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सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

शाइनिंग इंडिया चेहरा सुधीन्द्र कुलकर्णी का

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्ड होल्डर से सफ़र शुरू करने वाले तथा  पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के विशेष कार्याधिकारी रहे सुधीन्द्र कुलकर्णी के चेहरे पर शिव सैनिकों ने कालिख पोत दी. वर्तमान में कुलकर्णी थिंक टैंक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन चला रहे हैं और पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी की किताब का विमोचन मुंबई में आयोजित किया है. शिव सेना पाकिस्तानी पूर्व विदेश मंत्री के इस कार्यक्रम का विरोध कर रही है. उसका कहना है कि कुलकर्णी पाकिस्तानी एजेंट हैं. पकिस्तान से हमारे मुल्क की दुश्मनी है. हम उनका कार्यक्रम नहीं होने देंगे. 
लोकतान्त्रिक व्यवस्था के तहत सभी को अपने विचार रखने व अपनी बात कहने का अधिकार है लेकिन बम्बई में कुछ भी करने के लिए सरकार के अतिरिक्त शिव सेना की अनुमति की आवश्यकता होती है पूर्व में कांग्रेस की सरकार थी तब भी यही स्तिथि थी और अब भाजपा की सरकार है, स्तिथि ज्यों की त्यों बनी हुई है. शिव सेना की समान्तर सरकार चला रही है और उसका विरोध करने का साहस किसी भी दल में नहीं है. सुधीन्द्र कुलकर्णी अवसरवादी तत्व हैं और जब वह विशेष कार्याधिकारी पूर्व प्रधानमंत्री के थे तब गुजरात का नरसंहार हुआ था और उसका विरोध करने का नैतिक साहस उनमें नहीं था. उलटे कुलकर्णी साहब ने शाइनिंग इंडिया का नारा दिया था.
देश के अन्दर पुराने फासिस्टों और नए फासिस्टों में एक दुसरे से आगे जाने की होड़ लगी है. एक कहता है की एक आँख हम फोड़ देंगे तब तक दूसरा दोनों आँख फोड़ देता है. उसी की परिणित आज सुधीन्द्र कुलकर्णी के ऊपर कालिख पोतने से हुई है. 
फासिस्ट व्यवस्था में तर्क, बुद्धि व विचार की बात करना अपनी हत्या का आमंत्रण देना है. पूर्व में महाराष्ट्र के अन्दर ही नरेन्द्र दाभोलकर व गोविन्द पानसरे की हत्या हो चुकी है. प्रदेश सरकार हत्यारों के खिलाफ कड़ी कार्यवाई करने में अपने को असमर्थ पाती है. 
मुंबई में कसूरी का कार्यक्रम हो गया है लेकिन एक फासिस्ट संगठन द्वारा दूसरे फासिस्ट संगठन के चेहरे को शाइनिंग इंडिया बना दिया है यह शाइनिंग इंडिया वर्तमान प्रदेश व केंद्र सरकार का असली चेहरा है. गंभीर कवि व लेखक सरकार की नीतियों के खिलाफ साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस कर अपना विरोध जाता रहे हैं वहीँ, सरकार अपना मौन व्रत जारी रखे है.

सुमन 

सोमवार, 29 सितंबर 2014

समाचारपत्र या चैनल,ठाकरे या शिवसेना के विरूद्ध लिखता है, उसके दफ्तरों पर हमले


महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना का गठबंधन टूट गया है। गठबंधन सीटों के बंटवारे को लेकर टूटा है। शिवसेना, जैसा कि सभी जानते हैंए एक अत्यधिक दकियानूसी संगठन है। वैसे भी यह आश्चर्य की बात है कि एक संगठन,जिसके नाम से 'सेना' शब्द जुड़ा हो वह राजनीतिक पार्टी कैसे हो सकता है?उससे भी बड़ा आश्चर्य यह है कि चुनाव आयोग ने एक 'सेना'  को राजनैतिक पार्टी के रूप में मान्यता प्रदान कर रखी है।
शिवसेना की स्थापना बालासाहेब ठाकरे ने की थी। राजनीति में प्रवेश के पहले,ठाकरे मुंबई के एक अखबार में बतौर कार्टूनिस्ट सेवारत थे। अपने संगठन का नाम उन्होंने शिवाजी के नाम पर रखा था। यहां यह स्मरण दिलाना प्रासंगिक होगा कि राज्य पुनर्गठन आयोग ने वैसे तो भाषा.आधारित राज्यों के गठन की सिफारिश की थी परंतु महाराष्ट्र और गुजरात को एक ही राज्य रहने दिया था, इसका जोरदार विरोध महाराष्ट्र और गुजरात में हुआ। महाराष्ट्र में विरोध अपेक्षाकृत ज्यादा आक्रामक था और उसने अनेक स्थानों पर हिंसक रूप ले लिया था। यद्यपि महाराष्ट्र के निर्माण की मांग करने वाली समिति में कांग्रेस को छोड़कर, सभी राजनीतिक दल शामिल थे परंतु इस आंदोलन के दौरान एक संकुचित भाषा.आधारित विचार ने जन्म लिया था। महाराष्ट्र के निर्माण के लिए बनी समिति के नेताओं में प्रोफेसर पी.के. अत्रे भी शामिल थे। वैसे तो वे एक महान साहित्यकार थे परंतु उन्होंने आंदोलन के दौरान कुछ ऐसी बातें कहीं जिससे महाराष्ट्र आंदोलन ने एक काफी संकुचित रूप ले लिया। प्रोफेसर अत्रे ने अनेक अवसरों पर कहा कि भारतवर्ष के राज्यों में इतिहास तो सिर्फ महाराष्ट्र का है बाकी राज्यों का तो मात्र भूगोल है। सच पूछा जाये तो बालासाहेब ठाकरे ने इसी तरह के विचारों से प्रेरित होकर शिवसेना की स्थापना की थी। वैसे बालासाहेब ठाकरे शिवसेना को एक हिंदुत्ववादी पार्टी मानते थे। परंतु मेरी राय में शिवसेना वास्तव में एक हिंदू.विरोधी पार्टी है। शिवसेना का एक प्रमुख नारा है 'मुंबई में सिर्फ मराठी भाषी ही रह सकते हैं'। इस नारे के चलते शिवसैनिकों ने अनेक बार मुंबई में रहने वाले गैर मराठी भाषा.भाषी नागरिकों पर हिंसक हमले किए। मुंबई में मराठी भाषियों की संख्या भले ही ज्यादा हो परंतु मुंबई को देश की सबसे बड़ी औद्योगिक और व्यवसायिक नगरी बनाने में गैर मराठी भाषा.भाषियों का भी योगदान है। मुंबई हर दृष्टि से उतना ही कास्मोपोलिटन शहर है जितना कि न्यूयार्क, लंदन और पेरिस हैं। इसलिए उसे किसी भी हालत में एक ऐसा शहर नहीं बनाया जा सकता जिसमें एक ही भाषा बोलने वाले रह सकें। मुंबई में देश में बोली जाने वाली सभी भाषाओं के प्रतिनिधि रहते हैं। वास्तव में मुंबई एक लघु भारत ही है। जब यह नारा लगाया जाता है कि मुंबई में सिर्फ मराठी भाषी रह सकते हैं और जो मराठी भाषी नहीं उन्हें मुंबई छोड़ देना चाहिए तो इस नारे का सर्वाधिक प्रतिकूल असर हिंदुओं पर ही पड़ता है। उत्तरप्रदेश के हिंदू, मुंबई के नागरिकों को दूध पिलाते हैं, उत्तरप्रदेश और बिहार के हिंदू मुंबई में टैक्सी और ऑटो चलाते हैं। ये सब ऐसे हिंदू हैं जो रोजी.रोटी के लिए मुंबई आते हैं और अपने असाधारण श्रम से मुंबई को जिंदा रखते हैं। ऐसे हिंदू.विरोधी संगठन से भारतीय जनता पार्टी का नाता वैसे भी अस्वाभाविक था।
भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक शाखा है। संघ का कहना है कि वह हिंदुओं की रक्षा के लिए और हिंदुओं की एकता के लिए समर्पित है। इस उद्देश्य को हासिल करने की राजनीतिक जिम्मेदारी, भारतीय जनता पार्टी को सौंपी गई है। शिवसेना के साथ हाथ मिलाकर यह जिम्मेदारी कैसे पूरी की जा सकती है? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर ढूंढना अनिवार्य है।
इस तरहए सच पूछा जाये तो भाजपा को चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर ही नहीं, बल्कि वैचारिक आधार पर भी, शिवसेना से अपना संबंध पहले ही तोड़ लेना चाहिए था। फिर,शिवसेना की कुछ ऐसी गतिविधियां भी हैं जो भाजपा के एजेण्डे में नहीं हैं। जैसे.शिवसेना कहती है कि मुंबई में पाकिस्तान की किक्रेट टीम को हम खेलने नहीं देंगे, पाकिस्तानी फिल्मों का प्रदर्शन नहीं होने देंगे, प्रसिद्ध गजल गायक मेंहदी हसन और गुलाम अली समेत पाकिस्तान के गायकों का कार्यक्रम नहीं होने देंगे। इस तथ्य के बावजूद कि भारत की सबसे महान गायिका लता मंगेश्कर, इन दोनों प्रसिद्ध गजल गायकों की प्रशंसक हैं। हम पाकिस्तान के गायकों को तो गाना नहीं गाने देंगे परंतु प्रसिद्ध अमरीकी गायक माइकल जैक्सन को गाने की इजाजत देंगे। इसके अलावाए शिवसेना का घोषित एजेण्डा मुस्लिम.विरोधी भी है। जब 1992 में मुंबई में दंगे हुए तो ठाकरे ने सार्वजनिक रूप से कहा कि मेरे सैनिकों ने हिंदुओं की रक्षा की है। मुंबई के दंगों में शिवसेना की भागीदारी का श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी अद्भुत रिपोर्ट में अनेक बार उल्लेख किया है। बाबरी मस्जिद तोड़ने का श्रेय भी बालासाहेब ठाकरे ने अपने ;लड़कों; को दिया था।
शिवसेना ने अगले प्रधानमंत्री के तौर पर सुषमा स्वराज का नाम सुझाया था। आज जब नरेन्द्र मोदी सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि उन्हें भारत के मुसलमानों के देशभक्त होने पर पूरा भरोसा है, जब वे सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि भारत का मुसलमान अलकायदा का साथ नहीं देगा, इसके बावजूद यदि घनघोर मुस्लिम.विरोधी शिवसेना से भाजपा अपना संबंध बनाये रखती तो यह कहां तक उचित होता?
शिवसेना एक घोर अवसरवादी संगठन भी है। एनरोन नाम की एक विदेशी कंपनी ने महाराष्ट्र में बिजली का कारखाना डालने का प्रस्ताव किया था। शिवसेना ने इसका घोर विरोध किया। परंतु जब शिवसेना और भाजपा की सरकार बनी तो शिवसेना ने एनरोन को महाराष्ट्र में बिजली का कारखाना स्थापित करने की इजाजत दे दी। अवसरवादिता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है? शिवसेना और उसके संस्थापक बालासाहेब ठाकरे ने कभी भी भारतीय संविधान, न्यायपालिका और मीडिया के प्रति सम्मान नहीं दिखाया है। जो भी समाचारपत्र या चैनल,ठाकरे या शिवसेना के विरूद्ध लिखता है, उसके दफ्तरों पर हमले किए जाते हैं। बालासाहेब ठाकरे का दृष्टिकोण कितना संकुचित था,इसका एक बहुत ही दिलचस्प उदाहरण है। अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व के दौरान जब पोखरन में परमाणु विस्फोट हुआ तो ठाकरे ने हिंदू वैज्ञानिकों को ही बधाई दी। इसी तरह, जब मुंबई में एक मराठी भाषी बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया गया तो बालासाहेब ठाकरे ने कहा कि मराठी भाषी बलात्कार कर ही नहीं सकते।
अब प्रश्न यह है कि भाजपा ने स्थाई रूप से शिवसेना से तलाक लिया है या कुछ समय बाद स्थिति बदल सकती है? इस संबंध में अभी कुछ भी कहना उचित नहीं होगा। एक और मुद्दा है जिसका यहां उल्लेख करना आवश्यक है। भारतीय जनता पार्टी, राजनीति में परिवारवाद की विरोधी है। परंतु जब शिवसेना में परिवारवाद आया तो भाजपा मौन धारण किए रही। बालासाहेब ठाकरे ने अपने जीवनकाल में ही अपने पुत्र उद्धव ठाकरे को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। उनके इस निर्णय से खफा होकर,उनके भतीजे राज ठाकरे ने शिवसेना से अपना संबंध विच्छेद कर लिया और एक नई पार्टी बना ली थी। यह सभी लोग मानते हैं कि राज ठाकरे में नेतृत्व की क्षमता ज्यादा है और शिवसेना के संकुचित विचारों के आधार पर गतिविधियां संचालित करने की रणनीति में राज ठाकरे को पारंगता हासिल है। इस तरह, देखा जाये तो शिवसेना और भाजपा के बीच असमानताएं ज्यादा थीं इसलिए दोनों के संबंध विच्छेद से किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
-एल.एस. हरदेनिया

सोमवार, 5 अगस्त 2013

साम्प्रदायिक हिंसा: कौन है दोषी?

मेरे एक मित्र, आसानी से हार मानना जिनके स्वभाव का हिस्सा नहीं है, अपनी वक्तृव्य कला का उपयोग कर मुझे यह समझाने की कोशिश कर रहे थे कि साम्प्रदायिक हिंसा के लिए भाजपा से कहीं ज्यादा कांग्रेस जिम्मेदार है। उन्होंने देश में हुए प्रमुख साम्प्रदायिक दंगों को गिनाया और यह बताया कि जब ये भीषण घटनाक्रम हुए तब कांग्रेस, संबंधित क्षेत्र में सत्ता में थी। वे पूछते हैं कि हम गुजरात हिंसा की एक घटना को इतना अधिक महत्व क्यों दे रहे हैं और उसे नरेन्द्र मोदी व भाजपा के खिलाफ एक बड़ा मुद्दा क्यों बना रहे हैं? कुछ अन्य लोग भी अक्सर कहते हैं कि मोदी की सरकार की सन् 2002 के कत्लेआम में जो भूमिका थी, लगभग वही भूमिका कांग्रेस की सन् 1984 के सिक्ख-विरोधी दंगों में थी। अगर मोदी ने यह कहकर गुजरात को सही ठहराया था कि ‘‘हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है‘‘ तो राजीव गांधी ने भी सिक्खांें की मारकाट को औचित्यपूर्ण बताते हुए कहा था कि ‘‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती कांपती है‘‘- तो फिर मोदी और भाजपा को हम किस तरह साम्प्रदायिक दंगों के लिए अधिक जिम्मेदार ठहरा सकते हैं?
भारत में साम्प्रदायिक हिंसा की शुरूआत हुई अंगेेजों द्वारा ‘फूट डालो और राज करो‘ की नीति लागू किए जाने के साथ। इस नीति के अन्तर्गत ही उन्होंने इतिहास का साम्प्रदायिकीकरण किया और शासकों को धर्म के चश्मे से देखना शुरू किया। इसी सोच को जमींदारों और राजाओं-नवाबों के अस्त होते वर्ग ने अपना लिया। इन्हीं अस्त होते वर्गों ने मुस्लिम और हिन्दू-दोनों ब्रांडों की साम्प्रदायिकता की नींव रखी। हिन्दू साम्प्रदायिक तत्व मुस्लिम राजाओं पर मंदिर ढहाने और जबरन धर्मांतरण करवाने का आरोप लगाते थे जबकि मुस्लिम साम्प्रदायिक तत्व यह दावा करते थे कि वे देश के शासक हैं। इतिहास के इस तोड़े-मरोड़े गए संस्करण के कारण, हिन्दुओं और मुसलमानों में आपसी घृणा बढ़ती गई। शनैः-शनैः साम्प्रदायिक पार्टियां उभर आईं जिनमें मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा शामिल हैं। विभिन्न साम्प्रदायिक दलों ने समाज में नफरत फैलाने में तो कामयाबी हासिल कर ली परंतु चुनाव के मैदान में उन्हें कभी सफलता न मिल सकी। ब्रिटिश दौर में एक समुदाय को दूसरे समुदाय का शत्रु बनाने में अंग्र्रेजों द्वारा तैयार किए गए इतिहास के साम्प्रदायिक संस्करण की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। अंगे्रजों ने एक समुदाय को दूसरे समुदाय के खिलाफ भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी परंतु उस वक्त भी सड़कों और चैराहों पर हिंसा करने वाले लोग तो साम्प्रदायिक संगठनों के सदस्य ही हुआ करते थे। उस समय पुलिस और प्रशासन तटस्थ प्रेक्षक की भूमिका निभाता था। यहां यह महत्वपूर्ण है कि हिन्दू-मुस्लिम हिंसा के लंबी त्रासद सिलसिले के पीछे कई कारक थे, जिन्होंने अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं। अंग्रेजों के दौर में साम्प्रदायिक दंगों के लिए ब्रिटिश सरकार की नीतियां (इतिहास का साम्प्रदायिकीकरण और फूट डालो और राज करो की नीति) व साम्प्रदायिक तत्व जिम्मेदार थे। तत्कालीन पुलिस और प्रशासन को इस सिलसिले में कतई दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
धीरे-धीरे समय बदलने लगा। स्वाधीनता के बाद प्रशासन और पुलिस तटस्थ नहीं रह गए। वे पक्षपात करने लगे। एक जानेमाने पुलिस अधिकार डाॅ व्ही. एन. राय द्वारा किए गए अनुसंधान से यह सामने आया है कि कोई भी साम्प्रदायिक हिंसा तब तक जारी नहीं रह सकती जब तक कि प्रशासन और राजनैतिक नेतृत्व ऐसा न चाहे। इसके लिए मुख्यतः दोषी हैं साम्प्रदायिक ताकतें, जो न केवल अल्पसंख्यक समुदाय के बारे में दुष्प्रचार करती रहीं बल्कि उनके कुछ साथियों ने, साम्प्रदायिक हिंसा का इस्तेमाल, समाज को धार्मिक आधार पर धु्रवीकृत करने के लिए किया। धार्मिक आधार पर धु्रवीकरण से साम्प्रदायिक ताकतों को सामाजिक, राजनैतिक और चुनावीे क्षेत्र में लाभ हुआ। अन्य पार्टियों के राजनेेताओं ने भी कबजब हिंसा का इस्तेमाल सत्ता में आने या उसमें बने रहने के लिए किया। उस समय हुए दंगों की जांच करने वाले विभिन्न आयोगों ने साम्प्रदायिक ताकतों की भूमिका को रेखांकित किया है। अहमदाबाद के 1969 के दंगों की जगमोहन रेड्डी न्यायिक आयोग द्वारा की गई जांच की रपट स्पष्ट कहती है कि दंगों के पीछे आरएसएस और जनसंघ के नेताओं की भूमिका थी। इस तरह, स्वतंत्रता के तुरंत बाद के वर्षों में, साम्प्रदायिक ताकतों ने सत्ता में न रहते हुए भी, दंगे भड़काने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
सन् 1970 के भिवंडी-जलगांव दंगों की जांच करने वाले न्यायमूर्ति डी. पी. मादौन आयोग की रपट कहती है कि ‘‘हिन्दू समुदाय के कुछ सदस्य, विशेषकर आरएसएस व पीएसपी के कार्यकर्ता, गड़बड़ी फैलाने के लिए आतुर थे और उन्हें इसमें सफलता इसलिए मिली क्योंकि पुलिस तटस्थ बनी रही।“ सन् 1971 के तेल्लीचेरी दंगों की न्यायमूर्ति जोसफ विथ्याथिल ने जांच की थी। इस रपट में यह कहा गया है कि मुस्लिम-विरोधी प्रचार की शुरूआत आरएसएस व जनसंघ ने की थी। इस सबसे सामाजिक वातावरण बिगड़ गया और समाज धार्मिक आधार पर धु्रवीकृत हो गया। सन् 1979 के जमशेदपुर दंगों की जांच करने वाले न्यायिक आयोग ने कहा कि ‘‘हिंसा की शुरूआत संयुक्त बजरंगबली अखाड़ा समिति-जो कि आरएसएस से जुड़ा संगठन था-ने की। इस संगठन ने जानबूझकर जुलूस के रास्ते को लेकर विवाद खड़ा किया और इसके सदस्यों ने मुस्लिम विरोधी नारे लगाए।‘‘ कन्याकुमारी के 1982 केे दंगों की जस्टिस वेणु गोपाल आयोग की जांच रपट उन अफवाहों को फैलाने में आरएसएस की भूमिका की चर्चा करती है, जिनके चलते हिंसा भड़की। जस्टिस श्रीकृष्ण जांच आयोग ने यह साफ कर दिया है कि मुंबई के दंगांे में भाजपा के साथी दल शिवसेना की अत्यंत कुत्सित भूमिका थी।
प्रश्न यह है कि क्या दंगों के लिए केवल शासक दल को दोषी ठहराया जाना उचित है? साम्प्रदायिक हिंसा, समाज को बांटने वाले साम्प्रदायिक  प्रचार, पुलिस की भूमिका और शासक दल के दृष्टिकोण का मिलाजुला नतीजा होती है। अतः इन सभी को इस हिंसा के लिए दोषी ठहराया जा सकता है और ठहराया जाना चाहिए। शासक दल, जो कि अधिकांश दंगों के समय कांग्रेस रही है, को हिंसा से अपेक्षित कड़ाई से न निपटने, कई मौकों पर हिंसा को नजरअंदाज करने और कभी-कभी हिंसा को भड़काने-उदाहरणार्थ दिल्ली में-का दोषी ठहराया जा सकता है। इस सिलसिले में पुलिस की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। ब्रिटिश राज में साम्प्रदायिक दंगों में पुलिस पूरी तरह तटस्थ रहती थी। परंतु आज वह दंगों में भाग लेती है। जैसा कि महाराष्ट्र के धुले में सन् 2012 में हुए दंगों से जाहिर है। यहां हिन्दू दंगाईयों की जरूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि पुलिस ने खुद ही मुुसलमानों पर गोली चालन कर कई निर्दोष व्यक्तियों की जान ले ली।
तो साम्प्रदायिक हिंसा के मसले पर हम भाजपा और कांगे्रस की तुलना किस रूप में कर सकते हैं? भाजपा, दरअसल, आरएसएस की राजनैतिक शाखा है। साम्प्रदायिक दुष्प्रचार, अफवाहें फैलाने, साम्प्रदायिक धु्रवीकरण करने, भड़काऊ भाषणबाजी और हिंसा करने का आरएसएस का कई दशकों का अनुभव है। उसने इस कौशल से अपने अनुषांगिक संगठनों और अपनी विभिन्न शाखाओं को भी लैस कर दिया है। गुजरात के कत्लेआम में संघ ने ये सभी भूमिकाएं निभाईं। परंतु बाकी दंगों में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सत्ता में न रहने का अर्थ यह नहीं है कि आरएसएस ने दंगे भड़काने में प्रमुख भूमिका अदा नहीं की। यह तर्क कि चूंकि अधिकांश दंगे कांग्रेस के राज में हुए इसलिए दंगों के लिए कांग्रेस ही दोषी है, दरअसल, साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा कुटिलतापूर्वक गढ़े गए कई मिथकों में से एक है। यद्यपि साम्प्रदायिक हिंसा के संदर्भ में कांग्रेस का दामन पूरी तरह पाकसाफ नहीं है परंतु उसकी भूमिका की तुलना भाजपा की भूमिका से करना घोर अनुचित होगा। सिक्ख-विरोधी दंगों को छोड़कर कांग्रेस ने कभी दंगे करवाने में केन्द्रीय भूमिका नहीं निभाई। हां, उसने अपने कर्तव्य पालन में कोताही अवश्य बरती। परंतु भाजपा की तो अधिकांश दंगे भड़काने में केन्द्रीय भूमिका रही है।
सन् 1984 के सिक्ख कत्लेआम में कांग्रेस की भूमिका उसकी बहुवादी व धर्मनिरपेक्ष विरासत पर एक बदनुमा दाग है। उसने इस दाग को मिटाने की काफी कोशिशें की हैं। कांग्रेस ने दंगों के लिए माफी मांगी है और उसकी सरकार का प्रधानमंत्री एक सिक्ख है, जो पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद सबसे लंबे समय तक लगातार इस पद पर आसीन रहने वाले व्यक्ति हैं। भाजपा की किसी और पार्टी से इसलिए भी तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि भाजपा, आरएसएस की राजनैतिक संतान है और आरएसएस का लक्ष्य हिन्दू राष्ट्र का निर्माण है। समाजविज्ञानियों ने कांग्रेस और भाजपा की राजनीति के बीच के विरोधाभास को स्पष्ट किया है। एजाज अहमद कहते हैं कि जहां भाजपा का कार्यक्रम ही साम्प्रदायिक है वहीं कांग्रेस की साम्प्रदायिकता, अवसरवादी है। मुकुल केसवन ने अपने एक हालिया लेख में कहा कि कांग्रेस मूलतः बहुवादी और मौका पड़ने पर साम्प्रदायिक है जबकि भाजपा विचारधारा के स्तर पर साम्प्रदायिक और मौका पड़ने पर धर्मनिरपेक्ष है।
इस तथ्य के बावजूद कि साम्प्रदायिक हिंसा के पीछे कई कारक होते हैं, दो गलत चीजें मिलकर एक सही नहीं बन सकतीं। कांगे्रस को ऊपर से नीचे तक व्यापक सुधार लाने होंगे ताकि साम्प्रदायिक हिंसा पर नियंत्रण पाया जा सके। साम्प्रदायिक दुष्प्रचार का प्रभावी खण्डन होना चाहिए और कानूनों में इस तरह के परिवर्तन होने चाहिए की न केवल दंगाई बल्कि दंगों को रोकने के अपने कर्तव्य का पालन न करने वाले अधिकारियों को भी सजा मिल सके। जहां तक आरएसएस और उसके साथियों का सवाल है, उनसे यह उम्मीद करना बेकार है कि वे साम्प्रदायिक हिंसा पर नियंत्रण पाने में देश की कोई मदद करेंगे।     

-राम पुनियानी

गुरुवार, 15 नवंबर 2012

डर है या वास्तविकता

मुंबई में शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे की तबियत अत्यधिक ख़राब है। प्रदेश सरकार से लेकर भारत सरकार तक चिंतित है कि  कहीं बाला साहेब की मृत्यु न हो जाए और मृत्यु के बाद मुंबई समेत महाराष्ट्र में दंगा फसाद न होने लगे। इस सदी के महानायक तथा बाराबंकी जनपद में जमीन की जालसाजी में लिप्त रहे श्री अमिताभ बच्चन का कुर्ता फाड़ कर मार पिटाई उस वक्त की गयी है जब वह बाला साहेब को देखने उनके निवास गए थे . प्राप्त समाचारों को देखने के बाद यह प्रतीत होता है कि बॉलीवुड के अधिकांश अभिनेता बाला साहेब के स्वास्थ्य को लेकर विशेष रूप से चिंतित हैं। उद्योगपति भी उनको देखने विशेष रूप से जा रहे हैं। इन समाचारों का विश्लेषण करने से यह भी अनुभव होता है कि बाला साहेब की न्यूसेंस वैल्यू की धमक के डर से लोग ज्यादा अपने को व्याकुल दिखा रहे हैं। मुंबई में कर्फ्यू जैसे द्रश्य अगर देखने को मिल रहे हैं तो उसके पीछे डर ही काम कर रहा है। 
                     बाला साहेब कभी पाकिस्तान के साथ खेलों के खिलाफ रहे हैं तो कभी उत्तर भारतियों को महाराष्ट्र छोड़ने की धमकी देना, उनका प्रिय कार्य था। उग्र हिन्दुवात्ववादियों की वह पहचान थे। भारतीय समाज में मरणासन्न व्यक्ति को कुछ कहा नहीं जाता है और मरने के बाद भी उस पर टिपण्णी करना भी सभ्यता के खिलाफ माना  जाता है किन्तु इसके बावजूद यह भूला भी नहीं जा सकता है कि हजारों लोगों की हत्याएं जो पूर्णतया निर्दोष थे, महाराष्ट्र में होती रही हैं जो भाषा, प्रान्त, धर्म के नाम पर हुई हैं जिसका श्रेय  हिन्दू ह्रदय सम्राट बाला साहेब को जाता है और उनका डर महाराष्ट्र में रहने वाले प्रत्येक नागरिक को था। शिव सैनिको का खौफ आज भी है और सरकार की नियत अगर साफ़ नहीं रही तो आगे भी जारी रहेगा। सभी परिस्तिथियों को देखने के बाद विधि का शासन व भारतीय संविधान का अर्थ महाराष्ट्र में शिव सैनिको के आगे नहीं था।

सुमन
लो क सं घ र्ष !


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