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बुधवार, 25 जून 2014

कब धुलेगा मेरठ के माथे से ‘दंगों के शहर’ का कलंक

 ऐेतिहासिक शहर मेरठ। इस शहर को इस बात पर बहुत नाज है कि भारत की जंग-ए-आजादी की पहली चिंगारी इसी शहर से भड़की थी। जंग-ए-आजादी की लड़ाई में शहीद होने वालों की फेहरिस्त गवाह है इस बात की कि हिंदुस्तान को आजादी दिलाने में 10 मई 1857 से लेकर 15 अगस्त 1947 तक हिंदुओं और मुसलमानों ने बराबर की कुरबानियाँ दी थीं। मेरठ के लोगों को इस पर नाज है कि हमने ही सबसे पहले देश को आजाद कराने के लिए  लड़ाई शुरू की थी। नाज तो इस पर भी है कि हम दुनियाभर में खेलों का सामान भेजते हैं। बेहतरीन कपड़ा बुनते हैं। पूरी दुनिया हमारी रेवड़ी और गजक की दीवानी है। कैंचियाँ भी मेरठ शहर की पसंद की जाती हैं। इतराते तो इस बात पर भी हैं कि क्रांतिकारी शायर हफीज मेरठी इसी सरजमीं पर पैदा हुए थे, तो कवि हरिओम पवार का नाम भी मेरठ शहर से ही जुड़ा है। न जाने कितनी हस्तियाँ इस शहर से वाबस्ता रहीं, जिनके नाम से मेरठ को पहचाना जाता है। अगर इन बातों पर गर्व है, तो मेरठ को इस बात पर शर्मिंदगी भी महसूस करनी चाहिए कि दुनियाभर में इसी शहर के लोगों ने इस शहर को ‘दंगों का शहर’ के लिए भी कुख्यात किया है। किसी दूसरे शहर में जब कोई यह बताता है कि मेरठ से ताल्लुक रखता हूँ, सामने से जवाब आता है कि वहाँ सांप्रदायिक दंगे बहुत होते हैं। कहते हैं कि मेरठ नए मिजाज का शहर है। वाकई ऐसा ही है। यहाँ किस बात पर कब दंगा भड़क जाएगा, कहना मुश्किल है। इसी शहर के बारे में कहा जाता है कि यहाँ अंडा फूटने पर भी दंगा हो जाता है। यह बात यूँ ही नहीं कही जाती। 1993 में मात्र अंडा फूटने पर दंगा भड़क उठा था। दरअसल, सियासत ने मेरठ में कुछ इस तरह की साजिशें रची हैं कि उनसे पार पाना मुश्किल लग रहा है। इंसानों को हिंदू मुसलमान में बाँट दिया गया। आबादियाँ बाँट दी र्गइं। यहाँ तक कि दिलों का बँटवारा करने की नापाक कोशिशें भी की जाती हैं। जब-जब यह लगता है कि अब मेरठ के लोग छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ रहे हैं, तब-तब सियासत ऐसी चाल चलती है कि हिंदुओं और मुसलमानों को आमने-सामने कर दिया जाता है। मेरठ खूंरेज दंगों के लिए याद किया जाता है। 1968 में जब जम्मू कश्मीर के वजीर ए आज़म रहे स्वर्गीय शेख अब्दुल्लाह मेरठ आए थे, तो मेरठ सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलसा था। इसके बाद सितंबर 1982 में मंदिर-मजार विवाद के चलते मेरठ ने लगभग तीन महीने कफ्र्यू की मार झेली थी। इसी दंगे में उत्तर प्रदेश की पीएसी का सांप्रदायिक चेहरा तब सामने आया था, जब यहाँ की फिरोज बिल्डिंग पर सीधी फायरिंग करके कई मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया था। सरकार कांग्रेस की थी। बहुत शोर-शराबा हुआ। जाँच आयोग गठित कर दिया गया, लेकिन दोषियों (पीएसी) का कुछ नहीं बिगड़ा। रिपोर्ट में क्या था, इस पर धूल जम गई। मई 1987 में  हुआ दंगा सबसे ज्यादा खूरेंज था। पीएसी ने सभी सीमाएं लांघ कर हाशिमपुरा से मुसलमानों को घर से निकालकर ट्रकों में भरा और उन्हें मुरादनगर (गाजियाबाद) गंगा नहर पर ले जाकर सीधे गोली मारकर नहर में बहा दिया। मलियाना में भी पीएसी ने कहर बरपाया और 73 लोगों की जान ले ली थी। दुनियाभर में इन हत्याकांडों की गूंज हुई, लेकिन सजा किसी को आज तक नहीं मिली। मलियाना कांड की जीएल श्रीवास्तव जांच आयोग की रिपोर्ट कहाँ दफन कर दिया गया, कोई नहीं जानता। मलियाना कांड पर सबसे ज्यादा राजनीति करने वाले मुलायम सिंह यादव और आज़म खान की जुबान पर भी ताले लग गए। 1987 के खूंखार दंगों के निशान अभी पूरी तरह से मिटे नहीं हैं। वे लोग उन दिनों को याद करते हुए काँप उठते हैं, जिन्होंने उन दंगों को झेला और जिसकी आग में कितनों के अपने जल मरे।
    राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद के चलते नवंबर 1990 में और मई 1991 में भी मेरठ ने खूनी दंगों की दास्तान लिखी। 1991 में मेरठ के निगार सिनेमा में दंगाइयों ने 14  मुसलमानों को मार डाला। इंसाफ के नाम पर कुछ नहीं मिला। उल्टा इस कांड के आरोपियों को हमेशा बचाया गया। इसके बाद हर साल दो साल के अंतराल में छोटे-मोटे दंगे होते रहे। इससे ज्यादा शर्मसार करने वाली बात क्या होगी कि इस साल जिस सुबह मेरठ 10 मई 1857 के शहीदों को याद कर रहा था, दोपहर तक सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलस गया। मेरठ अपने माथे पर एक और दंगे का दाग लगवा बैठा। कभी-कभी लगता है कि इस शहर के लोग इतने परिपक्व हो गए हैं कि यह कलंक धुल जाएगा, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। हाँ, इतना शऊर तो आया है कि अब दंगा शहर के दूसरे इलाकों तक नहीं पहँुचता। ऐसा इसलिए हुआ है कि अब लोग दंगों की सियासत को समझ गए हैं। 1991 तक यह होता था कि शहर में कोई सांप्रदायिक हिंसा की वारदात होते ही फौरन शहर के कई हिस्सों में चाकूबाजी और आगजनी की वारदातें शुरू हो जाती थीं। जिससे दंगा का दायरा विस्तार पा जाता था और पूरा शहर कफ्र्यू की जद में आ जाता था।
    इसे भी समझना जरूरी है कि दंगा अब पूरे शहर में क्यों नहीं फैलता? दरअसल, सांप्रदायिक संगठन हमेशा ही दंगों में दलित जातियों का इस्तेमाल करते थे। पैसा देकर उन्हें उकसाया जाता था। लेकिन उत्तर प्रदेश में बसपा के उभार के बाद दलित-मुस्लिम समीकरण बनने के बाद दलित जातियों को समझ में आ गया है कि हमें दंगों की सियासत के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इसलिए वे अब सांप्रदायिक संगठनों के बहकावे में नहीं आते। हालांकि कभी-कभी जेहाद के नाम पर तो कभी गौ हत्या के नाम पर मेरठ की जनता को भड़काया जाता है। सांप्रदायिक संगठन ऐसे-ऐसे भड़काऊ पर्चे बाँटते हैं कि दंगा होने में देर नहीं लगे, लेकिन अब लोग समझ गए हैं कि यह सब उकसाने के लिए किया जा रहा है। 10 मई को जिस  तीरगरान इलाके में प्याऊ को लेकर भारी बवाल हुआ, उस पर पहले से ही विवाद है। विवाद भी नया नहीं, बहुत पुराना है। 1952 से मामला कोर्ट में है और कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दे रखे हैं। यह सवाल मौजूं है कि विवादित जगह पर किसी भी तरह का निर्माण किया ही क्यों जा रहा था? बेहतर तो यह होता कि दूसरे पक्ष की सहमति से कोई निर्णय लिया जाता। यह ठीक है कि पानी प्याऊ का निर्माण किया जा रहा था। इसके बावजूद भी दूसरे पक्ष की सहमति लेनी जरूरी तो थी ही। यदि निर्माण हो भी रहा था, तो दूसरे पक्ष को कानून का सहारा लेकर उसे रुकवाना चाहिए था। आखिर देश में कानून नाम की भी कोई चीज है या नहीं? खुद ही फैसला करने की जिद का नतीजा बड़े बवाल के रूप में सामने आया है। अविश्वास के घटाटोप अंधकार में ऐसा नहीं है कि उजाले की उम्मीद की कोई किरण है ही नहीं। जब अखबारों में हिंसा की खबरों के बीच ऐसी खबर नजर में आती है, जो यह बताती है कि कैसे दंगाइयों के बीच फँसे बच्चों या बड़ों को निकाला गया, तो लगता है कि हमारी आँखों का पानी अभी पूरी तरह खुष्क नहीं हुआ है। आँखों के कहीं किसी कोने में नमी बाकी है, जो उम्मीद की लौ जलाए रखने में मदद करती है। आपसी सौहार्द की खबरें  हौसला देती हैं कि मेरठ में ऐसे इंसान भी रहते हैं, जो नहीं चाहते कि मेरठ ‘दंगों के शहर’ के रूप में कुख्यात रहे।
   -सलीम अख्तर सिद्दीकी
मोबाइल: 09045582472
 लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

सांप्रदायिक हिंसा में पुलिस की भूमिका-भाग-1



हमारे देश  में साम्प्रदायिक हिंसा नियंत्रित करने में पुलिस और प्रशा सन की भूमिका पर हमेशा  से प्रष्नचिन्ह लगते रहे हैं। पुलिस और प्रशासन अक्सर अल्पसंख्यकों के प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त रहते हैं। भारत में अधिकतर साम्प्रदायिक दंगे पूर्व नियोजित होते हैं। स्वस्फूर्त दंगों को चैबीस घंटों के भीतर नियंत्रित किया जा सकता है, बषर्ते पुलिस, जिला प्रशासन  व सरकार ऐसा करना चाहते हों । दूसरे शब्दों में, दंगे तभी चैबीस घंटे से अधिक अवधि तक चल सकते हैं जब 1. वे पूर्व नियोजित हों व 2. प्रशासन व पुलिस दंगे जारी रखना चाहते हों। विभूति नारायण राय एक जानेमाने सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी हैं। उन्हें दंगों से निपटने का लंबा अनुभव है और उन्होंने साम्प्रदायिक दंगों और उनमें पुलिस की भूमिका का विशद और गहन अध्ययन किया है। उनका तर्क है कि भारत में न तो गृहयुद्ध चल रहा है और ना ही पष्चिम एशिया, यूरोप और दुनिया के कुछ अन्य भागों की तरह यहां हथियारबंद योद्धाओं के गिरोह सक्रिय हैं। अतः यदि भारत में पुलिस और प्रशासन किसी दंगे को चैबीस घंटे से अधिक की अवधि में नियंत्रित नहीं कर पाते हंै तो उनकी कार्यशैली व भूमिका की सूक्ष्म जांच की जाना आवष्यक है। अपने शोध के जरिए राय इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि चूंकि सरकारी तंत्र के सदस्यों के मन में साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह गहरे तक जड़ जमाए रहते हैं अतः वे दंगों को चैबीस घंटे के भीतर नियंत्रित करने में असफल रहते हैं। दंगों की जांच के दौरान, डाॅक्टर असगर अली इंजीनियर ने पाया कि मुंबई में दंगों के समय पुलिस कांस्टेबिलशिवसेना द्वारा प्रकाषित ‘सामना‘ अखबार पढ़ रहे थे। सन् 1984 के भिवंडी दंगांे को नियंत्रित करने के लिए तैनात पुलिसकर्मी गर्व से कहते थे कि वे वर्दी मंे शिवसैनिक हैं। सन् 1961 के जबलपुर दंगों की अपनी जांच में डाॅक्टर इंजीनियर ने पाया कि हथियारों से लैस पुलिस के सिपाहियों ने घरों में घुसकर मुस्लिम महिलाओं के साथ दुष्कर्म किए। तथापि डाॅक्टर इंजीनियर का यह भी कहना है कि पूर्वाग्रहों से मुक्त व निष्पक्ष पुलिस अधिकारियों की भी कमी नहीं है।
दंगे भड़कने के पूर्व संकेत
दंगों में पुलिस की मिलीभगत तीन चरणों या स्तर पर होती है। पहला चरण है, उन संकेतों को नजरअंदाज करना  जो तब मिलना शुरू होते हैं जब दंगों की योजना बनाई जा रही होती है। इस दौरान शहर या इलाके के रहवासियों के धर्म के संबंध में आंकड़े व जानकारियां एकत्र की जाती हैं। उदाहरणार्थ, गुजरात में दंगाईयों ने उन व्यवासायिक प्रतिष्ठानों पर भी हमले किए जिनके हिन्दू नाम, हिन्दू कर्मचारी और हिन्दू भागीदार थे। उन प्रतिष्ठानों को भी नहीं बख्षा गया जिनमें मुसलमानों का निवेश था या जिनमें मुसलमान निष्क्रिय भागीदार थे। हिन्दुओं के उन व्यापारिक प्रतिष्ठानों, जिनमें मुस्लिम भागीदार थे, के संबंध में जानकारी संभवतः विक्रय कर या पंजीयक, फम्र्स एण्ड सोसायटीज के कार्यालयों से एकत्रित की गई होगी। हिन्दू और मुस्लिम मकानों की पहचान के लिए उन पर निषान लगाए जाते हैं। सूरत और अहमदाबाद मंे हिन्दुओं से यह कहा गया था कि वे अपने घरों के दरवाजों पर ‘जय श्रीराम‘ लिख दें। सन् 1992-93 में सूूरत में हुए दंगों की मैंने जांच की थी। इस दौरान मुझे बताया गया कि घरों-घर ऐसे लोग पहंुचे, जो स्वयं को जनगणना कार्यालय के कर्मचारी बता रहे थे। उन्होंने कहा कि वे राशन कार्डों की जांच करने आए हैं और राशन कार्ड पर अंकित ब्यौरे को उन्होंने लिख लिया। अगला कदम होता है दंगों के दौरान इस्तेमाल में आने वाली सामग्री इकट्ठा करना। घरों में आग लगाने के लिए पेट्रोल व गैस सिलंेडर जुटाए जाते हैं, लोगों को मारने के लिए चाकुओं व तलवारों की व्यवस्था की जाती है। इसके अलावा, दोनों समुदायों के बीच छोटे-छोटे मुद्दों पर तनाव उत्पन्न हो जाना और ऐसी भाषणबाजी, जिससे दो समुदायों के बीच नफरत फैले, भी दंगे भड़कने के पूर्व संकेत होते हैं। भिवंडी और अलीगढ़, साम्प्रदायिक दंगों के लिए कुख्यात हैं परंतु बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद, इन दोनों शहरों में पूर्ण शान्ति बनी रही। इसका कारण था हिंसा रोकने के लिए प्रशासन द्वारा की गई प्रभावी व निष्पक्ष कार्यवाही। हर बड़े दंगे के पहले संकेत या चेतावनी मिलती है। कई बार ये संकेत दंगों के महीनों या हफ्तों पहले से मिलने लगते हैं। बाबरी मस्जिद के ढ़हने से पहले, लालकृष्ण आडवानी की रथयात्रा ऐसी ही चेतावनी थी। कंधमाल में होने वाली हिंसा के संकेत 24 दिसम्बर 2008 को ही मिलना शुरू हो गए थे जब संघ परिवार के सदस्यों ने ईसाईयों द्वारा क्रिसमस मनाने के लिए बनाए गए स्वागतद्वार गिरा दिए और ईसाईयों के खिलाफ भड़काऊ भाषण दिए।
इस चरण में पुलिस या प्रशासन अपनी ओर से कार्यवाही कर दंगे रोक सकता है। इसमें भड़काऊ भाषण देने वालों या हथियार इकट्ठे करने वालों या दंगों की योजना बनाने वालों को गिरफ्तार करना शामिल है। दोनो समुदायों के प्रतिष्ठित लोगों की बैठक आयोजित की जा सकती है जिससे उनके बीच संवाद बढ़े। लोगों मंे विष्वास जगाने के लिए पुलिस फ्लैग मार्च इत्यादि कर सकती है। अफवाहों पर नियंत्रण लगाया जा सकता है। प्रषासन अगर निष्पक्ष और दृढ़ रहे तो हिंसा षुरू ही नहीं होगी। दंगे भड़क सकते हैं या भड़कने वाले हैं, इसका अंदाजा औसत बुद्धि वाले आम आदमी को भी हो जाता है। फिर पुलिस का काम ही है गुप्त सूचनाएं इकट्ठी कर उनके आधार पर समुचित कार्यवाही करना। पुलिस एक ओर असामाजिक और साम्प्रदायिक तत्वों को हिरासत में ले सकती है, उनसे षांति बनाए रखने के बांड भरवा सकती है और षरारती तत्वों के मन में भय पैदा करने के लिए शक्तिप्रदर्षन कर सकती है। इसके साथ ही, तनाव घटाने के लिए दोनों समुदायों के बीच मेलमिलाप और सौहार्द को बढ़ावा दिया जा सकता है।
हमारे पुलिसकर्मी धार्मिक जुलूसों के दौरान लगाए जाने वाले अषोभनीय, भड़काऊ या आपत्तिजनक नारों के मूक दशर्क बनेे रहते हैं। वे इस तथ्य को कोई महत्व नहीं देते की ऐसे नारे लगाना कानून की दृष्टि में तो अपराध है ही, इससे दूसरा समुदाय आहत और अपमानित महसूस करता है और भड़कता है। परंतु पुलिसकर्मी शायद ही कभी  जुलूस में से ऐसे लोगोें को अलग कर उनके खिलाफ कार्यवाही करते हंै। अक्सर ऐसे मामलों में पुलिस की रपट यही रहती है कि जुलूसशान्तिपूर्ण था। सन् 1970 मंे भिवण्डी में हुए दंगों के पहले, धार्मिक जुलूसों के दौरान गुंडागर्दी व अवांछनीय व्यवहार करने वालों को पुलिस की तटस्थता से प्रोत्साहन मिला तथा उन्होंने और खुलकर आपत्तिजनक व्यवहार करना शुरू कर दिया (मादोन, 1974 खण्ड 6 अध्याय 6 पृष्ठ 22)। मोहल्ला कमेटियों में अक्सर हिन्दू साम्प्रदायिक नेताओं का बोलबाला रहता है क्योंकि उन्हें साम्प्रदायिक नहीं माना जाता। साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा दिए जाने वाले भड़काऊ भाषणों पर कोई कार्यवाही नहीं की जाती।
पुलिस की भूमिका का दूसरा चरण षुरू होता है साम्प्रदायिक हिंसा भड़कने के बाद। इस चरण में पुलिस को पर्याप्त बल का इस्तेमाल करना चाहिए। लाठीचार्ज या गोलीचालन कर दंगाईयों को तितर-बितर किया जा सकता है, कफ्र्यू लगाया जा सकता है और हथियार आदि लेकर चलने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। हिंसा के शिकार लोगों को सुरक्षा दी जा सकती है, ऐसे इलाकों में, जहां हथियार जमा होने की सूचना हो, तलाशी लेकर हथियार जप्त किए जा सकते हैं और दंगाईयों को गिरफ्तार किया जा सकता है। तीसरा चरण है दंगों के बाद हिंसा की जांच और दोषियों को सजा दिलवाने का कार्य।
तीनों ही चरणों में पुलिस और प्रशासन निष्पक्ष व्यवहार नहीं करते। कई बार उनके स्वयं के पूर्वाग्रहों के कारण और कई बार अपने राजनैतिक आकाओं के निर्देषों के चलते, प्रषासन संकेतों और चेतावनियों को नजरअंदाज करता है और रोकथाम के उपाय नहीं करता (सेनगुप्ता, कुमार व गंडेविया, 2003)। पुलिसकर्मी यह मानकर चलते हैं कि दंगा अल्पसंख्यक ही षुरू करंेगे और अगर रोकथाम की कोई कार्यवाही की भी जाती है तो उसके शिकार अल्पसंख्यक ही होते हैं। व्ही. एन. राय अपने शोधपत्र में लिखते हैं कि जिस समय रामजन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था उस समय अयोध्या के रामजन्मभूमि थाने में साम्प्रदायिक तत्वों की जो सूची बनाई गई थी उसमें हिन्दुओं के नाम ढूंढ़े नहीं मिलते थे। पुलिस यह मानकर चलती है कि साम्प्रदायिकता पर मुसलमानों का एकाधिकार है। यद्यपि बाबरी मस्जिद का ध्वंस पूर्वनियोजित था तथापि किसी भी गुप्तचर एजेंसी ने ऐसी आश न्का व्यक्त नहीं की और ना ही ऐसी कोई सूचना सरकार को दी। लिब्रहान आयोग की रपट से यह स्पष्ट है कि गुप्तचर एजेसिंयों ने यह पता लगाने का प्रयास ही नहीं किया कि अयोध्या में इकट्ठे हो रहे कारसेवकों के असली इरादे क्या हैं।
दंगों के दौरान शान्ति-व्यवस्था बनाए रखना
सूरत में दिसंबर 1992 और जनवरी 1993 में हुए दंगों के दौरान पुलिस मूकदर्षक बनी रही। कई बार पुलिसकर्मी जानबूझकर अल्पसंख्यकों को मौत के मुंह मंे धकेलते हैं। बिहार के भागलपुर के पास स्थित चंदेरी गांव में सेना ने लगभग 100 मुसलमानों को बिहार सैन्य पुलिस के हवाले किया। पुलिस के जवानों ने अल्पसंख्यकों को सुरक्षित रास्ते से निकालने के नाम पर उन्हंे ठीक उस स्थान की तरफ रवाना कर दिया, जहां हिन्दू दंगाईयांे की भीड़ तैयार थी। इन सभी मुसलमानों को दंगाईयों ने मौत के घाट उतार दिया। अपने लेख ‘साम्प्रदायिक दंगे और पुलिस की भूमिका: एक अध्ययन‘ , 1997 में डाॅक्टर असगर अली इंजीनियर कहते हैं कि पुलिस और दंगाईयों के बीच अक्सर बेहतरीन समन्वय होता है। गुजरात में 1969 के दंगों के दौरान, पुलिस थानों के पास स्थित मुस्लिम आराधना स्थलों को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने दिया गया। यह जगमोहन रेड्डी जांच आयोग का निष्कर्ष है। आयोग की रपट कहती है कि पुलिसकर्मियों का साम्प्रदायिकता के वाईरस से ग्रस्त हो जाना कोई अनोखी बात नहीं है क्योंकि आखिर वे भी समाज का हिस्सा होते हैं। यद्यपि दंगों मेें सबसे ज्यादा कष्ट अल्पसंख्यक भोगते हैं (औसतन 80 प्रतिशत दंगा पीडि़त अल्पसंख्यक होते हैं) तथापि पुलिस के गोलीचालन में मरने वालों में भी उनकी संख्या ज्यादा होती है और गिरफ्तार किए जाने वाले लोगों में भी। इस तथ्य को जस्टिस श्रीकृष्ण आयोग की रपट व व्ही. एन. राय के शोधपत्र में रेखांकित किया गया है। सूरत के दंगों की मेरे द्वारा की गई जांच का भी यही नतीजा है। जिन दंगों में हिन्दुओं से कई गुना अधिक मुसलमान मारे गए, वहां भी गिरफ्तार किए गए लोगों में मुसलमानों की संख्या ज्यादा थी।
मुस्लिम बस्तियों में कफ्र्यू अधिक सख्ती से लागू किया जाता है और उनके मकानों की तलाशी के दौरान पुलिस का व्यवहार असंवेदनशील रहता है। सूरत में जब हिंसक भीड़ सड़क पर तांडव कर रही थी तब पुलिस ने कफ्र्यू नहीं लगाया। अगर कफ्र्यू लगा दिया गया होता तो कई जानें बचाई जा सकती थीं। बाद में जब कफ्र्यू लगा तो उन लोगों को सबसे ज्यादा परेषान किया गया जो अपने प्रियजनों की तलाश में अस्पताल आदि पहुंचने की कोषिष कर रहे थे। व्ही. एन. राय के अनुसार, ऐसा ही कुछ अहमदाबाद में 1969 में, भिवंडी में 1970 में और भागलपुर मंे 1989 में हुआ। अक्सर मुस्लिम बस्तियों के चारों ओर घेरा डाल दिया जाता है और उसके बाद सभी घरों की तलाषी ली जाती है। जाहिर है, इससे समुदाय के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है। जहां मुस्लिम बस्तियों में कफ्र्यू सख्ती से लागू किया जाता है वहीं हिन्दू बस्तियों में वह केवल मुख्य सड़कों तक सीमित रहता है। अंदर गलियों में जिंदगी आम दिनों की तरह चलती रहती है। भिवंडी (1970), फीरोजाबाद (1972), अलीगढ़ (1978) और मेरठ (1982) दंगों में पुलिस के गोलीचालन से एक भी हिन्दू नहीं मारा गया। इसके विपरीत, मरने वाले मुसलमानों की संख्या क्रमश: 9, 6, 7 व 6 थी। मुंबई में 1992 के दिसम्बर में दंगों के पहले दौर में पुलिस की गोली से मरने वालों में मुसलमानों की बहुसंख्या थी। इन दंगों में 250 लोगों की जानें गईं जिनमें से 192 पुलिस की गोली से मरे और इनमें से 90 प्रतिशत से अधिक को कमर के ऊपर गोली लगी थी। इससे यह स्पष्ट था कि पुलिस ने दंगाईयों को तितर-बितर करने के लिए नहीं वरन् उन्हें जान से मारने के लिए गोलियां चलाईं थीं। दिसंबर 1992 और जनवरी 1993 में मुंबई के गोवंडी इलाके में पुलिस ने मुसलमानों को उनके घरों से घसीटकर बाहर निकाला और उन्हें गोली मार दी। ऐसा करने वाले इंस्पेक्टर को मात्र स्थानांतरण की सजा दी गई। गोवंडी में दिसंबर 7 से 10 के बीच पुलिस ने पूरे इलाके की नाकाबंदी कर तलाशी  अभियान चलाया। यद्यपि गोवंडी में कोई साम्प्रदायिक तनाव नहीं था फिर भी पुलिसकर्मी हर गली-कूचे में गए, जबरदस्ती घरों में घुसे, लूटपाट की, निर्दोश मुसलमानों को गिरफ्तार किया, उनके साथ मारपीट की और कुछ मामलों में उन्हें गोली मार दी। इलाके में रहने वाले हिन्दू, अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ हुए इस दुव्र्यवहार से अत्यंत आक्रोशित थे। वे अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ बरसों से शांतिपूर्वक रह रहे थे।
अगले अंक में जारी....

     
-इरफान इंजीनियर



सोमवार, 16 जुलाई 2012

एक आदमी की सेना

साम्प्रदायिक हिंसा सभी दक्षिण एशियाई देशों का नासूर है। भारत में साम्प्रदायिक हिंसा की शुरूआत अंग्रेजों के आने के साथ हुई। अपनी """"फूट डालो और राज करो"""" की नीति के तहत, अंग्रेजों ने इतिहास का साम्प्रदायिकीकरण किया और समाज के वे तबके, जो अपने सामंती विशेषाधिकारों को बचाए रखना चाहते थे, ेंने इतिहास के साम्प्रदायिक संस्करण और धर्म का इस्तेमाल अपने राजनैतिक हितों को साधने के लिए करना शुरू कर दिया। हिन्दू और मुस्लिम साम्प्रदायिकता ने अंग्रेजों की """"फूट डालो और राज करो"""" की नीति को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। साम्प्रदायिक हिंसा, भारत की सड़कों और गलियों और यहां तक कि गांवों तक फैल चुकी है। इसके विस्तार के पीछे कई कारण हैं परंतु यह निर्विवाद है कि इसने समाज को घोर कष्ट और दुःख दिए हैं। कई सामाजिक संगठन और व्यक्ति, अपनेअपने स्तर पर, यह कोशिश करते आ रहे हैं कि साम्प्रदायिक हिंसा की आग को हमेशा के लिए बुझा दिया जाए और समाज में सद्भाव और शांति की स्थापना हो।
इस सिलसिले में अहमदाबाद में 1 जुलाई को आयोजित """"शांति एवं सद्भावना दिवस"""" इसी दिशा में एक प्रयास था। इस दिन, वसंतरजब की पुण्यतिथि थी। वसंतराव हेंगिस्ते और रजब अली लखानी दो मित्र थे जो साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए काम करते थे। विभाजन के बाद अहमदाबाद में भड़की भयावह साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान वे शांति स्थापना की कोशिशों में लगे हुए थे। शहर के एक हिस्से में दंगे की खबर मिलने के बाद वे वहां पहुंचे। नफरत की आग में जल रही जुनूनी भीड़ ने उन दोनों की जान ले ली। उनके शहादत के दिन, गुजरात में अनेक संगठन अलगअलग आयोजन करते रहे हैं।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कई असाधारण रूप से साहसी व्यक्तियों, चिंतकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने साम्प्रदायिक शांति की वेदी पर अपनी बलि दी है। इस सिलसिले में गणेशशंकर विद्यार्थी का नाम तुरंत हम सब के ध्यान में आता है। वे कानपुर में सन 1931 में साम्प्रदायिक हिंसा रोकने के प्रयास में मारे गए थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के लिए हिन्दूमुस्लिम एकता अत्यंत महत्वपूर्ण थी। जब पूरा देश ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति का जश्न मना रहा था तब गांधीजी नोआखली और बंगाल के अन्य स्थानों में दंगों की आग को शांत करने के प्रयास में लगे हुए थे। गांधीजी एक महामानव थे। उनके लिए उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा का कोई महत्व नहीं थामहत्व था पागल भीड़ को सही रास्ता दिखाने का। यही कारण है कि ब्रिटिश साम्राज्य के आखिरी वाईसराय और स्वतंत्र भारत के पहले गर्वनर जनरल लार्ड माउंटबेटन ने उन्हें """"एक आदमी की सेना"""" कहा था।
इसमें कोई संदेह नहीं कि इस तरह के असाधारण साहस और प्रतिबद्धता के प्रदशर्न के अनेक उदाहरण हमारे देश में होंगे। ऐसे सभी व्यक्तियों को सम्मान से याद रखा जाना आवश्यक है। उनकी जयंतियां और पुण्यतिथियां मनाना एक औपचारिकता मात्र नहीं होनी चाहिए। हमें उनके मूल्यों से कुछ सीखना होगा। यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि आज के भारत में साम्प्रदायिक हिंसा का बोलबाला ब़ता जा रहा है और उसकी प्रकृति और स्वरूप में लगातार परिवर्तन हो रहे हैं। सन 1980 के दशक में व उसके बाद उत्तर भारत के अनेक शहरों में गंभीर साम्प्रदायिक हिंसा हुई। मेरठ, मलियाना, भागलपुर और दिल्ली के दंगों ने विभाजन के बाद हुई साम्प्रदायिक हिंसा की यादें ताजा कर दीं। नैल्ली और दिल्ली में हुई हिंसा में भारी संख्या में निर्दोष लोगों ने अपनी जानें गंवाईं। सन 199293 के मुंबई दंगों से देश को यह स्पष्ट चेतावनी मिली कि हमारे शहरों में अंतर्सामुदायिक रिश्तों में जहर घुलता जा रहा है। मुसलमानों के बाद एक अन्य अल्पसंख्यक समुदायईसाई–को निशाना बनाया जाने लगा। पास्टर स्टेन्स की हत्या और उसके बाद कंधमाल में हुई हिंसा ने कईयों की आंखें खोल दीं।
साम्प्रदायिक हिंसा के मूल में है धर्म की राजनीति। निहित स्वार्थी ताकतें अपने राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक एजेन्डे को धर्म की चाशनी में लपेटकर लागू करना चाहती हैं। दुर्भाग्यवश, भारत में साम्प्रदायिक हिंसा का दौरदौरा, वैश्विक स्तर पर साम्राज्यवादी ताकतों के तेल संसाधनों पर कब्जा करने के षड़यंत्र के समांनांतर चल रहा है। साम्राज्यवादी ताकतें, धर्म के नाम पर कट्टरवाद और आतंकवाद को प्रोत्साहन दे रही हैं। साम्राज्यवादी ताकतों ने दुनिया के धार्मिक समुदायों में से एक बड़े समुदाय का दानवीकरण कर दिया है। इस प्रक्रिया में """"सभ्यताओं के गठजोड़"""" का स्थान """"सभ्यताओं के टकराव"""" ने ले लिया है। निहित स्वार्थी ताकतें सभ्यताओं के टकराव के सिद्घांत की पोषक और प्रचारक हैं। यह सिद्घांत, मानव इतिहास को झुठलाता है। यह इस तथ्य को नकारता है कि मानव समाज की प्रगति के पीछे विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों का गठजोड़ रहा है। जहां शासक और श्रेष्ठि वर्ग अपनी शक्ति और संपदा की बोत्तरी के लिए संघर्ष करते रहे वहीं पूरी दुनिया के आमजन एकदूसरे के नजदीक आए, आपस में घुलेमिले और उन्होंने एकदूसरे से सीखासिखाया। चाहे खानपान हो, पहनावा, भाषा, साहित्य, वास्तुकला या धार्मिक परंपराएंसभी पर अलगअलग संस्कृतियों और सभ्यताओं की छाप देखी जा सकती है। मानव सभ्यता की प्रगति को उर्जा दी है सामाजिक मेलजोल के इंजिन ने।
धर्म के नाम पर की जाने वाली विभाजक राजनीति की शुरूआत होती है मानव जाति के वर्गीकरण का आधार सामाजिकआर्थिक कारकों के स्थान पर धर्म को बनाने से। मानव समाज के जो विभिन्न तबके, स्तर या समूह हैं, उनके मूल में हैं आर्थिकसामाजिक कारक। इस यथार्थ को झुठलाकर कुछ ताकतें यह सिद्ध करने में जुटी हुई हैं कि धार्मिक कर्मकाण्डों की विभिन्नता, मानव जाति को अलगअलग हिस्सों में बांटती है। समाज को एक करने वाले मुद्दों को पीछे खिसकाकर, समाज को बांटने वाले मुद्दों को ब़ावा दिया जा रहा है। साम्प्रदायिक हिंसा का आधार होता है """"दूसरे से घृणा करो"""" का सिद्घांत। यही दुष्प्रचार एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य की जान सिर्फ इसलिए लेने की प्रेरणा देता है कि वह दूसरे धर्म में विश्वास रखता है। इस तरह की हिंसा से साम्प्रदायिक धु्रवीकरण होता है और अलगअलग समुदाय अपनेअपने मोहल्लों में सिमटने लगते हैं। केवल अपने धर्म के मानने वालों के बीच रहने से मनुष्यों का दृष्टिकोण संकुचित होता जाता है और दूसरे समुदायों के बारे में फैलाए गए मिथकों पर वह और सहजता से विश्वास करने लगता है। हिंसाधु्रवीकरण–अपने अपने मोहल्लों में सिमटनासंकुचित मानसिकता में बोत्तरी का यह दुष्चक्र चलता रहता है। इसी दुष्चक्र के चलते हमारे देश में अल्पसंख्यकों को समाज के हाशिए पर पटक दिए जाने के अनेक उदाहरण सामने आ रहे हैं।
समाज में मानवता की पुनर्स्थापना का संघर्ष लंबा और कठिन है। विभिन्न धमोर्ं के हम सब लोगों की एक ही सामाजिकसांस्कृतिक विरासत है और हमारी आवश्यकताएं तथा महत्वाकांक्षाएं भी समान हैं। बेहतर समाज बनाने की हमारी कोशिश में सिर्फ एक चीज आड़े आ रही है और वह है धर्मआधारित राजनीति से उपजी घृणा और जुनून। इस जुनून को पैदा करने के लिए भावनात्मक मुद्दों को उछाला जाता है। इस बात की गहन आवश्यकता है कि समाज के सोचने के ंग को बदला जाए। हम सब पहचानआधारित संकुचित मुद्दों की बजाए उन मुद्दों पर विचार करें जिनका संबंध समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों और उन्हें जीवनयापन के साधन मुहैय्या कराने से है। अल्पसंख्यकों के बारे में फैलाए गए मिथकों से मुकाबला किया जाना जरूरी है। हमारी मिलीजुली संस्कृति पर जोर दिया जाना आवश्यक है। हमें बात करनी होगी भक्ति और सूफी परंपराओं की, हमें याद रखना होगा गांधी, गणेशंकर विद्यार्थी, वसंतरजब और उनके जैसे असंख्यों के मूल्यों को। शांति और सद्भाव की अपनी पुरानी परंपरा को पुनर्जीवित करने के प्रयासों को हम सलाम करते हैं। हमें भरोसा है कि यही राह हमें प्रगति और शांति की ओर ले जाएगी।
-राम पुनियानी

बुधवार, 9 मई 2012

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ..............दस मई





राष्ट्र मुक्ति के संघर्ष का दिन

10 मई 1857 इस राष्ट्र के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम दिवस है |सभी जानते है कि यह संग्राम मेरठ छावनी के सैनिको के विद्रोह के साथ शुरू हुआ था | लेकिन बाद में यह राजाओं , नवाबो , जमीदारो के साथ किसानो , दस्तकारो आदि के जन -- विद्रोह का रूप ग्रहण कर लिया था |
निश्चित तौर पर इस संग्राम का विस्फोट ब्रिटिश कम्पनी और उसकी हुकूमत द्वारा किए जाते रहे लूट -- अन्याय -- अत्याचार और दमन आदि के प्रति समाज के सभी वर्गो में निरंतर बढ़ते असंतोष विरोध के चलते हुआ था | उसमे कारतूसो में गाय - सूअर कि चर्बी के इस्तेमाल जैसे चर्चित तात्कालिक कारणों ने तो उस संग्राम कि पहली चिंगारी भडकाने का ही काम किया था |
एक साल से उपर चले इस संघर्ष में भले ही हिन्दुस्तानियों कि हार हो गयी | लेकिन इस संघर्ष ने न केवल उभरते हुए आधुनिक राष्ट्र के लिए ऐतिहासिक महत्व कि उपलब्धिया प्रदान
है कि बल्कि राष्ट्र के जनसाधारण को वर्तमान युग के संघर्षो के लिए एक विरासत और दिशा भी प्रदान की है |
इसकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धी तो यह है की इसने सदियों से सोते रहे इस राष्ट्र को झकझोर कर उठा दिया | तलवार पकडवाकर युद्ध के मैदान में उतार दिया |सैन्य दृष्टि से अत्यंत प्रशिक्षित सुसंगठित तथा उस समय के आधुनिक हथियारों से लैस ब्रिटिश फ़ौज से युद्ध में सामना करने की निडरता प्रदान कर
दिया | इसने जन -- जन में विदेशी राज को , विदेशी लूट व व्यापार को , विदेशी विजातीय धर्म व संस्कृति को पूरी तरह से उखाड़ फेकने का साहस व पराक्रम प्रदान कर दिया | 1857 के स्वतंत्रता सेनानियों ने इस युद्ध में
अपने रक्त भरकर एक नए जुझारू राष्ट्रवाद को अंकुरित कर दिया | फिर बाद के वर्षो में देश के समर्पित राष्ट्रवादियो एवं क्रान्तिकारियो को इस महान संघर्ष से प्रेरणा लेने का सुअवसर भी प्रदान किया | भगत सिंह व उनके साथियो ने भी अपने क्रांतिकारी संघर्ष में 10 मई को याद किया | उसे शुभ --- दिन का नाम दिया | इसे मनाने के लिए देशवासियों एवं राष्ट्रभक्तो का आह्वान किया | यह सब भगत सिंह एवं उनके साथियो के दस्तावेज में " 10 मई शुभ दिन " नाम से लेख के रूप में मौजूद है | 1857 के संघर्ष ने इस क्षेत्र को खासकर सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश व बिहार के पूर्वी क्षेत्र को इस संघर्ष का नायक बनने का ऐतिहासिक गौरव प्रदान किया है | इस संघर्ष में प्रदेश का पूर्वांचल भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ -- साथ चला | यह युद्ध इस प्रदेश के लगभग हर क्षेत्र में लड़ा गया | पूरे प्रदेश में यह युद्ध एक साथ युद्ध का रूप तो नही ले सका , पश्चिम से पूरब की ओर एक आगे बढती हुई लहर का रूप जरुर ग्रहण किया | निश्चित ही यह युद्ध समूचे क्षेत्र को और युद्धरत रहे इस व अन्य क्षेत्रो की जनता को विशेष गौरव प्रदान करता है और उन्हें भविष्य में ऐसे संघर्षो के लिए प्रेरणा प्रदान करता है |
1857 के इस महासंग्राम ने एक और ख़ास ऐतिहासिक उपलब्धि प्रदान की है |
सदियों तक इस देश के हिन्दुओं -- मुसलमानों में एक साथ रहने के वावजूद
राजनितिक , सामाजिक भिन्नताए उपर से नीचे तक बनी रही | एक साथ का रहन - सहन उसे तोड़ने में कही से सफल नही हो पाया | लेकिन 1857 के इस महासमर ने उनमे अभूतपूर्व राजनितिक एकता खड़ी कर दी | इसे देखकर स्वंय ब्रिटिश शासक भी आश्चर्य चकित रह गये और उन्होंने उसे तोड़ने का उपक्रम ठीक इसी युद्ध के बाद
शुरू कर दिया |
इसके अतिरिक्त 1857 के संग्राम की एक और बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धी यह है की
इसने युद्धरत क्षेत्र के सैनिको , राजाओं , नवाबो , जागीरदारों , किसानो , दस्तकारो , व्यापारियों में ब्रिटिश राज के विरुद्ध भारी एकजुटता खड़ी कर दी | हम यहा 1857 के युद्ध में अग्रेजो का साथ दे रहे विभिन्न समुदायों के उपरी व निचले हिस्से की ब्रिटिश प्रशस्ति और युद्ध में जैसी गद्दारी जैसी गतिविधियों को नजरअंदाज नही कर रहे है , लेकिन याद रखने वाली बात है की हिनुस्तानियो के एक हिस्से में ऐसी भूमिकाये ब्रिटिश राज के स्थापित होने के साथ ही बढने लगी थी | ये भूमिकाये 1857 की देन नही थी | इसके विपरीत वे तमाम लोग जो 1857 के संग्राम में अंग्रेजो के विरुद्ध स्वतंत्रता की तलवार उठाये , वे निसंदेह:1857 की देन थी | उनमे युद्ध के लिए उपर से नीचे तक बनी जो एक्ताये भी 1857 की देन थी | यह सब इस संग्राम की ऐतिहासिक उपलब्धी थी व है | इसलिए इतिहास व इतिहासकार यहा तक अंग्रेज इतिहासकार भी उन लड़ते रहे हिन्दुस्तानियों के मुकाबले अंग्रेजो का साथ दिए हिन्दुस्तानियों को बहुत कम महत्व दिए है | युद्धरत सेनानायको व बहादुरों की हिम्मत व पराक्रम को सम्मान दिए है |अब प्रश्न है कि क्या आज 1857 का महासमर इस देशवासियों के लिए उनके भावी आंदोलनों संघर्षो के लिए प्रेरणा श्रोत बन सकता है ? संघर्ष कि इस विरासत को आगे बढाने में मददगार साबित हो सकता है ?
एकदम हो सकता है पर सभी देशवासियों के लिए कदापि नही | जिस तरह से ब्रिटिश कम्पनी और उसके लूट , दमन व अत्याचार के विरुद्ध खड़े होने वाले विभिन्न सामाजिक हिस्से उसके भुक्तभोगी के रूप में संघर्ष के लिए उठ खड़े हुए थे उसी तरह वर्तमान दौर में विदेशी व देशी धनाढ्य कम्पनियों कि लूट और उसके लिए लाये जाते रहे नीतियों कानूनों आदि के भुक्त भोगी जनसाधारण भी उनके विरोध व विद्रोह के लिए उठ खड़े हो सकते है | जिस तरह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और उसके व्यापार के लिए कम्पनी राज के लिए और इस देश के उनके सहयोगियों के लिए 1857 के के स्वतंत्रता संग्राम डगर था , बगावत था राजद्रोह था उसी तरह से वर्तमान दौर में बढ़ते जनसमस्याओ को लेकर उभ्दने वाला जन -- विरोध -- जन आन्दोलन व संषर्ष भी " राष्ट्र विरोधी " राज विरोधी संघर्ष ही प्रचारित किया जाएगा | 1920 -- 30 के बाद ब्रिटिश कम्पनियों और ब्रिटिश राज के साथ उद्योग व्यापार तथा सत्ता के समझौते में लगे रहे लोगो ने देश कि धनाढ्य कम्पनियों और कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग जैसी पार्टियों ने1857 के संघर्ष को बीत गया इतिहास कहकर स्वतंत्रता संघर्ष में इसकी उपयोगिता को , मार्गदर्शन को पूरी तरह से खारिज कर दिया | |1947 में स्वतंत्रता समझौते के बादशिक्षा मंत्री बने श्री अबुल कलाम आजाद ने इसे खुलकर कहा था कि " पूर्व में घटित युद्ध कि घटनाओं से प्रेरणा लेने का समय बीत गया है | भारत और ब्रिटेन के बीच राजनितिक समस्या को आपसी बातचीत एवं सुलह समझौते द्वारा सुलझा लिया गया है | उसने दोनों देशो के बीच दोस्ती कि नयी भावना भर दी है | भारत ब्रिटिश संबंधो में बीते कल के कडवाहट ' जो उसकी चारित्रिक विशेषता थी अब नही रही |'...................(
इतिहासकार एस. एन . सेन कि पुस्तक एट्टींन फिफ्टीसेवन में अबुल कलाम आजाद कि लिखी भूमिका से उद्घृत )
सत्ता सरकार के उच्च पदों पर आसीन श्री आजाद एवं दूसरे कांग्रेसी लीडरो ने सुलह व समझौतों कि इस प्रक्रिया शुरू होने के बाद 1857 को याद करना बंद कर दिया था जबकि क्रांतिकारी 10 मई को मनाते रहे और आम जनता का इसके लिए आह्वान भी करते रहे | पुस्तक कि भूमिका लिखते समय श्री आजाद यह बात भूल गये1857 में भी हिन्दुस्तान --- ब्रिटिश संबंधो कि कड़वाहट को अंग्रेजो का साथ दे रहे देशवासियों ने कत्तइ नही महसूस किया |फिर 1920 -- 30के बाद ब्रिटिश साम्राज्य व ब्रिटिश राज के साथ समझौता कर रहे देश के धनाढ्य एवं उच्च हिस्से तथा कांग्रेस व मुस्लिम लीग जैसी पार्टियों के लिए संबंधो को कडवाहट तथा 1857 के युद्ध को याद करने कि कोई जगह नही थी |अब उन्हें ब्रिटेन के साथ बढ़ते जा रहे सम्बन्ध में उन्हें भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारियो कि कडवाहट कत्तई महसूस नही हो सकती थी |1947 के बाद तो वह रिश्तो कि वह कडवाहट पूरी तरह से मिठास में बदल गयी |भारत -- ब्रिटेन के रिश्तो कि मिठास व कडवाहट १८५७ में भी थी और आज भी है | जिन तबको के रिश्ते लुटेरे , साम्राज्यवादियों के साथ बनते और मधुर होते गये उन्हें संबंधो में मिठास कि अनुभूति होती गयी , पर जिनके साथ अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसे देशो के साथ रिश्ते कडवे बने रह गये , उन्हें 1857 जैसी कडवाहट ही महसूस होगी और हो भी रही है |
कौन नही जानता कि वर्तमान दौर में देश के समूचे धनाढ्य एवं उच्च हिस्से के सम्बन्ध अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसी साम्राज्यी देशो कि सरकारों से साम्राज्यी कम्पनियों से व साम्राज्यी पूंजी से मधुरतम होते गये |इन संबंधो के जरिये यहा और वहा के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों के निजी हितो -- स्वार्थो का परस्पर सहयोग अधिकाधिक मुनाफाखोरी व सूदखोरी कि लूट का अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसे साम्राज्यी ताकतों के प्रभुत्व या दबदबे के अधिकाधिक बढाव का काम निरंतर बढ़ता रहा है |इन्ही लुटेरे व प्रभुत्वकारी संबंधो में आम मजदूरों , किसानो , दस्तकारो , बुनकरों , दुकानदारों एवं अन्य मध्यम वर्गियो का जीवन चौतरफा संकटों से घिरता जा रहा है | उन्हें महगाई , बेकारी आदि कि मार सहने के साथ -- साथ लाखो कि संख्या में आत्महत्याए तक के लिए विवश करता जा रहा है |
देसंश के जन साधारण के लिए ये सम्बन्ध कडवे है निरंतर कटू से कटुतम होते गये है | उन्हें ऐसे शोषणकारी प्रभुत्वकारी संबंधो से राष्ट्र के जन साधारण को मुक्त कराने के लिए १८५७ को और देश -- दुनिया के अन्य क्रांतकारी घर्षो आंदोलनों को याद करना ही पडेगा | उन्हें इन संघर्षो को अपना पथ प्रदर्शक मानकर आगे बढना ही होगा
-कबीर
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