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मंगलवार, 21 जून 2016

योग के झूठ से देश को बचाओ

करीब सवा दो हज़ार साल से पतंजलि द्वारा इजाद की गयी स्वास्थ्य सुधार की एक पद्यति योग इस देश में चल रही है. शारीरिक कसरत का यह तरीका देश के अवाम के लिए कभी नहीं रहा है, क्यूंकि वे शारीरिक परिश्रम करते हैं और जो शारीरिक श्रम करते हैं, वे सभी शुद्र घोषित होते थे, जो समाज के सभी संसाधनों से वंचित रखे जाते हैं. शूद्रों को छोड़कर व्यापारी, क्षत्रिय और ब्राहमण चूँकि कोई शारीरिक श्रम नहीं करते रहे हैं, इसलिए स्वास्थ्य उन्ही की सबसे बड़ी समस्या बना रहा है. स्तिथि आज भी इससे अलग नहीं है. तीनो तथाकथित उच्च वर्णों का श्रम न करने के कारण बीमारियों से लड़ना कठिन रहा है. उनके स्वास्थ्य के लिए यह हिन्दू आनुष्ठानिक कसरत का तरीका इजाद किया गया, लेकिन इस योग ने इस देश को कितना स्वस्थ किया, इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए.
            भारत में कैंसर तक का इलाज करने का दावा करने वाले योगकर्मी क्या कभी देश को यह बताएँगे कि उन्होंने कितनो को स्वस्थ बनाया कि वे ओलंपिक खेलों में उस तरह सफल हो सके, जिस तरह योग से दूर का भी रिश्ता न रखने वाले दरिद्र देश इथोपिया के खिलाड़ी स्वर्ण-पदक जीतते हैं ? दौड़ने, कूदने, तैरने जैसी प्रतियोगिताएं के लिए भी योग सिखाने के नाम पर अरबों रुपये कमाने वाले रामदेव किसी को जीतने लायक स्वस्थ क्यों नहीं बना पाए ?
   योग से अकूत सम्पदा बनाने वालों से पूछना जाना चाहिए कि उनके शिविरों में वे ही मध्यवर्गीय क्यों आते हैं, जिनकी तोंद नहीं सम्हलती और चर्बी संतुलित भोजन के बावजूद बढती रहती है ? किसी तोंदवाले रिक्शा चालक या मजदूर को क्या किसी ने देखा है ? वे मध्यवर्गीय और उच्च वर्गीय लोग जिनके आसन गद्दियाँ या काउच होते हैं, किसी जिमखाने में नहीं जाते. उन्हें योग आसान लगता है और थोडा अध्यात्मिक संतोष भी मिलता है. उन्हें थोड़े से योग से स्वास्थ्य लाभ एवं धार्मिक पुण्य मिलने का भी सुख तत्काल मिलता है, जिसकी उन्हें जरूरत होती है. जिमखाना में अध्यात्मिक सुख कहाँ मिल सकता है ?
   योग के थोथेपन की यह चर्चा इसलिए जरूरी है कि सत्ता में बैठे बड़े-बड़े लोग भी इस अर्थहीन और उच्च वर्ग को लुभाने वाली कसरत की वास्तविकता नहीं जानते और योग शब्दे से वे अध्यात्मिक आतंक महसूस करते हैं. आठवीं सदी के बाद से इस देश को घोर धर्मभीरु बना दिया गया है और जैसे वह धर्म के दूसरे कर्मकांडों से डरता है, योग लाभ की क्रिया से भी डरना सीख लेता है. इस देश में हिन्दू महिलाएं जैसे सत्यनारायण की कथा में जाकर सुख पाती हैं, ठीक वैसे ही वे योग शिविरों में पाती हैं. योग शिविर में भर्ती होने की फीस अगर लम्बी-चौड़ी है तो इस मध्यवर्गीय महिला को वर्गीय संतोष भी मिल जाता है.
        इन सारे मामलों को तार्किक नजरिये से नहीं देखा गया है. एक समय वृंदा करात ने रामदेव के व्यापार की शुचिता को लेकर काफी कडवी बहस छेड़ी थी लेकिन तब भी उन्होंने योग पर सवाल नहीं उठाया था. यह गनीमत है कि कभी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह ने इस धंधे को चुनौती दी. उम्मीद है कि आने वाले दिनों में योग नाम के छद्म की तटस्थता से पड़ताल की जाएगी. 

- सुप्रसिद्ध साहित्यकार मुद्रारक्षस की कलम से

सोमवार, 7 मई 2012

नामवर सिंह 80 के पार हैं :शोषित के पक्ष में खड़े होने को ही अब क्रान्ति कहा जाने लगा है : शिवमूर्ति


उत्तर भारत के ग्रामीण जीवन की अनेकशः समस्याओं, स्त्री तथा दलित चेतना के नये सन्दर्भों के व्याख्याकार शिवमूर्ति ने केसरकस्तूरी’ कहानी संग्रह, साम्प्रदायिकता को लेकर त्रिशूल’ तथा दलित विमर्श के नये सन्दर्भों को उद्घाटित करता उनका उपन्यास तर्पण है। किसान समस्या और किसान आत्महत्या जैसे नवीन प्रसंगों को लेकर उन्होंने आखिरी छलांग’ जैसा उपन्यास भी लिखा है।
कसाई बाड़ा’ कहानी के अनेकशः मंचन हुए हैं। उन
की कहानी भरत नाट्यम्, तिरिया चरित्तर को लेकर सफल फिल्में भी बनी हैं।
तर्पण’ का अनुवाद कन्नड़ और जर्मन भाषाओं में हो चुका है। त्रिशूल’ उपन्यास का अनुवाद पंजाबी और उर्दू में हुआ है। वर्तमान समय के कम लिखकर अधिक लोकप्रिय’ कथाकारों के सिरमौर हैं-शिवमूर्ति
सुप्रसिद्ध कथाकार शिवमूर्ति से
लोक संघर्ष पत्रिका के सलाहकार, कथाकार एवं समीक्षक विनय दास से एक विचारोत्तेजक बातचीत
प्रश्न सामाजिक क्रान्ति या बदलाव में साहित्य की भूमिका नितान्त तुच्छ क्यों हो गई है? क्या क्रान्ति’ शब्द साहित्यकारों के लिए महज डिक्शनरी’ का शब्द भर है।
उत्तर इस सन्दर्भ में मैं दो बातें कहना चाहूँगा।
1साहित्यकार द्वारा लिखे गए साहित्य और पाठक द्वारा उसे पढ़े जाने के बीच एक लम्बा गैप है।
2हमारे लिखे जाने की वह व्यापक सामाजिक व्याप्ति और स्वीकृति नहीं है जो धर्म के संबंध्ध में लिखे गए साहित्य को लेकर है। यही कारण है कि सामाजिक हालात के बदलाव को लेकर लिखा गया साहित्य समाज में कोई बड़ा बदलाव या क्रान्ति नहीं कर पाया। आज के सामाजिक और साहित्यिक हालत में किसी भी पीड़ित या शोषित के पक्ष में खड़े होने को ही अब क्रान्ति’ कहा जाने लगा है। वैसे बड़ी सामाजिक क्रान्तियाँ अब संभव भी नज़र नहीं आती।
प्रश्न लोग कब से गरीब, शोषित, मजदूर, संगठित तथा असंगठित और अपवंचितों के विषय में लिख रहे है? मुझे लगता हे जितना ज्यादा इस तबके के विषय मे लिखा जाता है, उससे ज्यादा इनकी हालत बद से बदतर होती गई है। इस विरोधाभास के संदर्भ में कुछ कहें?
उत्तरजहाँ तक मैं जानता हूँ साहित्य के शुरूआती दौर से ही इस कोटि का लेखन होता रहा है। शहरी और कस्बाई श्रमिकों पर गोर्की का मां’ जैसा उपन्यास है। जगदम्बा प्रसाद दीक्षित का उपन्यास मुर्दाघर’ बड़े शहर में झुग्गीझोपड़ी में रहने वालों लोगों के जीवन को लेकर लिखा गया है। जहाँ देह का व्यापार एक सामान्य बात है। आगे चलें तो संजीव ने कोयला खदान के मजदूरों और उनकी समस्याओं को लेकर कई एक अच्छी कहानियाँ मैं चोर हूँ, मुझ पर थूको, ट्रैफिक जाम तथा सावधान! नीचे आग है’ जैसा उपन्यास लिखा है। जो छोटेबड़े कोयला चोरों और शहर के जरायम पेशा लोगों के जीवन की अमानवीय स्थितियों से हम सबको रूबरू कराता है। ये सारी बातें मजदूरों पर लागू होती हैं लेकिन मेरे विचार से इन्हीं मजदूरों की पंक्ति में ठेले वाले, गलीकूचे में झाड़ूबर्तन बेंचने वाले, कूलर घास बेंचने वाले आदि को भी इन अपवंचितों और शोषितों में शामिल किया जाना चाहिए। यह एक नया सामाजिक उभार है। इन पर भी लिखा जाना चाहिए। इनका असरकारक प्रभाव क्यों नहीं है, इस संदर्भ में मैं कुछ एक खास बातें कहना चाहूँगा। पहली तो यही कि साहित्यिक पत्रिकाओं की जनता में शाख नहीं है। दूसरे साहित्यिक सोच के आदमियों की वहाँ तक पहुँच नहीं है। पत्रिकाओं का वितरण कम है। इंटरनेट
की कमी है। यदि लेखक केवल लेखक भर है, उसका अपना कर्म, अपना जुड़ाव उस वर्ग से नहीं है तो पाठक और लेखक के बीच जो तादात्म्य होना चाहिए, वह तादात्म्य नहीं बनेगा। यह तब होगा जब इनकी कथनी और करनी में समानता होगी। अब आप ही सोचिए जहाँ हम बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं, वहाँ तक जब हमारा यह साहित्य पहुँचा ही नहीं है तो बदलाव कैसे संभव है।

प्रश्नवर्तमान बदली परिस्थितियों में आप एक लेखक के दायित्व को किस तरह परिभाषित करना चाहेंगे?
उत्तर हिन्दी का ज्यादातर लेखक खतरे नहीं उठाता जनता से सीधे तादात्म्य नहीं रखता। मुझे हिन्दी में ऐसा कोई लेखक याद नहीं आता जो परिवर्तन के लिए जनता के साथ खड़े हेकर उनके लिए जेल गया हो। यदि आप उनके साथ शारीरिक सहभागिता करेंगे तो जनता आपके पीछे आएगी। बहुत पहले रेणु और वर्तमान में अरुन्धतिराय ऐसे धरनों में जाती हैं, उनके समर्थन में लोग खड़े होते हैं। वे खतरे उठाती हैं। उन्हें मैं प्रथम श्रेणी का मानता हूँ। क्योंकि सामाजिक बदलाव के लिए ये अपने लाभ को दाँव पर लगाकर वहाँ पर सशरीर और व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होती हैं। वर्तमान परिस्थितियों में मैं इसे ही एक लेखक का दायित्व मानता हूँ।
प्रश्न अरून्धतिराय ही क्यों? मुद्राराक्षस, वीरेन्द्र यादव, राकेश, संदीप पाण्डेय, डॉ. राजेश मल्ल आदि ने भूमि अधिग्रहण आन्दोलन के खिलाफ शारीरिक रूप से उपस्थित हो पैदल मार्च, धरना आदि दिया। वह लड़ाई जीती भी गई। लेकिन आगे वह क्रम बन्द क्यों हो जाता है?
उत्तर दरअसल हिन्दी का लेखक भीरू किस्म का है। वह सुविधाभोगी है। संघर्ष से कोसों दूर है। उसने मान रखा है उसका कार्य समाज को विचार देना है। यहाँ पर ज्यादातर लेखक कल्चर की भूमिका निबाहते है। वे केवल वैचारिक परिवर्तन जो परिवर्तन की पहली सी़ी है वहीं पर आकर ठहर जाते हैं।
प्रश्न इधर नामवर सिंह के इस विचार से कि कोई भी विचारधारा साम्प्रदायिक नहीं होती है।’ साहित्य जगत खासा आन्दोलित है। इस सन्दर्भ में आपकी उनसे किस हद तक सहमति है।
उत्तरमैं इस कथन को पूरी तरह झूठ और आधारहीन मानता हूँ। निकट विगत में अयोध्या में, गुजरात में साम्प्रदायिक विचारधारा का ऐसा भीषण ताण्डव देखने के बाद भी अगर नामवर सिंह ऐसा कह रहे हैं तो मुझे लगता है कि वे उम्र के कारण विभ्रम की स्थिति में है या किसी प्रत्यक्षपरोक्ष लाभ के चक्कर में कई दशकों की अपनी स्टैण्डिंग को रिवर्स कर रहे हैं। यह भी हो सकता कि यह चर्चा में बने रहने का हुनर हो, जैसे कभी आरक्षण के विरुद्ध बोल दीजिए, कभी लेखक को सत्ता की चेरी कह दीजिए आदि। कहते हैं बदनाम जो होंगे तो क्या नाम न होगा। वे बुजुर्ग हैं। वे क्या सोचकर कहाँ निशाना लगाकर कह रहे हैं, इसका अनुभव करना कठिन है। पहले हिन्दुओं में साठ के पार को सठियाना माना जाता रहा है फिर वे तो अस्सी पार के हैं। मेरे विचार से अपने देश में कई विचारधाराएँ साम्प्रदायिक दृष्टि से इतनी सुस्पष्ट और मजबूत हैं जितनी विश्व में शायद ही कोई दूसरी विचाराधारा हो।
प्रश्न मुझे लगता है उम्र के चौथेपन में वामपन्थी लेखकों को भी दक्षिणपंथी विचारधारा अपने मजबूत गिरफ्त में ले लेती है, क्योंकि उन्हें भी स्वर्ग, ईश्वर, वेद, ब्राह्मण आदि की चिन्ता होने लगती है, जैसे डॉ0 राम विलास शर्मा। कहीं उसी के अमीपसमीप नामवर सिंह भी तो नहीं, पहुँच गए। फिर अब आप ही बताइए क्या वेद और मंत्रों मे ताकत नहीं होती है?
उत्तरशब्द जब कर्म बनेगा तब उसमें ताकत दिखाई देगी। केवल विजयी हो जा कह देने से कोई विजयी नहीं हो जाएगा। माना कि वेद पुराणों में मंत्र बहुत बने लेकिन एक साइकिल, एक कलम, एक कागज नहीं बन पाया। किसी एक ऐसी छोटी चीज का आविष्कार नहीं कर पाए जिसे आज हम यादकर सकें। सुनते हैं कि लोग मंत्र पढ़कर पानी पर चले जाते थे। एक लोग, मगर नदी पार करने वाले उन हजारों लोगों के विषय में इन मंत्रों के कभी विचार नहीं हुआ। कहते हैं उड़न खटोला था। लेकिन जब से हम लोगों ने आँख खोली तब से ऐसा कुछ नहीं दिखा। मुहम्मद गजनवी आया सोमनाथ में शिवमूर्ति तोड़ दी। उसे देवता नहीं बचा सके। दरअसल अपने यहाँ देवता भी केवल गाय और ब्राह्मण की रक्षा के लिए दौड़े आते हैं लेकिन किसी गरीब, झुग्गीझोपड़ी वाले की रक्षा के लिए कभी कोई भगवान नहीं आया। मंत्रों की ताकत को मैं नहीं मानता। ताकत कर्म में होती है और क्रिया में होती है। इस बात को एक छोटी कहानी से आप ज्यादा सटीक समझ सकेंगे। एक गाँव में एक आदमी के पास शंख था। वह उसे वह सब कुछ देता था जो माँगता था। एक दिन एक आदमी उसके पास आया उसने दूसरा शांख दिखाया। दूसरा शंख जितना माँगो उसका दुगना सामान देता था। उसने कहा इससे 10 किलो0 दूध माँगो। उसने तुरन्त कहा 20 किलो0 दूध लो। अब रखने को बर्तन नहीं। उसने कहा अब अगर चाहो तो तुम अपना शंख देकर यह शंख ले सकते हो। वह शंख बदलकर चला गया। दोपहर को जब उसे भूख लगी तो उसने कहा चार रोटी दे शंख उसने कहा आठ रोटी लो। केवह वह आठ रोटी लो की आवाज करता रहा मगर रोटियाँ न दे सका तब वह चीखा अरे! तुम यूपी बिहार के लोगों ने मुझे धोखा दिया है। तुम पोर शंख हो। मैं तो अपने यहाँ के तथाकथित लोगों को पोर शंख ही मानता हूँ। जिनकी विशेषता बड़ेबड़े दावे भर करना है। पश्चिम के लोग पहले वाले शंख हैं। प्लानिंग के अनुसार बिजली आदि पैदा किया। अपने यहाँ लोग भूखे सोते हैं। हम उन्हें अन्न नहीं दे पाते। मगर, वेद और धर्म के नाम पर स्वर्ग में कोई भूखा नहीं रहता है, का दिवास्वप्न दिखाकर उन्हें लूटते रहते हैं। यहाँ पर पोर शंखों का कब्जा है। सामान्य लोगों की समझ को देखते हुए मुझे लगता है कि अभी सैकड़ों वर्ष इस समाज पर इन पोर शंखों का कब्जा बना रहेगा।
प्रश्न बहुत से लोग तमाम नगों की अँगूठियाँ, गले में तुलसी, माणिक, रुद्राक्ष आदि की माला, गण्डा, ताबीज आदि धारण करते हैं, कहते हैं इनमें बड़ी ताकत है। इसी भावना के आड़ में बाबा और तांत्रिकों का धंधा निरन्तर फलफूल रहा है। एक ओर विज्ञान की ताकत और दूसरी ओर यह धार्मिक पोंगापन्थी। इस संदर्भ में कुछ कहें।
उत्तर मैंने ज्योतिष का अध्ययन नहीं किया है। लेकिन मैं ज्योतिष और तंत्र विद्या में विश्वास नहीं करता। मैंने आज तक न कोई इस तरह की अंगूठी पहनी हैं और न गण्डाताबीज ही। मैं और मेरी पत्नी कभी मन्दिर नहीं गए। मेरा इन चीजों में कोई विश्वास नहीं। मैंने छः लड़कियों की शादी की है। मैंने कन्यादान या कोई कर्मकाण्ड नहीं किया। कम्प्टीशन के दौरान भी मैंने किसी देवी देवता से अर्चना नहीं की और कभी कुछ माँगा भी नहीं। मैं व्यक्तिगत रूप से इन सबके खिलाफ हूँ। जो स्वर्गनर्क, सुखदुःख है, यहीं है। मैं सातवें आसमान में विश्वास नहीं करता। विगत जन्म का कुछ मिलता है, यह सब धोखाधड़ी है। पुनर्जन्म कपोल कल्पना है। तंत्रमंत्र के नाम पर यह सब ठगी और लूटपाट का धंधा तथा धर्म के नाम पर पण्डितपुरोहितों का यह धंधा अशिक्षा के अभाव में फलफूल रहा है। समाज जैसेजैसे शिक्षित होगा, इन पर अंकुश लगेगा।
प्रश्न तद्भव द्वारा आयोजित एक समारोह में नामचीन कथाकार काशीनाथ सिंह ने हिन्दी के साहित्यकारों को गाँव के सिवान पर मुँह उठाकर भौंकने वाला कुत्ता कहा है। इस संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे?
उत्तरलेखक की विषय वस्तु क्या है, यह बहुत कुछ इसी पर निर्भर करता है। जो आमजन के सरोकार से जुड़ा लेखन करता है तो उसका विचार इनसे भिन्न होगा। अगर, लेखक का अपने समाज से तादात्म्य है, वह समाज सम्मत लेखन कर रहा है, तब उस समाज के अंदर लेखक की भूमिका कुत्ते की भूमिका नहीं हो पाएगी। परिवर्तन कम हो, चाहे ज्यादा, लेकिन लेखक का स्थान कुत्ते का नहीं होगा। लेखक समाज से विमुख लेखन करेगा तक भी उसकी भूमिका सिवान के कुत्ते की नहीं होगी। ऐसी रचनाएँ भी आई हैं जो समाज के परिवर्तन का कारण बनी हैं जिससे क्रान्तियाँ हुई हैं। उनके नाम लेने की जरूरत नहीं। उसे सभी लोग जानते हैं। काशीनाथ सिंह द्वारा साहित्य की रचनात्मक भूमिका को नजरअंदाज करके सिवान पर भूँकते कुत्ते में इसे रेड्यूज कर देना उनके द्वारा हिन्दी के साहित्यकारों के साथ किया गया एक खतरनाक मजाक है। उनका यह बयान अब तक के लिखे गए सारे बहुमूल्य लेखन पर पानी फेर देना है। यदि काशीनाथ सिंह इसे केवल अपने लेखन और अपने लिए इस विशेषण का प्रयोग कर रहे हों तो भी मुझे इस कथन पर आपत्ति है।
प्रश्न नए साहित्यकारों के लिए कोई संदेश देना चाहेंगे?

उत्तर नए साहित्यकार के लिए यही कहना हे कि अपने नजरिए से समाज को देखें। भविष्य की चुनौतियाँ ज्यादा निर्मम और ज्यादा कठोर होती जा रही हैं। लेखक का धर्म और दायित्व तभी निर्वाह किया हुआ माना जाएगा जब वह आम जनता के सरोकार से जुड़ा हुआ लेखन करे, मेरे विचार से केवल मनोरंजन साहित्य का उद्देश्य नहीं हो सकता।

शनिवार, 24 मार्च 2012

आज मुल्क में रूहानियत के नाम पर ठग विद्या चल रही है

ढोंगी बाबा अवाम का जज्बाती इस्तेह्साल कर मुल्क में मजहबी मुनाफिरत फैला रहे हैं।


सर्वश्री रवीन्द्र प्रभात, डॉ सुभाष राय, मुद्राराक्षस, वीरेन्द्र यादव "सतनाम संप्रदाय और संत जगजीवन दास" पुस्तक का विमोचन करते हुए।

मुद्राराक्षस, विनोद दास, श्री हरिशरण दास साथ में वीरेन्द्र यादव पुस्तक को प्रदर्शित करते हुए



आज मुल्क में रूहानियत के नाम पर ठगी का कारोबार चल रहा है। जिस मुल्क में गौतम बुद्ध, गुरुनानक, महावीर, कबीरदास और बाबा जगजीवन दास जैसे रूहानी कुव्वत के साधु संत गुजरे हों उसी मुल्क में आज बाबा रामदेव, श्री श्री रवि शंकर और धीरेन्द्र ब्रम्हचारी जैसे हाईटेक साधु पनप रहे हैं।
इन खयालात का इजहार हिंदी जुबान के आलिमी शोहरत याफ्ता अदीब मुद्राराक्षस जुमे की सेपेहर जिला बार एसोसिएशन के मीटिंग हाल में सतनामी पंथ के बुजुर्ग बाबा जगजीवन दास की जिंदगी व उनकी फ़िक्र पर लिखी गयी तसनीफ के रस्म ए उजरा के मौके पर मुन्न्केदा तकरीब में अपने मेहमान ए खुसूसी खुतबे के दौरान कर रहे थे।
मुद्राराक्षस ने मौजूदा जमाने के साधू संतों के ऊपर तनकीद करते हुए कहा कि अभी हाल में श्री श्री रविशंकर ने मुल्क के तालीमी निजाम पर तनकीद करते हुए कान्वेंट तर्ज के प्राइवेट तालीमगाहों की वकालत की है जो मुल्क के लिये निहायत मोहलिक है। मुद्राराक्षस ने कहा की आज लोगों ने किताबों से किनाराकशी इख्तियार कर ली है और मुताल्या करना छोड़ दिया है। इसी का फायदा उठकर ये ढोंगी बाबा और साधू लोग योग के करतब दिखला व सिखलाकर लोगों के मजहबी जज्बात का इस्तेह्साल करते फिर रहे हैं।
हिंदी अदब के मशहूर तनकीद निगार वीरेन्द्र यादव ने हरिशरण दास के जरिए लिखी गयी किताब "सतनाम सम्प्रदाय और संत जगजीवन दास" के ऊपर तब्सिरा करते हुए कहा कि यह किताब देर से सही लेकिन दुरुस्त मौके पर आई है। आज सतनामी खयालात की शायद सबसे ज्यादा जरूरत मुल्क को है। हिन्दुस्तानी तहजीब में मजहब का तस्सवुर हजारों बरसों से चला आ रहा है लेकिन आज के मजहब का तस्सवुर अवाम के इस्तेह्साल तक ही महदूद होकर रह गया है।

-तारिक खान
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