हत्या लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हत्या लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 3 मई 2018

योगी सरकार कानून व्यवस्था बनाये रखने में नाकाम


मोहम्मद समी का शव
योगी सरकार प्रदेश में कानून व्यवस्था को बनाये रखने में असफल हो गयी है इसलिए थानों में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नही की जाती है. अपहरण, हत्या, बलात्कार जैसे मामलों की सूचना दर्ज न कर उनको छिपाने का काम किया जा रहा है. 
पूर्व विधायक सरवर अली
          बाराबंकी जनपद के थाना फतेहपुर के प्रमुख कपडा व्यवसायी मोहम्मद समी 20 मार्च को अपनी दुकान बंद कर 7 बजे शाम को अपने घर जा रहे थे कि रास्ते में घात लगाये कुछ लोगों ने उनका अपहरण कर लिया और उनका मोबाइल बंद हो गया तब उनके बड़े भाई मोहम्मद रफ़ी ने थाना फतेहपुर पहुँच कर पुलिस को सूचना दी किन्तु पुलिस के कानों पर जूं तक नही रेंगी और कोई सुनवाई नही हुई तब क्षेत्र के लगभग 50 मोटरसाइकिल सवारों ने आसपास के क्षेत्र में मोहम्मद समी को ढूंढना शुरू कर दिया. 21 मार्च को सूचना मिलती है कि मोहम्मद समी का शव गाँव जाने के रास्ते से विपरीत दिशा में 7 किलोमीटर दूर लोनियनपुरवा के पास पड़ा है. हजारों लोगों के इकठ्ठा हो जाने पर आक्रोश को देखते हुए थाना फतेहपुर बाराबंकी के प्रभारी निरीक्षक अपने लाव-लश्कर के साथ पहुंचे और बगैर पंचनामा कराये लाश को पोस्टमार्टम हाउस भेज दिया. मौके पर प्रभारी निरीक्षक पुलिस ने कोई भी साक्ष्य संकलन की दिशा में कोई कार्य नही किया. मृतक के भाई रफ़ी को थाने पर रोके रखा और पोस्टमार्टम हाउस में पंचनामा कर शव को सील कर तुरंत पोस्टमार्टम कराया. पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट भी दर्ज नही की.
श्याम बिहारी वर्मा
 योगी सरकार की पुलिस की इस कार्य प्रणाली से क्षुब्ध होकर क्षेत्रीय जनता ने कई बार प्रशासनिक व क्षेत्रीय अधिकारियों से मिलकर रिपोर्ट दर्ज कर जांच की मांग की लेकिन सरकार की मंशा के अनुरूप प्रथम सूचना रिपोर्ट अपहरण व हत्या की नही दर्ज की.
मृतक मोहम्मद समी
        जनता के आक्रोश को देखते हुए पूर्व विधायक सरवर अली ने इस घटना के विरोध में व सरकार की नाकामी को लेकर 7 मई को क़स्बा फतेहपुर बाराबंकी में कैंडल मार्च निकालने की घोषणा की और 8 मई को सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने की भी घोषणा की है. 
        वहीँ, बुढ़वल केन यूनियन के पूर्व अध्यक्ष श्याम बिहारी वर्मा ने कहा कि कानून व्यवस्था बनाये रखने में सरकार की जरा सा भी रुचि नही है और सम्बंधित थाने में  अपराधों की रोकथाम का सबसे बढ़िया उपाए यह है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट ही न दर्ज करो.

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

संघी हत्यारे बुद्धिजीवी लोगों की हत्याएं कर रहे हैं


बाराबंकी। अखिल भारतीय नौजवान सभा व आल इण्डिया स्टूडेण्ड फेडरेशन की कन्या कुमारी से चलकर हूसैनीवाला जाने वाली लॉन्ग मार्च को जनपद हरदोई में रोके जाने व पत्रकार गौरी लंकेश की निर्मम हत्या के विरोध में प्रदेश व देश की तानाशाह सरकार के तानाशही रवैये के खिलाफ अखिल भारतीय नौजवान सभा के कार्यकर्ताओ द्वारा पुलिस लाइन तिराहे पर प्रदेश सरकार का पुतला फूंक कर विरोध प्रदर्शन किया गया।
                    प्रदर्शन का नेतृत्व नौजवान सभा जिलाध्यक्ष अधिवक्ता बी0पी0सिंह व जिला महामंत्री प्रित्युश कान्त शुक्ल ने किया। इस दौरान कार्यकर्ताओ ने सरकार विरोधी नारे भी लगाये। 
               प्रदेश सरकार का पुतला जलाने से पूर्व गाँधी भवन में आयोजित सभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सहसचिव रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि जब से देश व प्रदेश में मोदी-योगी सरकारों आयी है, तब से लोकतंत्र समाप्त हो गया है और संघी हत्यारे गिरोह बुद्धिजीवी लोगों की हत्याएं कर रहे हैं। 
                    भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव ब्रज मोहन वर्मा ने कहा कि किसान ऋण माफी योजना जनता के साथ धोखा है।
भाकपा के जिला सहसचिव डॉ0 कौसर हुसेन ने कहा कि नौजवानों और छात्रों के लांग मार्च को हरदोई पुलिस ने योगी के इशारे पर रोक कर लोकतंत्र की हत्या कर दी है। विरोध प्रदर्शन के दौरान किसान सभा जिलाध्यक्ष विनय सिंह, रामनरेश वर्मा, वीरेंदर कुमार, मुनेश्वर, बशत, राकेश, समाजसेवी मयंकर यादव, अधिवक्ता विजय कुमार सिंह, अधिवक्ता पुष्पेन्द्र सिंह, अधिवक्ता राजेंद्र बहादुर सिंह, अधिवक्ता कर्मवीर सिंह, अधिवक्ता आनद सिंह, अधिवक्ता मन्नू लाल चौरसिया, अधिवक्ता गौरी रस्तोगी, अधिवक्ता नीरज वर्मा, अरुण यादव, अवधेश यादव समेत आदि लोगो ने विरोध प्रदर्शन किया।

- भूपिंदर पाल सिंह 

बुधवार, 2 नवंबर 2016

राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास


आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में ले जाकर फर्जी मुठभेड़ दिखाकर हत्या कर दी उस मुठभेड़ को सही साबित करने के लिए आश्चर्यजनक परिस्थितियों में जेल वार्डन रमाशंकर यादव की हत्या कर दी जाती हैं यह सभी कार्य राजनीतिक नेतृत्व के सम्भव नहीं है दिल्ली में सीबीआई वरिष्ठ अधिकारी बंसल को गिरफ्तार करती है और उस घटना में पहले बंसल की बेटी और पत्नी आत्महत्या कर लेती है और बाद में बंसल और उनका पुत्र भी आत्महत्या कर लेता है सीबीआई केन्द्र सरकार की इच्छा शक्ति को प्रदर्शित करती है और अधिकारियों को यह संदेश देती है कि अगर हमारे राजनीतिक इशारों के अनुसार कार्य नहीं करोगे तो यातना गृह में पूरे परिवार को तडपा तडपा कर मार डाला जायेगा। यह सब मामले नाजी जर्मनी की याद दिलाते हैं और हिटलर का गेस्टापो   जर्मनी में कवि लेखक पत्रकार न्यायविद व यहूदी लोगों को उठा ले जाते थे यातनागृहो में मार डालने का कार्य करते थे और अगर कोई व्यक्ति किसी जेल में होता था तो उसको कैदियों द्वारा पीटने के नाम पर उसकी हत्या कर दी जाती थी। कतील नाम के मुस्लिम नौजवान की हत्या जेल में कर दी जाती जब उसके केस का फैसला आने वाला होता है। उसी तर्ज पर जब इन सिमी कार्यकर्ताओं का फैसला आने वाला था तो जाकिर हुसैन सादिक, मोहम्मद सलीक, महबूब गुड्डू, मोहम्मद खालिद अहमद, अकील अमजद, शेख मुजीब और मजीद की हत्या कारागार से निकाल कर कर दी जाती है।
                                                             वही   उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में उक्त हत्या कांड  के विरोध प्रदर्शन  में पुलिस ने नागरिक संगठन रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव की बुरी तरह पिटाई की है. पुलिस राजीव को पीटते हुए जीपीओ पुलिस चौकी ले गई, जहां तबीयत बिगड़ने पर ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया.
                                  राजीव के अलावा मंच के शकील कुरैशी भी ज़ख़्मी हैं. मंच ने सोमवार को भोपाल में हुए सिमी एनकाउंटर और उसमें पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाते हुए लखनऊ, जीपीओ पर विरोध प्रदर्शन बुलाया था जहां पुलिस ने उनपर कार्रवाई की.   रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब अधिवक्ता ने कहा है कि मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार से कोई अंदरुनी गठजोड़ कर रखा है?जिसका परिणाम   लाठी चार्ज है यह भी सरकारी हत्या का प्रयास है जो भी विरोध करेगा  उसका भी यही अंजाम होगा

                          देश बदल रहा है देश को यातना गृह और हत्या घर में बदला जा रहा है न्यायपालिका चिल्ला रही है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति न कर न्यायालयों में ताला लगाने की साजिश है राजनीतिक नेतृत्व हिटलर के फासीवाद से प्रतीत है उससे कोई उम्मीद करना बेइमानी होगी जरूरत इस बात की है कि धर्मनिरपेक्ष, जनवादी कार्पोरेट विरोधी शक्तियों को अपनी ताकत से विरोध करने की है भोपाल फर्जी मुठभेड़ प्रकरण की अविलंब जाच उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश इस बिंदु पर कराने की आवश्यकता है कि क्या राजनीतिक नेतृत्व की इस फर्जी मुठभेड़ प्रकरण में कहा तक शामिल था 
----रण धीर सिंह सुमन 
                          एडवोकेट
 लो क सं घ र्ष !

बुधवार, 19 मार्च 2014

संघ के जहरीले प्रचार के कारण गांधी जी की हत्या हुई थी

  राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने महात्मा गांधी की हत्या की थी।
संघ इस आरोप को बेबुनियाद बता रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि महात्मा गांधी की हत्या में संघ का अप्रत्यक्ष हाथ था। हत्या का फैसला कोई प्रस्ताव पारित करके नहीं किया गया था परन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि संघ व हिन्दू महासभा के कुछ प्रमुख नेताओं को यह जानकारी थी कि महात्मा गांधी की हत्या होने वाली है। यह आरोप कि संघ को ज्ञात था कि महात्मा गांधी की हत्या होने वाली है, तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने लगाया था। पत्र में पटेल ने लिखा था ‘‘उसके (आर.एस.एस.) सभी नेताओं के भाषण साम्प्रदायिक जहर से भरे रहते थे। उन जहरीले भाषणों के चलते देश में ऐसा वातावरण बना जिससे यह बड़ी त्रासदी (गांधी जी की हत्या) घटी। हत्या के बाद संघ के स्वयंसेवकों ने खुशियां मनाईं और मिठाई बांटी।’’
पटेल ने इस पत्र की कापी जनसंघ के प्रथम अध्यक्ष और हिन्दू महासभा नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी को भी भेजी थी। सरदार पटेल ने महात्मा गांधी की हत्या के बाद तत्कालीन सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर को एक पत्र लिखासंदेह नहीं कि  नाथूराम गोडसे, जिसने गांधीजी की हत्या की थी, वे संघ के सदस्य रहे थे। उन्हें बौद्धिक प्रचारक का उत्तरदायित्व सौंपा गया था। उनके भाई गोपाल गोडसे लिखते हैं कि ‘‘नाथूराम गोडसे ने अदालत को बताया था कि उन्होंने 1934 में संघ छोड़ दिया था परंतु वास्तविकता यह है कि उन्होंने (नाथूराम गोडसे) संघ को कभी नहीं छोड़ा’’ गोपाल गोडसे के इस कथन से स्पष्ट होता है कि वे उस समय भी संघ से जुड़े थे जब उन्होंने गांधी की हत्या की थी।
गोडसे की वास्तविक स्थिति के बारे में आउटलुक पत्रिका ने सरसंघचालक प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह से एक साक्षात्कार में पूछा था। राजेन्द्र सिंह ने उत्तर दिया था कि ‘‘नाथूराम गोडसे अखंड भारत का सपना देखता था। उसका इरादा ठीक था परंतु उसने जो तरीका अपनाया वह गलत था।’’
संघ ने कभी भी नाथूराम गोडसे से अपना संबंध नहीं तोड़ा। इसके ठीक विपरीत, संघ उसके विचारों को प्रचारित करता रहा है। संघ वर्षों तक नाथूराम गोडसे और उनके भाई की किताबों के विज्ञापन अपने साप्ताहिक समाचारपत्र आर्गनाईजर में छापता रहा है। जैसे दिनांक अक्टूबर 5, 1997 के संस्करण में रीडेबल अटरेक्टिव न्यू बुक्स शीर्षक से विज्ञापन छपा था। इन किताबों में नाथूराम गोडसे की किताब ‘‘मे इट प्लीज युअर आनर’’ और गोपाल गोडसे की किताब ‘‘गांधीज मर्डर एंड आफ्टर’’ शामिल हैं। इस तरह के विज्ञापन समय-समय पर छपते रहे हैं।
सरदार पटेल ने, जिन्हें नरेन्द्र मोदी और संघ अपना हीरो मानता है, गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया था। 4 फरवरी 1948 को प्रतिबंध लगाया गया था। ‘भारत सरकार ने 2 फरवरी को अपनी घोषणा में कहा है कि  उसने (भारत सरकार) उन सभी विद्वेकारी तथा हिंसक क्तियों को जड़मूल से नष्ट कर देने का निष्चय किया है, जो राष्ट्र की स्वतत्रंता को खतरे में डालकर उसके उज्जवल नाम पर कलंक लगा रही हैं। उसी नीति के अनुसार, चीफ कमिश्नरों के अधीनस्थ सब प्रदेशों  में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अवैध घोषित करने का निर्णय भारत सरकार ने कर लिया है। गवर्नरों के अधीन राज्यों में भी इसी ढंग की योजना जारी की जा रही है।’’ सरकारी विज्ञप्ति में आगे कहा गया: ‘‘संघ के स्वयंसेवक अनुचित कार्य भी करते रहे हैं। देश  के विभिन्न भागों में उसके सदस्य व्यक्तिगत रूप से आगजनी, लूटमार, डाके, हत्याएं तथा लुकछिप कर स्त्र, गोला और बारूद संग्रह करने जैसी हिंसक कार्यवाहियां कर रहे हैं। यह भी देखा गया है कि ये लोग पर्चे भी बांटते हैं, जिनसे जनता को आतंकवादी मार्गों का अवलंबन करने, बंदूकें एकत्र करने तथा सरकार के बारे में असंतोश  फैला कर सेना और पुलिस में उपद्रव कराने की प्रेरणा दी जाती है।’’
सरकारी आदेश  में वे अन्य कारण भी गिनवाए गये जिनके चलते आरएसएस पर प्रतिबंध लगाना जरूरी हो गया था। इस संदर्भ में जानने लायक एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जब आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया गया तब देश  के गृहमंत्री सरदार पटेल ही थे, जिनको आरएसएस कांग्रेस में अपना प्रिय नेता मानती थी और आज भी मानती है। सरदार पटेल ने गांधी जी की हत्या में आरएसएस की भूमिका के बारे में स्वयं गोलवलकर को एक पत्र के माध्यम से जो कुछ लिखा था वह भी पढ़ने लायक है। सरदार पटेल ने 19.9.1948 के अपने पत्र में लिखा, ‘‘हिन्दुओं का संगठन करना, उनकी सहायता करना एक प्रश्न है पर उनकी मुसीबतों का बदला, निहत्थे व लाचार औरतों, बच्चों व आदमियों से लेना दूसरा प्रष्न है...उन्होंने कांग्रेस का विरोध करके और इस कठोरता से कि न व्यक्तित्व का ख्याल, न सभ्यता व शिष्टता का ध्यान, जनता में एक प्रकार की बेचैनी पैदा कर दी थी। इनकी सारी स्पीचिज सांप्रदायिक विष से भरी थीं। हिन्दुओं में जोश  पैदा करना व उनकी रक्षा के प्रबन्ध करने के लिए यह आवश्यक न था कि वह जहर फैले। इस जहर का फल अन्त में यही हुआ कि गांधी जी की अमूल्य जान की कुर्बानी देश  को सहनी पड़ी और सरकार व जनता की सहानुभूति जरा भी आरएसएस के साथ नहीं रही, बल्कि उनके खिलाफ हो गयी। उनकी मृत्यु पर आरएसएस वालों ने जो हर्ष प्रकट किया था और मिठाई बांटी, उस से यह विरोध और बढ़ गया और सरकार को इस हालत में आरएसएस के खिलाफ कार्यवाही करना जरूरी ही था।
‘‘तब से अब 6 महीने से ज्यादा हो गए। हम लोगों की आशा  थी कि इतने वक्त के बाद सोचविचार कर के आरएसएस वाले सीधे रास्ते पर आ जाएंगे। परन्तु मेरे पास जो रिपोर्ट आती हैं उनसे यही विदित होता है कि पुरानी कार्यवाहियों को नई जान देने का प्रयत्न किया जा रहा है।’’
प्रतिबंध लगने के बाद संघ की गतिविधियां ठप्प हो गईं। इसके बाद संघ द्वारा प्रतिबंध उठाने के लिए अथक प्रयास किए गए। अपने प्रयासों के दौरान गोलवलकर ने पटेल को अनेक पत्र लिखे। परन्तु पटेल ने बार-बार यह स्पष्ट किया कि प्रतिबंध उठाने के अनुरोध पर उसी समय विचार किया जाएगा जब संघ उसके संविधान का प्रारूप पेश करे।
14 नवंबर 1948 को गृह मंत्रालय की ओर से एक विज्ञप्ति जारी की गई जिसमें यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि गोलवलकर प्रतिबंध उठवाना तो चाहते हैं परंतु संघ अपने स्वरूप और गतिविधियों में किसी प्रकार का सुधार करने को तैयार नहीं है। पटेल ने श्यामाप्रसाद मुखर्जी को लिखे एक पत्र में कहा कि संघ की गतिविधियों से देश को खतरा है। वे वास्तव में राष्ट्रविरोधी हैं। बाद में संघ ने अपने संविधान का प्रारूप पटेल को भेजा। इस प्रारूप में संघ ने यह स्पष्ट प्रावधान किया कि संघ, राजनीति में हिस्सा नहीं लेगा और अपनी गतिविधियों को सांस्कृतिक क्षेत्र तक सीमित रखेगा। यह आश्वासन देने के बावजूद, संघ अब सीधे राजनीति में भाग ले रहा है। इस तरह वह पटेल को दिए गए आश्वासन के ठीक विपरीत कार्य कर रहा है। आज भी संघ जिन उद्देश्यों के लिए काम कर रहा है वे उस संविधान के विरूद्ध हैं जिसके द्वारा हमारे राष्ट्र की सभी प्रकार की गतिविधियों का संचालन होता है।
-एल.एस. हरदेनिया

शुक्रवार, 7 जून 2013

न्यायिक अभिरक्षा में हत्या या मौत


   आतंकवाद के झूठे आरोपों में निरुद्ध होकर वर्षों से जेलों में बंद मुस्लिम नवयुवकों की अखिलेश सरकार द्वारा रिहाई के अपने वायदे पर अमल न करने से प्रदेश का मुसलमान उन से नाराज तो चल ही रहा था कि रही सही कसर लखनऊ व फैजाबाद न्यायालय परिसर में हुए श्रंखलाबद्ध बम विस्फोटों के आरोपी खालिद मुजाहिद की पुलिस अभिरक्षा में संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने पहले से ही आहत मुसलमानों के जले हुए दिलों पर पेट्रोल डालने का काम कर डाला।
    पुलिस सूत्रों के मुताबिक खालिद मुजाहिद, तारिक कासमी, सज्जादुर्रहमान और मुहम्मद अख्तर को लेकर 18 मई को दोपहर लगभग एक बजे लखनऊ पुलिस लाइन के सब इंस्पेक्टर रामअचल राय के नेतृत्व में 7 सिपाहियों का एक दल फैजाबाद जेल पहुँचा जहाँ एडीशनल सेशन जज मो0 हुसैन की अदालत में केस की सुनवाई के बाद लगभग साढ़े तीन बजे चारों अभियुक्त लखनऊ वापसी  के लिए पुलिस वाहन से चले। सब इंस्पेक्टर पुलिस रामअचल राय के अनुसार खालिद मुजाहिद की तबीयत लगभग 4ः45 बजे रामसनेहीघाट क्षेत्र में अचानक बिगड़ी और वह अचेत हो गया। पुलिस ने ठण्डे पानी के छींटे उसके चेहरे पर डाले, परन्तु खालिद मुजाहिद अचेत ही रहा। जब उसे 5ः25 मिनट पर जिला अस्पताल बाराबंकी के आपात कक्ष में पहुँचाया गया तो डाक्टरांे ने उसका चिकित्सीय परीक्षण कर उसकी मृत्यु की घोषणा कर दी।
    मीडिया को जो बयान तारिक कासमी ने दिया उसके मुताबिक खालिद मुजाहिद की तबीयत विगत कई दिनों से खराब चल रही थी, परन्तु जेल अधिकारियों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जबकि आरोपियों के वकील मुहम्मद शुऐब के अनुसार फैजाबाद में खालिद बिल्कुल स्वस्थ व प्रसन्नचित था, अपने घर वालों को सलाम भी उसने उनसे कहने को कहा था। तारिक कासमी द्वारा मीडिया को दिए गए बयान को सही न मानते हुए उन्होंने कहा कि पुलिसअभिरक्षा में तारिक के बयान की सच्चाई सवालों के घेरे में है। उन्होंने एक सवाल यह उठाया कि आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद ए0टी0एस0 व एस0टी0एफ0 ने कभी भी मीडिया को आरोपियों के पास नहीं आने दिया परन्तु खालिद मुजाहिद की मृत्यु के पश्चात तारिक कासमी को मीडिया के सामने पुलिस ने बयान देने के लिए प्रस्तुत करने से तनिक भी संकोच नहीं किया।
  
    वहीं मृतक के चाचा जहीर आलम फलाही ने पोस्टमार्टम के पूर्व एक तहरीर देकर हत्या का वाद कोतवाली नगर, बाराबंकी में दर्ज कराया जिसमें मुख्य अभियुक्त के रूप में विक्रम सिंह, बृजलाल, मनोज कुमार झा, चिरंजीव नाथ सिन्हा, एस आनन्द, राजेश कुमार श्रीवास्तव सहित 42 अधिकारी व आई0बी0 के लोग हैं।
    प्रतापगढ़ के कुण्डा पुलिस सर्किल के डिप्टी एस0पी0 जियाउल हक की हत्या के पश्चात यह दूसरी जाँच है जो सरकार ने सी0बी0आई0 के हवाले की है। देखना यह है कि सी0बी0आई0 कितनी निष्पक्षता से दोनों केसों की जाँच करती है। फिलहाल अखिलेश सरकार पर से मुसलमानों का विश्वास डगमगा गया है।
खालिद मुजाहिद की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में विषाक्त पदार्थ के सेवन के उपरान्त जो संकेत शव के विभिन्न अंगों में आने चाहिए वह सभी दिखे, परन्तु दो मुस्लिम डाक्टरों सहित पाँच डाक्टरों की टीम मृत्यु का कारण फिर भी स्पष्ट न कर सकी। यह बात किसी के गले के नीचे नहीं उतरी।
-तारिक़ खान
लोकसंघर्ष पत्रिका से

शुक्रवार, 24 जून 2011

सुनियोजित हत्या है डॉ सचान की

डॉ वाई.एस सचान की जिला कारागार लखनऊ में सुनियोजित हत्या है डॉ बी.पी सिंह की हत्या के बाद प्रदेश के दो मंत्री अनंत मिश्रा बाबु सिंह कुशवाहा को मंत्रिपद से हटा दिया गया था और तभी यह भी प्रकाश में आया था कि सत्तारूढ़ दल के कई महाबली डॉ बी.पी सिंह की हत्या में शामिल थे उन लोगों को गिरफ्तार करने से सत्तारूढ़ दल की काफी छीछालेदर होती उस छेछालेदार से बचने के लिये आम तौर से पुलिसिया हथकंडे से अन्य व्यक्तियों को अभियुक्त बनाया जाता रहा है लेकिन यह भी सत्य है कि परिवार कल्याण विभाग में हो रहे करोडो रुपये के घोटालों की सभी जानकारी डॉ वाई.एस सचान को थी और जब उनको बलि का बकरा बनाया जाने लगा तो उन्होंने अपना मुंह खोलने का निश्चय किया होगा जिला कारागार लखनऊ में पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उनके शरीर पर 9 एंटीपोस्टमार्टम इंजरीज पाई गयी हैं जो स्वयं किसी व्यक्ति द्वारा अपने को घायल करना संभव नहीं है पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार डॉ सचान की मौत दिन में 11 बजे से 12 बजे के बीच में हुई है जिससे यह भी साबित होता है कि कारागार प्रशासन की जानकारी में उनको प्रताड़ित किया गया और प्रताड़ितकर्ताओं की बात मानने के कारण उनको हमेशा-हमेशा के लिये मौत की नींद में सुला दिया गया सरकारी विभागों में अरबों रुपयों की कमीशन बाजी होती रहती है और राजनीति के क्षितिज पर रहने वाले लोगों का भी उसमें हिस्सा होता है इसलिए मुख्य अपराधियों के खिलाफ कार्यवाई करने में वह लोग रोड़े अटकाते हैं डॉ सचान के मामले में कैबिनेट सचिव शशांक शेखर से लेकर उच्च पुलिस अधिकारीयों ने तरह-तरह के बयान बदले हैं जिससे उनकी ही स्तिथि हास्यस्पद हो गयी है परिस्तिथि जन्य साक्ष्य सीधी-साधी हत्या बता रहे हैं लेकिन पुलिस विभाग और सरकार आत्महत्या बता रही है

सुमन
लो क सं घ र्ष !
Share |