शुक्रवार, 13 जून 2014

जियाउलहक़ के निजामे मुस्तफा से हिन्दू राष्ट्र तक

 नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश में पहली बार भाजपा ने पूर्ण बहुमत प्राप्त कर लिया है। हिन्दुत्ववादी शक्तियों को ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे बरसों का उनका सपना अब साकार हुआ है, लेकिन इसके क्या नतीजे देश को भोगने होंगे यह भविष्य के गर्भ मेें छुपा है।
    स्वतंत्रता संग्राम के लम्बे संघर्ष के उपरान्त जब यह तय हो गया था कि अब देश आजाद होने वाला है तो उसी समय से हिन्दुत्ववादी शक्तियों ने एक सपना देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने का अपनी आँखों में सँजोया था। उनके प्रयासों को बल दिया मुस्लिम कट्टर पंथी शक्तियों ने और दोनों का सहारा बने देश से रुसवा होकर जाते अंग्रेज, जिनके आखिरी वायसराय लार्ड माउन्टबैटन ने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को देश के दो प्रांतों क्रमशः पंजाब व बंगाल के विभाजन के लिए राजी कर लिया था।
       इस विभाजन से देश व हिन्दू मुसलमानों को क्या नुकसान हुआ यह बात आज किसी से छुपी नहीं है। विभाजन तो हुआ देश के मात्र दो प्रांतों का लेकिन हिन्दु एवं मुसलमानों के पलायन का सिलसिला चल पड़ा पूरे देश से। इस पलायन को रोकने के बजाए दोनों देशों की हुकूमतों ने और सहयोग यों दिया कि सरकारी विभागों में कार्यरत कर्मचारियों को देश बदलने का खुला अवसर एवं सहयोग बाकायदा उनकी लिखित इच्छा के अनुसार एक प्रारूप भराकर ली गई। देश के विभाजन एवं आबादी के पलायन के दुष्परिणाम आज तक दोनों समुदाय के लोग आपसी नफरत के रूप में नस्ल दर नस्ल भुगतते चले आ रहे हैं। जो मुसलमान यहाँ से पाकिस्तान गए उनकी सम्पत्तियाँ पहले निष्क्रान्त एवं बाद में शत्रु सम्पत्ति एक्ट के अन्तर्गत सरकारी तौर पर अधिगृहीत कर ली गईं। परिणाम उनके परिवारीजनों को दोनों देशों में भुगतने पड़े। चंद दिनों के भीतर दोनों कौमों के लोग बेवतन हो गए। संसार के इतिहास में इतनी बड़ी आबादी का खूनी पलायन शायद ही इससे पूर्व कभी हुआ हो और आगे शायद ही कभी फिर हो।
    इस पलायन को रोकने का प्रयास दोनों देशों में से किसी राजनेता ने उस समय नहीं किया। इंसानियत सरेआम जख्मी होती रही। गृहस्तियाँ उजड़ती रहीं लेकिन उस समय के वे नेता जो अंग्रेजों से लम्बी लड़ाई लड़ते-लड़ते शायद थक से गए थे अपनों से लड़ाई लड़ने के लिए आगे न बढ़ सके और बेबस होकर देश की अस्मिता और उसकी अखण्डता को तार-तार होते देखते रहे। ना लौह पुरूष आगे बढ़े और न महात्मा गांधी, न खान अब्दुल गफ्फार खां उर्फ सरहदी गांधी अपने मुजाहिदाना तेवर दिखला पाए और न कायदे आजम मुहम्मद अली जिन्ना की कूटनीति कुछ काम आई, केवल एक कमजोर जिस्म से मजबूत व जोशीली आवाज जामा मस्जिद की सीढि़यों से बुलन्द हुई ओर उस आवाज ने अपने मादरे वतन को छोड़कर जाते हुए मुसलमानों के कदमों को न सिर्फ रोक दिया बल्कि मुल्क के लिए समर्पण का ऐसा जज्बा उनमें पैदा कर दिया कि हजारों की तादाद में साम्प्रदायिक दंगों का दंश झेलने के बावजूद फिर कभी उनके दिलों में तर्के वतन का खयाल तक नहीं आया। एक लेख में प्रसिद्ध कहानी कार व हिन्दी उर्दू साहित्य के प्रख्यात विद्वान राही मासूम रजा ने लिखा है कि जब उन्होंने रामायण के संवाद लिखे और टी0वी0 सीरियल में उनके संवादों की चर्चा देश व विदेशों में बढ़ी तो दिल्ली में भाजपाइयों द्वारा एक प्रोग्राम का आयोजन उनके सम्मान में किया गया। उस आयोजन में तमाम लोगों ने उनकी शान में प्रशंसा के कसीदे पढ़े, उनका खूब महिमा मंडन हुआ। शाम को लाल कृष्ण आडवाणी ने उनके सम्मान में अपने घर पर एक भोज का आयोजन किया। वहाँ चंद लोगों की मौजूदगी में राही मासूम रजा ने एक सवाल लाल कृष्ण आडवाणी से यह किया कि देश में अब तक कितनी संख्या में साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं। आडवाणी ने जवाब दिया कि कई हजार तो जरूर हो चुके हैं। राही मासूम रजा ने दूसरा सवाल आडवाणी से किया कि जब वह पाकिस्तान में थे तो कितने दंगे वहाँ उन्होंने देखे थे। आडवाणी जी ने कहा कि उनके सामने तो मात्र एक दंगा हुआ था उसके बाद वह अपना वतन छोड़कर भारत आ गए थे। इस पर राही मासूम रजा ने चुटकी लेते हुए कहा आडवाणी जी आप जैसे तमाम लोग बराबर भारतीय मुसलमानों की देश भक्ति और वफादारी पर सवालिया निशान खड़ा करते रहते हंै। भारतीय मुसलमान इतने दंगे भारत में झेलने के बाद भी कभी अपना वतन छोड़ने की बात नहीं सोचता जबकि आडवाणी जी आप एक दंगा नहीं बर्दाश्त कर सके और अपनी मातृभूमि छोड़कर यहाँ आ गए।
    राही मासूम रजा की बात आज भी सच साबित हो रही है। चाहे मुजफ्फरनगर का हाल का दंगा हो या गोधरा व अहमदाबाद (गुजरात) का 2002 का दंगा। चाहे 1993 का महाराष्ट्र दंगा हो या हाशिमपुरा मालियाना मेरठ, भागलपुर व जमशेदपुर के दंगे, मुसलमान जानी व माली नुकसान उठाने के बावजूद भी उन्हीं दंगा प्रभावित क्षेत्रों में फिर से तिनका तिनका जोड़कर अपना आशियाना बनाने में जुटा रहा।
    मौलाना आजाद के प्रयासों से जब मुसलमानों के पलायन का सिलसिला रुका तो सबसे अधिक पीड़ा हिन्दू कट्टर पंथियों को हुई। उनके अरमान पूरे नहीं हो सके। दो कौमी नजरिए की जो योजना अंग्रेजों ने देश से जाते-जाते बनाई थी, वह अधूरी रह गई। दूसरी ओर जब मुहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान असेम्बली को संबोधित करते हुए यह एलान कर दिया कि पाकिस्तान एक
धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र रहेगा धार्मिक स्टेट नहीं। भारत के संविधान में भी 1950 में यही घोष्णा की गई कि देश का स्वरूप धर्मनिरपेक्षता पर
आधारित होगा। उसका कोई धर्म नहीं होगा। सारे नागरिकों को एक समान अधिकार व अवसर प्राप्त रहेंगे।
        परन्तु दोनों ही मुल्क अपने संविधान पर नहीं चले। जिन्ना के देहान्त के बाद पाकिस्तान अमरीका की गोद में जा बैठा, जिसने उसे धार्मिक स्टेट बनाने की ओर सदैव प्रेरित किया। पाकिस्तानी अवाम सदैव लोकतंत्र से वंचित रहा। नागरिक अधिकारों को वे तरसते रहे। अधिकांशतः एक धर्म से संबंधित होने के बावजूद क्षेत्रीय पक्षपात का शिकार रहे।
    परिणाम स्वरूप आजादी के 24 वर्ष बाद ही क्षेत्रवाद की साम्प्रदायिकता के चलते पाकिस्तान दो भागों में तकसीम हो गया और दो कौमी नजरिए को एक बार फिर जबरदस्त आघात पहुँचा। अपना एक बाजू कट जाने के बाद विकलांग पाकिस्तान को आर्थिक, औद्योगिक विकास तथा समाजवाद व लोकतंत्र के मार्ग पर जैसे ही ले जाने का प्रयास जुल्फिकार अली भुट्ठो ने शुरू किया अमरीका व अन्य पूँजीवादी राष्ट्रों को अपनी दुकान पाकिस्तान में बंद होती नजर आने लगी। सो उन्होंने धार्मिक कट्टरपंथियों को आगे बढ़ाने का काम शुरू कर दिया और परिणाम स्वरूप थलसेना अध्यक्ष जनरल जियाउल हक ने पाकिस्तान को
धार्मिक स्टेट बनाने का एलान कर निजामे मुस्तफा कायम करना शुरू कर दिया। लोक तांत्रिक शक्तियों ने जब इसका विरोध किया तो जनरल जियाउल हक ने सैन्य बल का प्रयोग कर उसे दबाते हुए मार्शल ला लगा दिया और पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को जेल की सलाखों के पीछे डालकर फर्जी आरोप उनके ऊपर मढ़ते हुए मुकदमा चलाया और 4 अप्रैल 1979 को उन्हें फाँसी के तख्ते पर लटका दिया।
    निजामे मुस्तफा कायम करने के जनरल जियाउल हक के पूरे प्रयासों के पीछे अमरीकी बराबर के शरीक रहे। इसका प्रभाव अफगानिस्तान पर पड़ना शुरू हुआ जहाँ उस समय सोवियत यूनियन समर्थित हुकूमत थी। कम्युनिस्टों को काफिर कहकर अफगानिस्तान को आजाद कराने का जेहाद अमरीका ने शुरू कराया। जनरल जियाउल हक ने अमरीका की इस कमजोरी का फायदा उठाकर पाकिस्तान के लिए आधुनिकतम हथियार प्राप्त कर लिए। नतीजे में भारत को भी अपने रक्षा बजट में बढ़ोत्तरी करनी पड़ी। अफगानिस्तान में खोते अपने वर्चस्व व सी0आई0ए0 की गतिविधियों के कारण आक्रोशित होकर सोवियत यूनियन ने वर्ष 1980 में अफगानिस्तान में अपनी सेना उतार दी। अमरीका यही चाहता था कि वह पठानों की सिरफिरी एवं जंगजू कौम से उसे युद्ध क्षेत्र में उसी प्रकार फंसा दे जिस प्रकार उसे वियतनाम युद्ध में सोवियत यूनियन ने फाँसा था।
    सोवियत अफगान युद्ध लगभग एक दशक तक चला अन्ततः विफल एवं विवश होकर सोवियत सेनाएँ अफगानिस्तान से वापस चली र्गइं, इसका दुष्परिणाम सोवियत यूनियन के आत्मबल पर इस दर्जा पड़ा कि वह टूट कर 1991 में बिखर गया। उधर अमरीका को निरन्तर ब्लैकमेल करते चले आ रहे जनरल जियाउल हक को एक विमान दुर्घटनाग्रस्त कराकर सी0आई0ए0 ने अमरीका को राहत तो दे दी, लेकिन तालिबान से वह निजात हासिल न कर सका। अमरीकी अस्त्र-शस्त्रों से लैस तालिबान और अमरीकी पूँजी से पनपे मुस्लिम कट्टरपंथी पूरे क्षेत्र के लिए आतंक का पर्याय बन गए, जिसको बड़ी चुतराई से अमरीका ने भारत की ओर और विशेष तौर पर कश्मीर की ओर मोड़कर भारत में अपने अपेक्षित लक्ष्य की प्राप्ति प्रारम्भ कर दी।
      पाकिस्तान में 80 के दशक में तालिबान व मुस्लिम कट्टरपंथियों की जमात खड़ी करने के पश्चात भारत में हिन्दुत्व उग्रवाद को बढ़ावा देने का काम भी अमरीका ने शुरू कर दिया। इससे पूर्व वह खालिस्तानी उग्रवाद को जनरल जियाउल हक से बढ़वा कर उनके आतंक का शिकार इन्दिरा गांधी को बना चुका था। बाद में राजीव गांधी को तमिल उग्रवादियों को मुकाबले में उतार कर उनकी हत्या भी अमरीकी सी0आई0ए0 ने करवाकर भारत में अपने मजबूत कदम जमाने का रास्ता साफ कर लिया था।
    अपने दिग्गज नेताओं को खो चुकी कांग्रेस के बीच से सी0आई0ए0 ने नरसिम्हा राव व मनमोहन सिंह को सत्ता में बैठाकर नेहरू, इन्दिरा की समाजवाद की नीतियों को दफन कर आर्थिक उदारीकरण एवं बाजारवाद की संस्कृति से देश की जनता को रूबरू कराया। साथ ही इलेक्ट्रानिक मीडिया के सहारे अपने नापाक मंसूबों को अमली जामा पहनाने की योजना पर कार्य प्रारम्भ कर दिया। 1991 से शुरू हुए इस सफर के लक्ष्य को 2014 में पहली बार हिन्दुत्ववादी शक्तियों को सत्ता में बैठाकर अमरीका तथा पूँजीपतियों ने देश में मौजूद साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ मिलकर पूरा कर लिया।
       तथाकथित निज़ामे मुस्तफा से पाकिस्तान की बर्बादी का सफर लगभग तीन दशक का रहा। अब देखना यह है कि हिन्दू राष्ट्र से भारत की बर्बादी का सफर कितने समय में पूरा होता है। सोचने वाली बात यह हे कि 99 प्रतिशत एक धर्म की आबादी वाले पाकिस्तान में जब निजामे मुस्तफा कामयाब न हो सका तो 80 प्रतिशत हिन्दू धर्म की आबादी वाले भारत में हिन्दू राष्ट्र क्या गुल खिलाएगा?
        -तारिक खान   
          मो0 09455804309
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

1 टिप्पणी:

अंकित कुमार हिन्दू ने कहा…

ऐसा शर्मनिरपेक्ष रोग हिन्दुओं को ही क्यों होता हिअ ?