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मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

सरकार बनाएगा और कॉर्पोरेट सेक्टर की ही सेवा करेगा.

दुनिया के एक बड़े हिस्से ने शोषकों से उत्पीडित जनता को निजात दिलाने के लिए साम्यवाद के विचारों को अपनाया था जब तक वह कारण दुनिया में विद्यमान रहेंगे साम्यवादी विचारों की आवश्यकता बनी रहेगी.
आज प्रदेश में विराट बेरोजगारी फैली हुई है सत्तारूढ़ दल बेरोजगारी की समस्या का समाधान करने में असमर्थ हैं उसका मुख्य कारण विचारों का अभाव होना है. कॉर्पोरेट सेक्टर के पैसे से चुनाव लड़ने वाले सत्तारूढ़ दल व अन्य पूंजीवादी दल कॉर्पोरेट सेक्टर की सेवा करने के लिए पढ़े-लिखे नौजवानों को बेरोजगार बनाये रखना चाहते हैं इसलिए लाखों-लाख इंजिनियर, प्रशिक्षित अध्यापक, बिज़नेस मैनेजमेंट कर्ता पांच हज़ार रुपयों से लेकर 10 हज़ार रुपये प्रतिमाह की नौकरी करने के लिए मजबूर हैं वहीँ  लाखों-लाख करोड़ रुपये का मुनाफा प्रतिवर्ष कॉर्पोरेट सेक्टर करता हैं, पूंजीवादी मुनाफे के लिए आवश्यक है कि बेरोजगारों की मंडी बनी रहे और इसीलिए कॉर्पोरेट सेक्टर हज़ारों करोड़ रुपये पूंजीवादी राजनीतिक दलों के ऊपर खर्च करता है.
                               सपा, बसपा, भाजपा, कांग्रेस कॉर्पोरेट सेक्टर की सेवा में उन्ही के पैसे चुनाव लड़ रहे हैं जो भी जीतेगा वह सरकार बनाएगा और कॉर्पोरेट सेक्टर की ही सेवा करेगा.
              आज किसान को अपने उत्पादन का मूल्य न मिलने से कोल्ड स्टोरेज में रखा उसका आलू सड़ गया और नए आलू का मूल्य 400 रुपये प्रति कुंतल है, 600 रुपये प्रति कुंतल में धान अभी बिका है. किसान दिवालिया हो रहा है. बुनकरों के पास काम न होने के कारण वह प्रतिदिन 100 रुपये कि भी मजदूरी नहीं कर पा रहा है. प्रतिवर्ष धान वा गेंहू की खरीद कि व्यवस्था कागजों पर ही होती रही है. जिससे प्रदेश के किसानो कि माली हालत ख़राब हुई है. नोटबंदी के कारण गाँवों के अन्दर मजदूरी मिलनी बंद हो गयी है.
         प्रदेश में कांग्रेस, सपा, बसपा, भाजपा की सरकारें रही हैं. इन सभी दलों के नेतागण मजदूरों, किसानो, बुनकरों कि चिंता में रात दिन लगे रहते हैं जिससे यह तबके आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे हैं कॉर्पोरेट सेक्टर का मुनाफा लाखों-लाख करोड़ हो रहा है. विकास की इस धारा में कॉर्पोरेट सेक्टर मालामाल हो रहा है और मजदूर, किसान, बुनकर, मध्यम वर्ग तबाह हो रहा है.
            आइये ! हम आप सब मिलकर एक नई व्यवस्था का निर्माण करे जिसमें भूख, शोषण, अत्याचार, उत्पीडन न हो और एक शोषण रहित सुखी समाज की स्थापना हो सके.
इसके लिए

  • 17 वीं विधान सभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के चुनाव निशान हंसिया बाली वाले खाने का बटन दबा कर विजयी बनाएं तथा वामपंथी दलों को जितायें.
  • सांप्रदायिक, जातिवादी तथा वंशवादी ताकतों को परास्त करें.
  • भ्रष्ट, अपराधी तथा माफिया सरगनाओं को विधान सभा में पहुँचने से रोकें.
  • किसान, मजदूर एवं आम आदमी की बर्बादी का कारण आर्थिक नवउदारवाद की नीतियों को पीछे धकेलें.

  नोट ; भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी प्रतिनिधि रणधीर सिंह सुमन  का लेख  1 मार्च   को आल इंडिया रेडियो  से  प्रसारित  किया जाएगा

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

गुजरात: हिंदुवत्व का किला चरमराया

गुजरात में हुए नगर महापालिका से लेकर तालुका पंचायत तक चुनाव नतीजे भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में अच्छे नहीं रहे. हद तो यहाँ तक हो गयी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गृह जनपद मेहसाणा में भी भारतीय जनता पार्टी बुरी तरह पराजित हुई. अच्छे दिन के नारे की पोल खुलनी शुरू हुई वहीँ नागपुर मुख्यालय के दिवास्वप्न हिन्दू राष्ट्र का भी सपना खंडित होता नजर आ रहा है. शुद्ध ब्राहमणत्व की विचारधारा जनता को स्वीकार नहीं है लेकिन घायल नागिन की तरह यह लोग विष वमन करना बंद नहीं किये हैं लेकिन इसका असर संसद की कार्यप्रणाली पर पड़ा है और सत्तारूढ़ दल ने अपना मुखौटा सौम्य व मानवीय लगाकर शासन चलाने की कोशिश कर रहा है और धीरे-धीरे अपने विषाक्त विचारधारा दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों में फैला रहा है और उन्हें मुस्लिम विरोध के नाम पर हिन्दुवत्व की टोपी पहना कर अपना मजबूत आधार तैयार कर रहा है. इतिहास के अर्धसत्यों के आधार पर वह भारतीय जनमानस में घृणा व द्वेष फैला कर एक विशेष प्रकार की अंधभक्ति नवजवानों में तैयार कर रहा है. यह अंधभक्त तर्क, बुद्धि व विवेक खो कर सिर्फ मुस्लिम विरोध के आधार पर एक उग्र तालिबानी हिंदुवत्व बम के रूप में तब्दील हो रहे हैं. जिसका उदहारण मालेगांव, मक्का मस्जिद, समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट से लेकर अभी हाल में कुरनूल जिला आन्ध्र प्रदेश में 29 नवम्बर को भारी मात्रा  में विस्फोटक संघियो के पास  से  बरामद हुए है ऐथवा श्रीनिवास व बोया सुरेश  को पुलिस ने गिरफ्तार किया है इन लोगो के पास से  2,680 डिकोंनेटर, 1,200 गिलेटीन राड, 180 बूस्टर , 1,200 मीटरफ्यूज वायर  व  1.50टोंस अमोनियम नाइट्रेट बरामद हुआ  है की घटना से प्रमाणित होता है.
गुजरात की जनता ने यह कर दिखाया है कि ज्यादा दिन तक जनता को अर्धसत्यों के आधार पर गुमराह नहीं किया जा सकता है जिसका परिणाम यह रहा कि भाजपा ने गुजरात में सभी 6 महानगर पालिका पर अपना कब्जा जरूर बनाए रखा लेकिन वहीँ जिला पंचायत में उसे कांग्रेस के हाथों बड़ी पराजय झेलनी पड़ी। 31 जिला पंचायतों में से 21 पर कांग्रेस ने जीत हासिल  नगर पालिका पालिका में से उसने 42 पर जीत हासिल कर पायी जिला पंचायत और वहीं 4 पर अन्य का कब्जा रहा। भाजपा के खाते में केवल 6 जिला पंचायत गई। 230 तालुका पंचायतों में से 130 पर कांग्रेस जीती और भाजपा केवल 73 ही जीत पाई।
हिंदुवत्व का किला देश के मुनाफाखोर, जमाखोर जमातों तथा उद्योगपतियों के मुनाफे को लाखों-लाख गुना बढ़ा देता है उनके द्वारा किये जा रहे शोषण की तरफ जनता का ध्यान न रहे इसलिए तमाम सारे भावनात्मक मुद्दे संसद और विधान सभाओं से लेकर उद्योगपतियों द्वारा संचालित इलेक्ट्रोनिक मीडिया व प्रिंट मीडिया में छाये रहते हैं. 
                 महंगाई बेरोजगारी, भुखमरी, कर्ज में डूबे किसानो की आत्महत्या या यूँ कहे की बहुसंख्यक आबादी की समस्याओं की चर्चा व उसका निराकरण नहीं हो पा रहा है. साम्राज्यवादी शक्तियां शासक वर्ग को बुरी तरह से जकडे हुए है. समाजवाद के नाम पर छद्म समाजवादियों का कब्ज़ा है वह भी साम्राज्यवादी शक्तियों की स्वेच्छा से गुलामी कर रही हैं. जरूरत इस बात की है कि साम्राज्यवादी शक्तियों को बुरी तरह से पराजित नहीं किया जाएगा तब तक हिंदुवत्व का किला जीर्णशीर्ण होने पर भी खड़ा रहेगा. जब तक यह किला खड़ा रहेगा तब तक निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है की देश की एकता और अखंडता खतरे में है और बहुसंख्यक आबादी की समस्याओं की समाधान नहीं हो सकता है. 
सुमन
लो क सं घ र्ष !

रविवार, 11 अक्टूबर 2015

नेपाल में फेकू हारा -भारत नहीं

 भारत की विदेश नीति का यह प्रमुख हिस्सा रहा है कि पडोसी देशो की अंदरूनी राजनीति में हस्तक्षेप न  किया जाय और इसी कारण उसके सम्बन्ध पाकिस्तान को छोडकर सभी से अच्छे सम्बन्ध रहे है भारत में नयी सरकार आने के बाद उसकी विदेश नीति अस्पष्ट हो गयी है जिसका नतीजा नेपाल में दिखाई दे रहा है वहां पर इस चुनाव में भारतीय हस्तक्षेप की बात खुल कर सामने आयी कि सांसदों को खरीदने के लिए रुपया तक भेजा गया हमारे प्रधानमंत्री की पहली नेपाल यात्रा पर उनका भब्य स्वागत हुआ था लेकिन दूसरी यात्रा में उनकी अनाप सनाप बातो ने नेपाली जनता को रुष्ट  कर दिया था. नेपाली संविधान को बनाये जाने की प्रक्रिया में उनकी पार्टी के हस्तक्षेप ने नेपाली जनमानस में देश के प्रति आक्रोश पैदा  कर दिया. अंदरूनी सूत्रों के अनुसार नागपुरी दिशा निर्देशों के अनुरूप संविधान में वह हिन्दू राष्ट्र घोषित कराना चाहते थे जिसको वहा के संविधान निर्माताओ ने अस्वीकार कर दिया .जिसके फलस्वरूप हस्तक्षेप कर्ताओं को मुहं की खानी पडी वहीँ आज नए संविधान के बाद नेपाल ने अपना  प्रधानमंत्री भी चुन लिया है। 558 मेंबर वाली संसद ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-यूनीफाइड मार्कसिस्ट लेनेनिस्ट  के नेता खडग प्रसाद शर्मा ओली को पीएम को तौर पर चुना। केपी शर्मा ने नेपाली कांग्रेस पार्टी के नेता व पूर्व प्रधानमंत्री सुशील कोइराला को हराया है .
संसद में आज हुए मतदान में सीपीएन-यूएमएल के प्रमुख ओली को 338 मत मिले, जबकि नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष कोइराला ने सिर्फ 249 मत हासिल किए. प्रधानमंत्री चुने जाने के लिए 299 मतों की जरुरत थी.कुल 587 सदस्यों ने मतदान किया.हस्तक्षेप न किया होता तो शायद परिणाम दुसरे होते . इसी तरह हमारे प्रधानमंत्री लगातार विदेश यात्राएं करते रहते है और अप्रवासी भारतीयों से जय जयकारा करते रहते है विरोध वहां भी शुरू हो गया है.विरोध में अप्रवासी भारतीयों द्वारा अपशब्दों का प्रयोग भी किया जा रहा है. प्रधानमंत्री विदेश में भी चुनाव सभा संबोधित करते है और विपक्षी दलों  के ऊपर आरोप- प्रत्यारोप करके  देश की गरिमा  को ठेस पहुचाते है .पहले यह नीति थी कि जो भारतीय किसी भी देश का नागरिक हो गया है वह उसी मुल्क की बेहतरी के सम्बन्ध में सोचे तथा उसी मुल्क के प्रति निष्ठावान रहे. अब यह नीति बदल गयी है अप्रवासी भारतीयों को बार -बार  संबोधित करने से अगर उनकी निष्ठां संदेह के घेरे में आयी तो निश्चित रूप से जिस मुल्क में रह रहे है दिक्कते पैदा हो जायंगी . इस सम्वन्ध में नागपुरी सोचने में असमर्थ है.अमरीकियों ने सुनियोजित तरीको से मुसलमानों में यह नारा दिया कि पहले वह मुसलमान है फिर जिस देश में रहते है वहां के नागरिक है.जिसका असर यह हुआ कि दुनिया में उनके ऊपर सवाल भी अमरीकियों ने ही खड़ा करा दिया. उनकी दिक्कते बढ़ी.नेपाल की जनता और भारतीय जनता में घनिष्ट सम्वन्ध है फेकू की उल्टी सीधी हरकतों से सम्वन्ध खत्म नही होने जा रहे है लेकिन एक विवाद बढ़ रहा है . समय रहते जिस दिशा में कदम उठाने की जरुरत है. भारत -नेपाल की जनता की एकता जिंदाबाद ! -रणधीर सिंह सुमन
लो क सं घ र्ष !

शुक्रवार, 2 मई 2014

चुनाव-आतंकवाद की राजनीति

   लोकतंत्र में आम चुनाव एक ऐसा अवसर होता है जब यह अपेक्षा की जाती है कि सत्ता पक्ष द्वारा उसके कार्यकाल में किए गए कार्यों का विश्लेषण किया जाएगा। स्वयं सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियाँ गिनवाएगा। विपक्षी दल उसकी नाकामियों और नीतियों पर सवाल उठाएँगे। सभी दल देश और जनता की भलाई के लिए अपनी योजनाओं कार्यक्रमों की घोषणा करेंगे। जनहित के मुद्दों पर सकारात्मक बहस होगी। समाज के वंचित, पीडि़त और शोषित वर्गों को अपनी आवाज (आम तौर पर) गूँगे, बहरे और अंधे कानों और आँखों तक पहुँचाने में मदद मिलेगी, क्योंकि अक्सर सत्ता के नशे पूँजीतियों और कारपोरेट घरानों की चकाचैंध में राजनैतिक दलों के नेता न सुन पाते हैं और न देख पाते हैं। लेकिन यह एक कड़ुवी सच्चाई जिसका अनुभव हम इससे पहले के आम चुनावों में भी कर चुके हैं कि चुनावी सरगरमियाँ जैसे-जैसे तेज होती जाती हैं इन जनहित के मुद्दों को बड़ी धूर्तबाजी से हमारे राजनेता हाशिए पर पहुँचा देते हैं। फिर वही वंशवाद, व्यक्तिवाद आस्था, को भय और लालच के हथियार का प्रयोग करते हुए पूँजीपतियों और कारपोट घरानों के हजारो हजार करोड़ रूपयों के चुनावी निवेश से भोली भाली जनता को परोसा जाता रहा है। वही वातावरण इस चुनाव में निर्मित किया जाता हुआ महसूस हो रहा है। पहले वंशवाद और व्यक्तिवाद के साथ आस्था को ज्यादा महत्व दिया जाता था। भय का हथियार आमतौर पर सेकुलर माने जाने वाले दल मुसलमानों, ईसाइयों और दलितों को अपने पक्ष में रहने को मजबूर करने के लिए करते थे। लेकिन शायद 16वीं लोकसभा के लिए होने वाला यह चुनाव इस लिहाज से सबसे अलग होगा कि इसमें ‘भय’ और ‘असुरक्षा’ की भावना की (अगर इसकी धार को कुंद करने के लिए समय रहते सकारात्मक और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो) सबसे बड़ी भूमिका होगी। यह भावना केवल मुसलमानों या ईसाइयों में ही नहीं होगी, जो लगातार पिछले कुछ वर्षो में होने वाले दंगों के कारण विकसित हो चुकी है, बल्कि इस बार उसका सबसे बड़ा शिकार बहुसंख्यक समाज को बनाने की तैयारी है। उसे मुद्दा बनाने के लिए माहौल बनाया जा रहा है। रोटी, कपड़ा, मकान, किसान, मजदूर, बुनकर, दलित, आदिवासी, जल, जंगल, जमीन जैसे बुनियादी सवालों की बात का शायद नेताओं के भाषणों और स्तम्भकारों के लेखों को श्रृंगारित करने के लिए ही किया जाएगा। निश्चित रूप से बहुसंख्यकों में ‘भय’ और ‘असुरक्षा’ की भावना को परवान चढ़ाने और इसे सबसे बड़े मुद्दे के तौर पर पेश करने का सबसे प्रभावी हथियार होगा ‘आतंकवाद’। लगता है कि संघ और भाजपा ने इसके लिए मन बना लिया है और विभिन्न एजेंसियों का उन्हें अपने पक्ष में माहौल बनाने में पूरा सहयोग भी मिल रहा है।
    जिस तरीके से और जिस अंदाज में ‘आतंकवाद’ के मुद्दे को उछाला जा रहा है उससे साफ है कि मकसद किसी सकारात्मक बहस शुरू करने का नहीं है बल्कि बहुसंख्यक समाज में ‘भय’ और ‘असुरक्षा’ की भावना उत्पन्न करके चुनावी लाभ उठाने का है। अगर यह कहा जाए कि आतंकवाद के नाम पर पिछले दिनों गिरफ्तारियों में जो तेजी आई है उसका इससे सीधा सम्बन्ध है तो गलत न होगा। हो सकता है कि पहली नजर में यह निष्कर्ष किसी आशंका या पूर्वागह का नतीजा मालूम हो लेकिन आतंकवाद के मामले में कई संस्थाओं, प्रतिष्ठानों और राजनैतिक दलों के दृष्टिकोण और व्यवहार इस निष्कर्ष के लिए ठोस आधार उपलब्ध कराते हैं। जाहिर सी बात है जब हम आतंकवाद के नाम पर होने वाली गिरफ्तारियों पर उँगली उठाते हैं तो इसका मतलब होता है खुफिया एवं जाँच एजेसियों को कटघरे में खड़ा करना। आखिर वह किसी राजनैतिक दल या गठबंधन के पक्ष में माहौल बनाने के लिए ऐसा क्यों करेंगे, आतंकवाद एक वास्तविक समस्या है। धमाके हो रहे हैं, बेगुनाह मारे जा रहे हैं फिर तो निश्चित है कि इस अपराध को अंजाम देने वाले भी होंगे। यदि कुछ लोग इस आरोप में पकड़े जा रहे हैं तो इसमें हैरत की क्या बात है, अगर कोई निर्दोष है तो उसके लिए अदालत का दरवाजा खुला हुआ है फिर इसमें किसी आशंका की गुंजाइश कहाँ है, लेकिन पिछले अनुभवों और वर्तमान कार्रवाइयों को जोड़ कर देखें तो हम यकीनी तौर पर इससे अलग सोचने को मजबूर हो जाते हैं।
    सबसे पहले संदेह के लिए पूरी गुंजाइश वहीं पैदा हो जाती है जब आतंकवाद को किसी धर्म या समुदाय से जोड़ कर देखने की कोशिश की जाती है। भारत में इसे इस्लाम और मुसलमानों से जोड़ने की शुरूआत संघ और भाजपा ने की और खुफिया एवं जाँच एजेंसियों तथा मुख्य धारा की मीडिया का उनको पूरा सहयोग मिला। आडवाणी का वह वाक्य सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते लेकिन जितने आतंकवादी हैं सब मुसलमान हैं, कौन भूल सकता है। देश का मुसलमान शुरू से ही यह कहता आ रहा था कि आतंकी घटनाएँ एक साजिश हैं जिसको संचालित  कोई और करता है और खुफिया एवं जाँच एजेंसियाँ फँसाती मुसलमानों को हैं। महाराष्ट्र ए.टी.एस. प्रमुख स्व० हेमन्त करकरे ने 2008 में आतंक के उस चेहरे को बेनकाब किया जिसकी आशंका मुसलमान वर्षों पहले से जताता आ रहा था। यह रहस्य खुला तो एक के बाद कई बड़ी आतंकी वारदातों में आतंक के इस नए चेहरे का नाम जुड़ता गया। मालेगाँव 2006 और 2008 के धमाकों में वही हाथ पाए गए जो समझौता एक्सप्रेस, अजमेर शरीफ और मक्का मस्जिद बम धमाकों के अपराध में शामिल थे। मगर करकरे की 26/11 के मुम्बई आतंकी हमलों में हत्या के बाद उनके द्वारा की गई जाँच मालेगाँव 2006 के धमाकों से आगे उस दिशा में न बढ़ने देने के लिए आई.बी. और महाराष्ट्र ए.टी.एस. ने अपनी पूरी ताकत लगा दी और वह उस प्रयास में काफी हद तक सफल भी रहे। उस धमाके में साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित समेत अभिनव भारत तथा सनातन संस्थान से जुड़े कई आरोपियों की गिरफ्तारी और चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी मालेगाँव के बेगुनाह फँसाए गए, मुस्लिम युवकों को जमानत तक पाने में हर रुकावट खड़ी की गई। इसी आरोप में संघ के आदिवासियों में काम करने के जिम्मेदार और गुजरात के डांग जिले में शबरी आश्रम के संस्थापक असीमानंद ने मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 के तहत पहले दिल्ली में और उसके एक महीना बाद राजस्थान की अदालत में अपना अपराध स्वीकार करते हुए मक्का मस्जिद, अजमेर, समझौता एक्सप्रेस, और मालेगाँव 2006 और 2008 के दोनों
धमाकों में अपने साथियों की भूमिका का खुलासा कर दिया। तब यह भी पता चला कि उन धमाकों में संघ से जुड़े कई लोग शामिल थे। सुनील जोशी जिसकी 2007 में उसके ही साथियों ने हत्या कर दी थी, संघ का प्रचारक था। सुनील की तरह मध्यप्रदेश के ही रहने वाले लोकेश शर्मा और संदीप डांगे, रामजी कालसांगर भी संघ के प्रचारक थे और इन सभी ने बम बनाने और उसे प्लांट करने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। असीमानंद के इकबालिया बयान के अनुसार संघ के बड़े नेता और राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य इन्द्रेश कुमार स्वयं षड्यंत्र रचने और धमाकों की योजना बनाने में प्रत्यक्ष शामिल थे। उन्होंने पैसे और कुछ बम प्लान्टर भी उपलब्ध करवाए थे। इतना ही नहीं संघ के वर्तमान सर संघ चालक को भी न केवल इन गतिविधियों की जानकारी थी बल्कि उनका आर्शीवाद भी प्राप्त था। लेकिन किसी एजेंसी ने इस सिलसिले में किसी बड़े नेता को गिरफ्तार नहीं किया। हद तो यह है कि सूत्रों द्वारा मीडिया में उनको क्लीन चिट दी जाने लगी। कई नेताओं से पूछताछ की भी औपचारिकता एजेंसियों ने पूरी नहीं की। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि आरोपियों की गिरफ्तारी और उनसे पूछताछ में जाँच एजेंसियाँ इतने बड़े-बड़े मामलों में उनकी संलिप्तता का राज क्यों नहीं उगलवा पाई थीं, बेगुनाह मुसलमानों के गिरफ्तारी के बाद ही कबूलनामें हासिल कर लेने में माहिर जाँचकर्ता अचानक इन आरोपियों के मामले में इतने अक्षम क्यों नजर आने लगे, या फिर यह मान लेना चाहिए कि नीयत का फर्क था,        चूँकि इन तमाम धमाकों में मुसलमानों को गिरफ्तार करके केस को पहले ही हल करने का दावा किया जा चुका था और इससे पहले तक होने वाले हर धमाके को इस्लामी आतंकवाद या जिहादी आतंकवाद की संज्ञा दी जाती रही थी इसलिए आतंक के इस चेहरे के सामने आने के बाद इसे ‘भगवा’ आतंकवाद कहा गया। हालाँकि यह उतना ही गलत है जितना कि आतंकवाद को ‘इस्लामी या जेहादी’ आतंकवाद का नाम देना। आतंकवादी धमाकों में इस नए चेहरे के काले कारनामों की सूची लम्बी होने लगी और 2003 तक की कई घटनाओं में इन्हीं के हाथ होने का खुलासा हुआ। इसमें जालना, पूरना, परभनी, मोडासा और जम्मू की पीर मट्ठा मस्जिद के धमाके भी शामिल थे। यह भी पता चला कि सुनील जोशी ने कई मंदिरों में पाइप बम धमाके की योजना बनाई थी ताकि हिन्दुओं को भड़काया जा सके। इसके लिए उसने अपने एक दोस्त के कारखाने में लोहे के कुछ विशेष पाइप भी बनवाए थे। सुनील की 2007 में हत्या हो जाने के कारण इस दिशा में जाँच आगे नहीं बढ़ सकी थी। या यह कहा जाए कि खुफिया और जाँच एजेंसियों को, जो जाँच को इस दिशा में आगे बढ़ाना नहीं चाहती थीं इसका बहाना मिल गया और बात वहीं खत्म हो गई। 2006 में नांदेड़ में बम बनाते हुए बजरंग दल के लोग मारे गए थे और वहाँ से नकली दाढ़ी, टोपी, और कुर्ता पाजमा बरामद हुआ था जो इसका साफ प्रमाण था कि बम धमाके करके मुसलमानों को फँसाने का काम किया जा रहा है। लेकिन उसकी जाँच सही तरीके से नहीं की गई और मामला रफा-दफा हो गया। कानपुर में बन बनाते समय होने वाली घटना की कहानी भी बिल्कुल नांदेड़ जैसी ही थी। इसमें भी मारे जाने वाले बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के लोग थे। लेकिन यहाँ तो विस्फोटकों की मात्रा इतनी अधिक पकड़ी गई थी कि तत्कालीन पुलिस अधीक्षक को कहना पड़ा था कि पूरे कानपुर शहर को उड़ाने के लिए पर्याप्त थी। लेकिन इस मामले की जाँच भी आगे नहीं बढ़ी और फाइनल रिपोर्ट लगा कर मामला समाप्त कर दिया गया। गोवा में सनातन संस्थान के सदस्यों द्वारा स्कूटर पर ले जाया जाने वाला बम रास्ते में ही फट गया, मामला थोड़े समय के लिए मीडिया में आया और उसका अंजाम नांदेड़ और कानपुर जैसा ही हुआ। कितने ही स्थानों पर बम बनाते या ले जाते हुए होने वाले धमाकों को पटाखों की आड़ में छुपाया गया। यह सब सम्भव नहीं था यदि खुफिया और जाँच एजेंसियाँ ईमानदारी से काम करतीं और कोई कारण नही था कि इतने सघन अभियान के बाद अब तक भारत से आतंकवाद की जड़ें उखड़ न गई होतीं चाहे उसका नाम और रंग कुछ भी होता। जहाँ एक तरफ खुफिया और जाँच एजेंसियाँ इन आतंकवादियों को संरक्षण दे रही थी वहीं बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को उन्हीं धमाकों के आरोप में पकड़ रही थी और उनके खिलाफ सबूत गढ़ कर उनका जीवन नष्ट कर रही थीं और यातनाएँ देकर अपराध स्वीकार करवा रही थीं। इन सभी मामलों में फर्जी फँसाए गए मुस्लिम आरोपियों के मामले में पुलिस के पास (उसके  अनुसार) सबूत भी थे, बरामद किए गए बम और नक्शे भी थे और सरकारी गवाह भी थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सबूत कैसे बनाए जाते हैं और कहानी कैसे गढ़ी जाती है। खुफिया और जाँच एजेंसियों के अहलकार किस तरह से मुसलमानों को आतंकवादी बना कर पूरे समुदाय को बदनाम करने का काम करते थे और उसके समर्थन में झूठे सबूत गढ़ते थे उसका और ठोस सबूत मिलता है गुजरात के इनकाउंटरों से। विस्तार में जाए बिना इतना काफी होगा कि इशरत जहाँ, सोहराबुद्दीन, सादिक जमाल मेहतर और तुलसी प्रजापति फर्जी मुडभेड़ मामलों में कई बड़े पुलिस अधिकारी जेल में हैं। इशरत जहाँ केस में आई.बी. के स्पेशल डायरेक्टर राजेन्द्र कुमार और तीन अन्य आई.बी. अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट तक दाखिल कर दी है। यह तो मात्र वह मामले हैं जो संयोग से खुल गए हैं। देश में इतने संवेदनशील मुद्दे पर इतना बड़ा फर्जीवाड़ा होता रहा, मुसलमान फँसाए जाते रहे जब उसका खुलासा हो गया तो अन्य वारदातों की पुनर्विवेचना के लिए सरकार और एजेंसियों को खुद पहल करनी चाहिए थी लेकिन इसकी बार बार माँग के बावजूद कोई कदम न उठाया जाना यह साबित करता है कि सरकार ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहती जिससे उन चेहरों को फिर किसी आतंकवादी घटना से जुड़ा हुआ पाए जाने का रहस्य खुल जाने की सम्भावना मात्र भी हो। इन खुलासों के बाद से जितनी भी आतंकवादी वारदातें हुई हैं उनमें जब भी कभी ऐसी सम्भावना पैदा हुई है उसे तुरन्त खारिज किया गया है और जल्दबाजी में मुसलमान नौजवानों की गिरफ्तारियाँ हई हैं। पुणे जर्मन बेकरी धमाकें के मामले में हिमाचल बेग की गिरफ्तारी की बात हो या जंगली महाराज रोड धमाकों के दयानंद पाटिल में थैले में फटने वाले बम के बाद उसे मामूली चोट बता कर क्लीन चिट देने की बात, सब एक ही रणनीति की कड़ी मालूम होती हैं।
धीरे-धीरे फिर वही वातावरण बनाने का प्रयास लगातार महसूस होता है जो आतंकवाद के इस नए चेहरे के बेनकाब होने से पहले था। खुफिया और जाँच एजेंसियाँ मुख्य धारा की मीडिया के सहारे इसके लिए आधार
उपलब्ध करवाती हैं उसके बाद में सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर माहौल बनाने का बेड़ा संघ और भाजपा तथा कुछ और संगठनों और दलों का होता है। लेकिन बीच-बीच में अदालतों के फैसले इस लय को तोड़ देते हैं। हिमायत बेग को जर्मन बेकरी का मुख्य अभियुक्त बनाया गया था और जिसको निचली अदालत से गढ़े हुए सबूतों के आधार पर फाँसी की सजा भी हो गई थी अब बेगुनाह साबित हो गया। भाजपा और संघ को आतंकवाद के नाम पर राजनैतिक लाभ उठाने में अदालती फैसलों के कारण सबसे बड़ा धक्का अभी हाल ही में उत्तर-प्रदेश में लगा। जब कानपूर के वासिफ हैदर को अदालत ने उन सभी 9 आरोपों से बरी कर दिया जो एस.टी.एफ. ने गढ़े थे। बिजनौर के नासिर को भी अदालत ने बरी किया जिसे ऋषीकेश से एस.टी.एफ. ने उठाया था और लखनऊ से आर.डी.एक्स. के साथ गिरफ्तार दिखाया था। सबसे बड़ी बात यह कि उसकी बेगुनाही की गवाही ऋषीकेश के उस हिन्दू स्वामी ने अपने खर्च से अदालत में हाजिर हो कर दी थी जो उसके वहाँ से उठाए जाने का प्रत्यक्षदर्शी था। अदालत ने भी स्वामी के उस कदम की सराहना अपने फैसले में की है। यह घटनाएँ अप्रत्याशित थीं और उत्तर-प्रदेश जैसे राज्य में जहाँ लोकसभा की 80 सीटें हों वहाँ मजबूत प्रदर्शन के बिना दिल्ली दूर ही रह जाएगी। इसका आभास भाजपा को पहले से है, शायद मोदी को बनारस से चुनाव लड़ाने के पीछे संघ की मंशा भी यही है। लेकिन मोदी के विकास (हालाँकि जब गुजरात के विकास की बात होती है उसका एक मतलब 2002 का दंगा भी होता है) का महल गिर चुका है और उसको लेकर किए जाने वाले दावों की हर दिन पोल खुल रही है। ऐसे में उत्तर-प्रदेश सहित देश के अन्य भागों में आतंकवाद का भय दिखा कर यह यकीन दिलाने की कोशिश की जा रही है कि भाजपा ही इस दानव से निजात दिला सकती है। 23 मार्च को राजस्थान में अलग अलग स्थानों से चार मुसलमानों की गिरफ्तारी (उनमें से दो को जामिआ नगर दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था) दिखाई गई और बताया गया कि उनका सम्बन्ध इंडियन मुजाहिदीन से है। इसी तरह जिस तहसीन अखतर को बौद्धगया और पटना
धमाकों के आरोप में साल भर से ज्यादा समय से पुलिस तलाश कर रही थी जोधपुर से गिरफ्तार कर लिया गया। हैदराबाद के मौलाना अब्दुल कवी जो देवबंद जाने के लिए दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरे थे उन्हें गुजरात पुलिस ने वहीं से गिरफ्तार कर लिया। अगले ही दिन गोरखपुर से दो पाकिस्तानियों की गिरफ्तारी दिखाई गई। इससे पहले राजस्थान से गिरफ्तार चार आईएम आतंकियों में भी वकास पाकिस्तानी है जो यहाँ छात्र के तौर पर रह रहा था। इन गिरफ्तारियों में किसका मामला लियाकत अली शाह, हिमायत बेग और मुखतार राजू बंगाली जैसा होगा यह तो बाद में देखा जाएगा लेकिन जो माहौल अभी बनाना है उसके लिए तो आधार मिल ही गया है। लेकिन उत्साह में पाक नागरिकों को भी इंडियन मुजाहिदीन का आतंकी बताना हास्यास्पद और संदेहास्पद नहीं लगता।            मगर माहौल तो इंडियन मुजाहिदीन ही से बनेगा इस लिए यह मजबूरी भी थी कि इनको लश्कर या जैश के साथ जोड़ने के बजाए आई.एम. का आतंकी बताया जए। 
    चूँकि मोदी चुनाव वाराणसी से लड़ रहे हैं इस लिए गिरफ्तारियों का कनेक्शन वहाँ तक न पहुँचे तो बात अधूरी रह जाती है। पुलिस और खुफिया एजेंसियों के सूत्रों के हवाले से जो खबरें अखबारों में छपी हैं उनमें आजमगढ़ के डाक्टर शहनवाज और मिर्जा शादाब के बारे में कहा गया है कि उत्तर भारत में आई.एम. ने आतंकी हमले की कमान इन दोनों को सौंपी है। यह बात पकड़े गए कथित आतंकवादियों ने पूछताछ में बताई है। उन्होंने यह भी खुलासा किया है कि उत्तर-प्रदेश में आई.एम. के 150 स्लीपिंग माड्यूल्स हैं जिनका इस्तेमाल हमलों के लिए किया जा सकता है। शायद यह बताने की जरूरत नहीं कि पूछताछ में यह भी पता चला कि हमले मोदी और उनकी रैलियों पर किए जाएँगे। आजमगढ़ से वाराणसी की दूरी मुश्किल से 50-60 किलोमीटर है। इस लिजाज से आजमगढ़ माड्यूल ही इस पटकथा में सबसे फिट बैठता है और पिछले कुछ समय से मीडिया में इसी हवाले से चर्चा में रहने के कारण सबसे ज्यादा प्रभावी भी साबित हो सकता है। इसी तरह का माहौल जदयू से भाजपा के रिश्ते टूटने के बाद बिहार में भी बनाया गया था।
    यहाँ यह प्रश्न दिमाग में उठना स्वाभाविक है कि खुफिया और जाँच एजेंसियों को ऐसा करने की जरूरत ही क्यों है और उसके लिए भाजपा के ही हक में माहौल बनाने का क्या औचित्य है, तो इस सवाल का जवाब अगर सवाल ही से दिया जाए तो यह पूछा जा सकता है कि जिन बम धमाकों में असीमानंद और प्रज्ञा एंड कंपनी का हाथ था उसमें बेकसूर मुसलमानों को फँसाने के पीछे क्या राज हो सकता है, या इशरत जहाँ को पकड़ कर हत्या कर दी जाती है और उसे लशकर का आतंकी बताने के लिए ए.के. 47 दिखाई जाती है तो इसके पीछे क्या रहस्य हो सकता है, क्या यह एक व्यक्ति के दिमाग की खराबी कह कर टालने योग्य बात है। नहीं यह मामला कुछ और है। खुफिया एजेंसियों को असीमित अधिकार चाहिए और साथ ही किसी प्रकार की जवाबदेही भी नहीं रहे उसके लिए लोगों में भय और असुरक्षा का भाव उत्पन्न होना आवश्यक है। भाजपा को देश की सत्ता चाहिए ऐेसे में भय और असुरक्षा का हथियार बहुत प्रभावी हो सकता है मगर इसके लिए उसे मुसलमानों से जोड़ना जरूरी है। इसलिए यदि कोई वास्तविक शत्रु न हो तो काल्पनिक शत्रु पैदा करना उसके लिए राजनैतिक मजबूरी है। धमाकों के लिए माहौल बनाने से लेकर जरूरत पड़ने पर उसे अंजाम देने तक का इंतेजाम संघ के पास है, और उसका आरोप उस काल्पनिक शत्रु के सिर थोपने की कुंजी खुफिया और जाँच एजेंसियों के पास। यदि दोनों अपने अपने हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वाह सही तरीके से करते हैं तो लक्ष्य को आसान बना सकते हैं। जब जनता इसको स्वीकार कर लेगी तो फासीवाद में उसे अपने लिए रक्षक दिखाई देने लगेगा और शायद यह मान लिया जाएगा कि वह ‘सामूहिक चेतना’ अब जनता में भी वास्तव में पैदा हो गई है जिसको संतुष्ट करने के लिए अफजल गुरू को फाँसी पर चढ़ाया गया था।    
 -मसीहुद्दीन संजरी
मो0-09455571488     लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

चुनावी पैतरेबाजी की कलाकारी

नये लोक सभा चुनाव ने विचारधारा के अनुशासन को नई उचाइयाँ प्रदान किया है और यह साबित कियाहै कि पैतरेबाजी की विचारधारा वर्तमान समय में ज्यादा प्रासंगिक है साथ हीं साथ यह बात भी सिद्ध हुई हैकि विचारधारा किसी पार्टी कि बपौती नहीं है विचारधारा ऐसी नदी है जो किसी भी रास्ते से गुजरने कि काबिलियत रखती है साथ हीं साथ कुछ सहायक विचारधारा के  रूप में अवसर और भागी - भागी भागीदारी की धार पैतरेबाजी कि धारा के बहाव मे सहायक नदी कि भूमिका बनाए  हुये हैं और यहीं अवसर को जिसके लिए तमाम विवाद ग्रस्त इतिहास टीले का आकार ले चुके  हैं जिन पर कुछ पक्षी कभी कभार कलरव करते  हुये मालूम पड़ते हैं हिंदुस्तान के संदर्भ में तो और हीं ज्यादा आनंद दायक प्रतीत होने लगे हैं अब इसी लोक सभा चुनाव कि बात करें तो बस कमाल हीं कमाल है बहुत हीं बवाल है लेकिन फिर भी सब खुश खुश नजर आ रहें हैं क्यूकि  अब कोई अकेला नही है सब में सब समाये जा रहे हैं पहले भी हमारे  यहाँ संयुक्त परिवार हीं था जो भी हा े हर भागीदारी एक तरफ और सत्ता  की  भागीदारी एक तरफ, क्या मजाल कोई टक्कर दे  सके और वर्तमान समय बस भागीदारी और अवसर को भुनाने का हीं तो है ऐसे में क्या भाजपा क्या कांग्रेस क्या सपा और क्या बसपा क्या आप क्या हम काहे को जद और राजद या कोई और किसी कि भी बंगले में पार्टी मना लेंगे केक कटना चाहिए बस ?
अब कुछ लोग नाराज फालतू में हो  रहे हैं और नेताओं को बरसाती मेंढक बता रहे हैं इन कम अक्लों को नही मालूम है कि बरसाती मेंढकों में सौंदर्य और भौगोलिक वातवरण कि अपनी सीमा है ,लेकिन हमारे नेताओं में ऎसा बिल्कुल  नहीं है ये तो और ज्यादा ही उदार और ब्यापक हुये हैं यहीं तो इनकी पहचान है और इस चुनाव में इनहोने अपनी विसतरवादी छ्वी से पूरी दुनियाँ को चकित किया है कुछ  तो सीधा चुनाव लड़ने से हीं इंकार कर देश का तो भला किया हीं बल्कि अपनी त्याग कि भावना का भी मिशाल पेश किया है कई बुजुर्ग नेताओं ने  तो फिर से बालक जैसा रूठना शुरू कर दिया है लेकिन होता तो वहीं है जो अभिभावक चाहते हैं इसलिए बच्चा कितना भी होशियार क्यूँ ना हो ठगा हीं जाएगा कभी धर्म के  नाम पर कभी धन के नाम पर कभी डर के नाम पर तो कभी प्यार के नाम पर और ज्यादा जिद किया तो फिर लगती है खुद हीं रोकर चुप हो जाएगा या फिर सो भी जाता है इस बार के चुनावी समर मेँ कुछ नैसर्गिक नेता भी उपजे हैं जो परिवारवाद की खिलाफत कर रहे हैं और अपने पापा का टिकट कटवा दिये हैं और खुद जनता की सेवा मे उतर आए हैं कुछ  बड़े बड़े दावेदार वंशवाद की खिलाफत करते करते  हीरो जैसा सेलिब्रेटाइज्ड हो गए हैं और हूड़ हूड़ दबंग दबंग गाते गाते हुड्ड ्बाजों की फौज खड़ी कर लिए हैं उनकी दबंगई  से कई हरफौनमौला खिलाड़ी उनके खिलाफ बोलने  से डर रहे हैं ताकि लिस्ट से नाम न कट जाए, कुछ  लोग बेटों की नही भतीजों की फौज के साथ मैदान मे आ भिड़े हैं इसमे वंशवाद नहीं अंशवाद की मिठास है ये भले ही किसी राजनैतिक पिता के संतान हैं पर
ये भी बंशवाद की खिलाफत का झण्डा बुलंद कर रहे हैं कुछ पुराने  रणनीतिकार अब कहानी की नई विधा के  साथ अपने  जलवे दिखाना शुरू कर दिये हैं धमकी कहानी  को चटनी और मसाले के  साथ पेश कर दिये हैं

बहुत सारे  कर्म के  मारे   जनसेवक जिन्हे सरकारी नौकरी के  दौरान जनता की सेवा न कर पाने का मलाल है छतिपूर्ति  हेतु चुनावी मैदान मे उतर चुके  हैं ताकि इस पवित्र पावन समय मेँ कुछ  योगदान दे  सकें इन्हें कभी कोई पद का लालच नही रहा है इसी लिए किसी एक पद पर बहुत टीके नहीं रहें हैं और पद बदलाव इन हेतु जीवन की मजबूरी और जरूरत भी बन गई है अब ये पाला बदल बदल कर अपना चोला बदलने पर लालायित हैं कुछ दारोगा टाइप एस पी भी सीधा छलांग लगा चुके  हैं अब चाहते  हैं कि  संसद मेँ ही सीधा सेवा देंगे ताकि अब कोई सुरक्षा मेँ खामी नहीं रहे द्य ईनका मानना है की सांसद मे होकर देश को ज्यादा सुरक्षा दे पाएंगे खैर उधर अगली खाली लाइन मे कुछ हीरो, हिरोइनी को पकड़ कर लाया जा रहा हैकुछ क्रिकटर जो अब फ्लाफ होने के  कगार पर हैं उनकी करार की ब्यवस्था अलग से की जा रही है इन सेलिब्रेटी को समाज सेवा की खानदानी आदत है जो इनके पेशे मेँ कूट कूट कर भरी हैहालांकि इतिहास गवाह है की ये बरसात की तरह आते हैं और फिर वापस अपनी राह पकड़ लेते हैं इस मामले मे ये इनकी ईमानदारी की अपनी अलग मिशाल है

अब तो कुछ पुरस्कारी पुरुष भी चुनाव को शुशोभित् करने हेतु पर्चा दाखिल कर रहे हैं पहले चमत्कारी बाबा भी आए थे अब पर्दे के पीछे हीं जीतने की गारंटी दे रहे हैं उधर खबर आ रही है की काका टाइप निर्देशक जिनका संसद से कोई लेना देना नहीं है सांसद के चाल चरित्र को परिभाषित और प्रस्तावित करने मेँ अपनी भूमिका को मजबूत करने हेतु  यात्राबाजी शुरू कर चुके  हैं अब घंटी जहाँ बजेगी   राजा की सवारी वहीं सजेगी और जनता फिर नाचेगी, मगर नाचाएगा कौन ??
 -योगेश पासवान
शोध छात्र संचार एवं मीडिया

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

लोकतंत्र का हिंसक लोकतंत्र में रूपान्तरण

पष्चिम ,बंगाल   चुनाव आयोग, हाईकोर्ट और 70 हजार पुलिसबलों की सक्रियता के बावजूद पंचायत चुनावों में हिंसा अबाध गति से जारी रही। राजनीति का इस प्रक्रिया में रूपान्तरण हो गया है। दलीय विचारधारा के बजाय बम की विचारधारा के आधार पर चीजें नियंत्रित की जा रही हैं।  लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाएँ असहाय और मूकदर्षक बनी हुई हैं। मानवाधिकार आयोग के आदेषों की राज्य सरकार सीधे अवहेलना कर रही है। 
       भारत के विभिन्न राज्य लोकतंत्र के अपराधीकरण और कारपोरेट लूट से परेश।न हैं लेकिन पष्चिम बंगाल में तो लोकतंत्र ही हिंसक हो उठा है, लोकतांत्रिक राजनैतिक दल हिंसक हो उठे हैं। लोकतंत्र में पहले यदा-कदा हिंसा होती थी लेकिन इन दिनों हिंसा का ताण्डव रोजमर्रा की बात है। 
     लोकतंत्र को हिंसक लोकतंत्र में तब्दील करने में वामदलों की अग्रणी भूमिका रही है। वामदलों ने अपने विरोधियों से निबटने और वाम विरोधियों ने भी वाम दलों से निबटने का पष्चिम बंगाल में जो रास्ता चुना है उसमें हिंसा और हिंसक गिरोह महत्वपूर्ण कारक तत्व हैं। इसके कारण प्रतिस्पर्धी हिंसा का दैनंदिन ताण्डव चल रहा है। आमतौर पर भारत के विभिन्न प्रांतों में रहने वाले लोग बंगाली समाज को शांत-सुसभ्य समाज के रूप में जानते हैं लेकिन हिंसक लोकतंत्र का जो रूप यहाँ निर्मित हो रहा है वह समूचे देष के लिए अपषकुन है। यह बंगासी समाज की प्रचलित धारणाओं का विलोम रच रहा है। असल में हिंसक लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य को समझे बिना हाल ही में संपन्न पंचायतों के चुनाव और उसके परिणाम समझ में नहीं आ सकते।
    सामान्यतौर पर भारत के किसी भी राज्य में हिंसा व्यापक फिनोमिना कभी नहीं रही। लेकिन पष्चिम बंगाल में हिंसा फिलहाल जिस गति और शक्ति के साथ पैर जमा चुकी है उसके किसी तरह थमने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। हाल में संपन्न त्रिस्तरीय पंचायतों के चुनावों में चुनाव आयोग और कलकत्ता उच्चन्यायालय को निष्प्रभावी देखा गया। शासकदल तृणमूल कांग्रेस ने इन दोनों संवैधानिक संस्थाओं के आदेषों का निचले स्तर पर सचेत ढंग से उल्लंघन किया। स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि चुनाव आयोग ने शासकदल की मोटरसाइकिल रैलियों को अवैध घोषित कर दिया था लेकिन इसके बाबजूद ये रैलियाँ हर कस्बे और गाँव में निकाली गईं, इन रैलियों में इलाके के गुंडे-बदमाष हथियारबंद होकर शामिल हुए और स्थानीय लोगों में दहषत फैलाने का काम किया। कालांतर में चुनाव आयोग ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में षिकायत की थी, उस पर अदालत ने भी आदेष दिया लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने नहीं माना। अपराधियों का तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में इस तरह का खुला प्रदर्षन प0बंगाल के लिए नई घटना थी। पहले यह लोग पर्दे के पीछे रहकर समर्थन करते थे लेकिन ममता सरकार आने के बाद से उनकी सार्वजनिक मंचों, जलसों, ऑफिसों, रैलियों आदि में मौजूदगी बढ़ गई है। मोटरसाइकिल ब्रिगेड के नाम इन बदमाषों ने बाइकवाहिनी बनाई थी जिसका मुख्य काम था राज्य के विभिन्न इलाकों में आतंक पैदा करके रखना। इन बदमाषों पर नियंत्रण के लिए चुनाव आयोग ने इनकी बाइक रैलियों पर पाबंदी लगाई, लेकिन उसका तृणमूल कांग्रेस ने पालन ही नहीं किया।
      इसी तरह अदालत ने राज्य सरकार को आदेष दिया कि चुनाव आयोग जितना पुलिसबल माँग रहा है उतना पुलिसबल दिया जाए और जिस दिन से तैनाती के लिए कह रहा है पुलिसबलों को तैनात कर दिया जाए लेकिन निचले स्तर पर अधिकांष इलाकों में नामांकन के समय पुलिसबल तैनात ही नहीं हो पाए क्योंकि चुनाव आयोग और राज्य सरकार का सुप्रीम कोर्ट में विवाद चल रहा था। फलतः  तृणमूल कांग्रेस ने विरोधी उम्मीदवारों को बड़ी संख्या में नामांकन पत्र ही दाखिल नहीं करने दिया। इसका परिणाम यह निकला कि साढ़े छह हजार से ज्यादा तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार बिना किसी प्रतिद्वंद्विता के ही पंचायतों के लिए चुन लिए गए। अदालत के आदेष के बावजूद निचले स्तर पर नामांकन पत्र दाखिल करने की तिथि तक उम्मीदवारों को सुरक्षा का माहौल प्रदान करने में चुनाव आयोग असफल रहा। चुनाव आयोग को राज्य सरकार ने मुकदमेबाजी में इस कदर उलझा दिया कि चुनाव प्रबंधन का काम गौण होकर रह गया।
      इस बार चुनाव आयोग के समस्त आदेषों की सत्तारूढ़ दल ने सचेत ढंग से अवहेलना की। तृणमूल कांग्रेस के विरोध में जो उम्मीदवार किसी तरह नामांकन पत्र दाखिल करने में सफल रहे उनमें से अधिकांष को डराने-धमकाने का अनवरत सिलसिला चलता रहा। तृणमूल कांग्रेस के अनेक स्थानीय नेताओं और मंत्रियों ने
विरोधी उम्मीदवारों के घर तक जलाए जाने का पब्लिक मीटिंग में आह्वान कर डाला और इसके बाद तो विरोधी उम्मीदवारों के घरों पर हमले तेज हो गए। तृणमूल कांग्रेस के हमलों में 50 से ज्यादा लोग चुनाव अभियान के दौरान मारे गए हैं इनमें से
अधिकांष वाम कार्यकर्ता हैं। इसके अलावा सैकड़ों लोगों को अपना घर छोड़कर भागना पड़ा। हिंसा का आलम यह था कि चुनाव प्रचार के दौरान तकरीबन हर इलाके में हिंसा की घटना हुई।
       चुनाव से पहले आधे से ज्यादा पंचायत बूथों को चुनाव आयोग ने अतिसंवेदनषील घोषित कर दिया था इसके बावजूद चुनावों को शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराने में चुनाव आयोग असफल रहा। तृणमूल कांग्रेस के लोगों ने बूथ कैप्चरिंग में नया रिकॉर्ड बनाया, पहले बूथ लूटे गए और सैकड़ों मतदान केन्द्रों से वामदलों और कांग्रेस के प्रतिनिधियों को खदेड़कर बाहर कर दिया गया। बाद में मतगणना के समय दोबारा  हिंसा और लूट हुई और मतगणना के लिए नियत वाम प्रतिनिधियों को बड़ी संख्या में गणनाकेन्द्रों के बाहर कर दिया गया और चुनाव आयोग के लोग असहाय देखते रहे। चुनाव आयोग के लोगों ने इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए कोई सख्त कदम तक नहीं उठाए।
    पष्चिम बंगाल के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में उन इलाकों में तृणमूल कांग्रेस बड़ी संख्या में सीटें जीतने में सफल रही है जहाँ पर आतंक ज्यादा फैलाया गया और हिंसा ज्यादा हुई। उन इलाकों में उसका प्रदर्षन खराब या कम अच्छा रहा है जहाँ हिंसा कम हुई थी या नहीं हुई थी। मतगणना के समय गणनाकेन्द्रों पर मतपत्र छीनने और वाम प्रतिनिधियों को गणना केन्द्रों से खदेड़कर बाहर करने की अधिकांष घटनाएँ हावडा, वर्धमान, हुगली और उत्तर 24 परगना में हुईं।
    तृणमूल कांग्रेस को 13 जिला परिषदों में जीत हासिल हुई। वाममोर्चे को जलपाईगुड़ी जिला परिषद में जीत हासिल हुई, वहाँ पर उसने 37 में से 23 सीटें जीतीं। उत्तर दिनाजपुर में वाम ने 26 में से 13 सीट जीतीं, कांग्रेस ने 6 और तृणमूल कांग्रेस ने 5 सीट जीतीं। इस जिला परिषद को पहले कांग्रेस संचालित करती थी। मालदा में वाम ने 16, कांग्रेस ने 16 और तृणमूल कांग्रेस ने 6 सीट जीतीं। मुर्षिदाबाद जिला परिषद पर कांग्रेस का कब्जा हुआ, उसने 70 में से 42 सीटों पर जीत दर्ज की। नदिया में वाम ने 21 और तृणमूल कांग्रेस ने 25 सीटें हासिल कीं। पंचायत समितियों के चुनाव में वाममोर्चा ने जलपाईगुड़ी, उत्तर दिनाजपुर, मालदा, मुर्षिदाबाद और नदिया की अधिकांष समितियों में जीत दर्ज की। राज्य के कुल 330 ब्लॉक में वाममोर्चा को 68, तृणमूल कांग्रेस को 219, कांग्रेस को 20 ब्लॉक में सफलता मिली। जबकि 20 ब्लॉक अनिष्चित नेतृत्व की अवस्था में हैं। उल्लेखनीय है कि तृणमूल कांग्रेस ने ब्लॉकस्तर पर 870 सीटें बिना किसी मुकाबले के ही जीत ली थीं, इन सीटों पर उसने विपक्षी दलों के उम्मीदवारों को नामांकन पत्र ही दाखिल नहीं करने दिया। मुर्षिदाबाद में वाममोर्चा ने 15 ब्लॉक समितियों में से अधिकांष पर जीत हासिल की। नदिया में 9 पंचायत समितियों में जीत हासिल की। उत्तर 24 परगना में सन् 2008 में वाम मोर्चा ने 4 पंचायत समितियों में चुनाव जीता था लेकिन इस बार के चुनाव में उसे 7 पंचायत समितियों में विजय मिली है। यह सब व्यापक आतंक के बावजूद हुआ है।
    ग्राम पंचायत स्तर के चुनावों में 3215 ग्राम पंचायत समितियों में वाममोर्चे को 749 ग्राम पंचायतों में विजय हासिल हुई है। तृणमूल कांग्रेस ने 1812, कांग्रेस ने 240 और 393 ग्राम पंचायतें हंग यानी अर्निणीत अवस्था में हैं। उल्लेखनीय है कि ग्राम पंचायत समिति के चुनावों में सत्तारूढ दल ने बड़े पैमाने पर नामांकन पत्र ही दाखिल नहीं होने दिए इसके कारण तृणमूल कांग्रेस ने बिना चुनाव लड़े ही 5336 सीटें जीत लीं। असल संख्या इससे ज्यादा हो सकती है क्योंकि अनेक स्थानों पर उसने डमी या बोगस उम्मीदवार खड़े किए थे।
    मुर्षिदाबाद में  वाममोर्चे ने 102 ग्राम पंचायतों में जीत हासिल की, तृणमूल कांग्रेस ने 8, उत्तर 24 परगना में वाम ने 47 ग्राम पंचायतें 2008 में जीती थीं इस बार यह संख्या बढ़कर 60 हो गई है। दक्षिण 24 परगना में 94 और जलपाईगुड़ी में 58 ग्राम पंचायत समितियों में वाम विजयी रहा है। यहाँ तक कि पूर्वी मिदनापुर में, जो तृणमूल कांग्रेस का गढ़ माना जाता है, वहाँ पर वाम मोर्चे ने 43 ग्राम पंचायतों में जीत दर्ज की है। नदिया में वाम ने 51 ग्राम पंचायतों में जीत हासिल की है और 48 में नेतृत्व अनिष्चित है, यानी हंग की अवस्था है। सत्तारूढ़ दल के नियोजित आतंक के बावजूद कुल मिलाकर 9000  वाम उम्मीदवार त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में विजयी रहे हैं और यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। इस प्रसंग में वामदलों और खासकर मा.क.पा. के सामने यह चुनौती है कि वह अपनी सांगठनिक दुर्बलताओं और भूलों को जल्दी से दुरुस्त करे। मा.क.पा. जितनी जल्दी अपनी कमियों को दूर करेगी उतनी ही जल्दी आम जनता का विष्वास अर्जित करने में मदद मिलेगी।
       बंगाल में लोकतंत्र का हिंसक लोकतंत्र में रूपान्तरण हो चुका है। यह लोकतंत्र के अपराधीकरण से आगे की अवस्था है। पंचायतों के चुनाव परिणाम आ गए हैं। विभिन्न इलाकों में पंचायतों का गठन भी हो चुका है, लेकिन गाँवों और कस्बों में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। चुनाव से पहले हिंसा और चुनाव के बाद हिंसा यह इस राज्य के लोकतंत्र का सामान्य चरित्र है। हिंसा के बिना लोकतंत्र और लोकतांत्रिक चुनावों की परिकल्पना एकदम असंभव है।
 -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी          
मोबाइल: 09331762360

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

उम्मीदवार दे रहे हैं मज़हबी ज्ञान की परीक्षा

पाकिस्तान में चुनाव
 कड़ुवाहट पैदा करने वाले बहुत सारे समाचारों के बीच एक अच्छी ख़बर आई है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ख़लिदा जि़या ने देश में ईश निंन्दा क़ानून बनाने की दक्षिण पंथी मज़हबी संगठनांे की मांग को अस्वीकार करते हुए उनके उग्र आन्दोलन के आगे झुकने से इंकार कर दिया है। पाकिस्तान में इस तरह के क़ानून के दुरुपयोग से विश्व अच्छी तरह परिचित है। इसका अवसाद वहां के सामाजिक माहौल में अब भी महसूस किया जा सकता है। पाकिस्तान के उसी पंजाब में जहां आधुनिकता व पारम्परिकता के बीच, देश के दूसरे हिस्सांे के समान तीखा संघर्ष चलता रहा है, वहां की प्रान्तीय हुकूमत ने स्कूली पाठयक्रम में बड़ी तब्दीली करते हुए पाठय सामग्री में धार्मिक पाठों की संख्या सीमित कर दी है। विशेष रूप से दसवीं कक्षा की उर्दू पाठय पुस्तक में। हलांकि वहां इस तब्दीली का तीखा विरोध हुआ और तत्कालीन मुख्यमंत्री शहबाज़ शरीफ की लानत-मलामत भी हुई। जाते-जाते शहबाज ने तबदीली रद्द करने की हामी भी भर दी। परन्तु उनकी जगह आये कार गुजार मुख्यमंत्री नज्मसेठी ने, धार्मिक पाठों को फिर से शामिल करने से इन्कार कर दिया। इस पृष्ठ भूमि में देखिए तो वहां के युवाओं के बड़े प्रतिशत द्वारा देश के लिये इस्लामी शरीअत का समर्थन चांैकाता भी है, चिन्ता भी पैदा करता है। ये स्थिति अपने देश के युवाओं में नरेन्द्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता से बहुत अलग नहीं है। भारत हो या पाकिस्तान दोनों जगह आगामी चुनाव में धर्म निरपेक्ष आधुनिकता वदियों तथा साम्प्रदायिक रूढि़वादियों के बीच बड़ी टक्कर होने जा रही है। इतना अन्तर अवश्य है कि पाकिस्तान में ये टक्कर अधिक उग्र और हिंसक हो सकती है। क्योंकि वहां का चुनाव आयोग स्वयं इस विवाद की एक पार्टी बना हुआ है। उसकी निगरानी लोकतंत्र और जनवाद के मसीहा की हैसियत प्राप्त कर चुके जस्टिस इफि़्तखा़र चैधरी कर रहे है। चुनाव आयोग नामांकन करने वाले सम्भावित उम्मीदवारों से उनकी इस्लामी ज्ञान की परीक्षा ले रहा है। यह परीक्षा गुपचुप तरीकें से नहीं बल्कि सार्वजनिक रूप से हो रही है। यानि की इसमें टी.वी. के क्विज़ प्रोग्राम का भी सहारा लिया गया है। निश्चय ही यह परीक्षा हमारे समय की गहरे तक चिन्तित करने वाली बड़ी त्रासदी है। यद्यपि इस आधार पर अभी तक कोई नामांकन रद्द नही हुआ है, फिर भी ख़तरे बने हुये है। वो क्षण यकीनन इतिहास के रोचक प्रसंग की तरह याद कियें जायेगें, जिनमें शरीअत कानून की प्रबल प़क्ष धर जामाअते इस्लामी के एक उम्मीदवार उस्मान शरीफ इस परीक्षा में उत्तीर्ण नही हो पाये। एक रिपोर्ट के अनुसार उनसे इस्लाम का ‘‘तीसरा कलमा’’ सुनाने को कहा गया लेकिन वो पहला कलमा ही सुना पाये। कुछ पाकिस्तान का क़ौमी तराना नही सुना सके तो कुछ मज़हब के बुनियादी उसूल नही बता पायें। ऐसे में हालात की बिडम्बना उबारने वाली सआदत हसन मंन्टो की ‘‘स्याह हाशिए’’ मे संकलित एक छोटी कहानी याद आती है।
        बम्बई में विभाजन के दंगो के दौरान एक मुसलमान एक हिन्दू रिक्शे वाले को मारने के लिये खुला चाकू लेकर उसके पीछे दौड़ता है। एक मक़ाम पर वो उसे जा दबोचता है। और नीचे गिराकर उसकी छाती पर चढ़ बैठता है। उसकी ओर चाकू तान कर कहता है, ‘‘पढ़ कलमा नहीं तो मारा’’ कलमा पढ़ने का मतलब उसके निकट मुसलमान हो जाना था। हिन्दू रिक्शे वाला बहुत छटपटाया ,बड़ी मिन्नत समाजत की, हाथ पैर जोड़े लेकिन इस्लामी जोश ठंडा नही पड़ा। रिक्शे वाले ने बचने का कोई उपाय न देख, अंन्ततः छाती पर चढे़ नंगा चाकू ताने हुए आदमी से कहा ‘‘अच्छा बताओ कैसे पढं़े कलमा’’? चाकू वाला हाथ सहसा ढीला हुआ, वो अपलक अवाक सा उसे देखता रह गया। उसका गरीबां छोड़ते हुए और छाती से उठते हुए उस आदमी ने कहा ‘‘यह तो मुझे भी नही मालूम कि कलमा कैसे पढ़ा जाता है’’
        पाकिस्तानी चुनाव आयोग के इस कृत्य से समूचे उप महाद्वीप के धर्म निरपेक्ष आधुनिकता वादियों का चिन्तित होना स्वाभाविक है। इस तरह की घटनाओं से दूसरे देशों के रूढि़वादी पोंगा पण्डितों तथा धार्मिक आस्था का राजनैतिक इस्तेमाल करने वालों को शक्ति प्राप्त होती है तथा समाज में उनका स्पेस विस्तार पाता है। इस्लामी या मुस्लिम एकता के परख़च्च्ेा उड़ाने वाले ऐतिहासिक संघर्ष से गुजर चुके बंग्लादेश में ईश निन्दा कानून के पक्ष में चला आन्दोलन जिसकी प्रकट मिसाल है। मुक्ति युद्ध से गद्दारी करने वालो को मृत्यु दण्ड दिये जाने के फैसले की मुखा़लिफ़त मे बड़ी संख्या में युवकों का सड़कों पर उतरना भी इसी सिलसिले की एक कड़ी मानी जा सकती है। याद किया जा सकता है कि वहां तस्लीमा नसरीन के खिलाफ़
विरोध व निन्दा का उग्र आन्दोलन जमाअते इस्लामी ने मुक्ति युद्ध के दौरान किये गये अपनेे अपराधों की ओर से ध्यान हटाने के लिये ही चलाया था।
        पाकिस्तान में उसके जन्म से ही सियासी नेताओं, पार्टियों तथा शासको द्वारा वहां के लुटे पिटे अवाम के प्रति किये गये लगातार विश्वास घात (जो संयोग से हमारे यहां भी होता रहा है।) के कारणों वहां के आवाम का सियासी नेताओं व पार्टियों पर सेे विश्वास बुरी तरह डगमगा गया है। राजनीति के प्रति विरक्ति का  भाव व्यापक होता गया। मोह भंग की तकलीफ़ उन्हे धर्म के करीब ले गयी यद्यपि धार्मिक गुरूओं-मौलानाओं तथा धर्म की राजनीति करने वालों ने भी उनके साथ  बड़ा विश्वासघात किया। लेकिन इसको क्या कीजिये कि पुर्नउत्थानवाद की मादकता हकीकतों को धुँधलाने में अधिक समर्थ साबित होती हेै। वहां चुनाव आयोग की इस सक्रियता को यदि एक ओर धर्म निरपेक्षता व उदारवाद की राजनीति करने वाली शक्तियों एवं सोच को कमजोर करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। तो दूसरी ओर समूची सियासी बिरादरी  को हास्यास्पद बनाने के प्रयास के रूप मे भी। ज़ाहिर सी बात है         ऐसे में विक्षोभ भरी आपत्तियां भी हो रही है और क़ानूनी कार्यवाही की धमकियां भी दी जा रही है। कुछ लोग तो वहां के संविधान में पाकिस्तान को इस्लामी राष्ट्र की हैसियत ही से असहमति प्रकट कर रहे है। ऐसे में इस समाचार पर सन्देह करने का कोई कारण नज़र नही आता है कि शराब पीने व बेचने पर लगी पाबन्दी को हटाने के अभियान से जुड़े एक उम्मीदवार को इसी कारण चुनाव लड़ने से प्रतिबन्धित कर दिया गया है।
        पाकिस्तान के अवाम को इस चुनाव से बड़ी आशाएँ है? निष्पक्षता के सिद्धांत को कड़ाई से लागू करते हुए टैक्स व बैंक क़जऱ्ों की अदायगी के साथ ही शैक्षिक प्रमाण-पत्रों व अपराधी पृष्ठिभूमि की बारीक जाँच ने लोगों में नई उम्मीद जगाई है। पख़्तून इलाक़े की दो क़बीलाई महिलाओं द्वारा पहली बार किए गये नामांकन तथा चुनाव प्रक्रिया में स्त्री सक्रियता ने गहमा गहमी को बढ़ाया है। पहली बार अपना कार्यकाल पूरा करने का श्रेय प्राप्त अतीत का हिस्सा बन चुकी पार्लयामेन्ट ने औरतों के पक्ष में कई क़ानून बनाए हंै।
        इस प्रकाश में देखें तो चुनाव आयोग द्वारा उम्मीदवारों के धार्मिक ज्ञान की परीक्षा लोकतांत्रिक मूल्यों तथा चुनाव की बुनियादी आचार संहिता का उपहास उड़ाने जैसा है। इसे तुरन्त रोकाजाना पकिस्तान सहित समूचे उपमहाद्वीप के हित में है।
   
   -शकील सिद्दीकी
  
    मो0. 09839123525


रविवार, 12 फ़रवरी 2012

चुनाव : धनबल का चुनाव

उत्तर प्रदेश में दूसरे चरण का मतदान शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो गया है लेकिन इस चुनाव की मुख्य विशेषता यह है कि आयोग ने शांतिपूर्वक चुनाव तो करवा लिए लेकिन मतदाताओं की खरीद फरोख्त को रोक नहीं पाए कुछ क्षेत्रों में सीधे-सीधे मतदाताओं को एक हजार रुपये की नोट देने के समाचार हैं चुनाव में प्रिंट मीडिया इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लोगों ने मेज के नीचे से रुपया लेकर सपा-बसपा-भाजपा को मतदाताओं के सामने पेश किया अन्य पार्टियों जिनके उम्मीदवारों ने या पार्टी स्तर पर रुपये का भुगतान नहीं किया वह पार्टियाँ उनके एजेंडे से गायब ही रहीं राजनितिक दलों के सिम्बल अख़बारों में प्रकाशित किये गए किन्तु उत्तर प्रदेश में दो राष्ट्रीय पार्टियों भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मर्क्सस्वादी कम्युनिस्ट पार्टी के चुनाव निशान प्रकाशित नहीं किये गए इसका मुख्य कारण यह है कि इन पार्टियों ने मेज के ऊपर से और ही मेज के नीचे से पेमेंट किया
धर्म गुरुओं ने भी अपनी अपनी निष्ठाएं विभिन्न दलों में व्यक्त की चुनाव में भी उनका भाव तेजी पर रहा लग्जरी गाड़ियाँ, प्रतिदिन का खर्चा तथा विभिन्न प्रकार की सुविधाओं का उपयोग भी इन लोगों ने किया।
चुनाव में मुद्दे गायब थे, चुनाव संपन्न होते ही किसानो की खाद, बीज की समस्याएं ज्यों की त्यों बनी हैं। महंगाई दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। वोट लेने वाले बहुरूपियों ने सरकार बनाने के लिये साम, दाम, दंड भेद से मत प्राप्त कर लिये हैं, बिजली पानी नदारद है। सरकार चाहे जिसकी बने महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी जैसे मुद्दे हल करने की दिशा में इन राजनीतिक दलों की कोई रूचि नहीं है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

बुधवार, 25 जनवरी 2012

सरकार बनेगी थैलीशाहों की


उत्तर प्रदेश में विधान सभा के चुनाव में प्रथम चरण की शुरुवात हो चुकी है। कांग्रेस, सपा, बसपा, भाजपा की ओर से बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा आया रुपया ( ब्लैक मनी) मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिये खर्च किया जा रहा है प्रिंट इलेक्ट्रोनिक मीडिया के उद्घोषक से लेकर उनका पूरा तंत्र इन्ही दलों के घमासान की खबरें छापने उद्घोषित करने में लगा हुआ हैछोटे दलों या निर्दलीय प्रत्याशियों के प्रतिनिधि जब समाचार देने जाते हैं तो उनसे सीधे-सीधे विज्ञापन की मांग की जाती है इससे यह साबित होता है कि उनके समाचार सर्वेक्षण में सब कुछ इन चार दलों के थैलीशाहों द्वारा प्रायोजित है जनता लाख कोशिश करे किन्तु व्यवस्था इन थैलीशाहों द्वारा नियोजित की जा रही है। मतदान करना ही है तो इन चार दलों में से ही मतदाता किसी न किसी को तो मतदान कर ही आएगा। अन्तोगत्वा चाहे बिजली पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं बनी ही रहेंगी। अरबों रुपये जो लोग चुनाव जिताने में खर्च कर रहे हैं। तो सरकार चाहे जिसकी बने पहले थैलीशाहों के हित व स्वार्थ उसको पूरे करने होंगे। पूरे चुनाव प्रक्रिया में आम मतदाता का कोई अर्थ नहीं रह गया है और अप्रत्यक्ष रूप से सरकार चाहे जिस दल की हो वह थैलीशाहों की ही होगी।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

गुरुवार, 17 नवंबर 2011

श्री श्री और आर्ट ऑफ पोलिटिक्स


जैसे-जैसे उत्तरप्रदेश विधानसभा के चुनाव नजदीक आ रहे हैं वैसे-वैसे बाबाओं और भगवानों का इस राज्य के प्रति प्रेम बढ़ता ही जा रहा है। उनके उप्र दौरों की संख्या में अचानक वृद्धि हो गई है। इनमें से अधिकतर गुरू, भ्रष्टाचार का जीजान से विरोध करने में अपनी आध्यत्मिक उर्जा व्यय कर रहे हैं। इनमें प्रमुख हैं बाबा रामदेव एवं श्री श्री रविशंकर। श्री श्री इसके पहले अन्ना के साथ थे और अन्ना की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने अन्ना आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वे अन्ना की जेल यात्रा के दौरान अन्ना और उनके साथियों के बीच संवाद सेतु थे। ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान ने अचानक आकाशवाणी के जरिए श्री श्री और बाबा रामदेव को देश में भ्रष्टाचार के फैलते मकड़जाल से अवगत कराया है और वे इसे जड़मूल से उखाड़ फेंकने में जुट गए हैं।
पिछले कुछ समय से बाबा रामदेव के प्रवचनों में भ्रष्टाचार-विरोध का एक परिषिष्ट अनिवार्य रूप से शमिल रहता है। इसी तरह, आर्ट ऑफ लिविंग के अविष्कारक श्री श्री अपने शिष्यों को यह बताते नहीं थकते कि भ्रष्टाचार का विरोध कितना जरूरी है। इसी बीच, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया है कि रामदेव, अन्ना और श्री श्री, दरअसल, आरएसएस के मोहरे हैं और वे समाज और चुनावी राजनीति में आरएसएस के एजेन्डे को लागू कर रहे हैं। रामदेव की भाजपा से नजदीकियां जगजाहिर हैं और कुछ समय पूर्व उन्होंने अपनी एक अलग पार्टी गठित करने का विचार भी बनाया था। अलबत्ता, श्री श्री ने कभी इस भाषा में बात नहीं की और वे लगातार यह कहते रहे हैं कि उनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। उनका कहना है कि उनकी उत्तरप्रदेश यात्रा, उनके उस देशव्यापी कार्यक्रम का हिस्सा मात्र है जिसके अंतर्गत वे लोगों को यह शपथ दिलाते रहे हैं कि वे भ्रष्टाचार का विरोध करेंगे।

दिग्विजय सिंह गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रहे हैं कि श्री श्री का राजनैतिक एजेन्डा है और वे आरएसएस की सी टीम हैं। क्या श्री श्री सचमुच राजनीति में दिलचस्पी ले रहे हैं? क्या वे संघ परिवार का हिस्सा हैं? यह तो साफ है कि श्री श्री ने न तो कभी शाखाओं में भाग लिया है और न ही बौद्धिकों में हिस्सेदारी की है। उन्हें खाकी हाफ पेन्ट पहनकर नमस्ते सदा वत्सले का गायन करते हुए भी कभी नहीं पाया गया। परंतु साथ ही, यह भी स्पष्ट है कि श्री श्री चुनावी राजनीति को प्रभावित करने के लिए बनाई गई एक वृहद योजना का हिस्सा हैं। हमें यह समझना होगा कि चुनावी राजनीति केवल राजनैतिक हथियारों और तरीकों से नहीं की जाती। सामाजिक आंदोलनों और जनजागृति के कार्यक्रमों के जरिए भी चुनावी राजनीति का खेल खेला जाता है।

कोई भी कानून न तो सड़कों पर पारित किया जा सकता है और न ही उसे किसी समूह के दबाव में बनाया जा सकता है। यूपीए सरकार ने अन्ना टीम की मांगें लगभग मंजूर कर ली हैं और उन्हें पूरा करने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। परंतु इसके बावजूद, अन्ना टीम सुबह-शाम यूपीए और कांग्रेस के खिलाफ आग उगल रही है और हिसार उपचुनाव में उसने खुलकर कांग्रेस उम्मीदवार का विरोध किया। ऐसा लगता है कि अन्ना आंदोलन के एजेन्डे में जनलोकपाल बिल और भ्रष्टाचार विरोध के अतिरिक्त कुछ और कार्यक्रम भी शामिल हैं। बाबाओं के इस समूह का कोई गहरा, छिपा हुआ एजेन्डा है और श्री श्री, इस समूह के महत्वपूर्ण सदस्य हैं। यूपीए सरकार पहले ही सूचना का अधिकार और नरेगा जैसे आमजनों का सशक्तिकरण करने वाले कानून बना चुकी है और भ्रष्टाचार-विरोधी कानून बनाने पर सहमत है। इसके बावजूद, अन्ना टीम और उससे जुड़े हुए बाबाओं का सरकार पर दबाव बढ़ाते जाना आश्चर्यजनक है। स्पष्टतः इस आंदोलन के पीछे कोई न कोई ऐसा उद्देश्य है जिसे सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है।

इस आंदोलन का राजनैतिक एजेन्डा उतना सीधा नहीं है जितना कि दिखलाई दे रहा है। क्या जनता को यह पूछने का हक नहीं है कि आध्यत्मिकता की आड़ में किसी ब्रांड विशेष की राजनीति को जनता पर क्यों थोपा जा रहा है? श्री श्री पिछले तीन दशकों में तेजी से उभरे हैं। युवावर्ग को उसके कार्यस्थल से जु़ड़े तनावों से मुक्ति दिलाने के लिए श्री श्री ने सुदर्शन क्रियाका अविष्कार किया जो कि पुरातन भारतीय परंपरा के श्वास आधारित व्यायामों का परिष्कृत रूप है। आज वे स्वर्गीय भगवान सत्यसांई, आसाराम बापू, बाबा रामदेव आदि के क्लब में शामिल हैं। एक ओर ये बाबा मन को भुलावा देने वाली, यथार्थ से दूर ले जाने वाली स्वस्थ बनो तकनीकों का प्रसार कर रहे हैं तो दूसरी ओर वे एक विशिष्ट सामाजिक ढांचे के पैरोकार बनकर भी उभरे हैं। धर्म के नाम पर की जा रही उनकी राजनीति में वंचितों, दलितों, महिलाओं और आदिवासियों के अधिकारों के लिए कोई जगह नहीं है। यही कारण है कि वे नितिन गडकरी, नरेन्द्र मोदी, राम माधव और उनके जैसे अन्य लोगों के साथ खड़े दिख रहे हैं। आश्चर्य नहीं कि इन सब का ध्यान इन दिनों उस राज्य पर केन्द्रित है जहां जल्दी ही चुनाव होने जा रहे हैं। उनकी राजनीति, एक तरह की हिन्दू राष्ट्र की राजनीति है जिसकी स्थापना के लक्ष्य को लेकर आरएसएस सन् 1925 से काम कर रहा है।

भ्रष्टाचार उन्मूलन के नारे में कुछ भी गलत नहीं है। परंतु यह आश्चर्य की बात है कि हजारे, रामदेव और श्री श्री को भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने का विचार एक साथ कैसे आया? यह भी महत्वपूर्ण है कि संघ प्रमुख ने यह दावा किया है कि उन्होंने अन्ना हजारे से यह मुद्दा उठाने का अनुरोध किया था। संघ के स्वयंसेवकों ने पूरे देश में इनके आंदोलन को समर्थन और सहयोग दिया। क्या यह मात्र संयोग है? कदापि नहीं। भ्रष्टाचार का विरोध करना अच्छी बात है परंतु क्या कारण है कि ये लोग दलितों पर अत्याचार, अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और कन्या भ्रूण हत्या जैसे मुद्दों पर कुछ नहीं कहते। क्या ये समस्याएं महत्वपूर्ण नहीं हैं? इन बाबाओं को भोजन के अधिकार से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कभी यह कामना प्रगट नहीं की कि भारत साम्प्रदायिक दंगों से मुक्त देश बने। हम सबको यह जानने में गहरी दिलचस्पी है कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, दलितों के लिए आरक्षण व अन्य कई मुद्दों पर श्री श्री और संघ-भाजपा के विचारों में इतनी समानता क्यों और कैसे है?


-राम पुनियानी
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