मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

मोदीयुग में बढ़ी है सूदखोरी

सूदखोर द्वारा पिटाई
मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद किसानो की आत्महत्याएं बढ़ी हैं उसका मुख्य कारण यह भी है कि वित्तीय संस्थाएं छोटे किसानो को ऋण देने में आनाकानी करने लगी हैं जिससे विश्व बैंक, NCAER के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश के 21% ग्रामीण परिवारों पर औपचारिक लोन बकाया था लेकिन 40 % ग्रामीण परिवारों पर अनौपचारिक ऋण है जो यह प्रदर्शित करता है कि अधिकांश किसान सूदखोरों, भू स्वामियों व दलाल तबके के कर्ज के मकडजाल में फंसा हुआ है. अधिकतम ब्याज दरें होने के कारण ग्रामीण परिवार उस सूदखोरी के कर्ज को अदा नहीं कर सकता है. जिससे लघु व सीमान्त किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर होते हैं. 
                      मोदी की पार्टी के कार्यकर्ता ग्रामीण क्षेत्रों में सूदखोरी का धंधा करते हैं और अधिकतम ब्याजदरों को वसूलने के लिए वह बल प्रयोग करते हैं और भगवा अंगौछे के कारण उनके खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं हो पाती है अक्सर यह भी देखने में आया है कि उनके दबाव के कारण पीड़ित किसान आत्म हत्या कर लेते हैं लेकिन पुलिस आत्म हत्या के दुष्प्रेरण का मुकदमा भी दर्ज नही करती है. 
                 एक समाचार के अनुसार मुजफ्फरनगर के शाहपुर थाना क्षेत्र स्थित पलज गांव निवासी संजीव पुत्र नकली प्रजापति ने करीब 8 महीने पहले बेटी की शादी के लिए सूदखोर से ब्याज पर 50 हजार रुपये लिए थे। संजीव बहादपुर निवासी रणतेज उर्फ काला नाम के इस सूदखोर को अब तक 75 हजार रुपये दे चुके हैं, लेकिन सूदखोर का कहना है कि 50 हजार की रकम के लिए ब्याज के साथ सवा लाख रुपये बनते है। संजीव को यह रकम चुकानी ही होगी। इसी रकम की वसूली को लेकर रणतेज लगातार संजीव पर दबाव बना रहा था। जिसके बाद रणतेज ने संजीव की चप्पल से पिटाई की।
           शहरी क्षेत्रों में निचले स्तर के कर्मचारी, मजदूर भी इन सूदखोरों के कर्ज जाल में फंसे हुए हैं इनकी ब्याज की दरें काम से काम 10% मासिक है जिसको लेने वाला व्यक्ति अदा करने में अक्षम होता है और फिर अपराधी, पुलिस व सूदखोरों के गुंडे अपने पौरुष बल के ऊपर वसूली करते हैं. हंटरों से पिटाई, पकड़ कर गुप्त गोदामों में बंधक बनाना व घर के अन्दर बंद कर घरेलू काम लेना प्रमुख है. 
            मोदी व विभिन्न प्रदेशों में भाजपा शासित सरकारें इस दिशा में कोई कदम उठाने को तैयार नही हैं और पहले से बने साहूकार अधिनियम जैसे कानूनों को दरकिनार कर दिया गया है. जिससे आर्थिक रूप से कमजोर तबकों का जीना हराम हो गया है और वह दास प्रथा की तरफ वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को ले जा रहे हैं. 

रणधीर सिंह सुमन 

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