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बुधवार, 3 दिसंबर 2014

जन विकास की पुख्ता आधारशिलाएँ

 भारत में विकास, सार्वजनिक नीतियों,  राजकाज तथा लोक कल्याण आदि विषयों के बारे में सोच कुछ गहरी विसंगतियों से भरा हुआ है। उसका एक बहुधा नजर आने वाला पक्ष है आर्थिक तथा सामाजिक पक्षों को अलग-अलग करके, कभी कभार तो विरोधी या प्रतिद्वंद्वी रूप में देखना। इस प्रवृत्ति का नतीजा है कि आर्थिक विकास या कल्याण को सामाजिक विकास या कल्याण से अलग करके देखा और पेश किया जाता है। भारत में आर्थिक विकास को प्राथमिकता दी गयी है। धारणा हैं कि आर्थिक विकास एक तो सामाजिक विकास का रास्ता खोलेगा, दूसरे आर्थिक विकास (यानी ऊँची, सम्पूर्ण तथा प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय) के ऊँचे और तेजी से बढ़ते स्तर के कारण राजकीय राजस्व या आमदनी का ऊँचा स्तर सुलभ हो पाएगा। इस आधार पर राज्य सामाजिक सेवाओं सुविधाओं, सुरक्षा की उपलब्धता में तेजी से इजाफा कर पाएगा। इस तरह माना गया कि एक ओर निजी ऊँची आमदनी तथा दूसरी ओर राज्य द्वारा दी गई सामाजिक सेवाओं का तेजी से प्रसार सारे देश के सामाजिक विकास को लगातार नई ऊँचाइयाँ देता रहेगा। इस तरह यह निष्कर्ष निकाला गया कि आर्थिक विकास सामाजिक विकास का रास्ता भी प्रशस्त करता है। परिणाम स्वरूप विकास के इन दो पक्षों या पहलूओं में कोई मूलभूत या दूरगामी अन्तरविरोध नहीं माना गया। भारत की पाँच साला विकास योजनाओं और सालाना बजटों पर इस सोच की गहरी छाप दिखाई देती है।
    हम आजादी के सात दशक पूरे करने जा रहे हैं। विकास रणनीति, योजनाओं, आर्थिक और सामाजिक नीतियों और कार्यक्रमों के कारण आज भारतीय अर्थ व्यवस्था और सामाजिक स्थिति में कड़वे मीठे, सीमित तथा व्यापक फैलाव वाले परिवर्तनों के सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता है। हर साल बजट दर बजट कुछ नई आर्थिक सामाजिक नीतियों और कार्यक्रमों का एक मिश्रण देश में लागू किया जाता है। आमतौर पर इन नीतियों और कार्यक्रमों की समीक्षा में केन्द्रीय तथा राज्य सरकारों की भूमिका का साझा आकलन किया जाता है। राज्य सरकारों के कामों-नीतियों में जिस तरह भिन्नता नजर आती है, उसी तरह केन्द्र द्वारा भी अपने संसाधनों के प्रादेशिक आवंटन में एक सीमा तक गैर बराबरी का पुट साफ नजर आता है। आवंटन में सबसे बड़ी गंभीर तथा अनुचित असमानता गाँवों तथा शहरों के बीच देखी जाती है। किन्तु देश ने अब तक यह देखा है कि एक ओर जहाँ भारत की बहुआयामी विविधता और विषमताएँ  बढ़ रही हैं, तो दूसरी ओर कुल मिलाकर विकास इन दोनों पैमानों पर काफी नाकाफी भी रहा है।
    इस स्थिति को समझने की कोशिशों का पहला बिन्दु हमें यह नजर आता है कि आर्थिक और सामाजिक विकास को अलग अलग समझना अवास्तविक है। साथ ही आर्थिक विकास की वैशाखी पकड़ कर सामाजिक विकास की ओर बढ़ सकने की परिकल्पना से सामाजिक जीवन के दोनों ही पहलू आहत हुए हैं। खास बात यह है कि इस बिलगाव के असर में आर्थिक तरक्की को प्रधानतः प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय के रूप में देखा गया है आयके समाज के विभिन्न तबकों, समूहों, वर्गों में न्यायपूर्ण और समुचित वितरण की इतनी घोर उपेक्षा की गई कि वितरण की विषमता के विस्तृत होते विष को भी शिरोधार्य कर लिया गया। वास्तव में यह सम्पन्न और सशक्त लोगों के क्षुद्र और संक्रीर्ण हितों और लोभ की वेदी पर करोड़ों नागरिकों की कई पीढि़यों की न्यूनतम मानवीय जरूरतों की आहुति देने जैसा दुष्कर्म साबित होता जा रहा है। सन् 1990 तक सामाजिक शक्ति, क्षमताओं, प्रभाव और सम्पत्ति पर अत्यधिक आधिपत्य जमाये तबकों को आर्थिक एकांगी विकास की बागडोर देते हुए भी उन पर लोकतांत्रिक राज्य का नेतृत्व अपने महावती उत्तरदायित्व का अंकुश रखने की कोशिशों में लगा रहा। इन प्रयासों को असफल करने के बाद तो सन् 1990 के बाद शक्ति सम्पत्ति के शीर्षस्थ तबकों ने सामाजिक विकास को पूरी तरह हासिये पर डाल दिया। रोटी, कपड़ा, मकान की मांग अधर में लटक गई। अब बिजली पानी, सड़क भी आन्दोलनों के मुद्दे बन गए। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पोषण, स्वच्छता के बदले महानगरों में तेजी से बढ़ती राष्ट्रीय आय सम्पन्नों के अरमान राज्य के केन्द्र बन गए। देसी परदेसी कम्पनियों के हाथों में अभूतपूर्व केन्द्रीकरण हुआ किन्तु न तो राजकीय राजस्व अनुपात बढ़ पाया और न ही उसका सामाजिक विकास के लिए आवंटन बढ़ा। निरपेक्ष रूप से सामाजिक कामों के लिए धन  बढ़ाया गया किन्तु राजकोषीय आवंटन वृद्धिमान आमदनी, उसके स्वरूप, उससे जुड़ी तकनीकों, प्रबंधन व्यवस्था, उसमें बढ़ते सेवाओं के अनुपात और उससे जुड़ी निजीकरण प्रक्रिया आदि के चलते दलितों, वंचितों, आदिवासियों तथा प्रदूषित समावेशन के शिकारों आदि की स्थिति बदतर होती गई। सकल,  वास्तविक राष्ट्रीय आय में विश्व में तीसरे नम्बर पर आया भारत मानव विकास के तुलनात्मक प्रतिमानों की कसौटी पर विश्व में 134वें पायदान पर आ टिका। अब तो आर्थिक और सामाजिक सुधार दोनों पर ग्रहण लग गया है, जाहिर है दर्जनों सुन्दर गुलदस्तों नुमा नौकरशाही तथा नेताओं, छुटभैय्यों की जमात द्वारा नियंत्रित संचालित कार्यक्रम अपने घोषित मकसदों से दूर भटकते गये। युद्धों में मध्यकालिक सेनाओं द्वारा की गई लूट की तरह अब सरकारी अमला और राजनैतिक दलाल दोनों हाथों सामाजिक विकास के लिए बांटी गयी राशि को बटोर रहे हैं। मनरेगा, शिक्षा का अधिकार, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, आवास योजनाएँ जिन्हें सच्चे विकास पथ से भटके राजनीतिज्ञों के नाम पर प्रचारित करना बेहद घटिया अलोकतांत्रिक मजाक है। खाद्य अधिकार, आदि अपने घोषित उद्देश्यों के बरक्स पूरी तरह बौने हैं। अतः सामाजिक तथा आर्थिक नीतियों और कार्यक्रमों के बीच की दीवारों को गिराकर समग्र, सर्वांगीण, सर्व समावेशी, सामाजिक विकास नीतियों और कार्यक्रमों का श्री गणेश होना चाहिए। आर्थिक, तकनीकी, प्रादेशिक ग्रामीण, शहरी आदि सभी प्रकार के विकास आपस में एक दूसरे से अलग-अलग नहीं किए जा सकते। इसी तरह शिक्षा, सुपोषण, स्वास्थ्य, स्वच्छता, महिलाओं, बच्चों-वृद्धों की जरूरतों को संभालती सामाजिक सुरक्षा सेवाएँ आदि भी एक पूरे समवेत पैकेज के रूप में एक निश्चित समय सीमा में सबको और केवल नाम दिखाऊ नहीं पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराने की गारंटी ही आर्थिक और सामाजिक विकास की एक बरण हुई गंगा यमुना को सदनीरा रूप में प्रवाहित कर सकती है।
    इन चर्चाओं में आंकड़ों की खेती उगाना जन चेतना और अधिकारों के लिए जूझने की तैयारी के रूप में निरर्थक ही साबित होती है। अभी हालिया चुनाव में किस तरह इन कागजी कार्यक्रमों और आम आदमी की कल्पना से कोसों दूर मोटे-मोटे करोड़ों अरबों की राशियों को बखानते आंकड़े प्रभावहीन साबित हुए यह बताने की जरूरत नहीं है। केन्द्र तथा राज्य सरकारों के विभिन्न सामाजिक सेवाओं पर राजस्व खर्च सन् 1990-91 में कई हजार करोड़ रूपयों के लगभग था। महंगाई, जनसंख्या वृद्धि, नई सेवाओं आदि के चलते यह खर्च सन् 2012-13 में लगभग 105 लाख करोड़ रूपये अनुमानित है। यदि यह करीब सत्रह गुणा वृद्धि कुछ गुणात्मक बदलाव का संकेत देती तो भारत के सामाजिक परिदृश्य का कायाकल्प हो गया होता। अतः असली कसौटियाँ हैं-एक अल्पकाल में इन सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाकर उन्हें गारंटी सहित सर्व सुलभ करनी, दूसरे इन सेवाओं की प्रति उपयोगकर्ता पर्याप्त मात्रा तथा तीसरे इन सेवाओं की लोगों की विभिन्न जरूरतों के अनुरूप उपयुक्तता।
    यदि ऐसा किया जाता है तो आर्थिक प्रगति के साथ साथ सामाजिक विकास की गाड़ी भी चल पड़ेगी। किन्तु इन सब सामाजिक सेवाओं की जरूरत संयुक्त रूप से होती है और इनकी उपलब्धता सबसे पहली प्राथमिकता के रूप में हमारे साढ़े छः लाख गाँवों के लिए होनी चाहिए। इनमें कुछ की अनुपलब्धता बाकी की सेवाओं की प्रभावशीलता घटा देती है और हमारे नागरिकों को दुष्प्रभाव्यता ग्रसित बना देती है। इन दिनों लोगों की उम्मीदों का बयान अच्छे दिनों के इन्तजार के रूप में हो रहा है। अतः आज के ग्रामीण भारत के सामाजिक विकास के एजेण्डे के नीचे बताए गए बारहों बिन्दुओं पर एक साथ पक्का, पुख्ता, तीन सालों में पूरा होने वाला कार्यक्रम लागू किया जाना चाहिए। इस 10 जुलाई को हमारे देश के 70 प्रतिशत ग्रामीण केन्द्र और राज्यों के बजट से द्वादश नियामतों के एक समग्र पैकेज की प्रतीक्षा करेंगे। ये हैं:-
1. सारे गाँव में नालियों और पानी की निकास व्यवस्था युक्त पक्की सड़कें। 2. मुख्य बाहरी सड़क से जोड़ती सड़क। 3. शौचालय 4. पेयजल 5. प्राथमिक स्कूल भवन 6. चिकित्सा और स्वास्थ्य केन्द्र  7. पंचायत के नियंत्रण में पक्का गोदाम 8. पंचायत का कम्प्यूटरयुक्त दफ्तर। 9. चारागाह 10. ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था।
11 बैंक 12. सार्वजनिक सभा स्थल और खेल का मैदान जिससे कि जब हम आजादी की 70वीं जयंती मना रहे हों तब सारा भारत इन नागरिक सुविधाओं सेवाओं युक्त हो जाए तो हमारा स्वराज्य रामराज्य की नींव डाल देगा।
 -कमल नयन काबरा
 मोबाइलः 09013504389       
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
दिसम्बर --2014

बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

देवालय, शौचालय और संघ की राजनीति



एक लंबे अभियान के बाद, संघ परिवार, 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद को ढहाने में सफल हुआ। यद्यपि इस अभियान का नेतृत्व लालकृष्ण आडवाणी कर रहे थे परन्तु इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को अंजाम देने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इनमें से एक थे नरेन्द्र मोदी, जो कि अब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। मंदिर.मस्जिद के पहचान से जुड़े इस मुद्दे को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया गया और आमजनों के दैनिक जीवन से जुड़ी मूल समस्याओं को दरकिनार कर दिया गया। उस समय कई पत्रिकाओं ने यह जानने के लिए सर्वेक्षण किए थे कि आमजन, बाबरी मस्जिद के स्थान पर क्या बना देखना चाहते हैं। कई लोगों का यह मत था कि उस स्थान पर या तो कोई शैक्षणिक संस्थान अथवा अस्पताल बनाया जाना चाहिए।
बहुजन समाज पार्टी के तत्कालीन नेता कांशीराम ने जोर देकर कहा था कि उस स्थान पर एक शौचालय बनना चाहिए। इसी तर्ज परए कुछ साल पहले, केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि देश के लिए मंदिरों से ज्यादा जरूरी शौचालय हैं। नरेन्द्र मोदी ने भी हाल ;अक्टूबर 2013 में कहा कि पहले शौचालय, फिर देवालय जब जयराम रमेश ने शौचालयों को मंदिरों से अधिक महत्वपूर्ण बताया था तब संघ के कार्यकर्ताओं ने पंक्ति बनाकर उनके घर के सामने मूत्र विसर्जन किया था। उनके घर के दरवाजे पर मूत्र से भरी बोतलें भी रखी गईं थीं। भाजपा प्रवक्ताओं ने रमेश पर देशवासियों की आस्था और उनकी धार्मिक भावना को चोट पहुंचाने का आरोप लगाया था। परन्तु अब मोदी द्वारा वही बात कहने पर भाजपा के प्रवक्ताओं का मुंह नहीं खुल रहा है। हांए प्रवीण तोगडि़या ने जरूर मोदी की निंदा की है। कई समीक्षकों ने मोदी के वक्तव्य का समर्थन करते हुए कहा कि यह सॉफ्ट हिंदुत्व है और यही भाजपा को चुनाव में उसकी ताकत बढ़ाने में मदद करेगा। जयराम रमेश ने एक बार फिर यही दोहराया है कि आगामी चुनावों में कांग्रेस को भाजपा नहीं वरन् आरएसएस से मुकाबला करना है।
जो समीक्षक यह कह रहे हैं कि यह हिंदुत्व का सॉफ्टअर्थात नरमपंथी या उदारवादी संस्करण है, उन्हें यह साफ.साफ समझ लेना चाहिए कि चुनाव कैसे और किन आधारों पर लड़े जाएं, यह भाजपा नहीं बल्कि आरएसएस तय करता है। आरएसएस और उसके परिवार के अन्य सदस्य, एकजुट होकर वह सब कुछ करते हैं, जिससे भाजपा को चुनावों में फायदा हो। बाबरी ध्वंस के 20 साल बादए मोदी यह कह रहे हैं कि उनके लिए शौचालय अधिक महत्वपूर्ण हैंए देवालय कम। यह निश्चित तौर पर एक कुटिल रणनीतिक चाल है। आरएसएस कई स्तरों पर काम करता है और उसके अनेक मुखौटे हैं। संघ परिवार के विभिन्न सदस्यों को अलग.अलग कार्य सौंपे गये हैं। विहिपए राममंदिर मुद्दे को जिंदा रखे हुए है तो अन्य सदस्य साम्प्रदायिक दंगे भड़काकर समाज को ध्रुवीकृत करने के काम में हैं। इसी के समानांतर, कुछ संगठन गोएबेल्स के अंदाज में,मोदी की छवि एक ऐसे नेता के रूप में गढ़ने में व्यस्त हैं जो विकास के प्रति प्रतिबद्ध है, कार्यकुशल है,बेहतरीन प्रशासक है और ना जाने क्या.क्या है।
अगले चुनाव में आरएसएस कई रणनीतियां अपनाएगा। एक ओर दंगे भड़का कर और राममंदिर मुद्दे को हवा देकर समाज का ध्रुवीकरण किया जायेगा। दूसरी ओरए मोदी का जबरदस्त महिमामंडन होगा। उनके विकास के गुजरात मॉडल की तारीफों के पुल बांधे जायेंगे। उन्हें सर्वगुण सम्पन्न नेता बताया जाएगा, एक ऐसा नेता जो निर्णय लेने और उन्हें लागू करने में तनिक भी देरी नहीं करता। इसी उद्देश्य से मोदी अब विकास और शौचालयों की बात कर रहे हैं। यह भी एक धूर्ततापूर्ण चाल है। मोदी के राजनैतिक कैरियर का आधार है गुजरात के समाज का ध्रुवीकरण, जिसे उन्होंने गोधरा के बाद हुए हत्याकांड के जरिए बनाया था। इतने सालों तक वे हिंदुत्व के झंडाबरदार बने रहे। उन्होंने अल्पसंख्यकों को समाज के हाशिये पर धकेलने की हर संभव कोशिश की। गुजरात में अल्पसंख्यकों की बदहाली सबके सामने है। समाज के ध्रुवीकरण का काम पूरा करने के बादए अब उन्होंने नया राग अलापना षुरू कर दिया है। वे अब विकास के प्रणेता बन गए हैं। उनके तथाकथित विकास के दावों की हवा, विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त आंकड़ों से समय.समय पर निकलती रही है। इस सिलसिले में सबसे ताजा आंकड़े यह हैं कि गुजरात में हर तीसरा बच्चा कुपोषित है। यह सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है। कई अन्य आंकड़ों ने भी गुजरात के विकास के उनके मिथक का सच दुनिया के सामने ला दिया है।
जयराम रमेश का यह कहना कि कांग्रेस को अगले चुनाव में भाजपा नहीं वरन् आरएसएस से मुकाबला करना है, बिल्कुल सही है। उनके अनुसार कांग्रेस का असली मुकाबला आरएसएस से इसलिए होगा क्योंकि आरएसएस ही भाजपा को नियंत्रित करती है। यह इससे स्पष्ट है कि संघ ने हाल में अपनी पसंद के व्यक्ति को भाजपा के अध्यक्ष और उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में थोपा। परन्तु यह पूरी कहानी का एक हिस्सा मात्र है। अनुभवी और वरिष्ठ राजनेता होने के नाते, रमेष को यह पता होगा कि भाजपा का मूल नेतृत्व संघ के स्वयंसेवकों के हाथ में है। अमरीका के स्टेटैन आइलैण्ड में बोलते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने ठीक ही कहा था कि वे पहले स्वयंसेवक हैं और उसके बाद कुछ और। आरएसएस की कार्यषैली यह है कि वह स्वयंसेवकों को हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा का प्रशिक्षण देता है और उसके बाद, ये प्रशिक्षित स्वयंसेवक, हिन्दू राष्ट्र के संघ के एजेण्डे को पूरा करने के लिए अलग.अलग क्षेत्रों में अपना.अपना काम करते हैं। संघ से जुड़े जितने भी संगठन हैं, उन सब का असली नेतृत्व संघ के प्रशिक्षित स्वयंसेवकों के हाथ में रहता है। और इन स्वयंसेवकों के बीच समन्वय का काम आरएसएस करता है। इस प्रकार, मोदी शौचालय की बात कर सकते हैंए तोगडि़या मंदिर का राग अलाप सकते हैं। नीचे के स्तर का कोई कार्यकर्ता इंटरनेट पर वीडियो अपलोड कर दंगे भड़का सकता है। कोई पाठ्यपुस्तकों के भगवाकरण के काम में जुट सकता है तो कोई दूसरा जाणता राजा नामक शिवाजी पर आधारित नाटक का प्रदर्षन कर सकता है.एक ऐसे नाटक का, जो इतिहास का सांप्रदायिकीकरण करता है। हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा में ओतप्रोत स्वयंसेवक, राज्यतंत्र में भी घुसपैठ कर रहे हैं। हम केवल आशा कर सकते हैं कि देश के सबसे बड़े राजनैतिक दल, जिसे बहुवाद का परचम लहराना चाहिएए वह आरएसएस को अच्छी तरह से जानता और पहचानता है। इस दल को यह भी पता होना चाहिए कि आरएसएस, राजनीति पर नियंत्रण और समन्वय के लिए सिर्फ चुनावी प्रक्रिया का इस्तेमाल नहीं करता। वह अन्य कई रास्तों से अपनी मंजिल तक पहुंचने के उद्यम में लगा रहता है।
वनवासी कल्याण आश्रम या सामाजिक समरसता मंच, दूरदराज के इलाकों में सोशल इंजीनियरिंग के जरिए संघ के एजेण्डे की नींव तैयार करते हैं। बल्किए संघ ने हमारे सामाजिक और राजनैतिक जीवन के हर पक्ष में इतनी जबरदस्त घुसपैठ बना ली है कि एक अर्थ में हम यह भी कह सकते हैं कि चुनावी राजनीति, उसके कार्याकलापों का एक छोटा हिस्सा भर रह गई है। आरएसएस का हिंदू राष्ट्र या हिन्दू पाकिस्तान का एजेण्डा, भारत की विविधवर्णी संस्कृति के विरूद्ध है। यह व्यवस्था ऐसे समाज के लिए उपयुक्त है, जहां एकाधिकारीवादी शासन व्यवस्था हो और समाज पर श्रेष्ठिवर्ग का दबदबा बना रहे। दरअसल, हिंदू हित की बात करने वाला संघ, हिंदुओं के एक तबके के प्रभुत्व के लिए काम कर रहा है।
आरएसएस की गतिविधियों में पिछले तीन दशकों में जबरदस्त तेजी आई है और राज्यों और केन्द्र में सत्ता में आने के बाद से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उसके स्वयंसेवकों की घुसपैठ में आशातीत बढ़ोत्तरी हुई है। जब भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए सन् 1998 से लेकर 2004 तक देष पर शासन कर रहा था तब यही हुआ था और यही भाजपा.शासित प्रदेशों में इस समय हो रहा है। अच्छा होगा कि जयराम रमेश और उनके जैसे अन्य इस कटु और डरावने सच से वाकिफ हों। जो लोग आरएसएस की राजनीति को नजदीक से देख रहे हैं वे इस परिद्रश्य को अच्छी तरह से समझते हैं। राजनीति में सक्रिय वे लोग जो प्रजातंत्र, बहुवाद और भारतीय संविधान के मूल्यों की रक्षा करना चाहते हैंए उन्हें केवल चुनाव के वक्त धार्मिक राष्ट्रवाद से मुकाबला करने की बात नहीं सोचनी चाहिए। यह एक ऐसी लड़ाई है जिसे अनवरत और हर क्षेत्र में लड़ा जाना होगा.फिर चाहे वह राजनीति हो, संस्राम कृति हो, साहित्य हो या कला या कोई भी अन्य क्षेत्र।
-राम पुनियानी

शुक्रवार, 8 जून 2012

तलाये जाने के लिये

भारत अदभुत देश है इसके नेता बेशर्मी की पराकाष्ठा पार कर गए हैं। इन नेताओं और इनके साथ अफसरशाह भारतीय जनता को मूर्ख समझते हैं और तरह-तरह के तर्क जनता को छलने के लिये गढ़ते हैं। इसका बेहतरीन नमूना योजना आयोग उपाध्यक्ष मंटोक सिंह अहलुवालिया हैं। मनमोहन सिंह पुराने नौकरशाह के साथ-साथ प्रधानमंत्री हैं तथा योजना आयोग के अध्यक्ष हैं। योजना आयोग का मानना है कि भारतीय जनता में जो भी व्यक्ति 28 रुपये खर्च करता है वह गरीब नहीं है। योजना आयोग का यह अर्थशास्त्र दोनों पुराने नौकरशाह के दिमागी फितूर का एक हिस्सा हो सकता है किन्तु वास्तविक जीवन में इसका कोई अर्थ नहीं है।
दोनों नौकरशाहों योजना भवन में 60 व्यक्तियों के हगने मूतने के लिये शौचालय को सजाने और सवारने में 35 लाख रुपये खर्च किये हैं। पुराने सामंतवाद की सनक को पीछे धकेलते हुए 35 लाख रुपये खर्च किये गए जबकि इसके विपरीत इंदिरा आवास के लिये 45000 रुपये का बजट दिया जाता है और जब वह गिरने लगता है तो उसकी मरम्मत 15000 रुपये में होती है। इन आकड़ों से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ये नौकरशाह राजनेता जनता के ऊपर तरह-तरह के कर लगा कर उसका उपयोग अपने व्यक्तिगत हितों के लिये करते हैं और उपदेश जनता को देते हैं, बेशर्म भी हैं, बेगैरत भी हैं। अगर इन लोगों के हगने मूतने पर इतना खर्चा आता है तो 28 रुपये के हिसाब से कितने व्यक्तियों की पूरी जिंदगी इसमें निपट जाएगी। वैसे इस देश की स्तिथि यह है कि बहुसंख्यक ग्रामीण जनता तलाये जाने के नाम पर एक पैसा खर्च नहीं करती है। वह सुबह उठकर तालाब की तरफ चली जाती है।
देश में भूख से लोग मरते हैं गर्मी से मरते हैं और जाड़े से मरते हैं। बदन पर कपडे नहीं होते हैं। इलाज के अभाव में मरते हैं। पैसा न होने के कारण शिक्षा नहीं प्राप्त कर पाते हैं वहीँ ये नौकरशाह-राजनेता स्वर्गिक आनंद जीते जी प्राप्त कर रहे हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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