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बुधवार, 23 अप्रैल 2014

महात्मा गांधी से मोदी का क्या संबंध?

   अगर नफरत की खुराक पर कोई पला हो, तो उसका असर कभी जाता नहीं। संघ परिवारियों से नफरत के अलावा और किसी बात की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। देखिए नरेंद्र मोदी की भाषा, ‘‘कांग्रेस एक बीमारी है। नेहरू परिवार में नकली गांधी हैं। कांग्रेस के नेता कहते हैं कि कांग्रेस एक विचार है। वास्तव में यह एक विचार था, जब तक गांधी जी जीवित थे। ‘‘चलिए नेहरू परिवार पर हमला बोलने के लिए ही गांधीजी को याद किया। लेकिन यह मोदी की शुद्ध मक्कारी है। महात्मा गांधी, उनके विचारों और उनकी विरासत से संघ का हमेशा 36 का आँकड़ा रहा है। संघ की औपचारिक सदस्यता का कोई रजिस्टर नहीं होता, इसलिए संघ वाले सुविधानुसार खंडन कर देते हैं कि अमुक व्यक्ति संघ में नहीं है। संघ एक विचार है और नफरत के इसी विचार से प्रेरित होकर नाथूराम गोड्से ने गांधीजी की हत्या की थी।
     मोदी और अन्य संघ परिवारियों को यह बताना चाहिए कि उन्होंने दूसरे सर संघ चालक माधव राव सदाशिव गोलवलकर के विचारों का त्याग किया है या नहीं। वे हिटलर और मुसोलिनी को प्रेरणा स्रोत के रूप में अब देखते हैं या नहीं? मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यकों से अब नफरत करते हैं या नहीं? आज उनका विचार क्या है? आखिर यूरोप के फासिस्टों से संघ परिवारियों का चोली-दामन का साथ रहा है।
    मोरेश्वर राव मुंजे ने 1931 में इटली के फासिस्ट नेता मुसोलिनी से भेंट की थी और फासिस्ट आंदोलन को सराहा था। दूसरी ओर जवाहर लाल नेहरू ने मुसोलिनी से भेंट के आमंत्रण को ठुकरा दिया था। भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कोलकाता यूनिवर्सिटी के कुलपति के नाते मुसोलिनी की एक सरकारी संस्था से संबंध स्थापित किए थे। गोलवलकर को कांग्रेस का यह सिद्धांत बहुत बुरा लगा कि देश के सभी निवासियों को मिलाकर देश बनता है। संघ ने सिद्धांत प्रतिपादित किया कि भारत हिंदुओं का है। चेकोस्लोवाकिया के जर्मन भाषी इलाके सुडेटेनलैंड पर हिटलर के कब्जे की सराहना करते हुए गोलवलकर ने लिखा कि यह एक बहुजातीय देश की विफलता का प्रमाण है। उन्होंने लिखा, ‘जर्मनी ने अपनी नस्ल और  संस्कृति की शुद्धता को बनाए रखने के लिए दुनिया को झटका मार दिया। यहाँ नस्ली गौरव की पराकाष्ठा के दर्शन होते हैं। जर्मनी ने यह भी दिखा दिया कि मूलतः भिन्न नस्लों और संस्कृतियों के लिए एक राष्ट्र समिश्रित होना कितना असंभव है। हिन्दुस्तान को  सीखने और लाभान्वित होने के लिए एक अच्छा पाठ।’ गोलवलकर की मंशा बहुत साफ थी-जैसे हिटलर ने 60 ला
ख यहूदियों को मार डाला, कुछ वैसा ही भारत को भी अपनी नस्ली और सांस्कृतिक शुद्धता के लिए करना चाहिए। 2002 के गुजरात दंगों के संदर्भ में गोलवलकर की घोषणा का पाठ होना चाहिए। मोदी ने अपने संगठन के विचार का उल्लेख किया। उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि गोलवलकर के इस विचार को वह स्वीकार करते हैं या नहीं।

 -प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

चुनाव आयोग :पेड न्यूज मीडिया की एक लाइलाज बीमारी


    पेड न्यूज के ऊपर चुनाव आयोग ने इस बार काफी चिन्ता व्यक्त की है। हर जिले में जिला निर्वाचन अधिकारी के नेतृत्व में एक मानीटरिंग कमेटी बनाकर इसकी निगरानी किए जाने के निर्देश भी चुनाव आयोग द्वारा दिए गए हैं। बावजूद इसके प्रेस की भूमिका पर सवाल खड़े हैं।
    यह सवाल खड़ा होना लाजिमी है क्योंकि अधिकांश चुनावी दलों को जनता तक अपनी झूठी सच्ची बात पहुँचाने के लिए मीडिया की आवश्यकता होती है। चुनावी खर्चा न बढ़े इसके लिए अधिकांश प्रत्याशी प्रिन्ट व इलेक्ट्रानिक मीडिया को बंद मुट्ठी डील कर लेते हैं और जनसम्पर्क के नाम पर अपने लिखे लिखाए प्रेस नोट देश के प्रमुख समाचार पत्रों में छपवाए जाते हैं।
    चुनाव के अंतिम चरणों में समीक्षा छापने का सिलसिला प्रारम्भ किया जाता है और चुनावी सर्वे की भाँति जातिगत तथा बिरादरी पर आधारित आँकड़े मतदाताओं के सम्मुख परोस कर उन मतदाताओं को प्रभावित किया जाता है जो अन्तिम समय तक चुनाव में विजयी होने वाले प्रत्याशी के ऊपर अपना मत दाँव स्वरूप लगाते हैं। जाति तथा बिरादरी के आँकड़ों को अपने मनमाफिक ऐसा खींचतान कर मतदाताओं के सामने प्रस्तुत किया जाता है कि मतदाता अपना निर्णय गलत ले लेता है।
    विगत लोकसभा चुनाव में पेड न्यूज का सिलसिला इतना परवान चढ़ा कि प्रेस परिषद ने बाद में इसे संज्ञान में लिया और कुछ समाचार पत्रों व प्रत्याशियों के खेल को बेनकाब कर उनके विरुद्ध कार्रवाई की। बाकायदा लाखों रूपये का स्पेस देश के प्रमुख समाचार पत्रों में बुक किया गया। देखने में यह विज्ञापन न लगे इसलिए पत्रकारिता के हुनर के जौहर दिखलाते हुए इसे ऐसी भाषा में पाठकों के सामने परोसा जाता है कि पेड न्यूज के दायरे से बचा जा सके।
    उधर इलेक्ट्रानिक मीडिया की हालत इस मामले में और भी बदतरीन है। जिस प्रकार से नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा व उसके सहयोगी एन.डी.ए. गठबंधन को चुनाव से पूर्व सर्वे के माध्यम से दिखाया जा रहा है और उससेे भाजपा एन.डी.ए. के पक्ष में हवा बाँधी जा रही है उस पर कांग्रेस, आप पार्टी, जनता दल (यू) राष्ट्रीय लोकदल, वाम मोर्चा, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी व आर0जे0डी0 समेत सभी राजनैतिक दलों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है, परन्तु इस मामले में बेबस चुनाव आयोग यह कहते हुए अपने हाथ खड़े कर चुका है कि सर्वे पर रोक लगाना उसके बस में नहीं है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय की ओर से केवल दो दिन पूर्व के सर्वे को प्रतिबंधित किया गया है। कम्युनिस्ट पार्टियाँ मीडिया को रूपया नहीं देती हैं इसलिए उनका समाचार न तो प्रिन्ट मीडिया और न ही इलेक्ट्रानिक मीडिया पर दिखाई देता है।
    पेड न्यूज का प्रारम्भ विगत दो दशकों से अधिक देखने को मिल रहा है। वास्तव में हाईटेक प्रचार का चलन जबसे भारतीय राजनीति में आया है तभी से मीडिया का महत्व राजनैतिक दलों में बढ़ा है। बाकायदा मीडिया प्रभारी की एक पोस्ट हर पार्टी ने अपने यहाँ रख कर मीडिया मैनेजमेन्ट की कवायद शुरू कर दी।
    वैसे मीडिया द्वारा जनता का मिजाज बदलने का चलन बहुत पुराना है और पूरे विश्व स्तर पर मीडिया का महत्व इसीलिए है कि प्रचार के द्वारा अपनी बात समाज में पोषित की जा सकती है। अभी हाल में विश्व स्तर पर स्थापित सोशल मीडिया ने मध्य एशिया के अरब, अफ्रीकी राष्ट्रों में हुकूमतों का तख्ता पलट दिया। परिणाम स्वरूप बहुत से राष्ट्रों ने अपने यहाँ फेसबुक इत्यादि पर प्रतिबंध भी लगा दिया है।
    देश के विभाजन से लेकर रामलहर के हक मंे देश में माहौल साजगार करने के लिए भी मीडिया का जमकर दुरुपयोग किया गया था। संसार में जहाँ नैतिक मूल्यों व जिम्मेदारियाँ को परित्याग, व्यावसायिक सोच एवं उपभोक्तावाद के चलते समाज के हर पेशे को प्रभावित किया है तो भला मीडिया इस बीमारी से केसे बच पाता? केवल कानून बनाने से मीडिया के अन्दर व्याप्त पेड न्यूज रूपी भ्रष्टाचार का इलाज नहीं किया जा सकता। देश भक्ति व सामाजिक जिम्मेदारी के एहसास का संचार जब तक समाज के हर वर्ग में नहीं होगा भ्रष्टाचार नए-नए रूप में सामने आता रहेगा।
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

पिछड़ेपन के सेल्समैन हैं नरेंद्र मोदी !

   प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी देशी-विदेशी इजारेदारों के सत्संग में मार्केटिंग की  मोदी का एक दुख देखिए, ‘‘मुझे बहुत कष्ट हुआ, क्योंकि मैं एक ऐसे गाँव में बड़ा हुआ, जहाँ बिजली नहीं थी। इस वजह से हमें बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।’’ करीब साठ साल पहले के भारत की कल्पना करिए। आजादी आए ज्यादा वक्त नहीं हुआ था। पूरा भारत पिछड़ा था। बिजली का उत्पादन बहुत कम था। जवाहर लाल नेहरू के दूरदर्शी नेतृत्व में शुरू की गई योजनाओं का फल अभी अच्छी तरह मिलना शुरू नहीं हुआ था। भारत के लाखों गाँवों में बिजली नहीं थी। मोदी के गाँव में भी नहीं रही होगी।
    हममें से बहुतों ने लालटेन, लैंप, ढिबरी की रोशनी में या म्युनिस्पलिटी के लैंप पोस्ट या बिजली के खंभे के नीचे बैठ कर पढ़ाई की होगी। आज भी हजारों गाँवों का यही हाल है। विद्युतीकरण हो भी गया है तो 12-15 घंटे या दो-दो दिन बिजली नहीं आती। बिजली उपलब्ध भी हुई तो प्राथमिकता खेती को देनी पड़ती है। तो मोदी आज भी इतना दुखी क्यों हैं? उनके बाल्य काल के दुख में क्या खास बात है? वह दुख तो करोड़ों भारतीयों का है।
    यहाँ मोदी के सोच की झलक मिलती है। राजनेता समाज और देश के विकास की योजना व्यापक संदर्भ में बनाते हैं। एक महान राष्ट्र की परिकल्पना उन्हें अनुप्राणित करती है। वह अपने बचपन की यादों को पीछे छोड़ देते हैं। लेकिन मोदी के साथ ऐसा नहीं है। उन्होंने अपने निजी जीवन के आधार पर ‘ज्योतिग्राम योजना’ शुरू की। इस योजना के तहत गुजरात में घरेलू और कृषि इस्तेमाल के लिए अलग-अलग फीडर बनाए गए। लेकिन इसमें नया कुछ नहीं है। बस नई  बात है मोदी की मार्केटिंग ट्रिक। बिजली का
उत्पादन बढ़ेगा और कमी नहीं रहेगी तो अलग-अलग फीडर से बिजली दो या न दो मिलती सबको रहेगी। मोदी के मुख्यमंत्री बनने तक स्थितियाँ काफी बदल चुकी थीं। वह जिस विकास का श्रेय खुद ले रहे हैं, उसकी शुरुआत तो बहुत पहले हो चुकी थी। यह उसी तरह है, जैसे पोखरण-2 के बाद भाजपाइयों का यह गाल बजाना कि अटल जी की सरकार ने ऐटम बम से देश को लैस कर दिया। बम तो कांग्रेसी सरकारों ने बना रखा था। बम दो-चार हफ्ते में नहीं बना करते। बम हो या गुजरात का विकास, राजनैतिक लाभ के लिए मिथ्या प्रचार भाजपाइयों की संस्कृति का हिस्सा है।
ट्रिक्स अच्छी तरह सीख गए हैं। गरीबी हो या पिछड़ापन, दुख दूसरों का हो या अपना, वास्तविकता हो या कल्पना मोदी हर बात को अपनी निजी उपलब्धि और महत्वाकांक्षा से जोड़ कर वोट में बदलने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते।
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

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