शनिवार, 22 दिसंबर 2012

गैंग रेप : सभी न्यायशास्त्री हो गए

दिल्ली में गैंग रेप की घटना के बाद जन आक्रोश फुट पड़ा है। पुलिस ने अभियुक्तों को गिरफ्तार कर लिया है। जनता के चेतन्य शील तबके के लोग फांसी की सजा की मांग कर रहे हैं। कुछ लोग तरह-तरह के दंड देने की बात कर रहे हैं। मौजूदा कानून को बदलने की भी बात चल रही है। देश बहुत बड़ा है। दिल्ली तक ही सीमित नहीं है। देश में तरह-तरह के लोग रहते हैं। एक थाने में लगभग 200 बलात्कार के प्रार्थना पत्र पेंडिंग हैं। इस क्षेत्र में विरोधियों के ऊपर बलात्कार के मुक़दमे दर्ज कराने का रिवाज है। किसी विरोधी को लोग कायदे से ठीक करना चाहते हैं तो कोई औरत खड़ी कर बलात्कार का मुकदमा दर्ज करा देते हैं। यदि सभी लिख लिए जाए तो 200 अगले दिन फिर आ जायेंगे। इसकी रोकथाम कैसे करोगे। न्याय के कुछ सिद्धांत हैं उनको बने रहने दो। तभी देश चलेगा। हर आदमी दंड देने का अधिकारी अगर हो जायेगा तो कुछ नहीं बचेगा। आज एक घटना को लेकर जन उभार मौजूद है लेकिन देश के अन्दर सोनी आदिवासी महिला के साथ जो हुआ उसके लिए कोई कुछ नहीं बोला। माननीय उच्चतम न्यायलय की जानकारी में सोनी का सम्पूर्ण प्रकरण है। अभी तक कोई कार्यवाई विशेष नहीं हुई है। सम्बंधित पुलिस अधिकारी को सरकार से इनाम मिल चूका है। मणिपुर में भारतीय सेना के बलात्कारों से ऊब कर महिलाओं का नग्न प्रदर्शन तक हो चुका  है। दिल्ली गैंग रेप के मामले में सम्बंधित बस क्या उस वक्त यात्रियों को ले जाने के लिए अधिकृत थी ? बस का परमिट कहीं का बनता है और बस चलती कहीं और है। दिल्ली में पुलिस और प्रशासन की मेहेरबानी से अनाधिकृत वाहन चलते रहते हैं। जनता उसमें सफ़र करती रहती है। मीडिया को कुछ लोगों का प्रदर्शन तहरीर चौक का प्रदर्शन लगने लगता है और लाखों लोगो का प्रदर्शन जब होता है तब उसके बारे में एक लाइन भी नहीं लिखी जाती है। प्रदर्शनकारी क्या यह चाहते हैं कि अभियुक्तों को उनको सौप दिया जाए और वह सजा देंगे। अन्ना केजरीवाल के आन्दोलन के बाद कुछ लोगों की समझ में यह गलतफ़हमी हो गयी है कि वह पूरे देश का प्रतिनिधित्व करते है। दंड की मात्रा कितनी हो उसके भी सिद्धांत हैं और उन्ही सिद्धांतो पर कार्य होना चाहिए। फांसी की सजा अंतर्गत धारा 376 आई पी सी में बढ़ा देने से क्या बलात्कार रुक जायेंगे। प्रदर्शनकारियों को भी ईसा की कहानी याद रखनी चाहिए की जिसमे एक औरत पर छिनारा का आरोप था। उस समय सजा यह थी कि  उस औरत को पत्थरों से पीट कर मार डाला जाए। ईशा ने कहा पहला पत्थर वह व्यक्ति मारे जिसने मन से, वचन से, कर्म से, इस काम के बारे में न सोचा हो। किसी ने भी एक पत्थर नहीं मारा और भीड़ चली गयी। नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज नहीं जाती है। समाज की स्तिथियाँ क्या हैं उसके बारे में भी सोच समझ कर बात करनी चाहिए।

सुमन 

1 टिप्पणी:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

आपने बहुत सही लिखा कि,,,,दंड की मात्रा कितनी हो उसके भी सिद्धांत हैं और उन्ही सिद्धांतो पर कार्य होना चाहिए। फांसी की सजा अंतर्गत धारा 376 आई पी सी में बढ़ा देने से क्या बलात्कार रुक जायेगें,,,

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