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गुरुवार, 14 अगस्त 2014

क्या 'हिन्दू' हमारी राष्ट्रीय पहचान है ?

सन् 1980 के दशक से पहचान.आधारित राजनीति ने हमारे देश में जड़ें जमानी शुरू कीं। शाहबानो मामले,राममंदिर की समस्या और रथयात्राओं ने पहचान पर आधारित मुद्दों को देश के सामाजिक.राजनीतिक रंगमंच के केन्द्र में ला दिया। इस राजनीति का सबसे पहला बड़ा शिकार बनी बाबरी मस्जिद। कुछ लोग गंभीरतापूर्वक यह विश्वास करने लगे कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और 'हम सब हिन्दू हैं' के नारे की गूंज जगह.जगह सुनाई देने लगी। हाल में, मोदी.भाजपा को लोकसभा में बहुमत मिलने के बाद से यह मुद्दा और जोरशोर से उठाया जा रहा है। सन् 1990 में भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने कहा था कि हम सब हिन्दू हैं.मुसलमान, अहमदिया हिन्दू हैं, ईसाई क्रीस्टी हिन्दू हैं और जैन, सिक्ख और बौद्ध तो हिंदू हैं ही। आरएसएस यह मानता है कि बौद्ध, सिक्ख और जैन धर्म, हिन्दू धर्म के पंथ हैं। यह अलग बात है कि कुछ समय पूर्व, जब तत्कालीन सरसंघचालक के. सुदर्शन ने यह कहा था कि सिक्ख, अलग धर्म नहीं वरन् हिन्दू धर्म का पंथ मात्र है तो इसके खिलाफ पंजाब में जोरदार विरोध प्रदर्शन हुए थे। मोदी के सत्ता के शीर्ष पर काबिज होने के बाद से, आरएसएस बार.बार,लगातार यह दोहरा रहा है कि सभी भारतीयों को स्वयं को हिन्दू कहना चाहिए। अंग्रेजी की कहावत है कि कुछ लोगों को जब झुकने को कहा जाता है तो वे दंडवत करने लगते हैं। इसी तर्ज पर, गोवा के उपमुख्यमंत्री और भाजपा नेता फ्रांसिस डिसूजा ने कहा कि सभी ईसाई, हिन्दू हैं। आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने जोर देकर कहा कि 'सारी दुनिया भारतीयों को हिन्दू मानती है इसलिए भारत, हिन्दू राष्ट्र है। यह बहुत साधारण सी बात है। जिस तरह ब्रिटेन में रहने वाले ब्रिटिश हैं, जर्मनी के सभी निवासी जर्मन हैं और अमेरिका के सभी नागरिक अमरीकी हैं उसी तरह हिन्दुस्तान के सभी रहवासी हिन्दू हैं।' हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म जैसी दो नितांत अलग.अलग चीजों का मिश्रण करते हुए उन्होंने कहा, 'सारे भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिन्दुत्व है और इस वर्तमान में इस देश में रहने वाले सभी लोग एक ही महान संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं।' इस तरह के दावों के पीछे असली राजनीतिक एजेण्डा क्या है, इसकी पोल खोलते हुए गोवा के सहकारिता मंत्री दीपक धावलीकर ने विधानसभा में कहा कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतए हिन्दू राष्ट्र बनने की ओर उद्यत है।
सच यह है कि हिन्दू, हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र ये तीनों अलग.अलग चीजें हैं और इनका राजनैतिक निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए दुरूपयोग किया जा रहा है। इन तीनों अवधारणाओं को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है। हिन्दू धर्म के बारे में जो दावे किये जा रहे हैं, उनकी वर्तमान संदर्भों में पड़ताल अपेक्षित है। हिन्दू शब्द के उदय की कहानी लंबी है। समय के साथ इस शब्द के अर्थ और संदर्भ बदलते रहे हैं। हिन्दू धर्म का राजनैतिक संस्करण हिन्दुत्व है और हिन्दुत्व का राजनैतिक लक्ष्य, हिन्दू राष्ट्र है। इन तीनों शब्दों को संघ परिवार ने अपने राष्ट्रवाद के पैकेज का हिस्सा बना लिया है।
यह दिलचस्प है कि जिन ग्रंथों को हिन्दू धर्मग्रंथ कहा जाता है, उनमें भी 8वीं सदी ईस्वी तक, हिन्दू शब्द का जिक्र नहीं मिलता। दरअसल, हिन्दू शब्द अस्तित्व में तब आया जब अरब और मध्यपूर्व से मुसलमान यहां पहुंचे। उन्होंने सिंधु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिन्दू कहना शुरू कर दिया। इस प्रकार, हिन्दू मूलतः एक भौगोलिक अवधारणा है। यही कारण है कि दुनिया के कुछ हिस्सों, विशेषकर पश्चिम एशिया में आज भी भारत को हिन्दुस्तान कहा जाता है। भागवत का यह कहना गलत है कि पूरी दुनिया में भारत को हिन्दुस्तान नाम से पुकारा जाता है। केवल सऊदी अरब और पश्चिम एशिया में यह शब्द प्रचलन में है। सऊदी में आज भी भारत से जाने वाले हाजियों को हिन्दी कहा जाता है और सऊदी अरब की स्थानीय भाषा में गणित को हिन्दसा ;हिन्द से आया हुआ; कहा जाता है।
समय के साथ हिन्दू, भौगोलिक के स्थान पर धार्मिक अवधारणा बन गया और सिंधू नदी के पूर्व में रहने वाले लोगों की धार्मिक परंपराओं और कर्मकाण्डों को हिन्दू कहा जाने लगा। यह दावा कि प्राचीन भारत में हिन्दू संस्कृति का बोलबाला था, बेबुनियाद है। सिंधू घाटी की सभ्यता, देश के दूसरे इलाकों की सभ्यता व संस्कृति से एकदम भिन्न थी। शुरूआत में आर्य पशुपालक थे परंतु बाद में उन्होंने एक जगह रहकर खेती करना और राज्यों व साम्राज्यों की स्थापना करना शुरू कर दिया। भारत में पहले से रहने वाले आदिवासियों की अपनी एक अलग संस्कृति थी। उसी तरह, ब्राह्मणवादी व बौद्ध परंपराएं एकदम अलग.अलग थीं। जहां ब्राह्मणवाद जन्म.आधारित जातिगत ऊँचनीच में विश्वास करता था वहीं बौद्ध धर्म इसका विरोधी था। यह कहना कि पूरे प्राचीन भारत में एक सी संस्कृति थी, एकदम गलत है। हम सब जानते हैं कि संस्कृति, नए लोगों के किसी स्थान पर बसने और उस स्थान पर रहने वाले लोगों के दूसरी जगह जाने से परिवर्तित होती रहती है।
हिन्दुत्व शब्द का उदय 19वीं सदी में हुआ जब उभरते हुए राष्ट्रीय आंदोलन के विरूद्ध सांप्रदायिक राजनीति ने मोर्चा संभाला। जब सन 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई तब मुसलमान और हिन्दू, दोनों धर्मों के सामंती तत्वों ने इसका विरोध किया और अपनी सांप्रदायिक सोच को हवा दी। हिन्दू संप्रदायवादियों की सोच को ही मोटे तौर पर हिन्दुत्व कहा जाता है। इस विचारधारा को आकार देने में सावरकर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सावरकर ने ही सबसे पहले सन् 1924 में हिन्दू शब्द की परिभाषा दी। उन्होंने कहा कि हिन्दू वह है जिसकी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनो भारत हैं। इस तरह ईसाई और मुसलमान, अपने आप हिन्दू धर्म की परिभाषा से बाहर हो जाते हैं। सावरकर के अनुसार हिन्दू वह है जो आर्य है, ब्राह्मणवादी संस्कृति में विश्वास रखता है और हिमालय से लेकर समुद्र तक फैले भूभाग में रहता है। सावरकर ने ही हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को आकार दिया। इस अवधारणा को 1925 में आरएसएस ने अपने लक्ष्य के रूप में अपना लिया। हिन्दू राष्ट्र का लक्ष्य, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लक्ष्य से एकदम भिन्न था। राष्ट्रीय आंदोलन का उद्देश्य धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक भारत का निर्माण करना था।
यह बार.बार कहा जा रहा है कि हम सब को अपने आप को इसलिए हिन्दू कहना चाहिए क्योंकि हिन्दू,दरअसल, कोई धर्म नहीं बल्कि जीने का तरीका है। और इस देश के सभी निवासी एक ही तरह से जीते हैं। यह लोगों को बेवकूफ बनाने की चाल है। कोई मुस्लिम भी यह कह सकता है कि इस्लाम,धर्म नहीं वरन् जीवन पद्धति है। यह स्पष्ट है कि केवल धर्म, जीवनपद्धति नहीं हो सकता। जीवनपद्धति धर्म से अधिक विस्तृत अवधारणा है और इसमें भाषा, स्थानीय संस्कृति आदि शामिल हैं,जो कि पूरे देश में कभी एक नहीं हो सकते। उसी तरह, धर्म भी एकसार नहीं है। दरअसल, धर्म, जीवनपद्धति का एक हिस्सा है। वह जीवनपद्धति नहीं है और न हो सकता है। नवस्वतंत्र देश का क्या नाम होना चाहिएए इस पर संविधान सभा में लंबी बहस हुई थी और अंत में यह तय किया गया कि देश का नाम 'इंडिया देट इज भारत' होगा। यह नाम किसी धर्म विशेष से जुड़ा हुआ नहीं है। हिन्दू शब्द के राष्ट्रीय.सांस्कृतिक अर्थ नहीं है। यह एक विशुद्ध धार्मिक शब्द है। भारत के सभी निवासियों को हिन्दू बताने के खेल के पीछे एक कुटिल चाल है। पहले भौगोलिक पहचान की बात करोए फिर कहो कि चूंकि हम सब के पूर्वज एक ही हैं और चूंकि हम सब हिन्दू हैं इसलिए गीता और मनुस्मृति हमारी राष्ट्रीय पुस्तकें हैं और गाय हमारा राष्ट्रीय पशु हैं और हम सबको राम आदि की पूजा करनी चाहिए।
आरएसएस जो कुछ कर रहा है वह कोई सीधा.साधा या सामान्य सा प्रयास नहीं है। उसका अंतिम तर्क यह होगा कि 'हम सब हिन्दू हैं अतः भारत हिन्दू राष्ट्र हैए, अतः हमें हिन्दू धर्म के स्वनियुक्त ठेकेदारों और हिन्दू साधु.संतों के निर्देष मानने हैं।' इस मुद्दे पर हमारा संविधान बहुत साफ है हिन्दू एक धार्मिक पहचान है जबकि भारतए राष्ट्रीय पहचान है। आरएसएस का न तो स्वाधीनता संग्राम से कोई लेनादेना रहा है और ना ही भारतीय संविधान में उसे कोई विशेष श्रद्धा है। आश्चर्य नहीं कि उसका एजेण्डा भारतीय संविधान की आत्मा और उसके प्रावधानों के ठीक उलट है। आरएसएस दरअसल देश पर हिन्दू पहचान लादना चाहता है। संघ का अगला कदम क्या होगा, यह आरएसएस के एक अभ्यास वर्ग में हुए प्रश्नोत्तर से जाहिर है। आरएसएस के एक नेता यादवराव जोशी का कुछ दशक पहले का निम्नांकित कथन महत्वपूर्ण है और आरएसएस के असली एजेण्डे की झलक दिखलाता है। 'प्रश्नोत्तर के दौरान एक स्वयंसेवक ने जोशी, जो कि उस समय आरएसएस के दक्षिण भारत प्रमुख थे, से जानना चाहा 'हम कहते हैं कि आरएसएस एक हिन्दू संगठन है। हम कहते हैं कि भारत हिन्दुओं का देश है। उसी सांस में हम यह भी कहते हैं कि ईसाई और मुसलमान अपने.अपने धर्मों का पालन करते रह सकते हैं बशर्ते वे भारत के प्रति वफादार रहें और देश से प्रेम करें। हमें यह छूट देने की क्या आवश्यकता है? हम यह क्यों साफ नहीं कहते कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और उसमें मुसलमानों और ईसाईयों के लिए कोई स्थान नहीं है।यादवराव जोशी ने उत्तर देते हुए कहा, 'वर्तमान में हिन्दू समाज और आरएसएस इतने शक्तिशाली नहीं है कि हम ईसाईयों और मुसलमानों से यह कह सकें कि यदि उन्हें भारत में रहना है तो उन्हें हिन्दू धर्म को स्वीकार करना होगा। या तो वे हिन्दू बनें या मारे जायें। परंतु जब हिन्दू समाज और आरएसएस पर्याप्त शक्तिशाली हो जायेंगे तब हम उनसे कहेंगे कि यदि वे भारत में रहना चाहते हैं और यदि वे भारत से प्रेम करते हैं तो उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि कुछ पीढि़यों पहले तक वे हिन्दू थे और उन्हें हिन्दू धर्म में वापसआनाहोगा।'http://www.caravanmagazine.in/reportage/rss-30#sthash.GmBGCZLQ.dpuf
जो बात आरएसएस वर्षों से कहता आ रहा हैए केन्द्र में मोदी के सत्ता में आने के बाद उसके सदस्य अब वही बात और जोर.जोर से साफ शब्दों में कह रहे हैं। आरएसएस के मुखिया भागवत के बयान और आरएसएस के सदस्यों द्वारा टीवी पर आयोजित बहसों में जो भी कहा जा रहा हैए वह भारतीय संविधान के मूल्यों के स्पष्टतः खिलाफ है। अतः आवश्यक है कि भारत के हम सभी नागरिक इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार करें कि हम आखिर किस दिशा में जा रहे हैं। क्या हम उन मूल्यों और सिद्धांतों को पूरी तरह त्याग देना चाहते हैं जो हमारे राष्ट्रीय आंदोलन और संविधान की रीढ़ हैं? इन सिद्धांतों और मूल्यों को हमें बचाए रखना है और देश को संकीर्ण ताकतों के हाथों का खिलौना नहीं बनने देना है। यही समय की मांग है।
-राम पुनियानी,

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

सैनिक तानाशाही

हाल में म्यानामार के अराकान राज्य में रोहिंग्या मुसलमानों और बौद्घों के बीच हुए दंगों की खबर ने पूरे विश्व को चौंका दिया। इन दंगो में 100 से अधिक मुसलमान मारे गये और करोड़ो की संपत्ति नष्ट हो गई। अमन (एशियन मुस्लिम एक्शन नेटवर्क), जिसका फैलाव पूरे एशिया में है, ने इस क्षेत्र में शांति स्थापना की पहल करने का निर्णय लिया। म्यानामार (बर्मा) की छवि एक शांतिपूर्ण देश की है और वहां इस बड़े पैमाने पर दंगे होने की अपेक्षा किसी को नहीं थी।
यह तय किया गया कि म्यानामार के तीनों प्रमुख धार्मिक समुदायों अर्थात बौद्ध, मुस्लिम और ईसाई, के बीच अंतर्धार्मिक संवाद का आयोजन किया जावे। म्यानामार में मुसलमान, कुल आबादी का लगभग 10 प्रतिशत हैं। यांगोन (जिसे पहले रंगून कहा जाता था) में मुसलमानों की आबादी 20 प्रतिशत के आसपास है। यांगोन एक समय म्यानामार की राजधानी था परन्तु अब वह देश का सबसे बड़ा व्यावसायिक केन्द्र है। राजधानी अन्यंत्र स्थापित कर दी गई है।
अंतर्धार्मिक संवाद का आयोजन यांगोन में किया गया था। यांगोन मंझोले आकार का एक सुंदर शहर है। यहां खूब साफसफाई है और हरियाली भी बहुत है। यांगोन की आबादी लगभग 60 लाख है अर्थात मुंबई से करीब आधी। यहां मुंबई की तुलना में भीड़भाड़ बहुत कम है और जिंदगी की धीमी रफ्तार और भरपूर हरियाली इसे मुंबई से अलग करती है। मुंबई के विपरीत, यांगोन में गगनचुंबी इमारतें नहीं हैं। सबसे ऊंची इमारतों में दो होटलें शामिल हैं जो 25 मंजिला हैं। अन्य इमारतों में पांच से लेकर पंद्रह मंजिलें तक हैं। एक समय मुसलमान, यांगोन के काफी प्रभावशाली समुदायों में शामिल थे। उनमें से अधिकांश व्यापारी थे। अकेले सूरत शहर से इतनी बड़ी संख्या में मुसलमान वहां गये थे कि यांगोन में आज भी एक सुंदर सूरती मस्जिद है।
म्यानामार का मुस्लिम समुदाय अत्यंत विविधतापूर्ण है। बर्मी मूल के मुसलमानों की संख्या बहुत कम है। अधिकांश मुसलमान भारत के विभिन्न हिस्सों से आये प्रवासी हैं जो उस वक्त म्यानामार में बसे थे जब वह भारत का हिस्सा था। वहां बड़ी संख्या में तमिल, गुजराती, बंगाली और बोहरा मुसलमान हैं। उर्दू बोलने वाले मुसलमानों की संख्या बहुत कम है। अब तो सभी मुसलमान बर्मी भाषा बोलते हैं। अपने मुस्लिम नाम के अतिरिक्त इन सभी के बर्मी नाम भी हैं और सार्वजनिक जीवन में वे अपने बर्मी नाम व मुस्लिम समुदाय में अपने इस्लामिक नाम से जाने जाते हैं। उदाहरणार्थ, एक व्यक्ति का बर्मी नाम है चिटको ओ.ओ. और उसी व्यक्ति का इस्लामिक नाम है मो. नसीरउद्दीन। यही परंपरा वहां रह रहे थाईलैंड के मुसलमान भी अपनाते हैं।
यांगोन में दो स्थान सबसे प्रसिद्ध हैं। पहला, मुगल बादशाह बहादुरशाह ज़फर की कब्र और दूसरा, बर्मा का सबसे बड़ा बौद्ध पैगोडा। मैने दोनों स्थल देखे। बहादुरशाह जफर की कब्र अब भारत सरकार द्वारा बनवाई गई एक मस्जिद के अंदर है। उनकी इस असली कब्र का पता तब चला जब 199293 में मस्जिद के निर्माण के लिए खुदाई की जा रही थी। अंग्रेजों ने उन्हे गुप्त रूप से दफनाया था और असली स्थान से कुछ दूरी पर एक बड़ी सी प्रतीकात्मक कब्र बना दी थी। दोनो कब्रें आज भी हैं। मैं बहादुरशाह ज़फर की कब्र पर गया और भारत के इस महान स्वाधीनता संग्राम सेनानी को श्रद्घांजली दी। इस स्थल की सरकार द्वारा बहुत अच्छी तरह से देखभाल की जा रही है।
गोल्डन बौद्ध पैगोडा, बौद्धों का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है और यांगोन का एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण भी। असल में यह बहुत सारे बड़ेछोटे पैगोडा का काम्पलेक्स है और यहां हमेशा भीड़ बनी रहती है। अधिकांश इमारतों पर सोने की पर्त च़ी है जिससे ये बहुत सुंदर और आकर्षक लगती हैं। काम्पलेक्स के चारों ओर घनी हरियाली है। यहां बैठ कर अत्यंत शांति का अनुभव होता है। यह दुःखद है कि बुद्ध के इस देश में मानव रक्त अकारण बहाया गया। अब भी कोई नही जानता कि दंगो में कुल कितने लोग मारे गये। भगवान बुद्ध दया और अहिंसा की प्रतिमूर्ति थे परन्तु उनके ही अनुयायियों ने निर्दोषों का खून बहाने में तनिक भी संकोच नही किया। किसी भी धर्म के आदर्शों और उसके अनुयायियों के क्रियाकलापों में हमेशा बड़ा अंतर रहता है।
जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं, बर्मा एक शांतिपूर्ण देश है और यहां के तीनों प्रमुख धार्मिक समुदायों के सदस्य आपसी प्रेम और सद्भाव से रहते आये हैं। बर्मा के पश्चिमी प्रांत अराकान में सेना के सत्ता संभालने के बाद समस्याएं शुरू हुईं। यांगोन की अपनी यात्रा के पहले दिन 22 जून को मैं एक ईसाई शिक्षण संस्था में गया। मैंने वहां अंतर्धार्मिक संवाद और उसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। संवाद का लक्ष्य एकदूसरे को समझना है, एकदूसरे का मतांतर करना नहीं। धमांर्न्तरण की तो बात ही नहीं की जानी चाहिए। इससे संवाद की मूल आत्मा ही खतरे में पड़ जाती है। मैंने अंतर्धार्मिक व अंतर्सांस्कृतिक संवाद की अवधारणा पर विस्तृत प्रकाश डाला और इस बात पर जोर दिया कि विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक समुदायों के बीच सतत संवाद चलते रहने से समस्याएं या तो उत्पन्न ही नहीं होंगी और यदि होंगी भी तो जल्दी ही सुलझ जाएंगी।
हम लोगों ने इस मौके पर रोहिंग्या मुसलमानों के हालात पर चर्चा नहीं की वरन मुख्यतः अंतर्धार्मिक संवाद के सैद्घांतिक पक्ष पर विचार किया। इससे भी कई मुद्दों को स्पष्ट करने में मदद मिली। दंगाप्रभावित प्रांत में मार्शल लॉ लागू है और कफ्र्यू लगा हुआ है। वहां किसी को भी जाने की इजाजत नही है। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्रसंघ के
प्रतिनिधि को भी प्रभावित इलाके से बेंरग वापस कर दिया गया था। इस स्थिति में मेरे पास इसके सिवा कोई चारा न था कि मैं इस मुद्दे पर यांगोन के निवासियों से ही चर्चा करुं। यांगोन में काफी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान निवास करते हैं।
मुझे यह बताया गया कि यह आरोप सही नहीं है कि कुछ मुसलमानों ने एक बौद्ध लड़की के साथ बलात्कार किया था। सच तो यह है कि एक मुस्लिम युवक और बौद्ध नवयुवती आपस में प्रेम करते थे। उन्होंने विवाह कर लिया और स्थानीय निवासियों के गुस्से से बचने के लिए अपने घर छोड़ कर भाग गये। दो मुसलमान लड़कों ने इस युगल के विवाह और उसके बाद उनके वहां से भागने में मदद की। ठीक ऐसा ही कुछ जबलपुर में सन 1961 में हुआ था। एक मुसलमान लड़के और हिन्दू लड़की ने विवाह करने का निश्चय किया परन्तु अफवाह यह फैला दी गई कि लड़के ने लड़की के साथ जबरदस्ती की है। इसके बाद भड़के दंगों में 100 से अधिक लोग मारे गये और करोड़ो की संपत्ति स्वाहा हो गई।
यही कुछ राखियान प्रांत में भी हुआ परन्तु यह दंगो की असली वजह नहीं थी। दंगो की असली वजह थी रोहिंग्या मुसलमानों की नागरिकता का मसला। मैं इस मुद्दे पर आगे प्रकाश डालूंगा। बहरहाल, शादी करने वाला लड़का और उसकी मदद करने वाले दोनों लड़के पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए गये। जिस लड़के ने शादी की थी, वह पुलिस हिरासत में मर गया और कई रोहिंग्या मुसलमानों का यह आरोप है कि उसे शारीरिक यंत्रणा देकर मारा गया।
इससे भी अधिक दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जिन दो लड़कों ने विवाह करने में अपने साथी की मदद की थी उन्हे मृत्युदंड दिया गया है और जल्दी ही उन्हे फांसी दे दी जायेगी। यह केवल सैनिक तानाशाही में ही हो सकता है, किसी भी ऐसे देश मे नहीं, जहां कानून का राज है। किसी व्यक्ति के मामले की सुनवाई चंद दिनों में निपटा कर उसे मृत्युदंड दे देना कैसे न्यायपूर्ण हो सकता है। किसी भी व्यक्ति को मृत्युदंड देने से पहले की न्यायिक कार्यवाही महीनों और कबजब सालों तक चलती है। इस घटना से यह साफ है कि सैनिक तानाशाहों को मानवाधिकारों से कोई मतलब नहीं रहता।
बर्मा के मुसलमानो के लिए अभी सबसे जरूरी है इन दोनों लड़कों की जान बचाना। समुदाय का नेतृत्व इस सिलसिले में गहन विचारविमर्श कर रहा है। मैंने उन्हें सलाह दी कि वे अच्छे वकील की सेवाएं लें और ऊंची अदालतों में अपील करें। मैने उनसे यह भी कहा कि एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाओं से भी इस मुद्दे पर अभियान चलाने का अनुरोध किया जा सकता है।
दूसरा महत्वपूर्ण मसला है दंगा पीड़ितों को राहत पहुंचाने का। सरकार किसी को भी दंगा पीड़ित तक सीधे राहत पहुंचाने की इजाजत नही दे रही है। सरकार की यह शर्त है कि राहत सामग्री एक सरकारी संस्था को सौंप दी जाए जो कि उसे प्रभावित लोगों तक पहुंचाएगी। मुसलमानों का कहना है कि उन्हें यह भरोसा नही है कि सरकारी एजेंसी को सौंपी गई राहत सामग्री असली पीड़ितों को मिलेगी। कुल मिलाकर, रोहिंग्या मुसलमान परेशानियां भोग रहे हैं और उन्हें राहत की तुरंत आवश्यकता है। परन्तु स्वयंसेवी संस्थाओं को उन तक राहत पहुंचाने की इजाजत नहीं दी जा रही है।
आराकान (राखियान) प्रांत में रहने वाले रोहिंग्या मुसलमान बाहर से आकर यहां बसे हैं ठीक उसी तरह जैसे बर्मा के अन्य इलाकों, विशेषकर रंगून को प्रवासी मुसलमानों ने अपना घर बना लिया है। एक समय अराकान में मुसलमानों का राज था और इसलिए भी वहां बड़ी संख्या में मुसलमान आकर बस गये। परन्तु म्यानामार की वर्तमान सैनिक सरकार का कहना है कि उनमे से अधिकांश पिछले कुछ वर्षों में ही वहां आकर बसे हैं। सरकार उन्हें नागरिक नहीं मानती। दूसरी ओर, रोहिंग्या कहते हैं कि वे पिछले सौ सालों से भी अधिक समय से अराकान में रह रहे हैं।
यह कुछकुछ हमारे देश की असम और बांग्लादेश की समस्या की तरह है। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के नेताओं का आरोप था कि बांग्लादेशी मुसलमान बड़ी संख्या मे असम में बस रहे हैं और जल्दी ही वे वहां के बहुसंख्यक समुदाय बन जाएंगे। इसी प्रचार के चलते नेल्ली दंगे हुए जिनमें 4,000 बंगाली मुसलमान मारे गये। बंगाली मुसलमानों का भी यह कहना है कि वे घुसपैठिए नहीं हैं वरन पिछली सदी के तीसरे दशक के आसपास असम में आकर बसे थे और यह भी कि उनकी संतानें कई पीयिों से असमिया स्कूलों में पॄ रहीं हैं।
म्यानामार की सैनिक सरकार, रोहिंग्या मुसलमानों को नागरिक का दर्जा देने को तैयार नही है। इन लोगों का कहना है कि सन 1982 तक कोई समस्या नहीं थी और वे हर चुनाव में अपना मत देते थे। केंद्रीय सरकार में अराकान प्रांत से पांच मंत्री हुआ करते थे। इनमें से कई मुसलमान सऊदी अरब व अन्य देशों में काम कर रहे हैं परन्तु उनके पास बर्मा का पासपोर्ट नहीं है।
वे अवैध रूप से सीमा पार कर पड़ोसी बांग्लादेश मे घुस जाते हैं और वहां से अवैध पासपोर्ट बनवाकर खाड़ी के देशों मे काम करने चले जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि सऊदी अरब में वर्क परमिट पर कम से कम पांच लाख रोहिंग्या मुसलमान काम कर रहे हैं। यांगोन मे रहने वाले कई मुसलमानों के पास भी नागरिकता संबंधी दस्तावेज नहीं हैं। उन्हें पहचानपत्र तो दिये गये हैं परन्तु पासपोर्ट नही दिया जाता है। यह भी बर्मा में ब़ते विवाद का एक कारण है।
हिंसा की जड़ में ये सब कारक थे। एक मुस्लिम लड़के और बौद्ध लड़की के भाग जाने की घटना तो मात्र वह चिंगारी थी जिसने पहले से सुलग रही आग को भड़का दिया। स्थानीय बौद्ध, रोहिंग्या मुसलमानों को जरा भी पसंद नही करते। उन्हें वे उसी रूप में देखते हैं जिसमें एएएसयू तथाकथित बांग्लादेशी मुसलमानों को देखती है। परन्तु भारत और म्यानामार में एक बहुत महत्वपूर्ण अंतर यह है कि भारत एक प्रजातंत्र है और म्यानामार, सैनिक तानाशाही। भारत में समस्याओं का हल प्रजातांत्रिक तरीकों से निकाला जा सकता है। इंदिराजी ने ऐसी कोशिश की थी परन्तु उससे न तो बंगाली मुसलमान संतुष्ट हुए और न ही असम के निवासी। म्यानामार में तो प्रजातंत्र ही नही है। और इसलिए आंग सांग सू की ने कहा है कि इस समस्या को तब तक नही सुलझाया जा सकता जब तक कि बर्मा में प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना नही हो जाती और नागरिकता संबंधी अधिकारों का निर्धारण संवैधानिक प्रक्रिया से नहीं होने लगता। अभी तो बर्मा में संविधान ही नहीं है इसलिए ऐसा लगता है कि इस समस्या का जल्द ही कोई हल निकलने वाला नही है।

-डॉ. असगर अली इंजीनियर
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