रविवार, 20 मार्च 2016

भारत पिता, नहीं भारत माता

नागपुर मुख्यालय और उसके सभी अनुवांशिक संगठन भारत माता की जय कराने के लिए बेचैन हैं और उसके पीछे उनकी मुख्य मंशा अल्पसंख्यकों को डराने व धमकाने की है. अगर उनके आँख भौं दिखाने से डर कर कायरता पूर्ण तरीके से जय-जय कार करने लगो तो वह आगे और तमाम सारी बातों के लिए डराने व धमकाने का काम करने लगेंगे. मेरा तो स्पष्ट मत है कि किसी व डराने व धमकाने की स्तिथि में वह काम नहीं करना चाहिए जिसको वह कह रहा है. 
मजेदार तथ्य यह है कि प्राचीन साहित्य के अनुसार भारत पुर्लिंग है वह पिता या भाई तो हो सकता है. स्त्रीलिंग हो ही नहीं सकता है इसलिए भारत माता का संघी अवधारणा पूर्णतया गलत है और देश के पढ़े लिखे लोगों को इसका विरोध करना चाहिए न कि कायरतापूर्ण तरीके से अपने को डर वश देशप्रेमी साबित करने के लिए आँख मूँद कर मान लेनी चाहिए.
भारतीय साहित्य के अनुसार भरत चक्रवर्ती, प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र थे। जैन और हिन्दू पुराणों के अनुसार वह चक्रवर्ती सम्राट थे और उन्ही के नाम पर भारत का नाम "भारतवर्ष" पड़ा।
हिन्दू ग्रन्थ, स्कन्द पुराण (अध्याय ३७) के अनुसार: "ऋषभदेव नाभिराज के पुत्र थे, ऋषभ के पुत्र भरत थे, और इनके ही नाम पर इस देश का नाम "भारतवर्ष" पड़ा"|

ऋषभो मरुदेव्याश्च ऋषभात भरतो भवेत्
भरताद भारतं वर्षं, भरतात सुमतिस्त्वभूत्

— विष्णु पुराण (2, 1, 31)
ऋषभ मरुदेवी को पैदा हुए थे, भरत ऋषभ को पैदा हुए थे,
भारतवर्ष भरत से उगा और सुमति भरत से उगी

ततश्च भारतं वर्षमेतल्लोकेषुगीयते
भरताय यत: पित्रा दत्तं प्रतिष्ठिता वनम

- विष्णुपुराण (2,1,32) 
यह भूमि तब से भारतवर्ष के रूप में जानी जाती है जब से पिता अपने पुत्र भरत को राज्य सौंप कर तपस्या के लिए जंगल में गए

श्रीमद्भागवत में वर्णित ऋषभदेव के पुत्र जिनके नाम पर भारत का नाम भारतवर्ष पड़ा।
 
सुमन 

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