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सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

विदेशी पूंजी का महा-भूत


                                       
       
        ‘‘हमने ‘गार’ के भूत का दफना दिया है। अब पूंजी निवेशकों को डरने की जरुरत नहीं है। हमने खुदरा व्यापार मंे विदेशी पूंजी को इजाजत देने और ईंधन कीमतों मंे बढ़ोत्तरी के फैसले लिए हैं, जिनसे हमारी रेटिंग घटने का खतरा नहीं रहा। इन कदमों से अब निवेशक भारत में फिर से दिलचस्पी ले रहे हैं।’’
                        - वित्तमंत्री पी. चिदंबरम, 22 जनवरी 2013, हांगकांग

            भारत के वित्तमंत्री का यह बयान कई मायनों मंे महत्वपूर्ण है और बहुत कुछ कहता है। हांगकांग में सिटी बैंक और बीएनपी नामक दो बहुराष्ट्रीय बैंकों द्वारा ‘निवेश के लिए भारत सम्मेलन’ का आयोजन किया गया था जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के 200 प्रतिनिधि शामिल हुए। इस मौके पर चिदंबरम के मुंह से यह उद्गार निकले। अगले दिन वे सिंगापुर मे  इसी मिशन पर गए। उसके बाद यूरोप में इसी तरह अंतरराष्ट्रीय पूंजीपतियों की चिरौरी करने गए। इसी समय 23 से 27 जनवरी तक स्विट्जरलैण्ड के दावोस नगर मंे विश्व आर्थिक मंच की सालाना बैठक मे भारत के वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा और शहरी विकास मंत्री कमलनाथ निवेशकों को लुभाने गए। उसके बाद विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने यूरोप के दो देशों की यात्रा की तो उनके एजेण्डे मे भी भारत-यूरोप आर्थिक सहयोग प्रमुख रुप से शामिल था।
            यह साफ है कि इसके पहले भारत सरकार ने जो कई बड़े-बड़े फैसले लिए, उनका मकसद विदेशी निवेशकों को खुश करना था। ये अंतरराष्ट्रीय पूंजीपति निवेश का फैसला करने के लिए अंतरराष्ट्रीय साख निर्धारण (रेटिंग) एजेंसियों की तरफ देखते हैं। स्टेण्डर्ड एण्ड पुअर, मूडीज, फिच जैसी ये एजेंसियां पूरी तरह नवउदारवादी-पूंजीवादी सोच पर चलती है और उनका एकमात्र मकसद बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों को बढ़ावा देना है। जिस फार्मूले से वे रेटिंग तय करती हैं, वह ब्याज दरों, शेयर बाजार, भुगतान संतुलन के ंचालू खाते के घाटे, सरकारी खर्च, विदेशी निवेशकों को रियायतों आदि पर आधारित होता है। अर्थव्यवस्थाओं के बारे मंे इनके अनुमान कई बार गलत निकले हैं। लेकिन भारत सरकार के लिए वही रेटिंग, शेयर सूचकांक, राष्ट्रीय आय वृद्धि दर जैसे ही मानक सर्वोपरि हो गए हैं।
            यह ‘गार’ का भूत क्या है ? भारत सरकार की आमदनी और घाटे से चिंतित पिछले वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने पिछले साल के बजट मंे ‘गार’ का प्रावधान किया था। यह अंगरेजी के ‘जनरल एन्टी अवायडेन्स रुल्स’ का संक्षेप है जिसका मतलब है कर-वंचन रोकने के सामान्य नियम। आय कर कानून के तहत बनाए जा रहे इन नियमों का मकसद देशी-विदेशी कंपनियों द्वारा करों की चोरी या कर से बचने की कोशिशों पर लगाम लगाना था। यह भी प्रावधान किया जा रहा था कि यदि कोई कंपनी कोई भी कर नहीं दे रही है तो उस पर एक न्यूनतम कर लगेगा। इसी बीच नीदरलैण्ड की वोडाफोन कंपनी ने भारत में टेलीफोन व्यवसाय के अधिग्रहण का देश के बाहर सौदा करके टैक्स से बचने की कोशिश की थी। उसको रोकने के लिए प्रणव मुखर्जी ने ऐसे सौदों को भी कर-जाल के दायरे मे लाने और उसे पिछली अवधि से लागू करने की घोषण की थी। वोडाफोन कंपनी पर करीब 11,218 करोड़ रु. के टैक्स का दावा बनता था।
            लेकिन प्रणव मुखर्जी का इन मंशाओं के जाहिर होते ही विदेशी कंपनियों मे खलबली मच गई। उन्होंने हल्ला मचाना शुरु कर दिया और भारत से अपनी पूंजी वापस ले जाने की धमकियां देनी शुरु कर दी। मनमोहन सिंह दुविधा मे फंस गए। इस बीच भारत के राष्ट्रपति के चुनाव का एक अच्छा मौका मनमोहन सिंह के हाथ मे आया। प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति बनाकर राह का रोड़ा हटाया गया। वित्तमंत्री का प्रभार लेते ही मनमोहन सिंह ने आश्वासन दिया कि ‘गार’ की समीक्षा की जाएगी। फिर मंत्रालय में चिदंबरम को लाया गया जिसकी कंपनी-भक्ति में कोई संदेह नहीं था।  रंगराजन, कौशिक बसु, रघुराम राजन जैसे आर्थिक सलाहकार भी एक स्वर में अनुदानों को कम करने के साथ-साथ निवेशकों की आशंकाएं दूर करने का राग अलापने लगे। ऐसे ही एक अर्थशास्त्री पार्थसारथी शोम की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई। उसने फटाफट अपनी रपट पेश कर दी। 14 जनवरी को सरकार ने घोषणा कर दी कि गार नियमों को तीन साल के लिए स्थगित किया जाता है और 1 अप्रैल 2016 से उन्हें लागू किया जाएगा। इस बीच वित्तमंत्री यह भी घोषणा कर चुके थे कि किसी भी कंपनी को पिछली तारीख से कर के दायरे मंे नहीं लाया जाएगा। इससे वोडाफोन कंपनी को एक खरब रुपए से ज्यादा का फायदा हो गया।
            गार स्थगन की घोषणा के साथ ही विदेशी पूंजीपतियों मे खुशी की लहर दौड़ गई और दो दिन मे ही सेन्सेक्स 20,000 के ऊपर पहुंच गया, जो कि दो साल का सबसे ऊंचा स्तर था। इसी समय भारत सरकार ने डीजल की कीमतें क्रमिक रुप से बढ़ाने, बड़े उपभोक्ताओं को बाजार दर पर डीजल देने, धीरे-धीरे डीजल कीमतों को पूरी तरह नियंत्रणमुक्त करने और डीजल पर अनुदान समाप्त करने का फैसला कर दिया। इससे भारतीय जनता पर चाहे बोझ पड़ा हो और महंगाई का नया दौर शुरु होने की संभावना बनी हो, लेकिन रिलायन्स तथा एस्सार कंपनियों को काफी फायदा पहुंचने वाला है। इन कंपनियों के पास तेलशोधन की क्षमता है, लेकिन डीजल-पेट्रोल सस्ता होने के कारण वे अपने पेट्रोल पम्प नहीं चला पा रही थी। अब बाजार दरें लागू होने पर उनका धंधा चल निकलेगा। इसी तरह दुनिया की सबसे बड़ी और बदनाम तेल कंपनी शेल ने भी भारत पेट्रोल पम्पों के लाइसेन्स ले रखे हैं। उसकी भी कमाई के दरवाजे खुल जाएंगे। खुदरा व्यापार के दरवाजे भी प्रबल विरोध के बावजूद वालमार्ट जैसी विशाल कंपनियों के लिए खोले गए हैं। पिछले कुछ सालों मे दरअसल सरकार के ज्यादातर फैसले कंपनियों को खुश करने और फायदा पहुंचाने के लिए ही किए गए हैं।
            यह एक विचित्र बात है कि जो सरकार बजट घाटे का रोना रोती रहती है और खर्च कम करने के लिए आम जनता को मिलने वाले अनुदानों व मदद को कम करने पर तुली हुई है, वही सरकार दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों से करों को वसूलने और कर-चोरी रोकने के उपायों को आसानी से छोड़ देती है। मारीशस मार्ग जैसी कर-चोरी को उसने पूरी तरह इजाजत दे रखी है। कंपनियों को दी जाने वाली कर-रियायतें तथा उनको अनुदान हर बजट मे विशाल मात्रा में बढ़ते जा रहे हैं। कारण यही है कि सरकार मे बैठे लोग किसी भी किसी भी कीमत पर विदेशी पूंजी को रिझाने, लुभाने, खुश करने और बुलाने के लिए बैचेन है। इसके लिए वे देशहित, जनहित, सरकारहित, नैतिकता, संप्रभुता सबको तिलांजलि देने के लिए तैयार है। विदेशी  पूंजी की यह गुलामी अभूतपूर्व है। आधुनिक भारत के इतिहास का यह एक शर्मनाक अध्याय है।
            दरअसल भूत ‘गार’ का नहीं है, विदेशी पूंजी का महाभूत है जो भारत सरकार पर पूरी तरह सवार हो गया है। सरकार होश खो बैठी है और यह भूत उसको चाहे जैसा नचा रहा है। लातों के भूत बातों से नहीं मानते। इस भूत को उतारने के लिए एक बड़ा जन-विद्रोह करने करने का वक्त आ गया है।
  - सुनील

रविवार, 18 दिसंबर 2011

जी20 सम्मेलन और यूरोज़ोन संकट भाग 2

जी20 की हालिया बैठक के बाद जो विज्ञप्ति जारी की गई उसमें यह प्रमुखता से माना गया कि पिछले बैठक के बाद से इन देशों में बेरोज़गारी और इकोनॉमिक रिकवरी का स्तर पहले से भी ज्यादा पिछड़ा है। इससे पार पाने के लिए कुछ उपाय भी सुझाए गए कि अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं की पहलकदमी को किस तरह इस संकट से उबरने में इस्तेमाल किया जाए और संकट में फँसे अर्थव्यवस्थाओं को दिए जाने वाली मदद का स्वरूप कैसा हो, लेकिन वैश्वीकरण के जिस बिंदु पर ज़ोर दिया गया वह ग़ौरतलब है। जी20 ने माना कि वैश्वीकरण के मौजूदा स्वरूप में सामाजिक पहलू पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की ज़रूरत है। रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा हासिल करने हेतु लक्ष्य बनाया गया है। एक जी20 कार्यबल बनाने की बात कही गई है जो युवाओं को रोज़गार के अवसर मुहैया कराने की दिशा में काम करेगी। फ्रांस में बेरोज़गारी को लेकर बीते साल लंबे समय तक चले छात्र आंदोलन ने वैश्वीकरण के उत्पाद के तौर पर बेरोज़गारी को सरकार के सामने खोलकर रख दिया था, ऐसे में फ्रांस में हुई बैठक में रोज़गार पर एक्शन लेना ज़रूरी हो गया था। वित्तीय फर्म की विशालता को उस हद तक कतरने की बात कही गई जहाँ तक यह विफल साबित न हो जाए।
इस सम्मेलन में छिटपुट तरीके से कृषि विकास, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक व्यापार पर भी बात की गई लेकिन इन मामलों में कोई उल्लेखनीय पहलकदमी नहीं की गई। बैठक के दौरान कई ग़ैरसरकारी संगठनों और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध करते हुए ॔वित्त से पहले आदमी’ का नारा लगाया। द्वितीय वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद से जी20 के हर बैठक ने विरोध झेला है। इसमें आमंत्रित किए गए चार देशों में इथियोपिया के शामिल होने की वजह से हॉर्न अफ्रीकी’ देशों में खाद्यान्न संकट और भुखमरी के सवाल उठे जो कि काफी महत्वपूर्ण है। बीते कुछ सालों में पूर्वी अफ्रीकी देशों में हज़ारों लोगों ने भूख की वजह से जानें दी हैं। इस पर काबू पाने के लिए चावल भंडारण की एक योजना भी बनाई गई है जिसमें जी20 एशियान+3’ की मदद करेगा।
हालाँकि बीते साल की बैठक में जो लक्ष्य निर्धारित किए गए थे फ्रांस सम्मेलन में भी थोड़े फेरबदल के साथ उन्हीं बिंदुओं को ताजे लक्ष्य के तौर पर सामने रखा गया है। हालिया बैठक में यह साफ नज़र आ रहा था कि एजेंडों और उपायों को लेकर सदस्य देशों के बीच काफी मतांतर हैं। अमरीका और ब्रिटेन ने यूरोज़ोन संकट में बहुत कम दिलचस्पी दिखाई। असल में अमरीका की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ सालों से जिस तरह खुद संकट के चक्र में फँसी हुई है उससे किसी भी तरह का वित्तीय पैकेज देना अमरीका के लिए अभी मुश्किल नज़र आ रहा है। अमरीकी कांग्रेस के दबाव में ओबामा ने फ्रांस से उठ रही इस आवाज़ को कि आई0एम0एफ0 के फंड को ब़ा कर यूरोज़ोन संकट से उबरने में खर्च किया जाए, यह कहकर थामा कि पहले यूरोज़ोन खुद इस पर लगाम कसने की कोशिश करें। ओबामा ने यूरोज़ोन देशों से अपील की कि पहले उनकी सरकारें यह पता लगाने की कोशिश करें कि कहाँ से इस संकट की मनोवैज्ञानिक शुरुआत हुई थी। ब्रिटेन ने भी बेलआउट पैकेज के विस्तार में उदासीनता दिखाई। यूरोपीय संघ का सदस्य होने के बावज़ूद ब्रिटेन यूरोज़ोन में शामिल नहीं है और मौजूदा संकट शुरू होने के बाद ब्रिटेन के भीतर यह आवाज़ भी तेजी से उठनी शुरू हो गई कि ब्रिटेन को मानवाधिकार और माइग्रेशन मामलों में भी खुद को यूरोपीय संघ से अलग कर लेना चाहिए। ब्रिटेन की बड़ी आबादी यह मानती है कि उनका देश इसलिए बच गया क्योंकि वह यूरोज़ोन में शामिल नहीं है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री केमरॉन ने यूरोज़ोन के देशों को यह चेतावनी भी दी कि मौजूदा संकट महज एक बानगी भर है और इससे भयानक स्थिति पैदा हो सकती है। ब्राज़ील ने भी यूरोपीय देशों को अपने स्तर पर संकट से निपटने की सलाह दी। जी20 की बैठक पर यूरोज़ोन के देशों ने जिन उम्मीदों से निगाहें टिकाईं थीं उस अर्थ में तो यह राहत पहुँचाने वाली बिल्कुल साबित नहीं हुई।
आर्थिक संकट से घिरे यूरोप के देशों के लिए आने वाले दिनों में राहत की उम्मीद बहुत क्षीण नज़र आ रही है। इटली पर अपनी जी0डी0पी0 से 120 फीसदी ज्यादा का कर्ज़भार है। बेलआउट पैकेज के भरोसे इटली भविष्य की ओर मुँह किए ताक रहा है, लेकिन यूरोज़ोन के दो सबसे शक्तिशाली देश, फ्रांस और जर्मनी की भीतरी राजनैतिक और आर्थिक स्थिति भी बहुत सुकूनदेह नहीं है। फ्रांस ने एहतियातन बड़े सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों के वेतनवृद्धि पर रोक लगाने की योजना बनाई है।

-दिलीप ख़ान
मो0 : 09555045077
(समाप्त)

जी20 सम्मेलन और यूरोज़ोन संकट भाग 1

यूरोज़ोन संकट के थपेड़े से जूझते यूरोप में इससे पार पाने की कवायदें पिछले कई महीनों से जारी हैं। हालात ये हैं कि यूरोपीय संघ के भीतर यूरोज़ोन को हने से बचाने की कोशिश करने वाले देशों की स्थिति भी ख़राब होती जा रही है। ग्रीस के बाद इटली की खस्ताहाली सिर्फ़ एक कैलेंडर वर्ष की आर्थिक नीतियों का न तो परिणाम है और न ही इससे कुछ महीनों में पार पाया जा सकता है। जब ग्रीस ने घोषित मोटे बेलआउट के बाद भी वहाँ की स्थिति में सुधार महसूस नहीं किया तो यह जाहिर हो गया कि जिस स्थिति की कल्पना की जा रही है वह उससे कहीं बदतर है। जी20 के लिए जब यूरोप के भीतर ऐसी आर्थिक और राजनैतिक पृष्ठभूमि मौजूद थी और यूरोज़ोन मामले में महीनों से सक्रिय रहने वाले फ्रांस को जब इसकी मेजबानी करनी थी, तो पहले से ही यह तक़रीबन स्पष्ट लग रहा था कि बातचीत का तानाबाना यूरोज़ोन संकट के इर्दगिर्द ही बुना जाएगा।
जी20 की स्थापना जब 1999 में की गई तो इसका एजेंडा था कि कैसे 1997 में पैदा हुए एशियाई आर्थिक संकट से निपटा जाए। इस तरह अपने स्थापना के समय से ही यह समूह आर्थिक संकटों के आसपास की बातचीत पर केंद्रित रहा है बल्कि यह कहना ज़्यादा मुनासिब होगा कि दुनिया के अलगअलग हिस्सों में तेजी से उभरने वाले आर्थिक संकटों की रोकथाम ही इसका उद्देश्य बन गया। दुनिया के 20 सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं को एक मंच पर लाकर वैश्विक आर्थिक विकास का जो ख्वाब बुना गया था उसकी सारी ऊर्जा वैश्विक अर्थव्यवस्था को बचाने में खप रही है। इसलिए मौजूदा यूरोज़ोन संकट की बहस अपने चरित्र में जी20 के देशों के लिए नई नहीं है। 2008 के वाशिंगटन सम्मेलन, 2009 के लंदन और पीट्सबर्ग सम्मेलन और 2010 के टोरंटो और सियोल सम्मेलन का ज्यादातर हिस्सा तेजी से ब़ती आर्थिक मंदी पर खरचा गया।
हर साल इस समूह के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों की बैठक बुलाने के पीछे यह मक़सद काफ़ी मज़बूती के साथ नत्थी रहता है कि वैश्विक वित्तीय प्रवाह को बरक़रार रखने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए जाएँ। फ्रांस में संपन्न हुई मौजूदा बैठक जी20 के राष्ट्रध्यक्षों की छठीं बैठक थी जोकि वित्तीय अर्थव्यवस्थाओं और आर्थिक संकटों की तात्कालिक वजहों के पड़ताल पर केंद्रित थी। ग्रीस के संकट की भयावहता उसके भूगोल से बाहर निकल आई है और यूरोपीय देशों के साथसाथ दुनिया के ज्यादातर शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं की यह चिंता बन गई है कि मौजूदा वैश्विक आर्थिक ाँचे को किस तरह बचाया जाए। ॔वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करो’ की मुहिम दर्ज़नों देशों में फैल गई है। फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि वॉल स्ट्रीट की जगह पर स्थानीय आर्थिक प्रतीकों का इस्तेमाल हो रहा है।
जिस तरह वॉल स्ट्रीट आंदोलन को अमरीकी हुक्मरान छोटा करके दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं ठीक उसी तरह यूरोज़ोन संकट को भी यूरोपीय देश कमतर करके वैश्विक मंच पर पेश कर रहे हैं। लेकिन आपसी बातचीत और बैठक में यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु होता है। जी20 बैठक के दौरान प्रेस कांफ्रेंस में जब ग्रीस के
प्रधानमंत्री जॉर्ज पापेंड्रू और इटालवी प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी यह कह रहे थे कि वे अपनेअपने देश को इस संकट से उबारने में सफल होंगे तो शायद उन्हें यह पता नहीं था कि उनकी इस प्रचार सामग्री को उनके देश के लोग ही खारिज करने में जुट जाएँगे। जी20 को ख़त्म हुए हफ्ता भर भी नहीं हुआ है और यह चर्चा ज़ोरों पर है कि पापेंद्रू और बर्लुस्कोनी इस्तीफ़ा देने वाले हैं। अर्थव्यवस्था की चरमराहट की मिसाल यह है कि ग्रीस में पापेंद्रू की जगह प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर जिनका नाम सामने आ रहा है उनमें यूरोपीय केंद्रीय बैंक के पूर्व उपाध्यक्ष लुकास पापाडेमोस और वित्त मंत्री इवांजेलोस वेनीज सबसे प्रमुख हैं। बर्लुस्कोनी यह तो कह रहे हैं कि स्थिति ज़्यादा गंभीर नहीं है लेकिन इस्तीफे की ख़बर के बीच सफाई देने से नहीं चूक रहे हैं कि इससे इटली की प्रतिभूति बाज़ार भारी दबाव में आ गया है। यह विरोधाभासी वक्तव्य फिलवक्त यूरोज़ोन और बेलगाम वैश्विक वित्तीय अर्थव्यवस्था की विफलता को छुपाने और पूँजीवाद की नीति में आई बड़ी दरार को भरने की असफल कोशिश को दर्शा रहे हैं।

-दिलीप ख़ान
क्रमश:
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