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शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

थोरियम घोटाला


जबसे यूपीए सरकार बनी है, तबसे देश में घोटालों का तांता लग गया है. देश के लोग यह मानने लग गए हैं कि मनमोहन सिंह सरकार घोटालों की सरकार है. एक के बाद एक और एक से बड़ा एक घोटाला हो रहा है. चौथी दुनिया ने जब 26 लाख करोड़ रुपये के कोयला घोटाले का पर्दाफाश किया था, तब किसी को यह यकीन भी नहीं हुआ कि देश में इतने बड़े घोटाले को अंजाम दिया जा सकता है. आज हम कोयला घोटाले से भी बड़े घोटाले का पर्दाफाश कर रहे हैं. यह घोटाला कोयला घोटाले से भी खतरनाक है, क्योंकि इसमें न स़िर्फ देश के बहुमूल्य खनिज की बंदरबांट हुई, बल्कि इस घोटाले का असर हिंदुस्तान के भविष्य पर भी होगा. मनमोहन सिंह सरकार के दौरान घोटाले का एक नया चेहरा सामने आया है. पहले जब घोटाला हुआ करता था तो उसमें पैसों की हेराफेरी होती थी. किसी बेईमान मंत्री या अधिकारी की करतूत की वजह से सरकारी डील में दलाली के पैसों की हेराफेरी होती थी. ज़्यादा पैसे देकर खराब माल लेकर घोटाला किया जाता था, लेकिन यूपीए सरकार के दौरान सीधे देश के बहुमूल्य खनिजों और खदानों को ही लूटकर घोटाले को अंजाम दिया जा रहा है. सरकारी नीतियों को बदल कर निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाना सरकार की नीति बन गई है. जो घोटाला आज हम आपके सामने रख रहे हैं, वह एक ऐसा घोटाला है, जिसके पैमाने और प्रभाव को जानकर आपके होश उड़ जाएंगे. यह घोटाला कम से कम 48 लाख करोड़ रुपये का है. यह थोरियम घोटाला है.
सबसे पहले समझते हैं कि यह थोरियम क्या है. थोरियम एक रेडियोएक्टिव पदार्थ है, जिसका इस्तेमाल न्यूक्लियर रिएक्टर में ईंधन की तरह होता है. न्यूक्लियर साइंटिस्टों के मुताबिक, थोरियम के जरिए भारत में ऊर्जा की ज़रूरतें पूरी हो सकती हैं. भारत में थोरियम का सबसे बड़ा भंडार है. दक्षिण भारत के समुद्री किनारों पर थोरियम फैला हुआ है, जिसे हम कई सौ सालों तक इस्तेमाल कर सकेंगे. दुनिया के दूसरे देशों में थोरियम पत्थरों में पाया जाता है, स़िर्फ हमारे देश में यह साधारण बालू में मिलता है. इसे खनन करना एवं जमा करना आसान है और यह सस्ता है. विश्वविख्यात न्यूक्लियर साइंटिस्ट होमी जहांगीर भाभा ने सबसे पहले थोरियम के महत्व को समझा था. उन्होंने 1960 के दौरान थोरियम के इस्तेमाल की योजना बनाई थी. उन्होंने तीन चरणों वाला न्यूक्लियर कार्यक्रम तैयार किया था. उनका मानना था कि चूंकि देश और दुनिया में ज़्यादा मात्रा में यूरेनियम उपलब्ध नहीं है, इसलिए भविष्य के रिएक्टर थोरियम आधारित होने चाहिए. हिंदुस्तान में थोरियम की कमी नहीं है, इसलिए भविष्य में ऊर्जा की ज़रूरतें आराम से पूरी हो जाएंगी. न्यूक्लियर रिएक्टर अगर थोरियम आधारित है तो उसके कई ़फायदे होते हैं. पहला, यह यूरेनियम से बेहतर ईंधन है. यह यूरेनियम से बेहतर ऊर्जा उत्सर्जन करता है. यह यूरेनियम आधारित रिएक्टर से ज़्यादा सुरक्षित भी है. यही वजह है कि जापान सहित कई देश अपने-अपने यूरेनियम आधारित रिएक्टर को छोड़कर थोरियम आधारित रिएक्टर लगा रहे हैं, लेकिन भारत से यह थोरियम गायब हो रहा है. मुनाफा कमाने के लिए इसे मिट्टी की तरह निर्यात किया जा रहा है, दूसरे देशों को इसकी आपूर्ति की जा रही है. यह न स़िर्फ गैरक़ानूनी है, बल्कि देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ भी है. समझने वाली बात यह है कि आज़ादी के बाद जब भारत सरकार ने डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी का गठन किया, तब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सबसे पहले थोरियम के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया था, लेकिन नेहरू जी के नाम पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी ने ही आज थोरियम लूटने की खुली छूट दे रखी है.
समुद्र तटों से निजी कंपनियों द्वारा थोरियम की लूट हो रही है और सरकार इस बात से अनजान है. पहले यह समझते हैं कि कैसे देश को 48 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ और कैसे देश के  बहुमूल्य खनिजों को गैरक़ानूनी तरीके से विदेश भेजा गया. 30 नवंबर, 2011 को कोडीकुनेल सुरेश ने लोकसभा में प्रधानमंत्री से सवाल पूछा. सवाल यह था कि देश से जो मोनाजाइट निर्यात किया जा रहा है, क्या उसमें किसी क़ानून का कोई उल्लंघन हुआ है या नहीं? इस पर पीएमओ के मिनिस्टर ऑफ स्टेट वी नारायणसामी ने जवाब दिया कि मोनाजाइट को छोड़कर समुद्र तट की बालू, जिसमें कुछ खनिज हैं, का निर्यात किया जा रहा है, क्योंकि मोनाजाइट और थोरियम के निर्यात के लिए लाइसेंस दिया जाता है और अब तक किसी कंपनी को इसे निर्यात करने के लिए लाइसेंस नहीं दिया गया है. डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी ने 6 जनवरी, 2006 को कई दूसरे खनिजों को अपनी लिस्ट (एसओ-61-ई) से हटा दिया और निजी कंपनियों को उन्हें निर्यात करने की छूट दे दी. लेकिन क्या सरकार को यह पता है कि देश से मोनाजाइट का निर्यात हो रहा है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2004 में मनमोहन सिंह की सरकार बनी, तबसे अब तक 2.1 मिलियन टन मोनाजाइट भारत से गायब कर दिया गया है. मोनाजाइट उड़ीसा, तमिलनाडु और केरल के समुद्र तटों पर मौजूद बालू में पाया जाता है. मोनाजाइट में करीब दस फीसदी थोरियम होता है. इसका मतलब यह कि करीब 1,95,000 टन थोरियम गायब कर दिया गया. माइंस एंड मिनरल एक्ट 1957 के तहत उड़ीसा सैंड कॉम्प्लेक्स, तमिलनाडु में कन्याकुमारी के पास मानवालाकुरिची और केरल में अलूवा-चावरा बेल्ट को मोनाजाइट के लिए चिन्हित किया गया था. मोनाजाइट से थोरियम निकालने का अधिकार स़िर्फ इंडिया रेयर अर्थ लिमिटेड को है. यह एक पब्लिक सेक्टर कंपनी है. माना यह जाता है कि अगर सीएजी यानी कॉम्पट्रोलर एंड आडिटर जनरल इंडिया रेयर अर्थ लिमिटेड और डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी के एकाउंट की जांच करे तो कोयला घोटाला काफी छोटा पड़ जाएगा. देश से जो थोरियम गायब है, अगर उसकी कीमत सौ डालर प्रति टन भी लगाई जाए तो यह 48 लाख करोड़ रुपये का घोटाला होगा. अब सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री कार्यालय को यह पता नहीं है कि देश के थोरियम के साथ क्या हो रहा है. अब जब मामला सामने आया है तो यह सवाल विपक्षी दलों  से भी पूछना चाहिए कि उन्होंने इस मामले पर आवाज़ क्यों नहीं उठाई, हंगामा क्यों नहीं किया. या फिर यह मान लिया जाए कि राजनीतिक दलों ने निजी कंपनियों को लूटने की आज़ादी दे दी है. वैसे मोनाजाइट और थोरियम के निर्यात का लाइसेंस देने का अधिकार नागपुर में चीफ कंट्रोलर ऑफ माइंस के पास है, जो सीधे केंद्रीय खान मंत्रालय के तहत आता है. पिछले चार सालों से इस चीफ कंट्रोलर की सीट खाली है. वरिष्ठ पत्रकार सैम राजप्पा के मुताबिक, सी पी एम्ब्रोस के 2008 में रिटायर होने के बाद सरकार ने जानबूझ कर किसी रंजन सहाय को काम करने दिया, क्योंकि उनके रिश्ते निजी कंपनियों और उद्योगपतियों के साथ हैं. वैसे भी इतने महत्वपूर्ण पद को चार सालों तक खाली रखना कई सवाल खड़ा करता है. यही नहीं, रंजन सहाय के खिला़फ केंद्रीय सतर्कता आयोग में कई शिकायतें दर्ज हैं. सवाल यह है कि रंजन सहाय को मदद करने वाले कौन लोग हैं? सरकार ने चीफ कंट्रोलर ऑफ माइंस के पद पर किसी को नियुक्त क्यों नहीं किया? अगर किसी को नियुक्त किया गया तो वह अपनी सेवाएं क्यों नहीं दे सका? यह सवाल इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि देश को 48 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो गया और किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी.
समुद्र के किनारे पाई जाने वाली बालू के निर्यात में 2005 के बाद से लगातार वृद्धि हुई. हैरानी इस बात की है कि इस बालू के साथ-साथ रेडियोएक्टिव पदार्थों का भी निर्यात धड़ल्ले से चल रहा है. जिन पदार्थों को देश के न्यूक्लियर रिएक्टर के लिए बचाना था, उन्हें निजी कंपनियों के हवाले कर दिया गया. मजेदार बात तो यह है कि जो लोग देश की संपदा को लूट रहे हैं, उन्हें सरकार अवार्ड भी दे रही है. यह थोरियम घोटाला भारत के वर्तमान के लिए तो खतरनाक है ही, साथ-साथ यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी चिंताजनक है. सरकार को चाहिए कि वह कम से कम अब तो थोरियम के निर्यात पर रोक लगाए. सरकार को माइंस एक्ट में बदलाव लाना चाहिए और जितने भी महत्वपूर्ण खनिज हैं, जिन्हें भविष्य के लिए बचाकर रखना ज़रूरी है, उनके खनन और निर्यात पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाए. मनमोहन सिंह सरकार की नव उदारवादी नीतियों से देश को बहुत नुकसान हो चुका है. अभी भी संभलने का वक्त बाकी है. संविधान के मुताबिक, देश के खनिज पर देश की जनता का अधिकार है और सरकार को चाहिए कि वह इन पदार्थों के इस्तेमाल की निगरानी करे. थोरियम एक न्यूक्लियर ईंधन है, इसलिए उसके प्रति और भी सतर्क रहने की ज़रूरत है. सरकार को उन इलाकों को फिर से चिन्हित करना चाहिए, जहां मोनाजाइट और थोरियम है. उन इलाकों में किसी भी तरह के खनन पर पाबंदी लगाकर आर्मी, एयरफोर्स या नेवी द्वारा उनकी रक्षा की जानी चाहिए. अब तक जितना थोरियम का नुकसान हुआ, उसका पता लगाने के लिए इस मामले की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए.
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि पिछले कुछ सालों में मनमोहन सिंह ने भारत की ऊर्जा ज़रूरतों के बारे में देश-विदेश में सवाल उठाए हैं. न्यूक्लियर एनर्जी के लिए तो उन्होंने अपनी सरकार को ही दांव पर लगा दिया. कोयला घोटाला सामने आने से पहले तक मनमोहन सिंह लगातार यही कह रहे थे कि देश में कोयले की कमी है. बिजली बनाने वाली कंपनियों को कोयला नहीं मिल रहा है. जब कोयला घोटाला सामने आया तो देश को असलियत का पता चला. जब सरकार कोयला खदानों को निजी कंपनियों को मुफ्त में दे देगी तो कोयला कहां से आएगा? अब तक उन कोयला कंपनियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, जिन्होंने कोयला खदानें तो ले लीं, लेकिन कोयला निकालने का काम शुरू नहीं किया. देश में अगर स़िर्फ क़ानून का राज होता तो कई साल पहले ही इन कोयला खदानों को सरकार वापस जब्त कर सकती थी. अब मामला थोरियम का सामने आया है. थोरियम के सही उपयोग से देश की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा किया जा सकता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार ने जानबूझ कर होमी जहांगीर भाभा की योजनाओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया, क्या सरकार ने थोरियम का गैरक़ानूनी निर्यात करके दूसरे देशों की ऊर्जा पूर्ति करने का मन बना लिया है? अगर देश में थोरियम का भंडार यूं ही पड़ा है और जिसके लिए 1960 से ही योजना चल रही है, तो उसे छोड़कर सरकार अमेरिका और दूसरे देशों के रिएक्टर क्यों भारत में लगाना चाहती है? क्या सरकार पर अमेरिका का दबाव है, क्या ऊर्जा पूर्ति के नाम पर सरकार अमेरिकी कंपनियों को फायदा पहुंचाना चाहती है? इन सवालों के जवाब सरकार को देने होंगे और साथ ही यह भी बताना होगा कि पिछले कुछ सालों में 48 लाख करोड़ रुपये का थोरियम कहां गायब हो गया और सरकारी तंत्र क्यों सोता रहा? यह मामला सीधे प्रधानमंत्री के अधिकार क्षेत्र में आता है, ऐसे में यह मामला वैसे भी गंभीर हो जाता है. उम्मीद यही की जानी चाहिए कि मनमोहन सिंह कम से कम अब अपना मौनव्रत तोड़ेंगे और थोरियम घोटाले पर सरकार की सफाई पेश करेंगे.
जब हम पंडित जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री के रूप में मूल्यांकन करते हैं या इतिहास की किताबों में पढ़ते हैं तो उनके बारे में जानकर अच्छा लगता है. आज भी जब हम नदियों पर डैम या स्टील कंपनियों और दूसरे कल-कारखानों को देखते हैं तो गर्व से कहते हैं कि यह सब नेहरू जी की वजह से संभव हो पाया. क्या कांग्रेस पार्टी या यूपीए के किसी मंत्री को यह ख्याल आता है कि क़रीब बीस साल बाद जब लोग याद करेंगे तो मनमोहन सरकार को किस तरह याद करेंगे, इतिहासकार किस तरह से यूपीए सरकार का आकलन करेंगे? आने वाली पीढ़ी को जब पता चलेगा कि मनमोहन सिंह के शासन के दौरान देश की कोयला खदानें मुफ्त में बांट दी गई थीं, तो वह क्या सोचेगी? जब उसे पता चलेगा कि हमारे पास कभी खनिजों के दुनिया के सबसे बड़े भंडार थे, जिन्हें हमारी सरकार ने निजी कंपनियों को लूटने और विदेश भेजने दिया तो सच मानिए, वर्तमान यूपीए सरकार पर आने वाली पीढ़ियां हंसेंगी.

http://www.chauthiduniya.com/2012/11/48-lakh-crore-mahagotala.html
चौथी दुनिया से साभार 

सोमवार, 18 जून 2012

21 हजार सरकारी स्कूल बंद


30 अप्रैल के हिन्दी दैनिक में 21 हजार सरकारी स्कूलो के बंद होने की खबर छपी है | खबर मानव संसाधन एवं विकास मत्रालय की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया गया है की 2009 -- 11 के दौरान देश में सरकारी स्कूलो की संख्या में 28052 स्कूलो की वृद्धि हुई है | लेकिन यह वृद्धि शिक्षा के पिछड़े राज्यों में -- उत्तर प्रदेश , बिहार , उड़ीसा , महाराष्ट्र और झारखंड में हुई है | जबकि शिक्षा में अगड़े 12 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशो में इस अवधि में 20 .796 स्कूल बन्द हो गये | इन राज्यों में केरल , आंध्र प्रदेश , राजस्थान , असम अरुणाचल , प्रदेश हरियाणा , सिक्किम , उत्तराखंड , दिल्ली तथा केंद्र शासित चंडीगढ़ , दमन दादरा एवं नगर हवेली शामिल है | दिलचस्प बात यह है की इन राज्यों के लगभग 21 हजार विद्यालयों के बन्द होने का प्रमुख कारण यह बताया गया है की इन राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण पर अच्छा काम हुआ है | फलस्वरूप जन्मदर में कमी आई है | बच्चो की संख्या में कमी आई है | इसी कारण वहा के स्कूल बंद हुए है | प्रश्न उठता है की आबादी में वृद्धि दर में कमी आने से स्कूल क्यों और कैसे बन्द हो जायेंगे ? बच्चो की कमी से कम बच्चे स्कूल पहुचेंगे , लेकिन वे पूरी तरह से गायब कैसे हो जायेंगे ? जनसंख्या वृद्धि दर घटना और बच्चो की संख्या कम होने के साथ -- साथ मानव संसाधन विकास मंत्रालय की रिपोर्ट में आबादी के गाँवों से शहरों में बढते पलायन का कारण भी जोड़ दिया गया है | लेकिन यहाँ भी वही सवाल खड़ा है की क्या पूरी आबादी और बच्चे भी पलायन कर गये है , जो कत्तई संभव नही है |
मानव संसाधन विकास मंत्रालय के रिपोर्ट की थोड़ी विवेचना भी स्कूलो का बन्द होने की बताये गये कारणों को गलत व झूठा साबित कर देता है | लेकिन तब सवाल है की स्कूल बन्द होने के वास्तविक कारण क्या है ? इस का वास्तविक कारण यह है की सरकारी स्कूलो में बच्चो को शिक्षित करने का काम उनमे शिक्षा की बुनियाद डालने और मजबूत करने का काम कब का छोड़ दिया गया है | उन्हें तो अब मुख्य तौर पर सरकारी सर्व शिक्षा अभियान के प्रचारों में ही शिक्षित दिखाया जा रहा है | इसीलिए तो प्राइवेट -- नर्सरी व प्राइमरी दर्जो के स्कूलो में न जा पाने वाले गरीब बच्चे ही सरकारी स्कूलो में पहुच रहे है | वह भी शिक्षा से ज्यादा मिड -- डे-- मील के नाम पर जा रहे है | यह इस बात का सबूत है की सरकार अब बच्चो की शिक्षा का काम राज्य व सरकार के उपर से हटाने लगी हुई है | इसे धीरे -- धीरे वे 20 -- 25 सालो से नयी शिक्षा नीति के लागू किए जाने के बाद से चरणबद्ध रूप से हटाती भी रही है | अब वह स्कूली शिक्षा को भी निजी विद्यालयों के छोटे -- बड़े मालिको के हाथ में सौप्ति जा रही है | 21 हजार स्कूलो के बन्द होने का असली कारण भी यही है | लेकिन तब शिक्षा में पिछड़े बताये गये राज्यों में विद्यालयों की संख्या बढ़ क्यों रही है ? उसके बढने का पहला कारण तो गरीब घरो के बच्चो का प्राइवेट स्कूलो में पहुचने की असर्मथता और मिड -- डे -- मील है | इसका दुसरा बड़ा कारण स्वंय ऐसे प्राइवेट स्कूल है , जिनको अभी मान्यता नही मिल पायी है | उनके बच्चे तो पढ़ते है गैर मान्यता प्राप्त स्कूलो में पर उनका नाम सरकारी स्कूल रजिस्टर में दर्ज है |
प्राप्त सूचनाओं के अनुसार सरकारी स्कूलो में इन बच्चो की संख्या , कुल बच्चो की संख्या के आधे से ज्यादा ही है | यह है इन प्रान्तों के स्कूलो के ज्यादा खुलने या बढने की स्थितियों का प्रमुख कारण | सही कहा जाए तो यह इन प्रान्तों के भी स्कूलो के भविष्य में बन्द होने की स्थितिया है , न की उनके लगातार चलने व बढने की | यह स्थिति खासकर सरकारी जूनियर हाई स्कूल के दर्जो में एकदम स्पष्ट दिखाई पड रही है | सरकारी स्कूलो के कक्षा 6 , 7 , और 8 के बच्चो की संख्या में भारी कमी आई है | साफ़ बात है की सरकारी स्कूलो के बन्द होने की यह स्थितिया न तो आबादी वृद्धि दर में कमी आने से हो रही है और न ग्रामीण आबादी के पलायन से | बल्कि यह स्थिति खुद सरकारों द्वारा सरकारी स्कूलो को हतोत्साहित करने और प्राइवेट स्कूलो को बढावा देने की नीतिगत बदलावों के चलते खड़ी हो रही है और बढती भी जा रही है |
बताने की जरूरत नही हैं की यह नीतिगत बदलाव समाज के निचले स्तर प्र्पदे और कल को निचले स्तर पर पहुचने वाले लोगो को स्कूली शिक्षा से बाहर कर देगा और कर भी रहा है | फिर यह बदलाव शिक्षण संस्थाओं के निजी मालिको को छोटे -- बड़े स्तर तक के मालिको को खासकर उच्च स्तरीय शिक्षण संस्थानों से भारी लाभ कमाने की छूट देने और इसे बढाने का भी काम कर रहा है | शिक्षा के क्षेत्र में यह नीतिगत बदलाव वैश्वीकरणवादी , आर्थिक नीतियों व डंकल प्रस्ताव का अहम हिस्सा है | सरकारी स्कूलो को धीरे -- धीरे बन्द किया जाना और उसे निजी हाथो में सौपा जाना डंकल प्रस्ताव के सेवा के व्यापार के अंतर्गत है | उसका नियोजित क्रियान्वन है | जागो -- जागी अब भी वक्त है अगर नही जागे तो तुम्हारे बच्चो का भविष्य पूरी तरह अँधेरे में होगा रौशनी का एक दिया भी नही होगा उनके जीवन में .......................................आने वाले कल की खातिर जागो |

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672
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