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सोमवार, 16 मार्च 2015

‘‘कांग्रेस मुक्त भारत’’ देश के लिए सार्थक या घातक-3

यहीं से प्रारम्भ हुआ देश में राजनैतिक अस्थिरता का माहौल। जनता पार्टी की हुकूमत का कार्यकाल मात्र ढाई साल चला। हुकूमत के पतन का कारण दो विपरीत विचारधाराओं के बीच आपसी सामंजस्य स्थापित न होना बना। जनसंघ का नाम बदल कर आर0एस0एस0 की सलाह व मदद से भारतीय जनता पार्टी बनी। आर0एस0एस0 उनसे रिश्ते तोड़ने की बात की तो उनका असली चेहरा सामने आ गया और उन्होंने सभा को त्यागना पसंद किया। आर0एस0एस0 से अपने रिश्ते नहीं तोड़े। उस समय अटल बिहारी ने कहा था कि आर0एस0एस0 हमारी जननी है कोई बेटा अपनी मां से रिश्ता कैसे तोड़ सकता है। परिणाम स्वरूप जनता पार्टी हुकूमत का पतन हो गया।
     1980 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में लोगांे ने फिर विश्वास प्रकट किया। मुस्लिम वोट जो आपातकाल के दौरान जबरी नसबंदी से नाराज था, वह भी पुनः इंदिरा गांधी पर विश्वास करते हुए कांग्रेस में वापस लौट आया। लेकिन कांग्रेस के बुरे दिनों के दौरान काली टोपी उतार कर सफेद टोपी पहने संजय गांधी की अनुभवहीनता का लाभ उठाकर नए कांग्रेसियों ने इंदिरा
गांधी जैसी समझदार व परिपक्व राजनेत्री को यह समझाने में कामयाबी हासिल कर ली कि पहली बार कांग्रेस मुस्लिम समर्थन के बगैर सभा में वापस आयी है इसलिए अगर वह खुलकर हिन्दू कार्ड खेले तो फिर उसे कोई सभा से कभी हिला न सकेगा। इंदिरा गांधी इस झांसे में आ गईं और वीर बहादुर सिंह, अरूण नेहरू व आरिफ मो0 खां जैसे कांग्रेसी लीडरों ने अपनी मजबूत पकड़ पी0एम0 कार्यालय में बना ली।
    उधर साम्राजी शक्तियांे ने जब देखा कि इंदिरा गांधी ने उनके इरादों को शिकस्त देकर उन्हें देश की सत्ता पर अपनी पिट्ठू शासकों को बिठा कर अपने उद्देश्यों की पूर्ति के उनके सपनों को ढेर कर दिया है तो उन्होंने अपने जियाउल हक के द्वारा संचालित आई0एस0आई0 व अमरीकी सी0आई0ए0 के द्वारा सिक्खों के भीतर खालिस्तान तहरीक की लहर को पैदा कर पंजाब में आतंकवाद की फसल को पनपाना शुरू कर दिया। इसका जवाब इंदिरा गांधी ने अपने मिजाज के मुताबिक दमन से दिया और आपरेशन ब्लू स्टार अभियान का नाम देकर सैन्य शक्ति से आतंक का प्रयाय बन चुके भिंडरवाला व उनके साथियों का नरसंहार अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में कर खालिस्तान तहरीक को कुचल डाला।
    परिणाम स्वरूप धार्मिक भावनाओं से आहत उन्हीं के सिक्ख सुरक्षा गार्डों ने उनके निवास स्थल पर गोलियों से भून कर उनकी हत्या कर दी। बात यहीं तक नहीं रुकी राजधानी देहली सहित कई राज्यों में सिक्खों के विरुद्ध हिन्दुओं के क्रोध ने हिंसा का रूप धारण कर लिया और उनकी हत्या व उनके व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को लूटकर जलाने का कार्य उस वक्त तक जारी रहा जब तक राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री की शपथ ग्रहण कर शान्ति की अपील नहीं की। नेहरू इंदिरा के बाद कांग्रेस का क्या होगा की बात उठने लगी। अन्र्तराष्ट्रीय जगत में भी साम्राज्यवादी ताकतें उत्साहित थी कि अब राजनैतिक तौर पर अनुभवहीन राजीव गांधी को अपने हिसाब से वह कंट्रोल कर संचालित कर लेंगे। विदेशी मीडिया में उनकी खूब प्रशंसा रही। अमरीका के पहले दौरे पर उनके अमरीकी सदन के भाषण पर खूब तारीफों के पुल बांधे गए। वहीं कांग्रेस में मौजूद पूँजीवादी व साम्प्रदायिक सोच के लोगों ने राजीव को अपने काबू में कर उनसे गलत नीतियों पर अमल करवाना प्रारम्भ भी कर दिया। वर्षों से ठण्डे बस्ते में चले आ रहे बाबरी मस्जिद का ताला 1986 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे वीर बहादुर सिंह ने कोर्ट के रास्ते से आदेश प्राप्त कर खुलवा दिया। इसके विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी नामक संस्था का वजूद, अमल में आ गया और मुहम्मद आजम खां, सैयद शहाबुद्दीन, उबैदउल्ला आजमी, अहमद बुखारी जैसे धुआंधार वक्ताओं का उदय यदि एक समुदाय से हुआ तो उसके जवाब में अशोक सिंघल, साध्वी ऋतम्भरा, साध्वी उमा भारती, साक्षी महाराज और महंत अवैद्यनाथ जैसे उत्तेजनात्मक व आपत्तिजनक भाषण देने वाले राजनेताओं ने भी भारतीय राजनीति में अपनी जगह बना ली। कार्यकाल मात्र दस माह का रहा, उसके पश्चात एक साल तक इन्द्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने रहे। फिर 1988 से 13 माह तक भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में एन0डी0ए0 सत्ता पर काबिज रही और 1998 के आम चुनाव में अटल बिहारी के नेतृत्व में एन0डी0ए0 ने 298 सीटें लेकर पूर्ण बहुमत प्राप्त किया और कांग्रेस अपने सहयोगियों को साथ लेकर केवल 136 सीटें ही ला पाई। कांग्रेस का बुरा हश्र तब हुआ जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान अपने हाथों में ली। कांग्रेस की हार पर सोनिया गांधी को भी निशाने पर लिया गया लेकिन सोनिया गांधी ने कठोर परिश्रम कर यहीं से प्रारम्भ हुआ देश में राजनैतिक अस्थिरता का माहौल। जनता पार्टी की हुकूमत का कार्यकाल मात्र ढाई साल चला। हुकूमत के पतन का कारण दो विपरीत विचारधाराओं के बीच आपसी सामंजस्य स्थापित न होना बना। जनसंघ का नाम बदल कर आर0एस0एस0 की सलाह व मदद से भारतीय जनता पार्टी बनी। आर0एस0एस0 उनसे रिश्ते तोड़ने की बात की तो उनका असली चेहरा सामने आ गया और उन्होंने सभा को त्यागना पसंद किया। आर0एस0एस0 से अपने रिश्ते नहीं तोड़े। उस समय अटल बिहारी ने कहा था कि आर0एस0एस0 हमारी जननी है कोई बेटा अपनी मां से रिश्ता कैसे तोड़ सकता है। परिणाम स्वरूप जनता पार्टी हुकूमत का पतन हो गया।
     1980 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में लोगांे ने फिर विश्वास प्रकट किया। मुस्लिम वोट जो आपातकाल के दौरान जबरी नसबंदी से नाराज था, वह भी पुनः इंदिरा गांधी पर विश्वास करते हुए कांग्रेस में वापस लौट आया। लेकिन कांग्रेस के बुरे दिनों के दौरान काली टोपी उतार कर सफेद टोपी पहने संजय गांधी की अनुभवहीनता का लाभ उठाकर नए कांग्रेसियों ने इंदिरा
गांधी जैसी समझदार व परिपक्व राजनेत्री को यह समझाने में कामयाबी हासिल कर ली कि पहली बार कांग्रेस मुस्लिम समर्थन के बगैर सभा में वापस आयी है इसलिए अगर वह खुलकर हिन्दू कार्ड खेले तो फिर उसे कोई सभा से कभी हिला न सकेगा। इंदिरा गांधी इस झांसे में आ गईं और वीर बहादुर सिंह, अरूण नेहरू व आरिफ मो0 खां जैसे कांग्रेसी लीडरों ने अपनी मजबूत पकड़ पी0एम0 कार्यालय में बना ली।
    उधर साम्राजी शक्तियांे ने जब देखा कि इंदिरा गांधी ने उनके इरादों को शिकस्त देकर उन्हें देश की सत्ता पर अपनी पिट्ठू शासकों को बिठा कर अपने उद्देश्यों की पूर्ति के उनके सपनों को ढेर कर दिया है तो उन्होंने अपने जियाउल हक के द्वारा संचालित आई0एस0आई0 व अमरीकी सी0आई0ए0 के द्वारा सिक्खों के भीतर खालिस्तान तहरीक की लहर को पैदा कर पंजाब में आतंकवाद की फसल को पनपाना शुरू कर दिया। इसका जवाब इंदिरा गांधी ने अपने मिजाज के मुताबिक दमन से दिया और आपरेशन ब्लू स्टार अभियान का नाम देकर सैन्य शक्ति से आतंक का प्रयाय बन चुके भिंडरवाला व उनके साथियों का नरसंहार अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में कर खालिस्तान तहरीक को कुचल डाला।
    परिणाम स्वरूप धार्मिक भावनाओं से आहत उन्हीं के सिक्ख सुरक्षा गार्डों ने उनके निवास स्थल पर गोलियों से भून कर उनकी हत्या कर दी। बात यहीं तक नहीं रुकी राजधानी देहली सहित कई राज्यों में सिक्खों के विरुद्ध हिन्दुओं के क्रोध ने हिंसा का रूप धारण कर लिया और उनकी हत्या व उनके व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को लूटकर जलाने का कार्य उस वक्त तक जारी रहा जब तक राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री की शपथ ग्रहण कर शान्ति की अपील नहीं की। नेहरू इंदिरा के बाद कांग्रेस का क्या होगा की बात उठने लगी। अन्र्तराष्ट्रीय जगत में भी साम्राज्यवादी ताकतें उत्साहित थी कि अब राजनैतिक तौर पर अनुभवहीन राजीव गांधी को अपने हिसाब से वह कंट्रोल कर संचालित कर लेंगे। विदेशी मीडिया में उनकी खूब प्रशंसा रही। अमरीका के पहले दौरे पर उनके अमरीकी सदन के भाषण पर खूब तारीफों के पुल बांधे गए। वहीं कांग्रेस में मौजूद पूँजीवादी व साम्प्रदायिक सोच के लोगों ने राजीव को अपने काबू में कर उनसे गलत नीतियों पर अमल करवाना प्रारम्भ भी कर दिया। वर्षों से ठण्डे बस्ते में चले आ रहे बाबरी मस्जिद का ताला 1986 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे वीर बहादुर सिंह ने कोर्ट के रास्ते से आदेश प्राप्त कर खुलवा दिया। इसके विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी नामक संस्था का वजूद, अमल में आ गया और मुहम्मद आजम खां, सैयद शहाबुद्दीन, उबैदउल्ला आजमी, अहमद बुखारी जैसे धुआंधार वक्ताओं का उदय यदि एक समुदाय से हुआ तो उसके जवाब में अशोक सिंघल, साध्वी ऋतम्भरा, साध्वी उमा भारती, साक्षी महाराज और महंत अवैद्यनाथ जैसे उत्तेजनात्मक व आपत्तिजनक भाषण देने वाले राजनेताओं ने भी भारतीय राजनीति में अपनी जगह बना ली। कार्यकाल मात्र दस माह का रहा, उसके पश्चात एक साल तक इन्द्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने रहे। फिर 1988 से 13 माह तक भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में एन0डी0ए0 सत्ता पर काबिज रही और 1998 के आम चुनाव में अटल बिहारी के नेतृत्व में एन0डी0ए0 ने 298 सीटें लेकर पूर्ण बहुमत प्राप्त किया और कांग्रेस अपने सहयोगियों को साथ लेकर केवल 136 सीटें ही ला पाई। कांग्रेस का बुरा हश्र तब हुआ जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान अपने हाथों में ली। कांग्रेस की हार पर सोनिया गांधी को भी निशाने पर लिया गया लेकिन सोनिया गांधी ने कठोर परिश्रम कर वह चाहे कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी क्योंकि आज भी भारतीय समाज अपने अतीत के आदर्शों के प्रति मन में सम्मान रखता है। धार्मिक सहिष्णुता आपसी मेल जोल, अमन शान्ति यहाँ के आम नागरिक के खून की
धरोहर है इसे थोड़े समय के लिए उत्तेजित कर बहकाया तो जा सकता है लेकिन अन्त में सुबह का भूला शाम को वापस जरूर आता है।
-तारिक खान
 मो.09455804309

लोकसंघर्ष पत्रिका  मार्च 2015  में प्रकाशित

बुधवार, 11 मार्च 2015

‘‘कांग्रेस मुक्त भारत’’ देश के लिए सार्थक या घातक-2

भारत से मुसलमानों के पलायन  का सिलसिला मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अपने जज्बाती  भाषणों से रोक तो दिया लेकिन हिन्दू महासभा के लोगों को जाते हुए मुसलमानों का देश में रुके रहना एक आँख नहीं भाया। दोनों देशों के आजाद हो जाने के बाद दोनों ही देश के रहनुमाओं क्रमशः मुहम्मद अली जिनाह व देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पाकिस्तान व भारत को गैर धार्मिक स्टेट बनाने का एलान कर धार्मिक कट्टरपंथियों के इरादों पर रोक लगा दी। भारत में तो यह नुस्खा काफी हद तक कामयाब रहा लेकिन पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरपंथ सदैव हावी रहा।
    पाकिस्तान में तो मात्र 1 प्रतिशत हिन्दू बचे थे परन्तु भारत में उस समय भी 10 प्रतिशत से अधिक आबादी मुसलमानों की रह गई थी। जिसने मौलाना आजाद की पुकार और गांधी, नेहरू जैसे धर्मनिरपेक्ष लीडरों ने सुरक्षा की यकीन दहानी कराके उनके उखड़ चुके कदमों को फिर से अपने मादरे वतन में  जमाने का भरोसा दिया।
    26 जनवरी 1950 को भारत के संविधान में जब देश की अक्लियतों को विशेष अधिकार दिए गए, जिसमें उनकी धार्मिक आजादी की जमानत दी गई थी उनको अपने धार्मिक स्वरूप व शरई कानूनों की पाबन्दी के साथ जिन्दगी बिताने की गारन्टी दी गई थी, मुसलमानों ने राहत की सांस ली और वे इस मुल्क की तरक्की व उसके लिए मर मिटने तक में अपने वतन के साथ जुट गए। 1947 के बाद पाकिस्तान के तीन हमलों क्रमशः 1947, 1965 और 1971 में भारतीय मुसलमानों ने देश की सुरक्षा के लिए सरहद पर अपना खून भी बहाया और शहादत का जाम भी नोश फरमाया।
    आजाद भारत में कांग्रेस ने प्रथम चक्र में 1947 से 1977 तक और द्वितीय चक्र में 1980 से 1989 तक और फिर तृतीय चक्र में 1991 से 1996 तक फिर चैथे चक्र में यू0पी0ए0 के गठबंधन के साथ 2004 से 2014 तक देश में 54 वर्ष तक हुकूमत की। इसमें 17, 17 साल पं0 जवाहर लाल नेहरू व इंदिरा गांधी की हुकूमत रही। बाकी दस वर्ष यू0पी0ए0 के गठबंधन के साथ मनमोहन की हुकूमत व 5-5 वर्ष राजीव गांधी व नरसिम्हा राव की हुकूमतें रहीं।
    देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को जहाँ इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने आजाद भारत के स्वरूप को एक बहुरंगीय व बहुधर्मी सभ्यता से सुसज्जित समाज के साथ आधुनिक वैज्ञानिक सोच तथा समाजवादी आर्थिक नीतियों से सजाकर देश के आम आदमी को यह एहसास दिलाया कि इस देश की तरक्की में उसका भी महत्वपूर्ण योगदान है। पंडित नेहरू ने जब देश की बांगडोर संभाली तो उनके सामने दो तरह के माॅडल अर्थ व्यवस्था के थे। एक पूँजीवाद का माॅडल जिसमें साम्राज्यवादी शक्तियों के पास सारे आर्थिक अधिकार सीमित  हो जाते हैं। दूसरा सोवियत यूनियन व अन्य कम्युनिस्ट विचारधाराओं वाले राष्ट्रों की सामन्त शाही निजाम का सोशलिस्ट आर्थिक माॅडल। पंडित नेहरू ने दोनों के बीच का रास्ता चुना और मिक्सड एकनाॅमी का अनुसरण किया। उन्होंने देश के पूँजीपति टाटा, बिरला इत्यादि को यदि देश की औद्योगिक उन्नति की ओर ले जाने का जिम्मा सौंपा तो वहीं उनके ऊपर सरकारी अंकुश भी लगाए रखा। पंडित नेहरू ने शिक्षा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, कृषि, रक्षा, विज्ञान, पर्यावरण, प्राकृतिक, संसाधन इत्यादि के श्रोतों को सार्वजनिक क्षेत्रों के हवाले रखा। पंडित नेहरू के नेतृत्व में लगभग हर क्षेत्र में देश ने उन्नति की। 1950 से 1965 तक 7 प्रतिशत की औद्योगिक विकास इसका सुबूत है। उनके समय में विकासशील देशों में भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा हो गया था और विश्व में औद्योगिक विकास के मामले में 7वें स्थान पर भारत था। पंडित नेहरू के समय हुई उन्नति से परेशान साम्राजी शक्तियों जो भारत को बहुत मजबूरी में छोड़ कर गयी थी ने पड़ोसी राष्ट्र के साथ उसके संबंधों में खटास पैदा करनी शुरू कर दी। जबकि पंडित नेहरू ने चीन के साथ पंचशील समझौता करके चीन व भारत के बीच परस्पर सांस्कृतिक, आर्थिक व व्यावसायिक सहयोग करके रिश्तों को सुदृढ़ कर दिया था।
    साम्राजी शक्तियों ने दो विकास शील पड़ोसी मित्र राष्ट्रों की मित्रता को शत्रुता में परिवर्तित कर दिया। नतीजे में 1962 में हिन्द चीन युद्ध हुआ और सैन्य शक्ति में कमजोर भारत को चीन के हाथों पराजय का मुँह देखना पड़ा। चीन ने भारत की काफी भूमि अपने कब्जे में कर ली जो अब भी उसी के पास है। पंडित नेहरू को यह सजा साम्राजी शक्तियों ने दो कारणों से दी। एक साम्राज्यवादी नीतियों के स्थान पर समाजवादी नीतियों का अनुसरण और दूसरा दोनों सुपर पावर राष्ट्र अमरीका व सोवियत यूनियन के गुट में न शामिल होकर गुटनिरपेक्षता की राह अपनाना।
     अपने प्रयासों में विफल पंडित नेहरू इसके बाद अधिक दिन तक जीवित न रह सके और 1964 को उनका असामायिक निधन हो गया।
    पंडित नेहरू के निधन के बाद उनकी जानशीन इन्दिरा गांधी ने अपने पिता के अधूरे सपनों को और तेजी के साथ पूरा करना शुरू कर दिया। प्रारम्भ में उन्हें कांग्रेस के भीतर छिपे साम्राजी व साम्प्रदायिक शक्तियों के समर्थकों के विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन मुजाहिद बाप की बेटी भी उनसे कहीं कमजोर मुजाहिद नहीं निकली। उनके ऊपर कांग्रेस को विभाजित करने का आरोप लगा। जिद्दी मिजाजी व तानाशाही रवैये का इल्जाम लगाया गया लेकिन वे अपनी मजबूत, इच्छा शक्ति के सहारे किसी के दबाव के आगे नहीझुकीं और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती ही गई। इंदिरा गांधी के दौर में ही भारत ने अन्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त की। हरित क्रान्ति का नारा देकर उन्होंने कृषि को उसके उन्नति के शिखर पर पहुँचाया। विज्ञान एवं तकनीक के मामले में भी उन्होंने देश को विकासशील राष्ट्रों की फेहरिस्त में अग्रणी रखा। बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर ग्रामीण अंचलों तक बैंक की सुविधाएँ पहुँचा दीं। बेरोजगारी दूर करने के लिए छोटे-छोटे कुटीर उद्योग लगाने के लिए शिक्षित युवाओं को प्रोत्साहित किया। रक्षा क्षेत्र में भी उन्हीं के दौर में देश ने निपुणता हासिल की और अमरीका के दबाव को नकारते हुए 1975 में उन्होंने परमाणु विस्फोट कर उपमहाद्वीप में अपना सैन्य वर्चस्व स्थापित कर दिया। इंदिरा गांधी की ही राह का अनुसरण कर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्ठो ने भी अपने देश को औद्योगिक प्रगति तथा आर्थिक समृद्धि की ओर ले जाने की ओर कदम बढ़ा दिए। साथ ही हिन्द पाक रिश्तों में भी दोनों लीडरों ने सुधार के संकेत देने शुरू कर दिए। इन सबसे नाराज अमरीका ने दोनों को सबक सिखाने की मंसूबा साजी कर दी। दोनों ही लीडरों को उनके राजनैतिक प्रतिद्वन्द्वियों ने घेरना शुरू किया। भुट्ठो ने तो चुनाव में पाला मार लिया लेकिन इंदिरा गांधी अपने राजनैतिक विरोधियों के जाल में फँस गई और घबराकर उन्होंने देश में आपात काल की घोषणा कर दी। इससे उनके विरुद्ध ऐसा सियासी माहौल तैयार हुआ कि 1977 के आम लोकसभा चुनाव में वह परास्त हो कर सत्ता से बेदखल हो गईं। देश में पहली बार गैर कांग्रेसी हुकूमत मोरारजी देसाई के नेतृत्व में स्थापित हो गई और लीडरों की बैसाखी के सहारे साम्राज्यवादी व साम्प्रदायिक सोच रखने वाली भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता का मजा पहली बार चखा। 
-तारिक खान
 मो.09455804309
क्रमस:

लोकसंघर्ष पत्रिका  मार्च 2015  में प्रकाशित


मंगलवार, 10 मार्च 2015

‘‘कांग्रेस मुक्त भारत’’ देश के लिए सार्थक या घातक



  

 130 साल पुरानी सियासी पार्टी इंडियन नेशनल कांग्रेस जो कई नशेब व फराज से गुजर कर अब इस मुकाम पर खड़ी हैं जहाँ उसके वजूद तक पर सवाल उठ रहे हैं। ‘‘कांग्रेस मुक्त भारत’’ का सपना अवाम को दिखाया जा रहा है, इन हालात का मुकाबला करने के बजाए कांग्रेसी आपस में ही बयानबाजी कर उलझ रहे हैं। इसका क्या नतीजा मुल्क की सियासत और उसके भविष्य पर पड़ेगा, यह अपने आप में एक अहम सवाल है।
    इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना 28 दिसम्बर 1885 को गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कालेज बम्बई में ब्रिटिश ब्यूरोक्रेट एलेन आॅकटेवियन ह्यूम्स ने इस उद्देश्य से की थी कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद जो दूरी ब्रिटिश हुकमरानों व आम जनमानस में बढ़ी थी उसे कम किया जाए और आपसी विश्वास व सहयोग को बढ़ावा दिया जाए, जिससे ब्रिटिश हुकूमत को फिर किसी विरोधी हालात या विद्रोह/बगावत का सामना न करना पड़े।
    कांग्रेस पार्टी की स्थापना बाकायदा ब्रिटिश वायसराय की इजाजत से की गई थी। प्रारम्भ में मात्र 72 सदस्यों से यह पार्टी वजूद में आई थी और उनमें से सब के सब ऊँचे ओहदों पर बैठे सरकारी अफसर व राजे महराजे ही थे और इसका दायरा केवल महाराष्ट्र, बंगाल एवं पंजाब तक ही सीमित था।
      द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बाल गंगाधर तिलक, विपिन चन्द्रपाल, लाला लाजपतराम व मुहम्मद अली जिनाह ने स्वराज्य का नारा देकर इंडियन नेशनल कांग्रेस का ताल्लुक आम हिन्दुस्तानियों से पैदा किया और फिर इसमें मोतीलाल नेहरू, चितंरजन दास, राजगोपालाचारी, नरहरी पारिख जैसे लीडर जुड़ते चले गए।
    प्रारम्भ में कांग्रेस से मुसलमान नहीं जुड़ा था और मौलाना मुहम्मद अली जौहर, शौकत अली जौहर, हसरत मोहानी, हकीम अजमल खाँ, सैयद अताउल्ला शाह, बैरिस्टर जान मुहम्मद जुनेजो, डाॅ0 मुख्तार अहमद अंसारी और पीर गुलाम मुजाहिद सरहंगी (प्रथम) जैसे मुस्लिम लीडर अंग्रेजों द्वारा तुर्की की खिलाफते उस्मानिया तहरीक को कुचलने से नाराज होकर भारत में खिलाफत तहरीक का परचम उठाए हुए थे और अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार करने की तहरीक चला रहे थे जिसका असर न केवल मुसलमानों बल्कि गैर मुस्लिम कौमों पर भी पड़ना शुरू हो गया था। यह वह दौर था जब मोहनदास करम चन्द्र गांधी, बार एट लाॅ नाम का एक व्यक्ति दक्षिणी अफ्रीका से रंग भेद की नीतियों के विरूद्ध मोर्चा अंग्रेजों से लेकर लौटा था। गांधी ने जब देखा कि मुल्क में एक ओर इंडियन नेशनल कांग्रेस है जिसके अधिकांश लीडर हिन्दू धर्म से जुड़े हुए हैं और दूसरी ओर खिलाफत की तहरीक है जिसके झंडे तले मुसलमान अंग्रेजी हुकूमत से मोर्चा लेने की कोशिश में जुटे जुए हैं। गांधी ने मौके की नजाकत को भाँपकर कांग्रेस का समर्थन खिलाफत तहरीक के हक में कर दिया और असहयोग आन्दोलन की जंग में स्वराज्य को शामिल कर कांग्रेस मंे मुसलमानों के प्रवेश के दरवाजे खोल दिए। इसके नतीजे में ब्रिटिश हुकूमत के सामने एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई। कहाँ तो अंग्रेजों ने कांग्रेस जैसे एक सियासी दल को अपने रिश्ते भारतीय जनता से खुशगवार बनाने के लिए खड़ा किया था लेकिन गांधी ने दांव उलट दिया और इंडियन नेशनल कांग्रेस का प्लेटफार्म अंग्रेजों के खिलाफ ही इस्तेमाल होना शुरू हो गया। अंग्रेज इस बात से काफी फिक्रमंद थे, कि अचानक गोरखपुर के चैरी चैरा में असहयोग आन्दोलन हिंसक हो गया और 23 सिपाहियों को जिन्दा पुलिस चैकी में भीड़ ने जला दिया। जिसमें अधिकांशतः भारतीय सिपाही थे। गांधी ने इस बात से दुःखी होकर असहयोग आन्दोलन को समाप्त करने की घोषणा 1942्र में कर दी। खिलाफत तहरीक से जुड़े लीडर मुहम्मद अली जौहर इत्यादि तथा गांधी के बीच इस मुद्दे पर विवाद का पूरा लाभ अंग्रेजों ने उठाया और उन्होंने अपनी कूटनीतिक चालों से एक तरफ हिन्दुओं को भड़का कर हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के उदय में अहम भूमिका अदा की तो उसके जवाब में मुहम्मद अली जौहर ने इंडियन मुस्लिम लीग की ओर पुनः वापसी कर ली। एक और बात अली भाइयों को कांग्रेस के विरुद्ध ले गई वह यह कि अंग्रेजी शासकों की मंशा के अनुरूप मोती लाल नेहरू द्वारा लिखित एक संविधान के अधीन देश में भारतीय हुकूमत का समर्थन कांग्रेस करने पर राजी हो गई थी। इस पर मुहम्मद अली जौहर राजी नहीं थे।
    कांग्रेस में मौलाना अबुल कलाम आजाद ही सबसे वफादार मुस्लिम कांग्रेसी साबित हुए और बाकी साथ निभाया अफगानिस्तान के पश्तो लीडर खान अब्दुल गफ्फार खाँ ने। 1937 में गवर्नमेन्ट आॅफ इण्डिया एक्ट के तहत होने वाले प्रान्तीय चुनावों में मद्रास, सेन्ट्रल प्राविन्सेज बिहार, उड़ीसा, यूनाइटेड प्राविन्सेज बम्बई प्रेसीडेन्सी, आसाम, नार्थ वेस्ट फ्रन्टियर प्राविसेंज में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग को पराजित कर जीत दर्ज की। केवल बंगाल, पंजाब एण्ड सिंध प्रान्तों में मुस्लिम लीग को जीत मिली। यहीं से कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच दूरियाँ बढ़नी शुरू हुई। इसी बीच 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया। मुहम्मद अली जिनाह ने अंग्रेजों का साथ देने का निर्णय लिया, लेकिन कांग्रेस इसके लिए राजी नहीं हुई बल्कि सुभाष चन्द्र बोस ने तो अंग्रेजों के साथ सीधे युद्ध करने के मकसद से आजाद हिन्द फौज का गठन कर दिया। अन्ततः 22 अक्टूबर 1939 को कांग्रेस के नेतृत्व में कांग्रेस मुस्लिम लीग की मिली जुली प्रान्तीय सरकारें गिर गईं।
    इसी बीच द्वितीय विश्व युद्ध का भी अंत हो गया। अमरीका व उसके सहयोगी राष्ट्रों ने हिटलर व उसके सहयोगियों को शिकस्त तो दे दी थी परन्तु इंग्लैण्ड बुरी तरह से तबाह व बर्बाद हो गया। इसका असर उसके शासित देशों पर भी पड़ा और आजाद भारत की प्राप्ति की ओर कांग्रेस ने और दबाव भारत छोड़ो आन्दोलन’’ 1942 में छेड़ दिया। अंग्रेजों ने भी भारत से जाने का मन बना लिया था। 1946 में कैबिनेट मिशन प्लान की घोषणा के साथ भारत में सत्ता हस्तान्तरित करने की योजना पर अंग्रेजी शासकों ने कार्य शुरू कर दिया। उधर मुहम्मद अली जिनाह के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने अंग्रेजों की शह से कांग्रेस को मात देने के लिए पाकिस्तान के अलग राष्ट्र का ट्रम्प कार्ड फेंक कर कांग्रेस के साथ ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू कर दिया और मात्र 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी के लिए स्वतंत्र भारत में राज्य करने के लिए 50 प्रतिशत की भागीदारी की माँग उठाई जो कांग्रेस ने नामंजूर कर दी और फिर चल पड़ा मुस्लिम लीग व हिन्दू महासभा के लीडरों के उत्तेजनात्मक भाषणों का सिलसिला, जिसके चलते कत्ल, गारतगरी व खूंरेजी का खौफनाक दौर। ट्रेनों व ट्रकों में मर्दों, औरतों, बूढ़ांे व बच्चों की लाशों के लोथडे़ हिन्दू व मुस्लिम बाहुल्य इलाकों से आते जाते रहे। करोड़ों लोगों के पलायन का क्रम भी जारी रहा। अंत में 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान बन जाने के बाद तथा एक दिन बाद 15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी के बाद इस रक्तरंजित राजनीति का अंत हुआ।
-तारिक खान
 मो.09455804309
क्रमस:
लोकसंघर्ष पत्रिका  मार्च 2015  में प्रकाशित
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