शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2015

गाय न गंगा

 संघ की नागपुरी प्रयोगशाला का कोई सम्बन्ध गाय की भलाई से नहीं है और न ही गंगा से कोई मतलब है. गाय और गंगा का यह प्रयोग अपने राजनीतिक मुखौटे के वोट बैंक को बढाने के लिए करते हैं. मांसाहार का विरोध इनकी योजना का प्रमुख अंग होता है लेकिन मुनाफे के लिए इनके नेतागण बराबर इस व्यापार में शामिल होते रहते हैं. गेरुआ चोला ओढ़कर यह सारे पाप करना चाहते हैं. अभी हाल में यह खुलासा हुआ है कि बीजेपी के फायरब्रांड नेता संगीत सोम और उनके दो साथियों ने 2009 में अलीगढ़ में मीट प्रोसेसिंग यूनिट के लिए जमीन खरीदी थी। इस बात का खुलासा हिंदुस्तान टाइम्स द्वारा रजिस्ट्री संबंधी दस्तावेजों की पड़ताल में हुआ। दस्तावेज बताते हैं कि अल दुआ फूड प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड नाम की इस कंपनी में सोम भी एक डायरेक्टर हैं।मीट यूनिट की  यह फैक्ट्री 'हलाल मीट का उत्पादन करने वाली बड़ी यूनिट्स' में से एक है और बेहतरीन गुणवत्ता वाला भैंस, भेड़ और बकरे का मांस उपलब्ध कराती है।
 सोम के अलावा मुइनुद्दीन कुरैशी और योगेश रावत नाम के दो लोग जमीन के इस सौदे में शामिल हैं और कंपनी के डायरेक्टर हैं। 
देवधर संघी पत्रकार ने यह स्वीकार किया है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत समेत प्रमुख प्रचारक मांसाहार करते रहे हैं. उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष रहे व पूर्व सांसद सत्यदेव सिंह के ऊपर उन्ही के नेतागण आरोप लगाते थे कि उनकी ट्रक्स गोवंशीय जानवरों को कलकत्ता स्लॉटर हाउस लेकर जाती हैं. इस तरह से संघ व भाजपा के लोग मांस व्यापार में हो रहजे मुनाफे को हासिल करने के लिए तथा राजनीतिक लाभ के लिए हिंदी बेल्ट में जनता की भावनाओ को भड़काते रहते हैं लेकिन वह कभी नहीं चाहते हैं कि गौ वंशीय पशुओं की हत्या रोकी जाए. मुनाफा तथा वोटों का रोजगार गाय व मांसाहार से चलता रहे, इसी के लिए वह सदैव कार्य करने के लिए तत्पर रहते हैं. एखलाक को गौ मांस के अफवाह पर यह लोग पिटवा कर मार डालते हैं लेकिन दूसरी तरफ किरण रिजिजू मोदी सरकार के मंत्री हैं वह मांस भक्षण करते हैं तो गंगा स्नान का पुन्य देश को मिलता है.
गोमांस पर प्रतिबंध की मांग कर रहे लोगों को यह कड़वी सचाई पचाने में मुश्किल हो सकती है कि पशुओं को सिर्फ गोमांस खाने वालों के लिए नहीं मारा जाता, बल्कि दवा उद्योग की जरूरतों के लिए भी ऐसा किया जाता है। दवाओं के कैप्सूल, विटामिन की दवाओं और चिकन के चारे में इस्तेमाल होने वाले जेलेटिन को जानवर की हड्डियों और चमड़े की प्रोसेसिंग से बनाया जाता है। एक फार्मा कंपनी के सीनियर ऐग्जिक्युटिव ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, 'किसी न किसी रूप में हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में गोमांस कन्ज्यूम करते ही हैं।'इंडिया में ज्यादातर जेलेटिन मेकर्स का कहना है कि वे इसे बनाने में भैंस की हड्डियों का उपयोग करते हैं, लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा में गोवध विरोधी कानूनों को देखते हुए कंपनियों को आने वाले दिनों में परेशान किए जाने का डर सता रहा है। http://navbharattimes.indiatimes.com/business/business-news/ban-on-beef-to-affect-medical-care/articleshow/46671551.cms

दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा गंगा है. गंगा को प्रदूषित करने का काम भी यही लोग सबसे ज्यादा करते हैं. बनारस की हाल की घटना इसका प्रमुख उदाहरण है. एक तरफ तो सरकार गंगा सफाई योजना चला रही है, दूसरी तरफ लाखों टन मिटटी की मूर्तियाँ गंगा से लेकर विभिन्न नदियों में डालने का काम यही लोग कर रहे हैं. माननीय उच्चतम न्यायलय ने साफ़ तौर पर मूर्ति विसर्जन के लिए रोक लगा दी है तो भगवाधारी रूप धारण किये हुए संघी संत, महंत कानून व्यवस्था को न मानते हुए जबरदस्ती नदियों में मूर्तियाँ डालने के लिए प्रसिद्द हैं, बनारस में जब प्रशासन ने रोका तो लाठी चार्ज करने की नौबत आ गयी और जनता को सही बात न बताकर अफवाहें फैलाकर स्वयं अपराधी की भूमिका में आ जाते हैं. ऐसे अपराधियों के खिलाफ कार्यवाई की जाए तो यह चिल्लाने लगते हैं कि हिन्दू धर्म को दबाया जा रहा है. 
गंगा या विभिन्न नदियों को सबसे ज्यादा प्रदूषित कारखाने के मालिक करते हैं और उन्ही मालिकों के चंदे से इन तथाकथित संघी संत महात्माओं के चेहरे की लाली बढती है इनकी नियत न आजादी की लड़ाई में साफ़ थी न आज साफ़ है. 

सुमन 

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (11-10-2015) को "पतंजलि तो खुश हो रहे होंगे" (चर्चा अंक-2126) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'