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सोमवार, 13 अप्रैल 2020

जलियांवाला :मुखविरों के वंशज आज भी हिन्दू -मुसलमानों को लड़ा रहे हैं

अंग्रेजों के मुखविरों के वंशज आज भी हिन्दू -मुसलमानों को लड़ा कर साम्राज्यवादियों की मदद कर रहे है .देश की आजादी के लिए हिन्दू -मुसलमानों सहित लाखों तत्कालीन नागरिकों ने प्राण दे दिए थे .अंग्रेजों के मुखविरों के वंशज आज भी समझते है कि आजादी ऐसे ही मिल गई थी .
सभी धर्मों के मतालाम्बियों की एकता इस देश की प्राणवायु है .साम्प्रदायिक एकता के कारण ही जलियांवाला बाग कांड हुआ था . आज भी मुखविरों की जमात के वंशज हिन्दू- मुस्लिम -सिख- ईसाई को लड़ा कर देश की एकता को कमजोर कर रहे है . अंग्रेज भी इसी एकता से भयभीत थे .

13 अप्रैल, 1919 सिखों का बैसाखी पर्व था।पुलिस अत्याचारों व रोलेट एक्ट के विरोध में अमृतसर स्वर्ण मंदिर के पास जलियांवाला बाग मैदान में, हजारों सिख, मुसलमान और हिंदू उस समय एकत्रित हुए। राम सरन दत्त, गोकुल चंद नारंग, सैफ़ुद्दीन किचलू, अली ख़ान सहित अंग्रेजी शासन के खिलाफ सभी एकजुट थे अंग्रेज 1857 के विद्रोह, 1870 के दशक के कूका आंदोलन और साथ ही 1914-15 के ग़दर आंदोलन देख चुके थे . हिन्दू =मुस्लिम एकता के कारण सरकार का जबरदस्त मजबूत विरोध था .हड़तालें हो रही थी .जालंधर के ब्रिगेडियर जनरल रेगिनाल्ड डायर को आदेश दिया गया कि वो इन घटनाओं को संभालने के लिए फ़ौरन अमृतसर पहुंचें. नागरिक प्रशासन ढह चुका था और ऐसे में संभवत: डायर को परिस्थितियों को नियंत्रण में करने के लिए बुलाया गया था.

ब्रिगेडियर जनरल रेजिनॉल्ड डायर
शाम 4 बजे के बाद, जनरल रेजिनाल्ड डायर, फिर अमृतसर के सैन्य कमांडर ने 90 सदस्यों की एक छोटी टुकड़ी के साथ स्टेडियम को घेर लिया। बल के साथ दो बख्तरबंद वाहनों को डायर के पास लाया गया। लेकिन स्टेडियम की सड़क इतनी संकरी थी कि वाहन अंदर नहीं जा सकते थे। जलियांवाला बाग स्टेडियम दीवारों से घिरा हुआ है, स्टेडियम के द्वार बहुत संकीर्ण हैं और उनमें से कई स्थायी रूप से बंद हैं। यद्यपि मुख्य द्वार अपेक्षाकृत बड़ा था, लेकिन प्रवेश द्वार को डायर सैनिकों और वाहनों द्वारा बंद कर दिया गया था।
ब्रिगेडियर जनरल रेजिनॉल्ड डायर  ने सभा छोड़ने की चेतावनी के बिना  गोलीबारी का आदेश दिया गया था। डायर ने बाद में कहा कि यह कदम भारतीयों की सभा  को समाप्त  करने के बजाय सबक सिखाने के लिए थी । गोली  समाप्त होने तक सैनिकों को गोली चलाने का आदेश दिया गया था। सैनिकों ने 1,650 बार भीड़ पर गोलीबारी की। यह आंकड़ा बाद में उन खाली कारतूसों  से पता चला था जो घटना के बाद से खाली हो गए थे। त्रासदी से बचने के लिए, लोग मैदान में एक छोटे से कुँए पर चढ़ गए। इस छोटे से कुएं से केवल 120 शव बरामद किए गए थे।
गोलीबारी में हताहतों की संख्या को लेकर अभी भी विवाद हैं। ब्रिटिश सरकार ने कहा कि गोलीबारी में 379 लोग मारे गए। इसके बारे में कांग्रेस के आंकड़ों के अनुसार, यह लगभग 1,800 था।
घटना के महीनों बाद, सरकार ने मरने वालों की संख्या का अनुमान लगाया। अधिकारियों ने जनता से आग्रह किया कि अगर उनके परिवारोंके सदस्य  मौत  या घायल  जलियांवाला बाग में गोलीबारी में हुई है तो  वे अपने नाम सरकार को प्रस्तुत करें। यह कोई प्रभावी उपाय नहीं था। बहुत से लोग स्वयंसेवक के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि उन्हें लगता था  कि यदि उनके नाम सामने आते हैं तो अतिरिक्त कार्रवाई की जाएगी। प्रत्यक्षदर्शियों ने बाद में खुलासा किया कि वास्तविक मौत का आंकड़ा ब्रिटिश अधिकारियों की तुलना में बहुत अधिक था।
-रणधीर सिंह सुमन

रविवार, 17 फ़रवरी 2019

पाकिस्तान के साथ व्यापारिक सम्बन्धों को समाप्त कर आर्थिक हड्ड़ी तोड़ने का काम करें सरकार-रणधीर सिंह सुमन

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा सेनपुरवा में आयोजित की गयी श्रद्धाजंलि सभा

बाराबंकी। पुलवामा में अर्द्ध सैनिक बलो को सच्ची श्रद्धाजंलि यही होगी कि सरकार पाकिस्तान के साथ व्यापारिक सम्बन्धों को तुरन्त समाप्त कर पाकिस्तान की आर्थिक रीढ़ की हड्ड़ी तोड़ने का काम करें। उक्त विचार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा पुलवामा मे अर्द्ध सैनिक बलो के जवानो की शहादत पर ग्राम सेनपुरवा बंकी में आयोजित श्रद्धाजंलि सभा को सम्बोधित करते हुये राज्य परिषद सदस्य रणधीर सिंह सुमन ने कही। श्री सुमन ने आगे कहा कि नौजवानो की शहादत से पूरा देश शहीद नौजवानों के साथ खड़ा है। लेकिन कुछ साम्प्रादायिक शक्तियां देश की एकता और अखण्ड़ता को कमजोर करने के लिये राजनीत कर रही है। जिसकी हम सब निंदा करते है। श्रद्धाजंलि सभा को सम्बोधित करते हुये पार्टी जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि शहीद होने वाले नौजवान हमारे घरो के हैं। जो मजदूर, किसान घरो से आते है। उनको पेशन तक नही दी जा रही है। सरकार को चाहिये कि पेशन सुविधा बहाल करते हुये अन्य सुविधा प्रदान करे। जिला सह-सचिव शिवदर्शन वर्मा ने कहा कि जिस तरह मजदूर और किसान के हालात अच्छे नही है। उसी तरह अर्द्ध सैनिक बलो को जो सुविधाये मिलनी चाहिये नही मिल पा रही है। श्रद्धाजंलि सभा को प्रवीन कुमार, किसान सभा अध्यक्ष विनय कुमार सिंह, मुनेश्वर बक्श वर्मा ने भी सम्बोधित किया। सभा की अध्यक्षता पूर्व प्रधान अरुण वर्मा ने की। सभा में महेन्द्र यादव, रामनरेश, जैनुल आबदीन, मयूर सिह, गिरीश चन्द्र वर्मा, परमेन्द्र वर्मा, अशोक मौर्य, वीरेन्द्र कुमार वर्मा, कुलदीप, ताराचन्द्र, अशोक कुमार राव, आशुराम, अनुपम वर्मा, नन्हेलाल, रामविलास वर्मा, आदि मौजूद रहे। सभा के पूर्व 2 मिनट का मौन रख शहीदो को श्रद्धाजंलि अर्पित की गई। 

गुरुवार, 18 मई 2017

वामपंथ ही दलितों का स्वाभाविक सहयोगी : दारापुरी


    यह साक्षात्कार लोक संघर्ष पत्रिका के प्रबंध सम्पादक-रणधीर सिंह ‘सुमन’ ने वर्तमान सन्दर्भों में दलितों की भूमिका पर एस0आर0 दारापुरी पूर्व पुलिस महानिरीक्षक उ0प्र0 की जुबानी
प्रश्न-    बहुजन समाज पार्टी का क्या भविष्य है?
उत्तर-    मेरे विचार में बहुजन समाज पार्टी का बिखराव और तेज होगा क्योंकि दलितों के एक बड़े हिस्से का भी बसपा से मोहभंग हो गया है और उन्होंने दलित नेतृत्व पर उंगली उठानी शुरू कर दी है। मायावती ने चुनाव में हारने के बाद किसी भी प्रकार की अपने ऊपर जिम्मेदारी नहीं ली है जबकि दलित उन कारणों को बड़े स्पष्ट रूप से जान रहे हैं। इसके अलावा मायावती ने न तो आज तक कभी दलित एजेण्डा बनाया है और न ही दलित उत्पीड़न के मामलों में कोई प्रभावशाली प्रतिक्रिया ही दिखाई है इससे दलित मायावती को केवल वोट और नोट लेने तक ही सीमित होना देख रहे हैं।
प्रश्न-    मायावती और उनके भाई आनन्द कुमार के खिलाफ जो जांचे चल रही है उससे मायावती का अगला कदम क्या हो सकता है?
उत्तर-    अब तक की  जांचो में मायावती और उसका भाई काफी हद तक फंसते दिखाई दे रहे है। जिस कारण मायावती सत्तारूढ़ दल का विरोध नहीं कर सकती है, इस कारण मायावती को सत्तारूढ़ पार्टी जैसे पहले कांग्रेस  , वर्तमान में भाजपा के सहयोग में रहना एक बाध्यता है।
प्रश्न-    अधिकांश दलित चिन्तक और साहित्यकार, राजनेता वामपंथ के विरोध करते है, इसका क्या कारण हो सकता है?
उत्तर-    मेरे विचार में इसका मुख्य कारण दलितों और वामपंथियों के बीच में जान बूझकर भ्रान्तियां पैदा की गयी हैं। इतिहास इस बात का गवाह है कि शुरू के दौर में डा अम्बेडकर के अधिकतर जन आन्दोलन वामपंथियों के साथ मिलकर चलाए गये थे। उदाहरण के लिए सन् 1940 में भारत की सबसे बड़ी और सबसे सफल काटन मिल मजदूरों की हड़ताल डा0 अम्बेडकर और वामपंथियों ने मिलकर करवायी थी। इसके बाद भी डा अम्बेडकर के कुछ उच्च स्तरीय वामपंथ की विचारधारा से कुछ मुद्दों पर मतभेद था जैसे राज्य का लोप हो जाना अधिनायक वाद तथा क्रान्ति में हिंसा की अनिवार्यता इसके अतिरिक्त डा अम्बेडकर ने कहीं भी मार्क्सवाद का विरोध नहीं किया है। इसके विपरीत उन्होंने तो बौद्ध धर्म और मार्क्सवाद में बहुत समानता होने की भी बात स्वीकार की थी।
        डा अम्बेडकर के बाद डा अम्बेडकर द्वारा स्थापित पार्टी आर0पी0आई0 पार्टी का सबसे बड़ा सहयोग वापमंथी पार्टियों के साथ ही रहा है और उत्तर प्रदेश इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां पर ‘नीली टोपी लाल टोपी’ के साथ का नारा था।
        मेरे विचार में यह सही है कि शुरू में वामपंथ अधिकतर वर्ग संघर्ष की बात ही करता रहा और उसने जाति संधर्ष और जातीय उत्पीड़न को उतना महत्व नहीं दिया परन्तु अब वामपंथ ने वर्ग संघर्ष के साथ-साथ जातीय संघर्ष को भी अपने एजेण्डे पर लिया है और उसके अनुसार कार्यवाहियां भी की है। यह भी सही है कि वामपंथ का रास्ता संघर्ष का रास्ता है परन्तु कुछ दलित नेताओं को इस कठिन रास्ते में परहेज रहा है।
        वर्तमान परिस्थितियों में राजनैतिक तौर पर तथा सामाजिक संघर्ष के स्तर पर वामपंथी ही दलितों के सबसे नजदीक है और एक तरीके से उनके स्वाभाविक सहयोगी है
प्रश्न-    हिन्दू धर्म के दलितों के उत्पीड़न से क्षुब्ध होकर डा अम्बेडकर ने बौध धर्म अपने समर्थकों के साथ धारण कर लिया था। वर्तमान परिस्थितियों में क्या दलित समुदाय हिन्दू कट्टरपंथियों के सामने नतमस्तक हो रहा है?
उत्तर-    डा0 अम्बेडकर ने बौध धर्म को दलितों की सामाजिक, आर्थिक मानसिक मुक्ति के लिए अपनाया था। उनको प्रेरणा से दलितों के एक हिस्से ने बौध धर्म को अपनाया भी है और उन्होंने हिन्दू दलितों की अपेक्षा प्रगति भी की है।
        दुर्भाग्य से दलित कोई एक होमोजेनियस वर्ग नहीं है तथा विभिन्न जातीयों में विभाजित है अभी तक बौध धर्म का फैलाव दलितों की कुछ विशेष जातियों तक ही हुआ है। अधिकतर दलित अभी भी हिन्दू बने हुए है। पिछले कुछ समय से आर0एस0एस0 ने बहुत सचेतन प्रयास करके इन हिन्दू दलितों में हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार किया है उनकी बस्तियों में विभिन्न महापुरूषों के मन्दिर बनवाया है सहभोज करवाया है तथा प्रवचनों का आयोजन किया है।
        इसके अतिरिक्त भाजपा तथा आर0एस0एस0 ने हिन्दू दलितों की उपजातियों को राजनैतिक तौर पर बरगलाकर अपने हिन्दुत्व की छतरी के नीचे ले आये हैं। इससे यह कहा जा सकता है कि आर0एस0एस0 और भाजपा कुछ हद तक दलितों को कट्टर हिन्दू की ओर आकर्षित करने में सफल हुए है परन्तु फिर भी दलितों की बड़ी जातिया अभी भी हिन्दुत्व के प्रभाव से बड़ी जातिया बची हुई है।

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

सरकार बनाएगा और कॉर्पोरेट सेक्टर की ही सेवा करेगा.

दुनिया के एक बड़े हिस्से ने शोषकों से उत्पीडित जनता को निजात दिलाने के लिए साम्यवाद के विचारों को अपनाया था जब तक वह कारण दुनिया में विद्यमान रहेंगे साम्यवादी विचारों की आवश्यकता बनी रहेगी.
आज प्रदेश में विराट बेरोजगारी फैली हुई है सत्तारूढ़ दल बेरोजगारी की समस्या का समाधान करने में असमर्थ हैं उसका मुख्य कारण विचारों का अभाव होना है. कॉर्पोरेट सेक्टर के पैसे से चुनाव लड़ने वाले सत्तारूढ़ दल व अन्य पूंजीवादी दल कॉर्पोरेट सेक्टर की सेवा करने के लिए पढ़े-लिखे नौजवानों को बेरोजगार बनाये रखना चाहते हैं इसलिए लाखों-लाख इंजिनियर, प्रशिक्षित अध्यापक, बिज़नेस मैनेजमेंट कर्ता पांच हज़ार रुपयों से लेकर 10 हज़ार रुपये प्रतिमाह की नौकरी करने के लिए मजबूर हैं वहीँ  लाखों-लाख करोड़ रुपये का मुनाफा प्रतिवर्ष कॉर्पोरेट सेक्टर करता हैं, पूंजीवादी मुनाफे के लिए आवश्यक है कि बेरोजगारों की मंडी बनी रहे और इसीलिए कॉर्पोरेट सेक्टर हज़ारों करोड़ रुपये पूंजीवादी राजनीतिक दलों के ऊपर खर्च करता है.
                               सपा, बसपा, भाजपा, कांग्रेस कॉर्पोरेट सेक्टर की सेवा में उन्ही के पैसे चुनाव लड़ रहे हैं जो भी जीतेगा वह सरकार बनाएगा और कॉर्पोरेट सेक्टर की ही सेवा करेगा.
              आज किसान को अपने उत्पादन का मूल्य न मिलने से कोल्ड स्टोरेज में रखा उसका आलू सड़ गया और नए आलू का मूल्य 400 रुपये प्रति कुंतल है, 600 रुपये प्रति कुंतल में धान अभी बिका है. किसान दिवालिया हो रहा है. बुनकरों के पास काम न होने के कारण वह प्रतिदिन 100 रुपये कि भी मजदूरी नहीं कर पा रहा है. प्रतिवर्ष धान वा गेंहू की खरीद कि व्यवस्था कागजों पर ही होती रही है. जिससे प्रदेश के किसानो कि माली हालत ख़राब हुई है. नोटबंदी के कारण गाँवों के अन्दर मजदूरी मिलनी बंद हो गयी है.
         प्रदेश में कांग्रेस, सपा, बसपा, भाजपा की सरकारें रही हैं. इन सभी दलों के नेतागण मजदूरों, किसानो, बुनकरों कि चिंता में रात दिन लगे रहते हैं जिससे यह तबके आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे हैं कॉर्पोरेट सेक्टर का मुनाफा लाखों-लाख करोड़ हो रहा है. विकास की इस धारा में कॉर्पोरेट सेक्टर मालामाल हो रहा है और मजदूर, किसान, बुनकर, मध्यम वर्ग तबाह हो रहा है.
            आइये ! हम आप सब मिलकर एक नई व्यवस्था का निर्माण करे जिसमें भूख, शोषण, अत्याचार, उत्पीडन न हो और एक शोषण रहित सुखी समाज की स्थापना हो सके.
इसके लिए

  • 17 वीं विधान सभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के चुनाव निशान हंसिया बाली वाले खाने का बटन दबा कर विजयी बनाएं तथा वामपंथी दलों को जितायें.
  • सांप्रदायिक, जातिवादी तथा वंशवादी ताकतों को परास्त करें.
  • भ्रष्ट, अपराधी तथा माफिया सरगनाओं को विधान सभा में पहुँचने से रोकें.
  • किसान, मजदूर एवं आम आदमी की बर्बादी का कारण आर्थिक नवउदारवाद की नीतियों को पीछे धकेलें.

  नोट ; भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी प्रतिनिधि रणधीर सिंह सुमन  का लेख  1 मार्च   को आल इंडिया रेडियो  से  प्रसारित  किया जाएगा

रविवार, 8 जनवरी 2017

अब -अगला नम्बर किसका ?

 पाक चैनल का दावा- मोदी और अजीत डोवाल ने कराया ओम पुरी का कत्ल, अब सलमान खान और फवाद खान की बारीसरकार को अविलम्ब इस समाचार का विरोध करे और स्पष्टीकरण जरी करे
बॉलीवुड कलाकार ओम पुरी की मौत को लेकर कई तरह के सवाल उठाए गए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ओम पुरी की गर्दन पर कुछ चोट के निशान देखे गए थे। इसके बाद पुलिस ने इस संबंध में मामला भी दर्ज कर लिया है। वहीं इंटरनेट पर एक पाकिस्तानी चैनल के एक शो का वीडियो शेयर किया जा रहा है। इस शो के दौरान बताया गया कि पीएम मोदी और अजीत डोवाल ने ओमपुरी का कत्ल करवाया है। यह शो बोल टीवी पर प्रसारित किया गया है।
करीब आधे घंटे के इस वीडियो में एंकर बता रहा है, ‘अजीत डोवाल ने अपने खास लोगों के साथ मिलकर ओम पुरी के कत्ल का प्लान बनाया है। राजेश और एक अन्य व्यक्ति ने शंकुतला नाम की एक महिला के घर पर यह प्लान बनाया। इसके लिए शिवसेना और आरएसएस का साथ भी मिला था। ओमपुरी की मौत से एक हफ्ते पहले दिल्ली में अजीत डोवाल ने ओमपुरी को बुलाया था। उसके बाद उन्हें वहां पर मां की गालियां दी गई और उन्हें नंगा किया गया। और कहा गया था कि तुम्हें शहीद नितिन यादव के गांव जाकर, अपने आंसू बहाने होंगे। क्योंकि आपने शहीदों के खिलाफ बयान देकर उनकी बेइज्जती की है। तुम एक बहुत बड़े एक्टर हो। तुम अच्छे से आंसू बहा सकते हो। वहां पर शहीद के परिवार से माफी मांगनी होगी। तुम्हें जिंदा रहने का कोई हक नहीं है। अगर तुम चाहते हो कि तुम्हारी मौत सुकून से हो तो तुम्हें वहां जाना होगा। उसके बाद कोई फैसला लिया जाएगा।
साथ ही एंकर ने बताया, ‘डोवाल की उस धमकी के बाद ओमपुरी नितिन यादव के घर गए। वहां उनके साथ दो लोग भेजे गए। साथ ही वहां स्थानीय थाने में रॉ लोग उन पर नजर रखे हुए थे। उसके बाद डोवाल ने ओमपुरी को कहा था कि हमारी कोशिश होगी कि आपकी मौत सुकून से हो।’
 ओमपुरी के कत्ल के बारे में एंकर ने बताया, ‘पहले उन्हें जबरन शराब पिलाई गई। उनका मुंह खोलकर जबरन उन्हें शराब पिलाई गई। उसके बाद जब वे मदहोश हो गए तो तकिया से दबाकर उनका कत्ल कर दिया गया। उनके नाखूनों में किसी की खाल भी मिली है। वह खाल कत्ल करने वाले एजेंट की है।’
एंकर ने साथ ही बताया कि डोभाल ने ओमपुरी का कत्ल मोदी के कहने पर करवाया है। इसके साथ ही अब सलमान खान, माहिरा खान और फवाद खान का भी कत्ल करने का प्लान दिल्ली में बनाया गया है। एंकर ने बताया कि माहिरा खान को रईस की पार्टी में बुलाया जाएगा और वहां पर भीड़ के तौर पर उन पर हमला किया जाएगा।
इस वीडियो को यूट्यूब पर अभी तक दो लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैँ। इसके बाद ही सोशल मीडिया पर भी काफी शेयर किया जा रहा है। बता दें, ओमपुरी का शव शुक्रवार सुबह उनके घर पर मिला था।
सुमन
लोकसंघर्ष

शनिवार, 24 सितंबर 2016

गणवेश धारी राफेल उडा रहे हैं

उरी की घटना के बाद  गणवेश  धारी राफेल विमान
पाकिस्तान के आकाश  में उडा रहे हैं  उनको यह जानकारी  नहीं है  कि आठ हजार करोड़ रुपये  देने के बाद लगभग  तीन साल  बाद फांस  फाइटर  विमान की  सप्लाई  देगा  कतर  और मिश्र के बाद  भारत  का  नम्बर  आता है  भारत की वायुसेना  को 136 राफेल  विमानों की आवश्यकता थी  किन्तु  मोदी  सरकार ने 36 विमानों का सौदा प्रति विमान 1700करोड  में किया है जबकि  कांग्रेस  सरकार 715करोड में खरीद  रही थी तब  भाजपा इसका  विरोध कर रही थी 237 गुना अधिक की मत  दी जा रही है                                               
वैसे अब तक इस विमान के ग्राहक 80 से ज़्यादा देश रहे है और लगभग सभी देशों ने इसे खरीदना वर्षों पहले ही बंद कर दिया है । कई देशों ने इसे ब्लैकलिस्टेड किया हुआ है और कुछ देशों ने तो इसे "expensive garbage" यानि महँगा भंगार तक कह दिया है ।
राफेल विमान बनाने वाली कंपनी dassault aviation ने एशिया में अपने व्यापार के लिए जिस कंपनी को अपना पार्टनर बनाया है वो एक कंपनी भारतीय है । और ये वही कम्पनी है जिसे मोदी सरकार ने डिफेन्स में 100% तक FDI को मंज़ूरी देने के बाद भारत सरकार के लिए लाइज़निंग का ज़िम्मा सौंपा है । ये कंपनी है मुकेश अंबानी की "रिलायंस"                                               
मोदी की मेक इन  इंडिया  के नारे का भी कोई मतलब नहीं  रह गया है और  108विमानो का निर्माण  एच  ए एल  बंगलुरु में  होना था  वह इस  समझौते  में  नहीं है  59000 करोड़ रुपये खर्च कर राफेल  लेना  बुद्धि मानी  नहीं  है लेकिन  अंबानी के प्रधान  सेवक  को  लाभ  पहुंचाने का काम उन्हें करना है
उरी के बहाने  अंबानी को  लाभ देकर  देश को  नुकसान पहुंचाने  के  कार्य  को नई देश भक्ति  परिभाषा मानना होगा  प्राधोगिकी हस्तांतरण  न होना  भी घाटे का सौदा है   खुफिया एजेंसियों का फेल होना और सुरक्षा बलों की चूक को नजरअंदाज करना भी  उचित नहीं है इनकी जिम्मेदारी  को तय  करके  दंडित करना  भी  आवश्यक है   पाकिस्तान  पाकिस्तान  चिल्लाने  से  कोई  अर्थ नहीं  निकलता है    संघी  अफवाह  तो उडा  सकता है  दंगा  करा  सकता है किन्तु  देश  हित की बात  सोच  नहीं  सकता है        
 सुमन    

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

भगवा आतंकवादियों की गिरफ्तारी

चुनाव से पहले यूपी को दहलाने की साजिश पुलिस ने गुरुवार को नाकाम कर दी। जन्माष्टमी पर देश को दहलाने की साजिश को यूपी एटीएस और कानपुर क्राइम ब्रांच ने नाकाम कर दिया। एटीएस और कानपुर की क्राइम ब्रांच ने गुरुवार को कानपुर से एक ट्रक विस्फोटक के साथ चार लोगों को गिरफ्तार कर लिया।एटीएस ने ट्रक से 30 हजार डेटोनेटर, 20 हजार जिलेटीन और छह कुन्तल अमोनियम नाइट्रेट बरामद किया है। गिरफ्तार किए गए आरोपियों से पुलिस पूछताछ कर रही है। आरोपियों में अंबेडकरनगर का निर्भय मिश्रा, विक्रांत कुमार सिंह पप्पू, ओम नारायण राय और बिहार के सासाराम जिले का पंकज कुमार सिंह शामिल हैं।
  इसके पूर्व  भी डेटोनेटर, जिलेटिन राॅड और अमोनियम नाइट्रेट जैसे विस्फोटक अभी छह जुलाई को कानपुर से एटीएस ने बरामद की थी। यह विस्फोटक कानपुर के जाजमऊ इलाके से लावारिस सेंट्रो गाड़ी में मिली थी। गाड़ी बनारस से चोरी करके लाई गई थी। इसमें एक हजार डेटोनेटर बरामद हुआ था। मामले में चकेरी थाने में रिपोर्ट दर्ज कर शहर पुलिस, क्राइम ब्रांच और यूपी एटीएस अभी जांच ही कर रही थी कि फिर बड़े पैमाने पर विस्फोटक बरामद हो गया। यूपी एटीएस के आर्ईजी असीम अरूण ने इस बात की पुष्टि की। उन्हाेंने बताया कि फिलहाल पकड़े गए युवकाें से पूछताछ की जा रही है। ये किस मकसद से इतनी भारी मात्रा में विस्फोटक ले जा रहे थे इसका भी पता किया जा रहा है।

    चुनाव  जैसे जैसे नजदीक आ रहा है  भगवा तत्व प्रदेश  का माहौल  ख़राब करने के लिए  तरह तरह के हाथ कंडे अपना रहे है  उनकी कोशिश है की किसी तरह    धार्मिक उन्माद   बढ़े और उनका फायदा हो .
सुमन
लो क सं घ र्ष !

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

आतंक के कैंसर में जकड़ी दुनिया

हमारी वर्तमान दुनिया की एक बड़ी त्रासदी यह है कि भारी संख्या में मासूम लोग आतंकवाद की भेंट चढ़ रहे हैं। आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए सुरक्षा आदि के उपायों पर जो भारी खर्च हो रहा हैए वह भी पूरी तरह से अनुत्पादक है। इससे भी बड़ी मुसीबत यह है कि आतंकवाद को धर्म से जोड़ दिया गया है। लगभग दो सप्ताह पहले ;जुलाई 2016,अमरीका के ओरलैंडो स्थित पल्स क्लब में 49 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस भयावह घटना की दो व्याख्याएं की जा रही हैं.पहला, यह जिहादी आतंकवाद है और दूसरा, यह एक ऐसे व्यक्ति की करतूत है जो समलैंगिकों से घृणा करता था। एक टिप्पणीकार ने लिखाए 'ऐसा लगता है कि वह इस्लामिक कट्टरतावाद और समलैंगिकों के प्रति घृणा दोनों से प्रेरित था' 'आतंकवाद या समलैंगिकों से घृणा उत्तर है 'दोनों।
एक अन्य घटना में आईएस द्वारा बगदाद में किए गए एक बम धमाके में 119 लोग मारे गए। गत एक जुलाई को बांग्लादेश में 28 लोगों की हत्या कर दी गई। जिन लोगों ने अपनी जानें गंवाई, उन्हें विदेशी बताया जा रहा है। कुछ रपटों के  अनुसार, आतंकवादी हमलावर आईएस से नहीं बल्कि जमात.उल.मुजाहिदीन से जुड़े हुए थे। एक टिप्पणीकार का कहना है कि इन दिनों आईएस और अलकायदा में भारतीय उपमहाद्वीप में अपने खूनी पंजे फैलाने की प्रतियोगिता चल रही है। बांग्लादेश में इस्लामिक अतिवाद की जड़ें जमायत.ए.इस्लामी और उसकी कट्टरवादी विद्यार्थी शाखा इस्लामी छात्र शिबिर में हैं।
इन सारी विद्धवंसात्मक गतिविधियों में क्या समानता है? सतही तौर पर देखने से ऐसा लग सकता है कि ये सब इस्लामवादी आतंकवाद से जुड़ी हुई हैं। इस्लामवादी आतंकवाद शब्द 9/11 की त्रासदी के बाद से प्रचलन में आया है परंतु यदि हम थोड़ी गहराई से पड़ताल करेंगे तो हमें इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में कई अन्य कारक भी नज़र आएंगे। ओरलैंडों की घटना का संबंध अमरीका की गन संस्कृति से है। इस घटना के बाद अमरीकी कानून निर्माताओं को भी यह लगने लगा है कि आग्नेय अस्त्र रखने संबंधी कानूनों में परिवर्तन किया जाना चाहिए। ओरलैंडों की घटना भयावह थी परंतु इससे मिलती.जुलती छोटी.मोटी घटनाएं अमरीका में होती रहती हैं और उनका इस्लामिक आतंकवाद से कोई संबंध नहीं होता। हां, बगदाद के आतंकी हमले का संबंध निश्चित तौर पर इस्लामिक स्टेट से था।
जहां तक बांग्लादेश में हो रहे आतंकी हमलों का प्रश्न हैए ऐसा प्रतीत होता है कि वे बांग्लादेश की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय कट्टरवादी तत्वों की करतूते हैं। वहां लंबे समय से हत्याओं और आतंकी हमलों का दौर चल रहा है। कई प्रगतिशील.धर्मनिरपेक्ष व उदारवादी ब्लॉग लेखकों और हिन्दुओं की हत्याएं हो चुकी हैं। बांग्लादेश में हो रही आतंकी घटनाओं का संबंध किसी बाहरी संगठन से नहीं है बल्कि वे वहां के राज्य और समाज की राजनीति में बढ़ती कट्टरता को नियंत्रित करने में असफलता का परिणाम है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत.तीनों में कट्टरता और सांप्रदायिकता बढ़ रही है और इससे अतिवाद को प्रोत्साहन मिल रहा है।
पाकिस्तान में ज़िया.उल.हक के शासनकाल में इस्लामिक कट्टरवाद को आधिकारिक मान्यता मिली। अपनी तानाशाही स्थापित करने के लिए ज़िया.उल.हक ने सामंती ताकतों और मुल्लाओं के साथ गठजोड़ किया और मौलाना मौदूदी ;देवबंदी इस्लाम, के सिद्धांतों को प्रोत्साहन दिया। इस प्रक्रिया को पाकिस्तान का इस्लामीकरण कहा जाता है। इस इस्लामीकरण के केंद्र में था सामाजिक व्यवहार और नियमों को शरिया की मौलाना मौदूदी की व्याख्या के अनुरूप गढ़ने की कोशिश। वहां सामंती.दकियानूसी सोच को बढ़ावा दिया गया और महिलाओं व नागरिक स्वतंत्रताओं का दमन किया गया। भारत में धर्म के नाम पर राजनीति, सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा के रूप में सामने आई, जिनके शिकार धार्मिक अल्पसंख्यक बने। इसी विचारधारा का एक दूसरा पहलू है हिन्दुत्वादी संगठन, जो मालेगांवए मक्का मस्ज़िद ;हैदराबाद, अजमेर और समझौता एक्सप्रेस धमाकों के लिए ज़िम्मेदार बताए जाते हैं। सांप्रदायिक.कट्टरवादी विचारधारा का लक्ष्य है शरिया या अतीत की महान परंपराओं के नाम पर देश पर पूर्व.आधुनिक, सामंती मूल्य लादना, जो जाति,वर्ग व लिंग के आधार पर भेदभाव को मान्यता देते हैं।
जहां तक अलकायदा और आईएस के आतंकवाद का सवाल हैए उसकी जड़ें कच्चे तेल के संसाधनों पर कब्ज़ा ज़माने की राजनीति में हैं और इसमें अमरीका की नीतियों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। अमरीका ने पाकिस्तान में ऐसे मदरसों की  स्थापना करवाई जिनमें विद्यार्थियों के दिमाग में कट्टरवादी वहाबी इस्लाम के मूल्यों को ठूंस.ठूंस कर भरा गया। इन मदरसों में विद्यार्थियों को सिखाया गया कि काफिरों को मारना ही जिहाद है। इस तरह के संगठन यह मानते हैं कि उनसे असहमति रखने वालों को जिन्दा रहने का हक नहीं है। उन्होंने साम्यवाद का विरोध किया, अफगानिस्तान पर सोवियत कब्ज़े के खिलाफ संघर्ष किया और अब वे काफिरों की हत्या को अपना धर्म मानते हैं। पाकिस्तान के इस्लामीकरण की जो प्रक्रिया ज़िया.उल.हक के शासनकाल में शुरू हुई थी, उसे अलकायदा और उसके साथी संगठनों ने जारी रखा। अलकायदा ने आईएस की विचारधारात्मक नींव का निर्माण किया। हिलेरी क्लिन्टन ने इस सब में अमरीका की भूमिका की अत्यंत सारगर्भित व्याख्या की है। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि अमरीका, कई तरीकों से आतंकवादी समूहों का समर्थन करता आ रहा है।
वर्तमान समय में दो प्रकार के आतंकवाद हमारी दुनिया को खौफज़दा किए हुए हैं। एक का उद्देश्य है
पूर्व.आधुनिक मूल्यों की पुनर्स्थापना। इनमें शामिल हैं पाकिस्तान व बांग्लादेश ;मौलाना मौदूदी, भारत ;हिन्दुत्व और म्यांमार व श्रीलंका। म्यांमार और श्रीलंका में बौद्ध धर्म की एक विशिष्ट व्याख्या का इस्तेमाल,हिंसा को उचित ठहराने के लिए किया जा रहा है। दूसरे प्रकार का आतंकवाद वह है जिसे तेल के संसाधनों पर कब्ज़ा करने की वैश्विक राजनीति से समर्थन और सहयोग मिल रहा है। यह त्रासद है कि दोनों ही प्रकार के आतंकवादए धर्म, विशेषकर इस्लाम, के नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे धर्म के आधार पर अपनी कुत्सित हरकतों को उचित बताते हैं।
हर धर्म में कई धाराएं होती हैं। जैसे इस्लाम में जहां एक ओर उदारवादी व समावेशी सूफी परंपरा है, तो दूसरी ओर वहाबी कट्टरता भी है। उसी तरह हिन्दू धर्म में भक्ति परंपरा है, तो ब्राह्मणवाद भी है। अमरीका ने पश्चिम एशिया में अपने राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए इस्लाम के वहाबी संस्करण का इस्तेमाल किया। ज़िया ने अपनी तानाशाही स्थापित करने के लिए मौदूदी का सहारा लिया। हिन्दू राष्ट्रवाद.हिन्दुत्व ने अपने राजनीतिक एजेंडों की पूर्ति के लिए नव.ब्राह्मणवाद को अपना हथियार बनाया। विभिन्न धर्मों की अलग.अलग धाराओं के अस्तित्व में बने रहने से कोई खास समस्या नहीं होती। समस्या तब होती है जब राजनैतिक शक्तियां अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए इनमें से एक या अधिक धाराओं का इस्तेमाल करना शुरू कर देती हैं। इस तथ्य को यदि हम समझ लेंगे तो हम आतंकवाद से सफलतापूर्वक मुकाबला करने की ओर एक कदम बढ़ा लेंगे। हमें यह समझना होगा कि आतंकवाद,दरअसलए धर्म का केवल लबादा ओढ़े हुए है। उसके असली उद्देश्य राजनैतिक हैं। 
  -राम पुनियानी

सोमवार, 17 अगस्त 2015

आचार्य धर्मेंद्र ने स्वतंत्रता दिवस को काला दिवस बताया

स्वतंत्रता दिवस पर चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में संगोष्ठी विवाद में विहिप के वरिष्ठ सदस्य  आचार्य धर्मेंद्र ने स्वतंत्रता दिवस को काला दिवस बताया  .बृहस्पति भवन में "बलिदानों की अपूर्व गाथा" विषय पर आयोजित संगोष्ठी में  आचार्य धर्मेंद्र विशिष्ट अतिथि के तौर  थे। 
आचार्य धर्मेंद्र ने क्रांतिवीरों के योगदान पर बोलने से पहले स्वतंत्रता दिवस को काला दिवस बताकर सबको चौंका दिया। लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन को बकवास बताते हुए तीखे शब्दों का प्रयोग किया। कहा कि नरेंद्र मोदी सवा सौ करोड़ की बात कर हिदुओं का मनोबल तोड़ता हैं। पाकिस्तान, अनुच्छेद 370, गोहत्या और राम मंदिर पर एक शब्द नहीं बोलता, ऐसा व्यक्ति देश को डुबो देगा। 
आचार्य धर्मेंद्र के जाने के बाद मुख्य अतिथि संगीत सोम ने मंच संभाला। कहा कि धर्मसेवकों को राजनीति से दूर रहते हुए समाज को दिशा देनी चाहिए।लेकिन जब काग्रेस  का शासन  हो तो उसको उखाड़ने का इन धर्म सेवको की मदद ली जाए
 इस तरह से रंगे सियारों  ने अपनी खाले उतरनी शुरू कर दी यह वही लोग है  जो धर्मसेवक का  बिल्ला लगा कर  अंग्रेजो की मुखबिरी किया  करते थे और आज अमरीकी की गुलामी करने के लिए देश को उस दिशा में ले जाना चाहते है 
विहिप आर  आर एस का एक अनुसांगिग संगठन है  इसका भी देश की आज़ादी  की लड़ाई से कोई सम्बन्ध  नही रहा  है हाँ! आज जरुर  इस संगठन  के लोग देश भक्ति - राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र   जारी  करने  का कार्य कर रहे है -अपना प्रणामपत्र  अमरीका व इजरायल   के पास गिरवी रख आए है 

----सुमन
लो क सं घ र्ष !

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

बाल दिवस पर विशेष-नरेन्द्र मोदी बड़े या मोहन भागवत

नरेन्द्र मोदी की जगह अगर भारत के प्रधानमंत्री आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत होते तो नागपुर से सन्देश सरकार को देने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता . अयोध्या में राम मंदिर, संविधान से अनुच्छेद 370 का खात्मा, पूर्ण गौहत्या निषेध के साथ देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने में कोई परेशानी या दिक्कत नहीं होती . नरेन्द्र मोदी बड़े हैं या मोहन भगवत ? 
              नागपुर की प्रयोगशाला से नेहरु और पटेल के सम्बन्ध में तरह-तरह की अफवाहबाज़ कहानियां नेट, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व प्रिंट मीडिया प्रचारित की जा रही हैं जबकि वस्तुस्तिथि इसके विपरीत है संघ अपने जन्मकाल 1925 से लेकर 1947 तक इस देश की आजादी की लड़ाई में उसका का कोई योगदान नहीं रहा है. नेहरु , पटेल इस देश की जंग ए आजादी के नायक रहे हैं और महानायक महात्मा गाँधी थे . संघी भक्त नाथू राम गोडसे ने गाँधी की गोली मारकर हत्या कर दी थी उसका कोई प्रयाश्चित नागपुर न करके केरल के संघी मुखपत्र में नेहरु की हत्या के बाद करता है. आजादी की लड़ाई में भाग न लेकर आज वह सबसे बड़े देश प्रेमी व देश भक्त हैं . इसके विपरीत जो धाराएं आजादी की लड़ाई लड़ रही थी उसमें छोटा व बड़ा बताने का काम संघियों के अलावा किसी के पास नहीं है  आज वह बड़ी बेशर्मी से यह अफवाह फैलाते हैं . अगर देश के प्रधानमंत्री पटेल हुए होते तो देश विकास की नयी उचाईयों पर और आगे बढ़ा होता . यह बात कहकर संघी आजादी की लड़ाई में कोई योगदान न होने के बाद छिपाने की कोशिश करते हैं . संघ प्रशिक्षित कई बड़े नेता ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए मुखबिरी करने का काम करते रहे हैं . 
            पटेल व नेहरु के बीच कोई विवाद नहीं था. यह वह लोग थे जो मानव के बजाए महा मानव थे.
आई बी एन खबर के पंकज श्रीवास्तव के ब्लॉग में नेहरु पटेल का पत्र व्यवहार प्रकाशित हुआ है जो इस प्रकार है-
1 अगस्त 1947 को पंडित नेहरू ने पटेल को लिखा-'कुछ हद तक औपचारिकताएं निभाना जरूरी होने से मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूं। इस पत्र का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं।'
जवाब में पटेल ने 3 अगस्त को नेहरू के पत्र के जवाब में लिखा-'आपके 1 अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद। एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है तथा लगभग 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी। आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी शुद्ध और संपूर्ण वफादारी और निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है। हमारा सम्मिलन और संयोजन अटूट और अखंड है और उसी में हमारी शक्ति निहित है। आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं।
2 अक्टूबर 1950 को इंदौर में एक महिला केंद्र का उद्घाटन करने गये पटेल ने अपने भाषण में कहा-'अब चूंकि महात्मा हमारे बीच नहीं हैं, नेहरू ही हमारे नेता हैं। बापू ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था और इसकी घोषणा भी की थी। अब यह बापू के सिपाहियों का कर्तव्य है कि वे उनके निर्देश का पालन करें और मैं एक गैरवफ़ादार सिपाही नहीं हूं।'
ये सारे पत्र अहमदाबाद के नवजीन प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक 'सरदार पटेल के चुने हुए पत्र (1945-50)' में मौजूद हैं।

सुमन 

रविवार, 27 जुलाई 2014

मोदी युग की पहली कविता -----------

कारगिल -कारगिल ------------के अपराधियों से जोड़ा खाने वाले.
अपराधियों ने नौजवानों को मरवा दिया था
आज वहीअपराधी
शहीद - शहीद चिल्ला रहे है
यानी पहले शहीद कराओ
-फिर फूल चढाओ
फिर अपराधियों से हाथ मिलाओ
फिर ताबूत में कमीशन खाओ
फिर स्मारक बनवाओ
उसमे भी कमीशन खाओ
राष्ट्र प्रेम की अलख जगाओ
फिर चिल्लाओ कश्मीर मांगोगे
तो फिर सीना चीर देगे
संदेश भेजोगे कश्मीर सुंदर
आजाद मुल्क बनाओ
रक्षा क्षेत्र में एफ डी आई
अमरीका की गुलामी
गुजरात में
फट्टा के साथ
हवाला की सलामी
हिन्दू की एकता में
आरक्षण का विरोध
धर्म के नाम पर
धार्मिक गुलामी
सहारनपुर में सद्भाव
काठ में दंगा
लखनऊ में चेलो से
हुरदंगा
वोट के लिए सब चंगा
गाजा की ख़ुशी
यू. एन में दुखी
बर्लिन में
सेतुवा
जिनपिंग से
हलुवा
जरूरत है
तो बाप
नही है तो
देगे श्राप
यही इनका
राष्ट्र प्रेम
राष्ट्रप्रेमी है
बाकी सभी देश
द्रोही है
खुद का बाप
गाँधी नही
हिटलर है
संसद में
गाँधी
बाहर गोडसे की
आंधी
आजादी युद्ध में
अंग्रेज भक्त
आज बड़े
स्वतंत्रता सेनानी
कायरो की ज़मात
देश रक्षक
है यही
नोट -सभी संघी मित्रो से अनुरोध है कि कविता में कामा फुल स्टॉप सही करने का कष्ट करे
सादर

उन्ही का कापीराइट युक्त
सुमन

लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

गुजरात पुलिस - देश का गौरव

मोदी ने कहा था कि गुजरात की पुलिस- देश का गौरव है किन्तु उच्चतम न्यायलय द्वारा आतंकी मामलों ने आ रहे निर्णयों से यह साबित हो रहा है कि गुजरात पुलिस पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर एक संप्रदाय विशेष के लोगों को विभिन्न आतंकी घटनाओ में फंसा दिया था . जिसमें कथित आतंकियों को दस दस साल से अधिक समय से कारागार में बिताने पड़े और उनकी छवि खराब हुई , जीवन नष्ट हुआ . 
17 जुलाई 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में, 'दोहरे बम विस्फोटों' सूरत बम विस्फोट में कथित संलिप्तता के लिए अक्टूबर 2008 में एक टाडा अदालत ने दोषी करार दिया और सजा सुनाई थी, उन सभी ग्यारह व्यक्तियों को बरी कर दिया गया है 1993 के विस्फोटों में सभी अभियुक्त जेल गए थे  उन सभी लोगों को उच्चतम न्यायलय ने बरी कर दिया है.
 कांग्रेस के पूर्व मंत्री मोहम्मद सुरती सहित ग्यारह व्यक्तियों, सुप्रीम कोर्ट ने निर्दोष पाया और बरी कर दिया यहां तक ​​कि  हथियारों की बरामदगी संतोषजनक ढंग से व ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य से साबित नहीं किया . इस तरह की स्थिति में सजा नहीं दी जा सकती है.
 सुप्रीम कोर्ट ने 2002 अक्षरधाम आतंकी मामले में गुजरात पुलिस निर्णय पारित किया है. अक्षरधाम में जांच डीजी वंजारा और जीएल सिंघल के (नकली) मुठभेड़ विशेषज्ञ टीम द्वारा आयोजित किया गया. बरी करते हुए 16 मई 2014, पर सभी छह अक्षरधाम मामले में मौत की सजा सुनाई थी, जो तीन सहित आरोपी, सुप्रीम कोर्ट ने यह अक्षरधाम मामले की जांच का आयोजन किया जिसके साथ अक्षमता के लिए गुजरात पुलिस की खिंचाई की. न्यायमूर्ति ए.के. की बेंच पटनायक और जस्टिस वी गोपाल गौड़ा ने कहा कि 
सही जांच स्तर से पोटा, विशेष न्यायालय (पोटा) और पुष्टि द्वारा आरोपियों को सजा और सजा देने के तहत आरोपियों पर मुकदमा चलाने के लिए राज्य सरकार द्वारा मंजूरी देने के लिए, विभिन्न चरणों में इस मामले के विचारण में प्रतिकूलता उच्च न्यायालय द्वारा एक ही की.  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सबका मौलिक अधिकार है और इस देश के नागरिकों के बुनियादी मानवाधिकारों के ऐसे घोर उल्लंघन हमारे सामने प्रस्तुत किया गया. हम हाथ जोड़कर बैठने के लिए पैसा नहीं दे सकते.
राष्ट्र की अखंडता और सुरक्षा से जुड़े इस तरह के एक गंभीर प्रकृति के मामले की इसके बजाय इतने सारे कीमती जान लेने के लिए जिम्मेदार वास्तविक अपराधियों को जेल भेजने की जगह पुलिस ने  निर्दोष लोगों को पकड़ लिया और उनको गंभीर आरोपों में निरुद्ध किया और बाद में सजा कराई .
सूरत में बरी किए जाने के मामले विस्फोटों और अक्षरधाम मामलों गुजरात पुलिस वर्षों में फंसाने के लिए निर्दोष लोगों को टाडा और पोटा जैसे तथाकथित 'आतंक कानूनों' के साथ दुर्व्यवहार किया गया है कि कैसे दिखा. कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के 2002 में पोटा के लागू होने का विरोध किया था और भाजपा राजग सरकार पारित कानून लाने के लिए संसद के संयुक्त सत्र आयोजित करने के लिए मजबूर किया गया था का नेतृत्व किया. यह इसके पहले पोटा के रूप में बुरा था, जो टाडा, अधिनियमित किया था यह भी याद रहे कि कांग्रेस टाडा का विरोध किया था, हालांकि सभी लोकतांत्रिक ताकतों ने इन काले कानून और अलोकतांत्रिक कानून को लागू होने से रोकने के लिए कांग्रेस के प्रयासों की सराहना की थी. "आतंकवाद" "कानून" से नहीं रोका जा सकता है क्योंकि टाडा और पोटा जैसे कठोर कानून भी दुरुपयोग किया जा सकता है! टाडा के दुरुपयोग से हजारों निर्दोष व्यक्तियों, श्रमिकों के हजारों किसानों को जेल जाना पड़ा था और 1989 में भाजपा ने भी टाडा को समाप्त करने के अभियान का नेतृत्व किया था. 
लेकिन सत्ता में आने के बाद,  भाजपा राजग पोटा अधिनियमित और गुजरात में निर्दोष सैकड़ों मुसलमानों के खिलाफ इसका इस्तेमाल किया और दो ​​समुदायों विभाजित किया.  झारखंड, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, गरीब आदिवासियों की तरह अन्य राज्यों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और पोटा के तहत गिरफ्तार किया गया यहाँ तक उनको भी गिरफ्तार किया गया जो सत्तारूढ़ दल का हिस्सा थे जैसे वाइको ,यह इसलिए पोटा का विरोध और लोकतंत्र का लबादा पहनने के लिए कांग्रेस ने अपना रुख बदला 
यह कि टाडा और पोटा दोनों  निरस्त कर दिया गया है  यह की कई निर्दोष लोगों को अभी भी देश भर की जेलों में सड़ना पड़ रहा है. क्यों है.

सुमन 
लो क सं घ र्ष !

नोट  http://www.truthofgujarat.com/supreme-court-exposes-gujarat-polices-blatant-abuse-terror-laws-like-pota-tada/#more-4848 
का संक्षिप्त अनुवाद गूगल की मदद से किया गया है .

रविवार, 20 जुलाई 2014

पिछले जन्म के पाप पीछा नही छोड़ रहे है


पिछले जन्म  के पाप प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी का पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। गुजरात में हिन्दू , मुस्लिम आर्थिक अपराधियों का समूह सदैव उनकी सरकार का समर्थन करता रहा है क्यूंकि उसके द्वारा किये जा रहे अपराधों को संरक्षण राज्य सरकार का मिलता रहा है।  तुलसी, सोहराबुद्दीन एनकाउंटर का राज हिन्दू- मुस्लिम एकता नहीं थी बल्कि मोदी सरकार की तरफ से वसूली अभियान के हिसाब किताब में बेईमानी करने की सजा दी गयी थी  
नव भारत टाइम्स के अनुसार गुजरात में हवाला के जरिए 5 हजार 395 करोड़ रुपये के लेन-देन का पता लगाया है और इस मामले में 79 आरोपियों के खिलाफ आरोप-पत्र जारी किए गए हैं। अधिकारियों ने इसे देश का सबसे बड़ा हवाला घोटाला करार दिया है जांच अधिकारियों के मुताबिक राज्य में हवाला के जरिए सोना और प्रॉपर्टी के लेन-देन का धंधा किया जा रहा था। इस काम के लिए पिछले साल दिसंबर और इस साल जनवरी, फरवरी में सूरत में आईसीआईसीआई बैंक के दो ब्रांच का इस्तेमाल किया गया।
अहमदाबाद में ईडी के अधिकारियों ने बताया कि इस मामले की जांच आईसीआईसीआई बैंक द्वारा सूरत में दर्ज कराई गई एफआईआर के बाद शुरू हुई।
इस मामले में शुक्रवार को 79 आरोपियों के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल किए गए हैं। मामले के तीन मुख्य आरोपियों में से 2 को गिरफ्तार कर लिया गया है और एक अभी भी फरार है।
इनमें से अफरोज हसन फट्टा को दो महीने पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था और मदन जैन को गुरुवार को गिरफ्तार किया गया। एक अन्य मुख्य आरोपी बिलाल हारून गिलानी अभी फरार है।
आपको बता दें कि अफरोज फट्टा हीरा कारोबारी हैं और पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी के साथ उनकी फोटो आने के बाद काफी विवाद हुआ था।
कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी पर सूरत के हवाला कारोबारी अफरोज फट्टा से करीबी रिश्ते होने का आरोप लगाया था। कांग्रेस ने मोदी के विकास यात्रा के दौरान मंच पर अफरोज के साथ मोदी एक की तस्वीर भी रिलीज की थी। इससे पहले मार्च में ईडी(एनफोर्समेंट डायरेक्टॉरेट) ने सूरत में अफरोज के घर पर छापा मारकर 700 करोड़ रुपए जब्त किए थे। 
राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ का हिन्दुवत्व वादी चेहरा यही है।  इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है।  अगर देश के अन्दर आर्थिक अपराधियों को समूल रूप से नष्ट कर दिया जाए तो हिन्दुवत्व की प्रयोगशाला अपने आप नष्ट हो जाएगी।
-सुमन 

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

दादा गजेन्द्र सिंह समाज के हर वर्ग के प्रेरणा दायक


  बाराबंकी। पूर्व विधायक, समाज सुधारक स्व0 गजेन्द्र सिंह की प्रथम पुण्य तिथि के अवसर पर पूर्व अध्यक्ष जिला बार एसोसिएशन बृजेश दीक्षित की अध्यक्षता में गांधी भवन देवां रोड पर एक स्मृति सभा का आयोजन किया गया।
    कार्यक्रम का प्रारम्भ महन्त गुरूशरण दास ने स्व0 गजेन्द्र सिंह के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धासुमन पेश करते हुए किया।
    इस अवसर पर अपने संबोधन में बृजेश दीक्षित ने कहा कि दादा गजेन्द्र सिंह समाज के हर वर्ग के प्रेरणा दायक थे। उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि उनके विचारों का अनुसरण करने में ही है।
    गांधी वादी विचारक एवं गांधी समारोह ट्रस्ट के अध्यक्ष प0 राजनाथ शर्मा ने पूर्व विधायक को अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कहा कि उनका जीवन एक सच्चे एवं निर्भीक इंसान के जीवन की अभिव्यक्ति थी और गांधी समारोह ट्रस्ट के वह संस्थापक सदस्य थे और उन्हीं की प्रेरणा से ट्रस्ट द्वारा अनेको कार्यक्रम सम्पन्न कराए गए।

    वरिष्ठ पत्रकार हशमतउल्ला ने पूर्व विधायक के जीवन व उनके कार्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वह बहुआयामी व्यक्तित्व के मालिक थे। एक ओर जहां वह एक निर्भीक व बेबाक राजनेता थे तो वहीं उर्दू व हिन्दी साहित्य के प्रेमी थे, उन्हें यदि रामायण की चौपाइयों , गीत, श्लोक व प्रमुख कवियों की कविताएं कठस्थ थी तो वहीं उर्दू के ऐसे नायाब अशआर याद थे जो किसी ने कभी सुने भी न हों।
    फखरूद्दीन अली अहमद कमेटी के पूर्व चेयरमैन निहाल रिजवी ने दादा गजेन्द्र सिंह के साथ बिताए गए अपने समय का स्मरण करते हुए कहा कि जिले में राजनीति की युवा पीढ़ी को तैयार करने में दादा की अहम भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि वह एक निर्भीक राजनेता थे और आम आदमी के सरोकारो के पैरोकार थे।
    जिला उपभोक्ता फोरम के पूर्व सदस्य हुमायू नईम खां ने दादा गजेन्द्र सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि वह अपने आदर्शों से कभी समझौता न करने वाले इंसान थे और सामाजिक समस्याओं के प्रति उनकी संवेदनाओं ने सदैव उन्हें आम इंसानों के करीब रखा।
    वरिष्ठ प्रवक्ता जवाहर लाल नेहरू परास्नातक महाविद्यालय डा. राजेश मल्ल ने अपने संबोधन में कहा कि दादा गजेन्द्र सिंह ने राजनीति में अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के प्रवेश पर वह सदैव चिन्तित रहे और इसका विरोध करने के दृष्टिकोण से ही वह काफी समय तक एक राज्यमंत्री द्वारा राष्ट्रीय ध्वजारोहण किए जाने के खिलाफ अपनी आवाज बुलन्द करते हुए अपनी गिरफ्तारी देते रहे।
    इस अवसर पर पवन कुमार वैश्य, बृजमोहन वर्मा, डा. उमेश चन्द्र वर्मा, डा. एस.एम. हैदर, प्राचार्य रामस्वरूप यादव, पूर्व विधायक शिवकरन सिंह, हरिशरण दास, राकेश कुमार सिंह, दिलीप गुप्ता एडवोकेट, उपेन्द्र सिंह, श्रीमती नीरज सिंह, अजय सिंह, प्रशान्त मिश्र, सुरेन्द्र नाथ मिश्र, हरि गुप्ता, राजेन्द्र बहादुर सिंह, पुष्पेन्द्र कुमार सिंह, सलाम मोहम्मद, विजय प्रताप सिंह, आनंद सिंह, अरविन्द वर्मा, गनेश सिंह, धीरेन्द्र सिंह, राजेश्वर दयाल बाजपेयी, मेराज अहमद ने भी अपने विचार रखते हुए दिवंगत राजनेता  को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
    कार्यक्रम के अंत में रणधीर सिंह सुमन ने आए हुए सभी आगुन्तकों के प्रति अपना आभार व्यक्त किया।



रणधीर सिंह सुमन
एडवोकेट
जिला-बाराबंकी

रविवार, 13 अक्टूबर 2013

ज्यादा खतरनाक कौन ?

यहाँ पर दो समाचार दिए जा रहे हैं सोचना आपको है कि ज्यादा खतरनाक कौन है ? मध्यप्रदेश के दतिया जिले के रतनगढ़ माता मंदिर में भगदड़ मचने से मरने वालों की तादाद बढ़कर100 तक पहुंच गई है। जबकि कई लोग घायल हो गए हैं। चंबल रेंज के डीआईजी दिलीप आर्य के मुताबिक यूपी के कुछ लड़कों ने मंदिर के पास सिंध नदी पर बने पुल पर अफ़वाह फैला दी कि पुल टूट रहा है जिसकी वजह से लोगों ने भागना शुरू कर दिया। इसी दौरान ये हादसा हुआ।

तूफ़ान 'पाइलिन से 20 से अधिक लोगों की मौत हुई है।

सुमन
लो क सं घ र्ष ! 



शनिवार, 1 दिसंबर 2012

मानव खोपड़ी उबाल के पियो

इलाहाबाद के पत्रकार की हत्या के आरोप में राजा कोलंदर उर्फ़ राम निरंजन को आजीवन कारावास की सजा हुई है।साल 2000 में इलाहाबाद में पत्रकार धीरेन्द्र सिंह समेत चौदह लोगों को राजा कोलंदर के फ़ार्म हाउस में बेरहमी से क़त्ल कर उनकी लाश के टुकड़े- टुकड़े कर दिए गए थे. राजा कोलंदर ने काली प्रसाद श्रीवास्तव की हत्या कर उसकी खोपड़ी को उबाल कर पी लिया जिससे वह बुद्धिमान हो जाए। राजा कोलंदर ने काफी लोगों की हत्या कर उनकी खोपड़ी को उबाल कर पिया। मानव रक्त भी वह शौक से पीता  था। नरमुंडो को जाति के अनुसार रंग कर रखता था।
                    राजा कोलंदर की शादी शंकरगढ़ के पत्रकार धीरेन्द्र सिंह के गाँव में हुई थी। उसकी पत्नी का नाम गोमती था वह जिला पंचायत सदस्य भी रही हैं। राजा कोलंदर ने उनका नाम बदलकर फूलन देवी रख दिया  था। उनके बड़े बेटे का नाम जमानत था और छोटे बेटे का नाम अदालत था। बेटी का नाम क्रांती था।
          भारतीय समाज में किवदंतियों, आख्यानो, मिथकों में बे सिर-पैर की बातें आती रहती है। जिससे कम बुद्धि वाले मानव मस्तिष्क पर चमत्कारी असर होता है जिसके फल स्वरूप राजा कोलंदर जैसे मानवों का निर्माण होता है जो तरह-तरह की उलूल जुलूल हरकतें करके मानव जाति को कलंकित करने का काम करती रहती है। विभिन्न धर्मों के आख्यानो में सुपर पावर जैसी संरचना निर्मित होती है और जब वह वास्तविक दुनिया में लोग सुपर पॉवर बनने लगते हैं तो उसका असली चेहरा नरभक्षी के रूप में प्रकट होता है। इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया भी भूत-प्रेत से लेकर ज्योतिष तक काल्पनिक मनोविकारों का प्रचार-प्रसार करते रहते हैं जिसका सीधा असर समाज पर होता है और उससे समाज विकृत भी होता है। देखने में तो यहाँ तक आ रहा है की बगैर मेहनत किये धन-धान्य से परिपूर्ण होने के लिए उँगलियों में दर्जनों अंगूठियाँ लोग पहनने लगे हैं, हीरा, पन्ना, पुखराज, मूँगा आदि पहनने से भाग्य परिवर्तन की आशा में करोडो लोग लगे रहते हैं और अंत में माया मिली न राम।

सुमन
लो क सं घ र्ष ! 

बुधवार, 21 नवंबर 2012

कसाब से आतंकवाद का अंत नही

मुंबई आतंकी घटना में जीवित पकडे गए आमिर अजमल कसाब को आज संवैधानिक व्यवस्था के तहत फांसी दी गयी। इस फांसी के बाद अगर लोगों की यह सोच हो कि आतंकवाद से छुटकारा मिल जायेगा तो यह संभव नहीं है। मुंबई आतंकी घटना की मुख्य सूत्रधार आई एस आई पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी का नाम मुख्य रूप से आया था। आई एस आई को अमेरिकी साम्राज्यवाद का खुला समर्थन प्राप्त है। अफगानिस्तान में सोवियत यूनियन की दखलंदाजी के बाद अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने अथाह रुपया व हथियार, ट्रेनिंग पाकिस्तान के नागरिकों को दिए थे। पूरी दुनिया में इजारेदार कंपनियों की लूट और मुनाफा कमाने की नीति ने राज्य द्वारा प्रायोजित आतंक वाद को जन्म दिया है। कभी परमाणु हथियारों के नाम पर, कभी लोकतंत्र के नाम पर, कभी न्याय और समानता के नाम पर राज्य द्वारा प्रायोजित आतंकवाद दिखाई देता है। मुबई आतंकी घटना में भी राज्यों द्वारा आतंक फ़ैलाने का नमूना मात्र ही था। राज्य इजारेदार कंपनियों द्वारा संचालित हो रहे हैं। दुनिया में कुपोषण, भूख, अशिक्षा जैसे मुद्दों के उन्मूलन में जो रुपया खर्च होना चाहिए। वह रुपया इजारेदार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खजाने में मुनाफे के रूप में जा रहा है। गरीबी बढ़ रही है जिस कोई उपचार राज्य द्वारा नहीं किया जा रहा है। जो भी नीतियाँ या कानून बनाये जा रहे हैं वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों के अनुरूप उनके मुनाफे को बढाने के लिए है। आज विभिन्न देशों की सेना में लड़ने वाले लोग बेरोजगारी के कारण भी उनमें भर्ती होते हैं जिन लोगों को यह अवसर नहीं मिलता है वह भूख और प्यास के कारण  संगठित अपराधी गिरोहों, आतंकी गिरोहों में भर्ती होते हैं। उसके पीछे उनकी मंशा यह होती है कि कुछ दिन जिए लेकिन सुख से जिए।  
                                आज जरूरत इस बात की है कि एक मानवीय व्यवस्था कायम हो। जिसमें हर मानव का सम्पूर्ण विकास हो। भूख और प्यास समाज में न रहे जिससे कसाब या कसाब जैसे बहुत सारे आतंकी पैदा ही न हो सके। यह तभी संभव है जब साम्राज्यवाद जो आतंकवाद का प्रमुख केंद्र है, का खात्मा हो क्यूंकि साम्राज्यवाद के पास कसाब जैसे लाखों भाड़े के टट्टू आतंकी हैं। 

सुमन 

सोमवार, 10 सितंबर 2012

न्यायलय है या पुलिस की एजेंट

अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा पारित आदेशों को देख कर यह लगता है कि उसके पीठासीन अधिकारी न्यायिक मस्तिष्क का प्रयोग नहीं कर रहे हैं अपितु पुलिस विभाग के एजेंट के रूप में कार्य कर रहे हैं। कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी के मामले में जितना दोषी पुलिस है उससे कहीं ज्यादा गैर जिम्मेदारी पूर्ण आदेश पुलिस  कस्टडी रिमांड का है। मुख्य बात यहाँ है की किस आधार पर न्यायलय श्रीमान ने उनको पुलिस कस्टडी रिमांड पर दिया था। कानून क तहत ही यह परिभाषित है की पुलिस कस्टडी रिमांड का उपयोग कभी-कभी विशेष परिस्तिथियों  में ही  है किन्तु न्यायलय में जैसे ही पुलिस प्रार्थनापत्र देती है वैसे ही पुलिस कस्टडी रिमांड स्वीकृत हो जाता है आखिर में इस मामले में पुलिस को इनकार करना पड़ा है की उसे पुलिस  कस्टडी रिमांड नहीं चाहिए। न्याय का यह सिद्धांत है की गुनाहगार से उसके ही खिलाफ उससे सबूत नहीं मांगे जा सकते हैं। भारतीय पुलिस का चरित्र चेखेव के नाटक " गिरगिट " की तरह है वह बार-बार रंग बदलती है और न्यायलय उसके हर रंग को स्वीकार करने के आदि हो गए हैं। प्रथम रिमांड क प्रस्तुत होते ही न्यायलय श्रीमान को देखना चाहिए था की उक्त धाराएं अभियुक्त के ऊपर आयत होती हैं या नहीं और प्रथम दृष्टया मामले को देखने के बाद न तो पुलिस  कस्टडी रिमांड देना चाहिए और न ही न्यायिक अभिरक्षा में भेजे जाने का आदेश पारित करना चाहिए। भारतीय कानून को जब कोई न्यायलय तख्ते लन्दन से जोड़कर देखता है तो उसके निर्णय सही नहीं हो सकते हैं और जब कानून को भारतीय संविधान और विधि के मूल सिद्धांतों से जोड़कर देखा जाता है तो निर्णय अवश्य सही होंगे। अब पीठासीन अफसर किस चश्मे से देख रहा है उसी से उसके निर्णय होते हैं। 
 वहीँ, महाराष्ट्र के गृह मंत्री आरआर पाटिल ने मुंबई में कहा कि पुलिस को कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को हिरासत में लेने का कोई आधार नहीं था. पाटिल ने सोमवार 10 सितंबर को मुंबई में कहा कि इस मामले में पुलिस अपनी जांच का काम पूरा कर चुकी थी. उन्होंने कहा कि वह पूरे मामले को देख रहे हैं और जो कुछ भी उचित होगा उसे अदालत के सामने कहेंगे। तब यह सवाल उठ खड़ा होता है कि पुलिस कस्टडी रिमांड या न्यायिक अभिरक्षा का आदेश पारित करना कहाँ तक औचित्यपूर्ण था। 

सुमन 

शनिवार, 11 अगस्त 2012

समाजवाद में मूल्य का नियम-2


राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था का संतुलित (सानुपातिक) विकास नियम भी इसी दिशा में काम करता है जिसने उत्पादन में प्रतियोगिता और अराजकता को समाप्त कर दिया है।
हमारी वार्षिक और पंचवर्षीय योजनाएँ भी इसी दिशा में काम करती हैं, जिनकी आर्थिक नीतियाँ आमतौर पर राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था के संतुलित विकास नियम की आवश्यकताओं पर आधारित हैं।
सब मिलाकर परिणाम यह है कि हमारे देश में मूल्य नियम परिचालन का प्रभाव क्षेत्र सीमित है और इसलिए हमारी व्यवस्था में मूल्य नियम उत्पादन का नियामक नहीं बन सकता।
सचमुच यही उस ज्वलंत तथ्य की व्याख्या है कि हमारे देश में इसके बावजूद कि समाजवादी उत्पादन का अनवरत तेज विकास अति उत्पादन का संकट पैदा नहीं करता, वहीं पूँजीवादी देशों में जहाँ इसी मूल्य नियम का प्रभाव-क्षेत्र व्यापक है, उत्पादन के धीमा विकास के बावजूद समय-समय पर अति उत्पादन का संकट पैदा करता है।
कहा गया है कि मूल्य नियम एक ऐसा चिर स्थायी कानून है जो ऐतिहासिक विकास की सही अवधि में लागू होता है। यहाँ तक कि कम्युनिस्ट में भी यह बिल्कुल सच नहीं है। मूल्य नियम की तरह मूल्य भी एक ऐतिहासिक श्रेणी है जिसका सम्बंध माल उत्पादन के अस्तित्व के साथ जुड़ा है। माल उत्पादन के विलुप्त होने के साथ ही मूल्य और इसका स्वरूप तथा मूल्य नियम भी विलुप्त हो जाएगा।
समाजवादी समाज के दूसरे चरण में उत्पादित सामानों पर खर्च किए गए श्रम की गणना मोटा मोटी अनुमानित तरीके से इसके मूल्य और परिणाम के आधार पर नहीं किया जाएगा, जैसा माल उत्पादन प्रक्रिया के अंदर होता है, बल्कि उत्पादित सामानों पर सीधे और तुरन्त खर्च किए गए समय के परिमाण और उसके घंटो की संख्या के आधार पर किया जाएगा। चूँकि श्रम विभाजन, उत्पादन की विभिन्न प्रशाखाओं में इसका वितरण मूल्य नियम से विनियमित नहीं होगा क्योंकि जब तक इसका परिचालक बंद हो गया रहेगा, बल्कि यह सामानों के लिए समाज की बढ़ती माँगों से विनियमित होगा। तब समाज की निरंतर बढ़ती आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पादन प्रक्रिया संचालित होगी। यह ऐसा समाज होगा जब उत्पादन का नियमन समाज की आवश्यकताओं द्वारा होगा। इस तरह समाज की आवश्यकताओं का आकलन करना हमारे योजना निकायों के लिए सबसे बड़े महत्व का कार्य हो जाएगा।
यह अवधारणा भी पूर्णतः गलत है कि हमारी वर्तमान आर्थिक व्यवस्था के अंतर्गत साम्यवादी समाज के प्रथम चरण में उत्पादन की विभिन्न प्रशाखाओं में श्रम विभाजन के अनुपात का निर्धारण मूल्य नियम द्वारा होता है।
अगर यह सच होता तो यह समझ पाना कठिन होता कि आखिर हमारे हल्के उद्योंगों, जो काफी लाभदायक हैं, को पूरी तरह क्यों नहीं विकसित किया जा रहा है, जबकि भारी उद्योगों को प्राथमिकता दी जा रही है जो कम लाभ देने वाले हैं और कुछ तो बिल्कुल घाटे पर चल रहे हैं।
अगर यह सच होता तो इसे भी नहीं समझा जा सकता था कि हमारे अनेक भारी उद्योगों संयंत्रों, जो अभी भी लाभदायक नहीं है, और जहाँ मजदूरों के श्रम का समुचित रिटर्न भी नहीं आता है, को बंद क्यों नहीं कर दिया जाता और उसकी जगह हल्का उद्योग संयंत्रों जो निश्चिय यही लाभदायक होते और जहाँ मजदूरों के श्रम का रिटर्न काफी बड़ा आता, क्यों नहीं चालू कर दिया जाता है?
अगर यह सच होता तो इसे भी समझना मुश्किल होता कि ऐसे संयंत्रों से, जो कम लाभदायक हैं (यद्यपि हमारी अर्थ व्यवस्था के लिये आवश्यक हैं) मजदूरों का स्थानांतरण ऐसे संयंत्रों के क्यों नहीं कर दिया जाता जो मूल्य नियम के मुताबिक ज्यादा लाभदायक हैं और जिनके बारे में माना जाता है कि वह (अर्थात मूल्य नियम) उत्पादन की विभिन्न प्रशाखाओं के बीच श्रम विभाजन का अनुपात निर्धारित करता है।
यह स्पष्ट है कि अगर हम इन कामरेडों का नेतृत्व मान लें तो उपभोक्ता सामानों के उत्पादन के पक्ष में उत्पादन के साधनों के उत्पादन की प्राथमिकता देना हमें रोक देना चाहिए। लेकिन इसका क्या परिणाम होगा जब उत्पादन के साधनों के उत्पादन की प्राथमिकता समाप्त कर दी जाएगी? परिणाम होगा राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था के निरंतर विकास की संभावनाओं को बर्बाद कर देना क्योंकि उत्पादन के साधनों के बगैर उत्पादन के राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था का निरंतर विकास एवं विस्तार नहीं किया जा सकता।
ये कामरेड भूल जाते हैं कि मूल्य नियम केवल पूँजीवाद में उत्पादन का नियामक होता है जहाँ उत्पादन साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व, उत्पादन अराजकता और अति उत्पादन का संकट होता है। वे भूलते हैं कि हमारे देश में उत्पादन साधनों पर सामाजिक स्वामित्व और संतुलित राष्ट्रीय विकास नियम दरअसल मूल्य नियम के प्रभाव क्षेत्र को सीमित करते हैं और हमारे वार्षिक एवं पंचवर्षीय योजनाओं के प्रावधान तदनुसार बने हैं भी, मूल्य नियम के प्रभाव को कटाते हैं।
कुछ कामरेड इससे यह नतीजा निकालते हैं कि राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था का संतुलित विकास नियम और अर्थ नियोजन उत्पादन की लाभदायकता को ही अभिशून्य का देते हैं। यह बिल्कुल सच नहीं है। बल्कि बात उल्टी है। अगर लाभदायकता को प्रत्येक प्लांट और प्रत्येक उद्योग के साथ अलग-अलग नहीं देखें, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्रीय विकास को दृष्टि में रखते हुए आगामी दस वर्षों को देखें, जो इस मुद्दे पर सही दृष्टिकोरण होगा, तो तात्कालिक और क्षणिक लाभदायकता का प्रश्न नीचे चला जाएगा। राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था के संतुलित विकास नियम और तदनुसार अर्थ नियोजन ;म्बवदवउपब च्संददपदहद्ध से अपेक्षाकृत ऊँचा विकास सुनिश्चित होता हैं और इस राष्ट्र को नुकसान पहुँचाने वाले सामाजिक आर्थिक संकटों से बचते हैं।
संक्षेप में, निःसंदेह यह कहा जा सकता है कि हमारे समाजवादी उत्पादन की वर्तमान अवस्था में उत्पादन की विभिन्न प्रभाखाओं के बीच श्रम विभाजन का ‘अनुपात-नियामक’ मूल्य का नियम कभी नहीं बन सकता।

क्रमश:
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा हैसमाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थीइस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया थाइस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैंआप के सुझाव विचार सादर आमंत्रित हैं
-सुमन

बुधवार, 8 अगस्त 2012

मजदूर वर्ग उत्पादन साधनों का स्वामी है

यह सही है कि जब वर्तमान के दो बुनियादी उत्पादन क्षेत्रों (राजकीय औद्योगिक पदों और सामूहिक फार्म क्षेत्र) के स्थान पर केवल एक ही समग्र उत्पादन क्षेत्र (One all embracing production sector) होगा, जिसे देश के अंदर समस्त उपभोक्ता सामग्रियों को निबटाने का अधिकार प्राप्त होगा तो मुद्रा के लिए माल का परिचलन लुप्त हो जाएगा क्योंकि वह राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था में अनावश्यक हो जाएगा। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, जब तक दो बुनियादी उत्पादन क्षेत्र बना रहता है, तब तक माल का उत्पादन और माल का चलन निश्चिय ही बन रहेगा। यह हमारी अर्थ व्यवस्था के लिए आवश्यक और बहुत ही उपयोगी तत्व है। इस प्रकार के एक मात्र एकीकृत क्षेत्र का निर्माण कैसे होगा? क्या राजकीय क्षेत्र द्वारा सामूहिक फार्म को हड़प लिए जाने से यह होगा? यह किसी तरह संभव नहीं है, क्योंकि ऐसा करना वास्तविकता के सामूहिक फार्म को लूटना होगा। तब क्या एक ऐसा राष्ट्रीय निकाय के गठन से होगा जिसमें राजकीय उद्योगों और सामूहिक फार्मों के प्रतिनिधि शामिल किए जांच वह देश के सम्पूर्ण उपभोक्ता सामानों का हिसाब रखें और उसका वितरण करें, अर्थात वस्तुओं का विनियम करे? यह एक ऐसा विशेष प्रश्न है, जिस पर अलग से विचारने की जरूरत है।
इस तरह हमारा माल का उत्पादन सामान्य किस्म का नहीं है। यह विशेष किस्म का माल उत्पादन है। यह बगैर पूँजीपतियों के ऐसे माल का उत्पादन है जिसका संबंध मुख्य रूप से सम्बन्ध समाजवादी उत्पाकद को (राजकीय, सामूहिक फार्म, सहकारिता) की आवश्यक सामग्रियों से है, जिनका कार्य क्षेत्र व्यक्तिगत उपभोक्ता सामानों की किस्मों तक सीमित है जो स्पष्टतः पूँजीवादी उत्पादन की ओर नहीं जा सकता, क्योंकि दोनो क्षेत्रों को इस तरह बनाया गया है कि ये दोनों मिलकर समाजवाद उत्पादन को विकसित और सुदृ़ करेंगे।
इसलिए ऐसे साथी भी पूर्णतः गलत फहमी में है जिनका आरोप है कि चूँकि सामजवादी समाज का अवसान नहीं हुआ है (अर्थात साम्यवादी अवस्था नहीं उत्पन्न हुई है-अनु0) इसलिए माल के उत्पादन के चलते हम पूँजीवादी चरित्र की सभी आर्थिक श्रेणियों का पुनरोदय करने को बाध्य होंगे, जैसेमाल के रूप में श्रम शक्ति, अतिरिक्त मूल्य, पूँजी, पूँजीवाद मुनाफा, मुनाफा का सामान्य दर, इत्यादि। ऐसे साथी पूँजीवादी माल उत्पादन को हमारे माल उत्पादन के साथ मिला देते हैं और विश्वास कर लेते हैं कि जब कभी माल का उत्पादन होगा तो वह पूँजीवादी उत्पादन ही होगा। वे यह महसूस नहीं करते कि हमारा माल का उत्पादन मूल रूप से पूँजीवादी माल उत्पादन से भिन्न है।
और भी, मैं सोचता हूँ कि मार्क्स के "कैपिटल" से लिए गए कुछ दृष्टिकोणों को छोड़ दिया जाना चाहिए। जैसे मार्क्स जहाँ पूँजीवाद का विश्लेषण, वहाँ लिखी गई कुछ बातों को बनावटी तरीके से समाजवादी सम्बन्धों पर चिपका दिया गया है। मैं बताऊंगा ऐसे दृष्टिकोणों में कुछ हैं आवश्यक’ और अतिरिक्त मूल्य’, आवश्यक’ और अतिरिक्त उत्पादन’ मार्क्स पूँजीवाद का विश्लेषण इस रूप में करते हैं कि मजदूर वर्ग के शोषण की जड़ें अतिरिक्त मूल्य को उजागर किया जा सके। मजदूर वर्ग को, जिन्हें उत्पादन के साधनों से वंचित कर दिया गया है, सैद्घांतिक और वैचारिक हथियार से लैश किया जा सके ताकि वह पूँजीवाद के जुए को उतार फेंके। यह स्वाभाविक है कि माक्र्स ने जिन दृष्टिकोणों का इस्तेमाल किया वह पूर्ण रूप से पूँजीवादी सम्बन्धों पर लागू होता है। किन्तु उन्हीं बातों को इस समय लागू करन के बारे में बोलना आश्चर्यजनक है जब मजदूर वर्ग न केवल सत्ता और उत्पादन के साधनों से वंचित नहीं है, बल्कि वह इसके विपरीत सत्ता पर कब्जा किये है और उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण करता है। श्रम शक्ति को माल के रूप में समझना और मजदूरों को खरीदना’ (hising) जैसी बात करना अब हमारी व्यवस्था में बेतुका है क्योंकि यहाँ मजदूर वर्ग को उत्पादन साधनों का स्वयं स्वामी है, स्वयं अपने को खरीदता है और स्वयं अपनी श्रम शक्ति बेचता है। इसी तरह आवश्यक’ और अतिरिक्त श्रम’ की बात करना भी आश्चर्यजनक है क्योंकि हमारे यहाँ यह मजदूरों द्वारा उत्पादन ब़ाने के लिए समाज को दिया जाने वाला योगदान है। शिक्षा की उन्नति के लिए, जन स्वास्थ्य को मजबूत करने के लिए, सुरक्षा संगठन के लिए मजदूर योगदान करते हैं जो न केवल मजदूर वर्ग के लिए, जो आज सत्ता में है, बल्कि पूरे देश के लिए और यहाँ तक कि मजदूरों और उसके परिवारों की व्यक्तिगत जरूरतों के लिए भी मजदूर अपना श्रम खर्च करता है।
यह उल्लेखनीय है कि "गोथा कार्यक्रम की आलोचना’’ में मार्क्स जब पूँजीवाद की जाँच पड़ताल नहीं, बल्कि साम्यवादी समाज की प्रथम अवस्था का वर्णन कर रहे थे तो मार्क्स ने श्रम को उत्पादन ब़ाने के लिए, शिक्षा और जन स्वास्थ्य के लिए, प्रशासन खर्च के लिए, लोक निर्माण आदि के लिए समाज के प्रति किया गया योगदान के रूप में स्वीकार किया है और इसे उन्होंने उसी प्रकार आवश्यक माना है जैसे मजदूर वर्ग की उपभोक्ता जरूरतों की आपूर्ति के लिए श्रम खर्च किया जाता है।
मैं सोचता हूँ कि हमारे अर्थ शास्त्रियों को चाहिए कि इस विसंगति को समाप्त करें जो पुराने दृष्टिकोणों और हमारे देश की नई परिस्थितियों के बीच है। पुराने विचारों के स्थान पर नए दृष्टिकोण अपनाना चाहिए जो नई परिस्थितियों से मेल खाते हैं।
हम इस विसंगति को कुछ समय के लिए सह सकते थे, किन्तु अब समय आ गया है कि इसे समाप्त करें।

क्रमश:
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा हैसमाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थीइस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया थाइस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैंआप के सुझाव विचार सादर आमंत्रित हैं
-सुमन
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