गरीबों की स्थिति देखकर उनका मन दुःखी हो उठा। उन्हें बताया गया था कि करीब पांच लाख लोग बारह महीने बंबई में खुली आसमान के नीचे सड़कों पर सोते हैं। भारत के लोगों की स्थिति देखकर उन्होंने कहा कि यहां हालत भी बदतर हैं। डा. किंग भारत के दलितों की स्थिति देखकर काफी दुःखी हुए थे। वे एक ऐसे स्कूल में गए थे जहां दलित बच्चे पढ़ते थे। जब वे स्कूल में पहुंचे तो स्कूल के प्राचार्य ने उनका परिचय इन शब्दों में किया था ‘‘ये अमरीका में रहने वाले अछूत हैं’’।
भारत प्रवास के दौरान वे गुजरात में स्थित साबरमती आश्रम गए और वहां कुछ दिन बिताए। वे अनुभव करना चाहते थे कि इस स्थान से कैसे गांधी ने दुनिया के सबसे बड़े आजादी के आंदोलन का नेतृत्व किया। वे अपने प्रवास के दौरान राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद से मिले। इसके अतिरिक्त उन्होंने प्रसिद्ध गांधीवादी आचार्य कृपलानी से भी भेंट की। साबरमती आश्रम के बारे में उन्होंने लिखा है कि उनने उस स्थान पर एक महान आध्यात्मिक भावना का अनुभव किया। डा. किंग को बताया गया कि कैसे गांधी ने 322 किलोमीटर की पदयात्रा की थी। गांधी जी की इस महान ऐतिहासिक मार्च की चर्चा करते हुए डा. किंग ने अपने सहयोगियों को बताया कि गांधी जी ने मार्च में शामिल अन्य लोगों से कहा था ‘‘यदि तुम्हें पीटा जाता है तो भी पीटने वाले पर हमला न करो। यदि तुम्हारे ऊपर बंदूक चलाई जाती है तो भी कभी हथियार न उठाओ। यदि वे तुम्हें गाली देते हैं तो चुपचाप सुनो। इस सबके बावजूद चलते रहो, हो सकता है मंजिल पर पहुंचने के पहले हम में से कुछ मर जाएं, हम में से अनेकों को जेल भेज दिया जाए। इस सबके बाद भी हम चलते रहें और डा. किंग अंत में कहते हैं, कि वे (गांधी) चलते रहे।
डा. किंग की जीवनगाथा के लेखक लिखते हैं कि भारत की तीर्थयात्रा के बाद वे अनेक गांधीवादियों से ज्यादा गांधीवादी बन गए। वे भारत, गांधी जी के बारे में सब कुछ जानने के लिए आए थे। भारत की यात्रा के दौरान उन्होंने जो भी सुना, देखा, पढ़ा उसके बाद वे महान गांधीवादी बन गए।
-एल.एस. हरदेनिया

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकार



सेंटर फॉर सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म ;सीएसएसएसद्धए मुंबई ने काठमाण्डू में आयोजित पीपुल्स सार्क रीजनल कन्वर्जेन्स मीट में 24 नवंबर 2014 को 'दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकार' विषय पर सत्र का आयोजन किया।  इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य, दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के उल्लंघन की प्रकृति को समझना और जनसंगठनों का ऐसा मजबूत गठजोड़ खड़ा करना था, जिससे इन उल्लंघनों से मुकाबला करने के लिए पहले से विद्यमान व्यवस्था को और शक्तिशाली बनाया जा सके और इसके लिए नए तंत्र विकसित किए जा सकें। दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के घोषणापत्र का मसविदा तैयार करने की प्रक्रिया का शुभारंभ भी इस सत्र के एजेण्डे में शामिल था।
भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका व बांग्लादेश से आए लगभग 40 प्रतिनिधियों ने इस सत्र में भागीदारी की। सत्र की शुरूआत सभी उपस्थित प्रतिभागियों के परिचय से हुई। तत्पश्चात, सीएसएसएस के निदेशक इरफान इंजीनियर ने सत्र के आयोजन के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर विमर्श की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यक वर्गों में चेतना का उदय साम्राज्यवादी दौर में हुआ जब हमारे विदेशी शासकों ने बड़ी संख्या में लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान जाने पर मजबूर किया ताकि उन्हें सस्ता श्रम उपलब्ध हो सके। आबादी के इस स्थानांतरण से देशों की सीमाएं बदलीं और नई राजनीतिक व्यवस्थाओं ने जन्म लिया। विभिन्न क्षेत्रों में नए लोगों के बसने का एक प्रभाव यह हुआ कि दक्षिण एशिया के एक देश में जो समुदाय बहुसंख्यक था वह दूसरे देश में अल्पसंख्यक बन गया। इससे परिस्थितियां जटिल होती गईं।
अल्पसंख्यकों द्वारा उनके अधिकारों की मांग को राज्य अपनी सत्ता के लिए चुनौती मानता आया है। यद्यपि अल्पसंख्यकों की स्थिति में सुधार के लिए नेहरू.लियाकत सहित कई समझौते हुए परंतु शीतयुद्ध के काल मेंए दक्षिण एशिया, साम्राज्यवादी हितों के टकराव और हिंसा व षडयंत्रों का केंद्र बनकर उभरा। इससे विभिन्न समुदायों के बीच आपसी बैरभाव तो बढ़ा हीए धार्मिक कट्टरता में भी तेजी से वृद्धि हुई और क्षेत्र की सुरक्षा और शांति को खतरा पैदा हो गया। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए अल्पसंख्यक, जो दक्षिण एशिया में पहले से ही हाशिए पर थे।
सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज के हर्षमंदर ने अपने मुख्य वक्तव्य में कहा कि अल्पसंख्यक समुदायों और सरकारों के आपसी रिश्ते सहज और सामान्य नहीं हैं। अल्पसंख्यकों को यह लगता है कि वे वंचना के शिकार हैं। धार्मिक पहचान, समाज को विभाजित कर रही है। उन्होंने कहा कि प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता का मूल तत्व यह है कि हम विविधता का सम्मान करें और समानताएं ढूंढना बंद करें। यही दक्षिण एशिया और यूरोप में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा का फर्क है। यूरोप में धर्मनिरपेक्षता, वहां के समाज में घुलमिल जाने के रूप में परिभाषित की जा रही है। इसका एक उदाहरण है फ्रांस में पगड़ी व हिजाब पहनने पर प्रतिबंध। उन्होंने कहा कि राज्य के दमन और विविधता की उपेक्षा के कारण, लोग उस देश में स्वयं को सुरक्षित समझते हैं जहां उनके समुदाय का बहुमत हो। दक्षिण एशिया की विविधता ने उसकी संस्कृति को समृद्ध किया है। परंतु समृद्ध संस्कृति के साथ.साथ यह भी जरूरी है कि किसी भी देश में अल्पसंख्यक स्वयं को सुरक्षित समझें और बिना आतंक या डर के अपना जीवनयापन कर सकें। हर एक को यह स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह किसी भी धर्म का पालन करे या कोई भी धर्म न माने या नास्तिकता में विश्वास रखे। यही सच्चा प्रजातंत्र है। दुर्भाग्यवश,दक्षिण एशिया में प्रजातंत्र की इस मूल आत्मा का हनन हो रहा है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला जा रहा है। बर्मा जैसे कई देशों में तो मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चर्चा करना तक प्रतिबंधित है। ऐसे मुद्दों पर चर्चा के लिए गुप्त बैठकें आयोजित करनी पड़ती हैं क्योंकि सरकार किसी भी प्रकार की मतविभिन्नता को क्रूरता से कुचल देती है।
इसके बाद,विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने अपने.अपने देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति का विवरण दिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि श्री मंदर द्वारा व्यक्त की गई चिंताएं एकदम सही थीं। अल्पसंख्यकों की समस्या का चरित्र मूलतः राजनैतिक है और प्रजातांत्रिक अधिकारों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को उपयुक्त व पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए। अल्पसंख्यकों की समस्याओं के बढ़ने का एक कारण है आक्रामक बाजार.आधारित अर्थव्यवस्था,जो कि मध्यम वर्ग की मानसिकता पर गहरा प्रभाव डाल रही है। श्रेष्ठी वर्ग यह चाहता है कि हाशिए पर पटक दिए गए लोगों और अल्पसंख्यकों की कीमत पर समाज में उसका वर्चस्व बना रहे। इसलिए यह आवश्यक है कि पूंजीवाद जैसी विचारधाराओं पर हल्ला बोला जाए जो कि अमीरों और गरीबों के बीच की खाई को औरचौड़ा कर रही हैं। बाजार.आधारित अर्थव्यवस्था से असंतुलित विकास हो रहा हैए जो समावेशी नहीं है। बांग्लादेश से आए मोइनुद्दीन ने कहा कि बांग्लादेश में कई धार्मिक,नस्लीय व सैक्स.आधारित अल्पसंख्यक समूह हैं। देश में हिजड़ा समुदाय एक महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदाय है। अल्पसंख्यकों को ढेर सारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बांग्लादेश में हिंदू आबादीए जो कि सन् 1947 में 27 प्रतिशत थीए घटकर 10 प्रतिशत रह गई है। देश में अल्पसंख्यकों को अपने रहवास के इलाकों से पलायन करने पर मजबूर किया जा रहा है।
श्रीलंका के के.के. बालकृष्णन ने कहा कि वहां की आबादी में 72 प्रतिशत हिस्सा सिंहलियों का है जबकि 12.13 प्रतिशत तमिल, 8 प्रतिशत मुसलमान और लगभग 7 प्रतिशत भारतीय तमिल हैं,जो कि मुख्यतः वहां के बागानों में काम करते हैं। श्रीलंका में अल्पसंख्यकों के साथ नस्ल व वर्ग के आधार पर भेदभाव किया जाता है। भारतीय तमिलों के भी हाल बेहाल हैं।
पाकिस्तान में स्थिति और भी खराब है। वहां अल्पसंख्यकों की अर्थव्यवस्था और विकास में तनिक भी हिस्सेदारी नहीं है। नौकरशाही में अल्पसंख्यकों की भागीदारी न के बराबर है। यद्यपि पाकिस्तान में सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों के लिए 5 प्रतिशत पद आरक्षित हैं तथापि उन्हें कभी जिम्मेदार व ऊँचे पदों पर नियुक्त नहीं किया जाता। उन्हें अक्सर महत्वहीन पद दिए जाते हैं। विभाजन के दौरान, जिस समय दोनो देशों से हिंदुओं और मुसलमानों का बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा था, उस समय अल्पसंख्यकों ने पाकिस्तान में रहने का निर्णय इसलिए किया क्योंकि उन्हें उस धरती से प्यार था, जिसमें वे पले.बढ़े थे। केवल वे ही हिंदू पाकिस्तान छोड़कर जा सके जो धनी थे और जिनके पास एक नए स्थान पर जिंदगी शुरू करने के लिए आवश्यक संसाधन और योग्यता थी। दमनकारी जाति व्यवस्था और अमानवीय अछूत प्रथा के कारण भील और कोली समुदायों की बड़ी आबादी ने पाकिस्तान छोड़कर भारत न जाने का निर्णय किया। आज भी 80 लाख भील और कोली पाकिस्तान में रह रहे हैं। परंतु भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य देशों की तरह, पाकिस्तान में भी उनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव होता रहा और उन्हें शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में समान अवसर नहीं मिले। इस भेदभाव का एक सुबूत यह है कि जहां हिंदू आबादी का 80 प्रतिशत अनुसूचित जातियां हैं,वहीं अर्थव्यवस्था, प्रशासन, संसद आदि में उनका प्रतिनिधित्व मात्र 20 प्रतिशत है। स्पष्टतः, अल्पसंख्यकों की राजनीति में भागीदारी को रोकने की कोशिश की जा रही है। अगर सत्ता और राजनैतिक प्रक्रिया में उन्हें आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिया जाना है तो अल्पसंख्यक समुदायों को संसद में अधिक सीटें दी जानी चाहिए।
परंतु जब हम अल्पसंख्यकों और उनके अधिकारों की चर्चा करते हैं तब यह जरूरी है कि हम अल्पसंख्यक समुदायों को एकाश्म न मानें और ना ही हम उन्हें ऐसा समूह समझें, जिसकी आवश्यकताएं, महत्वाकाक्षाएं और अनुभव एक ही हैं। जाति की तरहए लिंग भी भेदभाव का आधार है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को विवाह करते समय इस्लाम अपनाने पर मजबूर किया जाता है। वहां बलात्कार आम है और ये महिलाओं के लिए मानसिक और शारीरिक यंत्रणा का सबब बनते हैं। अतः अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर कोई भी चर्चा तब तक पूरी नहीं होगी जब तक कि उसमें लैंगिक न्याय की बात शामिल न हो। अल्पसंख्यकों के अधिकारों के किसी भी घोषणापत्र को लागू करते समय यह ध्यान में रखा जाना होगा कि उसमें महिलाओं के अधिकारों के लिए उचित स्थान हो।
पाकिस्तान की तरह,भारत में भी अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को हजार दुःख हैं। उनके साथ भी बलात्कार और शारीरिक शोषण की घटनाएं बहुत आम हैं। मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से सामने आयी। जब मुसलमानों के खिलाफ हिंसा हो रही थी तब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने उसे रोकने के लिए पर्याप्त और उचित कदम नहीं उठाए। यहां तक कि मुस्लिम समुदाय के विधायक भी मूकदर्शक बने रहे।
टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल सांइसेज,मुंबई के प्रोफेसर रानू जैन ने कहा कि भारत में अल्पसंख्यकों के प्रति नीतियों पर बहस होनी चाहिए क्योंकि वे काफी हद तक अस्पष्ट हैं। उदाहरणार्थ, अल्पसंख्यक समुदाय को ही परिभाषित नहीं किया गया है। नतीजे मेंए उच्चतम न्यायालय यह तय कर रहा है कि कौन.सा समुदाय अल्पसंख्यक है और उस समुदाय को अल्पसंख्यकों के लिए नियत सुविधाएं दी जा रही हैं। इससे शक्तिशाली समुदायों को जोड़तोड़ करने का मौका मिल रहा है। भारत में इसी अस्पष्टता का लाभ उठाकर जैनियों और पारसियों ने भी अपने.अपने समुदायों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिलवा दिया है और उन्हें राज्य द्वारा हर किस्म का प्रोत्साहन दिया जा रहा है। यद्यपि यह सही है कि जैनियों और पारसियों की आबादी कम है परंतु यह भी सच है कि दोनों समुदाय विकसित,शिक्षित और समृद्ध हैं और उन्हें उन अल्पसंख्यक समुदायों की कीमत पर सुविधाएं उपलब्ध करवाई जा रही हैं, जो पिछड़े, गरीब और अशिक्षित हैं। भारत में अमीरों और गरीबों के बीच भारी अंतर है। मुट्ठीभर रईस यह जानते भी नहीं कि गरीबों को किस तरह की हिंसा, भेदभाव और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। संपन्न वर्ग तो बस अपनी ताकत में बढ़ोत्तरी करना चाहता है। मीडिया और शिक्षा व्यवस्था का इस हद तक सांप्रदायिकीकरण हो चुका है कि ये दोनों संस्थाएं अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं। निराशा के इस घनघोर अंधेरे में सच्चर समिति की रपट, आशा की किरण बनकर उभरी थी परंतु उसकी अधिकांश सिफारिशों को आज तक लागू नहीं किया गया है। ऐसे में जरूरी है कि अल्पसंख्यकों की चिंताओं पर खुलकर चर्चा की जाए और ऐसे नियम.कानून बनाए जाएं जिनसे सांप्रदायिक आधार पर भेदभाव रूक सके। साथ हीए सांप्रदायिक हिंसा पर नजर रखे जाने की भी जरूरत है। भारत के अल्पसंख्यकों की समस्याओं के बारे में कश्मीर से आए बशीर अहमद ने एक महत्वपूर्ण बात कही। कश्मीर में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वे जिस इलाके में रहते हैंए वहां पर हिंदू पंडित अल्पसंख्यक हैं।  उन्होंने कहा कि घाटी से पंडितों का पलायन दुर्भाग्यपूर्ण है। वे वहां से इसलिए चले गए क्योंकि उनके मन में असुरक्षा का भाव घर कर गया था। उन्होंने कहा कि जब हम अल्पसंख्यकों के संबंध में नीतियों के निर्माण पर चर्चा करें तब हमें अल्पसंख्यकों के अंदर के अल्पसंख्यकों का भी ध्यान रखना होगा।
सत्र के अंत में पाकिस्तान से आए करामत अली और इरफान इंजीनियर ने पूरी चर्चा का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया और भविष्य की कार्यवाही की रूपरेखा बताई। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों को विधानमंडलों और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में तो पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना ही चाहिएए आर्थिक नीतियों और विकास की प्रक्रिया के निर्धारण में भी उनकी भूमिका होनी चाहिए। अल्पसंख्यकों को यह हक मिलना चाहिए कि वे अपनी संस्कृति की रक्षा कर सकें और अपनी पहचान को सुरक्षित रख सकें। सांप्रदायिक हिंसा और कत्लेआम को रोकने के लिए कानून बनाए जाने चाहिए और उन्हें कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए। अकेले भारत में स्वतंत्रता से लेकर अब तक सांप्रदायिक दंगों में लगभग 40,000 लोग मारे जा चुके हैं। परंतु बहुत कम दोषियों को सजा मिल सकी है। अतः यह आवश्यक है कि पूरे दक्षिण एशिया में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं की निष्पक्ष जांच करने के लिए एक आयोग का गठन किया जाए। जो लोग हिंसा के कारण अपने गांवए घर छोड़ने पर मजबूर कर दिए जाते हैं वे शिक्षा और रोजगार से तो मेहरूम होते ही हैंए उनमें मजहबी कट्टरता भी बढ़ती है। अगर अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दी जाए और सत्ता में उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए तो कट्टरपंथी तत्व कमजोर पड़ेंगे और धार्मिक पहचान के आधार पर ध्रुवीकरण कम होगा।
इस सत्र में हुई चर्चा के आधार पर अल्पसंख्यक अधिकारों के घोषणापत्र की अवधारणा पर विचार करने हेतु एक मसविदा समिति का गठन किया गया जिसमें इरफान इंजीनियर,रानू जैन, हर्षमंदर, करामत अली व बशीर अहमद शामिल हैं। सम्मेलन में यह मांग की गई कि सार्क देशों को दक्षिण एशिया आयोग की नियुक्ति करना चाहिए जिसमें हर सार्क देश से एक.एक पुरूष और महिला प्रतिनिधि शामिल हो और जो क्षेत्र में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर नजर रखे।
-नेहा दभाड़े

रविवार, 26 अक्टूबर 2014

विस्मृत मृतात्माओं की साधना क्यों ?

पांच महीने अभी पूरे हुए हैं और मोदी के प्रचारकों का सुर बदल गया। देखिये कल, 24 अक्तूबर के ‘टेलिग्राफ’ में स्वपन दासगुप्त का लेख - Picky with his symbol (अपने प्रतीक का खनन)।
स्वपन दासगुप्त, मोदी बैंड के एक प्रमुख वादक, चुनाव प्रचार के दिनों में बता रहे थे - गुजरात का यह शेर सब बदल डालेगा। आजादी के बाद से अब तक जीवन के सभी क्षेत्रों में ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ का जो नाटक चलता रहा है, उसका नामो-निशान तक मिट जायेगा। इतिहास की एक नयी इबारत लिखी जायेगी।
                                     आज वही दासगुप्ता मोदी विरोधियों को इस बात के लिये लताड़ रहे हैं कि क्या हुआ, मोदी को लेकर इतना डरा रहे थे, कुछ भी तो नहीं बदला। मोदी की राक्षस वाली जो तस्वीर पेश की जा रही थी, अल्पसंख्यकों को डराया जा रहा था, पड़ौसी राष्ट्रों से भारी वैमनस्य की आशंकाएं जाहिर की जा रही थी - वैसा कुछ भी तो नहीं हुआ। बनिस्बत्, अपने राजतिलक के मौके पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री तक को आमंत्रित करके, जापान, अमेरिका सहित सारी दुनिया को आर्थिक उदारवाद की मनमोहन सिंह की नीतियों पर ही और भी दृढ़ता के साथ चलने का आश्वासन देकर और ‘स्वच्छ भारत’ आदि की तरह के अपने प्रचार अभियानों में आमिर खान, सलमान खान को शामिल करके, और तो और, स्वपन दासगुप्त के अनुसार, योगी आदित्यनाथ की जहरीली बातों का खुला समर्थन न करके मोदी ने अपने ऐसे सभी विरोधियों को निरस्त कर दिया है। उनके लेख की अंतिम पंक्ति है - ‘‘ मोदी के आलोचकों को अब उनकी पिटाई के लिए नयी छड़ी खोजनी होगी, पुरानी तो बेकार होगयी है।’’
(Modi’s critics must find a new stick to beat him with. The old one has blunted)
                                           दासगुप्त का यह कथन ही क्या यह बताने के लिये काफी नहीं है कांग्रेस-शासन के दुखांत के बाद, यह ‘कांग्रेस-विहीनता’ का शासन प्रहसन के रूप में इतिहास की पुनरावृत्ति के अलावा और कुछ नहीं साबित नहीं होने वाला !
                                     मार्क्स की विश्लेषण शैली का प्रयोग करें तो कहना होगा - मानव अपना इतिहास स्वयं बनाते हैं पर मनचाहे ढंग से नहीं। वे अतीत से मिली परिस्थितियों में काम करते हैं और मृत पीढि़यों की परंपरा जीवित मनुष्यों के मस्तिष्क पर एक दुरूस्वप्न सी हावी रहती है। ‘‘ऐसे में कुछ नया करने की उत्तेजना में ही अक्सर वे अतीत के प्रेतों को अपनी सेवा में आमंत्रित कर लेते हैं। उनसे अतीत के नाम, अतीत के रणनाद और अतीत के परिधान मांगते हैं ताकि इतिहास की नवीन रंगभूमि को चिर-प्रतिष्ठित वेश-भूषा में, इस मंगनी की भाषा में पेश कर सके।’’
आरएसएस के प्रचारक और गुजरात (2002) के सिंह के जिन प्रतीकों के आधार पर स्वपन दासगुप्त मोदी को एक नये बदलाव का सारथी बता रहे थे, वे ही अब यह कह करे हैं कि ‘‘प्रधानमंत्री मोदी और चुनाव प्रचार के समय का अदमनीय मोदी बिल्कुल भिन्न है। यह नयी मोदी शैली अभी विकासमान है और इसकी कोई चौखटाबद्ध परिभाषा करना जल्दबाजी होगी।’’

(Modi the prime minister has chosen to be markedly different from Modi the indefatigable election campaigner. The style is still evolving and it would be premature to attempt a rigid definition of the new style)


                                       नयी मोदी शैली ! पहले सरदार पटेल, अब गांधी, नेहरू भी - भारत की राष्ट्रीय राजनीति की चिरप्रतिष्ठित वेश-भूषा और मंगनी की पुरानी भाषा की सजावट से तैयार हो रही नयी शैली !
                                                इसमें शक नहीं कि दुनिया के सभी बड़े-बड़े परिवर्तनों की लड़ाइयों को बल पहुंचाने के लिये अतीत के प्रतिष्ठित प्रतीकों का, आदर्शों और कला रूपों का भी प्रयोग होता रहा हैं। वर्तमान की लड़ाई के सेनानियों में एक नया जज़्बा पैदा करने के लिये अनेक मृतात्माओं को पुनरुज्जीवित किया जाता रहा है। भारत की आजादी की लड़ाई का इतिहास तो ऐसे तमाम उदाहरणों से भरा हुआ है। आधुनिक जनतांत्रिक विचारों के साथ ही इसकी एक धारा स्पष्ट तौर पर पुनरुत्थानवादी धारा रही है। लेकिन उस लड़ाई में अतीत के आदर्शों और प्रतीकों का, अनेक मृतात्माओं का उपयोग गुलामी से मुक्ति की लड़ाई को गौरवमंडित करने के उद्देश्य से किया गया था, न कि किसी प्रकार की भौंडी नकल भर करने के लिएय उनका उपयोग अपने उद्देश्यों और कार्यभारों की गुरुता को स्थापित करने के लिये किया गया था, न कि अपने घोषित कार्यभारों को पूरा करने से कतराने के लिये, अपने चरित्र पर पर्दादारी के लियेय उनका इस्तेमाल कुंद की जा चुकी प्राचीन गौरव की आत्मा को जागृत करने के लिए किया गया था न कि उसके भूत को मंडराने देने के लिए, अपने समय को भूतों का डेरा बना देने के लिये।
                                                     गौरवशाली, वीरतापूर्ण राष्ट्रीय आंदोलन की कोख से इस देश में एक पूंजीवादी जनतांत्रिक राज्य की स्थापना हुई। राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व से अबतक इसके विभिन्न चरणों में कई प्रवक्ता पैदा हुए - पंडित नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिम्हा राव, मनमोहन सिंह। इनके अलावा गैर-कांग्रेस दलों से भी छोटे-बड़े अंतरालों के लिये मोरारजी देसाई, चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर, देवगौड़ा, गुजराल और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रवक्ता सामने आएं। यह कहानी, स्वतंत्र भारत में भारतीय पूंजीवाद के विकास की कहानी, पूरे सड़सठ सालों की कहानी है। इतने लंबे काल तक नाना प्रकार के टेढ़े-मेढ़े रास्तों से लगातार धन के उत्पादन, लूट-खसोट और गलाकाटू प्रतिद्वंद्विताओं में तल्लीन हमारा आज का उपभोक्तावादी समाज इस बात को लगभग भूल चुका है कि उसका जन्म आजादी की लड़ाई के दिनों के वीर सेनानियों की मृतात्माओं के संरक्षण में हुआ हैं। राजनीति एक आदर्श-शून्य, शुद्ध पेशेवरों का कमोबेस खानदानी धंधा बन चुकी है।
                                              ऐसे सामान्य परिवेश में, अतीत के सारे कूड़ा-कर्कट को साफ कर देने की दहाड़ के साथ सत्तासीन होने वाले शूरवीर द्वारा अपनी सेवा के लिये मृतात्माओं का आह्वान किस बात का संकेत है ? क्या तूफान की गति से इतिहास का पथ बदल देने का दंभ भरने वालों में सिर्फ पांच महीनों में ही सहसा किसी मृतयुग में पहुंच जाने का अहसास पैदा होने लगा है? वैसे भी, हाल के उपचुनावों और राज्यों के चुनावों के बाद एक सिरे से सब यह कहने लगे हैं कि भाजपा की बढ़त के बावजूद मोदी लहर जैसी किसी चीज का अस्तित्व नहीं रहा है। राजनीति के नाम पर वही सब प्रकार की जोड़-तोड़, सरकारें बनाने-बिगाड़ने की अनैतिक कवायदें, अपराधियों को हर प्रकार का संरक्षण देने की शर्मनाक कोशिशें, एक-दूसरे की टांग खिंचाई की साजिशाना हरकतें, सार्वजनिक धन को निजी हाथों में सौंप देने की राजाज्ञाएं, सीमाओं को लेकर थोथा गर्जन-तर्जन और विश्व पूंजीवाद के सरगना अमेरिका की चरण वंदना। यही तो है, एक शब्द में - राजनीति का मोदी-अमितशाहीकरण !
                                इसीलिये, स्वपन दासगुप्त जो भी कहे, अब इतना तो साफ है कि मोदी का सत्ता में आना किसी आकस्मिक हमले के जरिये बेखबरी की स्थिति में किसी को अपने कब्जे में ले लेना जैसा ही था। वैसा धुआंधार, एकतरफा प्रचार पहले किसी ने नहीं देखा था। अन्यथा, न भ्रष्टाचार-कदाचार में कोई फर्क आने वाला है, न तथाकथित नीतिगत पंगुता में। जब आंख मूंद कर पुराने ढर्रे पर ही चलना है तो क्या सजीवता, और क्या पंगुता ! इस पूरे उपक्रम में यदि कुछ बदलेगा तो, जैसा कि नाना प्रकार की खबरों से पता चल रहा है, पिछली सरकार द्वारा मजबूरन अपनाये गये गरीबी कम करने के कार्यक्रमों में कटौती होगीय भूमि अधिग्रहण कानून में किसानों के हित में किये जारहे सुधारों को रोका जायेगाय और भारत में विदेशी पूंजी के अबाध विचरण का रास्ता साफ किया जायेगा। भारत सरकार गरीबों को दी जाने वाली तमाम प्रकार की रियायतों में कटौती करें, इसके लिये सारी दुनिया के  बाजारवादी अर्थशास्त्री लगातार दबाव डालते रहे हैं। इसीप्रकार भूमि अधिग्रहण के मामले में बढ़ रही दिक्कतों को खत्म करने और बैंकिंग तथा बीमा के क्षेत्र को विदेशी पूंजी के लिये पूरी तरह से खोल देने के लिये भी दबाव कम नहीं हैं। मनमोहन सिंह इन सबके पक्ष में थे, फिर भी विभिन्न राजनीतिक दबावों के कारण अपनी मर्जी का काम नहीं कर पा रहे थे। इसीलिये उनकी सरकार पर लगने वाले ‘नीतिगत पंगुता’ के सभी सच्चे-झूठे अभियोगों में ये सारे प्रसंग भी शामिल किये जाते थे। मोदी सरकार ने इसी ‘नीतिगत पंगुता’ से उबरने के लिये सबसे पहले गरीबी को कम करने वाली योजनाओं की समीक्षा करनी शुरू कर दी है। बीमा क्षेत्र को तो विदेशी पूंजी के लिये खोल ही दिया है, भूमि अधिग्रहण विधेयक के मामले में भी पहले सर्वसम्मति से जो निर्णय लिये गये थे, उन सबको बदलने के बारे में विचार का सिलसिला शुरू हो गया है।
                 चन्द रोज पहले ही प्रकाशित हुई विश्व बैंक की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि सन् 2011 से 2013 के बीच दुनिया में गरीबी को दूर करने में भारत का योगदान सबसे अधिक (30 प्रतिशत) रहा है। खास तौर पर मनरेगा और बीपीएल कार्ड पर सस्ते में अनाज मुहैय्या कराने  की तरह के कार्यक्रमों ने सारी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इन कार्यक्रमों के चलते भारत में मजदूरी के सामान्य स्तर में वृद्धि हुई है। लेकिन भारतीय उद्योग और मोदी सरकार भी सस्ते माल के उत्पादन की प्रतिद्वंद्विता में भारत को दुनिया के दूसरे देशों से आगे रखने के नाम पर मजूरी के स्तर को नियंत्रित रखना चाहती है। ‘श्रमेव जयते’ योजना, पूंजी और श्रम के बीच की टकराहट में सरकार की अंपायर की भूमिका के अंत की योजना, जिसकी घोषणा के दिन को खुद भाजपा के श्रमिक संगठन, भारतीय मजदूर संघ ने भारत के मजदूरों के लिये एक काला दिवस कहा, मोदी उसीकी शेखी बघारने में फूले नहीं समा रहे। हांक रहे हैं - ‘श्रमयोगी बनेगा राष्ट्रयोगी’।
                        इन सारी स्थितियों में, ‘कांग्रेस-विहीन’ भारत सिर्फ चमत्कारों पर विश्वास करने वाले कमजोर लोगों में ही किसी नये विश्वास का उद्रेक कर सकता है। भविष्य के उन कार्यक्रमों के गुणगान में, जिनकी उन्होंने अपने मन में योजनाएं बना रखी है, लेकिन उन पर असल में अमल की कोई मंशा या अवधारणा ही नहीं हैं, ये वर्तमान के यथार्थ के अवबोध को ही खो दे रहे हैं।
                                           ‘स्वच्छता अभियान’ का ही प्रसंग लिया जाए। साफ और स्वच्छ भारत के पूरे मसले को जनता के शुद्ध आत्मिक विषय में तब्दील करके पूरे मामले को सिर के बल खड़ कर दिया जा रहा है। इन्हीं तमाम कारणों से वह समय दूर नहीं होगा, जब यह प्रमाणित करने के लिये इकट्ठे हुए लोग कि हम अयोग्य नहीं है, अपना बोरिया-बिस्तर समेटते हुए दिखाई देने लगेंगे - ‘जो आता है वह जाता है’ का बीतरागी गान करते हुए। स्वपन दासगुप्त मोदी-विरोधियों से मोदी की पिटाई के लिये नयी छड़ी खोजने की बात करते हैं। यह नहीं देखते कि जो पिटे हुए रास्ते पर चलने की पंगुता का शिकार हो, उसे पीटने के लिये किसी छड़ी की जरूरत ही नहीं होगी। मोदी शासन के प्रारंभ में ही उसके दुखांत के बीज छिपे हुए हैं। 

------अरुण माहेश्वरी
Share |