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शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

पूर्वोत्तर : अपने ही जाल में खुद फंस गई भाजपा

नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के शब्दकोष में राजनैतिक शुचिता जैसी कोई संज्ञा नहीं... 
    अरुणाचल में भाजपा ने जो खेल किया उसकी परिणति एक पूर्व मुख्यमंत्री की आत्महत्या में हुई। अरुणाचल और मणिपुर दोनों में सत्तालोलुप राजनेता ही भाजपा के साथ जुड़े हैं। यही स्थिति नागालैण्ड, त्रिपुरा और मेघालय में दिखाई दे रही है। इसके परिणाम दीर्घकाल में अच्छे नहीं होंगे।
    भारतीय जनता पार्टी त्रिपुरा के विधानसभा चुनावों में मिली शानदार जीत के लिए निश्चित ही बधाई की हकदार है। बात यहाँ समाप्त नहीं हो जाती। जिस दिन चुनाव परिणाम आए उस दिन से यह प्रचार लगातार किया जाता रहा कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में लाल किला ढह गया है और केसरिया ध्वज चारों ओर लहरा रहा है। मैं सवाल करना चाहता हूँ कि भारतीय जनता पार्टी कब तक इस छद्म के सहारे चलेगी। मेरा जनता से भी सवाल है कि वह कब तक आँखें मूँदकर, कान बंद कर इस छलना को समझने से इंकार करती रहेगी। भारतीय जनता पार्टी का प्रचारतंत्र जिस तरह दिन में अड़तालीस घंटे काम कर रहा है उसे देखकर मुझे दो बातें प्रतीत होती हैं-एक तो यह कि भाजपा जनता को मूर्ख समझती है और उसने एक पुरानी कहावत को पलटकर इस तरह रख दिया है कि आप हर समय हर व्यक्ति को बेवकूफ बना सकते हैं। दूसरी, अगर ऐसा नहीं है तो क्या हम यह मान लें कि भारत के मतदाता ने एक बिल्कुल नई राह पकड़ ली है, जिसमें आदर्श और सिद्धांतों की कोई गुंजाइश नहीं है बल्कि संकीर्ण मानसिकता से उपजे एक मध्ययुगीन भग्न स्वप्न को फिर यथार्थ में बदलने का लक्ष्य है?
    उत्तर-पूर्व के राजनैतिक और चुनावी नक्शे पर एक उड़ती दृष्टि डाल लेना उचित होगा। त्रिपुरा में पिछले बीस साल से सीपीएम के माणिक सरकार मुख्यमंत्री थे। उनके पहले भी नृपेन चक्रवर्ती और दशरथ देब के नेतृत्व में वामपंथी सरकार थी। इस लंबे दौर में त्रिपुरा में आंतरिक अशांति के कारणों का समाधान हुआ, वहाँ जो उग्रवाद पनपा था वह नियंत्रित हुआ। अपने आप में यह एक बड़ी उपलब्धि थी। फिर भी लंबे समय तक किसी एक पार्टी का शासन हो तो मतदाता ऊबने लगते हैं, उनमें असंतोष पनपने लगता है और वे बदलाव की अपेक्षा करने लगते हैं। सत्तारूढ़ दल इतने समय तक बिना कोई गलती किए राज करेगा, ऐसा कोई नहीं सोचेगा यानी उसे अपनी गलतियों का खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। इसके अलावा त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी और उसकी पितृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने घोर परिश्रम किया और उन्हें अपनी रणनीति में कामयाबी मिली। यह तथ्य ध्यान रखने योग्य है कि त्रिपुरा में भाजपा और माकपा को प्राप्त कुल मतों में बहुत अधिक अंतर नहीं था, शायद एक प्रतिशत का भी नहीं।
    भारतीय जनता पार्टी ने एक ओर जहाँ दो अलगाववादी पार्टियों के साथ चुनावी समझौता किया, वहीं उसने कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के विधायकों और नेताओं को चाणक्य नीति पर चल कर अपने साथ जोड़ने में सफलता हासिल की। त्रिपुरा में कांग्रेस पहले भी सत्ता में नहीं थी। इस चुनाव में भी उसके पास खोने के लिए बहुत कुछ नहीं था। कांग्रेस की शायद यह भी सोच थी कि माकपा की जीत से उसे आगे चलकर लोकसभा चुनावों के समय गठबंधन में सहायता मिलेगी। दूसरी ओर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की विडंबना कि उसके शीर्ष नेतृत्व में टकराव चल रहा है। पार्टी एक तरह से पश्चिम बंगाल और केरल ऐसे दो खेमों में बँट गई है। जनाधारविहीन प्रकाश करात की नीतियों ने पार्टी का जो नुकसान किया है उसे अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है। कुल मिलाकर ऐसे कारण बने जिनसे भाजपा की जीत सुनिश्चित हो गई।
   माणिक सरकार की सादगी और ईमानदारी को बहुत उछाला गया। हमने ऐसे बहुत से चरित्रवान, सादगी पसंद और ईमानदार लोगों को पहले भी चुनाव हारते देखा है।
    अब नागालैण्ड की बात करें। यहाँ जिस क्षेत्रीय दल के साथ भाजपा ने पिछले पाँच साल या शायद उससे भी पहले से गठबंधन कर रखा था उसे चुनाव के ऐन पहले तोड़ दिया और एक दूसरे क्षेत्रीय दल के साथ नया मोर्चा बना लिया। चुनाव में दोनों पार्टियों को बराबर-बराबर सीटें मिलीं और कुछ समय के लिए एक संवैधानिक संकट की स्थिति बन गई। जब निवर्तमान मुख्यमंत्री ने पद छोड़ने से इंकार कर दिया। उनकी माँग थी कि उन्हें ही दोबारा शपथ ग्रहण कराई जाए। इस स्थिति में भाजपा क्या करती? राज्यपाल उसका है इसलिए वह नए गठबंधन के नेता को मुख्यमंत्री पद का आमंत्रण भिजवा सकती थी, लेकिन नागालैण्ड में भाजपा की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया है। जिसका साथ उसने छोड़ा वह पार्टी बराबरी की ताकत बनकर उभरी है, वह भी बिना भाजपा के सहारे, इसलिए उसका मनोबल ऊँचा है। क्या ऐसे में भाजपा नए दोस्त को छोड़कर पुराने साथी की ओर हाथ बढ़ाएगी या फिर नए गठबंधन में पिछलग्गू बनकर सत्ता हासिल करेगी?
    नागालैण्ड की बात करते समय यह नहीं भूला जा सकता कि केन्द्र की मोदी सरकार ने विद्रोही नागा गुटों के साथ कोई गुप्त समझौता किया है। इसका खुलासा अभी तक नहीं हुआ है। यह चर्चा अवश्य सुनने को मिलती है कि वृहत्तर नगालिम बनेगा जिसमें मणिपुर आदि के नगा इलाके भी शामिल होंगे तथा इस नए प्रदेश के अपने अलग ध्वज आदि होंगे। इसको लेकर मणिपुर में संशय पनप रहा है जहाँ अनैतिक रूप से भाजपा ने सत्ता हासिल की है। भाजपा यदि प्रदेश की सत्ता में आती है तो क्या वह इस कथित समझौते को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ेगी? यदि हाँ तो पड़ोसी मणिपुर में इसका क्या असर पड़ेगा और यदि नहीं तो नगालैण्ड की जनता उस पर आगे कितना विश्वास रख पाएगी? एक तरफ त्रिपुरा के अलगाववादी दल, दूसरी ओर नगालैण्ड की यह उलझन। कहना ना होगा कि भाजपा यहाँ अपने ही जाल में खुद किसी हद तक फँस गई है। इससे बाहर निकलने के लिए भारी युक्ति और कौशल की आवश्यकता होगी।    मेघालय में भारतीय जनता पार्टी ने जो खेल खेला है उसकी खुले शब्दों में निंदा की जानी चाहिए। मेघालय में आज तक कभी किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, लेकिन संसदीय परंपरा है कि सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का न्यौता दिया जाता है। मेघालय के राज्यपाल ने जो किया उससे इस परिपाटी का उल्लंघन हुआ है। भाजपा को इस सवाल का जवाब देना पड़ेगा कि मेघालय में सबसे बड़ी पार्टी को सरकार न बनाने देने से उसने कौन सा आदर्श स्थापित किया है। उल्लेखनीय है कि मेघालय में भाजपा को मात्र दो सीटें मिलीं। यहाँ उसके सहयोग से कोनराड संगमा मुख्यमंत्री बन गए हैं। वे पी.ए. संगमा के बेटे हैं। उनकी बहन भी चुनाव जीती हैं। कांग्रेस पर वंशवाद का आरोप मोदीजी और उनके भक्तों ने खूब लगाया लेकिन अब पूर्णों संगमा के बेटे को मुख्यमंत्री बनाने में इन्हें वंशवाद नजर नहीं आया, बल्कि इस तथ्य को भाजपा ने
सुविधापूर्वक भुला दिया। संभव है कि आने वाले दिनों में वह मेघालय कांग्रेस में तोड़-फोड़ की वैसी ही कोशिश करे जैसे उसने अरुणाचल और मणिपुर में की थी।
    इन्हें बुत डराते हैं, चाहे वो अम्बेडकर हों या लेनिन ये गद्दार हैं। देश बेच देंगे, बैंक झोले में भरकर झोला उठाकर ब्रिटेन भाग जाएँगे
    एक विहंगम दृष्टि डालें तो हमारी समझ में आता है कि उत्तर-पूर्व के किसी भी प्रांत में भारतीय जनता पार्टी की मूलरूप से कोई प्रभावी स्थिति नहीं है। वह जिन राज्यों में सत्तारूढ़ है वहाँ उसने अधिकतर जोड़-तोड़ से सत्ता हासिल की है। सबसे पहले असम में हिमंत विश्व शर्मा जैसे अवसरवादी कांग्रेसी नेता को उसने तोड़ लिया। शर्मा जोड़-तोड़ में अवश्य माहिर होंगे, लेकिन उसकी भी कोई सीमा होती है। अरुणाचल में भाजपा ने जो खेल किया उसकी परिणति एक पूर्व मुख्यमंत्री की आत्महत्या में हुई। अरुणाचल और मणिपुर दोनों में सत्तालोलुप राजनेता ही भाजपा के साथ जुड़े। यही स्थिति नगालैण्ड, त्रिपुरा और मेघालय में दिखाई दे रही है। इसके परिणाम दीर्घकाल में अच्छे नहीं होंगे।
    नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के शब्दकोष में राजनैतिक शुचिता जैसी कोई संज्ञा नहीं है। आप पिछली सरकारों को चाहे जितना कोसते रहें, लेकिन स्वयं आपने क्या किया है, इसके बारे में जनता आज नहीं तो कल सवाल अवश्य पूछेगी। एक समय भाजपा चाल चरित्र और चेहरा की बात करती थी, अब वह सिर्फ दो लोगों के चेहरे और उनकी चाल नहीं, बल्कि चालबाजी के सिद्धांत पर अमल कर रही है। अब देखना यही है कि प्रचारतंत्र के भरोसे जो तिलिस्म खड़ा किया है, वह भरम कब टूटता है।



-ललित सुरजन
लोकसंघर्ष पत्रिका मार्च 2018 में प्रकाशित 

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

हारने के बाद भी जीत का जश्न

प्रतापगढ़ के पुलिस अधीक्षक शगुन गौतम 80 वर्षीय अल्पसंख्यक मतदाता की पिटाई करते हुए
उत्तर प्रदेश स्थानीय निकाय चुनाव में नगर निगम की कुल 16 सीटों में से 14 सीटें जीतकर सत्तारूढ़ डाल भाजपा ने मीडिया के माध्यम से जनता के ऊपर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का प्रयास शुरू किया है कि उसने स्थानीय निकाय में भारी सफलता हासिल की है जबकि नगर पालिका परिषद् अध्यक्ष कुल 198 पदों में भाजपा ने मात्र 70 पद पर जीत हासिल की है. वहीँ नगर पंचायत अध्यक्ष के कुल 438 पदों पर भाजपा ने मात्र 100 पदों पर जीत हासिल की है लेकिन नगर निगम के चुनावों के परिणाम को आधार बना कर पूरे देश में सत्तारूढ़ दल जीतने का दावा करने से बाज नही आ रही है.बीजेपी के 3,656 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई है पार्टी के सभी उम्मीदवारों में से 45 फीसदी बीजेपी के उम्मीदवार ऐसे हैं जिनकी जमानत जब्त हुई है। वहीं नगर पंचायत सदस्य के चुनाव में बीजेपी को मात्र 11.1 फीसदी सीट पर जीत मिली है।
           स्थानीय निकाय चुनाव में मुख्यमंत्री अजय सिंह बिष्ट उर्फ़ आदित्यनाथ ने दो हफ़्तों में 33 जनसभाएं की. प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ मिश्रा, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा सहित मंत्रियों ने पूरे प्रदेश में धनबल व सरकार का प्रयोग करते हुए जनता को अपने पक्ष में करने की कोशिश की लेकिन सफलता हाथ नही लगी.
        उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के गृह जनपद कौशाम्बी में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा है. यहां तक कि जिस वार्ड में केशव का घर पड़ता है वहां भी बीजेपी की हार हुई है.सभी 6 नगर पंचायतों में भाजपा की जबरदस्त हार हुई है. वहीँ, मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने गोरखपुर जिले के जिस वार्ड में अपने मत का प्रयोग किया था वहां भी भाजपा हार गयी है.  इसी तरह उत्तर प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनाव में सत्तारूढ़ दल के मंत्रियों के अथक प्रयास करने के बावजूद अधिकांश प्रत्याशी चुनाव हार गये हैं लेकिन मीडिया द्वारा चुनाव जीतने का जश्न मनाया जा रहा है. लगता नहीं है कि सरकार में बैठे हुए लोग विवेकशील व्यक्ति हैं या लफ्फाजों या गप्पबाजों के गिरोह के सरगना हैं. 
        जहाँ तक निष्पक्ष चुनाव कराने की बात है वहां पर योगी सरकार स्थानीय निकाय चुनाव में सही मतदाता सूची भी नहीं बनवा पायी थी. मतदाता सूची में सैकड़ों नाम उसी वार्ड में कई बार थे. फिर वही नाम दूसरे वार्डों में भी थे और ऐसे लोगों के नामों की फर्जी आईडी सत्तारूढ़ दल द्वारा देकर मतदान कराया जा रहा था. देखने में यह भी आया है कि सत्तारूढ़ दल के कई प्रत्याशी फर्जी आईडी प्रूफ बनाने की मशीने भी लगाये हुए थे. मतदाताओं को डराने और धमकाने का काम मजिस्ट्रेट स्तर के अधिकारी पुलिस बल के साथ कर रहे थे. हिन्दुस्तान अखबार में बाराबंकी जनपद की एक फोटो प्रकाशित हुई है जिसमें एसडीएम व सीओ एक मतदाता को पोलिंग स्टेशन के सामने मुर्गा बनाये हुए हैं और बाकी पुलिस बल उस दृश्य का आनंद ले रहा है.
                   बाराबंकी, प्रतापगढ़ सहित प्रदेश के अनेक जिलों में चुनाव मशीनरी को संचालित करने वाले बड़े अधिकारीयों ने नियोजित तरीके से अल्पसंख्यक बाहुल्य मतदान केन्द्रों पर सुबह से ही तोड़फोड़ व मतदाताओं की पिटाई का अभियान चला रखा था जिससे अल्पसंख्यक मतदाता अपने मत का प्रयोग न कर सकें. क्या यह योगी सरकार की निष्पक्षता का सबूत है ? 
              लोकतंत्र में प्रचार तो चलता है लेकिन नागपुर की संघी प्रयोगशाला दुष्प्रचार करने में माहिर है.  भाजपा अपनी नीतियों के कारण हार रही है लेकिन जनता में यह भ्रम पैदा किया जा रहा है कि वह जीत रही है. 

रणधीर सिंह सुमन 

मंगलवार, 6 सितंबर 2016

भाजपा के नेताओं की सोच कश्मीर समस्या को और पेचीदा बनाएगी


जिस तरह से कश्मीर में छर्रे के बौछार वाली बंदूकों का इस्तेमाल डेढ़ महीने से ऊपर किया जाता रहा यह सोचने वाला विषय है कि क्या भारत के किसी और हिस्से में सरकार एक दिन भी इस तरह का हथियार लोगों के खिलाफ इस्तेमाल कर पाती? लोग शायद बगावत पर उतर आते और सरकार ही न चलने देते। सरकार के मंत्री कश्मीर की जनता को हिंसा छोड़ने की नसीहत दे रहे हैं। किंतु बुरहान वानी की मृत्यु के बाद से अब तक के कश्मीर में चले सबसे लम्बे कर्फ्यू में आम जनता से लोगों के मरने के आंकड़े रोज बढ़ रहे थे न कि सुरक्षा बलों के लोगों के। सवाल यह है कि किसकी हिंसा ज्यादा जानलेवा या घातक थी? यदि लोगों से हिंसा छोड़ समाधान की दिशा में सहयोग की अपील की जाती है तो सरकार भी सुरक्षा बलों की हिंसा को रोक माहौल को सामान्य बनाने में अपनी भूमिका अदा करनी होगी। 52 दिनों के बाद कर्फ्यू उठाया गया है।

       अरुण जेतली ने साम्बा में अपने भाषण में कहा कि चाहे हथियार का इस्तेमाल करने वाले हों अथवा पत्थर फेंकने वाले दोनों से सख्ती से निपटा जाएगा। राजनाथ सिंह ने कहा कि वे कश्मीरी युवा के हाथ में पत्थर व बंदूक के बजाए पेन, कम्प्यूटर या रोजगार देखना चाहेंगे। रक्षा मंत्री मनोहर परिक्कर ने पाकिस्तान को नर्क कहा है। प्रधान मंत्री कहते हैं हिंसा के लिए उकसाने वाले बच नहीं सकेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि जान चाहे किसी की जाए, युवा हो या सुरक्षाकर्मी, तो यह देश का ही नुकसान है। नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से आने वाले शरणार्थियों के लिए रु. 2000 करोड़ की राशि आवंटित करने की घोषणा की है। भाजपा के सभी नेता मानते हैं और अब महबूबा मु्फ्ती से भी कहलवाया जा रहा है कि कश्मीर में जो भी असंतोष है उसके लिए पाकिस्तान जिम्मेदार है।
      
भाजपा नेताओं की सरलीकृत सोच कश्मीर समस्या को समाधान की दिशा में न ले जाकर और पेचीदा बनाएगी।
      
नेताओ ंके बयान से ऐसा लगता है कि विकास से लोगों के असंतोष का दूर किया जा सकता है। किंतु यदि भौतिक विकास से ही लोग संतुष्ट हो जाते तो पड़ोसी सम्पन्न पंजाब का युवा इतने बड़े पैमाने पर नशे का शिकार नहीं होता। क्या सरकार सोचती है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से आने वालों को धन देकर उनकी वफादारी खरीदी जा सकती है? यदि ऐसा होता तो कश्मीर में अन्य राज्यों की अपेक्षा विकास पर ज्यादा धन खर्च करने के बाद आज यह स्थिति न होती। कश्मीर के लोग भारत से खुश नहीं हैं। वे तब तक खुश नहीं हो सकते जब तक कश्मीर समस्या का समाधान उनके मन मुताबिक नहीं निकाला जाता। ज्यादातर विशेषज्ञों का कहना है कि यह हल किसी किस्म की स्वायत्ता होगी जो कश्मीरियों को मंजूर हो। कम से कम भारत द्वारा थोपा कोई हल शायद यहां के लोगों को स्वीकार न हो। भाजपा नेता जितनी जल्दी यह बात समझ जाएंगे उतनी ही उनकी और कश्मीरियों की तकलीफ कम होगी।
      
कश्मीर में लोगों को भरोसा दिलाने के लिए कि सरकार समाधान के लिए गम्भीर है सुरक्षा बलों को धीरे धीरे हटाना चाहिए। 13 वर्षों में पहली बार सीमा सुरक्षा बल को भी बुलाया गया। सुरक्षा बलों की भूमिका सीमा पर है, उन्हें वहां तैनात रहना चाहिए। अंदरूनी कानून और व्यवस्था जम्मू व कश्मीर की सरकार और पुलिए पर छोड़नी चाहिए। आखिर देश में अन्य जगहों पर भी आतंकवादी हमले होते हैं। क्या हर जगह सुरक्षा बलों को न्योता दिया जाता है? और इतने लम्बे समय तक कहीं सुरक्षा बलों को रखा जाता है?
      
अरुण जेतली को सोचना चाहिए कि आम कश्मीरी महिला और बच्चा भी क्यों पत्थर उठा रहा है? पत्थर तो लोग सुरक्षा बलों की हिंसा की प्रतिक्रिया में उठा रहे हैं। बल्कि जेतली को तो कश्मीरियों का धन्यवाद देना चाहिए कि लोग सिर्फ पत्थर ही उठा रहे हैं और बड़े पैमाने पर कोई हिंसा नहीं कर रहे। ऐसे कश्मीरी जो सुरक्षा बलों पर घातक हमले कर सकें उनकी संख्या तो बहुत कम है। सुरक्षा बल तो पत्थरों से अपनी सुरक्षा कर ही सकती हैं। किंतु लोग, जिनमें बच्चे और महिलाएं भी शामिल हैं, अपने को छर्रे के बौछार वाली बंदूकों से कैसे बचाएंगे? इस हथियार से 8 वर्षीय जुनैद का फेफड़ा फटने से या 16 वर्षीय इंशा की आंख जाने से लोगों के पास क्या सुरक्षा है? जितने लम्बे समय से कश्मीरी इन घातक हथियारों को झेल रहे हैं हमें कहना होगा कि कश्मीरी हिसंक नहीं बल्कि बहुत सहनशील हैं। मुख्य मंत्री को शर्म भी नहीं आती कि वे इंशा से अस्पताल में पूछती हैं कि क्या वह उनसे नाराज है? इतना अपमान कहां की जनता झेलेगी? भारत के मुख्य भू-भाग में इस किस्म की हिंसा, शायद आदिवासी इलाके को छोड़, कहीं भी बरदाश्त नहीं की जाती। कश्मीरियों का यह सवाल जायज है कि भारत में छर्रे के बौछार वाली बंदूकों का इस्तेमाल अब तक और कहीं क्यों नहीं किया गया? क्या हम कश्मीरी को अपना उतना नागरिक नहीं मानते जितना अन्य किसी राज्य के नागरिक को? कोई भी संवेदनशील लोकतांत्रिक सरकार इस किस्म के हथियार का इस्तेमाल अपने नागरिकों पर नहीं करेगी। इसे इजराइल फिलीस्तीनी लोगों पर इस्तेमाल करता है परन्तु इजराइल का फिलीस्तीनियों से वैसा रिश्ता नहीं है जैसा कि भारत कश्मीर के साथ होने का दावा करता है।
      
पाकिस्तान को कश्मीर में होने वाली सभी प्रकार की हिंसा के लिए दोषी मान लेना सरकार की ही किरकिरी है। इसका मतलब यह है कि पाकिस्तान का कहीं न कहीं लोगों पर प्रभाव है और भारत उसके सामने लाचार है। जिस तरह आज भारत बलूचिस्तान, गिलगित, बल्तिस्तान या पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में लोगों के असंतोष का फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है वही काम पाकिस्तान ने इतने सालों से कश्मीर में किया है।
      
प्रधान मंत्री कह रहे हैं कि हिंसा के लिए उकसाने वाले बचेंगे नहीं। इस कथन में यह अहंकार झलकता है कि सरकार ही सही है और जनता गलत। क्या नरेन्द्र मोदी अपने कथन को देश के अंदर उनके हिन्दुत्ववादी साथियों द्वारा की गई हिंसा के संदर्भ में भी लागू करेंगे?
      
भाजपा के नेताओं को सभी तरह की परिस्थितियों से निपटने का एक ही तरीका आता है - सख्ती। कश्मीर का मामला बहुत पेचीदा हो चुका है। भाजपा नेता इतना ही कर सकते हैं कि उसे और पेचीदा न बनाएं।
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संदीप पाण्डेय
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