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मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

दादा गजेन्द्र सिंह समाज के हर वर्ग के प्रेरणा दायक


  बाराबंकी। पूर्व विधायक, समाज सुधारक स्व0 गजेन्द्र सिंह की प्रथम पुण्य तिथि के अवसर पर पूर्व अध्यक्ष जिला बार एसोसिएशन बृजेश दीक्षित की अध्यक्षता में गांधी भवन देवां रोड पर एक स्मृति सभा का आयोजन किया गया।
    कार्यक्रम का प्रारम्भ महन्त गुरूशरण दास ने स्व0 गजेन्द्र सिंह के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धासुमन पेश करते हुए किया।
    इस अवसर पर अपने संबोधन में बृजेश दीक्षित ने कहा कि दादा गजेन्द्र सिंह समाज के हर वर्ग के प्रेरणा दायक थे। उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि उनके विचारों का अनुसरण करने में ही है।
    गांधी वादी विचारक एवं गांधी समारोह ट्रस्ट के अध्यक्ष प0 राजनाथ शर्मा ने पूर्व विधायक को अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कहा कि उनका जीवन एक सच्चे एवं निर्भीक इंसान के जीवन की अभिव्यक्ति थी और गांधी समारोह ट्रस्ट के वह संस्थापक सदस्य थे और उन्हीं की प्रेरणा से ट्रस्ट द्वारा अनेको कार्यक्रम सम्पन्न कराए गए।

    वरिष्ठ पत्रकार हशमतउल्ला ने पूर्व विधायक के जीवन व उनके कार्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वह बहुआयामी व्यक्तित्व के मालिक थे। एक ओर जहां वह एक निर्भीक व बेबाक राजनेता थे तो वहीं उर्दू व हिन्दी साहित्य के प्रेमी थे, उन्हें यदि रामायण की चौपाइयों , गीत, श्लोक व प्रमुख कवियों की कविताएं कठस्थ थी तो वहीं उर्दू के ऐसे नायाब अशआर याद थे जो किसी ने कभी सुने भी न हों।
    फखरूद्दीन अली अहमद कमेटी के पूर्व चेयरमैन निहाल रिजवी ने दादा गजेन्द्र सिंह के साथ बिताए गए अपने समय का स्मरण करते हुए कहा कि जिले में राजनीति की युवा पीढ़ी को तैयार करने में दादा की अहम भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि वह एक निर्भीक राजनेता थे और आम आदमी के सरोकारो के पैरोकार थे।
    जिला उपभोक्ता फोरम के पूर्व सदस्य हुमायू नईम खां ने दादा गजेन्द्र सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि वह अपने आदर्शों से कभी समझौता न करने वाले इंसान थे और सामाजिक समस्याओं के प्रति उनकी संवेदनाओं ने सदैव उन्हें आम इंसानों के करीब रखा।
    वरिष्ठ प्रवक्ता जवाहर लाल नेहरू परास्नातक महाविद्यालय डा. राजेश मल्ल ने अपने संबोधन में कहा कि दादा गजेन्द्र सिंह ने राजनीति में अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के प्रवेश पर वह सदैव चिन्तित रहे और इसका विरोध करने के दृष्टिकोण से ही वह काफी समय तक एक राज्यमंत्री द्वारा राष्ट्रीय ध्वजारोहण किए जाने के खिलाफ अपनी आवाज बुलन्द करते हुए अपनी गिरफ्तारी देते रहे।
    इस अवसर पर पवन कुमार वैश्य, बृजमोहन वर्मा, डा. उमेश चन्द्र वर्मा, डा. एस.एम. हैदर, प्राचार्य रामस्वरूप यादव, पूर्व विधायक शिवकरन सिंह, हरिशरण दास, राकेश कुमार सिंह, दिलीप गुप्ता एडवोकेट, उपेन्द्र सिंह, श्रीमती नीरज सिंह, अजय सिंह, प्रशान्त मिश्र, सुरेन्द्र नाथ मिश्र, हरि गुप्ता, राजेन्द्र बहादुर सिंह, पुष्पेन्द्र कुमार सिंह, सलाम मोहम्मद, विजय प्रताप सिंह, आनंद सिंह, अरविन्द वर्मा, गनेश सिंह, धीरेन्द्र सिंह, राजेश्वर दयाल बाजपेयी, मेराज अहमद ने भी अपने विचार रखते हुए दिवंगत राजनेता  को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
    कार्यक्रम के अंत में रणधीर सिंह सुमन ने आए हुए सभी आगुन्तकों के प्रति अपना आभार व्यक्त किया।



रणधीर सिंह सुमन
एडवोकेट
जिला-बाराबंकी

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

मेरे पिता गजेन्द्र सिंह का निधन


मेरे पिता श्री गजेन्द्र सिंह, पूर्व विधायक का निधन 22 अक्टूबर 2012 को समय करीब दोपहर 12:15 पर हो जाने के कारण लोकसंघर्ष में पोस्ट प्रकाशित नहीं की जा पा रही हैं जिसके लिए खेद है.

रणधीर सिंह सुमन
एडवोकेट
मो - 09450195427

सोमवार, 26 सितंबर 2011

वर्तमान दौर के जातीय संगठन और सामाजिक जनतंत्र का प्रश्न


आज हर जातीय के पास जातीय संगठन है | अब किसी भी जाति के लोगो के पास यह कहने का मुँह- माथा नही रह गया है की फला जाति के लोग जातिवादी है |जातिवादी संगठन बना रहे है |
कयोंकि जातिवादी संगठनों के जरिये जातिवाद करने - बढाने और समाज को बाटने का काम किसी भी जाति के लिए बाकी नही रह गया है | दिलचस्प बात यह है कि जातिवादी संगठनों के पदाधिकारी आमतौर पर उच्च या बेहतर स्तिथियों के लोग है | आधुनिक पद - पेशो पर प्रतिष्ठित लोग है | मंत्री , विधायक , उच्च अधिकारी , बड़े व्यापारी या फिर डाक्टर , इंजिनियर , लेक्चरर , प्रोफेसर , वकील आदि जैसे लोग है | अर्थात जातीय संगठनों के पदाधिकारी आमतौर पर अपने जातीय पेशो पहचानो और स्थितियों से उपर उठकर आधुनिक युग की पद -प्रतिष्ठा की जगहों पर विराजमान है | इसके विपरीत जातीय संगठनों में शामिल विभिन्न जातियों के जनसाधारण , खासकर गावं - गवई के खासी संख्या के लोग अभी भी अपने जातीय कामो - पेशो से जुड़े लोग है | यह बताने की जरूरत नही है विभिन्न जातियों की बुनियादी विशेषता उनका पुश्त दर पुश्त से चला आ रहा पेशा है |सामाजिक कामो की पुश्तैनी परम्परा है |नये या आधुनिक पेशो के आने से पुराने व पुश्तैनी पेशो में भारी टूटन व परिवर्तन आता जा रहा है | पुश्तैनी पेशो के रूप में सदियों से खड़ा होता रहा जातीय समुदाय टूटता - बिखरता जा रहा है | एकदम निम्न स्तर के कामो व पेशो को छोडकर अब हर काम धंधे व पेशो में हर जाति के लोग जाने लगे है | उसको अपने जीवन यापन का साधन बनाने लगे है |
लेकिन अभी भी हर जाति समुदाय में जातिय रिश्ता बना हुआ है | पेशो के रूप में टूटते रहने के वावजूद जातीय उपनाम या जातीय पहचान के साथ - साथ शादी - विवाह के जातीय रिश्ते अभी भी आमतौर से प्रचलित है | न केवल हिन्दुओ में बल्कि मुसलमानों में भी | अंतरजातीय विवाह का प्रचलन व मान्यता अभी समाज के अत्यंत उच्च हिस्सों में या बाम्बे जैसे शहरों में कई पीढियों से रह रहे लोगो में ही संभव हो पाया है |अत: शादी - विवाह के अनिवार्य एवं अपरिहार्य सामाजिक संबंधो के संदर्भो में जातीय संगठनों का बनना अभी भी प्रासंगिक है |
उनकी यह आवश्यकता या प्रासंगिकता , शादी - विवाह के संबंधो को सुलभ व सुगम बनाने के लिए आज भी अपेक्षित है | इसे लोग अच्छी तरह से समझ सकते है | शादिया खोजने , तय करने और फिर उसे परिपूरण करने की दिक्कतों को सभी लोग जान रहे है | अत: इस अत्यंत आवश्यक पारिवारिक - सामाजिक समस्या के समाधान के लिए ख़ास करके शादी - विवाह में पहले के पारम्परिक दहेज़ की जगह अब बढ़ते जा रहे बाजारवादी लेन - देन वाले दहेज़ को काटने - घटाने आदि के लिए भी जातीय संगठनों की अहम भूमिका हो सकती है और होनी भी चाहिए |
....... लेकिन वर्तमान दौर में बनते जातीय संगठन में इस काम के लिए तो कोई जगह ही नही है | वह काम तो उनके एजेण्डे में ही नही है | चाहे वह कोई भी जाति क्यों ना हो | इसी का परीलक्ष्ण है की एक तरफ जाति संगठन बनते - बढ़ते जा रहे आदि , दूसरी तरफ शादी - विवाह के रिश्तो की तमाम दिक्कतों के साथ नकद पैसे से लेकर आधुनिक मालो - सामानों के दान -दहेज़ आदि का चलन बढ़ता जा रहा है | हर जाति के जातीय संगठनों द्वारा अपने ही जाति के लोगो में खड़ी हो रही बाजारवादी लूट की समस्याओं को नजरन्दाज़ किया जा रहा है | .लेकिन तब वर्तमान दौर में जातीय संगठनों के बनने - बढने का माने मतलब क्या ? जातीय संगठनों के पदाधिकारियों का कहना है कि यह जाति विशेष के उत्थान व विकास के लिए है | लेकिन तब जातीय संगठनों द्वारा जातियों के बीच बुनियादी और अभी तक पड़े रह गये प्रमुख सम्बन्ध को अर्थात शादी - विवाह के सम्बन्ध और उसकी समस्याओं को महत्व क्यों नही दिया जाता ? जबाब एकदम साफ़ है | वह यह है की यह समस्या हर जाति के आम लोगो की अपेक्षाकृत निम्न और कमजोर स्तिथियों के लोगो की समस्या है , न की उच्च स्तर के और उच्च आमदनी वाले लोगो की | इसीलिए हर जाति के उच्च व बेहतर स्तिथियों के लोगो द्वारा बनाये या बनवाये जा रहे जातीय संगठनों में उस जाति के ही कमजोर स्तिथियों के लोगो की शादी - विवाह की समस्याओं के लिए कोई सक्रिय व सार्थक प्रयास भी नही है |
इससे भी साबित होता है कि वर्तमान दौर में जातीय संगठनों के बनने का मुख्य कारण एकदम दुसरा है | वह जाति के समूचे लोगो के लिए नही बल्कि विभिन्न जातियों की बेहतर व उच्च स्तर के लोगो के कल्याण उत्थान व चढत - बढत के लिए आवश्यक है | उसके जरिये जातियों के आगे बढ़े हुए लोग , जाति के नाम पर जातीय विकास व कल्याण के नाम पर समूची जाति को अपने पीछे लगा लेते है | जातीय संगठनों के नेता बनकर भाषण -प्रशासन से लेकर राजनीत में अपना असर - रसूख बना व बढा लेते है | फिर उससे अपने स्वार्थो की पूर्ति करते रहते है | इसे बढावा देने का प्रमुख काम देश की हुकूमत द्वारा पिछले 30 सालो से धर्मवादी , सम्प्रदायवादी , जातिवादी तथा इलाकावादी चुनावी राजनीत के जरिये किया जाता रहा है | धर्म , सम्प्रदाय व जाति की राजनितिक पार्टियों एवं प्रचार माध्यमो द्वारा उसे पनपाया व बढाया जाता रहा है | आम लोगो के हितो को उनके धार्मिक व जातीय समूहों के हितो के नाम से प्रस्तुत व प्रचारित किया जाता रहा है | धर्म , सम्प्रदाय व जाति के सत्ता - स्वार्थी इस्तेमाल की इसी राजनीत ने हर जाति के उच्च व बेहतर स्थितियों के लोगो में , अपनी जाति के लोगो के समर्थन का इस्तेमाल कर उपर चढने , राजनेता बनने की भूख जगा दी है | यही भूख उनसे जातियों के कल्याण - उत्थान का नाम लेकर जातीय संगठन बनवा रही है | जबकि विभिन्न जातियों के कमजोर स्तिथियों के लोगो के शादी - विवाह के अलावा महगाई , बेकारी , रोजी रोटी की समस्या शिक्षा स्वास्थ आदि की बुनियादी समस्याए ही नही है | इसीलिए इन बुनियादी समस्याओं से मुक्ति और जातियों के बहुसख्यक लोगो के कल्याण - उत्थान करने की समस्या जातीय संगठनों के जरिये हल होने वाली भी नही है | इन समस्याओं को विभिन्न धर्म - जाति के जनसाधारण के व्यापक संगठन या मंच के जरिये ही हल किया सकता है |हाँ जातीय संगठन के जरिये जाति के 10 -15 % लोगो को उपर चढने का अवसर जरुर मिल सकता है |
इसलिए हर जाति की बहुसख्यक परन्तु कमजोर स्थिति के लोगो को बनते बढ़ते जातीय संगठनों को अपनी समूची जाति के कल्याण -उठान के रूप में देखना कही से भी ठीक नही है | वस्तुत: यह जन एकता का विरोधी विचार - व्यवहार है , जिसे आम जनता में विभिन्न जातीय ( धार्मिक व इलाकाई ) समूहों में फैलया जा रहा है | इसलिए विभिन्न जातियों के इसी बहुसख्यक हिस्से का दायित्व है की वह शादी - विवाह के संबंधो को सुलभ बनाने के लिए या समाज में जाति विशेष के प्रति बरते जा रहे छुआछूत व भेदभाव जैसे गैर जनतांत्रिक विचारों व व्यवहारों के विरोध के लिए या अन्य किसी न्यायोचित मांगो के लिए ही जातीय संगठनों को समर्थन दे | बड़ी सामाजिक समस्याओं व मांगो के लिए दूसरी जातियों के लोगो से भी सहयोग लें | उसे वर्तमान दौर जैसे स्वार्थपूर्ति का सत्ता - स्वार्थी राजनीत का या रजनीतिक सामाजिक गोलबंदी का हथकंडा बनाने का विरोध करे | साथ ही पिछड़े युग में अपनी जातीयता उच्चता , श्रेष्ठता के मिहिमा मण्डन का या वास्तविक या कल्पित इतिहास को उठाकर जातीय समुदायों को महिमा मण्डित करने के प्रयासों का विरोध करे | जातीय संगठनों के संदर्भ में सामाजिक जनतंत्र का यही कार्यभार या दायित्व है |

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

पति पीड़ित विधायक


लोकतांत्रिक देशों में लिंगभेद के आधार पर कोई फैसला नहीं होता है लेकिन वास्तव में अधिकांश फैसले पुरुषवादी मानसिकता के तहत होते हैं भारत में स्त्री को दुर्गा, सरस्वती, पार्वती जैसे विश्लेषण से विभूषित किया जाता है लेकिन सच यह भी है कि पूरी दुनिया में स्त्रियों की बुरी दशा है और एक बड़ी संख्या में स्त्रियों को देह व्यापार जैसे कार्यों में जबरदस्ती लगाया गया है स्त्रियों की दुर्दशा का अभी महत्वपूर्ण मामला बिहार में देखने को आया है 2005 में राष्ट्रीय जनता दल से विधायक चुनी गयी बीमा भारती को उनके पति अवधेश मंडल ने बुरी तरह मारा पीटा की उनको अस्पताल में भर्ती करना पड़ा हैघटना के समय विधायक के अंगरक्षक तमाशा देखते रहेइस समय भी बीमा भारती सत्तारूढ़ दल जनता दल (यू) की विधायक हैं बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार उनका हाल-चाल लेने के लिए अस्पताल भी गए
अपने देश में महिलाओं के आरक्षण के तहत जिला पंचायत अध्यक्ष से लेकर सदस्य ग्राम पंचायत तक महिलाएं निर्वाचित होकर पदासीन होती हैं वहीँ संसद तथा विधान सभाओं में निर्वाचित होकर मंत्री बनती हैं देश की राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल हैं इन में कितनी निर्वाचित महिलाओं की पिटाई आये दिन उनके पति करते होंगे और वह बेचारी समाज में अपनी पदीय विवशता के कारण अपनी बात को भी नहीं कह सकती हैं
आज जरूरत इस बात की है कि हमारी शिक्षा दीक्षा इस तरह से निर्धारित कि जाए की उस में लिंग भेद समाप्त हो अन्यथा हम आप नारे लगते रहेंगे और महिलाओं कि दशा में कोई सुधार नहीं होगा

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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