गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

काले कानून से न्याय तंत्र को ख़त्म करने की साजिश

देश में लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था को संचालित करने के कार्य में अधिवक्ताओं की महत्वपुर्ण भूमिका होती है. अधिवक्ताओं द्वारा देश की जनता को न्याय दिलाने में एक महत्वपूर्ण हिस्सेदारी करनी होती है लेकिन विधि आयोग कि सिफारिशों को मानते हुए केंद्र सरकार विधि आयोग द्वारा प्रस्तावित अधिवक्ता अधिनियम (संशोधन) विधेयक 2017 को तैयार किया है जो सीधे तौर पर देश के अन्दर विभिन्न न्यायालयों में काम करने वाले 14 लाख अधिवक्ता प्रभावित होंगे जिससे पूरी की पूरी न्याय व्यवस्था को खतरा हो गया है.  प्रस्तावित विधेयक की कुछ प्रमुख बातें : काम में लापरवाही करने, अनुशासन तोड़ने पर वकीलों पर कार्रवाई होगी, वकीलों को उपभोक्ता आयोग द्वारा तय नियमों के मुताबिक मुवक्किलों को हर्जाना देना होगा, जज या कोई भी न्यायिक पदाधिकारी लापरवाही व अनुशासनहीनता पर वकील का लाइसेंस रद कर सकता है, हड़ताल करने पर वकील पर कार्रवाई या जुर्माना हो सकता है, राज्य बार काउंसिल के आधे से ज्यादा सदस्य उच्च न्यायालयों द्वारा नामित किए जाएंगे। इन सदस्यों में डॉक्टर, इंजीनियर, बिजनेसमैन आदि होंगे, बीसीआइ के सदस्य के लिए कोई चुनाव नहीं होगा, सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश, केंद्रीय निगरानी आयुक्त, चार्टर्ड अकाउंटेंट के अपीलीय पदाधिकारी के द्वारा बीसीआइ के आधे से अधिक सदस्य नामित किए जाएंगे। 
               इस तरह से अधिवक्ता की स्वतंत्रता को अप्रत्यक्ष रूप से सरकार छीनने की कोशिश कर रही है. इस तरह के संसोधनो से अधिवक्ता पूरी तरह से न्यायिक अधिकारीयों की गिरफ्त में आ जायेगा और वह अपनी बात को स्वतंत्रता पूर्वक रखने में असमर्थ होगा. बार कौंसिल का चुनाव न कराकर सरकार अपने पिट्ठू लोगों को नामित कर न्याय व्यवस्था को तथा अधिवक्ताओं को नियंत्रित कर तानाशाही की दिशा में देश को ले जाना चाहती है. 
        सरकार न्यायपालिका में न्यायिक अधिकारीयों की नियुक्ति ही नही कर रही है. जिसके कारण से वादों की संख्या बढती जाती है. नित्य नए कानून सरकार बनाती है लेकिन उन कानूनों को लागू करने के लिए न्यायिक तंत्र को विकसित नहीं करती है जिससे वादों की संख्या बढती जाती है और जब आज वादों का निस्तारण तेजी से नहीं हो रहा है तो उसका ठीकरा अधिवक्ताओं के सर पर फोड़ा जा रहा है.  एक तरफ देश की तमाम हाईकोर्ट न्यायिक अधिकारियों, या जजों की कमी का रोना रो रही हैं और इनमें उच्च न्यायालयों में करीब दो करोड़ और 80 लाख मुकदमें लंबित हैं, वहीं सुप्रीम कोर्ट इस मामले में थोड़ी उपलब्धि हासिल करता दिखाई पड़ रहा है।
     देश की उच्चतम न्यालाय में साल 2002 के मुकाबले साल 2016 में भर्तियों में दो फीसदी का इजाफा हुआ है। साल 2002 में उच्चम न्यायालय में नौकरियां 20 से 22 फीसदी हो गई है। बता दें कि उच्च न्यायालयों में 40 फीसदी जजों की कमी है।
       सरकार जब भी कोई कानून बनाए तो कानून बनाते समय ही उस कानून को तोड़ने वाले व्यक्तियों को दण्डित करने के लिए बजट व नए न्यायिक अधिकारीयों की नियुक्ति करे तभी न्याय व्यवस्था सुचारूरूप से चल सकेगी. अधिवक्ताओं को दबाकर नहीं रखा जा सकता है. पूरे न्यायिक तंत्र को संचालित करने का काम अधिवक्ता ही करता है और अगर काले कानूनों द्वारा अधिवक्ताओं की स्वतंत्रता को छीनने का प्रयास हुआ तो न्यायिक तंत्र समाप्त हो जायेगा.

रणधीर सिंह सुमन
लो क सं घ र्ष !

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (09-04-2017) को
"लोगों का आहार" (चर्चा अंक-2616)
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक