बुधवार, 3 अगस्त 2011

नवउदारवाद की प्रयोगशाला में भ्रष्टाचार भाग 5

हमने संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखने वाले सभी स्वतंत्रचेता नागरिकों और संगठनों की तरह रामलीला मैदान में यूपीए सरकार की आधी रात को की गई दमनकारी कार्रवाई की कड़ी निंदा की। रामदेव तो भाग निकले और उन्हें सवारी के लिए सरकार का हवाई जहाज मिल गया। लेकिन दूरद्राज से आए स्त्रित्रयोंबच्चों समेत हजारों नागरिकों पर जो दिल्ली पुलिस का कहर बरपा उसे शर्मनाक के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता। अगर वे सब नरेंद्र मोदी के आह्वान पर भी आए होते, तो भी हम पुलिस दमन का वैसा ही विरोध करते। हालांकि, निर्दोषों पर हुए पुलिस दमन से नाराज नागरिकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के कई भागों में पुलिस और सुरक्षा बलों का ही राज चलता है। भले केंद्र और राज्यों में सरकार किसी की हो। पीयूसीएल, पीयूडीआर जैसे नागरिक संगठनों की रपटें और खुद सरकार के आंकड़े देख्त्रो जा सकते हैं कि बहुतसे निर्दोष नागरिक राज्यसत्ता ने जेलों में ठूंसे हुए हैं। आशा करनी चाहिए कि राजधानी में ‘आपातकाल जैसा दृश्य’ देखने के बाद संवेदनशील और सचेत नागरिक देश की उस प्रताड़ित जनता के संवैधानिक और जीवनाधिकारों के लिए भी आवाज बुलंद करेंगे।
कांगरेस ने अन्ना हजारे और रामदेव को आरएसएस के मुख्त्रौटे कहा है। लेकिन समस्या यह है कि वह खुद उन्हें अपना मुखत्रौटा बनाने की हर कवायद करती है, और सफल न होने पर आरएसएस के पाले में धकेलती है। मंशा साफ है कि आरएसएस की ब़ती मजबूती देख कर पहले की तरह मुसलमान कांगरेसी छाया में आ जाएं। दलितों की घरवापसी का काम राहुल गांधी दलितों के घरों में जाकर करने में लगे ही हैं। इतिहासकार रामचंद्र गुहा से लेकर साहित्यकार गिरिराज किशोर तक बता रहे हैं कि राहुल गांधी राजनीति का नया पाठ ग़ रहे हैं। गिरिराज किशोर ने तो राहुल गांधी के दलितों के घरों में जाकर रहने को गांधी की ‘अहिंसक छापामारी’ से जोड़ कर दिखाया है। पता नहीं बहन मायावती को हाल में ‘जनसत्ता’ में छपी उनकी इस टिप्पणी का पता चला है या नहीं? कोई उन्हें बताएगा तो वे गांधी को जरूर दो लात और लगाएंगी कि वह राहुल गांधी के अवतार में मरने के बाद भी दलितों का पीछा नहीं छोड़ रहा है! केएम पणिक्कर और रोमिला थापर ने ‘दि हिंदू’ में साझा लेख लिखा है कि नेहरू मेमोरियल म्यूजियम और लाइब्रेरी के नए निदेशक महेश रंगराजन नेहरू के सपनों को साकार करने के लिए बनी इस संस्था के स्तर को गिरने से बचाएंगे, जो उनके मुताबिक, पिछले दस वषोर्ं से लगातार गिरता गया है। शायद इन दोनों विद्वानों ने महेश रंगराजन के राहुल गांधी की प्रशंसा में कसे कसीदे नहीं पॄे हैं।
बुद्धिजीवियों की यही खसलत होती है कि जो कौड़ी राहुल गांधी के मैनेजरों के हाथ नहीं आई, वह बुद्धिजीवियों ने खत्रोज निकाली। कांगरेस ने सेकुलर बुद्धिजीवियों पर शुरू से ही बड़ा भरोसा किया है। ये बुद्धिजीवी भी कांगरेस को कभी बिट्रे नहीं करते। ऊपर से अमेरिका है, वर्ल्ड बैंक है, आईएमएफ है, डब्ल्यूटीओ है चुनाव जीत लिया जाएगा। तभी प्रधानमंत्री ने कहा कि रामलीला मैदान की कार्रवाई अनिवार्य थी। द्रअसल, कांगेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी को जूता दिखाने वाले शख्स ने गलत सवाल पूछा कि कांगरेस विपक्ष नहीं चाहती है। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांगरेस केवल संघभाजपा को विपक्ष के रूप में रखना चाहती है। इससे उसके अनेक कारज सधते हैं। संघभाजपा के रहते सोनिया के सेवक और सेकुलर सिपाही कांगरेस के साथ रहते हैं। उससे कांगरेस को भाजपा के सत्ता में आने की स्थिति में नहीं आने देने में भरपूर सहायता मिलती है और अगर कुछ समय के लिए आ जाए तो उसकी नाक में दम किए रखा जा सकता है। इस छोटे कारज से बड़ा कारज सधता है कि नवउदारवाद के विरोध की राजनीति नहीं पनप पाती।
1857 से लेकर 1942 तक, क्रांतिकारियों से लेकर गांधीवादियों तक, देश की आजादी और गौरव के लिए लड़ने वालों में जो भी चूकें रही हों, कायरता नहीं थी; उन्होंने लालच के रोग से भी छुटकारा पा लिया होता था। बल्कि कायरता और लालच के जातीय रोग को काट कर ही वे सत्यागही अथवा/और क्रांतिकारी बनते थे। जो कायरता और लालच के रोग को पूरी तरह नहीं काट पाते थे, रास्ते में टूट जाते थे। गांधी की अहिंसा और क्रांतिकारियों की हिंसा भारत के कायरता और लालच के जातीय रोग को नहीं काट पाई। आजादी के संघर्ष के चलते वह अधूरा छूटा काम आजादी के बाद पूरा होना था। लेकिन आजादी के बाद न गांधी की चली, न क्रांतिकारियों की। हालांकि दोनों की विरासत के दावेदारों की कभी कमी नहीं रही। कारण जो भी रहे हों, फिलहाल वतन कायरों और लालचियों के हवाले है। हम अपने क्षेत्र की सच्चाई जानते हैं। भारत के उच्च शिक्षण संस्थान कायर और लालची बनाने के कारखाने बनते जा रहे हैं।
समर्थकों की बात हम नहीं कहते, हजारे, रामदेव और उनके सिपहसालार कायर और लालची हैं। अगर वे कायर नहीं होते तो अड़ कर जेल जाते, अपने घरों को नहीं। लेकिन जेल चले जाएंगे तो उनके व्यापार और प्रत्रोफेशन को कौन देख्त्रोगा? हजारे को अपनी मांग पूरी न होने के प्रतिरोध में फिर से अनशन नहीं, जेल भरने का आह्वान करना चाहिए। उन्होंने जंतरमंतर पर पिछले अनशन के अवसर पर साफ कहा था कि फलां तारीख तक मांग पूरी न होने की स्थिति में वे जेल भरो आंदोलन शुरू कर देंगे। उनके मुताबिक उनकी मांग पूरी नहीं हुई है। उस वचन का पालन उन्हें करना चाहिए।
जस्टिस राजेंद्र सच्चर अपने जीवन का एक वाकया बताते हैं। दिल्ली में नेपाली दूतावास के बाहर डॉ़ लोहिया के नेतृत्व में प्रदर्शन हो रहा था। पुलिस आई और प्रदर्शनकारियों को गाड़ी में च़ा कर ले जाने लगी। सच्चर साहब पीछे छूट जाते हैं और जेल जाने के लिए गाड़ी के पीछे भागते हैं। उन्हें खत्रींच कर पुलिस की गाड़ी में च़ा लिया जाता है तो चैन पड़ता है। आप जानते हैं लोहिया ने राजनीतिक कार्यकर्ताओकं को ‘वोट, फावड़ा और जेल’ का सूत्र दिया था। अन्याय के प्रतिरोध में बारबार जेल जाना समाजवादियों की पहचान बन गई थी। यही कारण था कि इमरजेंसी में अकेले समाजवादियों ने जेल की परवाह नहीं की। आजकल समाजवादी, जेल जाने की बात छोड़िए, थाना तक जाने की बात आते ही पीछे खिसकने लगते हैं। डरा हुआ व्यिक्त सत्यागरही नहीं हो सकता। भरष्टाचार या किसी भी मुद्दे अथवा समस्या पर आंदोलन करने वाले लोग अगर किसी विचारक, नेता अथवा कार्यप्रणाली का नाम लेते हैं तो कुछ न कुछ मयार्दा का पालन उन्हें करना चाहिए। बेहतर तो यह होगा, जैसा कि हमने मई अंक के ‘समय संवाद’ में कहा था, वे अपने काम और तरीके की जिम्मेदारी खुद ही लें। इससे कम से कम नई पीयिों में भरम नहीं फैलेगा।
अंत में कह सकते हैं कि उपनिवेशवादी दौर से प्रशासन और नीतियों की जड़ों में पैठा भरष्टाचार नवउदारवादी दौर में आसमान छू चुका है। आसार बन रहे हैं कि मानसून सत्र आने पर भरष्टाचार विरोध की ‘राजनीति’ आसमान पर जा पहुंचेगी। और उसके बाद सब शांत हो जाएगा। अगर गांधी होते तो कहते, हम भरष्टाचार करना छोड़ दें तो वह अपने आप मिट जाएगा। यानी भरष्टाचार पैदा करने वाली व्यवस्था से अपना समर्थन वापस ले लें। लेकिन भरष्टाचार को परवान च़ाने वाली नवउदारवादी व्यवस्था और उसकी नीतियों को कोई भी छोड़ना नहीं चाहता। भारत में नवउदारवादी व्यवस्था के ‘भगीरथ’ मनमोहन सिंह टीम हजारे और रामदेव दोनों के हीरो हैं। फिलहाल तो एक ही सूरत बचती नजर आती है। नवउदारवादी नीतियों से बदहाल देश की अधिकांश जनता, जनांदोलनकारियों और नागरिक समाज एक्टिविश्टों से अलग, खुद विचार और संघर्ष करे।


प्रेम सिंह
मोबाइल: 09873276726
समाप्त

2 टिप्‍पणियां:

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

ये सब फ़ालतू की भाग-दौड़ है। आमूल-चूल परिवर्तन की जगह ये लोग पैबंदकारी से काम ले रहे हैं।
आप क्या जानते हैं हिंदी ब्लॉगिंग की मेंढक शैली के बारे में ? Frogs online

Bhushan ने कहा…

गाँधी ने ताउम्र शराब के खिलाफ आवाज़ उठाई. इसे न सरकार ने माना न पब्लिक ने. अन्ना टीम को अपना आकलन करने का हक़ है और हमें भी इनका आकलन करने का अधिकार है. इनका तथाकथित जन आंदोलन अख़बारी ख्यालों का अस्थाई उभार था. इन्हें जनभावनाओं के साथ प्रयोग करने के बजाय अपने गिरहबान में देखना चाहिए. जनता सब जानती है.