रविवार, 18 दिसंबर 2011

जी20 सम्मेलन और यूरोज़ोन संकट भाग 2

जी20 की हालिया बैठक के बाद जो विज्ञप्ति जारी की गई उसमें यह प्रमुखता से माना गया कि पिछले बैठक के बाद से इन देशों में बेरोज़गारी और इकोनॉमिक रिकवरी का स्तर पहले से भी ज्यादा पिछड़ा है। इससे पार पाने के लिए कुछ उपाय भी सुझाए गए कि अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं की पहलकदमी को किस तरह इस संकट से उबरने में इस्तेमाल किया जाए और संकट में फँसे अर्थव्यवस्थाओं को दिए जाने वाली मदद का स्वरूप कैसा हो, लेकिन वैश्वीकरण के जिस बिंदु पर ज़ोर दिया गया वह ग़ौरतलब है। जी20 ने माना कि वैश्वीकरण के मौजूदा स्वरूप में सामाजिक पहलू पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की ज़रूरत है। रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा हासिल करने हेतु लक्ष्य बनाया गया है। एक जी20 कार्यबल बनाने की बात कही गई है जो युवाओं को रोज़गार के अवसर मुहैया कराने की दिशा में काम करेगी। फ्रांस में बेरोज़गारी को लेकर बीते साल लंबे समय तक चले छात्र आंदोलन ने वैश्वीकरण के उत्पाद के तौर पर बेरोज़गारी को सरकार के सामने खोलकर रख दिया था, ऐसे में फ्रांस में हुई बैठक में रोज़गार पर एक्शन लेना ज़रूरी हो गया था। वित्तीय फर्म की विशालता को उस हद तक कतरने की बात कही गई जहाँ तक यह विफल साबित न हो जाए।
इस सम्मेलन में छिटपुट तरीके से कृषि विकास, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक व्यापार पर भी बात की गई लेकिन इन मामलों में कोई उल्लेखनीय पहलकदमी नहीं की गई। बैठक के दौरान कई ग़ैरसरकारी संगठनों और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध करते हुए ॔वित्त से पहले आदमी’ का नारा लगाया। द्वितीय वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद से जी20 के हर बैठक ने विरोध झेला है। इसमें आमंत्रित किए गए चार देशों में इथियोपिया के शामिल होने की वजह से हॉर्न अफ्रीकी’ देशों में खाद्यान्न संकट और भुखमरी के सवाल उठे जो कि काफी महत्वपूर्ण है। बीते कुछ सालों में पूर्वी अफ्रीकी देशों में हज़ारों लोगों ने भूख की वजह से जानें दी हैं। इस पर काबू पाने के लिए चावल भंडारण की एक योजना भी बनाई गई है जिसमें जी20 एशियान+3’ की मदद करेगा।
हालाँकि बीते साल की बैठक में जो लक्ष्य निर्धारित किए गए थे फ्रांस सम्मेलन में भी थोड़े फेरबदल के साथ उन्हीं बिंदुओं को ताजे लक्ष्य के तौर पर सामने रखा गया है। हालिया बैठक में यह साफ नज़र आ रहा था कि एजेंडों और उपायों को लेकर सदस्य देशों के बीच काफी मतांतर हैं। अमरीका और ब्रिटेन ने यूरोज़ोन संकट में बहुत कम दिलचस्पी दिखाई। असल में अमरीका की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ सालों से जिस तरह खुद संकट के चक्र में फँसी हुई है उससे किसी भी तरह का वित्तीय पैकेज देना अमरीका के लिए अभी मुश्किल नज़र आ रहा है। अमरीकी कांग्रेस के दबाव में ओबामा ने फ्रांस से उठ रही इस आवाज़ को कि आई0एम0एफ0 के फंड को ब़ा कर यूरोज़ोन संकट से उबरने में खर्च किया जाए, यह कहकर थामा कि पहले यूरोज़ोन खुद इस पर लगाम कसने की कोशिश करें। ओबामा ने यूरोज़ोन देशों से अपील की कि पहले उनकी सरकारें यह पता लगाने की कोशिश करें कि कहाँ से इस संकट की मनोवैज्ञानिक शुरुआत हुई थी। ब्रिटेन ने भी बेलआउट पैकेज के विस्तार में उदासीनता दिखाई। यूरोपीय संघ का सदस्य होने के बावज़ूद ब्रिटेन यूरोज़ोन में शामिल नहीं है और मौजूदा संकट शुरू होने के बाद ब्रिटेन के भीतर यह आवाज़ भी तेजी से उठनी शुरू हो गई कि ब्रिटेन को मानवाधिकार और माइग्रेशन मामलों में भी खुद को यूरोपीय संघ से अलग कर लेना चाहिए। ब्रिटेन की बड़ी आबादी यह मानती है कि उनका देश इसलिए बच गया क्योंकि वह यूरोज़ोन में शामिल नहीं है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री केमरॉन ने यूरोज़ोन के देशों को यह चेतावनी भी दी कि मौजूदा संकट महज एक बानगी भर है और इससे भयानक स्थिति पैदा हो सकती है। ब्राज़ील ने भी यूरोपीय देशों को अपने स्तर पर संकट से निपटने की सलाह दी। जी20 की बैठक पर यूरोज़ोन के देशों ने जिन उम्मीदों से निगाहें टिकाईं थीं उस अर्थ में तो यह राहत पहुँचाने वाली बिल्कुल साबित नहीं हुई।
आर्थिक संकट से घिरे यूरोप के देशों के लिए आने वाले दिनों में राहत की उम्मीद बहुत क्षीण नज़र आ रही है। इटली पर अपनी जी0डी0पी0 से 120 फीसदी ज्यादा का कर्ज़भार है। बेलआउट पैकेज के भरोसे इटली भविष्य की ओर मुँह किए ताक रहा है, लेकिन यूरोज़ोन के दो सबसे शक्तिशाली देश, फ्रांस और जर्मनी की भीतरी राजनैतिक और आर्थिक स्थिति भी बहुत सुकूनदेह नहीं है। फ्रांस ने एहतियातन बड़े सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों के वेतनवृद्धि पर रोक लगाने की योजना बनाई है।

-दिलीप ख़ान
मो0 : 09555045077
(समाप्त)

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