शनिवार, 8 जनवरी 2011

वार्षिक हिंदी ब्लॉग विश्लेषण -२०१० (भाग-७)

......... गतांक से आगे बढ़ते हुए ......



जब मुद्दों की बात चलती है तो एक ब्लॉग अनायास ही मेरी आँखों के सामने प्रतिविंबित होने लगता है । जनसंघर्ष को समर्पित इस ब्लॉग का नाम है लोकसंघर्ष । मुद्दे चाहे जैसे हो, जन समस्याओं से संवंधित मुद्दे हों अथवा राष्ट्रीय , सामाजिक हो अथवा असामाजिक, राजनीतिक हों अथवा गैर राजनीतिक .....सभी मुद्दों पर खुल कर अपना पक्ष रखा इस ब्लॉग ने इस वर्ष । इस वर्ष यह ब्लॉग चिट्ठाजगत की सक्रियता सूची में भी चौथे-पांचवें स्थान पर रहा । अयोध्या मुद्दे पर इनका एक पोस्ट (मंदिर के कोई पुख्ता प्रमाण भी नहीं मिले :विनोद दास ) जहां गंभीर विमर्श को जन्म देता दिखाई देता है वहीँ उनका दूसरा पोस्ट ( पुरातत्ववेता प्रोफ़ेसर मंडल का कथन अयोध्या उत्खनन के संवंध में ) विवादों को ।अपने एक पोस्ट में यह ब्लॉग गिन-गिनकर अयोध्या फैसले के गुनाहगार का नाम गिनाते हैं वहीं अपने एक पोस्ट में यह ब्लॉग कहता है कि दुर्लभ मौक़ा आपने गँवा दिया न्यायाधीश महोदयदूसरा मुद्दा बराक ओबामा की भारत यात्रा पर यह ब्लॉग बोलता है " चापलूसी हमारा स्वभाव है " । भ्रष्टाचार के मुद्दे पर यह ब्लॉग कहता है कि भ्रष्टाचार पर कौंग्रेस और भाजपा मौसेरे भाई है वहीं इसी विषय पर एक पोस्ट में ये कहते हैं - गुलामी और लूट का खेल तमाशा ।हाल ही प्रकाशित उनका एक आलेख औद्योगिक घरानों की लोकतंत्र के साथ सांठगाँठ को उजागर करता है शीर्षक है -संसद,लोकतंत्र कठपुतलियाँ हैं औद्योगिक कंपनियों की .....!





मुद्दों पर आधारित इस वर्ष का अगला चर्चित ब्लॉग है दुधवा लाईव , इस ब्लॉग पर २४ जुलाई २०१० को विश्व जनसंख्या पर एक सार्गभितआलेख प्रस्तुत किया गया जिसका शीर्षक था "हम दूसरों के कदमों पर कदम रखना कब छोड़ेंगे ? अगला ब्लॉग है चोखेर वाली जिसपर ३१ अक्तूबर को अरुंधती राय के बहाने कई मुद्दे दृढ़ता के साथ उठाये गए , शीर्षक था 'अरुंधती राय की विच हंटिंग ....! देश का दर्द बांटने वाला देश का चर्चित सामूहिक ब्लॉग हिन्दुस्तान का दर्द पर ०३ मई २०१० को प्रकाशित इस रिपोर्ट का सच क्या है ? पर बेनजीर भुट्टों से संवंधित कई चौंकाने वाले तथ्य प्रकाश में लाए गए ।
"मुझे ये पूरा विश्वास है कि भ्रष्टाचार आज हम भारतीयों का स्वीकृत आचार बन चुका है. क्षमा चाहूंगा, मैं यहां “हम भारतीयों” पर जोर डालना चाहता हूं. क्योंकि, आज एक-दो आदमी या संस्था नहीं, हम सभी भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ डूबे हैं। " ऐसा कहा है आजकल ब्लॉग ने अपने २१ अगस्त के पोस्ट पर जिसका शीर्षक है हम सभी भ्रष्ट हैं ।'राजीव गांधी हों, वीपी सिंह हों या मुलायम सिंह यादव हों, कोई भी मुसलमानों का हमदर्द नहीं है।' ऐसा कहा है २८ अक्तूबर को सलीम अख्तर सिद्दीकी ने अपने ब्लॉग हक की बात में । मीडिया पर असली मुद्दा छुपाने का आरोप लगाया है रणविजय प्रताप सिंह ने समाचार ४ मीडिया पर वहीँ भड़ास 4 मीडिया पर पंकज झा ने अपने एक पोस्ट में कहा है कि अयोध्या मुद्दे को उत्पात न बनाएं । अनिता भारती ने मुहल्ला लाईव में ०७ अगस्त को पूछा कि मुद्दों को डायल्युट कौन कर रहा है
? जनतंत्र के ३० सितंबर के एक आलेख में सलीम अख्तर सिद्दीकी ने भाजपा पर यह आरोप लगाया है कि राख हो चुके मंदिर मुद्दे में आग लगने की कोशिश हो रही है ।

वर्ष के आखिरी चरणों में भारतीय समाज के विभिन्न क्षेत्रों में जानी मानी हस्तियों ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान शुरू करते हुए देश के भ्रष्टाचार निरोधक तंत्र में कमियों को दूर करने के वास्ते लोकपाल बिल का मजमून तैयार किया और इसे कानून का रूप देने के अनुरोध के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भेजा । ब्लॉग पर भी कुछ इसी तरह की चर्चाएँ गर्म रही उस दौरान , यथा- रायटोक्रेट कुमारेन्द्र पर : भ्रष्टाचार का विरोध सब कर रहे हैं, आइये हम सफाया करें जय जय भारत पर :२ जी स्पेक्ट्रम : ये (भ्रष्टाचार का ) प्रदूषण तो दिमाग को हिला देने वाला हैकडुआ सच पर : भ्रष्टाचार....भ्रष्टाचार ....चलो आज हम हाथ लगा दें
आचार्य जी
पर : भ्रष्टाचार खबर इंडिया डोट कोम पर : भ्रष्टाचार की भारतीय राजनीति मेंविकासयात्राब्लोगोत्सव-२०१० पर : भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए क्या करना चाहिए ब्लोगोत्सव-२०१० पर : बदलाव जरूरी है...दबीर निउज में : सुप्रीम कोर्ट की दो टूक भ्रष्टाचार सिस्टम का बदनुमा दाग हैपरिकल्पना पर : चर्चा-ए-आम भ्रष्टाचार की आगोश में आवाम और खबर इंडिया डोट कोम पर :भ्रष्टाचार से खोखला हो रहा है देश । ये सभी ब्लॉग भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम को हवा देने का कार्य किया हैं , जो प्रशंसनीय है । इस वर्ष के उत्तरार्द्ध में एक नया ब्लॉग आया मंगलायतन , इस पर भी भ्रष्टाचार से संबंधित मुद्दे उठाये गए ।

भारत ने एक संप्रभुता संपन्न राष्ट्र के रूप में १५ अगस्त -२०१० को ६३ वी वर्षगाँठ मनाई । इस समयांतराल में नि:संदेह एक राष्ट्र के रूप में उसने बड़ी-बड़ी उपलब्धियां प्राप्त की । आई टी सेक्टर में दुनिया में उसका डंका बजता है । चिकित्सा,शिक्षा, वाहन, सड़क, रेल, कपड़ा, खेल, परमाणु शक्ति, अंतरिक्ष विज्ञान आदि क्षेत्रों में बड़े काम हुए हैं । परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र का रुतवा भी हासिल किया है । आर्थिक महाशक्ति बनने को अग्रसर है । मगर राष्ट्र समग्र रूप से विकसित हो रहा है इस दृष्टि से विश्लेषण करें तो बहुत कुछ छूता हुआ भी मिलता है, विकास में असंतुलन दिखाई देता है एवं उसे देश के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचाने में सफलता नहीं मिली है । जिससे भावनात्मक एकता कमजोर हो रही है , जो किसी राष्ट्र को शक्ति संपन्न , समृद्धशाली,अक्षुण बनाए रखने के लिए जरूरी है । यह समस्या चिंता की लकीर बढाती है ।

१५ अगस्त से २४ अगस्त तक परिकल्पना पर एक परिचर्चा आयोजित हुई " क्या है आपके लिए आज़ादी के मायने ? इस परिचर्चा में शामिल हुए लगभग दो दर्जन ब्लोगर । परिचर्चा में शामिल होते हुए समीर लाल समीर ने कहा कि " पीर पराई समझ सको तो जीवन भर आज़ाद रहोगे , बरना तुम बर्बाद रहोगे । " रश्मि प्रभा ने कहा कि " सब शतरंज के प्यादे राजा बनने की होड़ में और ताज पहनानेवाले अनपढ़ , गंवार !" दीगंबर नासवा ने कहा कि "यदि आप आज की पीढ़ी से पूछें तो शायद आज़ाद भारत में आज़ादी का मतलब ढूँढने में लंबा वक़्त लगेगा । " दीपक मशाल ने कहा कि "यू के में एक मज़दूर भी चैन का जीवन बिता सकता है मगर क्या आज़ाद भारत में ?" सरस्वती प्रसाद ने कहा कि ""यहाँ पर ज़िन्दगी भी मौत सी सुनसान होती है....यहाँ किस दोस्त की किस मेहरबां की बात करते हो....अमां तुम किस वतन के हो कहाँ की बात करते हो !" अविनाश वाचस्पति ने कहा कि "जिस दिन सोने और सपने देखने की आजादी मिल जाए तो समझना संपूर्ण आजादी मिल गई है। इसे हासिल करना दुष्‍कर है, यह मक्‍का मदीना नहीं है, यह पुष्‍कर है।" शीखा वार्ष्णेय ने कहा कि "घर से निकलती है बेटी तो दिल माँ का धड़कने लगता है,जब तक न लौटे काम से साजन दिल प्रिया का बोझिल रहता है,अपने ही घर में हर तरफ़ भय की जंजीरों का जंजाल हैं, हाँ हम आजाद हैं।" गिरीश पंकज ने कहा कि " आज़ादी मेरे लिए जीने का सामान है,इश्वर का बरदान है !" अर्चना चाव ने कहा कि " समय के साथ चलो सिर्फ इतना भर कह देने से कुछ नहीं होगा...!" प्रमोद तांबट ने कहा कि " आज़ादी का फल भोगने की आज़ादी सब को होना चाहिए ।" उदय केशरी ने कहा कि "क्या भारतीय लोकतंत्र की दशा व दिशा तय करने वाली भारतीय राजनीतिक गलियारे के प्रति युवाओं के दायित्व की इति श्री केवल इस कारण हो गई, क्योकि यह गलियारा मुट्ठी भर पखंडियो और भ्रष्ट राजनीतिकों के सडांध से बजबजाने लगा है ...!" खुशदीप सहगल ने कहा कि "दुनिया भर में मंदी की मार पड़ी हो लेकिन भारत में पिछले साल अरबपतियों की तादाद दुगने से ज़्यादा हो गई...पहले २४ थे अब ४९ हो गए हैं....वहीं ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के ताजा सर्वे के मुताबिक भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या ६४ करोड़ ५० लाख है...ये देश की आबादी का कुल ५५ फीसदी है...!" अशोक मेहता ने कहा कि "अगर हम गौर करें तो ये पायेंगे कि हमने अपने देश को तो अंग्रेजों से आज़ाद करवा लिया, मगर यहाँ के लोग और उनकी सोच को हम अंग्रेजीपन से आजाद नहीं करवा पाए. आज भी हम उसी अंग्रेजीपन के गुलाम हैं. अपने स्कूल, ऑफिस, या सोसाइटी में तिरंगा फेहरा के हम अगर ये समझते हैं कि हमने आज़ादी हासिल कर ली है तो ये गलत है....!" संगीता पुरी ने कहा कि " हर प्रकार की स्‍वतंत्रता प्राप्‍त करने के लिए , हर प्रकार की स्‍वतंत्रता को बनाए रखने के लिए नागरिकों के द्वारा अधिकार और कर्तब्‍य दोनो का पालन आवश्‍यक है , ये दोनो एक दूसरे के पूरक हैं। स्‍वतंत्रता का अर्थ उच्‍छृंखलता या मनमानी नहीं होती ।" डा सुभाष राय ने कहा कि "जो समाज आजादी का अर्थ निरंकुशता, उन्मुक्ति या मनमानेपन के रूप में लगाता है, वह भी उसी असावधान पक्षी की तरह नष्ट हो जाता है। अराजकता हमेशा गुलामी या विनाश की ओर ले जाती है। सच्ची आजादी का मतलब ऐसे कर्म और चिंतन के लिये आसमान का पूरी तरह खुला होना है, जो समूचे समाज को, देश को लाभ पहुंचा सके।" प्रेम जनमेजय ने कहा कि " पहले भी गरीब पिटता था और आज भी गरीबों को पीटने की पोरी आज़ादी है !" इसके अलावा इस महत्वपूर्ण परिचर्चा में शामिल होने वाले ब्लोगर थे -विनोद कुमार पाण्डेय ,एडवोकेट रणधीर सिंह सुमन,राजीव तनेजा , डा दिविक रमेश , दीपक शर्मा , शकील खान , सलीम खान , ललित शर्मा आदि ।

अयोध्या के हनुमानगढ़ी के पास ही ऊंचाई पर रामद्वार मंदिर के पुजारी चंद्र प्रसाद पाठक की व्यथा-कथा कुछ अलग अंदाज़ में सुनाया रबीश कुमार ने कस्बा पर दिनांक १२.०९.२०१० को । वहीं जिज्ञासा पर २४ सितंबर को प्रमोद जोशी ने कहा कि कॉमनवैल्थ खेल के समांतर अयोध्या का मसला काफी रोचक हो गया है। १० अक्तूबर को विचारार्थ पर राज किशोर ने कहा कि "बचपन से ही मैं नास्तिक हूं। फिर भी राम का व्यक्तित्व मुझे बेहद आकर्षित करता रहा है। वैसे, हिन्दू संस्कारों में पले बच्चे के लिए मिथकीय दुनिया में चुनने के लिए होता ही कितना है? राममनोहर लोहिया ने राम, कृष्ण और शिव की चर्चा कर एक तरह से महानायकों की ओर संकेत कर दिया है। पूजने वाले गणेश, लक्ष्मी और हनुमान को भी पूजते हैं। पर राम, कृष्ण और शिव की मोहिनी ही अलग है। इनकी मूर्ति जन-जन के मन में समाई हुई है। मैं अपने को इस जन का ही एक सदस्य मानता हूं। सीता का परित्याग और शंबूक की हत्या, ये दो ऐसे प्रकरण हैं, जो न होते, तो राम की स्वीकार्यता और बढ़ जाती। लेकिन इधर मेरा मत यह बना है कि महापुरुषों का मूल्यांकन उनकी कमियों के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी श्रेष्ठताओं के आधार पर किया जाना चाहिए। मैं तो कहूंगा, अपने परिवार और साथ के लोगों के प्रति भी हमें यही दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। दूसरों की बुराइयों और कमियों में रस लेना मानसिक रुग्णता है।" भडास4मीडिया पर डा नूतन ठाकुर अयोध्या के लिए नेताओं की तरह मीडिया को भी जिम्मेदार ठहराया है । हमारी भी सुनो पर गुफरान सिद्दीकी ने पूछा है कि किसकी अयोध्या ?

जहां तक महंगाई जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों का प्रश्न है १४ जून २०१० को मनोज पर सत्येन्द्र झा कहते है कि " मंहगाई पहले पैसे खर्च करवाती थी। अब माँ से बेटे को अलग कर के धर दे रही है। इस मंहगाई का. ... ऐसी मानसिकता का क्या कहें ? मंहगाई केवल माँ को रखने में ही दिखाई देती है. ...(यह एक लघुकथा है जो मूल कृति मैथिली में "अहींकें कहै छी" में संकलित 'महगी' से केशव कर्ण द्वारा हिंदी में अनुदित है )।१७ अगस्त २०१० को बाल सजग पर कक्षा-८ में पढ़ने वाले आशीष कुमार की बड़ी प्यारी कविता प्रकाशित हुई है ... मंहगाई इतनी बढ़ी है मंहगाई । किसी ने की न जिसकी आवाज सुन मेरे भाई ॥ पूँछा आलू का क्या दाम है भइया । उसने बोला एक किलो का दस रुपया ॥ टमाटर का दाम वो सुनकर । ... ०५ अगस्त २०१० को लोकमंच पर यह खबर छपी है कि मंहगाई पर सरकार वेबस है ।आरडी तैलंग्स ब्लॉग पर बहुत सुन्दर व्यंग्य प्रकाशित हुआ है जिसमें कहा गया है कि मंहगाई हमारे देश का गुण है, और हम अपना गुण नष्ट करने में लगे हैं। मैं तो चाह रहा हूं, हर चीज़ मंहगी हो जाए, यहां तक कि आलू भी…ताकि किसी को अगर आलू के चिप्स भी खिला दो, तो वो गुण गाता फिरे कि कितना अच्छा स्वागत किया। पैसे की कीमत भी तभी पता चलेगी, जब पैसा कम हो, और मंहगाई ज्यादा…। सारे रिश्ते नाते, मंहगाई पर ही टिके हैं… जिस दिन मंहगी साड़ी मिलती है, उस दिन बीवी भी Extra प्यार करती है… मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा कि वो जल्द से जल्द मंहगाई बढ़ाए, देश बढ़ाए…!"

.......जारी है विश्लेषण मिलते हैं एक विराम के बाद ......

रवीन्द्र प्रभात

परिकल्पना ब्लॉग से साभार

2 टिप्‍पणियां:

कृष्ण ने कहा…

ब्लॉग विश्लेशण के महत्वपूर्ण कार्य के लिए साधुवाद, साथ ही ब्लागिंग के इतिहास में आप का और आप के ब्लाग का महत्वपूर्ण स्थान होगा।

मनोज कुमार ने कहा…

यह श्रूंखला एक सहेज कर रखने वाली धरोहर है।