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शनिवार, 28 अप्रैल 2012

घिर गई है भारत माता-1





ये भी तो मादरे हिंद की बेटी है!
करीब पांच साल पहले की बात है। हम परिवार के साथ कार में रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे नोएडा से एक शादी से लौट रहे थे। गाजीपुर चैराहे पर अंधेरा था और कड़ाके की ठंड थी। करीब पंद्रह साल की एक लड़की लाल बत्ती पर गजरा बेच रही थी। लिबास से वह खानाबदोश या फिर आदिवासी समाज से लग रही थी। वह थोड़ी ही दूरी पर खड़ी थी लेकिन धूसर शरीर और कपड़ों में उसकी शक्ल साफ नहीं दिख रही थी। लेकिन यह साफ था कि वह कुपोषण के चलते पतली-दुबली है। हमने इधर-उधर नजर दौड़ाई। उसके साथियों में और कोई नजर नहीं आया। वह चैराहा शहर के बाहर और सुनसान था, जहां लड़की के साथ कुछ भी हो सकता था। हमने यह मान कर मन को तसल्ली दी कि उसके कोई कोई साथी जरूर आस-पास कहीं होंगे; लड़की अकेली नहीं है। इतनी रात गए अकेली कैसे हो सकती है? हमें तब नागार्जुन की उपर्युक्त काव्य-पंक्ति अनायास याद आई थी। मादरे हिंद की एक बेटी यह भी है!
हम काफी दिनों तक उस लड़की की दशा पर कोई लेख या कविता लिखने की बात सोचता रहे। हालांकि लिखा नहीं गया। सोचा, लोग कब से गरीबों, वंचितों, शोषितों को विषय बना कर लिखते रहे हैं। उसे मुक्ति का, क्रांति का साहित्य कह कर उसका संघर्ष और सौंदर्य मूल्य भी सिद्ध कर दिया जाता है। लेकिन भारत के शहरों की गंदी बस्तियों, झुग्गियों, लाल बत्तियों, फुटपाथों पर भीड़ बढ़ती ही जाती है। उन्हें मानव कहना मुश्किल लगता है; नागरिक तो कभी बन ही नहीं सकते। उस दिन खास बात थी तो यही कि वह अकेली लड़की एक-दो रुपये के लिए इतनी रात गए वहां थी।
हमें लगा कि जिस तरह पूंजीवादी कंपनियों के लिए जल, जंगल, जमीन संसाधन हैं, लेखकों के लिए कंपनियों द्वारा उनकी जड़ों से उजाड़ा गया जीवन भी संसाधन है। कंपनियों को जैसे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा चाहिए, रचना के बदले लेखकों को भी नाम और नकद पुरस्कार चाहिए - ज्यादा से ज्यादा और बड़ा से बड़ा। जो सरकार कंपनियों को ठेके देती हैं, वही लिखने वालों को पद और पुरस्कार देती हैं। इधर कंपनियां भी अपने पुरस्कार देने लगी हैं।रचना सत्ता का प्रतिपक्ष होती है’, ‘सत्ता रचना/रचनाकार से भय खाती है’ - इस तरह की टेक को ऊंचा उठाए रखते हुए लेखकों ने वे पुरस्कार लेने भी शुरू कर दिए हैं। आने वाले समय में कंपनियों की ओर से कुछ पद भी आॅफर किए जा सकते हैं। यूरोप और अमेरिका में लंबे समय से यह चल रहा है।
बहरहाल, हमने उस लड़की पर कुछ लिखा नहीं। उसे रात के अंधंरे में वहां देख कर सहानुभूति का एक तीव्र ज्वार उठा था। आज साफ लगता है कि लिखे जाने पर जो भी मुक्ति होती, वह अपनी ही होती। उस लड़की की मुक्ति से उसका कोई साझा नहीं होता। पांच साल बाद देखते हैं कि वह लड़की और ज्यादा अकेली होती और अमानवीय परिस्थितियों में घिरती जा रही है। इतिहास, विचारधारा, मुक्ति, प्रतिबद्धता, सरोकार, सहानुभूति आदि पद निकम्मे घोषित किए जा चुके हैं। उस लड़की के संदर्भ उन्हें एक दिन निकम्मे साबित होना ही था। क्योंके वे पूंजीवाद के पेट से उठाए गए थे। जिस दिन पूंजीवाद को मानव सभ्यता के विकास में क्रांतिाकरी चरण होने का प्रमाणपत्र मिला था, उसी दिन यह तय हो गया था कि वह लड़की महानगर के चैराहे पर रात के अंधेरे में अकेली कोई सामान बेचेगी। और उसकी एक अन्य बहन को उसका मालिक ताले में बंद करके सपरिवार निश्चिंत विदेश घूमने निकल जाएगा। यह तय हो गया था कि यह भारत सहित पूरी दुनिया में अनेक जगहों पर अनेक रूपों में होगा। भारत में पिछले 20-25 सालों में इस प्रक्रिया में खासी तेजी आई है।
पिछले दिनों देश की राजधानी दिल्ली की मध्यवर्गीय आवास काॅलोनी द्वारिका के एक मकान से पुलिस ने एक 13 साल की घरेलू नौकरानी को डाॅक्टर दंपत्ति के घर की कैद से छुड़ाया। डाॅक्टर दंपत्ति मार्च के अंतिम सप्ताह में उसे घर में बंद करके अपनी बेटी के साथ थाईलैंड की सैर पर गए थे। 6 दिन बाद बालकनी से पड़ोसियों ने लड़की की पुकार सुनी। वह पहले भी पुकार करती रही थी लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की। 30 मार्च को एक एनजीओ की मदद से पुलिस को बुलाया गया। पुलिस ने फायर इंजिन बुला कर लड़की को कैद से बाहर निकाला। यह मामला मीडिया में काफी र्चिर्चत रहा। खबरों में आया कि लड़की भूखी, डरी हुई और बेहाल थी। मालिकों ने लड़की को उसके लिए छोड़े गए खाने के अलावा रसोई से कुछ और नहीं खाने के लिए सख्ती से मना किया था। खबरों के मुताबिक लड़की ने मालिकों द्वारा अक्सर प्रताडि़त किए जाने की बात भी कही।
मामला टीवी और अखबारों में आने से, जाहिर है, डाक्टर दंपत्ति के रिश्तेदारों ने उन्हें बैंकाॅक में सूचित कर दिया। वे आए और पुलिस से बचते रहे। उन्होंने कहा कि उनकी नौकरानी बच्ची नहीं, 18 साल की बालिग है और उसके साथ कोई दुव्र्यहार नहीं किया जाता रहा है। वे उसे साथ ले जाना चाहते थे लेकिन लड़की ने जाने से इंकार कर दिया। जो भी हो, मामला पकड़ में गया था, पुलिस ने डाॅक्टर दंपत्ति को न्यायिक हिरासत में लिया। अब वे जमानत पर हैं और अदालत में केस दायर है। लोग अभी से उसके बारे में भूल चुके हैं। हो सकता है कोई गंभीर पत्रकार मामले में आगे रुचि ले और केस की प्रगति और नतीजे के बारे में बताए। और उस लड़की के बारे में भी कि उसका क्या हुआ? उसे क्या न्याय मिला?
जैसा कि अक्सर होता है, इस मामले में भी मीडिया की खबरों में लड़की को मेड (उंपक) अथवा घरेलू नौकरानी लिखा/कहा गया है। लड़की का उत्पीड़न करने वाले डाॅक्टर दंपत्ति का नाम - संजय वर्मा, सुमित्रा वर्मा - हर खबर में पढ़ने/सुनने में आया। काफी खोजने पर हमें लड़की का नाम एक जगह सोना लिखा मिला। हालांकि हमें यह नाम असली नहीं लगता। लड़की की मां जब झारखंड से आई तो उसका नाम भी मीडिया में पढ़ने को नहीं मिला। उसे लड़की की मां लिखा और कहा गया है। भारत का मध्यवर्ग अपने बच्चों के नामकरण के पीछे कितना पागल होता है, इसकी एक झलक अशोक सेकसरिया की कहानीराइजिंग टू अकेजनमें देखी जा सकती है। पिछले, विशेषकर 25 सालों में सुंदर-सुंदर संस्कृतनिष्ठ नाम रखने की देश में जबरदस्त चल्ला चली हुई है। केवल द्विज जातियां ही नहीं, शूद्र और अनुसूचित जाति और जनजाति से मध्यवर्ग में प्रवेश पाने वाले दूसरी-तीसरी पीढ़ी के लोग द्विजों की देखा-देखी यह करते हैं। लाड़लों पर लाड़ तो उंड़ेला जाता ही है; भारत का मध्यवर्ग अपने सांस्कृतिक खोखल को सांस्कृतिक किस्म के नामों से भरने की कोशिश करता है। इस समाज में झारखंड के आदिवासी इलाके से आने वाली निरक्षर मां-बेटियों का नाम नहीं होता।
यह मामला सुख्रियों में आने पर नागरिक समाज ने ऐसा भाव प्रदर्शित किया मानो वे स्वयं ऐसा कुछ नहीं करते जो डाक्टर दंपत्ति ने किया। मानो वह काॅलोनी, दिल्ली या देश में एक विरल मामला था, जो भले पड़ोसियों के चलते समय पर सामने गया। कानून तोड़ने और लड़की के साथ अमानवीय व्यवहार करने वाले शख्स को गिरफ्तार कर लिया गया। अब पुलिस और कानून अपना काम करेगा। ऐसा सोचने में उसका पीडि़ता से कोई सरोकार नहीं, खुद से है। ऐसा सोच कर वह अपने को कानून का पाबंद नागरिक और परम मानवीय इंसान मानने की तसल्ली पा लेता है। इस तसल्ली में अगर कुछ कमी रह जाती है तो वह बाबाओं के दर्शन और प्रवचन से पूरी करता है। इस झूठी तसल्ली में वह इतना सच्चा हो जाता है कि गंदी राजनीति और राजनेताओं पर अक्सर तीखे हमला बोलता है। उनके द्वारा कर दी गई देश की दुर्दशा पर आक्रोश व्यक्त करता है। राजनीति को बुरा बताते वक्त भी राजनैतिक सुधार उसकी इच्छा नहीं होती, वैसा करके वह अपने अच्छा होने का भ्रम पालता है। यह सच्ची बात है कि भारत की मौजूदा राजनीति बुरी बन चुकी है। लेकिन बुरी राजनीति की मलाई काटने की सच्चाई मध्यवर्ग छिपा लेता है।
हम सब जानते हैं भारत में कारखानों, ढाबों, दुकानों से लेकर घरों तक में बाल मजदूरों की भरमार है। शहर की लाल बत्तियों पर छोटे-छोटे लड़के-लड़कियां तमाशा दिखाते, कोई सामान बेचते या भीख मांगते मिलते हैं। जो 14 साल से ऊपर हो जाते हैं उन्हें भी हाड़तोड़ श्रम के बदले सही से दो वक्त पेट भरने लायक मेहनताना नहीं मिलता। सुबह 6 बजे से रात 8 बजे तक माइयां काॅलोनियों में इस घर से उस घर चैका-बर्तन, झाड़ु-बुहारू, कपड़े धोने, बच्चे सम्हालने और खाना बनाने के काम में चकरी की तरह घूमती हैं। वे दस-बीस रुपया बढ़ाने को कह दें तो सारे मोहल्ले में हल्ला हो जाता है। उनके मेहनताने - ज्यादा से ज्यादा काम, कम से कम भुगतान - को लेकर पूरे मध्यवर्गीय भारत में गजब का एका है।
दूसरी तरफ, मध्यवर्ग के लोग जिस महकमे, कंपनी या व्यापार में काम करते हैं, अपने सहित पूरे परिवार की हर तरह की सुविधा-सुरक्षा मांगते और प्राप्त करते हैं। इसमें संततियों के लिए ज्यादा से ज्यादा संपत्ति जोड़ना भी शामिल है। फिर भी उनका पूरा नहीं पड़ता। वे कमाई के और जरिए निकालते हैं। रिश्वत लेते हैं। टैक्स बचाते हैं। अपने निजी फायदे के लिए कानून तोड़ते हैं। अभिनेता, खिलाड़ी, विश्व सुंदरियां, कलाकार, जावेद अख्तर जैसे लेखक अपने फन से होने वाली अंधी कमाई से संतुष्ट नहीं रहते। वे विज्ञापन की दुनिया में भी डट कर कमाई करते हैं। सरकारें ऐसी प्रतिभाओं से लोक कल्याण के संदेश भी प्रसारित करवाती हैं। वे अपनी अंधी कमाई को लेकर जरा भी शंकित हुए देश की आन-बान-शान का उपदेश झाड़ते हैं। इस तरह अपनी बड़ी-छोटी सोने की लंका खड़ी करके उसे और मजबूत बनाने में जीवन के अंत काल तक जुटे रहते हैं। इनकी हविस का कोई अंत नहीं है। रोजाना करोड़ों बचपन तिल-तिल दफन होते हैं, तब उनकी यह दुनिया बनती और चलती है।
भोग की लालसा में फंसे मध्यवर्ग का एक और रोचक पहलू है जो फिल्मों और साहित्य में भी देखा जा सकता है। यह सब करते वक्त उन्हें अपनी मजबूरी सोना की मां की मजबूरी से भी बड़ी लगती है, जिसे अपनी नाबालिग लड़की अंधेरे में धकेलनी पड़ती है।पापी पेट की मजबूरीमें वे झूठ बोलने, धोखा देने, फ्लर्ट करने, प्रपंच रचने की खुली छूट लेते हैं। कई बार यह पैंतरा भी लिया जाता है कि हम भी तो कुछ पाने के लिए अपनी आत्मा को अंधेरे में धकेलते हैं! रोशनी दिखाने वाले बाबा लोग हो तो जीना कितना मुश्किल हो जाए!
लोग यह भी जानते हैं कि देश में चाइल्ड लेबर (प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन) एक्ट 2006 है। लेकिन उसकी शायद ही कोई परवाह करता है। कुछ एनजीओ और स्वयंसेवी संस्थाएं ही इस मुद्दे पर सक्रिय रहते हैं। बाकी कहीं से कोई आवाज नहीं उठती कि बचपन को कैद और प्रताडि़त करने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई हो; अगर मौजूदा कानून में कमी है तो उसे और प्रभावी बनाया जाए। कड़क लोकपाल की स्वतंत्र संस्था और कानून बनाने के लिए आसमान सिर पर उठाने वाले लोग ये ही हैं। उनके लिए ही बाल मजदूरी और सस्ती मजदूरी की यहप्रथाचल रही है। वह चले तो इनका जीवन भी चलना असंभव हो जाएगा।
आइए सोना की बात करें। सोना अपनी मां की बेटी है। लेकिन क्या वह भारत माता की भी बेटी है? नागार्जुन ने अपनी कविता में जब आराम फरमा मादा सुअर का चित्रण किया तो वे उसकी मस्ती और स्वतंत्र हस्ती पर फिदा हुए लगते हैं - देखो मादरे हिंद की गोद में उसकी कैसी-कैसी बेटियां खेलती हैं! कविता का शीर्षकपैने दांतों वाली ...’ कविता की अंतिम पंक्ति है। शायद कवि कहना चाहता है कि ‘‘जमना किनारे/मखमली दूबों पर/पूस की गुनगुनी धूप में/पसर कर लेटी .../यह ... मादरे हिंद की बेटी ...’’ अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने में समर्थ है।
सोना का वह भाग्य नहीं है। उससे भारत माता की गोद छीन ली गई है। भारत माता सोना की मां जैसी ही मजबूर कर दी गई है, जिसे अपनी बेटी अनजाने देश भेजनी पड़ती है, जहां वह सीधे वेश्यावृत्ति के धंधे में भी धकेली जा सकती है। वह चाह कर भी अपनी बेटी को अपने पास नहीं रख सकती। पूंजीवादी आधुनिक सभ्यता आदिवासियों को उनके घर-परिवेश-परिजनों से उखाड़ कर जमती है। ऐसा नहीं है कि नागरिक समाज में ईमानदार और दयालु लोग नहीं हैं या नवउदारवाद के चलते आगे नहीं रहेंगे। लेकिन उससे अनेकार्थी विषमताजनित शोषण नहीं रुकेगा। आदिवासी लड़कियों, महिलाओं, लड़कों, पुरुषों को अपने घर-परिवेश से निकल कर हमारे घरों और निर्माण स्थालों पर आना ही होगा।
आपको याद होगा अन्ना आंदोलन के दौरान दिल्ली में पोस्टर लगे थे कि देश की बेटी किरण बेदी जैसी होनी चाहिए - ‘देश की बेटी कैसी हो, किरण बेदी जैसी हो।किरण बेदी काफी चर्चा में रहती हैं। कहती हैं, जो भी करती हैं, देश की सेवा में करती हैं। सवाल है - मादरे हिंद की बेटी कौन है? किरण बेदी या सोना? आप कह सकते हैं दोनों हैं। लेकिन हम सोना को मादरे हिंद की बेटी मानते हैं। इसलिए नहीं कि हमारी ज्यादा सही समझ और पक्षधरता है। सोनाएं किरण बेदियों के मुकाबले भारी सख्या में हैं और किसी का बिना शोषण किए, बिना बेईमानी किए, बिना देश सेवा का ढिंढोरा पीटे, दिन-रात श्रम करके, किफायत करके अपना जीवन चलाती हैं। यौन शोषण समेत अनेक तरह की प्रताड़नाएं सहती हैं। अपनी ऐसी गरीब बेटियों के लिए हर मां मरती-पचती और आंसू बहाती है। सोनाओं की मांओं के समुच्चय का नाम ही भारत माता है। इस भारत माता को कपूतों ने एकजुट होकर अपनी कैद में कर लिया है।
-प्रेम सिंह
क्रमश:

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

साम्प्रदायिक दंगे 2011 -3


अगस्त महीने की 8 तारीख को मुरादाबाद शहर एक बार फिर साम्प्रदायिक हिंसा की चपेट में आ गया। काँवड़ियों (गंगाजल ले जा रहे शिवभक्त) के एक जुलूस को एक मुस्लिम मोहल्ले से होकर निकलने की इजाजत नहीं दी गई। काँवड़िये एक मस्जिद के सामने से अपना जुलूस ले जाना चाहते थे। काँवड़ियों ने पहले पुलिस से हुज्जत की और उसके बाद उनमें से कुछ ने मस्जिद पर गोलियाँ दागीं। चूँकि रोज़ा अफ्तार का समय नजदीक आ रहा था इसलिए पुलिस कोई जोखिम उठाना नहीं चाहती थी।
जब मुस्लिम तराबी के लिए अपने घरों से निकले तब काँवड़ियों ने उन्हें मस्जिद जाने से रोका। इसके बाद हिंसा भड़क उठी। काँवड़ियों ने कई मोटर साइकिलों और अन्य वाहनों में आग लगा दीं और पुलिस की गाड़ियों पर भी गोलियाँ दागीं। उन्होंने एक मस्जिद पर भी पत्थरबाजी की। आसपास खड़े कुछ ट्रकों को भी आग के हवाले कर दिया गया। एक पुल पर से गुजर रहे लोगों पर पुल के नीचे से गोलियाँ चलाई गईं। ऐसा लगता है कि यह हिंसा पूर्व नियोजित थी।
अगस्त महीने की 22 तारीख को मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में एक धार्मिक जुलूस को लेकर शुरू हुए विवाद ने दो समुदायों के बीच हिंसक संघर्ष का रूप ले लिया। जमकर पत्थरबाजी हुई जिसके बाद पुलिस ने 6 थाना क्षेत्रों में कफ्र्यू लगाकर स्थिति को नियंत्रित किया। जबलपुर शहर का साम्प्रदायिक हिंसा का लंबा इतिहास है। यही वह शहर था जहाँ सन 1961 में स्वतंत्र भारत का पहला साम्प्रदायिक दंगा हुआ था।
इसके तीन दिन बाद, उत्तर प्रदेश के बहराइच शहर में साम्प्रदायिक हिंसा हुई। बहराइच भी साम्प्रदायिक दृष्टि से संवेदनशील शहर है। एक मस्जिद के सामने दो समुदायों के सदस्यों के बीच किसी मुद्दे पर बहसबाजी हुई। उसके बाद दोनों गुटों ने एकदूसरे पर पत्थर फेंकने शुरू कर दिए। बीच में किसी ने गोलियाँ भी चलाईं जिससे एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया। इलाज के लिए लखनऊ ले जाते वक्त रास्ते में उसकी मृत्यु हो गई। हिंसा में कई लोग घायल भी हुए।
इसी दिन महाराष्ट्र के ठाणे जिले के टिटवाला में हिंसा भड़क उठी। उस दिन जन्माष्टमी थी। कुछ हिन्दू असामाजिक तत्वों ने मुस्लिम युवकों की पिटाई कर दी और मुसलमानों की गाड़ियों और सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाया। वहाँ हुई हिंसा के फोटो सहित मुसलमानों का एक प्रतिनिधि मंडल महाराष्ट्र के गृहमंत्री श्री आर0 आर0 पाटिल से मिला। गृहमंत्री को बताया गया कि हमलावर अब भी खुलओम मुस्लिम बस्तियों में घूम रहे हैं और मुसलमान डर के साए में जीने को मजबूर हैं। प्रतिनिधिमंडल ने पुलिस कार्यवाही पर भी प्रश्न चिन्ह लगाए।
2 सितम्बर को ईद थी। इस दिन महाराष्ट्र के अहमद नगर जिले के नेवासा में साम्प्रदायिक दंगा हुआ। ऐसा आरोप है कि पुलिस का व्यवहार अत्यंत पक्षपातपूर्ण रहा। जो मुसलमान थाने में एफ0आई0आर0 लिखवाने गए उन्हें ही आई0पी0सी0 की धारा 307 का आरोपी बनाकर गिरफ्तार कर लिया गया। मुसलमानों के साथ ऐसा अक्सर होता है और इसलिए वे एफ0आई0आर0 दर्ज कराने से भी घबराते हैं। कई मुसलमानों ने नेवासा से भागकर अहमद नगर में शरण ली। इस दंगे में मुसलमानों पर चाकुओं और तलवारों से हमला किया गया और ज़की नामक एक व्यक्ति का कार्यालय पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया। इसके बाद भी पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की और उल्टै मुसलमानों को हत्या के प्रयास का आरोपी बना दिया। इसके अगले दिन 3 सितम्बर को मध्यप्रदेश के उज्जैन में साम्प्रदायिक दंगा हुआ। उज्जैन में खासी मुस्लिम आबादी है। इस हिंसा में दो लोग मारे गए और 16 घायल हुए। ऐसा कहा जा रहा है कि विवाद की शुरुआत शहर के पुराने इलाके दौलतगंज में स्थित एक दुकान में गणेश की मूर्ति की स्थापना को लेकर हुई। यह दुकान एक मस्जिद के बगल में है। यह स्पष्ट नहीं है कि दंगे का कारण केवल वह मूर्ति थी या कुछ और। वैसे गणेश की मूर्ति की स्थापना को लेकर ही मस्जिद के बगल में विवाद का कारण नहीं बननी चाहिए। सितम्बर माह की 7 तारीख को आंध्रप्रदेश के कुरनूल जिले की अधूनी तहसील में हुई हिंसा में सैकड़ों लोग घायल हुए। इनमें से तीन को गंभीर चोटें आईं। कारण वही पुराना था मस्जिद के सामने संगीत बजाया जाना। पुलिस को भीड़ को तितरबितर करने के लिए कई बार लाठी चार्ज करना पड़ा। दोनों ओर से पत्थरबाजी हुई और यह सिलसिला चार घंटे तक चलता रहा। इसके बाद पुलिस ने हवा में गोलियाँ भी चलाईं। गणेश की प्रतिमाओं को विसर्जन के लिए ले जाया जा रहा था। यह जुलूस एक मस्जिद के सामने रुक गया और वहाँ काफी समय तक बाजे बजाए गए। इसके बाद हिंसा शुरू हुई। दोनों पक्ष ट्रकों और आटो रिक्शों में पत्थर भरकर लाए थे।
महाराष्ट्र के आदिवासी इलाके नंदूरबार में 8 सितम्बर को गणेश विसर्जन के दौरान हिंसा हुई जिसमें दो लोगों ने अपनी जानें गवाईं और कई घायल हो गए। बताया जाता है कि विवाद एक गैरकानूनी गणेश मंडप को लेकर शुरू हुआ। मुसलमानों का आरोप है कि स्थानीय थाने के इंस्पेक्टर रमेश पाटिल का रवैया अत्यंत पक्षपातपूर्ण था और उन्होंने मुसलमानों को डराया धमकाया। यहाँ भी अपनी सम्पित्त को नुकसान पहुँचाए जाने की एफ0आई0आर0 लिखवाने थाने पहुँचे मुसलमानों को धारा 353 में गिरफ्तार कर लिया गया। इस धारा में 326 मुसलमानों को और केवल 12 गैर मुसलमानों को गिरफ्तार किया गया। इसी तरह, 6 मुसलमानों को धारा 302 और 12 को धारा 307 में गिरफ्तार किया गया। इन धाराओं में एक भी गैरमुस्लिम की गिरफ्तारी नहीं हुई। नंदूरबार के मुसलमान इतने आतंकित हैं कि उनमें से जो वहाँ बरसों से रह रहे थे वे भी अपने घर वापस जाने के लिए तैयार नहीं हैं।

-डा. असगर अली इंजीनियर
क्रमश:

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

साम्प्रदायिक दंगे 2011 -2


मेरठ में 25 अप्रैल को एक गिलास ठंडा पानी सांप्रदायिक हिंसा का सबब बन गया। मेरठ के नजदीक काज़ीपुर गाँव के दो रहवासी गाँव की छोटी मस्जिद में पहुँचे और पीने के लिए पानी माँगा। उनसे कहा गया कि वे मस्जिद प्रांगण में लगे नल से पानी पी सकते हैं। परंतु उन्होंने ठंडे पानी की माँग की। जब उनसे यह कहा गया कि ठंडा पानी मस्जिद में उपलब्ध नहीं है तो वे मस्जिद के इमाम और वहाँ मौजूद अन्य लोगों पर टूट पड़े। उन्होंने मस्जिद में पढ़ रहे कुछ बच्चों की भी पिटाई कर दी। इमाम और उनके साथियों की रपट लिखने से पुलिस ने साफ इंकार कर दिया। इसके बाद मुसलमानों की एक भीड़ ने थाने को घेर लिया। पथराव हुआ जिसमें सिटी मजिस्ट्रेट और कुछ पुलिस अधिकारी घायल हुए।
इसके बाद भीड़ ने दुकानों और मकानों को निशाना बनाना शुरू किया। कई पुलिस चौकियों को आग के हवाले कर दिया गया। पुलिस ने बतौर सावधानी शहर के सभी सरकारी और निजी स्कूलों को बंद करवा दिया। यह सब हुआ केवल एक गिलास ठंडे पानी की खातिर।
मेरठ का सांप्रदायिक हिंसा का लंबा इतिहास है। सन 1987 में वहाँ हुई जबरदस्त हिंसा के बाद पी0ए0सी0 जवानों ने 54 मुस्लिम युवकों को उनके घरों से निकाल कर गोली मार दी थी। उनके शवों को हिण्डन नहर में फेंक दिया गया था।
अगली घटना भी उत्तरप्रदेश के ही मुरादाबाद में हुई। कुछ पुलिसवाले मुल्ज़िम की तलाश में एक मुस्लिम घर में घुसे। मुल्ज़िम को वहाँ न पाकर वे घरवालों से दुव्र्यवहार करने लगे। उन्होंने नूरजहाँ नामक 10 साल की बच्ची के हाथ से कुरान छीनकर उसके बिस्तर पर पटक दिया। जब उन्होंने बिस्तर पलटा तब कुरान नीचे गिर गई। इससे मुसलमान नाराज हो गए। इसे कुरान का अपमान बताते हुए मुसलमानों की भारी भीड़ इकट्ठा हो गई और पुलिसवालों के विरुद्ध कार्यवाही की माँग करने लगी। पुलिस बारबार भीड़ को तितरबितर होने के लिए कहती रही और भीड़, पुलिसवालों के खिलाफ कार्यवाही की माँग दोहराती रही। भीड़ ने पुलिस थाने पर भी हमला किया और पुलिसवालों की गाड़ियों को आग लगा दी। पुलिसकर्मियों पर पत्थर भी फेंके गए। जवाब में गुस्साए पुलिसकर्मियों ने भीड़ की जम कर पिटाई की। पुलिस ने गोलियाँ भी चलाईं जिसमें दो मुसलमान और पेट्रोल पंप पर काम करने वाला एक हिन्दू गंभीर रूप से घायल हो गए। शहर में कफ्र्यू लगाया गया। निकटवर्ती गाँवों के रहवासियों ने पुलिस की बर्बर कार्यवाही और गिरफ्तारी के डर से आसपास के जंगलों में शरण ली।
उस्मानिया विश्वविद्यालय की ए0बी0व्ही0पी0 शाखा की बदौलत तेलंगाना जैसे क्षेत्रीय आंदोलन का भी साम्प्रदायिकीकरण हो गया है। इसी सांप्रदायिकीकरण का नतीजा था कि आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद जिले में 8 जुलाई को छः मुसलमानों को जिंदा जला दिया गया। यह लोमहर्षक घटना आंध्रप्रदेश व महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित एक गाँव में हुई। शरारती तत्वों ने जिले के वाटोली गाँव में अल्पसंख्यकों के एक घर में आग लगा दी। निकटवर्ती भैनसा नगर का साप्रंदायिक हिंसा का लंबा इतिहास है इसलिए सरकार काफी सावधान थी। वाटोली गाँव में मारे गए लोगों में महबूब खान, नोमान, अरसालन, रिजवान व साफिया बेगम के अलावा दो वर्षीय टूबा महोश भी शामिल थे।
दिनांक 12 जुलाई को आगरा के मनटोला इलाके में साम्प्रदायिक हिंसा भड़क उठी। एक बीमार बकरी को अस्पताल ले जा रहे ट्रक से दूसरे समुदाय के कुछ लोगों को मामूली चोटें आईं। इसके बाद शुरू हुए विवाद ने जल्द ही दोनों समुदायों के सदस्यों के बीच हिंसक झड़पों का रूप ले लिया। पत्थरबाजी शुरू हो गई। दुकानों, मकानों और गाड़ियों में आग लगा दी गई। कुछ लोगों ने गोलियाँ भी चलाईं। जवाब में पुलिस ने भी गोलीबारी की। ड्यूटी पर तैनात डी0आई0जी0 को गोली लगतेलगते बची। लोग अपने घरों की छतों से गोलियाँ चला रहे थे। भारी संख्या में हथियारबंद पुलिस व पी0ए0सी0 के जवानों की तैनाती के बाद बड़ी मुश्किल से दंगे पर नियंत्रण पाया जा सका।
-डा. असगर अली इंजीनियर
क्रमश:

शनिवार, 19 नवंबर 2011

इतिहास से कटता- जुड़ता वर्तमान समाज

हम अपने को सदियों पुराने धार्मिक ,जातीय व इलाकाई महापुरुषों से जोडकर तो देख ले रहे है , पर वर्तमान दौर में पुराने ऐतिहासिक सामाजिक संबंधो की टूटन को नही देख पा रहे हैं और ना ही आधुनिक युग के नये खड़े होते रहे सामाजिक संबंधो से अपने जुड़ाव को देख पा रहे है | हम वर्तमान युग के सामाजिक संबंधो को बहुत कम महत्व दे पा रहे हैं
किसी राष्ट्र का इतिहास उसे अपने देश व समाज की परिस्तिथियों से , उसके धरोहरों से उसके सामाजिक विशेषताओं गुणों , अवगुणों से परिचित कराता हैं | साथ ही वह उसे इतिहास का सबक भी सिखाता है | वर्तमान एवं भविष्य को बेहतर बनाने के प्रेरणाए देता हैं | मुख्यत: इसीलिए राष्ट्र व समाज के इतिहास को जानना जरूरी हैं | पर उससे भी ज्यादा जरूरी है की वर्तमान युग के राष्ट्र व समाज को , उसकी स्थितियों , परिस्थितियों एवं गतिविधियों को जाना जाय | क्योंकि हमे इतिहास का सबक वर्तमान युग में लागू करना है | उसी सीख - शिक्षा से वर्तमान और भविष्य को बेहतर बनाना है |अगर वर्तमान को जानने का गम्भीर प्रयास नही करते तो इतिहास हमारे लिए केवल शिक्षा का पढने - पढाने का प्रशंसा या निंदा आदि का ही विषय बनकर रह जाएगा | बदकिस्मती से आज कल हमारे समाज में यही कुछ हो रहा है | आज यह कहने वाले लोग मिल जायेगे की विगत इतिहास में हमारा देश सुख - वैभव ,धन - धान्य से भरा - पूरा रहा है , तो दूसरी तरफ यह कहने वाले भी मिल जायेगे की वर्तमान युग से पहले तो ज्यादातर लोगो को दोनों समय का भोजन भी नही नसीब हो पाता था | यह कहते हुए लोग मिल जायेगे कि हमारा इतिहास विदेशी शक्तियों को अपने अन्दर समाहित कर लेने का तथा शान्ति , सहृदयता व सहनशीलता का इतिहास रहा है , तो यह कहते हुए लोग मिल जायेगे कि हमारा इतिहास विदेशी शक्तियों के पराजय का कायरता का , सामाजिक जड़ता , कट्टरता और असहनशीलता का इतिहास रहा है |
इतिहास के इन्ही पाठो , प्रचारों और चर्चाओं के साथ अब एक नया दौर भी शुरू हुआ है |इतिहास को समाज व राष्ट्र के इतिहास के रूप में देखने तथा उसके राष्ट्रीय व सामाजिक गुणों , अवगुणों को समग्रता में जानने की जगह अब उसे धार्मिक , जातीय व इलाकाई समुदायों के रूप में देखने - बताने का दौर चल पड़ा है | ऐसा नही है कि इन आधारों पर इतिहास को देखने का काम पहले नही था | पहले भी था , पर उसका दायरा सीमित था | फिर ब्रिटिश राज के दौरान खड़े होते रहे राष्ट्रवादियो व क्रान्तिकारियो ने राष्ट्र व समाज कि ऐतिहासिक कमियों को बताते हुए उसे ठीक करने का कुछ न कुछ प्रयास भी किया |
वर्तमान दौर में इतिहास को समूचे राष्ट्र व समाज के इतिहास में प्रस्तुत करने की जगह मुख्यत:विभिन्न धार्मिक , जातीय , इलाकाई के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है |इतिहास के वास्तविक या कल्पित व्यक्तियों , घटनाओं को महिमामंडित कर विभिन्न सामाजिक समुदायों को अपने - अपने इतिहास पर गर्व करने का पाठ -प्रचार चलाया जा रहा है | वर्तमान दौर के सामाजिक समुदायों की विशिष्टता को इतिहास से जोडकर देखा व बताया जा रहा है | विडम्बना यह है कि वर्तमान दौर में इतिहास से जोडकर देखने पहचानने की सामाजिक प्रक्रिया बढने - बढाने के साथ वर्तमान युग की स्थितियों में अपने को देखने पहचानने की प्रक्रिया धूमिल पडती जा रही है |हम अपने को सदियों पुराने धार्मिक , जातीय व इलाकाई महापुरुषों से जोडकर तो देख ले रहे है , पर वर्तमान दौर में पुराने ऐतिहासिक सामाजिक संबंधो की टूटन को नही देख पा रहे है और न ही आधुनिक युग के नये खड़े होते रहे सामाजिक संबंधो से अपने जुड़ाव को देख पा रहे है | दूसरे शब्दों में कहे तो हम वर्तमान युग के सामाजिक सम्बन्धो को बहुत कम महत्व दे पा रहे है | सभी जानते है कि इस देश में आधुनिक युग की शुरुआत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के समय से हुई थी |कम्पनी राज और फिर 1858 के बाद के ब्रिटिश राज ने न केवल आधुनिक युग कि दासता को थोपे रखा अपितु इस देश को उसके पुराने इतिहास से , सामाजिक सम्बन्धो से भी काटकर अलग कर देने का काम शुरू कर दिया | उन्होंने राजशाही के दौर के राजकाज , शासन - प्रशासन को खत्म कर दिया | पुरानी कृषि व दस्तकारी पर आधारित अर्थव्यवस्था को भी छिन्न - भिन्न कर दिया समाज के पुराने सामाजिक सम्बन्धो को तोड़ते हुए आधुनिक युग के खरीद फरोख्त के बाजारवादी सम्बन्धो में बदलाव कि प्रक्रिया को आगे बढाने का काम किया | क्या ब्रिटिश दासता से पहले के इतिहास में राज व समाज के बदलाव का काम नही होता रहा है ? जरुर होता रहा है | पर अत्यंत धीमी गति से और थोड़े बहुत परिवर्तनों या कहिये सतही परिवर्तनों के साथ | उदाहरणार्थ ------इस देश कि प्राचीन कृषि , ग्रामीण एवं हस्तशिल्प कि व्यवस्था सदियों तक ज्यो क़ी त्यों या थोड़े बहुत विकास के साथ चलती रही | हिन्दू राजाओं ,बौद्ध राजाओं मुस्लिम बादशाहों का दौर आता जाता रहा , पर समाज व्यवस्था जस क़ी तस बनी रही | सत्ता के बदलाव के साथ समाज के सम्बन्धो में वस्तुत:कोई बदलाव नही हो पाया था | हिन्दू बोद्ध और मुस्लिम धर्म के बढ़ते प्रभावों के चलते समाज में धार्मिक बदलाव तो होता रहा पर समाज क़ी सदियों पुरानी अर्थव्यवस्था और उसमे कामो पेशो के विभाजन के साथ सदियों पुरानी उंचाई - निचाई , छोटे - बड़ाई तथा धार्मिक जातीय व इलाकाई अलगाव दुराव चलता रहा |इसकी जड़ता इस हद तक बनी रही क़ी मुस्लिम शासको के दौर्र में इस्लाम के फैलाव के वावजूद विभिन्न जातियों के रूप में मौजूदसामाजिक सम्बन्ध नही टूट पाए | इस्लाम के अनुयायियों तक में भी कुछ सुधारों के बावजूद सदियों पुरानी जातीय उचाई - निचाई बदस्तूर चलती रही | राज से लेकर समाज तक में यह स्थिति सदियों तक बनी रही | मध्य युग के इतिहास में राजाओं , बादशाहों के नाम चेहरे बदलने के साथ कोई महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव नही हो पाया | इसलिए लोगो का यह कहना मध्ययुग तक के लिए एकदम ठीक है कि कई बाहरी आक्रमणकारी आये गये पर हमारी सभ्यता संस्कृति ज्यो की त्यों बनी रही | यह न केवल इस भूभाग के सामाजिक जड़ता को बताती है बल्कि किसी महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव के प्रति बाहर से यहा आने वाले आक्रमणकारी की अक्षमता को भी दर्शाती है | फिर जब इतिहास की इसी सामाजिक जड़ता को समाज की खूबी बनाकर गाया सुनाया जाए तो वह वर्तमान युग में हमारी कूपमंडूकता को भी प्रदर्शित कर देती है | क्योंकि ढाई सौ साल पहले विदेशी यूरोपीय विशेषकर व्यापारियों के आगमन के बाद तथा उनकी आर्थिक , राजनीतिक, सैन्य शैक्षणिक व सांस्कृतिक प्रणालियों के लागू होने के बाद देश व समाज का चेहरा बदलने लग गया था और आज तक बदलता ही जा रहा है | हां यह बात एकदम ठीक है जिस तरह से उन्होंने आधुनिक औधोगिक व्यापारिक प्रणाली की स्थापना के साथ अपने देश के पुराने सामाजिक संबंधो का बदलाव किया था , वैसा उन्होंने इस देश को अपनी औपनिवेशिक लूट के लिए गुलाम बनाये रखना था | लेकिन इसके वावजूद अब सदियों पुरानी समाज व्यवस्था व उसके अंतर्गत चलते रहे सामाजिक संबंधो को टूटना बदलना अनिवार्य हो उठा था | बदलाव की वही प्रक्रिया निरंतर आगे बढती रही है | वह चाहे जितनी धीमी हो , विकृत हो , कष्टदायक हो , पर वह प्रक्रिया रुकने वाली नही हैं | इतिहास का पुराना दौर वापस लौटने वाला नही है |पुराने सम्बन्ध चलने वाले नही है और उनका टूटना व समाप्त होना अनिवार्य एवं अपरिहार्य हैं | इसीलिए अपने आप को इतिहास के सामुदायिक पहचानो , संबंधो के आधुनिक प्रतिनिधि के रूप में देखना कही से ठीक नही है | क्योंकि हम आधुनिक युग के प्रतिनिधि है |पुराने इतिहास से हम जुड़े जरुर है पर हम उसके प्रतिनिधि नही है | वर्तमान दौर की आवश्यकता यह है कि पुराने युगों के इतिहास कि टूटन से उसकी बढती दिशा दशा से प्रेरणा लेकर हम आधुनिक युग के सामाजिक पहचानो संबंधो को महत्व दें | किसी राजा , महाराजा या पुराने युग के योद्धा व विद्वान् से अपना रिश्ता जोडकर और उसे आगे कर हम समाज को आगे नही बढ़ा सकते | पर आधुनिक युग के संबंधो पहचानो को महत्व देकर और उसके लिए पुराने युगों से प्रेरणा लेकर हम उसे जरुर आगे बढ़ा सकते है |ब्रिटिश काल में देश के राष्ट्रवादियो ने अपने जाति धर्म की पहचान को नही बल्कि आधुनिक युग के राष्ट्रवादी पहचान को आगे करके स्वतंत्रता संघर्ष के लिए राष्ट्र को एकजुट करने का प्रयास किया था और उसमे काफी हद तक सफल भी हुए थे | आज हम वही प्रयास देश के शोषित - शासित जनसाधारण समाज के लिए कर सकते हैं | इतिहास से वर्तमान में चली आई सामाजिक दूरियों अलगावो को बनाये रखने या उस पर पर्दा डालने की जगह उसे स्पष्टतया स्वीकार करते हुए तथा जनसाधारण की वर्तमान दौर घराती समस्याओं के लिए देश के जनसाधारण को एकजुट करते हुए ही कर सकते है।
सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672
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