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गुरुवार, 8 अगस्त 2013

महंत विनय दास को यशपाल पुरस्कार

महंत विनय दास
लोकसंघर्ष पत्रिका के सलाहकार महंत विनय दास की कहानी संग्रह 'सही गलत के बीच' पुस्तक को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा यशपाल पुरस्कार से सम्मानित करने का निर्णय हुआ है इसमें हिंदी संस्थान द्वारा विनयदास  को 50 हजार रुपये व सम्मान पत्र दिया जायेगा. वहीँ आज श्री विनय दास को परिकल्पना लोकभूषण सम्मान भी प्राप्त हुआ है. लोकसंघर्ष परिवार की तरफ से उनको हार्दिक बधाई।

सुमन 
लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

मंदिर के कोई पोख़्ता प्रमाण भी नहीं मिले:विनोद दास

साहित्य जगत के नामचीन कवि, कथाकार विनोद दास मुम्बई से, प्रखर समीक्षक व कथाशिल्पी विनयदास की अयोध्या मुद्दा बनाम राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद प्रकरण पर एक बेबाक बातचीत-
युवा ज्ञानपीठ पुरस्कार, श्रीकान्त वर्मा पुरस्कार, केदारनाथ अग्रवाल सम्मान जैसे अनेकशः पुरस्कारों से सम्मानित कवि विनोद दास ‘खिलाफ हवा से गुजरते हुए,’ ‘वर्णमाला से बाहर,’ ‘कविता का वैभव’ (समीक्षा) ‘भारतीय सिनेमा का अन्तःकरण,’ ‘बतरस’ (इन्टरव्यू) जैसी पुस्तकों के रचयिता हैं। उनकी काव्य चेतना पर हैदराबाद यूनिवर्सिटी से लघुशोध तथा उनकी फिल्म पुस्तक पर नागपुर यूनिवर्सिटी से लघु शोध प्रबन्ध भी हो चुके हैं।
विनयदास-साठ वर्षों के लम्बे अन्तराल से अयोध्या मन्दिर-मस्जिद मुद्दे पर उच्च न्यायालय के 30 सितम्बर 2010 के फैसले को किस हद तक कानूनी माना जा सकता है क्योंकि फैसले का मुख्य आधार आस्था है? इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
विनोददास-जहाँ तक मुझे लगता है यह एक राजनैतिक फैसला है। इस फैसले में न्याय की जो बुनियादी संरचना है उसका पालन नहीं हुआ है, क्योंकि यह फैसला आस्था के आधार पर दिया गया है न कि दस्तावेजी प्रमाणों के आधार पर यहाँ यह भी याद रखना चाहिए कि यहाँ पर रामलला मंदिर के कोई पोख्ता प्रमाण भी नहीं मिले हैं।
विनयदास-अभी तक मुसलमानों का कहना था, हमें न्यायालय का फैसला मान्य होगा। किन्तु फैसला आने के बाद वे इसे मानने से अब मुकर रहे हैं। इस सन्दर्भ में आपकी क्या राय है?
विनोददास-मुसलमान कहाँ मुकरे हैं। इस फैसले के बाद उन्होंने अद्भुत धैर्य का परिचय दिया है। फिर इसे अभी एक कोर्ट ने कहा है। यह फैसला उन्हें न्याय के आधार पर नहीं लगता है। इसके लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खुला है। विश्वास है शायद उन्हें वहाँ न्याय मिल सके। उन्हें इस फैसले के विरोध में आगे जाना ही चाहिए।
विनयदास- न्यायिक प्रक्रिया और आस्था में आप कैसा और कितना सम्बन्ध देखते हैं?
विनोददास- जाहिर है आस्था मनुष्य की एक निजी सोच है, निजी व्यवस्था है, जबकि कानून एक सामाजिक व्यवस्था है। हर नागरिक की अलग-अलग आस्थाएँ हैं। मेरी समझ से आस्था का प्रश्न वैयक्तिक है जबकि कानून सामाजिक समानता, सामाजिक समरसता के सिद्धान्त पर बना है। अतः मैं न्याय के पक्ष में हूँ न कि आस्था के।
विनयदास- अयोध्या मन्दिर मस्जिद के फैसले पर कम्युनिस्ट ज्यादातर चुप रहे। क्या वे इस फैसले से असन्तुष्ट और इस मुद्दे को न हल होने देने के पक्ष में है।
विनोददास- कम्युनिस्ट चुप कहाँ हंै? फिर कम्युनिस्ट से आपका आशय क्या है? इसका विरोध कमोबेश सभी कम्युनिस्टों ने किया है। वे इस फैसले के स्थाई समाधान में विश्वास रखते हैं न कि इसके अस्थाई और तात्कालिक समाधान में। वे इसे नासूर नहीं बनने देना चाहते हैं। हो सकता है एक पक्ष जो अभी आपको शान्त दिखाई देता है आगे चलकर वह बम-सा विस्फोट कर जाए। जिससे पूरे समाज में अशान्ति फैल जाए।
विनयदास- सुन्नी वक्फ बोर्ड इस निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट जाना चाहता है। यदि वह उच्च न्यायालय के निर्णय को स्वीकार नहीं कर सका, तो क्या वह उच्चतम न्यायालय के निर्णय को, जो इसी से मिलता-जुलता हुआ तो क्या वह उसे स्वीकार कर लेगा।
विनोददास- अगर वे ऐसा कर रहें हैं तो बुरा क्या कर रहे है? अगर वे ऐसा कह रहे है तो हमें उन पर विश्वास करना चाहिए।
विनयदास- मन्दिर स्थल की खुदाई में जो ध्वंसावशेष मिले हैं उसे पुरातत्व विदों ने जाँच के बाद मन्दिर के पक्ष के अवशेष बताए हैं फिर मस्जिद का सवाल ही कहाँ?
विनोददास- मेरी समझ में जो पुरातात्विक अवशेष मिले हैं वे मन्दिर के पक्ष में नहीं हैं। यदि वहाँ मन्दिर होता तो हड्डियाँ न मिलतीं और वहाँ पर कब्रें न मिलतीं। इससे लगता है वहाँ मन्दिर नहीं था।
विनयदास- विश्व हिन्दू परिषद, बजरंगदल, आदि विभिन्न हिन्दू संगठन भी इस फैसले पर मुसलमानों के असन्तोषजनक प्रतिक्रिया स्वरूप अब असन्तोष व्यक्त कर रहे हैं। वे कह रहे हैं राम मन्दिर-अयोध्या प्रकरण को हम शाहबानो फैसले की तर्ज पर पार्लियामेन्ट में ले जाएँगे। जब पार्लियामेन्ट उनके लिए कानून बदल सकती है, संशोधित कर सकती है तो हमारे लिए क्यों नहीं?
विनोददास- पार्लियामेन्ट कानून बना सकती है। जिसके आधार पर फैसला लिया जा सकता है। मगर वह फैसला दे नहीं सकती फैसला अन्ततः न्यायालय को ही करना होगा। जो लोग ऐसा कह रहे हैं उन्हें कानून के प्रक्रिया की जानकारी नहीं है। अशोक सिंघल आई0पी0एस0 रह चुके हैं जब वे ऐसी बात कह रहे हैं तो इसे हमारे देश का दुर्भाग्य ही समझें।
विनयदास- क्या आपको नहीं लगता कि न्यायालय का फैसला न्याय की प्रक्रिया से कम और सामाजिक समरसता के सिद्धान्त से अधिक प्रेरित है। इस कारण से देश में एक बड़ा तूफान आने से बच गया।
विनोददास- आपकी बात बिल्कुल ठीक है। इस दृष्टि से देखें तो यह फैसला एक हद तक संतोषजनक कहा जा सकता है। इसमें सभी को सन्तुष्ट करने की कोशिश की गई है। इसमें सामाजिक समरसता का ध्यान रखा गया है मगर कानूनी प्रक्रिया का नहीं।

-विनयदास
मोबाइल: 09235574885

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

नव पूँजीवाद का जघन्यतम चेहरा

विगत कई एक वर्षों के प्रकाशकों का लेखा, जोखा, रुझान, पुस्तक मेला में हुई खरीद, फरोख्त का ब्यौरा आदि को यदि ध्यान से देखें तो विशेषकर एक बात उभरकर सामने आती है कि सूचनात्मक, ज्ञानवर्द्धक, सामाजिक, आर्थिक जैसे विषयों के उभार का यह समय है। साहित्यिक विद्या की पुस्तकें कविता, कहानी, उपन्यास, समीक्षा आदि की क्रय शक्ति इनकी अपेक्षा कमतर हुई है। यह मान्यता मेरी निजी नहीं बल्कि अखबारी सर्वेक्षण और प्रत्येक मेले के बाद प्रकाशकों द्वारा जारी किए गए संयुक्त बयान का संक्षिप्त सार है।
इस कथन से साहित्यिक और साहित्येतर विषयों के कद को यदि छोटा, बड़ा करके दिखने दिखाने की रस्साकसी में न पड़ें तो भी इससे एक बात बहुत स्पष्ट है कि पाठकों की पठनीयता के रुझान में
इधर तेजी से परिवर्तन आया है। यही कारण है कि आज की तारीख में अरुन्धती राय, मेघा पाटेकर, महीप सिंह, मुद्राराक्षस, विमल जालान, प्रभृत अनेकशः लेखक अपने साहित्यिक लेखन की तुलना में साहित्येतर लेखन के कारण चर्चा के केन्द्र में अधिक रहे हैं।
इसी श्रृंखला की एक सशक्त कड़ी के रूप में बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि, कहानीकार, प्रखर विचारक, सामाजिक आर्थिक विषयों के विश्लेषक अशोक कुमार पाण्डेय की पुस्तक ‘शोषण के अभ्यारण्यः भूमण्डलीकरण के दुष्प्रभाव और विकल्प का सवाल (शिल्पायन प्रकाशन, शहादरा, दिल्ली, मूल्य 200रु0) को देखा, पढ़ा और समझा जा सकता है।
सामाजिक आर्थिक विषयों की वे पुस्तकें जो प्रायः विषय विशेषज्ञों के द्वारा तैयार की जाती हैं, उनके अपठनीय होने के साथ विषय बोझिल होने की शिकायत अक्सर रहती हैं। जबकि अशोक कुमार पाण्डे की यह पुस्तक किसी हद तक एक विषय विशेषज्ञ के ज्ञान को अपने में समाहित करते हुए भी उनसे भिन्न, पढ़ने में दिलचस्प, रोचक एवं विचारोत्तेजक भी है। जो एक साथ साधारण और असाधारण दोनों कोटि के पाठकों को संतुष्ट करने में सक्षम है। इस पुस्तक का सबसे बड़ा गुण आद्यन्त पठनीयता है। इस पुस्तक में लेखक ने आँकड़ों की बाजीगरी न दिखाकर उसके सटीक प्रयोग द्वारा सामाजिक, आर्थिक मुद्दों में समता, विषमता को विश्लेषित करने में किया है। जिसके कारण लेखों की विश्वसनीयता पाठक के हृदय में धीरे-धीरे घर कर जाती है। मसलन, लैंगिक भेद का आईना, भारतीय महिला मुक्ति संघर्षों का लाइट हाउस, हताशा के दौर में संघर्ष की उजली कहानी ऐसे ही लेख हैं। जो भारत की आधी आबादी नारी के प्रति हो रहे आर्थिक भेदभाव पूर्ण नीति को आईना दिखाते है, और अन्ततः महिला सशक्तीकरण में अपना विश्वास व्यक्त करते हुए उसे जमीनी धरातल पर रूपायित करते हैं न कि कोरा वाग्विलास। हताशा के दैनिक संघर्ष की उजली कहानी में वे हाण्डा प्रबन्धन और मजदूरों के बीच की कहानी को पर्त दर पर्त उघाड़ते हुए पूँजीशाही के घिनौने चरित्र को पेशकर उसके प्रति वितृष्णा व नफरत पैदा करते हैं तो दूसरी ओर ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ जैसे नारे में विश्वास व्यक्त करते हुए वहाँ के मजदूरों के अदम्य संघर्ष और साहस का सच प्रस्तुत करते हुए उनका मनोबल भी ऊँचा करते हैं। किसी भी लेखक की यह एक बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वह पाठकों को अपने विचारों के पक्ष मंे या बिल्कुल सच के करीब पहुँचाए, इस कार्य को भी अशोक कुमार पाण्डेय ने बखूबी अंजाम दिया है। इसे इस किताब की सफलता का रहस्य भी कह सकते हैं।
शोषण के अभ्यारण्य’ पुस्तक एक औसत भारतीय मेघा के चिंतन और विशिष्ट वैचारिकी के तालमेल से सृजित है।
यह कहने में कोई संकोच नहीं कि इसमें लेखक ने समाज में व्याप्त विभिन्न रूपों में पूँजीवाद के नये पुराने चरित्र को उद्घाटित करते हुए उसके शोषण के नए-नए, क्रूर, वीभत्स, चेहरों को अंग्रेजों के औपनिवेशिक काल से लेकर, अधुनातन समय के नव साम्राज्यवाद तक, उसके तह में जाकर पर्याप्त मंथन के बाद अनावृत किया है। किन्तु इनके बीच पिस रहे मजदूर, किसान और बेरोजगार, नौजवान का संघर्ष तथा पीड़ा उनकी दृष्टि से कहीं भी ओझल नहीं होता हैं। वे पूँजीवाद के पतन और एक नये समाजवाद में विश्वास व्यक्त करते हैं। यह पुस्तक आने वाले समाज के भयावह सच से रूबरू कराती है। जहाँ वैश्विक गाँव की परिकल्पना में किसान आत्महत्या को मजबूर हैं, बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ के हाथों उनकी जमीन औने-पौने बेचने की सरकारी, गैरसरकारी क्रूर कोशिशें हैं, कृषि योग्य घटती जमीने हैं, खाद्यान्न की अकूत कमी के भावी संकेत हैं, आम जन के खुदरा बाजार पर भी कब्जा करने को आतुर ये कम्पनियाँ सुरसा सा मुँह बाए हैं। बड़े-बड़े माॅलों की चमक, रीयल स्टेट की बहुमंजली इमारतंे, मुट्ठीभर पढ़े, लिखे को रोजगार की कीमत पर शेष 90 प्रतिशत बेरोजगारों की फौज का आखिर क्या होगा? रोजगार के अवसर, निरन्तर घट रहे हैं। क्या इन्हीं कारणों के परिप्रेक्ष्य में नक्सली या नक्सलवाद तो नहीं पनप रहा हैं।
इन अनेकशः नई समस्याओं को केन्द्र में रखकर अशोक कुमार पाण्डेय ने ग्यारह शीर्षकों को बीस उपशीर्षकों में बाँटकर अपनी पुस्तक को एक सुन्दर कलेवर दिया है। नई सदी के ज्यादातर विषयों पर उनकी दृष्टि गई है। यह पुस्तक रिजर्व बैंक के गवर्नर विमल जालान की पुस्तक ‘भारत की अर्थ नीति 21वीं सदी की ओर’ कतिपय सन्दर्भों से जोड़कर भी देखी, पढ़ी जा सकती है। यदि दोनों पुस्तकों का तुलनात्मक
अध्ययन किया जाए तो कुछ नए और दिलचस्प नतीजे भी मिल सकते हैं।

-महंत विनय दास
मोबाइलः 9235574885

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