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शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

संघी खाएगा स्वर्ग जाएगा ! अल्पसंख्यक खाएगा नरक जाएगा !

बीफ के सवाल पर जहाँ देश के अन्दर पीट-पीटकर लोगों को मार डाला जा रहा है या पशुधन के व्यापारियों की पिटाई करके जान ले ली जा रही हो। वहीं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख पदाधिकारी श्री मनमोहन वैद्य ने स्वीकार किया है कि संघ के लोग बीफ खाकर भी उसमें रह सकते हैं। टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के अनुसार संघ के 3000 लोग बीफ का आनंद लेते हैं। संघ के लोग हिन्दी भाषी प्रदेश में बीफ के सवाल को लेकर समाज में कटुता पैदा करते हैं वहीं स्वयं उसका सेवन करने से परहेज नहीं करते हैं यह उनके दोहरे चरित्र को दर्शाता है। मुख्य सवाल यह है कि इनके दोहरे चरित्र के कारण देश के अन्दर निवास करने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के लोग भयभीत होते हैं। दूसरी तरफ यह लोग भी बीफ के सवाल ऊपर तमाम सारी पूर्वाग्रह भरी बातें कर धार्मिक उन्माद पैदा करते हैं।
    मनमोहन वैद्य के बीफ खाने की बात स्वीकार करने के बाद भी संघ के लोग उन्माद फैलाने से बाज नहीं आ रहे हैं। ईमानदारी की बात तो यह है कि नागपुर मुख्यालय को बीफ के सवाल के ऊपर अपनी स्थिति साफ करनी चाहिए तथा गौरक्षा समिति से लेकर तमाम सारी सेनायें उन्होंने बना रखी है उसको भंग करें। अन्यथा उनकी दोगली राजनीति के कारण देश के एकता और अखण्डता विविधता को गम्भीर खतरा पैदा हो रहा है।
-रणधीर सिंह सुमन
लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 15 जून 2015

मोदी का मुस्लिम नेताओं से संवाद एक मायाजाल


   
लगभग एक सप्ताह पहले, नरेन्द्र मोदी ने विभिन्न मुस्लिम समूहों के लगभग 30 प्रतिनिधियों से बातचीत की। यद्यपि इस सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है तथापि कहा जाता है कि मोदी ने इन नेताओं से कहा कि वे उनके लिए हमेशा उपलब्ध हैं। 'आप लोग आधी रात को भी मेरा दरवाजा खटखटा सकते हैं', उन्होंने कहा। जो मुस्लिम नेता मोदी से मिले, उनमें से कई आरआरएस के नजदीक हैं और संघ द्वारा स्थापित 'मुस्लिम राष्ट्रीय मंच' से जुड़े हुए हैं। इस बैठक का खूब प्रचार हुआ परन्तु यह मोदी की अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं के साथ पहली मुलाकात नहीं थी। सवाल यह है कि यह संवाद केवल एक दिखावा था या मुस्लिम समुदाय की समस्याओं को सुलझाने का संजीदा प्रयास। क्या मोदी के शब्दों को गंभीरता से लिया जा सकता है? क्या वे सचमुच देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय की बेहतरी के बारे में चिंतित हैं ? क्या वे देश की बहुवादी संस्कृति की रक्षा करना चाहते हैं ? मुस्लिम समुदाय में भी कई ऐसे नेता हैं जो पुराने अनुभवों को भुला कर एक नयी शुरुआत, एक नया संवाद शुरू करना चाहते हैं। क्या यह संभव है ?
मोदी,आरएसएस के प्रशिक्षित प्रचारक हैं,जिन्हें डेप्युटेशन पर भाजपा में भेजा गया है। उनकी विचारधारा क्या है, वे यह कई बार साफ कर चुके हैं। लोकसभा के 2014 चुनाव के प्रचार के दौरान उन्होंने कहा था कि वे जन्म से हिन्दू हैं और राष्ट्रवादी हैं, इसलिए वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं! वे समय.समय पर आरएसएस के मुखिया से विचार.विनिमय करते रहते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि दोनों के बीच कुछ मामूली मतभेदों के बावजूद, संघ ही भाजपा की नीतियों का अंतिम निर्धारक है। गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर, मोदी ने उनकी राजनीति की प्रकृति एकदम स्पष्ट कर दी थी। उनके मुख्यमंत्रित्वकाल में गुजरात को 'हिन्दू राष्ट्र की प्रयोगशाला' कहा जाता था। उन्होंने गुजरात कत्लेआम को औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए न्यूटन के क्रिया.प्रतिक्रिया, के गतिकी के तीसरे नियम का हवाला दिया था। दंगों के बाद पीडि़तों के लिए स्थापित राहत शिविरों को बहुत जल्दी बंद कर दिया गया और मोदी ने उन्हें 'बच्चे पैदा करने वाली फैक्ट्रियां' बताया था।
दंगों के फलस्वरूप, गुजरात के समाज का सांप्रदायिक आधार पर जो ध्रुवीकरण हुआ, उसकी मदद से मोदी ने लगातार तीन चुनावों में विजय हासिल की। दंगों के घाव भरने और दोनों समुदायों के बीच सौहार्द कायम करने की इस बीच कोई कोशिश नहीं हुई। अल्पसंख्यक अपने मोहल्लों में सिमटते गए। अहमदाबाद का मुस्लिम.बहुल जुहापुरा इलाका, मोदी की बाँटनेवाली राजनीति का प्रतीक है। जिन लोगों ने निर्दोषों का खून बहाया था उन्हें महत्वपूर्ण पदों से नवाजा गया। मायाबेन कोडनानी को मंत्री पद मिला। उस दौर में फर्जी मुठभेड़ें आम थीं और इन्हें अंजाम देने वालेए सत्ता के गलियारों में सम्मान की दृष्टि से देखे जाते थे। धीरे.धीरे मोदी ने अपनी भाषा और अपने शब्दों को 'स्वीकार्य' स्वरुप देना शुरू किया। वे हिंदुत्व के जिस अतिवादी संस्करण के प्रणेता थे, उसे 'मोदित्व' कहा जाने लगा। 
सन 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान, एक ओर तो वे विकास की बातें करते रहे तो दूसरी ओर बड़ी चतुराई से सांप्रदायिक सन्देश भी देते रहे। उन्होंने बीफ के निर्यात की निंदा की और उसे 'पिंक रेवोल्यूशन' बताया। इसका उद्देश्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों को बीफ से जोड़ना था। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि असम की सरकारए बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसाहट के लिए वहां पाए जाने वाले एक सींग वाले गेंडों को मार रही है। यह बांग्लाभाषी मुसलमानों पर हमला था। उन्होंने यह भी कहा कि बांग्लाभाषी मुसलमानों को 16 मई को . जिस दिन वे देश के प्रधानमंत्री बन जायेंगे . अपना बोरिया.बिस्तर लपेटने के लिए तैयार रहना चाहिए। यह साम्प्रदायिकता फैलाने का खुल्लमखुल्ला प्रयास था। भाजपा के प्रवक्ता लगातार यह कहते रहे हैं कि बांग्लाभाषी हिन्दू शरणार्थी हैं और मुसलमान, घुसपैठिये। सन्  2014 का चुनाव अभियान मोदी के नेतृत्व में चलाया गया था। उनके चेले अमित शाह ने मुजफ्फरनगर का 'बदला' लेने की बात कही तो गिरिराज सिंह ने फरमाया कि जो मोदी के विरोधी हैं, उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए।
आरएसएस ने पिछले ;2014 चुनावों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी ताकि प्रचारक मोदी प्रधानमंत्री बन सकें। सत्ता में आने के बादए परोक्ष व अपरोक्ष ढंग से ऐसे कई सन्देश दिए गए जिनसे विभाजनकारी राष्ट्रीयता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता जाहिर होती थी। आरएसएस से सम्बद्ध विभिन्न संगठन, जो अलग.अलग तरीकों और रास्तों से संघ के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए काम करते हैं, आक्रामक होने लगे और उनकी गतिविधियों में तेजी आई। चर्चों और मस्जिदों पर हमले बढ़ने लगे। दक्षिणपंथी ताकतों को यह लगने लगा कि चूंकि अब देश में उनकी सरकार है इसलिए वे चाहे जो करें, उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मोदी के शासनकाल के पहले छह महीनों में मोदी की नाक के नीचे चर्चों पर हमले हुए और वे चुप्पी साधे रहे। उनका मौन तब टूटा जब अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता के महत्व की याद दिलाई।
हाल ;जून 2015 में दिल्ली के पास अटाली में व्यापक हिंसा हुई जहां एक अधबनी मस्जिद को गिरा दिया गया और सैकड़ों मुसलमानों को पुलिस थाने में शरण लेनी पड़ी। इस तरह की घटनाएं देश में जगह.जगह हो रही हैं और इनसे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण मजबूत हो रहा है। गैर.हिन्दुओं पर'हरामजादे' का लेबिल चस्पा करने वाली मंत्री महोदया अपने पद पर बनीं हुई हैं और निहायत घटिया नस्लीय टिप्पणी करने वाले भी सत्ता के गलियारों में काबिज हैं। हिन्दुत्व के प्रतीक सावरकर और गोड़से का महिमामंडन किया जा रहा है और बहुवाद के पैरोकार नेहरू की या तो निंदा की जा रही है या उनके महत्व को कम करके बताया जा रहा है। गांधीजी को 'सफाईकर्मी' बना दिया गया है और हिन्दू.मुस्लिम एकता के उनके मूल संदेश को दरकिनार कर दिया गया है। केन्द्र सरकार के संस्थानों में ऐसे लोगों को चुन.चुनकर पदस्थ किया जा रहा है जो पौराणिकता और इतिहास में कोई भेद नहीं करते और जातिप्रथा को उचित ठहराते हैं। इनमें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के नए अध्यक्ष प्रोफेसर सुदर्शन राव शामिल हैं। आरएसएस से जुड़ी शैक्षणिक संस्थाएं सरकार को यह बता रही हैं कि शिक्षा नीति क्या होनी चाहिए और स्कूलों में बच्चों को क्या पढ़ाया जाना चाहिए। हिन्दू संस्कृति को राष्ट्रीय संस्कृति का दर्जा देने की कोशिश हो रही है।
मुस्लिम समुदाय की वास्तविक आवश्यकताएं क्या हैं? उन्हें प्रधानमंत्री से असल में क्या कहना चाहिए? उन्हें सबसे पहले ऐसी नीतियों की जरूरत है जिससे उनमें सुरक्षा का भाव उत्पन्न हो। पिछले तीन दशकों में हुई व्यापक और क्रूर हिंसा ने इस समुदाय पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाला है। हिंसा के अलावा, मुसलमानों के प्रति घृणा का वातावरण बनाया गया और सामूहिक सामाजिक सोच को इस तरह से तोड़ा.मरोड़ा गया जिससे विघटनकारी विचारधारा को बढ़ावा मिले और मुसलमानों पर निशाना साधा जा सके। और यह सब करने के बादए पीडि़त समुदाय को ही हिंसा का जनक और कारण बताया जाता रहा है! अल्पसंख्यकों के खिलाफ तरह.तरह के दुष्प्रचार हुए और इसके लिए सोशल मीडिया का जमकर उपयोग हुआ। जब तक मुसलमानों के खिलाफ समाज में व्याप्त गलत धारणाएं दूर नहीं की जाएंगी तब तक साम्प्रदायिक हिंसा पर रोक लगाना संभव नहीं होगा।
इस तरहए पूरी व्यवस्था का ढांचागत हिन्दुत्वीकरण किया जा रहा है और बहुवाद, जो कि भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का केन्द्रीय तत्व था, की कीमत पर सावरकर.गोलवलकर की विचारधारा का प्रसार किया जा रहा है।
मुसलमानों के लिए दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा है आर्थिक दृष्टि से उनका हाशिए पर पटक दिया जाना। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि एक मुस्लिम युवक जीशान अली खान को खुल्लमखुल्ला यह कह दिया गया कि उसके धर्म के कारण उसे नौकरी नहीं दी जा सकती और एक मुस्लिम लड़की मिशाब कादरी को उसका घर खाली करने के लिए कहा गया क्योकि वह एक धर्म विशेष में आस्था रखती थी। 'सबका साथ सबका विकास' केवल नारा रह गया है और जैसा कि मोदी के सिपहसालार अमित शाह ने किसी और संदर्भ में कहा था, वह केवल एक जुमला था। किसी भी विविधतापूर्ण समाज में वंचित समुदायों की बेहतरी के लिए सकारात्मक कदम उठानाए समाज और राज्य की जिम्मेदारी है। जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने मुस्लिम विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति प्रदान करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा भिजवाई गई धनराशि को लौटा दिया था। सच्चर समिति की सिफारिशों की तो अब कोई चर्चा ही नहीं करता। जाहिर है कि 'सबका विकास' इस सरकार के लक्ष्यों में कतई शामिल नहीं है।
मुसलमानों का एक तबका यह तर्क दे रहा है कि मोदी का 'हृदय परिवर्तन' हो गया है और अब वे अपनी पार्टी के सांप्रदायिक तत्वों को दबाने की कोशिश कर रहे हैं और आरएसएस की बात सुनना उनने कम कर दिया है। यह भ्रम जानबूझकर फैलाया जा रहा है और इसे फैलाने वालों में ज़फर सरेसवाला और एसएम मुश्रिफ जैसे लोग शामिल हैं। ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब संघ परिवार का कोई न कोई नेता राममंदिर के निर्माण की मांग या धार्मिक अल्पसंख्यकों का अपमान न करे। और यह सब बहुत योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा है। घरवापसी और लवजिहाद के नाम पर भी सांप्रदायिकता की आग को सुलगाए रखने की कोशिश हो रही है। जो लोग'हृदय परिवर्तन' की बात कर रहे हैं वे यह नहीं जानते कि आरएसएस द्वारा प्रशिक्षित स्वयंसेवक और प्रचारक, विचारधारा की दृष्टि से कितने कट्टर होते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे व्यक्ति ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद यह कहा था कि वे आरएसएस के स्वयंसेवक पहले हैं और प्रधानमंत्री बाद में।
कुछ आरएसएस समर्थक मुस्लिम नेता, मोदी के साथ जाना चाहते हैं और मोदी ने उन्हें वायदा किया है कि वे उनके लिए आधी रात को भी उपलब्ध रहेंगे। इन लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि एहसान जाफरी के साथ क्या हुआ था। वे मोदी से सहायता की भीख मांगते रहे परंतु मोदी शायद बहरे हो गए थे। जाफरी को क्रूरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया। मोदी जहां थे, जाफरी उससे थोड़ी ही दूरी पर थे और उस समय आधी रात नहीं हुई थी।
समाज के अन्य वंचित वर्गों की तरह, मुस्लिम समुदाय को भी यह चाहिए कि वह जागे, आत्मचिंतन करे और बहुवाद व प्रजातंत्र के मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष करे। मुस्लिम समुदाय को प्रजातांत्रिक ढंग से आंदोलन चलाने होंगे ताकि समुदाय के सदस्यों के नागरिक अधिकार सुरक्षित रह सकें। मूलाधिकारों के उल्लंघन का कड़ाई से विरोध किया जाना चाहिए। इस मामले में वे अंबेडकर से प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं जिन्होंने प्रजातांत्रिक रास्ते पर चलकर दलितों की बेहतरी के लिए काम किया। मुस्लिम समुदाय को चाहिए कि वो गांधी और मौलाना आजाद की राह पर चले, जो विविधता का अपनी दिल की गहराई से सम्मान करते थे न कि केवल दिखावे के लिए। मुसलमानों के लिए बिछाए जा रहे जाल में उन्हें नहीं फंसना चाहिए। खोखले शब्दों की जगह उन्हें संबंधित व्यक्तियों के कार्यों और उसकी विचारधारा पर ध्यान देना चाहिए।
-राम पुनियानी

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

धर्म, राजनीति और समाज

धर्म का राजनीति से क्या लेनादेना है? धर्म और हिंसा का क्या संबंध है? वर्तमान समय में, विभिन्न राजनैतिक एजेण्डे कौनसा रूप धर कर हमारे सामने आ रहे हैं?
ऐसा लगता है कि राजनीति ने धर्म का चोला ओड़ लिया है और यह प्रवृत्ति दक्षिण व पष्चिमएशिया में अधिक नजर आती है। अगर हम पिछले कुछ दशकों की बात करें तो धर्म की राजनीति में घुसपैठ की शुरूआत हुई ईरान में अयातुल्लाह खुमैनी के सत्ता में आने के साथ। इसके पहले, मुसादिक की सरकार का तख्ता पलट दिया गया था। मुसादिक, सन् 1953 में प्रजातांत्रिक रास्ते से ईरान के प्रधानमंत्री चुने गए थे। उन्होंने देश  के कच्चे तेल के भंडार का राष्ट्रीयकरण कर दिया, जो, पष्चिम विशेष कर अमरीकी बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियों को पसंद नहीं आया क्योंकि इससे उनका मुनाफा प्रभावित हो रहा था। मुसादिक सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद, अमरीका के पिट्ठू शाह रजा पहलवी को सत्ता सौंप दी गई। इसके बाद हुई एक क्रांति के जरिये अयातुल्लाह खुमैनी सत्ता में आए। खुमैनी और उनके साथी कट्टरवादी इस्लाम के झंडाबरदार थे। उनके सत्ता में आने से पष्चिमी मीडिया में हलचल मच गई और इस्लाम को ‘आने वाले समय का सबसे बड़ा खतरा’ बताया जाने लगा। जहां तक दक्षिण एशिया का सवाल है, पिछले कुछ दशकों में भारत में हिंदू धर्म की पहचान की राजनीति परवान चढ़ी और पाकिस्तान में जिया-उल-हक ने राजनीति का इस्लामीकरण किया। इस्लाम की मौलाना मौदूदी की व्याख्या का इस्तेमाल, जिया-उल-हक ने अपनी सत्ता को मजबूती देने के लिए किया। इसके कुछ समय बाद, म्यंामार में अशिन विरथू जैसे लोगों का उदय हुआ, जिसे बर्मा का बिन लादेन कहा जाने लगा। श्रीलंका में बौद्ध पुरोहित वर्ग ने धर्म के नाम पर राजनीति में घुसपैठ शुरू कर दी। इसी दौर में अमरीका में ईसाई कट्टरवाद का बोलबाला बढ़ा।
न्यूयार्क के डब्ल्यूटीसी टाॅवर पर 9/11 के हमले के बाद, अमरीकी मीडिया ने ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द गढ़ा। इसके जरिये इस्लाम को आतंकवादी हिंसा के कीचड़ में घसीट लिया गया। तब से लेकर आज तक यह आम धारणा बनी हुई है-बल्कि मजबूत हुई है-कि इस्लाम और मुसलमान, आतंकवादी हिंसा की जड़ में हैं। इस्लाम का राजनीति मे उपयोग और कुछ सिरफिरे लोगों द्वारा अपने हितों की रक्षा के लिए इस्लाम के नाम का इस्तेमाल करने के कारण इस धारणा को मजबूती मिली और पूरी दुनिया में मुसलमानों की छवि खराब हुई।
लगभग सभी धर्म, अपने-अपने संदर्भों में, मानवतावाद की बात करते हैं परंतु न जाने क्यों, धर्मों के दर्शनिक पक्ष की बजाए उनके रीतिरिवाज, सामुदायिक कार्यक्रम और पुरोहित वर्ग उनकी पहचान बन गए और अब भी बने हुए हैं।
सामंती, प्राक्-औद्योगिक समाज में पुरोहित वर्ग और सत्ताधारियों के बीच गठजोड़ हुआ करता था। पुरोहित वर्ग ने ही इस अवधारणा को प्रस्तुत किया कि राजाओं को शासन करने का दैवीय अधिकार है। यूरोप में राजा और पोप हमराही हो गए, इस्लामिक दुनिया के बड़े हिस्से में नवाब और शाही इमाम में दोस्ती हो गई और हिंदू धर्म के प्रभाव वाले क्षेत्रों में राजा और राजगुरू एक साथ खड़े दिखने लगे। इस गठजोड़ का लाभ यह हुआ कि शासक अब अधिक से अधिक सत्ता अपने हाथों में  केंद्रित करने के लिए धर्म का इस्तेमाल कर सकते थे। आश्चर्य  नहीं कि राजाओं ने अपनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को धार्मिक आधार पर औचित्यपूर्ण ठहराना शुरू कर दिया। अगर कोई ईसाई राजा अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था तो उसके लिए किए जाने वाले युद्ध को वह ‘क्रूसेड’ बताता था। इसी तरह, मुस्लिम राजा कभी युद्ध नहीं करते थे, वे हमेशा  जिहाद करते थे। हिंदू राजाओं की हर लड़ाई धर्मयुद्ध हुआ करती थी।
जिन देशों में धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया शुरू हो गई और समाज पर सामंती-पुरोहित वर्ग का शिकंजा ढीला हो गया, वहां धर्म को उसके दायरे में सीमित कर दिया गया। धर्म, हर व्यक्ति का व्यक्तिगत मसला है, यह मान्यता पुष्ट हुई। राज्य सभी नागरिकों को समान दर्जा देने लगा, चाहे उनकी धार्मिक आस्था कुछ भी हो। इसके विपरीत, दक्षिण एशिया  में या तो  धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया शुरू ही नहीं हुई और या फिर अधूरी रह गई। जमींदारों और पुरोहितों के अस्त होते वर्गों ने जोरशोर से धर्म के नाम पर राजनीति शुरू कर दी। भारत में हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिक धाराएं उभरीं, जिनको बढ़ावा दिया राजाओं, नवाबों और जमींदारों के एक तबके ने। बाद में शिक्षित मध्यम वर्ग के कुछ लोग भी इन धाराओं का हिस्सा बन गए। हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवादी उभरे, जिनका नेतृत्व जिन्ना, सावरकर व गोलवलकर जैसे उच्च शिक्षित श्रेष्ठी वर्ग के सदस्यों के हाथों में था। इन सांप्रदायिक धाराओं ने हमारे औपनिवेषिक षासकों को उनकी ‘‘फूट डालो और राज करो’’ की नीति को लागू करने में मदद की। औपनिवेशिक ताकतें, जो शनैः शनैः साम्राज्यवादी ताकतें बनती जा रही थीं, का आर्थिक प्रभुत्व बनाए रखने में सांप्रदायिक ताकतों ने उनकी मदद की। इसके विपरीत, मौलाना अबुल कलाम आजाद और मोहनदास करमचंद गांधी जैसे नेता, धार्मिक होते हुए भी धर्मनिरपेक्ष राज्य और समाज के हामी थे। सांप्रदायिक धाराएं जहां दूसरे समुदायों के विरूद्ध विष वमन करती थीं वहीं ये नेता सभी धर्मों को साथ लेकर चलने की नीति में विष्वास रखते थे और उस पर अमल भी करते थे।
समय के साथ दक्षिण एषिया में सांप्रदायिक हिंसा ने भयावह रूप धारण कर लिया है। भारत में वह हिंदू धर्म का चोला ओढ़े है तो बांग्लादेश और पाकिस्तान में इस्लाम का। श्रीलंका और म्यांमार में वह बौद्ध धर्म के वेश में है। इस हिंसा का राजनैतिक लक्ष्य और एजेंडा है प्राक्-आधुनिक सामंतवादी मूल्यों को आधुनिक कलेवर में समाज पर लादना। जाति और लैंगिक पदानुक्रम के सामंती मूल्यों को मजबूती देने के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जाता है जो आधुनिक मालूम होती है। कई बार समकालीन संदर्भों के अनुरूप इन मूल्यों में थोड़े-बहुत परिवर्तन भी कर लिए जाते हैं।
धर्म के नाम पर हिंसा के संदर्भ में इस्लाम को सबसे ज्यादा बदनाम किया गया है। जहां खोमैनी के बाद इस्लाम को दुनिया के लिए नया खतरा बताया गया, वहीं 9/11 के बाद खुलकर, इस्लामिक आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल होने लगा। समय के साथ अलकायदा उभरा जो मध्य व पष्चिम एशिया में आतंकवादी हिंसा की अधिकतर वारदातों के पीछे था। बोको हरम, आईसिस और अलकायदा की तिकड़ी, इस्लामिक पहचान को केंद्र में रखकर वीभत्स हिंसा कर रही है। यह प्रक्रिया शुरू हुई थी अफगानिस्तान में सोवियत सैनिकों को काफिर बताकर उन पर हमला करने के आह्वान से। अब हालत यह है कि मुसलमानों का एक पंथ ही दूसरे पंथ के सदस्यों को काफिर बता रहा है और अत्यंत क्रूर व दिल दहलाने वाले तरीकों से लोगों की जान ली जा रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस तिकड़ी द्वारा जिन लोगों की जान ली गई है, उनमें से सबसे ज्यादा मुसलमान ही हैं।
अलकायदा के उभार के पीछे कई कारक थे। इनमें से एक था जिया-उल-हक द्वारा पाकिस्तान का इस्लामीकरण। जिया-उल-हक ने पाकिस्तान में ऐसे मदरसों की स्थापना की, जिनका इस्तेमाल युवाओं के दिमाग में जहर भरने के लिए किया जाने लगा। सउदी अरब से इस्लाम के वहाबी संस्करण का आयात कर लिया गया। वहाबियों की यह मान्यता है कि शासक, ईश्वर का प्रतिनिधि होता है। इस्लाम के इस संस्करण के अनुसार, जो उनसे सहमत नहीं है, वह काफिर है और काफिर की जान लेना पवित्र जिहाद है। जो लोग इस जिहाद में मारे जाते हैं उन्हें जन्नत नसीब होती है। अलकायदा के खूनी अभियान को सबसे
अधिक मदद अमरीका से मिली, जिसने लगभग 800 करोड़ डाॅलर और 7000 टन असला अलकायदा को उपलब्ध करवाया। कैंसर की तरह अलकायदा धीरे-धीरे पूरे दक्षिण एशिया में फैल गया और उसे उखाड़ फेंकना मुष्किल होता गया।
तो अब हमारे सामने आगे की राह क्या है? अलग-अलग काल में धर्म की अलग-अलग भूमिका रही है। हमें धर्मों की संत परंपरा को पुनर्जीवित करना होगा। हमें लोगों को यह बताना होगा कि धर्म एक नैतिक षक्ति है और धर्म के नाम पर हिंसा किसी भी स्थिति में जायज़ नहीं है। और यह भी कि धर्म के नाम पर की जा रही हिंसा का असली उद्देष्य पुरातनपंथी मूल्यों को समाज पर लादना है। धार्मिक विद्वानों और अध्येताओं को धर्मों के नैतिक पक्ष पर जोर देना चाहिए और लोगों को पहचान से जुड़े मुद्दों और बाहरी आडंबर से दूर रहने की सलाह देनी चाहिए।
-राम पुनियानी

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

दादा गजेन्द्र सिंह समाज के हर वर्ग के प्रेरणा दायक


  बाराबंकी। पूर्व विधायक, समाज सुधारक स्व0 गजेन्द्र सिंह की प्रथम पुण्य तिथि के अवसर पर पूर्व अध्यक्ष जिला बार एसोसिएशन बृजेश दीक्षित की अध्यक्षता में गांधी भवन देवां रोड पर एक स्मृति सभा का आयोजन किया गया।
    कार्यक्रम का प्रारम्भ महन्त गुरूशरण दास ने स्व0 गजेन्द्र सिंह के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धासुमन पेश करते हुए किया।
    इस अवसर पर अपने संबोधन में बृजेश दीक्षित ने कहा कि दादा गजेन्द्र सिंह समाज के हर वर्ग के प्रेरणा दायक थे। उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि उनके विचारों का अनुसरण करने में ही है।
    गांधी वादी विचारक एवं गांधी समारोह ट्रस्ट के अध्यक्ष प0 राजनाथ शर्मा ने पूर्व विधायक को अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कहा कि उनका जीवन एक सच्चे एवं निर्भीक इंसान के जीवन की अभिव्यक्ति थी और गांधी समारोह ट्रस्ट के वह संस्थापक सदस्य थे और उन्हीं की प्रेरणा से ट्रस्ट द्वारा अनेको कार्यक्रम सम्पन्न कराए गए।

    वरिष्ठ पत्रकार हशमतउल्ला ने पूर्व विधायक के जीवन व उनके कार्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वह बहुआयामी व्यक्तित्व के मालिक थे। एक ओर जहां वह एक निर्भीक व बेबाक राजनेता थे तो वहीं उर्दू व हिन्दी साहित्य के प्रेमी थे, उन्हें यदि रामायण की चौपाइयों , गीत, श्लोक व प्रमुख कवियों की कविताएं कठस्थ थी तो वहीं उर्दू के ऐसे नायाब अशआर याद थे जो किसी ने कभी सुने भी न हों।
    फखरूद्दीन अली अहमद कमेटी के पूर्व चेयरमैन निहाल रिजवी ने दादा गजेन्द्र सिंह के साथ बिताए गए अपने समय का स्मरण करते हुए कहा कि जिले में राजनीति की युवा पीढ़ी को तैयार करने में दादा की अहम भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि वह एक निर्भीक राजनेता थे और आम आदमी के सरोकारो के पैरोकार थे।
    जिला उपभोक्ता फोरम के पूर्व सदस्य हुमायू नईम खां ने दादा गजेन्द्र सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि वह अपने आदर्शों से कभी समझौता न करने वाले इंसान थे और सामाजिक समस्याओं के प्रति उनकी संवेदनाओं ने सदैव उन्हें आम इंसानों के करीब रखा।
    वरिष्ठ प्रवक्ता जवाहर लाल नेहरू परास्नातक महाविद्यालय डा. राजेश मल्ल ने अपने संबोधन में कहा कि दादा गजेन्द्र सिंह ने राजनीति में अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के प्रवेश पर वह सदैव चिन्तित रहे और इसका विरोध करने के दृष्टिकोण से ही वह काफी समय तक एक राज्यमंत्री द्वारा राष्ट्रीय ध्वजारोहण किए जाने के खिलाफ अपनी आवाज बुलन्द करते हुए अपनी गिरफ्तारी देते रहे।
    इस अवसर पर पवन कुमार वैश्य, बृजमोहन वर्मा, डा. उमेश चन्द्र वर्मा, डा. एस.एम. हैदर, प्राचार्य रामस्वरूप यादव, पूर्व विधायक शिवकरन सिंह, हरिशरण दास, राकेश कुमार सिंह, दिलीप गुप्ता एडवोकेट, उपेन्द्र सिंह, श्रीमती नीरज सिंह, अजय सिंह, प्रशान्त मिश्र, सुरेन्द्र नाथ मिश्र, हरि गुप्ता, राजेन्द्र बहादुर सिंह, पुष्पेन्द्र कुमार सिंह, सलाम मोहम्मद, विजय प्रताप सिंह, आनंद सिंह, अरविन्द वर्मा, गनेश सिंह, धीरेन्द्र सिंह, राजेश्वर दयाल बाजपेयी, मेराज अहमद ने भी अपने विचार रखते हुए दिवंगत राजनेता  को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
    कार्यक्रम के अंत में रणधीर सिंह सुमन ने आए हुए सभी आगुन्तकों के प्रति अपना आभार व्यक्त किया।



रणधीर सिंह सुमन
एडवोकेट
जिला-बाराबंकी

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

विदेशी धन का यह फंदा काटना ही होगा -2

  1. राजनीति में विदेशी निवेश
आम आदमी पार्टी का बनना अचानक या अस्वाभाविक घटना नहीं है। किशन पटनायक ने एक जगह आक्रोश में कहा है कि जब देश में विदेशी धन से सब हो रहा है, पेड़ तक विदेशी धन से लग रहे हैं, तो अमुक क्षेत्र में विदेशी निवेश क्यों नहीं होगा? आज वे होते तो कहते कि विदेशी धन से चलने वाले एन.जी.ओ. जब समाज, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, मानवाधिकार, नागरिक अधिकार, लोकतंत्र
सुधार/संवर्द्धन आदि का काम बड़े पैमाने पर करते हैं तो राजनीति क्यों नहीं करेंगे? एन.जी.ओ. पूँजीवादी व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं जो उसके विरोध की राजनैतिक संभावनाओं को खत्म करते हैं। वे बताते हैं कि पूँजीवादी व्यवस्था अपने में पूर्ण और अंतिम है। अगर किसी समाज में समस्याएँ हैं तो वहाँ के निवासी एन.जी.ओ. बना कर धन ले सकते हैं और उन समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। उसके लिए पूँजीवादी व्यवस्था का विरोध करने की जरूरत नहीं है।
देश में जब सब क्षेत्रों में धड़ाधड़ एन.जी.ओ. काम कर रहे हैं तो राजनीति भी अपने हाथ में लेने की कोशिश करेंगे ही। आखिर सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार समिति (नैक) में कितने एन.जी.ओ. वालों को खपाया जा सकता है? सुनते हैं, केजरीवाल नैक में शामिल होना चाहते थे, लेकिन वहाँ जमे उनके प्रतिद्वंद्वियों ने उनका रास्ता रोक दिया। आखिर आदमी केवल प्रवृत्ति नहीं होता; उसकी अपनी भी कुछ फितरत होती है। मनमोहन सिंह का यह बच्चा रूठ कर कुछ उच्छृंखल हो गया है। उच्छृंखलता ज्यादा न ब़े, इसके लिए कतिपय पालतू बच्चे पार्टी में शामिल हो गए हैं। यह उनका अपना निर्णय है या खुद मनमोहन सिंह मंडली ने उन्हें वहाँ भेजा है, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता है।
एन.जी.ओ. द्वारा कार्यकर्ताओं को हड़पने की समस्या पहले भी रही है। फर्क इतना आया है कि एन.जी.ओ. के जाल में पुराने लोग भी फँसने लगे हैं। यह स्थिति नवउदारवादी व्यवस्था की मजबूती की दिशा में एक और ब़ा हुआ कदम है। इस बीच घटित एक वाकिये को रूपक के रूप में पॄा जा सकता है। 1995 में बनी राजनैतिक पार्टी समाजवादी जन परिषद (सजप) के वरिष्ठ नेता सुनील एक प्रखर विचारक और प्रतिबद्ध समाजवादी कार्यकर्ता हैं। जे.एन.यू. से अर्थशास्त्र में एम.ए. करने के बाद से वे पूर्णकालिक राजनैतिक काम कर रहे हैं। किशन पटनायक द्वारा शुरू की गई ॔सामयिक वार्ता’ का समता संगठन और बाद में सजप के साथ घनिष्ठ संबंध रहा है। किशन जी के रहते ही यह पत्रिका अनियमित होने लगी थी जिसकी उन्हें सर्वोपरि चिंता थी।
उनके बाद पत्रिका के संपादक बने साथी ने उसे अपना प्राथमिक काम नहीं बनाया। जबकि संपादकी की जिम्मेदारी लेने वाले किसी भी साथी को उसे अपना प्राथमिक काम स्वीकार करके ही वैसा करना चाहिए था। इस दौरान पत्रिका की नियमितता पूरी तरह भंग हो गई। अब पिछले दोतीन महीने से सुनील उसे केसलाइटारसी से निकालने और फिर से जमाने की कोशिश कर रहे हैं। सुनील राजनीति करने वाले थे और संपादक बने साथी फोर्ड फाउंडेशन से संबद्ध हैं। अब सुनील पत्रिका निकाल रहे हैं और राजनीति करने का काम किशन जी के बाद संपादक बने साथी ने सँभाल लिया है। सजप के भीतर यह फेरबदल होता तो उतनी परेशानी की बात नहीं थी। उनका मन बड़ा है! वे केजरीवाल की नई पार्टी की राजनीति कर रहे हैं। कह सकते हैं, जो जहाँ का होता है, अंततः वहीं जाता है। लेकिन इस नाटक में बड़ी मशक्कत से खड़े किए गए एक संगठन और उससे जुड़े नवउदारवाद
विरोधी संघर्ष का काफी नुकसान हुआ है। कहना न होगा कि इससे किशन पटनायक की प्रतिष्ठा को भी धक्का लगा है। आप समझ गए होंगे हम साथी योगेंद्र यादव की बात कर रहे हैं। हमने इस प्रसंग को रूपक के बतौर रखा है, जिसमें सुनील और योगेंद्र व्यक्ति नहीं, दो प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं।
साम्राज्यवाद की सगुणता के कई रूप हैं। विदेशी धन उनमें शायद मूलभूत है। पूरी दुनिया में बिछा बहुराष्ट्रीय कंपनियों और एन.जी.ओ. का फंदा उसीसे मजबूती से जुड़ा है। विदेशी
धन, चाहे कर्ज में आया हो चाहे खैरात में, वह खलनायक है जो हमारे संसाधनों, श्रम और रोजगार को ही नहीं लूटता, स्वावलंबन और स्वाभिमान का खजाना भी लूट लेता है। उसके बाद कितना भी तिरंगा लहराया जाए, देशभक्ति के गीत गाए जाएँ, न स्वावलंबन बहाल होता है न स्वाभिमान। केवल एक झूठी तसल्ली रह जाती है। सोवियत संघ के विघटित होने के बाद यह प्रकाश में आया कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को वहाँ से कितना धन मिलता था। उस समय गुरुवर विश्वनाथ त्रिपाठी ने हम से बगैर पूछे ही कहा कि ॔क्या हुआ, धन क्रांति करने के लिए लिया था।’ सवाल है कि अगर लिया था तो क्रांति का क्या हुआ? एक दौर के प्रचंड समाजवादी जॉर्ज फनारंडीज पर आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने सोशलिस्ट इंटरनेशनल से धन लिया। वे भी सोचते होंगे कि उन्होंने धन समाजवादी क्रांति करने के पवित्र उद्देश्य के लिए लिया है। आज वे कहाँ हैं बताने की जरूरत नहीं। विदेशी धन का यह फंदा काटना ही होगा।
नई पार्टी ने स्वराज लाने की बात कही है। लेकिन वह झाँसा ही है। एन.जी.ओ. वाले कैसे और कैसा स्वराज लाते हैं उसका जिक्र हमने ॔भ्रष्टाचार विरोध : विभ्रम और यथार्थ’ शीर्षक ॔समय संवाद’ में किया है जो अब इसी नाम से प्रकाशित पुस्तिका में उपलब्ध है। अब दोनों ही बातें हैं। नुकसान की भी और फायदे की भी। फायदे की बात पर ध्यान देना चाहिए। जो इस नवउदारवादी प्रवाह में शामिल नहीं हुए, उनकी समझ और रास्ते अब ज्यादा साफ होंगे। जो शामिल हुए, लेकिन लौट आए, यह अफसोस करना छोड़ दें कि कितनी बड़ी ऊर्जा बेकार चली गई! ऊर्जा कभी बेकार नहीं जाती। वह जिस काम के लिए पैदा हुई थी, वह काम काफी कुछ कर चुकी है और आगे करेगी। साथी अपना काम इस बार ज्यादा ध्यान से करें। उनके पास यह ताकत कम नहीं है कि वे बदलाव नहीं कर पा रहे हैं तो कम से कम देश की बदहाल आबादी के साथ धोखाधड़ी नहीं कर रहे हैं।
लोग राजनीति को कहते हैं, हमारा मानना है कि मानव जीवन ही संभावनाओं का खेल है। यह भी हो सकता है मोहभंग हो और नई पार्टी से कुछ लोग बाहर आएँ। जीवन में सीख की बड़ी भूमिका होती है। उससे नवउदारवाद विरोधी आंदोलन को निश्चित ही ज्यादा बल मिलेगा। 
-प्रेम सिंह

रविवार, 30 सितंबर 2012

क्या समाज में अमीरी -- गरीबी दैवीय प्रतिफल है ?



आधुनिक समाज में
अमीरी की सीढियों पर लोगो को चढ़ते देखकर कोई भी समझ सकता है की यह न तो किसी दैवीय शक्ति का प्रतिफल है , न ही किसी धनाढ्य बने व्यक्ति के स्वंय के मेहनत -- मशक्कत का परिणाम आम तौर पर लोग यह कहते हुए मिल जायेंगे की समाज में मौजूद  अमीरी -- गरीबी  सदा से चली आ रही है और वह चलती रहेगी |वह कभी खत्म नही होगी | समाज  में इस मान्यता को सदियों से स्थापित करने करनमें समाज के धनी  -- मानी लोगो और हुकुमतो के साथ -- साथ धार्मिक गुरुओं ,विद्वानों व धार्मिक लीडरो का भी हाथ रहा है | क्योंकि दुनिया के सभी धर्मोमें समाज में किसी व्यक्ति या वर्ग के अमीर या साधन सम्पन्न होने तथा
दूसरे व्यक्ति या वर्ग के गरीब व साधनहीन होने की धार्मिक मान्यता मिली हुईहै | यह धार्मिक मान्यता यह स्वीकार करती है कि , अमीरी -- गरीबी ईश्वर की बनाई हुई है | वह जिसे चाहता है अमीर बना देता है , जिसे चाहता है गरीब  बना देता है | हिन्दू धर्म में इसे ईश्वर द्वारा दिया गया पूर्व जन्म के  कर्मो का सुफल या कुफल माना जाता है | तो इस्लाम में उसे खुदा की मर्जी का प्रतिफल मान जाता है | कमोवेश यही स्थिति बाकी धर्मो की है |
वर्तमान 
जनतांत्रिक समाज के विद्वान् , बुद्धिजीवी व अर्थशास्त्री आमतौर पर इन धार्मिक अवधारणाओ का खण्डन नही करते | लेकिन वे अर्थशास्त्रीय पाठो व  प्रचारों में किसी के अमीर होने को उसके उद्यम , क्रियाशीलता और हिम्मत का परिणाम बताते रहते है | इन धार्मिक व अर्थशास्त्रीय अवधारणाओ के फलस्वरूप  वर्तमान समाज में आमतौर पर अमीरी को भाग्य , कर्मठता और दूरदर्शिता आदि का  परिणाम मानने के साथ -- साथ गरीबी को भाग्यहीनता अकर्मण्यता अदुर्द्र्शिता  आदि का परिणाम मान लिया जाता है |
जनसाधारण में आधुनिक युग की बुनियाद  आर्थिक गतिविधियों के बारे में आम तौर पर फैली अज्ञानता और उपर से धनाढ्य वर्गो द्वारा चलाए जाते रहे पाठ -- प्रचार समाज में अमीरी -- गरीबी के बटवारे को न्याय संगत तथा आवश्यक साबित करते रहते है | उदाहरण -- '' अमीरी  -- गरीबी दोनों के बिना समाज की गाडी नही चल सकती '' दोनों एक दूसरे के विरोधी न होकर पूरक है , जैसे तमाम प्रचार आम समाज में चलते रहते है |
लेकिन यह भी सच है की आधुनिक युग में ऐसे पाठो -- प्रचारों को चलाने --
बढाने का आधार समाज में पहले से ही मौजूद रहा है  समाज में अमीरी -- गरीबी
को हमेशा से मौजूद रहने के साथ उसे दैवीय इच्छा का परिणाम या प्रतिफल मानने
के रूप में यह आधार सदियों से मौजूद रहा है | यह बात एकदम सच है की मध्य
युग के धर्म गुरुओं व धार्मिक रहनुमाओं में विद्यमान यह अवधारणा उस युग की
कही कम विकसित परिस्थितियों के अनुरूप थी | मध्य युग या उससे पहले के युगों
में प्रकृति व समाज की हर घटना को आम तौर पर दैवीय इच्छा के प्रतिफल के
रूप में ही माना व समझा जाता था | खासकर 16  वी शताब्दी से प्रकृति व समाज के
विभिन्न क्षेत्रो में चल रही वैज्ञानिक खोजो , अनुसन्धानो ने सदियों
पुरानी धार्मिक सामाजिक मान्यताओं को एक के बाद दूसरे क्षेत्र से हटाना
शुरू किया | एक के बाद एक एक घटना को दैवीय मानने की जगह उसे प्राकृतिक व
सामाजिक शक्तियों का प्रतिफल समझा व माना  जाने लगा
उदाहरण ---------
1789 में हुई फ्रांसीसी क्रान्ति ने किसी वस्तु व्यक्ति या संस्था आदि को
आँख मुदकर मान्यता देने की जगह हर चीज को तर्क व प्रबुद्धता की कसौटी पर
कसकर समझने व मानने की वैज्ञानिक अवधारणा खड़ी कर दी || फ्रांसीसी क्रान्ति
ने राजा व उसके राज्य को ईश्वरीय सत्ता का अंग मानने की अवधारणा को ही
खारिज कर दिया | साथ ही राजा को  ईश्वर का दूत या पुत्र मानने से भी इनकार
कर दिया | राजा के हितो तथा धर्म के वसूलो  व नियमो के अनुसार राज्य की
स्थापना व संचालन की मान्यता को बलपूर्वक रद्द कर दिया गया | राजशाही के
साथ -- साथ पुरोहित शाही का भी अन्त कर दिया गया | वास्तविक अर्थो में धर्म
-- निरपेक्ष राज्य की स्थापना कर दी गयी | राज्य को राष्ट्र की समस्त जनता
का प्रतिनिधि घोषित कर दिया गया | लेकिन राजा व सामन्ती प्रभुओं की
सम्पत्ति का अन्त करते हुए भी इस दौर की क्रांतियो ने समाज में अमीरी --
गरीबी के बटवारे को नकारा नही ,,  उल्टे उसे नए रूपों में बढावा दिया |
यूरोपीय देशो के जनतांत्रिक क्रांतियो के फलस्वरूप जंहा समाज में आधुनिक
उद्योग  व्यापार के धनाढ्य मालिको का सर्वाधिक साधन सम्पन्न  अल्पसंख्यक
वर्ग खड़ा होता गया वही दूसरी तरफ अपनी श्रमशक्ति बेचकर जीने वाले स्वतंत्र
किन्तु साधनहीन मजदूरों का बहुसंख्यक वर्ग समूह भी खड़ा होता गया | आधुनिक
युग में विश्व के हर देश में आधुनिक विकास के साथ यह प्रक्रिया निरंतर
बढती जा रही है | इसलिए आधुनिक समाज के अगुवा बने धनी -- धनाढ्य हिस्सों और उनके समर्थक राजनितिक व बौद्धिक हिस्सों से समाज में सदियों से विद्यमान अमीरी -- गरीबी घटाने -- मिटाने की कोई बात सुनना व करना एकदम बेमानी है | न ही उनसे समाज में अमीरी -- गरीबी को दैवीय इच्छा का परिणाम या प्रतिफल होने की अवधारणा का खंडन किए जाने की कोई उम्मीद की जा सकती है | उल्टे उनसे अमीरी -- गरीबी के शाश्वत होने और बने रहने की धार्मिक अवधारणाओ का समर्थन करने के साथ उन्हें पुष्ट करने के अर्थशास्त्रीय पाठो -- प्रचारों को चलाने की ही उम्मीद की जा सकती है |
यही काम वो कर रहे है | धनाढ्यो  द्वारा धर्म के उपदेशो -- प्रचारों को बढावा देने का यह एक प्रमुख उद्देश्य है की धर्म -- भीरु जनसाधारण समाज अपनी गरीबी को अपने कर्मो का फल या ईश्वरीय इच्छा मान कर उसे चुपचाप बर्दाश्त करती रहे | पहले के युगों में गुलाम -- मालिको के विरुद्ध गुलामो के संघर्ष से फिर राजशाही , पुरोहितशाही के विरुद्ध मदरसों रियाया तबको एवं अन्य प्रजाजनों के संघर्ष से प्रेरणा लेकर अपनी मुक्ति के लिए आधुनिक धनाढ्य वर्गो के विरुद्ध विद्रोह व संघर्ष न करे | न ही उनके स्वार्थ्साध्क व संरक्षक बने आधुनिक जनतांत्रिक या फिर सामन्ती व मिलिट्री तानाशाही वाले राज्य के विरुद्ध बगावत पर उतरे |
सभी धर्मो के धनाढ्य धार्मिक नेता व धर्मगुरूओ का भी यहीलक्ष्य है | उन्हें मुख्यत: इसी लक्ष्य से समाज में अमीरी -- गरीबी की मौजूदगी को शाश्वत बताने और ईश्वरीय इच्छा का प्रतिफल बताने का काम जरुर करना है | क्योंकि वे महज धर्म गुरु या धर्म के नेता ही नही अपितु धनाढ्य धर्मगुरु या धनाढ्य धार्मिक नेता व प्रवक्ता भी है | पहले के राज -- पुरोहितो की तरह वे आधुनिक युग के धनाढ्य वर्गीय पुरोहित या धर्मगुरु है | जहा तक आम समाज के औसत गरीब धार्मिक नेताओं या धार्मिक प्रवक्ताओ द्वारा समाज में अमीरी -- गरीबी को दैवीय इच्छा बताने का मामला है तो इसमें उनकी अपनी सोच समझ नही , बल्कि जान बुझकर अज्ञानी बने रहने की प्रकृति झलकती है | शायद उन्हें इस बात का डर लगा रहता है की इस अवधारणा का खंडन कर देने से -- धर्म का तथा ईश्वर या खुदा का ही खण्डन हो जाएगा | उनका यही डर और धनाढ्यता के प्रति लगाव उन्हें सच कबूलने व बोलने से रोकती है | हालाकि यह बात आम धर्मवादियों  को भी तथा धर्म भीरु जनसाधारण के लिए भी समझना कत्तई  मुश्किल नही है की धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से भी ईश्वर या खुदा ने '' आदम -- हव्वा '' अथवा '' मनु -- सतरूपा '' के साथ दास -- दासियों को नही भेजा था | अर्थात अमीर व गरीब को उपर से नीचे नही उतारा था | इसलिए उन्हें मानव समाज बनने के धार्मिक कथानको को मानते हुए भी समाज में अमीरी व गरीबी के साधन सम्पन्नता व साधनहीनता के तथा मालिक व कमकर के बटवारे को उत्पादन व उसके साधनों के विकास के साथ -- साथ होते रहे सामाजिक विकास का ही प्रतिफल मानना चाहिए  न की उसे किसी दैवीय शक्ति के इच्छाओं का प्रतिफल माना चाहिए |
फिर इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है की आधुनिक समाज में अमीरी की सीढियों पर लोगो को चढ़ते देखकर कोई भी समझ सकता है की यह न तो किसी दैवीय शक्ति का प्रतिफल है न ही किसी धनाढ्य लोगो द्वारा बहुसंख्यक कमकर समुदाय के श्रमशक्ति के शोषण का अर्थात कमकरो   की श्रमशक्ति से प्राप्त समस्त उत्पादन के एक हिस्से को मजदूरी या वेतन के रूप में देने के बाद शेष समस्त उत्पादन को अपने नाम करते रहने का परिणाम है | साथ ही उसकी धनाढ्यता दुसरो के संसाधनों व उत्पादनों के लूट का भी परिणाम है | इसी का परीलक्षण है की दुनिया के बहुसंख्यक मेहनतक्ष हिस्से दिन रात मेहनत करने के वावजूद अमीर नही बन पाते और अमीर या मालिक बने लोग श्रम नही करते | मालिकाना बढने के साथ -- साथ वे स्वंय श्रम करने से बहुत दूर हो जाते है | साथ ही दुसरो के श्रम पर धनाढ्य एवं उच्च बनने के साथ -- साथ समाज के कामचोर , हरामखोर , मुनाफाखोर वर्ग बनते जाते है | समाज में अमीरी के बनने बढने की यह प्रक्रिया केवल आधुनिक नही है | बल्कि प्राचीन एवं मध्ययुगीन भी है | इस प्रक्रिया के फलस्वरूप ही समाज का धनी व गरीब में बटवारा विभिन्न रूपों एवं चारित्रिक विशेषताओं के साथ बढ़ता रहा है | इसलिए गरीबी व साधनहीनता  की दिशा में बढ़ते हुए  जनसाधारण को तथा आम समाज में रह रहे  साधारण धार्मिक गुरुओ धार्मिक नेताओं को कम से कम बात जरुर खारिज कर देना चाहिए की समाज का अमीरी -- गरीबी का बटवारा किसी दैवीय शक्ति का प्रतिफल है | साथ ही उन्हें इस धार्मिक अवधारणा को धनाढ्यो की शोषण लूट से बढती रही धनाढ्यता को न्याय संगत बताने वाला एक पर्दा व हथकंडा भी घोषित कर देना चाहिए |

- सुनील दत्ता
09415370672

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

इज्जतदार जिंदगी की चाहत-2


विस्थापन से रोजी का एक स्थायी संकट पैदा होता है क्योंकि विस्थापन मनुष्य को उन परिस्थितियों से दूर करता है जिनमें वह अपने ज्ञान का इस्तेमाल करके अपनी रोजी चला रहा होता है। इसके अलावा एक सामाजिक संकट भी पैदा होता है क्योंकि वह या तो अपने समुदाय से अलग कर दिया जाता है या फिर पूरा समुदाय ही विस्थापित हो जाता है। यानी विस्थापन के बेहद दूरगामी आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं दार्शनिक नतीजे होते हैं। गरीब होने के चलते उसे कोई सक्षम नया ज्ञान हासिल करने का मौका नहीं मिलता है और वह सस्ती मजदूरी के काम करने के लिए मजबूर हो जाता है। विस्थापन से मुकाबला केवल जिनका विस्थापन होता है वे ही कर लें, संभव नही है। इस मुकाबले का दारोमदार पूरे लोकविद्याधर समाज पर है और यह उनकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा, बराबरी और इज़्ज़त की लड़ाई का हिस्सा बनना होगा। वाराणसी में हाल ही में सम्पन्न लोकविद्या जन आन्दोलन के अधिवेशन में इस सिलसिले में दो माँगें उभर कर आईं। पहली यह कि लोकविद्या के आधार पर जीवनयापन का अधिकार होना चाहिए तथा इसे एक मौलिक संवैधानिक अधिकार बनाया जाना चाहिए। दूसरी यह कि इस देश के हर बालिग को पक्की नौकरी मिलनी चाहिए, जिसे जो आता है उसके बल पर यह नौकरी मिले और इस नौकरी में सरकारी नौकरी के बराबर की तनख्व़ाह मिले। यह लोकविद्या के आधार पर ऐसी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा की माँग है जिसके बगैर जि़न्दगी में केवल अभाव और बेइज्जती का ही समाना करना पड़ता है। इसके लिए लोकविद्याधर समाज का एक ज्ञान आन्दोलन खड़ा करना होगा, सार्वजनिक दुनिया में यह दावा पेश करना होगा कि किसान, कारीगर, आदिवासी, छोटे-छोटे दुकानदार और महिलाएँ जो ज्ञान रखते हैं वह विश्वविद्यालय के ज्ञान से किसी भी अर्थ में कम नही है, इसलिए अपने ज्ञान के बल पर लोकविद्याधर समाज को भी वे सब हक और मौके मिलने चाहिए जो आधुनिक पढ़े-लिखे समाज को प्राप्त हैं। इन समाजों का चारों तरफ हो रहा विस्थापन हमें यह कहता नज़र आता है कि लोकविद्याधर समाज के सारे अंग एक साझा ज्ञान आन्दोलन के कगार पर खड़े हैं, जो इस नये दर्शन के आधार पर सबके लिए बराबरी और इज़्ज़त की दुनिया की एक तस्वीर पेश करता है।
-सुनील सहस्र बुद्धे

गुरुवार, 15 मार्च 2012

इज्जतदार जिंदगी की चाहत-1




विस्थापन पर इस चर्चा के मार्फत हम आप लोगों का ध्यान एक ऐसे नजरिए की ओर खींचना चाहते हैं जो अभी बहुत चर्चा में तो नहीं है लेकिन जिसमें जनहित के बदलाव की अपार संभावनाएँ छिपी हैं। यह लोकविद्या का नजरिया है। यानी उन लोगों का अपने ज्ञान पर आधारित नजरिया जो कालेज और विश्वविद्यालय नहीं गए।
ध्यान देने की बात है कि ये वही लोग हैं जो बड़े पैमाने पर अपने काम से, अपने रहने की जगहों से बेदखल किए जा रहे हैं। ये किसान हंै, कारीगर हैं, आदिवासी हैं और पटरी के दुकानदार हैं। कोई भी विस्थापन की खबर उठाकर देख लीजिए इन्हीं में से किसी न किसी समुदाय के लोग विस्थापित नजर आएँगे। किसानों की जमीनों का अधिग्रहण, आदिवासियों का अपने गाँवों-जमीनों-जंगलों से खदेड़ा जाना, पटरी के दुकानों पर बुल्डोजर चलाना, स्थानीय उद्योग-सेवा-मनोरंजन के आधुनिकीकरण से कारीगरों का काम छीना जाना, शहरों की गरीब बस्तियों का उजाड़ा जाना यही आज की सबसे बड़ी असलियत है। इनके परिवारों की महिलाएँ शायद इन हमलों से होने वाले उजाड़ की सबसे बड़ी भुक्तभोगी हैं। ये वही लोग हैं, जो कभी कालेज या विश्वविद्यालय नहीं गए और जो अपनी जिंदगी और कारोबार अपने ज्ञान के बल पर चलाते हैं। इन्हीं के ज्ञान को लोकविद्या कहते हैं और इसी लोकविद्या के नजरिए में इन सबके बीच वह एकता बनाने की हैसियत हो सकती है जो एक ऐसे बदलाव का आगाज करे जिसमें ये लोग भी एक बराबर की इज्जतदार जिंदगी के हकदार होंगे।
दुनिया कैसी होनी चाहिए, विकास का अर्थ क्या है, रोजगार के मौके कैसे तैयार होते हैं, इन सबके ऊपर सार्वजनिक दुनिया में जो बहस चलती है उस पर विश्वविद्यालयों में जो पढ़ाया-लिखाया जाता है, वही काबिज होता है। अखबारों में जो लिखा जाता है, किताबों के मार्फत जो समझाया जाता है, टेलीविजन और रेडियो से जो प्रचार किया जाता है, बुद्धिजीवी जो माहौल बनाते हैं, अर्थशास्त्री जो तर्क देतेे हैं और अब राजनैतिक पार्टियों के नेता जो कहते हैं, सभी कुछ उस ज्ञान, समझ और जानकारी पर आधारित होता है जो उन्हें विश्वविद्यालय में मिलती है। जाहिर है इस पूरी बहस में इस देश के 80 फीसदी लोग, जो किसान, कारीगर, आदिवासी और छोटा-मोटा धंधा करने वाले परिवारों से आते हैं, कहीं भी शामिल नहीं हैं। जो बहस में ही शामिल नहीं है, जिसे अपनी बात कहने का ही कोई मौका नहीं है, उसके भले की कोई बात होगी इसकी कोई उम्मीद भी नहीं हो सकती। ये लोग विश्वविद्यालय नहीं गए हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि इनके पास कोई ज्ञान नहीं है और ये समाज, दुनिया, प्रकृति के बारे में कुछ समझते-जानते नहीं हैं। अगर ये अज्ञानी हैं तो इनकी जिंदगी कौन चलाता है? खेती, कारीगरी, जंगलों की जानकारी, छोटी पूँजी से धंधों का प्रबंधन, बच्चों का लालन-पालन और घर की व्यवस्थाएँ, इन सब के सबसे बड़े जानकार यही लोग हैं। इन सब लोगों को अज्ञानी अथवा नासमझ करार देना पूँजीवाद का सबसे बड़ा षड्यंत्र है। विस्थापन की सच्चाई विश्वविद्यालय में बैठकर नहीं दिखाई देती, न संसद, न टेलीविजन के केंद्र और न औद्योगिक इमारतों से ही दिखाई देती है। विस्थापन के खिलाफ संघर्षों में शामिल साथी भी इनके प्रभाव के चलते गुमराह होते रहते हैं। भूमि अधिग्रहण के जवाब में कृषि भूमि अधिगृहीत न की जाए या 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून में बुनियादी संशोधन किए जाएँ, ऐसे सुझाव कुछ तात्कालिक महत्व तो रख सकते हैं, लेकिन किसानों की दुनिया में कोई बुनियादी बदलाव आए, उनके लिए बराबरी और इज्जत की दुनिया की ओर बढ़ने के रास्ते खुलें, इसकी जमीन शायद ही तैयार कर पाते हैं। कारीगरों के हित में बड़े मशीनीकरण का विरोध किया जाना और गरीबोें की बस्तियों व पटरी के धंधों को कानूनी संरक्षण, आज की स्थिति बरकरार रखने तक सीमित बातें हैं। ये बातंे तो ठीक हैं लेकिन इनके आधार पर विस्थापित हो रहे समुदाय अपनी-अपनी लड़ाइयाँ लड़ सकेंगे ऐसा शायद तब तक न हो पाए जब तक वह सोच सामने नहीं आती जो सभी विस्थापित समुदायों के बीच एका का आधार तैयार करती हो।
सभी विस्थापित समुदायों के बीच एका का आधार लोकविद्या विचार में है। लोेकविद्या के नजरिए से देखें तो ये सारे समाज एक लोकविद्याधर समाज बनाते हुए दिखाई देते हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं को यह अनुभव होता ही है कि जब वे बस्तियों या गाँवों में विभिन्न विषयों पर चर्चा कर रहे होते हैं, तब सामना एक अलग नजरिए से होता है, सोचने और समझने के अलग तरीके से होता है। अगर हम हावी होकर अपनी बात थोपने का काम न करें और उनकी बात समझने की कोशिश करें, तो सोच की एक अलग दुनिया से सामना जरूर होगा। लोकविद्याधर समाज का सोचने या काम करने का तरीका उन्हें अपनी विरासत से मिला होता ह,ै जिसमें अपने अनुभव से, अपनी जरूरत से और अपनी तर्क बुद्धि के बल पर ये इजाफा करते रहते हैं। उस सोच में शासन, बाजार और
आधुनिक उद्योगों की प्रतिकूलताओं के बावजूद समाज में रहने की क्षमता विकसित करते रहते हैं। इन्हीं सोचों, क्षमताओं और विवेक के पुलिंदे को लोकविद्या कहते हैं। आज की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि लोकविद्या के आधार पर पूँजीवादी व्यवस्थाओं से मुकाबले का सामाजिक-राजनैतिक विचार कैसे तैयार हो। चूँकि विस्थापन सारे लोकविद्याधर समाज का होता है और केवल लोकविद्याधर समाज का होता है, इसलिए विस्थापन से मुकाबला पूरे लोकविद्याधर समाज की एकता की माँग करता है। किसान, कारीगर, छोटे-छोटे दुकानदार, आदिवासी और इनके घरों की महिलाएँ, इन सभी का नजरिया लोकविद्या का नजरिया है, इनकी आपसी एकता लोकविद्या की राजनीति का आधार देती है।
-सुनील सहस्र बुद्धे
क्रमश:

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

मध्यम वर्गीय समाज में सामाजिक जनतंत्र के प्रति बढती उपेक्षा और उसका दायित्व

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यह जिम्मेदारी समाज के आम मध्यम वर्गीय समाज के साथ - साथ समाज के निचले हिस्से और उनके प्रबुद्ध तबको पर आ गयी है | अब यह उसी का एतिहासिक दायित्व है कि वह आम समाज को आधुनिक युग कि मांगो , आवश्यकताओ के अनुरूप जागृत करे | उनमे एकता , भाईचारगी और बराबरी को खड़ा करे |

धनाढ्य एवं उच्च वर्गीय समाज का रुख - रवैया आम समाज के प्रति उपेक्षापूर्ण हैं | इस हिस्से ने आम समाज में उठने - बैठने , रहने - सहने से अपने आप को कब से अलग कर लिया है और अलग करता जा रहा है |यहा तक कि जन प्रतिनिधि कहे जाने वाले विधायको , सांसदों तक का अपने क्षेत्र की जनता से मिलना जुलना बहुत कम हो गया है
इन सभी का जीवन स्तर ,रहन - सहन तथा शिक्षा - संस्कृति आदि का आम समाज से अब वस्तुत:कोई सम्बन्ध नही रह गया हैं |सम्बन्ध है तो उच्च वर्गीय स्वार्थ का आम जन की श्रम सम्पत्ति के इस्तेमाल का या फिर उनमे राष्ट्रीय व धार्मिक , जातीय या इलाकाई भावनाओं आदि के इस्तेमाल का | जाहिर सी बात है की , राष्ट्र व समाज के इस हिस्से से आम समाज में आधुनिक युग की बराबरी , भाचार्गी और एकता को बढावा देने के प्रति अर्थात सामाजिक जनतंत्र के प्रति किसी सक्रिय सकारात्मक भूमिका की अब कोई अपेक्षा नही की जा सकती | हां उसके विरोध की अपेक्षा जरुर की जा सकती हैं |
समाज के उच्च संभ्रांत वर्ग से आये लोगो की सक्रिय भूमिकाये अब इतिहास का विषय बन चूकि हैं | अपने ही देश में ब्रिटिश दासता के काल में बड़े व सम्भ्रांत घरो से आये - राजाराम मोहन राय , सर सैयद अहमद और बाद के दौर में बहुतेरे राष्ट्रवादी , जनतंत्रवादियों का जैसा नेतृत्त्व अब आम समाज के आधुनिक पुनर्जागरण के लिए आने वाला नही है | क्योंकि पुराना पडा रह गया या नया बनता उच्च वर्गीय हिस्सा अब आमतौर पर पैसे - पूंजी , पद - प्रतिष्ठा का दास बन चुका है | उससे अलग होकर या उसका विरोध करके अब यह हिस्सा समाज के पुनर्जागरण के लिए खड़ा होने वाला नही हैं | स्वाभाविक रूप से अब यह जिम्मेदारी समाज के आम माध्यम वर्गीय समाज के साथ - साथ - समाज के निचले हिस्से और उनके प्रबुद्ध तबको पर आ गयी है | अब यह उसी का एतिहासिक दायित्व है कि वह आम समाज को आधुनिक युग की मांगो , आवश्यकताओ के अनुरूप जागृत करे | उनमे एकता , भाईचारगी और बराबरी को खड़ा करे | लेकिन समाज का यह पढ़ा - लिखा मध्यम वर्गीय हिस्सा अपने इस एतिहासिक दायित्व को सोचने - समझने तक के प्रति उपेक्षा व तटस्थता का रवैया अपनाए हुए हैं | उसकी चिन्ताए मुख्यत: उसकी निजी व पारिवारिक जीवन की चढत - बढत तक ही सीमित हो गयी हैं | आम समाज के प्रति , सामाजिक समस्याओं के प्रति तथा आम समाज को जागृत करने के प्रति , वह भी उच्च वर्गियो की तरह का ही रवैया अपनाए हुए है | धन - पैसा , पद -प्रतिष्ठा की अंधी दौड़ में लगे रहने के साथ - साथ समाज की घोर दकियानूसी परम्पराओं का वाहक भी बना हुआ है | धर्म व संस्कार के नाम पर न केवल हर पुराने एवं गैर जरूरी रीति - रिवाजो व कर्मकांडो को अपनाए हुए हैं , बल्कि उसको आधुनिक बाज़ार एवं भोगवादी संस्कृति से जोडकर महिमामंडित भी करता जा रहा है | इस संदर्भ में आप हिन्दू धर्म के धर्मिक - सामाजिक सुधार का एक उदाहरण देखिये - 19 वी शताब्दी के अन्तिम दशको में शुरू हुए आर्य समाज आन्दोलन में हिन्दू धर्म की कई पुरातन पंथी धार्मिक , सामाजिक कर्मकांडी रीतियों की न केवल निर्मम व तार्किक आलोचना की , बल्कि उनको सरल व नई धार्मिक , सामाजिक रीतियों व पद्धतियों के रूप में बदल भी दिया | लेकिन उस आन्दोलन और उसके जरिये होने वाले समाज - सुधार को आम पढ़े - लिखे , जानकार मध्यम वर्गीय समाज के व्यापक हिस्से ने उस समय भी अपेक्षा से कही कम महत्व दिया |फिर आज तो उस पर या उस जैसे अन्य सुधारों पर और भी कम या कहिये न के बराबर ध्यान दिया जाता हैं , जबकि अब नई युग की सोच के अनुसार उसमे और ज्यादा सुधार करने का समूचा दायित्व ही निम्न मध्यम वर्गीय और निम्न समाज पर आ पडा हैं |
इसका एक दुसरा सबूत यह भी है कि छोटी एवं निम्न जातियों में भी खासकर उनके पढ़े - लिखे और थोड़ा - बहुत भी सम्पन्न हिस्सों में अब वे सारे पुराने कर्मकांड खड़े होने एवं बढने लग गये है , जो पहले आमतौर पर बड़ी जातियों में खासकर ब्राह्मणों , क्षत्रियो और बाद में किसी हद तक वैश्यो, कायस्थों में ही प्रचलित थे | फिर इन्ही का एक हिस्सा इन क्र्म्कान्दो
के विरोध कि अगवाई करते हुए ब्रम्हसमाज से आर्य समाज तक के आन्दोलनो का नेतृत्त्व किया था | लेकिन आज स्तिथि उलट सी हो गयी है | आम प्रबुद्ध समाज कर्मकान्डो और ज्यादा अपनाता जाता हैं | यह समाज के आम प्रबुद्ध माध्यम वर्गीय हिस्से में प्रगतिशील विचार व व्यवहार के बढने का नही , अपितु उससे पीछे हटने का सबूत हैं | समाज को आगे बढाने में सहायक बनने का नही बल्कि उसे पीछे ढकेलने में लग जाने का सबूत है |आवश्यकता है कि आम समाज खासकर उसका पढ़ा लिखा हिस्सा अब आम समाज में सुधार लाने बढाने के लिए अपनी बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल करे | व्यापक समाज के लिए आवश्यक आधुनिक पुनर्जागरण के एतिहासिक दायित्व का निर्वहन करे |अपनी तर्क बुद्धि और प्रबुद्धता को पुराने युग कि सड़ी-गली रीतियों का सही औचित्य ठहराने में लगाने कि जगह , सुसंगत वैज्ञानिक तर्को के साथ नये विचार - व्यवहार को पनपाने बढाने में लगाये | आधुनिक पुनर्जागरण में योगदान दे चुके राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय विभूतियों व आन्दोलनो से प्रेरणा ग्रहण करे |आने वाले दिनों में टूटकर सम्पत्तिहीन कंकर वर्गीय स्थिति में समाहित हो जाने की दशा - दिशा का आकलन करते हुए अपने एतिहासिक दायित्व को संभालने के लिए आगे आये |समाज के उच्च वर्ग के साथ नही बल्कि निम्न वर्ग के साथ जनतांत्रिक एकता बनाये.
-सुनील दत्ता

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पत्रकार
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