बुधवार, 17 अक्तूबर 2012

धर्मनिरपेक्षता: वोट आधारित या मूल्य आधारित?




हमारे देश   में आर्थिक सुधार कदाचित सबसे अधिक चर्चित विषय है। परंतु इससे शायद थोड़े ही पीछे या इसके बराबरी पर है धर्मनिरपेक्षता। जब मैं  में कहीं भी जाता हूं मुझसे या तो धर्मनिरपेक्षता के भविष्य पर बोलने को कहा जाता है या धर्मनिरपेक्षता के समक्ष उपस्थित चुनौतियों पर या फिर धर्मनिरपेक्षता के अर्थ पर। कश्मीर  से लेकर कन्याकुमारी तक और गुजरात से लेकर उड़ीसा तक मैंने पाया है कि धर्मनिरपेक्षता में आस्था रखने वाला तबका  इसके भविष्य के प्रति गंभीर रूप से चिंतित है। धर्मनिरपेक्षता के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को न तो हल्के में लिया जा सकता है और न ही लिया जाना चाहिए।
अभी हाल में मैंने पटना के ए. एन. सिन्हा इंस्ट्ीटयूट में ‘धर्मनिरपेक्षता को चुनौतियां‘ विषय पर व्याख्यान दिया। मेरे बाद दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विस्वविद्यालय से आए एक राजनीतिविज्ञानी ने भाषण दिया। उन्होंने कहा कि भारत संसदीय प्रजातंत्र के ढांचे के अंतर्गत पूंजीवादी विकास की राह पर चल रहा है। यह बदलाव का दौर है और इस दौर में कई तरह की विरोधाभासी प्रवृत्तियां उभरना स्वाभाविक है। कभी-कभी ऐसा लग सकता है कि साम्प्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता पर भारी पड़ रही है परन्तु अंततः धर्मनिरपेक्षता की विजय सुनिष्चित है। इस तर्क में कुछ सच्चाई है।
उनके अनुसार पूंजीवाद का संबंध केवल बाजार और उत्पादित वस्तुओं की बिक्री से होता है। पूंजीवाद का किसी धार्मिक या नस्लीय समूह से कोई लेना-देना नहीं होता। यह सच है कि बाजार को इससे कोई मतलब नहीं रहता कि खरीददार हिन्दू है या मुसलमान, असमिया है या बंगाली। परंतु यह केवल तब तक सही है जब तक कि आर्थिक विकास, मानवीय वैचारिक हस्तक्षेप के बिना हो रहा हो। परंतु हम जानते हैं कि असल में ऐसा होता नहीं है। व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक, धर्मनिरपेक्षता के विरोध में षक्तिषाली वैचारिक हस्तक्षेप होता रहता है। यह परिवार में होता है, स्कूलों और कालेजों में होता है और सामाजिक-राजनैतिक दुनिया में भी होता है।
इस वैचारिक हस्तक्षेप में कई कारणों से वृद्धि हुई है। इनमें से एक महत्वपूर्ण कारण है राजनीति। हम सब जानते हैं कि हिन्दुत्व की विचारधारा में यकीन रखने वाला एक राजनैतिक दल, जोकि सन् 1950 के दशक में 4 प्रतिषत मत पाने के लिए भी तरसता था, 1990 के दषक के अंत तक 29 प्रतिषत मत पाने की स्थिति में आ गया। यह सही है कि इस दल की ताकत में बढ़ोत्तरी का सिलसिला रूक गया है परंतु ऐसा सिर्फ राजनैतिक अर्थ मंे हुआ है। इस दल की विचारधारा को आज भी व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त है। इस विरोधाभास को स्पष्ट करना आवष्यक है।
कोई व्यक्ति किस पार्टी या व्यक्ति को मत देता है इसका निर्धारण कई कारकों से होता है। इनमें षामिल हैं जाति, धर्म, भाषा, विचारधारा आदि और अक्सर एक ही व्यक्ति अलग-अलग चुनावों में अलग-अलग दलों का समर्थन करता है। परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि मतदाता अधिक या कम धर्मनिरपेक्ष हो जाता है। चुनाव में उसकी पसंद बदलने के बावजूद उसकी धर्मनिरपेक्षता पर कोई असर नहीं पड़ता। धर्मनिरपेक्षता में विष्वास करने वाले केवल चन्द लोग ही विचारधारात्मक कारणों से धर्मनिरपेक्ष दलों या व्यक्तियों का समर्थन करते हैं। धार्मिक अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी व समाज के अन्य वंचित वर्ग भी धर्मनिरपेक्ष दलों का साथ देते हैं परंतु इसके पीछे विचारधारा इकम और उनकी सुरक्षा और आर्थिक उन्नति की चाहत अधिक होती है।
प्रष्न यह है कि धर्मनिरपेक्ष विचारधारा से हमारा क्या आषय है? पष्चिमी  के विपरीत भारत में धर्मनिरपेक्ष विचारधारा का विरूद्धार्थी धार्मिक विचारधारा नहीं है और न ही धर्मनिरपेक्ष का विरूद्धार्थी धार्मिक है। भारत में धर्मनिरपेक्षता का विरूद्धार्थी है साम्प्रदायिकता। अर्थात, बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय या समुदायांे ंपर राजनैतिक और आर्थिक प्रभुत्व स्थापित करना या बहुसंख्यक समुदाय की ऊँची जातियों द्वारा दलितों व अन्य कमजोर वर्गों पर अपना प्रभुत्व कायम रखना और उन्हें राजनैतिक सत्ता और आर्थिक विकास में उनका वाजिब हक पाने से रोकना। 
अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए बहुसंख्यक समुदाय की ऊँची जातियों के सदस्य समय-समय पर हिंसा करते रहते हैं और इसी कारण साम्प्रदायिक दंगे होते हैं। इस हिंसा से धार्मिक अल्पसंख्यकों और नीची जातियों के मन में घोर असुरक्षा का भाव घर कर जाता है। हिंसा का इस्तेमाल इन वर्गों को ‘ठीक करने‘ के लिए किया जाता है। बहुसंख्यक समुदाय के प्रभुत्व को औचित्यपूर्ण और स्वाभाविक बताने के लिए ऐसे मिथक फैलाए जाते हैं जिनमें बहुसंख्यक समुदाय को नायक व अल्पसंख्यक समुदायों और नीची जातियों को खलनायक सिद्ध जाता है।
हमें यह ध्यान में रखना होगा कि इन मिथकों की विष्वसनीयता तब तक कायम नहीं हो सकती जब तक कि देष में एक विषिष्ट सामाजिक-धार्मिक संस्कृति का प्रसार न हो। इस संस्कृति के निर्माण के लिए षैक्षणिक औ सांस्कृतिक संस्थाओं का इस्तेमाल किया जाता है। अगर हमें धर्मनिरपेक्ष विचारधारा को मजबूत करना है तो हमें धर्मनिरपेक्ष संस्कृति की नींव तैयार करनी होगी। परंतु हमारे देष में इस संस्कृति का घोर अभाव है। सरकारी संस्थानों में, जिन्हें पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए, धार्मिक माहौल रहता है। सरकारी कार्यालयों में कई धार्मिक उत्सव मनाए जाते हैं। कई षासकीय कार्यालयों के परिसर में मंदिर हैं। देवी-देवताओं के चित्र अनेक कार्यालयों की दीवारों पर टंगे देखे जा सकते हैं। बैंकों और यहां तक कि पुलिस थानों में यह बहुत सामान्य है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि हर व्यक्ति अपने धर्म का पालन करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है। उस पर किसी तरह की कोई रोक नहीं लगाई जा सकती। परंतु सरकारी संस्थानों में धार्मिकता का खुलेआम प्रदर्षन अगर धर्मनिरपेक्षता-विरोधी नहीं तो कम से कम गैर-धर्मनिरपेक्ष तो है ही। हमारी षिक्षा व्यवस्था भी ऐसी है जो साम्प्रदायिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देती है और महिलाओं को निचले पायदान पर रखना सिखाती है। हमारी पाठ्यपुस्तकें दलितों के खिलाफ वातावरण भी बनाती हैं। आरएसएस द्वारा संचालित षिषु मंदिरों मंे तो धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों व महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रहों को बच्चों के दिलों में बैठाने का काम खुलकर और बहुत बड़े पैमाने पर होता है। इन स्कूलों से हर वर्ष हजारों बच्चे पढ़कर निकलते हैं।
यही बच्चे अंततः सरकारी रोजगार पाते हैं। वे पुलिसकर्मी बनते हैं, षिक्षक बनते हैं और निचले स्तर के सरकारी अधिकारी भी बनते हैं। वे कानून और व्यवस्था संभालते हैं, स्कूलों मंे पढ़ाते हंै और विभिन्न सरकारी योजनाओं को लागू करते हैं। मैंने पुलिसकर्मियों की अनेक कार्यषालाएं आयोजित की हैं और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि निचले पदों पर कार्यरत पुलिसकर्मी घोर साम्प्रदायिक हैं। स्पष्टतः, अगर हम हमारे स्कूली पाठ्यक्रमों का रचनात्मक पुनरावलोकन करें तो हम धर्मनिरपेक्षता को एक मजबूत सामाजिक आधार दे सकते हैं। परंतु दुर्भाग्यवष, पाठ्यपुस्तकंे लिखने वाले तक साम्प्रदायिक विचारधारा से ग्रस्त रहते हैं और इसी संस्कृति को समाज में फैलाते हैं।
समानता, मानवीय गरिमा और लैंगिक बराबरी-धर्मनिरपेक्ष संस्कृति के आवष्यक अंग हंै। हमारी स्कूली पाठ्यपुस्तकों में इन मूल्यों पर जोर देना तो दूर रहा उनकी चर्चा तक नहीं होती। हमारे संवैधानिक मूल्यों और प्रावधानों के बाद भी भारतीय समाज में आज भी ऊँचनीच और भेदभाव का बोलबाला है। जवाहरलाल नेहरू, षिक्षा व्यवस्था के जरिए देष में वैज्ञानिक सोच का विकास करना चाहते थे परंतु हमारी षिक्षा व्यवस्था तो संकीर्ण मानसिकता की वाहक बनकर रह गई है।
बच्चों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने के लिए षायद ही कोई प्रयास हुए हों। यह काम आसान नहीं है, विषेषकर छोटे षहरों और गांवों में। परंतु बड़े षहरों के प्रतिष्ठित स्कूलों तक में इस दिषा में कुछ नहीं किया गया है। इन स्कूलों में अधिकांषतः सामाजिक-आर्थिक उच्च और मध्यम वर्गों के बच्चे पढ़ते हैं और इन स्कूलों का एकमात्र उद्धेष्य इन बच्चों को ऐसे व्यावसासिक पाठ्यक्रमों में प्रवेष के लिए तैयार करना होेता है, जिनसे वे अधिक से अधिक पैसा कमा सकें। विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों व वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने का कोई प्रयास इन मंहगे व प्रतिष्ठित स्कूलों तक में नहीं किया जाता है।
इस प्रकार, दकियानूसीपन और धार्मिक संकीर्णता से भरे वातावरण और कमजोर सांस्कृतिक आधार के चलते हम यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि भारत में धर्मनिरपेक्ष संस्कृति कभी भी पल्लिवत-पुष्पित हो सकेगी। पहले से ही खराब स्थिति को और बर्बाद करते हैं हमारे राजनेता, जो चुनाव जीतने के लिए कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं। वे जाति, धर्म, भाषा और अन्य संकीर्ण पहचानों के आधार पर वोट मांगते हैं और समाज की विघटनकारी ताकतों को मजबूती देते हैं। आज की राजनीति मुख्यतः पहचान की राजनीति बनकर रह गई है।
इस पहचान का उपयोग अपने राजनैतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए करने वाले राजनेताओं के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे उन विभिन्न जाति व धर्म आधारित उत्सवों और कार्यक्रमों मंे भाग लें, जोे दिन-प्रतिदिन बड़े, और बड़े पैमाने पर आयोजित किए जा रहे हैं। स्वाभाविकतः बहुसंख्यक समुदाय के धार्मिक त्यौहारों को सबसे ज्यादा महत्व मिलता है। हर राजनैतिक दल और नेता ऐसे मौकों पर बड़े-बड़े होर्डिग और मंडप लगाता है। रमजान के दौरान राजनैतिक नेताओं और दलों में इफ्तार पार्टियां देने की होड़ सी लग जाती है।
सन् 1999 के चुनाव के पहले भाजपा और कांग्रेस में इफ्तार पार्टियों को लेकर जबरदस्त प्रतिस्पर्धा थी। दोनों दल अपनी-अपनी इफ्तार पार्टियों को दूसरेे से बड़ी और षानदार बनाने की होड़ में लगी हुई थीं। यहां तक कि रोजा अफ्तार पार्टी में कौन से व्यंजन परोसे जाएंगे यह गुप्त रखा जाता था ताकि दूसरा दल कहीं उसकी नकल न कर ले। रोजा इफ्तार पार्टियों का एकमात्र उद्धेष्य वोट कबाड़ना है। इस तरह, हमारे राजनेता यदि धर्मनिरपेक्षता का प्रदर्षन करते भी हैं तो भी उसका उद्धेष्य केवल राजनैतिक लाभ कमाना होता है। हम कह सकते हैं कि हमारी धर्मनिरपेक्षता मूल्य-आधारित नहीं वरन् वोट-आधारित है।
हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण है हमारा संविधान और उसमंे निहित मूल्य। परंतु हमारे राजनेता और उनके समर्थक संवैधानिक मूल्यों और प्रावधानों का मखौल बनाने में जरा भी संकोच नहीं करते, बषर्ते उससे उनका राजनैतिक लक्ष्य सध रहा हो। संकीर्ण पहचानों के आधार पर समर्थन या मत मांगना भी अंसवैधानिक है परंतु जैसा कि पहले कहा जा चुका है, हमारे लगभग सभी राजनेता संकीर्ण पहचानों के आधार पर ही वोट मांगते हैं और चुने जाते हैं।
यह सही है कि मुसलमान और कुछ अन्य समुदाय और जातियां षैक्षणिक और आर्थिक उन्नति की दौड़ में पीछे छूट गई हैं। परंतु इन समुदायों की भलाई के लिए चुनाव के ठीक पहले योजनाओं की घोषणा करना भी असंवैधानिक कहा जाएगा। इससे भाजपा और अन्य साम्प्रदायिक दलों को यह कहने का मौका भी मिल जाता है कि अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण किया जा रहा है। चुनाव के पहले इन समुदायों की भलाई के लिए लंबी-चैड़ी घोषणाएं करने की बजाए सरकारांें को यह कोषिष करनी चाहिए कि आरक्षण व अन्य सकारात्मक कदमों के जरिए ये समुदाय स्वयं ही पिछड़ेपन से बाहर आएं। धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दलों को भारत की स्वतंत्रता के बाद से ही इस दिषा में कोषिष करनी चाहिए थी। अगर ऐसा किया गया होता तो अब तक अल्पसंख्यकों का षैक्षणिक और आर्थिक स्तर इतना बढ़ चुका होता कि न तो उनको बरगलाया जाना संभव होता और न ही उनका हौव्वा बनाकर वोट लेना।
मूल्य आधारित धर्मनिरपेक्षता और मत आधारित धर्मनिरपेक्षता में जमीन-आसमान का फर्क है और अब समय आ गया है कि हम मूल्य आधारित धर्मनिरपेक्षता को अपनाएं।
 
-डा असगर अली इंजीनियर

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