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गुरुवार, 29 मई 2014

सावरकर : क्रांतिकारी भी हैं और अंग्रेज भक्त भी

भारत के क्रांतिकारियों में विनायक दामोदर सावरकर सबसे ज्यादा विवादस्पद व्यक्ति रहे हैं . इनके जीवन के दो पक्ष हैं एक पक्ष यह है कि वह बहुत बड़े क्रांतिकारी  थे दूसरा पक्ष यह है की उनका माफीनामा ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा स्वीकार कर लेने के बाद अंडमान जेल से निकलने के बाद ब्रिटिश साम्राज्यवाद की सेवा में लग गए थे . एक पक्ष क्रांतिकारी तो दूसरा पक्ष अंग्रेजों का सेवक दर्शाता है :
लन्दन में रहते हुये उनकी मुलाकात लाला हरदयाल से हुई जो उन दिनों इण्डिया हाउस की देखरेख करते थे। १ जुलाई, १९०९ को मदनलाल ढींगरा द्वारा विलियम हट कर्जन वायली को गोली मार दिये जाने के बाद उन्होंने लन्दन टाइम्स में एक लेख भी लिखा था। १३ मई, १९१० को पैरिस से लन्दन पहुँचने पर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया परन्तु ८ जुलाई, १९१० को एस०एस० मोरिया नामक जहाज से भारत ले जाते हुए सीवर होल के रास्ते ये भाग निकले। २४ दिसंबर, १९१० को उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गयी। इसके बाद ३१ जनवरी, १९११ को इन्हें दोबारा आजीवन कारावास दिया गया।

 १९०४ में उन्हॊंने अभिनव भारत नामक एक  संगठन की स्थापना की .नासिक जिले के कलेक्टर जैकसन की हत्या के लिए नासिक षडयंत्र काण्ड के अंतर्गत इन्हें ७ अप्रैल, १९११ को काला पानी की सजा पर सेलुलर जेल भेजा गया। उनके अनुसार यहां स्वतंत्रता सेनानियों को कड़ा परिश्रम करना पड़ता था। कैदियों को यहां नारियल छीलकर उसमें से तेल निकालना पड़ता था। साथ ही इन्हें यहां कोल्हू में बैल की तरह जुत कर सरसों व नारियल आदि का तेल निकालना होता था। इसके अलावा उन्हें जेल के साथ लगे व बाहर के जंगलों को साफ कर दलदली भूमी व पहाड़ी क्षेत्र को समतल भी करना होता था। रुकने पर उनको कड़ी सजा व बेंत व कोड़ों से पिटाई भी की जाती थीं। इतने पर भी उन्हें भरपेट खाना भी नहीं दिया जाता था। । सावरकर ४ जुलाई, १९११ से २१ मई, १९२१ तक पोर्ट ब्लेयर की जेल में रहे। विकिपीडिया से

 दूसरा पक्ष अंग्रेजों की भक्ति का है 

 ४ जुलाई १९११ में सेल्युलर जेल में लाए जाने के बाद उन्होंने माफ़ी मांगते हुए कै अर्जियां दीं । धीरे-धीरे वे जेल अधिकारियों के चहते बन गये और उन्हें जेल में पहले मुंशी का काम फिर जेल के तेल डीपो के फोरमैन का काम सौंपा गया। काला पानी से रिहा होने के बाद उन पर कहने को रत्नागिरी न छोड़ने और ’राजनैतिक’ गतिविधियों पर रोक रहे परंतु पालतू बन चुके शेर को हिन्दू महासभा का संगठन करने की छूट रही।रिहाई के बाद उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ किसी आन्दोलन को न चलाया और न ही भाग लिया। अधिकांश लोगों को इस बात की जानकारी नहीं है कि १९६६ में उनकी मृत्यु हुई । २७ फरवरी , १९४८ को सरदार पटेल ने गांधी की हत्या की बाबत नेहरू को लिखे अपने पत्र में लिखा , ’यह हिन्दू महासभा के सावरकर के नेतृत्व में चलने वाले मतान्ध खेमे द्वारा गढ़ी गई साजिश और उसके क्रियान्वयन का परिणाम थी ’।http://books.google.co.in/books?id=JkoznZcASfsC&pg=PA74&dq=सावरकर&hl=en&ei=547vTfALkcytB6uh7MwF&sa=X&oi=book_result&ct=result&sqi=2&redir_esc=y#v
पोर्ट ब्लेयर हवाई अड्डे का नाम,सेल्युलर जेल के सामने बने शहीद-उद्यान में उनकी मूर्तीऔर संसद की दीर्घा में उनका तैल चित्र लगा कर भाजपा सरकार ने सावरकर की गद्दारी के प्रति जनता की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की।

नोट : अभिनव भारत व Savarkar: Mithak Aur Sach का लिंक दिया गया है . आप पढ़ कर निर्णय करें कि कौन सा पक्ष आपको मानना है . 

सुमन 

बुधवार, 12 मार्च 2014

असफाक को फांसी


डॉ. मो. मजीद मिया
असफ़ाकुल्ला खाँ का जन्म 1900 ईव को शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश के एक इज्जतदार घराने मे हुआ था। उनके पिता का नाम सफीकुल्ला खाँ एवं माँ का नाम मझरुनिशा बेगम थी। अस्फ़ाकुल के परिवार के ज्यादा से ज्यादा लोग अँग्रेजों के ऊंचे पदों पर आसीन थे। असफाक अपने चार भाइयों मे सबसे छोटे थे। उनके बड़े भाई रियासतुल्ला खाँ, राम प्रसाद बिस्मिल के सहपाठी थे। वह असफाक को अक्सर बिस्मिल की शायरी और आजादी के लड़ाई के किस्से सुनाया करते थे। जिससे असफाक के दिल में बिस्मिल से मिलने की ख्वाइस होने लगी थी।
असफाक बचपन से ही क्रांतिकारियों से काफी प्रभावित थे। उनमे उम्र के साथ.साथ देश भक्ति की भावना भी बढ़ती गई और 20 वर्ष की कम उम्र मे पहुँचकर अपने देश को अँग्रेजी शासन से मुक्त कराने और देश के लिए मर.मिटने को भी तैयार हो चुके थे। इस जुनून को पूरा करने के लिए जल्द ही वह बिस्मिल से जा मिले और उनके साथ मिलकर आजादी की लड़ाई मे सरीख हो गए। जिस समय मौलाना मोहम्मद अली जौहर खिलाफत आंदोलन चला रहे थेए जिसने आगे चलकर असहयोग आंदोलन का रूप ले लिया, तब बिस्मिल एवं दूसरे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर असफाक भी आंदोलन के बारे मे लोगो को जागृत करने मे लग गए। धीरे.धीरे इन कार्यों के कारण असफाक भी अंग्रेजों की आँखों मे खटकने लगे।
1922 ईव मे असहयोग आंदोलन के समय चौरी.-चौरा के हत्या कांड की वजह से गांधीजी ने खिलाफत आन्दोलन के समापन की घोषना कर दी। असहयोग आन्दोलन के समाप्त होने से क्रांतिकारियों मे खलबली सी मच जाती है। गांधीजी के इस फैसले के कारण असफाक एवं उनके साथी नरम दल का साथ छोडकर गर्म दल के साथ हो जाते है।
क्रांतिकारियों ने समझा कि आजादी की लड़ाई को आगे चलाने के लिए हथियारों की जरूरत पड़ेगी और हथियारों के लिए रूपय की और इसके लिए क्रांतिकारियों ने फैसला किया कि अँग्रेजी सरकार पिछले कई वर्षों से भारत को लूट रही है तो क्यों न हम यह रूपय अंग्रेजों से लूट लें। इस मकसद से क्रांतिकारियों ने 8 अगस्त 1925 को काकोरी के नजदीक सरकारी खजाना ले जा रही ट्रेन को रोककर खजाना लूट लेते हैं। इस सभी कारवाई मे असफाक ने अकेले ही छेनी और हथौड़ी की मदद से सरकारी तिजौरियों को तोड़ने मे कामयाब होता है। इस कांड को इतिहास में एक बड़ी घटना के रूप मे याद किया जाता है। काकोरी की यह घटना अंग्रेजों की शक्ति एवं घमंड पर एक तमाचे की तरह ही था, जिससे अँग्रेजी हुकूमत तिलमिला जाती है। अँग्रेजी सरकार द्वारा इस घटना की जांच की जाती है और गुप्तचर विभाग ने महीने भर इस कांड मे सामील क्रांतिकारियों को शाहजहानपुर से गिरफ्तार कर लेते हैं और असफाक वहाँ से भागने मे कामयाब हो जाता है। बनारस पहुँचकर वह एक इंजीनियरिंग कालेज मे काम करने लगते हैं पर वहाँ भी वह चैन से नहीं बैठ पाता है। वह हमेशा इस फिराक मे रहता है कि किस प्रकार देश के बाहर जा कर लाला हरदयाल से मिलकर आजादी की इस लड़ाई को आगे बढ़ाए।
लाला हरदयाल उन दिनो अमेरिका मे रहते थे। असफाक हरदयाल से मिलकर उन्हे आजादी की लड़ाई मे शामिल करना चाहते थे। उन्ही से मिलने के लिए असफाक बनारस से दिल्ली आते हैं ताकि वह जल्द ही अमेरिका जा सके। लेकिन जिन गद्दारों ने अपने स्वार्थ के लिए अंग्रेजों से जा मिले थे वह भी इसी ताक मे थे कि असफाक कब दिल्ली आए। असफाक के एक करीबी मित्र ने अंग्रेजों के साथ मिलकर असफाक को पकड़वा देते हैं। अंग्रेज़ असफाक को पड़क कर फैजावाद जेल भेज देते हैंए जहां उनके खिलाफ कत्ल,डकैती और सरकार के खिलाफ षड्यंत्र का मुकदमा चलाया जाता है और असफाक को सजा -ए- मौत की सजा सुनाई जाती है।
काकोरी शाजिस के द्वारा अँग्रेजी सरकार ने असफाक,बिस्मिल राजेंद्र लहरी और ठाकुर दर्शन सिंह को सजा -ए- मौत और बाकी सोलह क्रांतिकारियों मे से चार को उम्र कैद और बाकी को चार वर्ष की सजा सुनाई जाती है। मुकदमे के समय अंग्रेजों ने असफाक को गवाही देने के लिए मान जाए, इसके लिए अंग्रेजों ने पुलिस इंस्पेक्टर तसदीक हुसैन को असफाक के पास भेजते हैं, जो असफाक को मजहब का वास्ता देकर कहते हैं 'तुम कैसे मुसलमान हो जो एक हिन्दू का साथ दे रहे हो',' जो इस मुल्क को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता है'। इसके जवाब मे असफाक कहते हैं 'बिस्मिल का हिन्दू राष्ट्र आपके अँग्रेजी सरकार से बेहतर ही होगा'।
जो लोग जेल मे असफाक के करीबी थे उनका कहना है जेल मे भी वह अंग्रेज़ो की चाल मे नहीं आए और सरकारी गवाह बनने की बात को हमेशा ठुकड़ा दिया करते थे। 19 दिसम्बर को असफाक को फांसी देने का दिन जब आता है। कुछ लोगों का कहना है फांसी के दिन असफाक दुगनी गति से फंदे की ओर बढ़ता गया और फांसी की जगह पहुँचकर फंदे को चूम लेता है, कुछ देर तक दुआ मांगता है और फंदा कस जाता है
- डॉ. मो. मजीद मिया

09733153487

सोमवार, 7 नवंबर 2011

विलक्षण प्रतिभावान प्रवासी क्रांतिकारी -लाला हरदयाल

14 अक्तूबर 1884-4 मार्च 1939 
 
लाला हरदयाल जी के बारे में लोग कम ही जानते है | उसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि उनकी वैचारिक एवं व्यवहारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र देश से बाहर विदेश में खासकर अमेरिका में रहा | लाला जी में प्रचण्ड बौद्धिक क्षमता के साथ आत्म त्याग की और राष्ट्र - सेवा तथा जन - सेवा की भावना भी अत्यन्त प्रबल थी | यही कारण है कि उनकी विलक्षण बौद्धिक क्षमता , उनके निजी जीवन की चदत - बढत का सोपान कभी नही बनी | उन्होंने ऐसे हर अवसर को दृढ़ता के साथ ठुकरा दिया | लाला हरदयाल का जीवन राष्ट्रवादी - क्रांतिकारी तथा आध्यात्मिक , वैचारिक एवं व्यवहारिक क्रिया - कलापों का एक अजीब सा मिश्रण है | पर उनके हर क्रिया - कलाप में राष्ट्र व मानव समाज की मुक्ति का लक्ष्य समाहित था |फिर उनके समग्र क्रिया -कलाप राष्ट्र के क्रांतिकारी स्वतंत्रता की दिशा में विकसित होते और बढ़ते रहे | इसलिए आर्य - समाज , बौद्दवाद के साथ स्वत: के आध्यात्मवादी चिंतन से आगे बढ़ते हुए वे क्रांतिकारी भौतिकवाद को भी अपनाने के प्रयास में लगे रहे | राजनीति के क्षेत्र में वे सुधारवादी राष्ट्रवाद व अराजकवाद से गुजरते हुए तथा क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की दिशा में आगे बढ़ते हुए गदर पार्टी के प्रमुख नायक बने | अधाधुंध नीजिवादी , भोगवादी जीवन के वर्तमान दौर में लाला जी का जीवन उन लोगो के लिए स्मरणीय एवं अनुकरणीय है , जो आज राष्ट्र तथा जनसाधारण की गिरती दशाओं के प्रति गम्भीर है , चिन्तित हैं | राष्ट्र पर बढती विदेशी प्रभुत्व के वर्मान दौर में गदर पार्टी व लाला हरदयाल की गतिविधिया तथा राष्ट्र की क्रांतिकारी स्वतंत्रता के उनके उद्देश्य आज भी हमारे लिए अनुकरणीय है |
महान राष्ट्रवादी विलक्षण विद्वान् , दृढनिश्चयी , संघर्षशील तथा आध्यात्मिक व्यक्तित्व के पर्याय थे लाला हरदयाल | उनका जन्म दिल्ली में हुआ था | उनके पिता गौरी दयाल माथुर जिला कचहरी में पेशकार थे | लाला हरदयाल ने दिल्ली के सेंट स्टीफन कालेज से बी0 ए0 किया |उसके पश्चात उन्होंने लाहौर के राजकीय कालेज से अंग्रेजी साहित्य में और फिर संस्कृत व इतिहास में मास्टर डिग्री किया | अनेक प्रश्न पत्रों में उन्हें शत - प्रतिशत अंक मिले | अंग्रेजी विषय में परीक्षक भी प्राय: अंग्रेज ही रहा करते थे , फिर भी उन्हें 96 % अंक प्राप्त हुए | उनकी शैक्षणिक उपलब्धिया साबित करती है कि वे विलक्षण बौद्धिक प्रतिभा से सम्पन्न थे | अपनी इस प्रतिभा के चलते लन्दन के आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा उच्च शिक्षा के लिए छात्र वृति मिली | इसके फलस्वरूप वे उच्च शिक्षा के लिए आक्सफोर्ड विश्व विद्यालय पहुच गये | वहा के प्राध्यापक उनकी तीक्ष्ण बौद्धिकता से अत्यंत प्रभावित हुए | लन्दन में ही उनका परिचय श्याम जी कृष्ण वर्मा से हुआ | श्यामजी कृष्ण वर्मा छात्रवृति विद्यार्थियों को अपनी ऑर आकर्षित कर रहे थे और विद्यार्थियों के रूप में वे क्रान्तिकारियो को संगठित कर रहे थे | इन विद्यार्थियों के भोजन और रहने की व्यवस्था करने के लिए " इंडिया हाउस ' की स्थापना की गयी थी | सच कहा जाए तो यह स्थान क्रान्तिकारियो के लिए ही था | लाला हरदयाल यही पर विनायक दामोदर सावरकर और मैडम भीकाजी कामा तथा अन्य राष्ट्रवादी क्रान्तिकारियो के सम्पर्क में आये और उनसे प्रभावित भी हुए | इंग्लैण्ड में रहते हुए भी उन्होंने भारत सरकार और आक्सफोर्ड विद्यापीठ की छात्रवृति को नकार दिया था | अंग्रेजी शिक्षा के साथ ही उन्होंने अंग्रेजी पोशाक को भी ठुकरा दिया था | लन्दन की ठंड में वे धोती पहनते थे |बाद में राष्ट्र स्वतंत्रता के उद्देश्य पूर्ति के लिए विश्व विद्यालय और इंग्लैण्ड को छोडकर हिन्दुस्तान पहुच आये | फिर देश सेवा के लिए उन्होंने गृह त्याग कर दिया | उसके पश्चात उन्होंने पुन:कभी भी परिवार में वापसी नही की |यहा वे लाहौर के एक आश्रम में रहने लगे |फिर यहा उन्होंने पंजाबी भाषा में अखबार निकाला | लाहौर की आश्रम में कार्यकर्ताओं के भर्ती के लिए युवको के खोज के लिए कानपुर आये | यहा वे प्रसिद्ध वकील और समाज सेवक पृथ्वीनाथ के घर पर रुके | कुछ कार्यकर्ता जमा हुए | उनके सादगी पूर्ण और तपस्वियों - से जीवन का उन युवको पर बहुत प्रभाव पडा | फिर पंजाब के अकाल के समय उन्होंने संकटग्रस्त लोगो की बहुत सहायता की थी | इन कामो से भी वे अत्यधिक लोकप्रिय हुए | लन्दन में रहते हुए ही वे ' इंडियन सोशियोलाजिस्ट ' में ब्रिटिश हुकूमत के विरोध में खुलकर लिखा करते थे | यह प्रक्रिया उन्होंने यहा भी जारी रखी |सरकार विरोधी रवैये के साथ उनकी बढती लोकप्रियता को को देखकर सरकार उन्हें गिरफ्तार कर लेना चाहती थी |इसीलिए कुछ शुभ चिंतको ने तथा लाला लाजपत राय ने भी लाला हरदयाल को विदेश चले जाने पर पूरा जोर लगा दिया | परन्तु हरदयाल इसके लिए तैयार नही थे | बहुत कहने सुनने पर लाला हरदयाल ने बड़े दू:खी मन से भारत छोड़ा | भविष्य में वे पुन: कभी भारत के दर्शन न कर सके | वे कोलम्बो मार्ग से इटली और इटली से फ्रांस पहुचे |फ्रांस में श्यामजी कृष्ण वर्मा और उनका सहयोगी दल सक्रिय था | मादाम कामा ने 'वन्देमातरम ' नामक अखबार का सम्पादन कार्य लाला हरदयाल जी को सौप दिया | उस दैनिक पत्र का प्रथम अंक मदन लाल धिगरा की स्मृति को समर्पित किया गया |आगामी अंको में भी बलिदानों के संस्मरण ही रहते थे | ये अंक भारतीयों को देशभक्ति की प्रेरणा देते थे | पेरिस में ब्रिटिश सरकार की नजर इन भारतीय क्रांतिकारियों का पीछा कर ही रही थी |
ब्रिटिश सरकार फ्रांस सरकार पर इन भारतीयों को गिरफ्तार करने के लिए दबाव डाल रही थी | इन परिस्थितियों में लाला हरदयाल मिस्र चले गये | वहा मिस्र के क्रांतिकारियों से उनका परिचय हुआ | कुछ समय बाद वे पुन: पेरिस वापस लौटे , परन्तु अभी भी उन पर ब्रिटिश सरकार की नजर थी , जिससे बचने के लिए वे वेस्टइंडीज के ' ला मार्टिनिक ' नामक समुद्री तट पर पहुचे | वहा वे लोगो को अंग्रेजी पढाकर अपना गुजर - बसर करते अपने साथियो और क्रांतिकारी आंदोलनों से निर्लिप्त होकर दूर अकेले पड़े थे | वे पूरी तरह सन्यासियों और वैरागियो - सा जीवन व्यतीत कर रहे थे | फिर भी उन्हें खोजते हुए प्रसिद्ध आर्य समाजी एवं क्रांतिकारी भाई परमानन्द वहा पहुचे | भाई परमानन्द लाला हरदयाल के साथ उस समुद्र किनारे महीना भर रहे |उन्होंने उन्हें तपस्वी जीवन छोडकर पुन:क्रांति कार्य में शामिल होने के लिए राज़ी कर लिया |
लाला हरदयाल पेरिस में बिताए जा रहे अपने जीवन और अपने लोगो की स्वार्थ - वृत्ति से उकता गये थे |भाई परमानन्द जैसे क्रांतिकारी ही उन्हें पुन:आन्दोलन में वापस लाने में सफल हो सकते थे |भाई परमानन्द के जोर देने पर वे कैलिफोर्निया पहुचे |वहा उन्होंने एक समिति का गठन किया और भारत के परिश्रमी विद्यार्थियों के लिए अमेरिका में उच्च शिक्षा के लिए छात्र वृत्ति देने की घोषणा की |उन्होंने छ:विद्यार्थियों को चुना और उन्हें उच्च शिक्षा देने के साथ ही क्रान्तिकारी उद्देश्यों की भी शिक्षा देने का काम किया |इस दौरान लाला हरदयाल के सेन फ्रांसिस्को में और बर्कल में दीये गये भाषणों से प्रभावित होकर उन्हें लेलैंड - स्टेनफोर्ड विद्यापीठ में संस्कृत और भारतीय दर्शन के प्राध्यापक के पद पर रखा गया , जिसे उन्होंने अवैतनिक सेवा के रूप में ही स्वीकारा |अमेरिका में उनकी प्रसिद्धि एक भारतीय ऋषि के रूप में फ़ैल गयी |अपनी लोकप्रियता और प्रसिद्धि का उपयोग उन्होंने क्रांति कार्य को बढावा देने में कर लिया | अमेरिका में रहते हुए भी उनका सारा ध्यान भारत में आ रहे बदलाव पर लगा हुआ था |23 दिसम्बर , 1912 को दिल्ली में लार्ड हार्डिंग पर बम फेंके जाने की खबर सुनकर वे प्रसन्न हुए थे |इस उपलक्ष्य में उन्होंने उनके क्रांतिकारी विद्यार्थियों ने 'वन्देमातरम ' 'भारत माता की जय ' की हर्षोल्लास के साथ सार्वजनिक सभा को भी आयोजित किया |
1- अमेरिका व कनाडा में प्रवासी हिन्दुस्तानियों में देश को स्वतंत्र कराने की भावनाए जोर पकड़ने लगी थी |उनमे खासकर पंजाब के किसान घरो से गये हुए लोगो की अच्छी खासी संख्या थी | लाला हरदयाल अब इन राष्ट्रवादी क्रान्तिकारियो के साथ थे | उनके अगुवा लोगो में थे |उन्होंने अमेरिका में हिन्दुस्तानियों की समिति का गठन किया | पहले उसका नाम ' द हिन्दुस्तान एसोसियन आफ द पेसिफिक एशियन ' था | बाद में उसका नाम बदलकर ' गदर पार्टी ' रख दिया गया |गदर पार्टी के अध्यक्ष सोहन सिंह बहकना थे |लाला हरदयाल उसके मंत्री और पंडित काशीराम कोषाध्यक्ष थे |गदर पार्टी का प्रमुख पत्र ' गदर ' था |जो उर्दू और पंजाबी भाषा में निकलता था |कुछ सामग्री अंग्रेजी में भी प्रकाशित की जाती थी |' गदर ' की प्रतिया सारी दुनिया में भेजी जाती थी | कड़े पहरे के बावजूद ' गदर ' की प्रतिया हिन्दुस्तान की लश्करी छावनियो तक में पहुचाई जाती थी |२ गदर पार्टी के एक अगुआ के रूप में ही लाला हरदयाल का राष्ट्रवादी , क्रांतिकारी जीवन परवान चढा |वे अमेरिका में पार्टी के एक प्रमुख प्रवक्ता या कहिये प्रमुख बौद्धिक प्रतिनिधि थे |गदर पार्टी के साहित्यों के प्रकाशन में लाला जी की अग्रणी भूमिकाये थी | पार्टी के प्रति विदेशो में समर्थन जुटाने और अन्य देशो में बसे हिन्दुस्तानियों को इसका सक्रिय समर्थन व सहयोगी बनाने की भूमिका प्रमुखत:लाला हरदयाल को ही निभानी थी | सेन फ्रांस्सिको का युगान्तर आश्रम गदर पार्टी और ' गदर ' पत्र का कार्यालय था | इस आश्रम में अनेक क्रांतिकारियों के साथ लाला हरदयाल तपोमय पर क्रांतिकारी जीवन जी रहे थे |' गदर ' के अभियान को गति तो मिल रही थी |साथ ही लाला हरदयाल के ओजस्वी लेखन के जादू से धन संग्रह भी बढ़ रहा था |बाद में ' गदर ' पार्टी के अनुरोध से वे तुर्की से जिनेवा पहुच गये |रामदास के झूठे नाम से 27 जनवरी 1915 को वे जिनेवा से बर्लिन जा पहुचे |तब तक प्रथम विश्व युद्ध का आरम्भ हो चुका था |अनेक भारतीय क्रांतिकारी बर्लिन में जमा थे | उन्होंने बर्लिन कमेटी की स्थापना करके यहा भी स्वतंत्रता की लड़ाई जारी रखी | इन क्रान्तिकारियो में चम्पक रामन पिल्लै , तारकनाथ दास , अब्दुल हफ़ीज़ , बरकतुल्ला , डॉ ० भूपेन्द्रनाथ दत्त , डॉ प्रभाकर , वीरेंद्र सरकार व वीरेंद्र चट्टोपाध्याय प्रमुख थे | लाला हरदयाल के आ जाने से क्रांतिकारी साहित्य के निर्माण में तेज़ी आ गयी | क्रान्तिकारियो ने तुर्की , अरब और अफगानिस्तान के शासको को ब्रिटेन के विरुद्ध एकत्रित होने का पत्र भी भेजा था | परन्तु वह पत्र अंग्रेजो के हाथ लग गया | क्रान्तिकारियो की यह योजना थी कि भारतीय जनता की ओर से जब भारत विद्रोह हो तभी अंग्रेजो के शत्रु देश आक्रमण तेज़ कर दे | अपने लक्ष्य तक पहुचने के लिए गदर पार्टी के सदस्य हजारो की संख्या में अमेरिका और कनाडा से भारत वापस लौट रहे थे |पंजाब और संयुक्त प्रांत के गदर आन्दोलन का संचालन रासबिहारी बोस और यतीन्द्रनाथ सान्याल कर रहे थे |यतीन्द्रनाथ मुखर्जी ( बाघा जतिन ) बंगाल से एशिया और यूरोप के क्रान्तिकारियो से सम्पर्क साध रहे थे |बर्लिन कमेटी के प्रयत्नों से क्रान्तिकारियो के लिए जर्मनी से शस्त्रों से भरे जहाज भेजे गये |परन्तु अंग्रेजो ने इन्हें पकड़ लिया |लाला हरदयाल ने फ्रांस , स्वीडन , नार्वे , स्विट्जरलैंड , इटली ,आस्ट्रिया आदि देशो के क्रान्तिकारियो से सम्पर्क बनाकर उन्हें भारत की क्रांति के समर्थन के लिए प्रेरित किया |जर्मनी में युद्ध बंदी के पश्चात लौटे हुए सैनिको का उपयोग करने की योजना बनाई गयी | लेकिन विश्वासघातियो के चलते गदर पार्टी द्वारा देश में सशस्त्र एवं सैन्य विद्रोह के जरिये राष्ट्र को स्वतंत्र कराने का प्रयास निर्धारित समय से पहले ही विफल हो गया | लिहाजा लाला हरदयाल और विदेशो में रह रहे दुसरे क्रान्तिकारियो का मनोबल भी काफी टूट - सा गया | उधर विश्व युद्ध के अंतिम दौर से पराजित हो रहे जर्मनी का भारत की तरफ देखने का दृष्टिकोण बदल गया था |अब जर्मनी ने लाला हरदयाल पर नजर रखनी शुरू की | 1916 से 1917 तक वे जर्मनी में नजर कैद में रखे गये | बाद में छिपते हुए स्वीडन पहुचे और अलग - अलग शहरों में 9 वर्षो तक रहे | विलक्षण बुद्धि के धनी तो वे थे ही |स्वीडन पहुचते ही स्वीडिश भाषा में अपना भाषण सभाष्ण और अध्यापन भी करने लगे | दुनिया कि अनेक भाषाओं पर उनको महारत हासिल थी | अध्यापन से वे अपनी आजीविका चलाते रहे | वहा भी उनके अनेक मित्र और प्रशंसक बन गये थे | बाद के दौर में सर तेज़ बहादुर सप्रू और सी ० ऍफ़ ० एंड्रूज के प्रयत्नों से ब्रिटिश सरकार से उन्हें भारत आने की अनुमति मिल गयी | उस समय लाला हरदयाल अमेरिका में थे | स्वदेश वापसी की अनुमति के वावजूद लाला हरदयाल हिन्दुस्तान कभी नही पहुच सके | अमेरिका के फिलाडेलिफया नामक स्थान पे 4 मार्च 1939 को उनकी अकस्मात मृत्यु हो गयी | मृत्यु से पहले वे पूरी तरह स्वस्थ थे |हमेशा कि तरह 3 मार्च कि रात को वे सोये और दूसरे दिन उन्हें मृत पाया गया | लाला हरदयाल व उनके साथी क्रांतिकारी युद्ध के माध्यम से भारत को स्वतंत्र कराना चाहते थे | पर वे अपने उद्देश्य में सफल न हो सके | लेकिन राष्ट्र - स्वतंत्रता के उनके उद्देश्य और उसके लिए किए गये अथक प्रयास देश वासियों के लिए स्मरणीय है | लाला हरदयाल विलक्षण -प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व थे , वे कुशल वक्ता और उच्च कोटि के लेखक भी थे |उन्होंने अनेक ग्रंथो की रचना की | इसमें कोई सन्देह नही की अगर जीवन ने उन्हें और मौक़ा दिया होता तो वे अपनी विलक्षण बौद्धिक प्रतिभा और सांगठनिक क्षमता का उपयोग आश्चर्यजनक कार्यो के लिए कर जाते. 
ऐसे महान क्रांतिकारी को मेरा शत - शत नमन

सुनील दत्ता 
पत्रकार
09415370672
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