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सोमवार, 2 नवंबर 2009

संप्रभुता से समझौता नहीं - उत्तरी कोरिया - 3

साम्राज्यवाद के घड़ियाली आँसू


दोनों पक्ष एक-दूसरे पर भरोसा नहीं जता रहे थे। नतीजतन, उत्तरी कोरिया ने अपने आपको आईएईए से अलग करने का इरादा ज़ाहिर किया। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग तरह की समस्याओं के उभरने का खतरा था। तब तक बड़े बुष जा चुके थे और क्लिंटन महोदय राष्ट्रपति बन चुके थे। इराक पर किये गये पहले हमले की आलोचनाएँ थमी नहीं थीं और क्लिंटन सर्बिया में फौजी कार्रवाई करने की तैयारी में थे। उधर दक्षिण कोरिया व उत्तरी कोरिया की सीमा पर तनाव बढ़ रहा था। अमेरिकी फौजें तो दक्षिण कोरिया में 1950 से ही डेरा डाले हुए हैं। क़रीब 30 हजार अमेरिकी फौजी समुंदर, ज़मीन और आसमान में दक्षिण कोरिया की सुरक्षा के लिए हर वक्त उसी ज़मीन पर मौजूद रहते हैं। उत्तर कोरिया की परमाणु हथियार बनाने की सरगर्म ख़बरों की वजह से कोरियाई खाड़ी में युद्ध जैसे हालात बन गये थे। क्लिंटन के विषेषज्ञ सलाहकारों ने युद्ध छिड़ने की स्थिति में भीषण नरसंहार की चेतावनियाँ दी थीं।

इन परिस्थितियों में उत्तरी कोरिया के साथ टकराव की स्थिति अमेरिका के लिए अनुकूल न लगती देख तत्कालीन राष्ट्रपति क्लिंटन ने शांति का कोई रास्ता निकालने के लिए पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर को जून 1994 में उत्तरी कोरिया भेजा था। क्लिंटन की हालिया यात्रा की तरह ही वो यात्रा भी आधिकारिक और सरकारी नहीं थी, लेकिन उस गैर आधिकारिक यात्रा में ही उस संधि के बीज छिपे थे जिसे एग्रीड फ्रेमवर्क ;।हतममक थ्तंउमूवताद्ध समझौते के नाम से जाना जाता है। प्रमुख रूप से उस संधि के मुताबिक उत्तर कोरिया ने अपने कुछ परमाणु अनुसंधानों को रोकने और योंगब्योन स्थित प्लूटोनियम आधारित रिएक्टर को बंद करने की सहमति दी थी। उत्तरी कोरिया के मुताबिक उसके वैज्ञानिकों ने ग्रेफाइट आधारित रिएक्टर बनाने की तकनीक विकसित कर ली थी और हालाँकि वो तकनीक हल्के जल वाले रिएक्टरों की तुलना में कम दक्ष भले ही थी लेकिन ग्रेफाइट की उपलब्धता उत्तरी कोरिया में पर्याप्त मात्रा में होने से वे उसी पर आगे अनुसंधान कर रहे थे। समझौता यह भी था कि यदि उहें हल्के जल वाले रिएक्टर हासिल होते हैं तो वे ग्रेफाइट वाले रिएक्टर बंद कर देंगे। अमेरिका ने इसी समझौते में यह वादा किया कि वो उत्तर कोरिया को दो हल्के जल वाले रिएक्टर देगा, पिछले 50 वर्षों से उत्तर कोरिया पर लगे तमाम आर्थिक व राजनीतिक प्रतिबंधों को भी हटा लिया जाएगा, और साथ ही नये रिएक्टरों के निर्माण के दौरान उत्तरी कोरिया की उर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अमेरिका ने पहले रिएक्टर के बनने तक उत्तरी कोरिया को 5 लाख मीट्रिक टन भारी तेल की सालाना आपूर्ति का वादा भी किया था। उत्तरी कोरिया ने समझौते के मुताबिक अपने ग्रेफाइट से चलने वाले रिएक्टर को नष्ट कर दिया। आईएईए ने भी निरीक्षण कर उत्तरी कोरिया के इस कदम पर संतोष ज़ाहिर कर दिया लेकिन अमेरिका ने उत्तरी कोरिया से किये हुए अपने किसी वादे पर अमल नहीं किया-न आधी सदी से चले आ रहे आर्थिक प्रतिबंध हटाये गये और न ही भारी तेल की पूरी आपूर्ति की गयी। उल्टे 1996 में अमेरिका ने उत्तरी कोरिया पर नये मिसाइल प्रतिबंध लगा डाले। इसके चलते उत्तरी कोरिया ने अपनी मिसाइल परीक्षण की योजना को रद्द कर दिया। पूरे चार साल इसी तरह खींचतान में गुजर गये। फिर 1998 में दक्षिण कोरिया में किम दे जुंग के राष्ट्रपति काल में कोरियाई भूभाग पर शांति प्रक्रिया को फिर गति मिली और दोनों देषों के बीच जमी बर्फ पिघली। कई मौकों पर जुंग ने अपने अमेरिकी सहयोगियों को उत्तरी कोरिया पर अपने फर्क ज़ाहिर कर नाराज़ भी किया। लेकिन अमेरिकी उपस्थिति से न तो उत्तरी कोरिया पूरी तरह दक्षिण कोरिया की मंषाओं पर यकीन कर सकता था और पूँजीवादी रास्ते से ही तरक्की हासिल कर सके दक्षिण कोरिया को भी उत्तरी कोरिया के लाल झण्डे पर पूरा ऐतबार होना मुष्किल ही था। हालाँकि वो प्रक्रिया किसी नतीजे पर तो नहीं पहुँच सकी लेकिन उसके निर्माता किम दे जुंग को शांति का नोबल ज़रूर दिया गया।

बाद में 2001 में बिल क्लिंटन के पद से हटने व जूनियर बुष के सत्ता में आने और 2003 में किम दे जुंग के राष्ट्रपति काल की समाप्ति से ये प्रक्रियाएँ धीरे-धीरे षिथिल पड़ती गयीं। जाॅर्ज डब्ल्यू. बुष ने सत्ता में आते ही उत्तरी कोरिया के बारे में नरम रवैया छोड़ कर वही पारंपरिक नज़रिया अपनाया जो उनके पिता जाॅर्ज एच. बुष और उनके भी पहले से चला आ रहा था। उत्तरी कोरिया द्वारा मई में किये गये परमाणु परीक्षणों के बाद फिर से सीमाओं पर मिसाइलें और बंदूकें तनी हुई हैं।

जूनियर बुष के सत्ता में आने के आठ महीने के भीतर ही 11 सितंबर 2001 का वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमला हुआ और उसकी आड़ लेकर बुष प्रषासन ने उन सभी को ठिकाने लगाने की योजनाओं पर सुनियोजित ढंग से अमल शुरू कर दिया जो किसी भी तरह अमेरिकी साम्राज्यवाद के वर्चस्व को चुनौती दे रहे थे और झुकने से इन्कार कर रहे थे। दुनिया से आतंकवाद के सफाये का नाम देकर साम्राज्यवादी आतंक का जो कहर सारी दुनिया के कमज़ोर देषों पर उस दौरान बरपाया गया, उसके सामने हिरोषिमा और नागासाकी की अमेरिकी बर्बरताएँ भी पीछे रह गयीं। यूँ तो बुष प्रषासन के सामने अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, इराक, सीरिया, लीबिया, क्यूबा, वेनेजुएला, नेपाल, पेरू, मेक्सिको, ब्राजील, फ़िलिस्तीन, लेबनान, सूडान सहित 50-60 देषों को सबक सिखाने का लक्ष्य था लेकिन 29 जनवरी 2003 को दिये गये अपने भाषण में बुष ने ‘‘शैतान की धुरी’’ कहते हुए तीन देषों पर ख़ास नज़रे इनायत बख़्षी। ये तीन देष थे - उत्तरी कोरिया, ईरान और इराक़।

यूँ इन तीनों देषों में कोई समानता नहीं थी सिवाय इसके कि ये तीनों ही देष अमेरिका की दादागिरी मानकर अपने घुटने टेकने को तैयार नहीं थे और तीनों ही सामरिक दृष्टि से अमेरिका की सर्वषक्तिमान बनने की राह में बाधा बन सकते थे।

इराक़ को सबसे पहले निषाना बनाया गया। बहाना बनाया गया उसके पास जनसंहारक हथियारों की संभावित मौजूदगी का, जबकि अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण दल भी इराक़ के निरीक्षण के बाद वहाँ ऐसे किन्हीं हथियारों की मौजूदगी की संभावना से इन्कार कर चुका था। फिर भी बुष महोदय ने वहाँ हमला किया, राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फाँसी पर लटकाया गया, लाखों निर्दोषों का क़त्लेआम किया गया जो अब तक जारी है।

मध्य एषिया में इराक़ को बारूद के ढेर में बदल देने के बाद फ़िलिस्तीन और ईरान ही अमेरिका की ‘‘तेल लूट परियोजना’’ की रुकावट हो सकते हैं। फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध की कमर तोड़ने के लिए अमेरिका का वफ़ादार इज़राएल वहाँ मौजूद है ही। ईरान के मामले में हालात थोड़े जुदा हैं। एक बड़ा मुल्क होने और वहाँ राष्ट्रपति अहमदीनेजाद की लोकप्रिय अमेरिका विरोधी सरकार के होने से अमेरिका सही मौके की ताक में है। वो इराक़ जैसा लंबा प्रतिरोध झेलने के लिए तैयार नहीं है। इल्जाम ईरान पर भी यही लगाया गया है कि उसके पास जनसंहारक क्षमता वाले हथियार मौजूद हैं और वो परमाणु हथियार बनाने की साज़िष कर रहा है। हालाँकि इराक़ की ही तरह अब तक इसका कोई सबूत नहीं पेष किया जा सका है फिर भी इन अमेरिकी बहानों की असलियत सभी जानते हैं।

इन तीनों देषों में से एक उत्तरी कोरिया ही ऐसा देष है जिसने अपने पास परमाणु हथियार होने की न केवल ठोक-बजाकर घोषणा की है बल्कि साथ ही यह भी कहा है कि वो अपना हथियार पहले नहीं इस्तेमाल करेगा, लेकिन अगर अमेरिका देष की सुरक्षा पर हमला करता है तो वो चुप नहीं रहेगा। उत्तरी कोरिया जैसे छोटे से देष का यह रवैया ‘आ बैल, मुझे मार’ जैसा भले नज़र आता हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विष्लेषकों के इस संकेत को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता कि अब तक जितने भी देषों पर अमेरिका ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हमले किये या करवाये हैं उनमें से एक भी देष परमाणु शक्ति संपन्न देष नहीं था। दूसरे शब्दों में, अमेरिका किसी परमाणु शक्ति संपन्न देष से भिड़ने का खतरा नहीं उठाना चाहेगा।

विनीत तिवारी

शनिवार, 31 अक्टूबर 2009

कहीं सी आई ऐ के नौकर तो नही हैं ?

अपने देश में अंग्रेज व्यापारी बनकर आए थे और यहाँ के लोगों को लालच देकर उपहार देकर, घूष देकर देश के ऊपर कब्जा कर लिया थाउन्ही नीतियों से सबक लेकर अमेरिकन साम्राज्यवाद एशिया के मुल्को को गुलाम बनाने के लिए कार्य कर रहा हैअफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई के भाई अहमद वली करजई को सी आई पिछले आठ सालों से वेतन दे रही है और अमेरिका की कठपुतली सरकार अफगानिस्तान में हैइसके पूर्व इराक़ में भी अमेरिकन साम्राज्यवादी लोग पत्रकारों, टेक्नोक्रेट्स , नौकरशाहो , न्यायविदों को रुपया देकर अपनी तरफ़ मिला कर इराक़ पर कब्जा किया था और ताजा समाचारों के अनुसार पाकिस्तान में अमेरिकन खुफिया एजेन्सी सी आई पैसा बाँट रही है और अपनी तरफ़ लोगों को कर रही हैपाकिस्तान में उसकी कठपुतली सरकार तो है लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था द्वारा चुनी गई सरकार है अमेरिकन साम्राज्यवाद जनता द्वारा चुनी गई सरकारों की मुख्य दुश्मन हैमुंबई आतंकी घटना के बाद अमेरिकी खुफिया एजेन्सी एफ बी आई और इजराइल की खुफिया एजेन्सी मोसाद अपने देश में कार्य कर रही हैनिश्चित रूप से सी आई अपना कोई भी हथकंडा छोड़ने वाली नही है और अपने हितों के लिए इस देश के बुद्धजीवी तबको में से कुछ स्वार्थी तत्वों को रुपया लालच देकर कार्य करने के लिए प्रेरित कर सकती हैइस लिए आवश्यक यह है की इनकी गतिविधियों पर सख्त निगाह रखी जाए इनके हथकंडो से सावधान रहने की जरूरत हैक्योंकि यह लोग सी आई के लोग प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से लोगों को खरीद कर अपनी कठपुतली सरकारें बनाए का कार्य करती है


सुमन
loksangharsha.blogspot.com

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

बुदबुदाते, खदबदाते, भरे बैठे लोगों को व्यंग्य वार्ता का आमंत्रण

प्रिय साथियो!
चलिये समाज की कुरीतियों, विसंगतियों, झूठ व आडम्बर पर प्रहार करें। हमारे औजार हमारी संवेदनाएं, हमारी अनुभूतियां, हमारे अनुभव होंगे और इनको जो धार देगा निस्संदेह वह व्यंग्य होगा। आईये हमसे हाथ मिलाइये और करिए समाज की सफाई; क्योंकि अब ‘व्यंग्यवार्ता’ का शुभारम्भ हो चुका है। संभावित दूसरा अंक पुलिस विशेषांक होगा। कमर कसिए, कलम घिसिए और भेज दीजिए अपनी चुटीली रचनाएं। हम उन सभी का स्वागत करते हैं जिनकी मुट्ठी अभी भी भिचतीं है और जो समाज को सुन्दर, बेहतर और स्वस्थ देखना चाहते हैं..........।

शुभकामनओं सहित...!
आपका मित्र
अनूप मणि त्रिपाठी
सम्पादक
व्यंग्यवार्ता
24, जहाँगीराबाद मेंशन, हजरतगंज, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
09956789394, 09451907315

anoopmtripathi@gmail.com

atulbhashasamwad@gmail.com


लोकसंघर्ष के सभी मित्रों से अनुरोध है की लखनऊ से प्रकाशित व्यंग वार्ता पत्रिका में अपने लिखे व्यंग भेजने का कष्ट करें ।

सुमन
loksangharsha.blogspot.com

बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

नोबुल पुरस्कार विजेता नए अर्थशास्त्री ? पुराने ख्यालात की री पैकेजिंग

योरप केंद्रित बुद्धि फिर एक बार उजागर हुई जब स्वेडिस साइंस अकादमी ने अमेरिकी अर्थशास्त्री ऑलिवर विलियम्सन और एलिनर आस्त्राम को इस वर्ष के नोबेल पुरस्कार से नवाजा । सामूहिक संपत्ति और अर्थ प्रबंधन के क्षेत्र में तथाकथित नए सिद्धांत का आविष्कार के लिए इन दोनों अर्थ शास्त्रियो को नोबेल पुरस्कार दिया गया है। यह वैसा ही आविष्कार है, जैसा किसी समय किताब में छापकर स्कूली बच्चों को पढाया जाता था की कोलाम्बस और वास्को डी गामा ने भारत की खोज की, जबकि कोलंबस और वास्को डी गामा के पैदा होने के हजारो वर्ष पहले भी भारत अस्तित्व में था। योरप केंद्रित बुद्धि का यह एक नमूना है की जिस दिन योरापियों को भारत का रास्ता मालूम हुआ उसी दिन को वे भारत का आविष्कार मानते है।

सर्विदित है की नेपाल में तुलसी मेहर और भारत में गाँधी जी ने विकेन्द्रित स्वावलंबी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का समेकित सिद्धांत विकसित किया । इसका उन्होंने कई क्षेत्रो में सफल प्रयोग भी किया। इस साल जब गाँधी जी की मशहूर पुस्तक हिंद स्वराज के प्रकाशन के सौ वर्ष पूरे होने की स्वर्ण जयंती मनाई जा रही है, तब स्वेडिस साइंस अकादमी को दो अमेरिकी अर्थशास्त्री के हवाले से पता चलता है की भारत और नेपाल में सामूहिक संपत्ति का सामूहिक नियमन किस प्रकार किया जा रहा है । तुलसी मेहर ने, जिन्हें 'नेपाल का गाँधी' कहा जाता था और स्वयं गाँधी जी ने सरकार और कारपोरेट से विलग ग्रामवासियों के अभिक्रम जगाकर स्थानीय श्रोत्रो पर आधारित समग्र विकास का वैकल्पिक विकेन्द्रित स्वावलंबी ग्राम व्यवस्था का तंत्र विकसित किया था। अखिल भारतीय चरखा संघ इसका उदाहरण था, जिसका नेटवर्क पूरे देश में फैला । बाद में विनोबाजी ने इस व्यवस्था का प्रयोग 'ग्रामदान' आन्दोलन के मध्यम से किया। डेढ़ सौ साल पहले काल मार्क्स ने मूल प्रस्थापना पेश की की उत्पादक शक्तियों का स्वामित्व समाज में निहित होना चाहिए । मार्क्स उत्पादन की शक्तियों पर समाज का सामाजिक स्वामित्व स्वाभाविक मानते थे, क्योंकि पूरा समाज इसका परिचालन करता है सम्पूर्ण समाज के लिए। राष्ट्रीयकरण सामाजिक स्वामित्व का स्थान नही ले सकता। राष्ट्रीयकरण को स्टेट काप्लेलिज्म कहा जाता है। क्म्मयुनिज़म में राज्य सत्ता सूख जाती है, फलत: सरकार का कोई स्थान नही होता है। साम्यवादी अवस्था में उत्पादन और वितरण व्यवस्था की भूमिका समाज का स्थानीय तंत्र निभाएगा।

भारत के प्रत्येक ग्राम में सामूहिक इस्तेमाल के लिए 'गैर मजरुआ आम' जमींन है, जिसका सामूहिक उपयोग गाँव की सामूहिक राय से होती है। राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे के मुताबिक भारत की कुल भगौलिक क्षेत्र का 15 प्रतिशत ऐसी ही सामूहिक संपत्ति है, जिसका सामूहिक उपयोग चारागाह , तालाब, सिंचाई और जलावन की लकड़ी इकठ्ठा करने के लिए किया जाता है। यह बात अलग है कि सरकारी नीतियों के चलते ऐसी सामूहिक संपत्ति का नियंत्रण या तो सरकार ने स्वयं अधिग्रहण कर लिया है या सरकारी हलके में उसका प्रबंधन इधर किसी निजी कंपनी/संस्थान के हवाले करने की सरकारी प्रवित्ति बलवती हो गई है।
नेपाल के कतिपय गाँवों की सिंचाई व्यवस्था मछली पालन, चारागाह, तालाब प्रबंधन देखकर आस्त्राम ने सिद्धांत निकला की "सामूहिक संपत्ति का प्रबंधन इस संपत्ति के उपभोक्ताओं के संगठनों द्वारा किया जा सकता है।" उसी तरह ऑलिवर विलियम्सन निष्कर्ष निकला है कि विवादों के समाधान के लिए मुक्ति बाजार व्यवस्था से ज्यादा सक्षम संगठित कंपनियाँ होती हैं । विलियमन कहते है की मुक्त बाजार में झगडे और असहमतियां होती हैं। असहमति होने पर उपभोक्ता बाजार में उपलब्ध अन्य वैकल्पिक उत्पादों की तरफ़ मुद जातें हैं , किंतु मोनोपाली मार्केट की स्तिथि में खरीदार के समक्ष कोई विकल्प नही रहता । ऐसी स्तिथि में संगठित ट्रेडिंग फर्म्स स्वयं विवाद का संधान करने में सक्षम होती हैं। इस प्रकार विलियम्सन मुक्त बाजार को नियमित करने के लिए कंपनियों की भूमिका रेखांकित करते हैं । कंपनियाँ आपसी सहमति का तंत्र विकसित कर बाजार के विरोधाभाषों पर काबू पा सकते हैं । यहाँ यह ध्यान देने की बात है की आस्त्राम और विलियम्सन दोनों ही सरकारी हस्तचेप और सरकारी नियमन की भूमिका नकारते हैं और वे मुक्त बाजार व्यवस्था के विरोधाभासों के समाधान के लिए पूर्णतया निजी ट्रेडिंग कंपनियों के विवेक पर निर्भर हो जाते हैं।

लोकतंत्र में आम लोगों की निर्णायक भूमिका होती है वे अपनी मर्जी की सरकार चुनते हैं । ऐसी स्तिथि में बाजार को विनियमित कमाने के लिए सरकार की भूमिका के अहमियत है। लोकतंत्र में सरकारी नियमन लोक भावना की सहज अभिवयक्ति है। किंतु इसे स्वीकार करने में दोनों अर्थशास्त्रियों को परहेज है। जाहिर है, स्वेडिस साइंस अकादमी मूल रूप में शोषण पर आधारित निजी व्यापार की आजादी का पक्षधर है और मुक्त बाजार व्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप का विरोधी है। इसलिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त दोनों ही अर्थशास्त्रियों की तथाकथित 'नई खोज' पूँजी बाजार समर्थक पुराने ख्यालात की री पैकेजिंग है।

सत्य नारायण ठाकुर

सुमन
loksangharsha.blogspot.com

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009

हिंदू आतंकी संगठनों की घुसपैठ

मालेगांव की आतंकी घटना में हिंदू आतंकी संगठनों के साथ सैन्य अधिकारियों का सम्बन्ध भी प्रत्यक्ष रूप से थाउसी प्रकार मडगांव (गोवा) विस्फोट में आरोपी कार्यकर्त्ता (हिंदू सनातन संस्था) ने बड़े-बड़े नेताओं, पुलिस अधिकारी सहित न्याय व्यवस्था में भी पकड़ मजबूत कर रखी हैमुख्य बात यह है कि गोवा विधि आयोग अध्यक्ष रमाकांत खलप गोवा के गृह मंत्री रवि नायक ने इस बात को बड़ी साफगोई से माना हैप्रश्न यह उठता है चाहे हिंदू आतंकी संगठन हो या अन्य आतंकी संगठन होअगर उनका प्रभाव सेना से लेकर न्याय व्यवस्था तक है और उनके अधिकारी इन संगठनों के आदेश से कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार हैं तो देश के लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बनाये बचाए रखना मुश्किल होगासाम्राज्यवादी शक्तियां ऐसे संगठनों को मदद देकर देश को गृह युद्घ की स्थिति में झोंक देना चाहती है जिससे देश में हमेशा अशांति बनी रहेदूसरी तरफ़ पुलिस विभाग के लोग फर्जी एनकाउंटर करके जनता में वाहवाही लूटने का काम करते हैंअभी लखनऊ में एनकाउंटर विशेषज्ञयों की फायरिंग प्रक्टिस में निशाने टारगेट पर लगे ही नहीआतंकवाद का दमन करने के नाम पर बने सरकारी सशस्त्र बल भी फर्जी घटनाओ के आधार पर ही वाहवाही लूट रहे हैंपुलिस के एक क्षेत्राधिकारी ने अपने सरकारी असलहे से हाथी के ऊपर गोलियाँ चलाई थी और एक भी गोली हाथी को नही लगी थी । इससे यह साबित होता है कि यह लोग लोगों को पकड़ कर एनकाउंटर के नाम पर उनकी हत्या कर रहे हैं। आज जरूरत इस बात की है कि इन आतंकी सगठनों के ख़िलाफ़ ईमानदारी से वैचारिक स्तर से जमीनी स्तर तक संघर्ष की आवश्यकता है अन्यथा विदेशी साम्राज्यवादी शक्तियां इस देश की एकता और अखंडता को नुकसान पहुँचा सकती है

सुमन
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सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

इलाहाबाद चिट्ठाकार सम्मलेन: आरोप-प्रत्यारोप का बहाना

इलाहाबाद में हिन्दी चिट्ठाकारों का जमावडा हुआजिसमें हिन्दी चिट्ठाकारी से सम्बंधित पुस्तक का विमोचन हुआइस कार्यक्रम का आयोजन महात्मा गाँधी अन्तराष्ट्रीय विश्विद्यालय वर्धा हिन्दुस्तान अकादमी इलाहाबाद ने किया थाहिन्दी चिट्ठाकारों ने इस आयोजन के बहाने सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह से लेकर हर तरह की व्यवस्था-अव्यस्था के सम्बन्ध में चिट्ठाकारी की है जिसमें व्यक्तिगत भड़ास से लेकर आरोप-प्रत्यारोप विगत इतिहास शामिल हैइस तरह से लगता यह है की किसी भी हिन्दी चिट्ठाकारों के आयोजन में शामिल होने वाला नही हैइस में शामिल होने का मतलब चिट्ठा जगत में अपने सम्बन्ध में तमाम आवश्यक और अनावश्यक विवाद को शामिल कर लेना हैइलाहाबाद की हिन्दुस्तान अकादमी महात्मा गाँधी अन्तराष्ट्रीय विश्विद्यालय वर्धा ने यह आयोजन करके हिन्दी चिट्ठाजगत को सम्मान ही प्रदान किया है और इसमें प्रमुख चिट्ठाकार सर्वश्री रविरतलामी, मसिजिवी, अनूप, प्रियंकर, विनीत कुमार ने भी रचनात्मक समझ के साथ ही आयोजन में शिरकत की होगी। शायद उन्होंने भी इस आरोप प्रत्यारोप के बारे में सोचा न होगा. इस कार्य से हिन्दी चिट्ठाजगत को महत्व मिला है किंतु अंतरजाल पर अब रही अनावश्यक बहस हिन्दी चिट्ठाजगत की छुद्र मानसिकता को प्रर्दशित कर रही हैअच्छा यह होता कि अनावश्यक आरोप-प्रत्यारोप करने कि बजाये जैसा वह उचित समझते हैउसी तरीके का कार्यक्रम कर डालेंकिसी रेखा को छोटा करने से अच्छा है कि उससे बड़ी रेखा खींच दी जाए इस सम्बन्ध में यह पंक्तियाँ महत्वपूर्ण है :-

'कैसे उनके रिश्तें है कैसे ये पड़ोसी हैं ,
भीगती हैं जब आँखें होंठ मुस्कुरातें है
क्या अजीब फितरत है इस जहाँ में बौनों की,
बढ़ तो ख़ुद नही सकते, कद मेरा घटाते है

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

ऊदा देवी :- अन्तिम भाग

इससे यह तात्पर्य नहीं लेना चाहिए कि ऊदा देवी का शौर्य और पराक्रम 1857 के महाविद्रोह की केन्द्रीय चेतना से सम्बद्ध नहीं था, यह कि उनकी शहादत मुक्ति के विराट स्वप्न को साकार करने की दिशा में दी गयी आहुति नहीं थी। उनकी शहादत को व्यक्तिगत प्रतिशोध की अभिव्यक्ति मानने वाले यकीनीतौर पर ऊदादेवी के क़द को छोटा करते हैं। साथ ही वे आज़ादी की इस विलक्षण लड़ाई में जनता के सभी हिस्सों की शिरकत के चमकीले यथार्थ को धुँधलाने की कोशिश भी करते हैं। मक्का पासी की शहादत हो या ऊदादेवी का बलिदान, इसके वृहत्तर सन्दर्भ का अनुमान इससे लग सकता है जितना कि इस महाविद्रोह के स्वरुप का मजाक उड़ाते हुए अंग्रेज इतिहासकारों का यह कहना कि ‘तब एक सिपाही भी अपने को राजा समझता था’ या घुड़सवार सिपाहियों की यह घोषणा कि ‘ख़ल्क़ खुदा का, मुल्क बादशाह का, अमल सिपाही का।’
बहुत बार बहुत अवसरों पर बादशाह के हुक्म की भी प्रतीक्षा नहीं की गयी। कई ऐसी साहसिक घटनाएँ भी प्रकाश में आईं जब विद्रोही सैनिकों तथा निःशस्त्र ग्रामीणों ने अपने हौसले और विवेक से अंग्रेज अधिकारियों और सेना पर घातक हमले किये। मगरवारा (उन्नाव) में जनरल आउट्म की मजबूत सेना पर ग्रामीणजनों द्वारा खेतों से गन्ने उखाड़कर टूट पड़ना, ऐसी ही एक अनूठी घटना है, ऐसी बहुत सी घटनाओं से इतिहास भरा पड़ा है। अवश्य ही सिकन्दरबाग की लड़ाई के एकमात्र निजी विवेक से उठ खड़े होने के ठोस प्रमाण नहीं मिलते क्योंकि यह मोर्चा 6 अगस्त को ब्रिजीस कदर की ताजपोशी के साथ बेगम हजरत महल द्वारा ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरुद्ध निर्णायक युध्द की घोषणा तथा आलमबाग के जबरदस्त प्रतिरोधी संघर्ष के बाद शौर्यगाथाओं की मूर्तता का दस्तावेज बना। भूलना नहीं चाहिए कि इस लड़ाई में शामिल नवाबी सलतनत के महिला दस्ते की अधिकांश सैनिकों के पास उस समय के आधुनिक हथियार थे। ऊदा देवी के पास भी। इतना अवश्य है कि काल्विन कैम्पबेल सिकन्दरबाग, किसी योजना के तहत नहीं बल्कि रास्ता भटक जाने के कारण पहुँचा था, इसलिए यहाँ उसकी सेना पर किया गया आक्रमण भी पूर्व नियोजित नहीं माना जा सकता। शायद यही कारण था कि यहाँ उसकी सेना भारी पड़ी। निश्चय ही इस लड़ाई को जुझारू धार देने में ऊदादेवी का विवेक, संकल्प शक्ति, रणकौशल तथा अंग्रेजों को मज़ा चखाने की प्रतिबद्धता ठोस रूप में मौजूद प्रतीत होती है।
यहाँ यह उल्लेख शायद अप्रासंगिक न हो कि सिकन्दर महल का निधन वाजिद अली शाह की वली अहदी में ही हो गया था। नवाब साहब की अतिप्रिय बेगम तो वह थीं ही, दरबार से जुड़े दूसरे लोग तथा परियाँ भी उनसे बहुत प्यार करती थीं। इस उल्लेख का तात्पर्य मात्र इतना ही है कि अपने महल के बाहरी व भीतरी हिस्सों में हुए ऐतिहासिक युद्ध में सिकन्दर महल मौजूद नहीं थीं। अपनी प्रिय सेनानायक की स्मृति को शेष रखने वाले भवन के सम्मुख काल्विन की सेना से मोर्चा लेकर ऊदा देवी ने इस लड़ाई में एक और आयाम जोड़ा।
डा0 राम विलास शर्मा ने ‘‘स्वाधनीता संग्राम, बदलते परिप्रेक्ष्य’’ में लिखा है ‘‘हिन्दुस्तानी सिपाही जिन उद्देश्यों के लिए लड़ रहे थे, उनकी सफलताओं के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता अत्यंत आवश्यक थी। राष्ट्रीय एकता, स्वाधीनता और नई लोकसत्ता इन तीनों में एक भी उद्देश्य हिन्दू-मुस्लिम एकता के बिना चरितार्थ न होता था।’’
उन्होंने आगे जोर देकर कहा कि ‘‘सेना के भीतर हिन्दू-मुसलमान अफसरों और सिपाहियों की वह एकता, भूमंडलीकरण के मौजूदा दौर में जब सुनियोजित तरीके से कुटीर उद्योगों, संस्कृति के सभी उज्ज्वल मानवीय पक्षों की घेराबंदी हो रही है या फिर उसे उत्तेजक अश्लीलता की कामुक लम्पटता दी जा रही है, बाज़ारवादी शक्तियँा दृश्य माध्यमों का निर्मम इस्तेमाल करते हुए धार्मिक भावनाओं को बाजार पर प्रभुत्व पाने के उद्देश्य से बेधड़क इस्तेमाल कर रही हैं। श्रम का मूल्य घट रहा है। विदेशी वस्तुओं से बाजार की चमक बढ़ रही है। स्वदेशी की भावना तथा स्वदेशी आन्दोलन की बहुमूल्य थाती धुँधला रही है। साधनहीन लोगों के लिए विकास के अवसर सीमित हो रहे हैं। तब यानी कि ऐसे कठिन समय में 1857 के महाविद्रोह तथा इसमें ऊदा देवी और उनके पति द्वारा दी गयी शहादत को याद करने की निश्चित ही विशिष्ट प्रासंगिकता है। यकीनन 1857 के उस महान जन विद्रोह तथा उसमें शामिल लोगों के बारे में अभी बहुत कुछ सामने आना शेष है, ऐसे समय में जब स्वतंत्रता आंदोलन के विरोधियों, उससे विश्वासघात करने वालों को महिमामंडित किया जा रहा हो, तब उस महासंग्राम के बारे में व्यापाकता से विचार होना तथा उस दौर के समूचे इतिहास को सम्पूर्णता के साथ उद्घाटित होना आवश्यक है।

एक अंग्रेज सार्जेण्ट का संस्मरण
सिकन्दरबाग के अन्दरूनी हिस्से के बीचाबीच पीपल का एक बहुत बड़ा घना पेड़ था। उसके नीचे ठण्डे पानी के बहुत से मटके रखे हुए थे। जब सिकन्दरबाग के युद्ध में रक्तपात का अंत हुआ तो बहुत से सिपाही अपनी प्यास बुझाने तथा पीपल के नीचे ठण्डी छाँव का आनन्द लेने लगे। इस पीपल के नीचे ब्रिटिश सेना की 53वीं और 9वीं सैनिक टुकड़ी के बहुत से जवान मरे हुए पड़े थे। लेकिन एक स्थान पर कैप्टन डासन का ध्यान गया कि इन मृत सैनिकों के शरीर के घावों से प्रकट होता है इनकी मृत्यु ऊपर से गोली चलाये जाने के कारण हुई है। कैप्टेन डाॅसन शीघ्र ही पीपल की छाया से बाहर निकला ओर उसने केकर वालेस को इस उद्देश्य से बुलाया कि वह पीपल के ऊपर देख्ेा कि वहाँ कोई है तो नहीं। उसने कहा कि यूरोपीय सिपाहियों की मौत रणक्षेत्र में आमने-सामने से चली गोलियों से नहीं बल्कि पेड़ के ऊपर बैठे किसी व्यक्ति द्वारा गोलियाँ चलाये ंजाने के कारण हुई है। वालेस के पास उसकी भरी हुई बन्दूक थी, सावधानी पूर्वक पीछे हटते हुए, पेड़ पर बैठे व्यक्ति की तलाश उसने आरम्भ की। तत्काल ही उसने कैप्टेन डासन से कहा, मैने उसे देख लिया है, फिर अपनी बन्दूक ऊपर की ओर तानते हुए उसने कहा कि अब मैं भगवान के सामने अपना वचन पूरा करुँगा। यह कहते हुए उसने गोली चला दी। गोली चलने के तुरन्त बाद पीपल से किसी व्यक्ति का शरीर नीचे गिरा। यह व्यक्ति लाल रंग की कसी हुई जैकेट और गुलाबी रंग की कसी हुई पैंट पहने था। उस व्यक्ति के नीचे गिरने से जब एक झटके के साथ उसकी जैकेट खुल गयी तो पता लगा कि पेड़ से गिरने वाला व्यक्ति पुरुष न होकर एक महिला थी। यह महिला पुराने माडल की दो पिस्तौलांे से लैस थी। इनमें से एक पिस्तौल खाली थी, दूसरी में उस समय भी गोलियाँ भरी थीं। उसकी आधी जेब में भी गोलियाँ भरी हुई थीं। वालेस यह देखकर कि जिस व्यक्ति को उसने मार गिराया वह कोई पुरूष नहीं बल्कि महिला है, वह फूट-फूट कर रोने लगा। साथ ही उसने कहा, यदि मुझे मालूम होता कि यह औरत है तो मैं हज़ार बार मर जाता परन्तु उसे नुकसान नहीं पहुँचाता।’’

शकील सिद्दीकी
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(समाप्त)

आशीष खंडेलवाल जी की ताजा पोस्ट के लिए

गूगल, यूं हिंदुस्तानियों के साथ खिलवाड़ न करो


शान्ति साम्राज्यवाद की मौत हैयुद्घ उसका जीवन है, विश्व में दो विश्व युद्घ लड़े गए है और दोनों ही साम्राज्यवादियों की धरती पर ही लड़े गए है दूसरे विश्व युद्घ के बाद साम्राज्यवादियों ने तय यह किया था कि अपनी धरती पर युद्घ नही लड़ना हैविश्व आर्थिक मंदी से निपटने के लिए साम्राज्यवादियों को युद्घ चाहिए इसके लिए एशिया में बड़े-बड़े प्रयोग किए जा रहे है और उनकी सारी ताकत एशिया की प्राकृतिक सम्पदा को लूट घसोट करने में लगी हैउनकी मुख्य विरोधी शक्तियां ईरान, उत्तर कोरिया, वियतनाम है और मुख्य प्रतिद्वंदी चीन हैईरान के रेवोलुशनरी गार्ड्स मुख्यालय पर आत्मघाती हमला हो चुका हैचीन भारत का युद्घ वह चाहते है । इसके लिए तरह-तरह की गोटियाँ चली जा रही हैउनके तनखैया इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया के लोग तरह-तरह की अफवाहबाजी उडा, भ्रम फैला कर युद्घ का माहौल तैयार कर रहे हैउसी का यह एक हिस्सा हैईराक में परमाणु हथियारों के सवाल को लेकर ईराक को तबाह किया गयाआज इराक़ में लाखो औरतें विधवा है . जिनके खाने और कमाने का कोई जरिया नही है , शिक्षा और स्वास्थ्य नाम की कोई चीज नही बची हैसाम्राज्यवादी ताकतें ईराक की प्राकृतिक सम्पदा को लूट रही है वही स्तिथि चीन और भारत का युद्घ करा कर यह ताकतें यहाँ की प्राकृतिक सम्पदा का दोहन करना चाहती हैयह जो कुछ हो रहा है वह सोची समझी रणनीति का हिस्सा हैहमारे अरुणांचल , जम्मू और कश्मीर को चीन का हिस्सा दिखा कर लोगों में भ्रम पैदा किया जा रहा है ताकि युद्घ का उन्माद पैदा होजो ताकतें यह हरकत कर रही है वह उनकी रणनीति का हिस्सा हैपूंजीवादी व्यवस्था में कोई चीज दान की नही होती हैमुनाफा और लाभ ही उनका धर्म हैये अपने अविष्कारों में हिस्सा देकर लाभ कमाते है । हमको अपनी मेहनत और श्रम का हिस्सा क्या उनके लाभ से हमको नही मिलता है ? हो सकता है उनकी योजना सफल हो तो भारतीय नक्शे में बीजिंग और इस्लामाबाद को दर्शाना शुरू कर दें

सादर
सुमन
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शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

दोस्त-दोस्त न रहा

साम्राज्यवादी लूट शोषण करने में अमेरिका और इजराइल की जोड़ी प्रसिद्ध है और इन दोनों देशों की खुफिया एजेन्सी सी आई और मोसाद विकास शील देशों के ख़िलाफ़ एकजुट होकर काम करती रहती है लेकिन समय आने पर वे एक दूसरे के विरूद्व जाकर अपना अधिपत्य कायम करना चाहती हैअभी कुछ दिन पूर्व अमेरिकी वैज्ञानिक को गिरफ्तार किया गया है जिसके ऊपर आरोप है की उसने इजराइल को ताजा खुफिया जानकारियाँ दी हैअमेरिकी वैज्ञानिक स्टीवर्ट डेविड नोजेट को एक स्टिंग ऑपरेशन में एफ.बी.आई एजेंट ने पकड़ा हैइजराइल हमेशा से अपने हितों की पूर्ति के लिए अमेरिका के ऊपर तमाम तरह के प्रयोग करता रहता हैइससे पूर्व ग्यारह सितम्बर की घटना वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में एक भी इजराइली कर्मचारी नही मारा गया था क्योंकि उस दिन सभी हजारो इजराइली करमचारियों ने एक साथ छुट्टी ले रखी थी और अमेरिकन साम्राज्यवाद ने उस दिशा में घटना की जांच करने की हिम्मत भी नही की और एशियाई मुल्कों के ऊपर तोहमत मड़कर अपना आतंक का साम्राज्य फैलाना शुरू कर दियासाम्राज्यवादी लूट में दोस्त-दोस्त रहा, बल्कि मुख्य चीज यह है कि किस तरीके से एक दूसरे के ऊपर दबाव बनाकर ज्यादा से ज्यादा लाभ लिया जा सके

सुमन
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ऊदा देवी :- 2

शहीद वीरांगना ऊदा देवी अवध के छठे बादशाह नवाब वाजिद अली शाह के महिला दस्ते की सदस्य थीं। वाजिद अली शाह ने, जो दौरे वली अहदी में परीख़ाना की स्थापना के कारण लगातार विवाद का कारण बने रहे तथा 1847 की फरवरी में बादशाह बनने के बाद अपनी जुनून की हद तक पहुँची संगीत प्रियता के कारण बार-बार ब्रिटिश रेजीडेंट द्वारा चेताये जाते रहे, बड़ी मात्रा में सैनिकों की भर्ती की जिसमें लखनऊ के सभी वर्गों के ग़रीबजनों को रोज़गार पाने का अच्छा अवसर मिला। ऊदादेवी के पति जो स्वयं भी काफी साहसी व पराक्रमी थे, वाजिद अली शाह की सेना में भर्ती हुए। वाजिद अली शाह ने इमारतों, बाग़ों, संगीत, नृत्य व अन्य कला माध्यमों की तरह अपनी सेना को भी बहुरंगी विविधता तथा आकर्षक वैभव दिया। उन्होंने अपनी पलटनों को तिरछा रिसाला, गुलाबी, दाऊदी, अब्बासी, जाफरी जैसे फूलों के नाम दिये और फूलों के रंग के अनुरूप ही उस पल्टन की वर्दी का रंग निर्धारित किया। परी से महल बनी चहेती बेगम सिकन्दर महल को ख़ातून दस्ते का रिसालदार बनाया गया। जिससे स्पष्ट होता है कि वाजिद अली शाह ने अपनी कुछ बेगमों को सैनिक तरबियत दिलायी थी। यों उन्होंने बली अहदी के दौर में अपने तथा परियों की हिफाज़त के उद्देश्य से तीस फुर्तीली स्त्रियों का एक सुरक्षा दस्ता भी बनाया था। जिसे अपेक्षानुरूप सैनिक प्रशिक्षण भी दिया गया। संभव है ऊदा देवी पहले इसी दस्ते की सदस्य रही हों क्योंकि बादशाह बनने के बाद नवाब ने इस दस्ते को भंग करके बाकायदा स्त्री पलटन खड़ी की थी। इस पलटन की वर्दी काली रखी गयी थी।
निःसन्देह इस पलटन में अफ्रीकी नस्ल की कुछ अश्वेत औरतें भी थीं लेकिन शायद काली वर्दी के कारण लेफ्टिनेंट कर्नल गोर्डेन एलक्जे़न्डर को, मारी गयी औरतें हब्शिनें नजर आईं, जिन्हें उसने ब्लैक कैट्स कहा और बताया कि वे जंगली बिल्लियों की तरह झपट-झपट कर लड़ीं। जबकि सार्जेण्ट फार्बस मिच्चल ने सिकन्दर बाग के उपवन में स्थित पीपल के एक बड़े पेड़ की ऊपरी शाख पर बैठी एक ऐसी स्त्री का विशेष उल्लेख किया है, जिसने अंग्रेजी सेना के कोई बत्तीस सिपाही और अफसर मारे। लंदन टाइम्स के संवाददाता विलियम हावर्ड रसेल ने लड़ाई के समाचारों का जो डिस्पैच लंदन भेजा उसमें पुरुष वेशभूषा में एक स्त्री द्वारा पीपल के पेड़ से फायरिंग करके तथा अंग्रेजी सेना को भारी क्षति पहुँचाने का उल्लेख प्रमुखता से किया। संभवतः लंदन टाइम्स में छपी खबरों के आधार पर ही कार्ल माक्र्स ने भी अपनी टिप्पणी में इस घटना को समुचित स्थान दिया। वीरांगना ऊदा देवी का ससुराली नाम जगरानी माना जाता है। इनके भक्त दृढ़ता से यह मत व्यक्त करते रहे हैं कि ऊदा देवी उर्फ जगरानी को 16 नवम्बर 1857 को सिकन्दरबाग में साहसिक कारनामा अंजाम देने की शक्ति उनके पति मक्का पासी के बलिदान से प्राप्त हुई। अर्थात 10 जून 1857 को लखनऊ के कस्बा चिनहट के निकट इस्माईलगंज में हेनरी लारेंस के नेतृत्व में ईस्टइंडिया कम्पनी की फौज के साथ मौलवी अहमद उल्लाह शाह की अगुवाई में संगठित, विद्रोही सेना की ऐतिहासिक लड़ाई में मक्का पासी की शहादत ने उनमें प्रतिशोध की ज्वाला धधकाई। इस प्रतिशोध कीे आग, उन्होंने कानपुर से आयी काल्विन कैम्बेल सेना के 32 सिपाहियों को मृत्युलोक पहुँचाकर बुझाई। इस लड़ाई में वे खुद भी वीरगति को प्राप्त र्हुइं। कहा जाता है इस स्तब्ध कर देने वाली वीरता से अभिभूत होकर काल्विन कैम्बेल ने हैट उतारकर शहीद ऊदा देवी को श्रद्धांजलि दी। निश्चय ही सिकन्दर बाग की लड़ाई चिनहट के महासंग्राम की अगली कड़ियों में से एक थी। यक़ीनी तौर पर चिनहट की लड़ाई में विद्रोही सेना की विजय तथा हेनरी लारेंस की फौज का मैदान छोड़कर भाग खड़ा होना पहले स्वाधीनता संग्राम की बहुत बड़ी उपलब्धि थी। जिसके निश्चित प्रभाव कालांतर में सितम्बर 1858 तक चले इस संग्राम पर पड़े। यह भी सही है कि दमन के सहारे साम्राज्य को फैलाये जाने के खिलाफ भारतीय अवाम में प्रतिशोध की जो लहर विस्तार पा रही थी उसका उल्लेख पहले भी आया है, मक्कापासी तथा ऊदादेवी इसकी विराटता से अलग नहीं थे, उनके भीतर भी वही आग थी, ज़ालिम फिरंगियों को खदेड़ो, मारो और बाहर निकालो। यह बहुत संभव है कि पति की मृत्यु के बाद ऊदा देवी में प्रतिशोध की यह ज्वाला अधिक उग्र हो आयी हो।

शकील सिद्दीकी
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.....जारी ......*

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009

ऊदा देवी:

साधारण महिला का असाधारण बलिदान

‘‘अत्याचार जितना भीषण होगा, उसकी प्रतिक्रिया उतनी ही भीषण होना अटल है।’’ लार्ड मैकाले के इन शब्दों को याद करते हुए, उग्र राष्ट्रवाद के व्याख्याकार और प्रचारक, स्वाधीनता संग्राम के प्रारम्भिक सेनानी विनायक दामोदर सावरकर ने प्रथम स्वाधीनता संग्राम पर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में एक स्थान पर लिखा है, ‘स्वदेश की यंत्रणाओं को देख, एक आध व्यक्ति या किसी एक विशेष वर्ग को तीव्र विषाद महसूस हो रहा था, ऐसी बात नहीं है। हिन्दु-मुसलमान, ब्राह्मण, शूद्र, क्षत्रिय, वैश्य, राजा-रंक, स्त्री-पुरूष, पंडित-मौलवी, सैनिक- पुलिस इन भिन्न-भिन्न धर्म, भिन्न पंथ और कई भिन्न व्यवसायों के लोगों ने मिलकर, स्वदेश का बुरा हाल देखते रहना असंभव हो जाने से, अकल्पनीय थोड़े अवसर में भयानक प्रतिशोध का बवंडर खड़ा करदिया। कितना राष्ट्रव्यापी था वह आन्दोलन, इस एक ही बात से मालूम होगा कि जिस पराकाष्ठा को जुल्म पहुँच गया था, उसी पराकाष्ठा तक अपने प्रतिकार को पहुँचाने का जतन भी किया गया था।’
वीर सावरकर की यह स्थापना 1857 के महासंग्राम का बहुत हद तक वास्तविक बिम्ब है। इससे भी पहले सर्वहारा की सत्ता का दर्शन देने वाले, सभी तरह के उपनिवेशों से जनता के विशाल हिस्सों की मुक्ति के पक्षधर, महान दार्शनिक कार्लमाक्र्स और ऐगेलस ने, इस संग्राम को आजादी की पहली लड़ाई मानते हुए, उसे उपनिवेशवादी जुल्म और दमन के खिलाफ भारतीय जनता के विराट विद्रोह के रूप में रेखांकित किया। यह जानना सुखद हो सकता है कि मई 1857 से आरम्भ होकर 1858 के उत्तरार्द्ध अर्थात सोलह महीनों तक चले इस महाविद्रोह के बारे में माक्र्स और ऐगेल्स ने 28 लेख लिखे। कार्लमाक्र्स ने 1853 के एक लेख में महत्वपूर्ण संकेत किया था कि अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान में अपने राज की हिफ़ाजत के लिये हिन्दुस्तानी पलटन खड़ी करके, अनजाने ही हिन्दुस्तानियों के हाथ में स्वतंत्रता का हथियार सौंप दिया है। जब इस सेना ने हिन्दुस्तानी अवाम के मुख़्तलिफ तबकों के साथ मिलकर अंग्रेजी राज के खिलाफ विद्रोह किया तब कार्ल माक्र्स अभिभूत हो उठे। उन्होंने 15 जुलाई 1857 को न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून में लिखाः-
......‘‘यह पहली मर्तबा है कि देशी फौजों ने अपने यूरोपियन अफसरों को मार डाला है, मुसलमान और हिन्दू परस्पर घृणा को छोड़कर अपने मालिकों के खिलाफ एक हो गये हैं, हिन्दुओं से प्रारम्भ होने वाली अशांति की परिणति दिल्ली के राजसिंहासन पर एक मुसलमान सम्राट के आरोहण से हुआ है....कि बगा़वत कुछ स्थानों तक सीमित नहीं है और अंतिम यह कि आंग्ल -भारतीय सेना का विद्रोह उस समय हुआ है जबकि अंग्रेजों के प्रभुत्व के खिलाफ महान एशियाई राष्ट्र आम असंतोष प्रकट कर रहे हैं......।’’
इस महा विद्रोह की सबसे बड़ी विशिष्टता थी भारत की दलित दमित जनता के सभी हिस्सों में उमड़ आया अप्रतिम आत्मविश्वास और आजाद होने का असाधारण उत्साह, साधारण सिपाही से लेकर सामान्य ग्रामवासी तक का अपनेको मुक्ति संघर्ष का नायक समझने का भाव, जिसका कई अंग्रेज लेखकों ने मज़ाक़ भी उड़ाया। जिस पर भारतीय इतिहास के विलक्षण अध्येता डा0 राम विलास शर्मा ने बहुत अर्थपूर्ण टिप्पणी की हैः-
‘बात सही है, भारतीय इतिहास में यह पहला अवसर था जब यहाँ का किसान सैनिक वेश में-स्वयं को देश का राजा समझता था। बांदा के पास एक गाँव में शाही झण्डा फहराने के बाद घुड़सवार सिपाहियों ने ऐलान किया ख़ल्क खुदा का-मुल्क बादशाह का, अमल सिपाही का।’’
इस पृष्ठभूमि में वीरांगना ऊदादेवी के संघर्ष और बलिदान को देखें तो उनसे सम्बंधित समूचा घटना़क्रम अधिक अर्थपूर्ण लगता है तथा उसके नये आयाम उद्घाटित होते जान पड़ते हैं। बहुत से लोगों के लिए यह रोमांचक बलिदान इस कारण महत्वपूर्ण हो सकता है कि ऐसा साहसिक कारनामा एक स्त्री ने किया। बहुत से लोग केवल इस कारण गर्व से मस्तक ऊँचा कर सकते हैं कि उस बलिदानी, दृढ़ संकल्पी महिला का सम्बन्ध दलित वर्ग से था। दूसरे लोग मात्र इसी कारण इस महाघटना के अचर्चित रह जाने को बेहतर मान सकते हैं। वे इसके लिये ठोस प्रयास भी करते रह सकते हैं, बल्कि किया भी है। 16 नवम्बर 1857 को लखनऊ के सिकन्दरबाग चैराहे पर घटित इस अपने ढंग के अकेले बलिदान तथा इसकी पृष्ठभूमि में सक्रिय अभिन्न पराक्रम को इस कारण अधिक महत्वपूर्ण माना जा सकता है कि इस घटना मात्र से समूचे प्रथम स्वाधीनता संग्राम को न केवल नयी गरिमा मिलती है बल्कि उसके अपेक्षित विमर्श से वंचित रह गये कुछ पक्षों पर व्यापक विचार के अवसर भी उपलब्ध होते हैं। विशेष रूप से यह विमर्श कि सामंतवाद के वैभवग्रस्त प्रतीकों के अवसानकाल में दमन पर आधारित, बहुत हद तक अमानवीय जाति व्यवस्था की क्रूर उपस्थिति के गहरे विषाद को नजरअंदाज सी करती लखनवी दरबार की विशिष्ट संस्कृति ने, जो अपनी स्त्री उन्मुखता के कारण सबसे ज्यादा बदनाम हुई, स्त्री के लिए कहाँ कितने अवसर निर्मित किये।

-शकील सिद्दीक़ी


सुमन
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गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009

पाकिस्तानी कहानी

भगवान दास दरखान

कचहरी शुरू नहीं हुई थी। जिस कमरे में मुक़दमों की सुनवाई होती थी, अभी तक ख़ाली था। अलबत्ता सदर दरवाजे़ की दहलीज़ के पास दो मुलाज़िम किवाड़ों से टेक लगाये फ़र्श पर फसकड़ा मारे बैठे थे। कमरे के ठीक बीचोबीच दीवार से ज़रा हटकर रंगीन खाट पड़ी थी। यह चैड़ा चकला पलंग था। उसके पाये ऊँचे-ऊँचे थे। उन पर रंग-रोगन से निहायत खुशनुमा नक़्क़ाशियाँ बनी थीं। पलंग पर साफ़ सुथरी झलकती हुई सफे़द चादर बिछी थी। पाँयती की तरफ़ दोहती थी। उस पर रंगीन धागों से आँखों को भानेवाली क़शीदाकारी की गयी थी और हाशिया सुर्ख़ नोल का था। सिरहाने बड़े-बड़े मोटे तक़िये रखे थे।
कमरे के आगे लम्बा बरामदा था। बरामदे के सामने चैड़ा अहाता था, जिसके पूरबी कोने में घने दरख़्तों का झुण्ड था। बरामदे में और दरख़्तों के नीचे किसान, बकरे और भेड़ों को लड़ानेवाले और अलग-अलग पेशों से ताल्लुक़ रखने वाले कामगार जगह-जगह छोटी-बडी़ टोलियों में बैठे थे। उनमें बडी़ तादाद ऐसे मर्दों-औरतों की थी, जिनके मुक़दमों की सुनवाई सरदार की कचहरी में चल रही थी या जिनकी सुनवाई अभी शुरू नहीं हुई थी। वे हँस रहे थे या अपने मुक़दमों के बारे में एक-दूसरे से विचार-विमर्श कर रहे थे। उनकी मिली-जुली आवाजा़ें का शोर आहिस्ता-आहिस्ता उभर रहा था, जिसमें सरायकी के साथ-साथ कहीं-कहीं बलूची भी मिली हुई थी।
तमाम आवाजें़ एकाएक बन्द हो गईं। हर तरफ़ गहरी ख़ामोशी छा गयी। कचहरी के सदर दरवाजे़ की दहलीज़ पर
बैठे हुए दोनों मुलाज़िम घबराकर उठे और नज़रंे झुकाकर मुस्तैदी से खडे़ हो गये। देखते ही देखते दरवाजे़ पर सरदार शहजो़र खा़ँ मजा़री प्रकट हुआ। वह घुटनों से भी नीची लम्बी कमीज़ और पूरे बीस गज़ की घेरदार शलवार पहने हुए था। उसके उजले लिबास पर इत्र लगा था, जिसकी तेज़ खुशबू से कमरे की फ़िजा़ महकने लगी। उसकी स्याह दाढी़ खूब घनी थी। मूँछें भी घनी थीं और चढी़ हुई थीं। आँखों से जलाल टपकता था। चेहरे पर रूआब और दबदबा था। पीछे, उसका कारदार चाकर खा़ँ सरगानी और हवेली का मालिशिया था। दोनों गरदनें झुकाये उसके पीछे-पीछे चल रहे थे।
सरदार को देखते ही मुलाज़िमों ने आगे बढ़कर उसके पैरों को हाथ लगाकर पैरनपून किया। ऊँची आवाज़ में दुआएँ दीं। ‘सई’ सरदार सदा जीवें। सुखी-सेहत होवें। खै़र-ख़ैरियत होवे। बाल-बच्चे सुखी सेहत होवंे। सब राज़ी-बाज़ी होवे।
सरदार मज़ारी ने हौले-हौले गरदन हिलायी और उनकी तरफ़ देखे बग़ैर कहा ‘‘खै़र-ख़ैर सलाये।’’ वह गरदन उठाये आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ा। रंगीन खाट के करीब गया। टाँगे समेटकर ऊपर पहुँचा। चाकर खा़ँ सरगानी ने झुककर उसके पैरों से ख़स्से उतारे। सरदार तक़ियों से टेक लगाकर बैठ गया। उसने दोनों पैरों के पंजे जोड़कर एक दूसरे से मिलाये और घुटने उठाकर ऊँचे कर लिए। सरगानी के इशारे पर एक मुलाज़िम बढ़कर आगे आया। उसके हाथ में ख़ीरी थी। यह सफे़द मलमल का ढ़ाई गज़ लम्बा टुकड़ा था, जिसे तह करके लगभग छह इंच चैड़ा कर लिया गया था। मुलाज़िम झुका और निहायत मुस्तैदी से ख़ीरी उसकी कमर और घुटनों के गिर्द लपेटकर बग़लबन्दी कर दी। फिर ख़ीरी के दोनों सिरे जोड़कर इस तरह दमोका लगाया कि आँखों के सिवा चेहरे का ज़्यादातर हिस्सा छुप गया।
बलूच नवाज़ सरायकी रईसों की परम्परा के मुताबिक़ जब इस तरह वेठ मारकर बैठ गया तो एक मुलाज़िम ने हुक्क़ा ताज़ा करके रंगीन खाट के करीब स्टूल पर रख दिया। सरदार ने हुक्के की नै सँभाली और होंठों में दबाकर कश लगाने लगा। तम्बाकू की खुशबू कमरे में फैलने लगी। मालिशिया फ़ौरन सरदार मज़ारी की पीठ के पास पहुँचा और तेज़ी के साथ उसके कन्धे और कमर हौले-हौले दबाने लगा।
कचहरी की कार्रवाई शुरू हुई, तो चाकर ख़ाँ सरगानी ने, जो पेशकार का फ़र्ज़ अदा कर रहा था, पहला मुक़दमा सुनवाई के लिए पेश किया। मुलाज़िम गड़रिया था और सरदार के सामने गरदन झुकाये सहमा हुआ खड़ा था। उसके खिलाफ़ यह इल्ज़ाम था कि उसकी रेवड़ की दो भेड़ें सरदार मज़ारी के एक खेत में घुस गयी थीं और मक्की के कई पौधों को नुकसान पहुँचाया था। गड़रिया गिड़गिड़ाकर माफ़ी माँगता रहा, क़समें खाकर यक़ीन दिलाता रहा कि आइन्दा ऐसी ग़लती नहीं होगी, मगर उसकी एक न सुनी गयी। सरदार की नज़र में जुर्म की नौइयत संगीन थी। लिहाजा उसे जुर्माने में पाँच भेडें़ मालखा़ने में पहुँचाने के अलावा तीन महीने जेल में कै़द रखने की सजा़ दी गयी।
चाकर खा़ँ सरगा़नी ने दबी जुबान से सूचित किया, ‘‘सई सरकार, जेल में जगह नहीं है।’’
‘‘जेल में जगह नहीं, तो मुजरिम को सुक्के खोह में डाल दिया जाये।’’ सरदार मजा़री ने हुक्म सुनाया, ‘‘जब तक जेल में जगह नहीं है, सजा़ पानेवाले तमाम कै़दियों को सुक्के खोह में डाल दिया जाये।’’
सुक्के खोह अन्धे कुएँ थे। ये चैड़े मुँहवाले ऐसे कुएँ थे, जो कभी सिंचाई के काम आते थे। मगर सूख जाने की वजह से न उनमें अब पानी था, न उसके निकलने की कोई संभावना थी। सरदार की निजी जेल जब कै़दियों से भर जाती और उसमें कोई गुंजाइश न रहती, तो क़ैदियों को सुक्के खोह में बन्द कर दिया जाता। वे अन्धे कुएँ में उठते-बैठते, सोते, खाना खाते और वहीं पेशाब-पाखाने से फ़ारिग़ होते। न उन्हें किसी से मिलने की इजाज़त होती, न बात करने की। खाना-पानी निश्चित वक़्त पर सुबह शाम रस्सी में बाँधकर पहुँचा दिया जाता। जाड़ा हो, गर्मी हो या बरसात, वे सुक्के खोह से बाहर न आते। अलबत्ता सर्दी के मौसम में कै़दियों को एक कम्बल दे दिया जाता और वह भी उनके घरवाले मुहैया करते। क़ैदियों को जो खाना दिया जाता, चाहे वे सरदार की निजी जेल में बन्द हों या सुक्के खोह में, उसकी की़मत भी सगे-सम्बन्धी ही अदा करते। अगर की़मत अदा न होती, तो कै़दियों को फा़का करना पड़ता। अक्सर कै़दी लगातार भूखों रहने से सिसक-सिसककर मर भी जाते। सुक्के खोह में साँप, बिच्छू और ऐसे ही ज़हरीले कीडे़-मकोडे़ भी होते, जो कभी-कभी कै़दियों की मौत की वजह बनते।
सरदार के फै़सला सुनाये जाने के बाद उस पर फौ़री तौर पर अमलदरामद शुरू हो गया। जुर्माने की अदायगी और सुक्के खोह में कै़द करने की ग़रज से मुजरिम को खींचते हुए कचहरी से बाहर ले जाया गया। सरदार का फै़सला आखि़री और अटल फै़सला था। उसके खि़लाफ़ किसी भी अदालत में न उज्रदारी हो सकती थी न अपील।
चाकर ख़ान सरगानी ने दूसरा मुक़दमा पेश किया। मुक़दमा सरदार शहजो़र खाँ मजा़री के सामने पहली बार पेश नहीं किया गया था, उसकी सुनवाई लगभग चार महीने से जारी थी। अब तक कई पेशियाँ पड़ चुकी थीं। मुक़दमा ख़ासा पेचीदा ओर निहायत संगीन था। लिहाजा़ सरदार मजा़री मसलेहत से काम लेते हुए उसे जानबूझकर तूल दे रहा था, कि गुज़रते वक़्त के साथ-साथ फ़रीका़ें के दिलों में पाया जानेवाला शदीद ग़म व गुस्सा ठण्डा पड़ जाये और उसके फै़सले से हर फ़रीक़ इस तरह मुतमइन हो जाये कि दिलों से बैरभाव हट जाये।
यह पानी के बँटवारे का पुराना झगडा़ था। नौइयत यह थी कि फ़रीकै़न एक ही रूदकोही से अपनी फ़सलों कीे सिंचाई करते थे। रूदकोही के खड्ड में पानी का ज़खी़रा कम था और फ़सलों के लिए ज़रूरत ज़्यादा थी। अंजाम यह हुआ कि पानी के बँटवारे पर झगड़ा पैदा हुआ। ऐसे झगड़े उन बारानी इलाक़ों में अक्सर होते हैं, जहाँ खेतों को रूदकोहियों से पानी दिया जाता है। डेरा ग़ाजी ख़ाँ और उसके आसपास के पहाड़ी इलाक़े में सिंचाई की यह व्यवस्था बहुत पुरानी है। इतनी पुरानी कि सही-सही नहीं पता कि यह कैसे प्रचलित हुई और किसने प्रचलित की। सिंचाई की इस व्यवस्था के तहत बारिश का पानी एक तरफ़ तो बरबाद होने से बचाया जाता है और दूसरी तरफ़ उसे खेती के लिए ज़्यादा उपयोगी बनाने की कोशिश की जाती है। होता यह है कि जब पहाड़ों पर बारिश होती,है तो पानी ऊँची-नीची चोटियों और चट्टानों की बुलन्दियों से ढलान की तरफ़ निहायत तेज़ रफ्तार से बहता है। मशहूर है कि उसके तेज़ धारे में ऐसी काट होती है कि अगर ऊँट उसकी ज़द में आ जाये, तो पैरों और कूचों की हड्डियाँ भी आरी की तरह काट देता है।
यह बरसाती पानी आन की आन में उफान और सैलाब की सूरत इख़्तियार कर लेता है। तेज़ और तीखे रेले में मुसाफ़िरों से भरी हुई बसें बह जाती हैं। फ़सलें बरबाद हो जाती हैं। इन्सान और मवेशी बह जाते हैं। पत्थर, मिट्टी और घास-फूस के बने हुए मकान ढह जाते हैं। हर तरफ़ जल थल हो जाता है। तबाही और बरबादी का बाज़ार गर्म हो जाता है। यही पानी, जो पहाड़ों और उसके दामन में बसने वालों के लिए रहमत का पानी बन सकता है, ज़हमत और मुसीबत बन जाता है।
लेकिन वे जगहें जहाँ रूदकोहियाँ मौजूद हैं, इस तबाही से महफूज़ रहती हैं। उन जगहों पर पानी के तेज़ बहाव का रुख़ मोड़ने के लिए ढलवान पर जगह-जगह मिट्टी और पत्थरों के मजबूत और ऊँचे-ऊँचे पुश्ते बनाये गये हैं। इस तरह बारिश का पानी छोटी-बड़ी नालियों से बहकर उस ज़मीन को जलमग्न करता है, जिस पर खेती-बाड़ी होती है। मगर ऐसी बारानी ज़मीन पर आमतौर पर सिर्फ़ एक फ़सल होती है, जिसमें मक्की के इलावा ज्वार और बाज़रा पैदा होते हैं।
ऐसी रूदकोहियाँ (जल संग्रह का एक तरीक़ा) पहाड़ियों की तलहटी में जगह-जगह देखने में आती हैं। लेकिन झगड़ेवाली रूदकोही इस से भिन्न थी, ज्यादा उपयोगी और देर तक काम आने वाली। अपनी नौइयत और उपयोगिता के ऐतबार से वह एक छोटे से बाँध की तरह थी। उसका निर्माण इस तरह किया गया था कि बारिश के पानी की तेज़ धारा पुश्तों से टकराकर जब अपना रास्ता बदलती, तो नालियों से गुज़रती हुई ढलान के उस तरफ़ बहकर जाती, जहाँ ज़मीन खोदकर पानी का ज़ख़ीरा करने का निहायत मुनासिब इन्तज़ाम था। पानी का यह ज़ख़ीरा ज़मीन की सतह से कुछ बुलन्दी पर था और उसका हिस्सा एक विस्तृत गुफा के अन्दर दूर-दूर तक फैला हुआ था।
पानी का यह ज़ख़ीरा, जिसे स्थानीय बोली में खड्ड कहा जाता है, पहाड़ी चट्टानों के सख़्त और बड़े-बड़े पत्थर तोड़-फोड़कर निहायत जी तोड़ मेहनत से बनाया गया था, ताकि गर्मी के मौसम में पानी सुरक्षित रहे। खड्ड का पानी आम घरेलू इस्तेमाल के भी काम आता था। खड्ड से खेतों की सिंचाई करने के लिए जो नहरें और नालियाँ बनायी गयी थीं, वे ख़रीफ के इलावा कभी-कभी रबी की फ़सल की काश्त के वास्ते भी पानी मुहैया कराती थीं।
फ़रीकै़न (वादी-प्रतिवादी) का ताल्लुक़ तमन मज़ारी के रस्तमानी और मस्दानी क़बीलों से था। वे सुलेमान पहाड़ की दक्षिणी तलहटी में खेती-बाड़ी के साथ-साथ भेड़ चरवाही भी करते थे। साँझी रूदकोही से अपने खेतों को पानी देते थे। यह इलाका बलूचिस्तान के बुक्ती क़बीलों के निवास स्थान, डेरा बुक्ती से लगा हुआ है, जो शहज़ोर ख़ाँ मज़ारी की एक बलूच बीबी को बाप की तरफ़ से विरासत में मिला था। इसलिए अब वह उस जागीर में शामिल था।
पानी के बँटवारे का झगड़ा बढ़कर धीरे-धीरे रस्तमानियों और मस्दानियों के दरमियान पुरानी क़बाइली दुश्मनी की शक्ल अख्ति़यार करता गया। बदले की कार्रवाई के तौर पर मवेशी उठा लिये जाते, फ़सलों को नुक़सान पहुँचाने की कोशिश की जाती, रात केे अँधेरे में चोरी-छिपे पानी के बहाव का रुख़ मोड़ दिया जाता, ज़ख़ीरा यानी खड्ड के मुँह से रुकावटें हटा दी जातीं और अपने खेतों को ज़्यादा से ज़्यादा जलमग्न करने की गऱज़ से पानी की चोरी की जाती।
कई बार लड़ाई-झगड़े हुए, मगर पिछले हफ़्ते ज़बरदस्त हथियारबन्द मुठभेड़़ हुए। मुठभेड़ से पहले बाकायदा विरोधी फ़रीक़ को ललकारकर ख़बरदार किया गया था कि वह पूरी तैयारी के साथ मुक़ाबले पर आयें। इसलिए फ़रीकैन ने अपने-अपने क़बीले से जं़ग-आज़माओं और सूरमाओं को इकट्ठा किया, रात भर जागते रहे। सलाह-मशवरा करते रहे। अपनी और दुश्मन की ताक़त और असलहों का अन्दाज़ लगाते रहे और उसकी रौशनी में प्रभावशाली जं़गी कार्रवाई करने के मंसूबे बनाते रहे।
रात आँखों में कटी। सूरज निकला। धूप पहाड़ों की चोटियों से फैलती हुई नीचे उतरने लगी। सुबह हो गयी। वे कमर कसकर बक्कल के स्थान पर पहुँच गये। वे निहायत जोशो-ख़रोश से नारे लगा रहे थे। ढोल बजा रहे थे। पगड़ियाँ उछाल रहे थे। हाथों में दबे हुए हथियारों को सरों से ऊपर उठाकर लहरा रहे थे। तरह-तरह से खून को गरमा रहे थे। अपने हौसले बुलन्द से बुलन्दतर कर रहे थे। बलूचों की युद्ध संहिता में यह मुगदर मारना था।
वे कुछ देर तक आमने-सामने खडे़ रहे। मुगदर खींचकर अपनी ताक़त और दुस्साहस का प्रदर्शन करते रहे; फिर तलवारें सूँतकर और कुल्हाड़ियाँ और दूसरे हथियार सँभालकर वे आगे बढे़ और दाढ़ियाँ दाँतों तले दबाकर भयानक गुस्से के आलम में एक-दूसरे पर टूट पडे़। तलवार तलवार से और कुल्हाडी़ कुल्हाडी़ से टकरायी। गर्द के बादल उठे। फ़िजा़ धुआँ-धुआँ हो गयी। नारे बुलन्द से बुलन्दतर होते गये। शोर बढता गया। हर तरफ़ ख़ून के छींटे उड़ने लगे।
ग़ज़ब का रन पडा़। मगर बहुत ज़्यादा ख़ून-ख़राबे की नौबत न आयी। हुआ यह कि लडा़ई शुरू होते ही एक हिन्दू चीख़ता-चिल्लाता, दुहाई देता एक ओर से प्रकट हुआ और तेजी़ से दौड़ता हुआ क़रीब पहुँच गया। उसका नाम भगवानदास था। अधेड़-उम्र था। सिर और दाढी़ के बाल खिचडी़ थे, मगर जिस्म मज़बूत था। क़द ऊँचा था। पेशे के एतबार से वह दरखान था, यानी बढ़ई होने के साथ-साथ राजगीर का काम भी करता था और पड़ोस की बस्ती कोटला शेख़ में रहता था। उसके इलावा कोटला शेख़ में हिन्दुओं के चन्द और खा़नदान भी आबाद थे जो खेती-बाडी़ करते थे, भेड़ चरवाही करते थे या भगवानदास दरखान की तरह मेहनत-मज़दूरी करते थे।
भगवानदास दरखान भाग-दौड़ करने के बाद बुरी तरह हाँफ रहा था। उसका चेहरा पसीने से सराबोर था। उसकी पगडी़ खुलकर गले में आ गयी थी। सिर के लम्बे-लम्बे बाल बिखरे हुए थे। हक्कल की इत्तिला सूरज निकलने से पहले ही उसे मिल गयी थी। इत्तिला मिलते ही वह तारों की छाँव में घर से निकल खड़ा हुआ। उसने हक्कल के मुकाम पर जल्द से जल्द पहुँचने की कोशिश की और गिरते-पड़ते समय से पहुँचने में कामयाब भी हो गया। उसने निहायत दुस्साहस और बेबाक़ी का प्रदर्शन किया। अपनी जान की बाज़ी लगाकर वह बेधड़क लड़नेवालों की पंक्तियों में घुस गया। मेढ़ करने के लिए चीख़-चीख़कर दुहाई देता रहा और उनके दरमियान चट्टान की तरह तनकर खड़ा हो गया। उसने दोनों हाथ बुलन्द किये। तलवारों और कुल्हाड़ियों के वार हाथों पर रोके। वह ज़ख़्मी हुआ और ज़ख़्मों से निढाल होकर गिर पड़ा।
उसने मार-धाड़ बन्द कराने के लिए यह हथियार आज़माया था, जिसे बलूची में मेढ़ कहा जाता है। भगवानदास दरखान हिन्दू था और चूँकि हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, लिहाज़ा मुसलमान बलूच अपनी श्रेष्ठ क़बाइली परम्परा के मुताबिक उनकी जानो-माल का इस हद तक ख़याल रखते हैं कि उनको ऐसा समझा जाता है कि किसी को म्यार बनाने के बाद उसका खून बहाना या किसी तरह की तकलीफ़ पहुँचाना बलूचों की क़बाइली आचार संहिता की दृष्टि से अत्यन्त घृणित और जवाबी कार्रवाई जैसा माना जाता है। इसलिए भगवानदास दरखान की कोशिश और दुस्साहस सनकियों-सा साबित हुआ। हंगामा करने वाले ठण्डे पड़ गये। उठे हुए हाथ रुक गये। जो जहाँ था, वहीं रुक गया। लड़ाई फ़ौरन बन्द हो गयी। वैसे ही मेढ़ के लिए उस हिन्दू दरखान के अलावा अगर कोई सैयदज़ादा क़ुरान शरीफ़ उठाये साक्षात् फ़रीकै़न के दरमियान आ जाता या क़बीलों की चन्द बूढ़ियाँ सिर खोले, बाल बिखराये, गले में चादर डाले ठीक लड़ाई के दौरान रणभूमि में पहुँच जातीं, तो उनके सम्मान में भी लड़ाई बन्द करने का ऐलान कर दिया जाता।
मेढ़ की दृष्टि से तात्कालिक ढंग पर जं़ग बन्द हो गयी। भगवानदास दरखान की फ़ौरी तौर पर मरहम पट्टी की गयी और उसे कोटला शेख़ पहुँचा दिया गया। रस्तमानी और मस्दानी शूरवीर भी अपने-अपने ज़ख़्म लिए चले गये। मगर उनके चेहरों पर अभी तक भयानक क्रोध छाया हुआ था। आँखें शिकार पर झपटनेवाले बाज़ की तरह चमक रही थीं। ख़ून खौल रहा था। शूरवीरों का जोश सवा नैजे़ पर था। दोनों तरफ़ खींचातानी और ग़मो-गुस्सा का वातावरण था। उस वक़्त सूरते हाल निहायत संगीन हो गयी, जब तीसरे रोज़ सूरज डूबने से कुछ देर पहले मस्दानी क़बीले का एक ज़ख़्मी चल बसा। मृतक के घर में कुहराम मच गया। उसके भाइयों और क़बीले के दूसरे लोगों के सीनों में बदले की आग शिद्दत से भड़क उठी और मस्सत करने यानी ख़ून के बदले ख़ून की तैयारियाँ जा़ोर-शोर से होने लगीं। बदले की ऐसी कार्रवाई को लस्टदबीर कहा जाता है।
रस्तमानियों को जब उस लस्टदबीर का पता चला, तो उधर भी लोहा गरम हुआ। मरने-मारने की तैयारियाँ शुरू कर दी गईं। फ़ौरन डाह का बन्दोबस्त किया गया। इसके लिए यह तरीक़ा अपनाया गया कि एक ऐसे शख़्स को डाहडोक मुकर्रर किया गया, जिसका ताल्लुक़ एक तटस्थ क़बीले से था। डाहडोक क़द्दावर जवान था और मँझा हुआ ढोलकिया था। दिन चढ़े वह गले में ढोल डालकर निकला और ढोल बजाकर हर तरफ़ मुनादी करने लगा। वह पहले तड़ातड़ कई बार ढोल पर तमची से चोट लगाता और फिर बायाँ हाथ झटककर ख़ास अन्दाज़ में इस तरह थाप देता, जिसका स्पष्ट भाव यह था कि लड़ाई का ख़तरा सरों पर मँडरा रहा है। रणभेरी बजने वाली है। वह दिन ढले तक इसी तरह फ़रीकै़न को ख़बरदार करता रहा।
डाह का ऐलान होते ही एक बार फिर दोनांे तरफ़ जं़ग की तैयारियाँ होने लगीं। मगर कुछ ऐसे क़बीले भी थे, जो इस लड़ाई-झगड़े में अभी तटस्थ थे। उनका ताल्लुक़ बलचानी और सरगानी क़बीलों से था। वे ख़ून-ख़राबे के बजाय फ़रीकै़न में सुलह-सफ़ाई कराने की ख़्वाहिश रखते थे। उन्होंने आपसी सलाह-मशवरे से ‘मेढ़ मरका’ यानी लड़ाई-झगड़ा ख़त्म कराने का मंसूबा बनाया। मृतक के क़बीले को अपने आगमन की ख़बर दी और सुलह कराने की ग़रज़ से पहुँच गये। उनके साथ क़बीलों के बुजुर्ग और प्रतिष्ठित लोग थे। इलाके़ का एक सैयदज़ादा था और जिस क़बीले के हाथों क़त्ल हुआ था उसके प्रतिष्ठित लोग भी थे।
बातचीत की शुरूआत हुई, तो फ़िज़ा में निहायत खिंचाव था। फ़रीकै़न एक-दूसरे के खिलाफ़ संगीन इल्जाम लगा रहे थे। दुश्मनी के साथ-साथ मरहूम के भाइयों का रवैया निहायत बर्बरतापूर्ण था। ऐसा महसूस होता था कि ‘मेढ़ मरका’ का मंसूबा नाकाम हो जायेगा। सुलह-सफ़ाई की कोशिश बेकार जायेगी। सूरते-हाल सँभलने के बजाय बिगड़ने लगी। मगर प्रतिष्ठित लोगों और बुजुर्गों ने ठीक वक़्त पर हस्तक्षेप किया। बीच का रास्ता अपनाया। उत्तेजित और बिफरे हुए नौजवानों का गुस्सा ठण्डा किया। मृतक के सगे-सम्बंधियों को मस्सत करने से रोका। बदले की कार्रवाई के ख़तरनाक और दूरगामी नतीजों से ख़बरदार किया।
धीरे-धीरे तनाव कम होने लगा। चेहरों पर छायी हुई मलिनता और झुँझलाहट का गुबार छँटने लगा। आँखों से निकलती हुई चिनगारियाँ बुझने लगीं। प्रतिष्ठित जनों की ख़्वाहिश थी कि ख़ून के बदले खून के बजाय मरहूम के खून की कीमत और घायलों का तावान, आपसी रज़ामंदी से निश्चित कर दिया जाये। लेकिन मृतक की माँ ज़रीना बीबी खून की क़ीमत और तावान लेने के लिए तैयार न र्हुइं। वह बेवा थी। उसके पाँच बेटे थे। एक के हलाक़ होने के बाद चार रह गये थे। चारों कड़ियल जवान थे। उनके कद ऊँचे और जिस्म मज़बूत थे। वे भी अपनी माँ से सहमत थे। वे बार-बार माँग कर रहे थे कि उनकी प्रतिशोध भावना की आग सिर्फ इसी सूरत में ठण्डी पड़ सकती है कि सरों की पगड़ियाँ गरदनों में डालकर और मुल्जिमों की तरह नज़रें झुकाकर बाकायदा सबके सामने माफ़ी माँगी जाये। उनके कब़ीले के प्रतिष्ठित लोग भी यही चाहते थे। मगर विरोधी फरीक़ को यह माँग किसी तरह मंजूर न थी। वह उनके कब़ीले की आन का खुला अपमान था।
देर तक बहसा-बहसी होती रही। कोई नतीजा न निकला। दोनों फरीक अपनी अपनी जगह पर अड़े हुए थे। आखिरकार यह तय हुआ कि चन्द रोज़ बाद फिर सिर जोड़कर बैठा जाये और सुलह कराने की नये सिरे से कोशिश की जाये। उस वक़्त तक लड़ाई-झगड़ा न होगा। मेढ़ यानी जंगबन्दी का पूरी तरह लिहाज़ रखा जाये। किसी तरह की उत्तेजना का प्रदर्शन नहीं किया जाये।
तटस्थ क़बीलों के प्रतिष्ठित लोगों और बुजुर्गों ने, जो मारधाड़ के बजाय सुलह और मेल-मिलाप के ख़्वाहिशमन्द थे, अपनी कोशिश बराबर जारी रखी। फ़रीकै़न से लगातार राब्ता क़ायम रखा और ऐसा तरीक़ा अपनाना चाहा, जो दोनों के लिए क़बूल करने लायक़ हो। आखि़र वे इसमें कामयाब भी हो गये। बलूचों के क़बीलाई कानून के मुताबिक़ यह बिंज का तरीक़ा था। उसकी नौइयत यह थी, कि सज़ा के तौर पर मृतक के एक भाई से विरोधी क़बीले की किसी लड़की का रिश्ता तय कर दिया जाये, जो मेढ़ मरका के हिसाब से बिंज कहलाता था।
बिंज का दस्तूर सिर्फ़ बलूचों में ही नहीं, मुल्क़ के कुछ दूसरे इलाक़ों के क़बीलों और बिरादरियों में भी प्रचलित है और उसे सवार कहा जाता है।
बिंज होने वाली लड़की, गुलज़री के बाप का नाम नूर बख़्श रस्तमानी था। वह खेती-बाड़ी के इलावा खजूर की फ़सल का ठेका लेने वाला ज़मींदार भी था। नूरबख़्श रस्तमानी अपने क़बीले का खुशहाल और अहम सदस्य समझा जाता था। पानी के बँटवारे के झगड़े का वह इस हैसियत से साफ़ तौर पर अहम किरदार था कि उसके खेतों का रकबा ज़्यादा बड़ा था और उसके खेत झगड़ेवाली रूदकोही से सटे हुए भी थे। हथियारबन्द लड़ाई में भी वह आगे-आगे था और बढ़ चढ़कर हमले कर रहा था। मृतक के सिर पर जो घातक घाव थे, चश्मदीद गवाहों के मुताबिक वह भी नूरबख्श़ रस्तमानी की कुल्हाड़ी के वार से हुआ था।
नूरबख़्श रस्तमानी को प्रतिष्ठित लोगों और बुजुर्गों के दबाव के सामने खुलकर इन्कार करने की जुर्रत न हुई, मगर वह अपनी बेटी को बिंज बनाने के लिए किसी तरह तैयार न था। वह शदीद परेशानी में मुब्तिला था। उसकी बड़ी बहन शीरीं की दुखभरी ज़िन्दगी उसके सामने थी। क़त्ल की एक वारदात के बाद क़बीले के सामूहिक फै़सले के मुताबिक शीरीं को भी बिंज बनने पर मजबूर कर दिया गया था। बिंज तय होने के बाद शीरीं का, मृतक के बड़े भाई के साथ निकाह पढ़ाया गया। वह बूढ़ा था और दमे का पुराना मरीज़ था। सिर और दाढ़ी-मूँछों के बाल सफ़ेद हो चुके थे। वह न सिर्फ़ शादीशुदा था, बल्कि उसकी दो बीवियाँ भी मौजूद थीं। शीरीं रूख़सत होकर अपने शौहर के घर पहुँची तो उसने सिर्फ, सुहागरात उसके साथ बितायी। वह भी इस तरह कि अपनी प्रतिशोध भावना की शान्ति के लिए। वह उसे मादरज़ाद नंगा करके रात भर तरह-तरह से यातनाएँ पहुँचाता रहा। ज़लील और बेइज़्ज़त करता रहा। सुबह होते ही उसे मैके भिजवा दिया गया। दुबारा न कभी बुलाया, न उससे मिला और न ही तलाक दी। शादी से पहले वह जवानी की उमंगों से भरी एक खूबसूरत और बाँकी किशोरी थी। एक ही रात में वह जलकर राख हो गयी थी। उसका रंग-रूप धुँधला गया था। आँखों के कमल बुझ गये थे। चेहरे पर वीरानी छा गयी थी।
उस सदमें को वह कुछ अरसे तक तो बरदाश्त करती रही, फिर उसका मानसिक सन्तुलन बिगड़ गया। वह हर वक़्त ख़ामोश बैठी शून्य में घूरती रहती। न किसी से बोलती, न बात करती। पूछने पर भी कुछ न कहती। माँ को गुमान हुआ कि किसी तरह के डर से इसका दिल कमज़ोर हो गया है। इसलिए तैर रैच कराया गया। उस तरीक़े के इलाज के मुताबिक़ शीरीं को बिस्तर पर चित लिटाकर पीतल का कटोरा पानी से भरकर रख दिया जाता था। उसमें शीशा पिघलाकर डाल दिया जाता। यह क्रिया कई बार की गयी, लेकिन कोई फ़ायदा न हुआ। शीरीं का दवा-इलाज बराबर होता रहा। दवा के साथ-साथ टोने और टोटके भी आजमाये जाते। इसलिए शामरज़ मँगवाया गया। यह हरे रंग का गोल पत्थर था, जिस पर विभिन्न रंगों के नन्हे-नन्हे बेलबूटे थे। उसमें सूराख़ किया गया और एक डोरी में पिरोकर शीरीं के गले में डाल दिया गया, ताकि कोई भूत-प्रेत और झपेट हो, तो उसका असर ख़त्म हो जाये। इसी मक़सद के लिए शीरीं के सिरहाने आसान परी रखा गया। यह भी हल्का कोयलानुमा बदबूदार पत्थर था। ख़ातून बीबी की मन्नत मानी गयी। पाक-साफ़ होकर तरह-तरह के खाने पकाये गये और ऐसी महफूज़ जगह पर पकाये गये, जहाँ कोई मर्द न जा सके। खाना भी ग़रीब-गुरबा और मुहताजों को इस तरह खै़रात में दिया गया, कि सामने बिठाकर खिलाया गया। उसमें किसी बच्चे, मर्द या गर्भवती औरत को बिल्कुल नहीं शामिल किया गया। ऐसी मन्नत को बीबी दस्ती कहा जाता है।
मगर न कोई मन्नत कारगर साबित हुई, न कोई दवा-दारू काम आया और न टोना-टोटका। शीरीं का पागलपन बढ़ता गया। न खाने का होश रहा, न पहनने का। कभी हँसती, कभी फूट-फूटकर रोती। कभी झुँझलाकर जिस्म के तमाम कपड़े झर्र-झर्र फाड़ देती और बिल्कुल नंगी हो जाती। पालगन का शदीद दौरा पड़ता, तो आँखें लाल हो जातीं। चेहरे पर डर तैरने लगता। उसी डर की हालत में घर से बाहर निकल जाती। जिधर मुँह उठता उधर चली जाती। बाप उस वक्त तक जिन्दा था। वह बार-बार उसे पकड़कर वापस लाता। जब वह उसके पागलपन से बहुत आजिज़ आ गया तो घर में कै़द कर दिया। पैरों में लोहे की जं़जीर डाल दी। हर वक्त कड़ी निगरानी भी की जाती, ताकि वह घर से बाहर न जा सके।
एक रोज वह किसी तरह घर से निकल गयी। बाप को ख़बर मिली। वह घोडे़े पर सवार होकर उसकी तलाश में निकला। आखि़र वह उसे बस्ती से दूर एक वीरान रास्ते पर मिल गयी। आलम यह था कि लिबास तार-तार था और एक तरह से बिखरा हुआ पड़ा था। वह मादरज़ाद नंगी थी और रास्ते से हटकर जंगली झाड़ियों की ओट में पड़ी थी उसकी बुरी हालत देखकर पता चलता था कि किसी ने उसे अपनी हवस का शिकार बनाया है। यह उसकी बेटी शीरीं न थी, उसकी इज़्ज़त और मर्यादा तार-तार हो चुकी थी , वह शर्म से नज़रें झुकाये उसके क़रीब पहुँचा और अपनी पगड़ी सिर से उतारकर उसके जवान और नंगे शरीर पर डाल दी।
कुछ देर वह उसके पहलू में निढाल और खिन्नचित खड़ा रहा, फिर उसके सिरहाने बैठ गया। ममता ने जोश मारा, तो दिल भर आया। आँखों से टप-टप आँसू गिरने लगे। वह हौले-हौले बेटी का सिर थपकने लगा। बेटी ने आँखें खोलकर बाप को देखा और कराहती हुई उठकर बैठ गयी। उसने बाप से कोई बात न की। उसकी वीरान आँखों में न शर्म थी, न पश्चाताप। चेहरा बिलकुल सपाट था। एकाएक उसने बाप को गुस्से से देखा और जिस्म पर लिपटी हुई पगड़ी खींचकर एक तरफ़ फेंक दी। बाप ने फौरन पगड़ी उठा ली और उसका बदन ढाँप दिया लेकिन वह बाज़ न आयी पगड़ी हटाकर फिर अलग कर दी। बाप ने दोबारा उसका बदन ढाँपा। कई बार ऐसा हुआ।
बाप के लिए उसका पागलपन असद्वय हो गया। चेहरे पर झुँझलाहट के साये फैल गये। वह भी गुस्से से पागल हो गया। उसने शीरीं के गाल पर तड़ाक से थप्पड़ मारा। दूसरा मारा, तीसरा मारा। उसका गुस्सा कम होने के बजाय बढ़ता गया। वह लगातार लात-घूँसें चलाता रहा। यहाँ तक कि वह हाँफने लगा।
शीरीं ने आपत्ति नहीं की। वह न रोई, न चिल्लायी, न उसने फ़रियाद की, न दुहाई दी। चुपचाप मार खाती रही। उसकी एक आँख सूज गयी थी। ज़ख़्मी होंठ से ख़ून रिस रहा था। वह जम़ीन पर ख़ामोश और बेहाल पड़ी थी। उसके सिर के बाल धूल में सने हुए थे। चेहरा भी धूल-सना होकर मटियाला हो गया था। मगर वह ज्यादा देर तक उस हालत में न रह सकी। उसने करवट बदली और उठकर बैठ गयी। एक बार फिर उस पर पागलपन का दौरा पड़ा उसने जिस्म से लिपटी हुई पगड़ी का एक कोना पकड़कर खींचा और उसे तार-तार कर एक तरफ घृणा के साथ फेंक दिया।
बाप ने गुस्से-भरी नज़रों से उसे देखा। पगड़ी उठायी और उसी से शीरीं के जिस्म को लपेटकर गठरी बनायी। उठाकर घोड़े पर डाला। खुद भी सवार हुआ और घोडा़ सरपट दौडा़ने लगा। मगर वह अपने घर न गया। सुनसान और टेढे़-मेढे़ रास्तों से गुज़रता हुआ एक वीरान लोप में पहुँचा। यह ऐसा, मुका़म था, जिसके तीन तरफ़ काले-काले पत्थरों की बंजर पहाड़ियाँ थीं। उनमें बसेरा करनेवाली चिड़ियाँ भी काली-काली थीं। घोडा़ लोप में दाखि़ल हुआ और उसकी टापें उभरीं, तो चिड़ियों का एक झुण्ड भर्रा मारकर उडा़ और स्याह बादल की तरह फ़िजा में बिखर गया। बाप ने उनकी तरफ़ कोई ध्यान न दिया। घोडा़ एक पहाडी़ के दामन में रोक, नीचे उतरा। बेटी को घोडे़ की पीठ से नीचे उतारकर पथरीली ज़मीन पर एक तरफ़ डाला। वह बिल्कुल गुमसुम थी। खा़ली नज़रों से बाप के चेहरे को तक रही थी, मगर उसने मुड़कर बेटी की तरफ़ न देखा। कमर से बँधा हुआ खंजर निकाला। बेटी की तरफ़ बढा़ उसके धूल-सने बालों को एक हाथ से पकड़कर सिर झुकाया। घुटनों के बल फ़र्श पर बैठा और खंजर से बेटी का गला काट डाला। खून का फव्वारा उबला, जिसके छींटों से बाप का चेहरा भी ख़ून से तर हो गया।
खंजर से ज़िबह करने के बाद वह चन्द लम्हे तक बेटी के तड़पते हुए जिस्म को देखता रहा। उसकी घनी दाढ़ी और मूँछों के सख़्त बालों पर ख़ून के लाल क़तरे बिखरे हुए थे। आँखों के चिराग़ जल रहे थे, बुझ रहे थे। वह रुक-रुककर गहरी साँस भरता रहा। फिर उसने खून-सना खंजर मज़बूती से पकड़ा और एक चट्टान से अड़ाकर पूरी ताकत़ से अपने सीने में उतार दिया। वह निढाल होकर गिरा और धूल में लिथड़ा हुआ पथरीली ज़मीन पर फड़कने लगा। नूरबख़्श रस्तमानी को इस भयानक घटना की सूचना एक चरवाहे से मिली। वह बदहवासी के आलम में घोड़ा दौड़ाता हुआ लोप में पहुँचा। सूरज लोप की पहाड़ियों की चोटियों पर जगमगा रहा था। उसकी रंगत सुर्ख़ पड़ती जा रही थी, जिससे स्याह पहाड़ियाँ भी हल्की लालिमा लिए हुए दीख रही थीं। ऊपर आसमान पर चीलों और गिद्वों का एक झुण्ड मँडरा रहा था। एक पहाड़ी की तलहटी में उसके बाप और बहन शीरीं के जिस्म क़रीब-क़रीब पडे़ थे। लाल ख़ून जमकर स्याह पड़ गया था। दोनों मर चुके थे।
बाप का हाथ अभी तक खंजर के मूठ पर जमा हुआ था। गरदन एक तरफ़ ढुलक गयी थी। बहन की ज्योतिहीन आँखें खुली थीं। वे पल-पल सुर्ख़ होते हुए आसमानों को तक रही थीं। नूरबख़्श रस्तमानी की उम्र उस वक़्त सोलह बरस के लगभग थी। हालाँकि उसके सिर और दाढ़ी के बालों में अब कहीं-कहीं सफ़ेदी झलकने लगी थी, मगर उस दिल दहला देने वाले दृश्य को वह अब तक भुला न सका था। नूरबख़्श रस्तमानी अपनी लाडली बेटी गुलज़रीं को बिंज बनाकर अपनी बड़ी बहन शीरीं की तरह, दिल हिला देने वाले उस रूप में किसी भी तरह नहीं देखना चाहता था, जिसे याद करके वह हमेशा तड़प उठता था। वह उदास और बहुत परेशान था। गुलज़रीं का रिश्ता अपने हमरुतबा एक ख़ुशहाल घराने के नौजवान से तय कर चुका था, जो लाहौर के एक काॅलेज में अपनी तालीम पूरी कर रहा था। रिश्ता तय करने के बाद वह दलोर के तौर पर पच्चीस हज़ार रूपये भी ले चुका था। यह वह रक़म थी, जो बलूचों के समाजी दस्तूर के मुताबिक़ लड़की के माँ-बाप उसके होने वाले शौहर से वसूल करते हैं। बहावलपुर और उसके आस-पास के इलाका़ें में भी यह रस्म आम है। अलबता दलोर की रक़म को सम्भा कहा जाता है।
गुलज़रीं अगर मेढ़ मरका की वजह से बिंज बन जाती है, तो नूरबख़्श को दोहरा नुक़सान होता। इस तरह उसकी बेटी न सिर्फ़ मृतक के वारिसों की प्रतिशोध-भावना की भेंट चढ़ जाती, बल्कि उसे दलोर के पच्चीस हजार रूपये भी वापस करने पड़ते।
इसलिए उसकी ख़्वाहिश थी कि गुलज़रीं ब्याहकर अपने होने वाले शौहर के पास चली जाये और उसके साथ हँसी-खुशी जिन्दगी बसर करे और दलोर की पच्चीस हजार की रक़म ख़ून की क़ीमत के तौर पर मृतक के वारिसों को दे दी जाये। लेकिन पंचायत के मेढ़ मरका का फै़सला उसकी ख़्वाहिश के उलट होने वाला था।
पंचायत बैठने में अभी दो रोज़ बाक़ी थे। नूरबख़्श ने आख़िरी कोशिश की। वह रातों-रात छुपता-छुपाता शाह मीर पहुँचा। चाकर ख़ाँ सरगानी से खुफिया तौर पर मिला। उसे सूरते-हाल से आगाह किया। अपना दुख-दर्द बताया, गिड़गिड़ाया। पाँच सौ रूपये निकालकर सरदार के लिए नज़राना पेश किया और यह ख़्वाहिश ज़ाहिर की कि पंचायत के बजाय सरदार अपनी कचहरी में मुक़दमें का फैसला करें और उसकी बेटी गुलज़रीं को बिंज होने से बचा लें।
चाकर ख़ाँ सरगानी से मिलने के बाद नूरबख़्श फ़ौरन वापस चला गया।
सरगानी एकान्त में सरदार शहजोर ख़ाँ मज़ारी से मिला। नूरबख़्श रस्तमानी ने जो पाँच सौ रूपये नज़राने के दिये थे, पेश किये। नूरबख़्श की परेशानी बयान की और दबी जुबान में यह भी बताया कि वह क्या चाहता है। चाकर ख़ाँ सरगानी किसी के लिए जान की बाज़ी लगा देने वाला और वफ़ादार होने के साथ-साथ सरदार मज़ारी का राज़दार और सलाहकार भी था। इसलिए सरदार मज़ारी ने पूरी तफ़सील सुनने के बाद सूरते-हाल का जायज़ा लिया। सरगानी से सलाह मशवरा किया और पंचायत में मेढ़ मरका का फै़सला होने के पहले ही मुक़दमा अपने हाथ में ले लिया।
मुक़दमें की सुनवाई शुरू हुए कई घण्टे गुज़र चुके थे। क्वार के महीने का तपता हुआ सूरज चढ़कर आसमान के बीचो-बीच पहुँच गया था। गर्मी बढ़ गयी थी। कचहरी में मस्दानियों के दो इज़्ज़तदार लोगों के अलावा मृतक की बेवा माँ ज़रीना बीबी और उसके बेटे भी मौजूद थे। रस्तमानियों के इज़्ज़तदार लोगों के साथ-साथ नूरबख़्श भी अदालत में हाज़िर था।
कचहरी पर सन्नाटा छाया था। सब ख़ामोश थे। सरदार शहज़ोर ख़ाँ मज़ारी भी चुप था। पिछली पेशियों में फ़रीकै़न बयान दे चुके थे। गवाहियाँ भी हो चुकी थीं। सबूत भी मुहैया किये जा चुके थे। फ़रीकै़न और उनके गवाहों के बयानों पर जिरह भी की जा चुकी थी। अब वह मरहला आ गया था कि सरदार मज़ारी को मुक़दमे का फैसला सुनाना था, मगर वह फैसला सुनाते हुए हिचकिचा रहा था। मुक़दमे की कार्रवाई की शुरुआत ही से अन्दाज़ा हो गया था कि उसे सोच-समझकर फै़सला सुनाना होगा। मुक़दमा बहुत पेचीदा और संगीन था। फै़सले की तीन ही साफ़ सूरतें थीं, और वे ये थीं कि मृतक के वारिसों को तैयार किया जाये कि ख़ून की क़ीमत के तौर पर नक़द रक़म वसूल कर लें और अगर वे इस पर राज़ी न हों तो रस्तमानियों पर दबाव डाला जाये कि मस्दानियों की माँग के मुताबिक माफ़ी माँग लें। इसके अलावा नूरबख़्श रस्तमानी की बेटी गुलज़रीं को बिंज क़रार देने का तरीक़ा था, जो तटस्थ क़बीलों के प्रतिष्ठित लोगों और बुजुर्गों ने तजवीज़ किया था। लेकिन नूरबख्श से नज़राने की सूरत में पाँच सौ रूपये लेने के बाद वह ऐसा नहीं करना चाहता था।
मगर वह जो भी फै़सला करता, किसी फ़रीक में इतनी जुर्रत न थी कि उसे क़बूल करने से इन्कार करता। वह सरदार था और उसका फै़सला आखि़री फै़सला था, लेकिन फै़सला ज़बरदस्ती थोपने की सूरत में यह अंदेशा था कि मेढ़ मरका पर पूरी तरह अमल न होता और फ़रीकै़न की लड़ाई और दुश्मनी ख़त्म होने के बजाय और बढ़ जाती। किसी बहाने छेड़छाड़ होती और एक बार फिर सशस्त्र संघर्ष होता। ख़ून-ख़राबा होता। कुछ मारे जाते, कुछ ज़ख़्मी होते। यह सूरते-हाल सरदार मज़ारी के लिए शर्म और बदनामी का बाइस होती। उसके इन्साफ़ पर धब्बा लगता। लिहाजा उसकी कोशिश यह थी कि ऐसा फैसला करे, जिसे दोनों फ़रीक़ राज़ी-खुशी मंज़ूर कर लें।
सरदार मज़ारी इस उधेड़बुन में मुब्तिला था और हुक्के की नै होंठांे में दबाये आहिस्ता-आहिस्ता कश लगा रहा था। उसी वक़्त भगवानदास दरखान कचहरी में दाखि़ल हुआ, मगर दरवाजे़ ही पर ठिठककर रह गया। सरदार ने उसे देखा, तो पहली ही नज़र में पहचान गया।
पिछले जाड़ों का जिक्र है। सरदार मज़ारी ने बड़ी बेटी की शादी से पहले अपनी हवेली के सदर दरवाजे़ का नवीनीकरण कराया, तो फाटक के बदरंग और सड़े गले किवाड़ बदलकर नये बनवाये थे। इस काम के लिए चाकर ख़ाँ सरगानी ने भगवानदास दरखान को लगाया था, जो अपनी हुनरमन्दी और महारत के लिए मशहूर था। उसकी रिहाइश का बन्दोबस्त भी हवेली के वसाख यानी मेहमानख़ाने के उस हिस्से में कर दिया गया था, जहाँ नौकर-चाकर और दूसरे खि़दमतगार कोठरियों में रहते थे।
भगवानदास बहुत मेहनती और कार्यकुशल था। हमेशा अपने काम से काम रखता। सूरज निकलते ही वह औज़ार सँभालकर अपनी कोठरी से निकलता और सूरज डूबने तक काम में जुटा रहता। अलबत्ता मंगल को वह छुट्टी करता। सोमवार की शाम को वह कोटला शेख चला जाता और बुधवार की सुबह वापस काम पर चला आता। उसके इन रोजमर्रा के कामों में कभी फर्क न आया। सरदार मज़ारी चाहता था कि हवेली के सदर दरवाज़े की तामीर का काम जल्द से जल्द खत्म हो जाये। इसलिए एक बार उसने भगवानदास दरखान को रोकना चाहा, तो वह हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। आजिज़ी से बोला ‘‘साईं तू सरदार है, तू मुजस्सिम शेर-है। तेरा हुक्म सिर आँखों पे। पर मैं मंगलवार को इधर नहीं रह सकता। मंगलवार को मैं बस्ती में सिर्फ अपना मन्दिर बनाने का काम करता हूँ। कोई दूसरा काम नहीं करता।‘‘
भगवानदास दरखान ने ठीक ही कहा था। उन दिनों उस पर एक ही धुन सवार थी, और वह थी कोटला शेख में मन्दिर की तामीर और यह काम भी वह तने-तन्हा कर रहा था। कोई बाल बच्चा भी नहीं था, न बीवी थी। कुछ बरस पहले उसकी बीबी जिन्दा थी वह उसकी दोस्त और हमदर्द थी। उसी के रोकने पर भगवानदास दरखान ने शरणार्थी बनकर बम्बई जाने का इरादा छोड़ दिया था जहाँ उसका छोटा भाई और कई रिश्तेदार पहले ही पहुँच चुके थे। बीवी के मरने के बाद ज़िन्दगी में जो खालीपन पैदा हो गया था, उसे भरने के लिए भगवानदास दरखान ने मन्दिर बनाने की ठानी और इस काम के लिए मंगल का दिन ख़ासतौर पर तय कर दिया। उसकी बीवी का इन्तिकाल मंगल ही को हुआ था। वह हफ्ते में छह रोज़ मेहनत करता और जो कुछ बचता उसे मन्दिर की तामीर पर लगा देता।
गरज कि सरदार शहज़ोर खाँ मज़ारी ने उसे दोबारा रोकने की कोशिश नहीं की। भगवानदास पूरी लगन और तल्लीनता से सरदार-मज़ारी की हवेली में काम करता रहा। फाटक के ऊँचे-ऊँचे किवाड़ों की जोड़ी तैयार करने के साथ-साथ हवेली के सामने के हिस्से की तामीर का काम भी उसी ने अंजाम दिया। किवाड़ों की जोड़ी पर इस नफ़ासत और बारीक़ी से फूल बूटे और ऐसी सज्जल मेहराबें बनायी कि हवेली की शान दोगुनी हो गयी। जो देखता वाह-वाह करता। सरदार मज़ारी उसके काम से इस क़दर खुश हुआ कि रुख़सत करते वक़्त पचास रूपये बतौर इनाम दिये।
भगवानदास दरखान पहली बार सरदार मज़ारी की कचहरी में हाज़िर हुआ था। हालाँकि वह मुकद्में का एक अहम गवाह था। फ़रीकैन ने अपने बयानों में उसका ज़िक्र भी किया था, मगर किसी ने उसे बतौर गवाह पेश नही किया था।
सरदार मज़ारी टकटकी बाँधे उसे चन्द लम्हे तक तकता रहा, फिर हाथ के इशारे से क़रीब बुलाया। वह आगे बढ़ा और सँभल-सँभल कर कदम उठाता हुआ सरदार के सामने पहुँच गया। दस्तूर के अनुसार दुआ-भरे जुमलों से ताबेदारी ज़ाहिर की। ‘सई सरदार सदा जीवे। बाल-बच्चे सबकी खै़र हो।‘ वह सरदार के क़दमों की तरफ झुका मगर पैरनपून के लिए पैरों को हाथ न लगाया। झुका हुआ सिर उठाया और सीधा खड़ा हो गया। सरदार शहज़ोर खाँ मज़ारी को उसका रवैया नागवार लगा, मगर अनदेखी से काम लिया। उसने ग़ौर किया, भगवानदास दरखान की दाढ़ी और मूँछों के बाल कुछ और सफेद हो गये थे। वह अब कमज़ोर और निढ़ाल नज़र आ रहा था। सिर पर ढीली-ढाली पगड़ी थी और गर्मी के बावजूद बदन पर मटमैली चादर लिपटी हुई थी। उसके माथे पर पसीने की बूँदें थीं और आँखें बुझी-बुझी थीं।
सरदार मज़ारी को उसी वक़्त याद आया कि वह मंगल का दिन था और उस रोज़ भगवानदास सिर्फ अपना मन्दिर बनाने का काम करता था। उसने हैरत से दरयाफ्त किया, ‘‘दरखान! आज मंगल है। आज तू कैसे आ गया? तूने आज मन्दिर बनाने का काम नही करना?‘‘
‘‘न सई, मैं अब मन्दिर नही बनाता।‘‘
‘‘क्यों?‘‘सरदार को और ज़्यादा हैरत हुई।
भगवानदास दरखान ने कोई जवाब नहीं दिया। ख़ामोशी से बायीं तरफ सिर झुकाया। गरदन के पास अड़सा हुआ चादर का कोना दाँतों से पकड़कर एक झटके से अलहिदा कर दिया। चादर ढुलककर नीचे गिर गयी। भगवानदास ने अपने दोनों हाथ फैलाकर सामने कर दिये, जो कुहनियों तक कटे हुए थे।
‘‘सई जो दरखान मन्दिर बनाता था, उसका मरन हो गया। जब दरखान ही न रहा तो मन्दिर कैसे बन सकता है?‘‘ उसने सर्द आह खींची, ‘‘मेरा मन्दिर बनाने का सफना (सपना) सफना ही रह गया। वह कभी पूरा न होगा।‘‘
कचहरी पर सन्नाटा छा गया। हर शख़्स खामोश था और हैरान और परेशान नज़रो ंसे भगवानदास की कटी हुई बाँहों को देख रहा था जिन्हें वह परकटे कबूतर की तरह हौले-हौले हिला रहा था। चन्द लम्हे गहरी खामोशी छायी रही, फिर सरदार मज़ारी की आवाज़ उभरी, ‘‘भगवानदास , तेरे ये हाथ मस्दानियों और रस्तमानियों की लड़ाई में मेढ़ कराते हुए कट गये थे?‘‘
‘‘ना सई, कटे नही, जख्मी थे।‘‘ भगवानदास ने सफाई दी, ‘‘जब बस्ती में ज़ख़्म ठीक नहीं हुए, पकने और सड़ने लगे थे, तो मैं शहर जाकर सरकारी अस्पताल में भर्ती हो गया। वहाँ डॉक्टरों ने दोनों हाथ काट दिये। मैं अब तक अस्पताल ही में था। पिछले इतवार को कोटला शेख़ वापस पहुँचा था।‘‘
‘‘यह तो बहुत बुरा हुआ। ऐसा नही होना चाहिए था।‘‘ सरदार ने अफ़सोस ज़ाहिर किया, ‘‘तेरे साथ बहुत ज़ुल्म हुआ।‘‘
‘‘न सई, कोई जुलुम-शुलुम नहीं हुआ। जब लड़ाई-भिड़ाई होती है, तो ऐसा होता है। कोई मरता है, कोई ज़ख़्मी होता है।‘‘ भगवानदास ने मुड़कर मृतक की माँ की तरफ देखा, ‘‘मुझे तो यह दुख है कि मेढ़ कराने के लिए कुछ पहले पहुँच जाता, तो शायद जरीना बीबी का पुत्तर बच जाता। कई ज़ख़्मी होने से बच जाते।‘‘ फिर उसने थोड़े से अन्तराल के बाद कहा, ‘‘सई मैं तो यह सोंचकर कचहरी में आया था कि मेंढ़ मरका....‘‘
‘‘ठीक है, ठीक है।‘‘ सरदार ने उसे आगे कुछ कहने न दिया, ‘‘भगवानदास तू नेक बन्दा है। तूने बहुत चंगा काम किया।‘‘ सरदार मज़ारी का चेहरा अचानक लाल हो गया। आँखों से जलाल टपकने लगा। उसने प्रलयंकारी दृष्टि से सामने खड़े मस्दानियों और रस्तामानियों को देखा। हाथ उठाकर भगवानदास दरखान की तरफ़ इशारा किया और तीखे लहजे़ में मस्दानियों को सम्बोधित कियाः-
‘‘इसे देख रहे हो, यह तुम्हारा म्यार है। इसकी जानो-माल की हिफ़ाज़त करना तुम्हारा फ़र्ज़ है। पर तुम दावा लेकर आ गये। तुमने यह नहीं सोचा कि तुम्हारे राजगीर पर क्या बीती। यही तुम्हारी म्यारदारी है? बोलो, जवाब दो।’’
‘‘सई सरदार, तू बिलकुल ठीक कह रहा है।’’
मस्दानियों के एक प्रतिष्ठित आदमी ने अपने क़बीले का प्रतिनिधित्व करते हुए अपनी मजबूरी ज़ाहिर की, ‘‘सई हमसे भूल हो गयी, माफ़ी दे दे।’’
सरदार ने रस्तमानियों की तरफ़ देखा, ‘‘तुमने अपने म्यार के लिए क्या किया? तुम्हारी म्यारदारी को क्या हो गया? तुम अपने जुर्म की सफ़ाई पेश करने आ गये। अपने गवाह भी लाये। सबूत भी दिये।’’ उसने एक बार फिर भगवानदास दरखान की तरफ़ हाथ उठाकर इशारा किया, ‘‘जुर्म की सफ़ाई तुम किस तरह पेश करोगे?’’
‘‘इस तरह काम नहीं चलेगा।’’ सरदार मज़ारी ने नजरें़ घुमा-फिराकर मस्दानियों और रस्तमानियों की तरफ़ देखा, ‘‘म्यार पर जो जुल्म हुआ है, माफी माँगने से उस संगीन जुर्म से मुक्ति नहीं हो सकती।’’ उसने गुस्से से गरदन को झटका, ‘‘हरगिज नहीं हो सकती।’’
कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया। सब ख़ामोश थे। सहमे हुए थे। सरदार ने हुक्के की नै संभाली। होंठों में दबायी और हौले-हौले कश लगाने लगा। उसका सेवक चाकर खाँ सरगानी हाथ बाँधे, नज़रें, झुकाये अदब के साथ खड़ा था। मालिशिया फु़र्ती के साथ सरदार की कमर और बाँहों के पुट्ठे दबा रहा था। उसके हाथ तेज़ी से चल रहे थे।
सरदार मज़ारी ने हुक्के की नै एक तरफ़ की। खँखारकर गला साफ़ किया और भारी भरकम लहजे़ में फ़रीकै़न को सम्बोधित किया, ‘‘भगवानदास दरखान के कचहरी में हाज़िर होने के बाद, क्योंकि मुक़दमें की नौइयत बदल गयी है, लिहाजा इसके बारे में नये सिरे से सोच-विचार करना होगा। मुकदमंे की कार्रवाई कल भी जारी रहेगी। कचहरी अब बर्खास्त की जाती है।’’
सरगानी के इशारे पर एक मुलाजिम़ फ़ौरन आगे बढ़ा। सरदार मज़ारी के करीब पहुँचा और उसकी कमर और घुटनों से लिपटी हुई ख़ीरी की गिरह खोलने लगा।
दूसरे रोज़, पहर दिन चढ़े मुदकमें की कार्रवाई फिर शुरू हुई। मगर ज़्यादा देर जारी न रही। न किसी फ़रीक़ का बयान लिया गया, न कोई पेशी हुई, न जिरह। सरदार मज़ारी ने सिर्फ मुक़दमें का फै़सला सुनाया, जो बहुत ही छोटा था।
‘‘चश्मदीद गवाहों की गवाहियों से रस्तमानियों के खि़लाफ़ जुर्म साबित हो गया हैे। लिहाज़ा उनको हुक्म दिया जाता है कि वे पच्चीस हज़ार रूपये, बतौर खून की कीमत मस्दानियों को अदा करें। खूनकी क़ीमत नूरबख्श रस्तमानी मुहैया करेगा। मगर ये पच्चीस हजार रूपये मृतक की माँ, ज़रीना बीबी को नहीं, बल्कि बतौर तावान भगवानदास दरखान को दिये जाएँ। नूरबख्श रस्तमानी को एक हफ्ते की मुहलत दी जाती है। अगर इस दौरान वह रूपया मुहैया न कर सके, तो उसे सुक्के खोह में डाल दिया जाये। उसे तब तक न रिहा किया जाये, जब तक वह भगवानदास दरखान को पूरा तावान अदा न कर दे।’’
सरदार शहज़ोर खाँ मज़ारी के इस फै़सले के खिलाफ़ न किसी फ़रीक़ ने ऐतराज किया, न विरोध। उनके चेहरों पर न किसी क़िस्म की झुँझलाहट थी, न मलिनता। उन्होंने ख़ामोशी से फैसला सुना और कचहरी से बाहर चले गये।

-शौकत सिद्दीक़ी

सुमन
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लोकसंघर्ष पत्रिका में शीघ्र प्रकाशित

बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

राष्ट्रवादियों के लिए

यहाँ हर मुस्लिम को अपने भारतीय होने और उसके नाते सभी समान अधिकार पाने की उम्मीद रखनी चाहिएअगर हम उसके मन में यह भावना नही जगा पाते तो हम अपने देश और विरासत दोनों के लिए अपात्र हैं

-राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगाने
वाले भारत के प्रथम गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल

सुमन
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क्या राष्ट्रवादियों के कानो में झुनझुना बजाऊं ?

जब कभी आप किसी सच्चाई की तलाश करना चाहते है तो यह जरूरी है कि आप उसके प्रचलित और लोकप्रिय अर्थ से हटकर सोचने की कोशिश करेंसाम्प्रदायिकता की परिभाषा आज नए सिरे से करने की जरूरत हैसमाज का एक वर्ग जब किसी चीज की परिभाषा एक तरह से करना शुरू कर देता है तब हम उसी दिशा में सोचने लगते हैअगर दस-पाँच पीढियों से हमारा परिवार हिन्दुस्तान में रह रहा है तो मैं उतना ही राष्ट्रीय हूँ जितने की आपफिर क्या जरूरी है कि आप मुझे अपनाएंगे जब मैं आपके कानो में राष्ट्रीयता का झुनझुना बजाऊंयदि मैं सांप्रदायिक हूँ तो आप मुझसे ज्यादा सांप्रदायिक हैं, जिन्होंने मुझे सांप्रदायिक बनाया

-गुलशेरखान शानी
विनोद दास की 'बतरस' से साभार

सुमन
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मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009

भगवा आतंकवाद

मडगाँव धमाके में जिन चीजों का प्रयोग किया गया है , उसी तरीके से ठाणे, पनवल में भी हुआ थामडगांव धमाके में राज्य सरकार के परिवहन मंत्री जो गोमांतक पार्टी के है , पत्नी का नाम भी रहा हैमालेगांव की घटना भी इससे जुड़ती हैसमझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट में राजस्थान पुलिस सी बी आई ने भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रणव मंडल समेत 4 से पूछ ताछ की हैयह संकेत देश के लिए हितकर नही है । देश में पनप रहे भगवा आतंकवाद और पाकिस्तान के तालिबानी आतंकवाद का मुख्य श्रोत्र अमेरिकन साम्राज्यवाद है और अमेरिका विरोधी मुख्य देश ईरान में रेवोलुशनरी गॉर्ड मुख्यालय पर आत्मघाती हमले में 49 लोगों की मृत्यु हो चुकी हैईरान ने कहा है कि इस आत्मघाती हमले में पकिस्तान का हाथ हैपकिस्तान सरकार के पीछे अमेरिका का हाथ हैअफगानिस्तान व ईराक में अमेरिका अपनी कठपुतली सरकार चला ही रहा हैपकिस्तान में उसका वर्चश्व है ही . अमेरिकन साम्राज्यवाद चाहता यह है कि एशिया की सरकारों पर उसका नियंत्रण हो जिसके लिए वह धार्मिक उन्माद वाली शक्तियों को मदद देकर अपना अधिपत्य स्थापित करना चाहता है । दूसरी तरफ़ मुख्य बात यह है की अमेरिका भारतीय सेना को भी प्रशिक्षित कर रही है । पकिस्तान की सेना को उसने पहले प्रशिक्षित किया था तो पकिस्तान का यह हाल है । अमेरिका ही आतंकवाद का मुख्य श्रोत्र है वह सरकार के साथ भी है और आतंकवादियों के साथ भी है । भगवा आतंकवाद के बहाने अमेरिकन साम्राज्यवाद देश को अस्थिर करके अपना वर्चश्व स्थापित करके यहाँ प्राकृतिक सम्पदा व मानव सम्पदा का दोहन करना चाहता है । आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सब मिलकर विविध,सांस्कृतिक , धार्मिक एकता को मजबूत बनाये रखें ।

सुमन
loksangharsha.blogspot.com
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