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मंगलवार, 18 अगस्त 2015

देश में झूठ - विदेश में झूठ - चुनाव में झूठ

उनसे कह दो, गुजरे हुए गवाहों से- झूंठ तो बोले, मगर झूंठ का सौदा न करे ===== जिसे यूएई की राजधानी में बनने वाला पहला मंदिर बताकर सरकार द्वारा प्रचारित किया जा रहा है इस ऐतिहासिक फैसले के लिए मोदी ने यूएई सरकार का शुक्रिया अदा किया, बताया जा रहा है कि इस मंदिर के लिए जमीन तो वर्ष 2013 में ही एक अरब शेख ने दान दी थी।
टाइम्स ऑफ इंडिया की 9 जुलाई 2013 की खबर के अनुसार, एक निवेश कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, नाज़ेम-अल-कुदसी के निमंत्रण पर स्वामीनारायण संप्रदाय मंदिर के अधिकारियों ने अबूधाबी का दौरा भी किया था।
 विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने ट्वीट किया था, ‘भारतीय समुदाय की लंबी प्रतीक्षा खत्म हुई। प्रधानमंत्री की यात्रा पर यूएई सरकार ने अबू धाबी में एक मंदिर बनाने के लिए जमीन आबंटित करने का फैसला किया।’ उन्होंने लिखा, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ऐतिहासिक फैसले के लिए यूएई नेतृत्व का शुक्रिया अदा किया।’
 दुबई में शिव और कृष्ण मंदिर के अलावा अक्षरधाम की स्वामीनारायण संस्था का सत्संग भवन, गुरुद्वारा और गिरजाघर भी हैं.दुबई का पहला हिंदू मंदिर 1958 में बना था और यह एक मस्जिद के निकट है.
देश में झूठ, विदेश में झूठ, चुनाव में झूठ शायद नागपुर मुख्यालय की यही आदर्श और नैतिकता है. दुबई में मंदिर जमीन को लेकर सोशल मीडिया में भक्तों द्वारा तरहत-तरह की कहानियाँ लिखी जा रही हैं. जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है. दुबई में भी जाकर बांग्लादेश की प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति बता आये हैं. वहीँ, जेडीयू नेता के. सी. त्यागी ने कहा कि कल देर रात तक वो दुबई में थे, आत्मा उनकी बिहार में पड़ी हुई थी. और वो दुबई से बिहार के मतदाताओं को राजनीतिक रिश्वत देने के लिए आरा पहुंचे. चुनाव में तरह-तरह की अफवाहों और झूठ बोले गए जिनका वास्तविकता से कोई मतलब ही नहीं था. बिहार में चुनाव शुरू हो रहे हैं सवा लाख करोड़ रुपये का विशेष पैकेज देने की बात शुरू कर दी जबकि यह पैकेज कहाँ और कैसे खर्च होगा उसका कोई प्लान भारत सरकार के पास नहीं है. बस काम चल रहा है किसी तरह से . सरकार चल रही है किसी तरह से.

सुमन 

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

क्या मोदी मध्यमार्गीय बन गए हैं?

दि इंडियन एक्सप्रेस में अपने लेख ;मोदी द मोडरेट   में आशुतोश वासर वार्ष्णेय लिखते हैं,मोदी की शैली भले ही वाजपेयी जैसी न हो परंतु कुल मिलाकर,पिछले कुछ महीनों मेंए उनके चुनाव अभियान के दौरान, वे वाजपेयी की लीक के नेता ही नजर आते हैं। अपने दावे के समर्थन में वार्ष्णेय लिखते हैं कि मोदी ने अपने एक चुनावी भाषण में मौलाना आजाद को श्रृद्धांजलि अर्पित की,उन्होंने दलित पार्टियों के साथ गठबंधन किया,जिनमें वे व्यक्ति भी शामिल हैं जो उनके खिलाफ बोलते रहे हैं और उन्होंने अपने एक भाषण में कहा कि गुजरात का हज कोटा पूरा भर जाता है जबकि बिहार और उत्तरप्रदेश में ऐसा नहीं होता क्योंकि गुजरात के मुसलमानों की तुलना में, बिहार और उत्तरप्रदेश के मुसलमान पिछड़े हुए हैं। वार्ष्णेय का यह दावा है कि उक्त तीनों उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि मोदी पूरी तौर पर न सहीए परंतु काफी हद तक, हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों से हट गए हैं। यहां पर दो प्रश्न हैं। पहला यह कि क्या उक्त तीनों उदाहरणों से ऐसा जाहिर होता है कि मोदी उग्र हिंदू राष्ट्रवादी नहीं रह गए हैं। और दूसरे, अगर ऐसा है, तो क्या यह केवल चुनावी रणनीति है या मोदी की विचारधारा में सचमुच परिवर्तन आया है।
उदारवादियों के एक तबके को उम्मीद है कि भारत जैसे विभिन्नताओं से भरे देश का शासन चलाने की जिम्मेदारी उठाने वाली किसी भी दक्षिणपंथी पार्टी के लिए अपने तेवर नरम करना आवश्यक होगा और उसे मजबूरी में मध्यमार्गी पार्टी बनना होगा। वार्ष्णेय के कहने का अर्थ यह है कि गठबंधन सरकार चलाने की मजबूरियों के चलते,वाजपेयी और भाजपा को मध्यमार्गी नीतियां अपनानी पड़ीं और ऐसा ही मोदी को करना पड़ेगा। दूसरी ओर, कुछ अन्य लोगों का कहना है कि ऐसी आशा करना व्यर्थ है क्योंकि हिन्दू राष्ट्रवादी, राज्य को एक ऐसे उपकरण के रूप में देखते हैं जिसका इस्तेमाल भारत और हिन्दुओं को एकसार राष्ट्र के रूप में पुनर्गठित करने के लिए किया जा सकता है। शनैः शनैः देश की सांस्कृतिक विविधता को समाप्त कर दिया जाएगा, उदारवादी, प्रजातांत्रिक मूल्यों से किनारा कर लिया जायेगा और अंततः देश, हिन्दू राष्ट्र में बदल जाएगा जो कि एक एकाधिकारवादी.सांस्कृतिक राज्य होगा। भारतीय समाज,विविधताओं से परिपूर्ण है। जातिगतए धार्मिक, नस्लीय, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताएं इतनी अधिक हैं कि समाज को पुनर्गठित करने के लिए यह आवश्यक होगा कि लोगों के दृष्टिकोण में परिवर्तन लाया जाए। इसके लिए, शैक्षणिक संस्थानों,संचार माध्यमों और नौकरशाही व सरकारी तंत्र, विशेषकर पुलिस, का इस्तेमाल किया जाए। जो भी दल सत्ता में रहता है उसका इन तीनों ही संस्थाओं पर जबरदस्त प्रभाव व नियंत्रण रहता है।
मीडिया और शैक्षणिक संस्थाओं का इस्तेमाल समाज को सांस्कृतिक दृष्टि से एकसार बनाने के लिए किया जाता है। दूसरी ओरए विविधता के प्रति असहिष्णुता विकसित की जाती है व सुरक्षाबलों और गुंडा ब्रिगेडों का इस्तेमाल उन समूहों या समुदायों के विरूद्ध किया जाता है जो कि अपनी विविधता बरकरार रखने का साहस या इरादा प्रदर्षित करते हैं। जाहिर है कि इस रणनीति का सबसे बड़ा शिकार अल्पसंख्यक समुदाय बनता है। उसके विरूद्ध हिंसा में बढोत्तरी होती है क्योंकि उसकी ओर से उसके विशिष्ट पारिवारिक कानूनों, खानपान की आदतों, त्योहार मनाने के तरीकों आदि में हस्तक्षेप का विरोध होता है। धार्मिक अल्पसंख्यकों की विविधता पर अलगाववादी मानसिकता का लेबल चस्पा कर दिया जाता है और यह कहा जाता है कि वे 'हिन्दू राष्ट्र' की सुरक्षा के लिए खतरा हैं। मृदु शक्ति ;मीडिया व शैक्षणिक संस्थान; व कठोर शक्ति ;सुरक्षाबल व नौकरशाही का इस्तेमाल कर अल्पसंख्यकों का दानवीकरण किया जाता है। उन पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे ढेर सारे बच्चे पैदा कर अपने संख्याबल में वृद्धि कर रहे हैं। यह कहा जाता है कि वे बंग्लादेशी घुसपैठिये हैं, आतंकवादी हैं,मंदिरों का ध्वंस करने वाले हैं और हिन्दू संस्कृति को नष्ट कर देना चाहते हैं। यह भी आरोप लगाया जाता है कि देश के मुस्लिम शासकों ने जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन करवाया था। मृदु शक्ति व कठोर शक्ति के द्वारा अल्पसंख्यकों की वर्तमान पीढ़ी से, उसके पूर्वजों द्वारा किए गए कथित अपराधों का बदला लेने को औचित्यपूर्ण सिद्ध किया जाता है।
परंतु राज्य द्वारा पूरे समाज को सांस्कृतिक दृष्टि से एकसार बनाने का विरोधए अल्पसंख्यक समुदाय की ओर से ही नहीं होता। समाज के कई दूसरे वर्ग, जैसे निम्न व मध्यम जातियां, पिछड़े इलाकों के रहवासी, महिलाएं, आदिवासी,लैंगिक अल्पसंख्यक व अन्य कई वर्ग भी इसके विरोध करते हैं।

वाजपेयी की राजनैतिक मजबूरियां
गठबंधन सरकार चलाने की मजबूरी के चलते, वाजपेयी के शासनकाल में भाजपा ने यह बेहतर समझा कि वह ऐसे मुद्दों को न उठाए जो हिन्दू राष्ट्रवादियों के प्रिय मुद्दे रहे हैं जैसे समान आचार संहिता,बाबरी मस्जिद के स्थान पर रामजन्मभूमि मंदिर का निर्माण और जम्मू कश्मीर को कुछ हद तक स्वायत्तता देने वाले संविधान के अनुच्छेद ३७० की समाप्ति। अगर भाजपा ने वाजपेयी शासन के दौरान अपने इस विघटनकारी एजेण्डे को लागू नहीं किया तो इसका कारण यह नहीं था कि उसकी राजनैतिक सोच में कुछ परिवर्तन आ गया था बल्कि इसका कारण यह था कि उसके पास इन कदमों को उठाने के लिए संसद में आवसश्यक बहुमत नहीं था। परंतु फिर भी, राज्य ने समाज को एकसार बनाने के अपनी परियोजना पर जमकर काम किया।
मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में मुरली मनोहर जोशी ने जे.एस. राजपूत को एनसीईआरटी का निदेशक नियुक्त किया। उन्होंने कई प्रतिष्ठित इतिहासविदों द्वारा लिखी पुस्तकों को स्कूली पाठ्यक्रमों से बाहर कर दिया और इतिहास की किताबों का साम्प्रदायिकीकरण किया, उन्होंने हिन्दू राष्ट्रवादियों को विभिन्न पदों पर नियुक्त किया और अनुदान के मामले में भेदभाव किया। जोशी ने विश्वविद्यालय स्तर पर ज्योतिष को एक विषय के रूप में शामिल किया और हिन्दू पंडितों को प्रशिक्षित करने के लिए पाठ्यक्रम विकसित करवाए। गुजरात ;व राजस्थान, जहां वसुन्धराराजे सिंधिया मुख्यमंत्री थीं में पाठ्यपुस्तकों में हिटलर की सरकार का गुणगान किया जाने लगा। इन पुस्तकों में हिटलर द्वारा यहूदियों के कत्लेआम की चर्चा तक नहीं की गई। वाजपेयी की सरकार के दौरान ही २००२ के गुजरात दंगे हुए और वाजपेयी ने दंगों के लिए मोदी द्वारा दिये गये
क्रिया.प्रतिक्रिया स्पष्टीकरण को अप्रत्यक्ष रूप से सही ठहराते हुए पूछाए परंतु गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एस.६ कोच में आग किसने लगाई थी?
वाजपेयी सरकार के दौरान ही सन् १९९८ में गुजरात के डांग और मध्यप्रदेश के झाबुआ जिलों में ईसाईयों पर हमले की घटनाओं में तेजी से बढोतरी हुई। इसकी प्रतिक्रिया में न तो सरकार ने पीडि़तों को मुआवजा दिया और ना ही दोषियों को सजा दिलवाने की कोशिश की। उलटे, वाजपेयी ने यह मांग की कि धर्मपरिवर्तन पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। जब भी भाजपा सत्ता में रहती है, हिन्दू राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं की हिम्मत बढ़ जाती है, उन्हें शासन से प्रोत्साहन मिलता है और राज्य के संसाधनों का इस्तेमाल करने की पूरी छूट भी। कानून उन्हें छू भी नहीं पाता। खण्डवा में प्रोफेसर एस एस ठाकुर पर कथित एबीव्हीपी कार्यकर्ताओं ने हमला किया। साध्वी प्रज्ञासिंह ठाकुर की मालेगांव में सन् २००८ में हुए धमाकों में संलिप्तता सामने आई। इसी तरह की अनेक घटनाएं देश के विभिन्न भागोंए विशेषकर भाजपा शासित प्रदेशों में हुईं। नौकरशाही में हिन्दू राष्ट्रवादियों की बडे पैमाने पर भर्ती की गई और उन्हें ऐसे पदों पर पदस्थ किया गया जिससे वे भाजपा के मूल एजेण्डे को लागू कर सकें।
हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों से दूरी?
बंबई हाईकोर्ट के समक्ष कई चुनाव याचिकाएं दायर की गईं थीं जिनमें यह आरोप लगाया गया था कि शिवसेना और भाजपा उम्मीदवारों ने महाराष्ट्र विधानसभा के सन् १९९५ के चुनाव में धर्म के नाम पर वोट मांगे और विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच शत्रुता उत्पन्न करने के प्रयास किए। इन आरोपों को हाईकोर्ट ने सही ठहराया। इसके बादए साम्प्रदायिक पार्टियों ने चुनाव के दौरान खुलकर धर्म के नाम पर वोट मांगना बंद कर दिया। परंतु किसी पार्टी के असली चरित्र को सिर्फ इस आधार पर आंकना उचित न होगा कि वह चुनाव प्रचार के दौरान किन मुद्दों का इस्तेमाल करती है। अब ये पार्टियां दबे.छुपे ढंग से अपने साम्प्रदायिक संदेश को लोगों तक पहुंचाती हैं। सार्वजनिक तौर पर इन पार्टियों के उम्मीदवार व पदाधिकारी, धर्मनिरपेक्षता की बात करते नजर आते हैं परंतु इन पार्टियों से जुड़े संगठन समाज को साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के अपने एजेण्डे पर काम करते रहते हैं। भाजपा के उत्तरप्रदेश प्रभारी अमित शाह, अयोध्या के रामजन्मभूमि मंदिर गए और मीडिया के जरिये उन्होंने लोगों तक यह बात पहुंचाई कि उन्होंने वहां प्रार्थना की कि उस स्थल पर एक भव्य रामजन्मभूमि मंदिर बने। विहिप ने उत्तरप्रदेश में धार्मिक ध्रुवीकरण करने के उद्देश्य से चैरासीकोसी परिक्रमा निकालने की कोशिश की। जब यह नहीं हो सका तब जाट महापंचायत का आयोजन किया गया और साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने की भरपूर कोशिश की गई। न तो मोदी और ना ही उनके दाहिने हाथ अमित शाह ने इन गतिविधियों की निंदा की। क्या फिर भी हम यह कह सकते हैं कि मोदी, हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों से दूर हो गये हैं? मोदी ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए स्वयं कहा कि वे जन्म से हिन्दू हैं और राष्ट्रवादी हैं इस कारण वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं। अगर केवल हिन्दू राष्ट्रवाद के सहारे भाजपा सत्ता में आ सकती होती तो वह केवल इसी का इस्तेमाल करती। हिन्दू राष्ट्रवाद, भाजपा की मूल विचारधारा है और वह इसका इस्तेमाल उन लोगों का समर्थन हासिल करने के लिए किया जाता है जो कि कट्टर हिन्दुत्ववादी हैं। इसके साथ.साथए भाजपा और आरएसएस के अन्य अनुषांगिक संगठन अपने समर्थकों की संख्या बढ़ाने के लिए भी काम करते रहते हैं। चुनाव के दौरान केवल हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा पर जोर देने से काम नहीं चलता। इसलिए इस विचारधारा को त्यागे बगैर, ये संगठन समाज के अन्य वर्गों को आकर्षित करने के लिए कांग्रेस.विरोध, पाकिस्तान के प्रति आक्रामक तेवर व ३५ प्रतिशत युवा उम्मीदवारों को आकर्षित करने के लिए विकास की बातें करते हैं।
भाजपा के कांग्रेस विरोध का उद्देश्य प्रजातंत्र व प्रजातांत्रिक संस्थाओं को मजबूती देना और राज्य को अधिक जवाबदेह बनाना नहीं है। भाजपा का कांग्रेस विरोध दो मुद्दों पर आधारित है पार्टी के अध्यक्ष के इटेलियन मूल का होने का मुद्दा ;गांधी परिवार पर इसलिए हमला किया जाता है क्योंकि वह पार्टी को एक रखे हुए है व उन कार्यक्रमों का विरोध,जो अल्पसंख्यकों की भलाई के लिए चलाए जाते हैं। इन कार्यक्रमों को पार्टी अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण बताती है। सच तो यह है कि भाजपा का कांग्रेस विरोध भी उसके हिन्दू राष्ट्रवादी चरित्र का उदाहरण है। पाकिस्तान के खिलाफ विषवमन भी भाजपा के हिन्दू राष्ट्रवादी राजनैतिक कार्यक्रम का हिस्सा है। पाकिस्तान को कटघरे में खड़ा कर हिन्दू राष्ट्रवादी, मुसलमानों को आईएसआई का एजेण्ट निरूपित करना चाहती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर जो पहला चुनाव मोदी ने लड़ा था वह मियां मुशर्रफ के खिलाफ था!
विज्ञापनों के जरिए भाजपा सरकारों द्वारा किए गए विकास कार्यों का ढोल बजाया जा रहा है। सच यह है कि इस तथाकथित विकास से केवल पूंजीपति और कारपोरेट संस्थान लाभांवित हुए हैं। उनके मुनाफे में आशातीत बढ़ोतरी हुई है। इस विकास से हाशिए पर पड़े समूहों विशेषकर किसानों, श्रमिकों, दलितों और आदिवासियों को कोई लाभ नहीं मिला है। विकास के फल का लाभ समाज के सभी वर्गों तक नहीं पहुंचा है। इसलिए अगर ये पार्टियां चुनाव के दौरान हिंदु राष्ट्रवाद के अपने एजेण्डे के अलावा अन्य मुद्दों पर भी बात करती हैं तो इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि उन्होंने हिन्दू राष्ट्रवाद के अपने एजेण्डे को त्याग दिया है। उनका मूल चरित्र वही है और वही रहेगा।   
आरएसएस व मोदी
भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मोदी के राजतिलक का भाजपा के सबसे सम्मानित नेता एल के आडवाणी ने विरोध किया था। सुषमा स्वराज, शत्रुध्न सिन्हा व यशवंत सिन्हा ने भी उस बैठक में भाग नहीं लिया था जिसमें मोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का निर्णय लिया गया था। बाद में आडवाणी, राजनाथ सिंह व अन्य नागपुर स्थित आरएसएस के मुख्यालय गए और उन्हें मोदी को स्वीकार करना पड़ा। मोदी केवल भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं। वे आरएसएस के भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। आरएसएसए हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध है। यह मानना भूल होगी कि आरएसएस ने मोदी की उम्मीदवारी का समर्थन इसलिए किया ताकि वे हिन्दू राष्ट्रवाद की राह से हट सकें। आरएसएस ने अपने हजारों कार्यकर्ताओं को मोदी के समर्थन में प्रचार अभियान में झोंक दिया है। अगर मोदी हिन्दू राष्ट्रवाद के एजेण्डे से जरा भी हटेंगे तो आरएसएस तुरंत अपने समर्पित कार्यकर्ताओं को प्रचार अभियान से हटा लेगी। मोदी, हिन्दू राष्ट्रवाद के एजेण्डे पर कायम हैं, यह इस तथ्य से भी जाहिर है कि उन्होंने सन् २००२ के दंगों के लिए माफी मांगने से इंकार कर दिया है।
-इरफान इंजीनियर

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

सांप्रदायिक हिंसा 2013 -भाग-2

किश्तवार, जम्मू एवं कश्मीर
9 अगस्त को ईद-उल-फित्र की नमाज के बाद अचानक पत्थरबाजी शूरू हो गई। नमाज के बाद बाहर निकल रहे लोगों का सामना अफजल गुरू और मकबूल भट्ट को फांसी दिए जाने से संबंधित भड़काऊ पोस्टरों से हुआ। कुछ अन्य लोगों का कहना है कि मस्जिद से निकल रहे लोग, भारत-विरोधी नारे लगा रहे थे जिसके कारण पत्थरबाजी हुई। यह बात अधिक विश्वसनीय नहीं लगती क्योंकि जम्मू में रहने वाले मुसलमानों का कश्मीरी राष्ट्रवादियों की स्व-निर्णय की मांग से बहुत लेनादेना नहीं है। बाद में भड़के दंगों में हिदयाल गांव में तीन व्यक्ति मारे गए और 80 घायल हुए। मृतकों में 23 साल का अरविंद कुमार भगत शामिल था, जो गोली लगने से मारा गया। हिन्दुओं का कहना है कि उसे किसी व्यक्ति ने गोली मारी जबकि मुसलमान कहते हैं कि वह पुलिस की गोली से मारा गया। बशर अहमद मोची पर भीड़ ने हमला किया और बाद में उसे जिंदा जला दिया। जम्मू क्षेत्र के आठ जिलों में कफ्र्यू लगाया गया। किश्तवार में मुसलमानों और हिन्दुओं की आबादी का नाजुक संतुलन है। हिन्दू, आबादी का 45 प्रतिशत हैं और मुसलमान 55। गृह राज्य मंत्री सज्जाद किचलू, जो किश्तवार के रहने वाले हैं, का दावा है कि दंगों की तैयारी पिछले कम से कम एक महीने से जारी थी और हथियारबंद समूह अल्पसंख्यकों पर हमला करने की योजना बना रहे थे। केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिंदबरम ने संसद मंे दिए गए अपने एक वक्तव्य में सांप्रदायिकता की आग भड़काने के लिए बजरंग दल को दोषी ठहराया।
किश्तवार में हुई सांप्रदायिक हिंसा के पीछे अलगाववादी राजनीति नहीं बल्कि वोट बैंक की राजनीति थी। यही कारण है कि एक छोटा सा झगड़ा बहुत जल्दी दंगे में बदल गया। भाजपा ने इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का राजनीतिकरण करने के लिए अरूण जेटली को किष्तवार भेजा। जम्मू कश्मीर में ऐसी सैंकड़ों घटनाएं हुईं हैं जिनमें लोग मारे गए और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया परंतु कोई भाजपा नेता वहां नहीं गया। भाजपा ने किश्तवार के दंगा पीडि़तों के लिए मुआवजे की राशि  बढ़ाने की मांग भी की। ऐसी मांग उसने पहले कभी नहीं की थी। किश्तवार दोनों समुदायों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्तों के लिए जाना जाता था।
ऊत्तर प्रदेश
रमजान के महीने में मेरठ में सड़कों पर नमाज पढ़े जाने पर भगवा ब्रिगेड ने आपत्ति उठाई। इससे दोनों समुदायों में तनाव बढ़ा परंतु पुलिस की तैनाती कर इस तनाव को हिंसा में नहीं बदलने दिया गया।
मेरठ जिले के नंगलामल गांव में एक मस्जिद के नजदीक स्थित मंदिर के बाहर लाउडस्पीकर के उपयोग को लेकर भड़की हिंसा में 26 जुलाई को एक व्यक्ति मारा गया और एक दर्जन घायल हो गए। दोनों समुदायों के बुजुर्गों ने हस्तक्षेप किया और मामले को शांतिपूर्ण ढंग से निपटा दिया। इसके बाद, एक इफ्तार पार्टी के दौरान श राब के नशे  में चूर कुछ लोगों द्वारा बदतमीजी किए जाने पर हिंसा भड़क उठी। हिंसा के दौरान गोलियां चलाई गईं और पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा। सुनील नामक एक युवक गोली से मारा गया और शाहिद को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। गांव के मुस्लिम रहवासियों का आरोप है कि पुलिस ने उनके घरों में घुसकर फर्नीचर और अन्य घरेलू सामान को नुकसान पहुंचाया और लोगों को पीटा (संडे एक्सप्रेस 28.07.2013)।
उत्तरप्रदेश  में सांप्रदायिक हिंसा की अधिकांश  घटनाएं सितंबर 7 और 8 को हुईं। अगस्त की 27 तारीख से लेकर 16 सितंबर के बीच सांप्रदायिक हिंसा की 128 घटनाएं हुईं। लगभग 50,000 लोग घर से बेघर हो गए और मुजफ्फरनगर में अमानवीय परिस्थितियों में राहत शिविरों में रह रहे हैं। सरकार ने उनके प्रति जुबानी सहानुभूति तो दिखलाई परंतु राहत शिविरों के हालात बेहतर करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए। कड़ाके की सर्दी और कंबलों की कमी के कारण राहत शिविरों में 40 बच्चे मौत के शिकार हो गए (इंडियन एक्सप्रेस दिनांक  3.12.2013)। मुजफ्फरनगर दंगों में 6 अक्टूबर तक 46 मुसलमान और 16 हिन्दू मारे जा चुके थे जबकि 57 मुसलमान और 11 हिन्दू घायल हुए थे। ये आधिकारिक आंकड़े हैं। अक्टूबर की 13 तारीख तक 352 एफ.आई.आर. दर्ज की गईं थीं जिनमें 5 जिलों- मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, बागपत व सहारानपुर- में हुई साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं के सिलसिले में 1068 व्यक्तियों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए थे। कुल मिलाकर 243 लोगों को गिरफ्तार किया गया जिनमें से अधिकांश  हिन्दू थे। अब भी करीब 17 हजार लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं। मेरठ जिले के भाजपा विधायक संगीत सोम को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया परंतु उन्हें सलाहकार परिषद के आदेश  पर जल्दी ही रिहा कर दिया गया। इसका कारण यह था कि उनके खिलाफ मामला मजबूत नहीं था। ऐसा मिलीभगत के चलते हुआ या लापरवाही से, यह कहना मुष्किल है। भाजपा ने अपने
विधायकों और अन्य आरोपियों के जमानत पर रिहा होने के बाद उनका सार्वजनिक सम्मान किया।
मुजफ्फरनगर दंगों में पुलिस की भूमिका घोर लापरवाही की रही। पुलिस ने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया। राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण हालात और बिगड़े। पुलिस महानिदेशक ने यह स्वीकार किया कि पुलिस ने अपेक्षित  भूमिका नहीं निभाई (टाईम्स आॅफ इंडिया दिनांक 25/09/2013)। पुलिस उस समय हस्तक्षेप कर सकती थी जब ‘लव जेहाद‘ के नाम पर मुस्लिम समुदाय को बदनाम किया जा रहा था परन्तु पुलिस ने कुछ नहीं किया। सचिन और गौरव की हत्या के मामले में पुलिस ने कई मुसलमानों को गिरफ्तार किया परंतु स्टिंग आपरेशनों से यह पता चला है कि आजम खान के दबाव में उन्हें छोड़ दिया गया। इसके बाद, निषेधाज्ञा लागू होने के बावजूद मुसलमानों की एक सभा आयोजित की गई जिसमें बसपा व सपा के सांसद मौजूद थे। जिले के एसपी ने स्वयं इस गैरकानूनी सभा के नुमांइदों से ज्ञापन स्वीकार किया। तत्पश्चात भाजपा ने जाटों की महापंचायत आयोजित करने का फैसला किया। इसमें भाग लेने के लिए हजारों हथियारबंद जाट पहुंचे और उन्होंने रास्ते में कई मुसलमानों का अपहरण कर लिया। हथियारों से लैस ये लोग कई पुलिस चौकियों व नाकों से गुजरे परंतु उन्हें किसी ने नहीं रोका। सभा के आयोजन पर लगे प्रतिबंध का पालन करवाने की कोई कोशिश  नहीं की गई जबकि यह स्पष्ट था कि सभा में भाग लेने जा रहे हथियारबंद लोग गुस्से से भरे हुए थे। महापंचायत में भड़काऊ भाषण दिए गए और इसके बाद दंगे शुरू हो गए। सभा से लौट रहे लोगों ने मुस्लिम गांवों पर हमला किया। कुछ अपवादों को छोड़कर, पुलिस उन स्थानों पर नहीं पहुंची जहां से हिंसा की खबरें आ रही थीं।
मुसलमानों ने ट्रेक्टर से अपने गांव लौट रहे जाटों को रोका और उन्हें गन्ने के एक खेत में ले जाकर मौत के घाट उतार दिया। जिन गांवों में मुसलमान बहुसंख्या में थे वहां हिन्दुओं पर हमले हुए। खराद गांव के सरपंच ने 150 मुसलमानों को अपने घर में शरण देकर उनकी जान बचाई।
कुछ दंगा पीडि़तों के समक्ष यह प्रस्ताव रखा गया कि अगर वे यह शपथपत्र दे दें कि वे अपने गांव नहीं लौटेंगे तो उन्हें 5 लाख रूपये का मुआवजा दिया जाएगा। सरकार ने इस आशय की अधिसूचना भी जारी की। यह एक अभूतपूर्व कदम था। भारत के संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को देश में कहीं भी बसने का अधिकार देता है और कार्यपालिका को कतई यह हक नहीं है कि वह नागरिकांे से उनके गांव में रहने का हक ‘खरीद‘ ले। सरकार ने दंगाईयों के अधूरे काम को पूरा करते हुए पीडि़तों को उनके गांवों से बाहर कर दिया। उनसे इस आशय के शपथपत्र हासिल कर लिए गए कि वे अपने गांव वापिस लौटना नहीं चाहते। अगर किसी को भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच मिलीभगत का प्रमाण चाहिए तो वह यह है।
समाजवादी पार्टी और भाजपा, दोनों को इन दंगों में अपना फायदा नजर आ रहा था। परंतु हिंसा इतना बड़ा स्वरूप ग्रहण कर लेगी,  इसका समाजवादी पार्टी को अंदाजा नहीं था और अब इस पार्टी को इन दंगों से नुकसान ही होगा। मुसलमान अब समाजवादी पार्टी से दूर हो रहे हैं। पष्चिमी उत्तरप्रदेष और विशेषकर दंगा प्रभावित जिले, अजीत सिंह की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय लोकदल के गढ़ हैं। चरण सिंह ने इस इलाके के मुसलमानों और जाटों में अपनी गहरी पैठ बना ली थी। साम्प्रदायिक धु्रवीकरण से अजीत सिंह की पार्टी को नुकसान होगा क्योंकि जाट मत भाजपा की ओर चले जाएंगे। समाजवादी पार्टी को यह उम्मीद थी कि मुसलमानों को कुछ मुआवजा देकर वह उनके बीच अपनी पकड़ मजबूत कर लेगी। इस तरह इन दंगों से भाजपा और सपा दोनों को यह आशा  थी कि वे  अजीत सिंह की पार्टी की कीमत पर अपना आधार बढ़ा लंेगीं। लाशों पर इस तरह के राजनैतिक खेल खेले जाना दुर्भाग्यपूर्ण किंतु कटु सत्य है। जब समाजवादी पार्टी की सरकार 84 कोसी परिक्रमा को रोक सकती थी तब वह जाट महापंचायत को भी रोक सकती थी। ऐसा न करके उसने आपराधिक लापरवाही की है। मुजफ्फरनगर दंगों के लिए भाजपा के साथ-साथ सपा भी जिम्मेदार है।  
मध्यप्रदेश
इंदौर के चंदननगर थाना क्षेत्र में 20 अगस्त को भड़की साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान हुई पत्थरबाजी में 30 पुलिसकर्मियों सहित 45 लोग घायल हो गए। झगड़े की शुरूआत एक क्रिकेट मैच के नतीजे और एक मंदिर के पास किसी जानवर का शव पाए जाने के साथ हुई। संघ परिवार से जुड़े लोगों ने भड़काऊ नारेबाजी की। दुकानों को नुकसान पहुंचाया गया और करीब 100 वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया। दो पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए।
हरदा जिल के छीपाबड़ में 19 सितंबर को हुई साम्प्रदायिक हिंसा में कई घरों को भारी नुकसान पहुंचाया गया और 22 लोग घायल हुए। हिंसा का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह था कि इससे पीडि़तों, विषेषकर महिलाओं और बच्चों को गहरा सदमा लगा और वे अब तक उससे उबर नहीं सके हैं। बजरंग दल के गुुंडों ने मुसलमानों के घरों को आग के हवाले कर दिया और यहां तक कि घरों में अनाज का एक दाना भी नहीं बचा। घरों में आग लगाने के लिए नजदीक के एक पेट्रोल पंप से पेट्रोल लाया गया। लगभग 60-70 बच्चों ने स्कूल जाना बंद कर दिया। हिंसक भीड़ एक स्कूल में पहुंची और यह मांग की कि मुसलमान बच्चों को उसके हवाले कर दिया जाए। परंतु स्कूल के शिक्षकों ने मुस्लिम बच्चों को पहले ही एक कमरे में बंद कर दिया था और उन्होंने भीड़ से कहा कि बच्चे अपने घर चले गए हैं। एल. एस. हरदेनिया के नेतृत्व में दंगों की जांच करने गए एक दल ने सुरेन्द्र राजपुरोहित उर्फ टाईगर की गिरफ्तारी की मांग की जिसकी कथित रूप से हिंसा भड़काने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। जांचदल ने यह मांग भी की कि हिंसा में एक स्थानीय भाजपा विधायक एवं पूर्व मंत्री के पुत्र की भूमिका की जांच की जाए और सभी दोषियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए जाएं।
बिहार
राज्य के बेतिया में 9 अगस्त को नागपंचमी के जुलूस के दौरान हिंसा हुई। पत्थर फेंके गए और जिला मजिस्ट्रेट और एसपी के वाहनों को जला दिया गया। जिले में कफ्र्यू लगाना पड़ा। नागपंचमी के धार्मिक जुलूस में शामिल लोग बिहार के मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के खिलाफ नारे लगा रहे थे। यह जदयू के एनडीए से अलग हो जाने का नतीजा था। महावीर अखाड़े के लठैत जुलूस मंे आगे चल रहे थे और उनके हाथों में तख्तियां थीं जिनपर राजनैतिक   नारे लिखे हुए थे।
नवादा में दो समुदायों की हिंसक भीड़ के बीच लगभग 48 घंटे तक खूनी संघर्ष चला, जिसमें 2 लोग मारे गए। हिंसा की शुरूआत 10 अगस्त को हुई जब कुछ मुस्लिम युवकों ने नवादा शहर के बाहरी हिस्से में स्थित ‘बाबा का ढाबा‘ में बुर्का पहने हुए कुछ मुस्लिम लड़कियों की उपस्थिति पर आपत्ति की। इस ढाबे का मालिक एक हिन्दू था। युवकों ने ढाबे पर हमला किया और वहां तोड़फोड़ की। इसके बाद दोनों समुदायों के बीच जमकर पत्थरबाजी हुई जिसमें कई लोग घायल हो गए। मुसलमानों की कई दुकानें जला दी गईं। जब पुलिस स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही थी तब बहुसंख्यक वर्ग के एक युवक ने एक पुलिसकर्मी की बंदूक छीननेे की कोशिश की। इसके बाद पुलिस ने गोलीचालन किया जिसमें वह युवक मारा किया। जुलाई में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भाजपा से नाता तोड़ा था। तबसे लेकर 9 अगस्त तक बिहार में 6 दंगे हुए।
कर्नाटक
चिकमंगलूर में 28 दिसंबर को भड़की साम्प्रदायिक हिंसा में 31 लोग घायल हुए जिनमें दो पुलिसकर्मी शामिल हैं। दिनांक 1 जनवरी 2014 के ‘इंकलाब‘ अखबार के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने अल्पसंख्यकों के साथ अत्यंत क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया। महात्मा गांधी रोड पर स्थित एक पूजास्थल केे पास एक जानवर का कटा हुआ सिर पाया गया। इसका विरोध करने लोग सड़कों पर उतर आए। पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया। टीपूनगर के 61 वर्षीय साहब जान को पुलिस ने सड़क पर घसीट-घसीटकर पीटा। यह तब हुआ जब साहब जान मृत जानवर के अवशेशों  को हटाकर उस स्थान को पानी से धो रहा था।
असम
कछार जिले के रंगपुर में 25 अगस्त को तीन मंदिरों के पास मांस के टुकड़े पाए गए। इसके बाद हुई हिंसा मंे सात पुलिसकर्मी घायल हो गए और शांति स्थापित करने के लिए सेना की तैनाती करनी पड़ी। मुख्यमंत्री तरूण गोगोई ने दंगों के लिए विहिप और भाजपा को जिम्मेदार बताया। कई दुकानें और वाहन जला दिए गए।
निष्कर्ष
हमारे देश में दंगे भड़काने के लिए कोई कारण छोटा नहीं होता। किसी मुसलमान द्वारा गाय को मार कर भगाना, मंदिरों / मस्जिदों के पास मांस के टुकड़े मिलना, महिलाओं के साथ छेड़छाड़, अंतःधार्मिक विवाह/प्रेम संबंध, लाउडस्पीकरों का उपयोग, रेस्टोरेंट के बिल पर विवाद, धार्मिक लबादे में राजनैतिक जुलूस आदि कुछ ऐसे मसले हैं जो गुजरे साल, दंगों का कारण बने। पुलिस द्वारा समय पर कार्यवाही न करने या कबजब उसकी दंगाईयों से मिलीभगत से असामाजिक तत्वों का हौसला बढ़ता है और वे शनैः-शनैः ताकतवर होते जाते हैं और राजनीति में भी उतर जाते हैं। यद्यपि इस तरह की घटनाओं से संवेदनशीलता और कड़ाई से निपटने की जरूरत है तथापि असली चुनौती यह है कि हम साम्प्रदायिक सोच का जड़मूल से सफाया करने की कोषिष करें ताकि हममें से हरेक हमारे देश की विविधता का आनंद लेना सीख सके और अपने से अलग ढंग से आराधना करने वालों, अपने से अलग खानपान की आदत वालों, अपने से अलग कपड़े पहनने वालों और अपने से अलग तरीके से जीने वालों को अपना शत्रु मानना बंद करे। ‘दूसरे‘ के प्रति दुराग्रह ही वह सीमेंट है जो साम्प्रदायिक पहचान को मजबूती देता है। इसके स्थान पर हमें मानवता, प्रेम, न्याय और सबके प्रति सहानुभूति के भाव को बढ़ावा देना चाहिए जिससे अंतःधार्मिक रिश्ते मजबूत हों। एक ऐसे कानून की भी आवश्यकता है जो दंगे रोकने में राज्य तंत्र की विफलता की स्थिति में संबंधित अधिकारियों/कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय करे।

 -इरफान इंजीनियर



सोमवार, 18 जून 2012

21 हजार सरकारी स्कूल बंद


30 अप्रैल के हिन्दी दैनिक में 21 हजार सरकारी स्कूलो के बंद होने की खबर छपी है | खबर मानव संसाधन एवं विकास मत्रालय की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया गया है की 2009 -- 11 के दौरान देश में सरकारी स्कूलो की संख्या में 28052 स्कूलो की वृद्धि हुई है | लेकिन यह वृद्धि शिक्षा के पिछड़े राज्यों में -- उत्तर प्रदेश , बिहार , उड़ीसा , महाराष्ट्र और झारखंड में हुई है | जबकि शिक्षा में अगड़े 12 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशो में इस अवधि में 20 .796 स्कूल बन्द हो गये | इन राज्यों में केरल , आंध्र प्रदेश , राजस्थान , असम अरुणाचल , प्रदेश हरियाणा , सिक्किम , उत्तराखंड , दिल्ली तथा केंद्र शासित चंडीगढ़ , दमन दादरा एवं नगर हवेली शामिल है | दिलचस्प बात यह है की इन राज्यों के लगभग 21 हजार विद्यालयों के बन्द होने का प्रमुख कारण यह बताया गया है की इन राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण पर अच्छा काम हुआ है | फलस्वरूप जन्मदर में कमी आई है | बच्चो की संख्या में कमी आई है | इसी कारण वहा के स्कूल बंद हुए है | प्रश्न उठता है की आबादी में वृद्धि दर में कमी आने से स्कूल क्यों और कैसे बन्द हो जायेंगे ? बच्चो की कमी से कम बच्चे स्कूल पहुचेंगे , लेकिन वे पूरी तरह से गायब कैसे हो जायेंगे ? जनसंख्या वृद्धि दर घटना और बच्चो की संख्या कम होने के साथ -- साथ मानव संसाधन विकास मंत्रालय की रिपोर्ट में आबादी के गाँवों से शहरों में बढते पलायन का कारण भी जोड़ दिया गया है | लेकिन यहाँ भी वही सवाल खड़ा है की क्या पूरी आबादी और बच्चे भी पलायन कर गये है , जो कत्तई संभव नही है |
मानव संसाधन विकास मंत्रालय के रिपोर्ट की थोड़ी विवेचना भी स्कूलो का बन्द होने की बताये गये कारणों को गलत व झूठा साबित कर देता है | लेकिन तब सवाल है की स्कूल बन्द होने के वास्तविक कारण क्या है ? इस का वास्तविक कारण यह है की सरकारी स्कूलो में बच्चो को शिक्षित करने का काम उनमे शिक्षा की बुनियाद डालने और मजबूत करने का काम कब का छोड़ दिया गया है | उन्हें तो अब मुख्य तौर पर सरकारी सर्व शिक्षा अभियान के प्रचारों में ही शिक्षित दिखाया जा रहा है | इसीलिए तो प्राइवेट -- नर्सरी व प्राइमरी दर्जो के स्कूलो में न जा पाने वाले गरीब बच्चे ही सरकारी स्कूलो में पहुच रहे है | वह भी शिक्षा से ज्यादा मिड -- डे-- मील के नाम पर जा रहे है | यह इस बात का सबूत है की सरकार अब बच्चो की शिक्षा का काम राज्य व सरकार के उपर से हटाने लगी हुई है | इसे धीरे -- धीरे वे 20 -- 25 सालो से नयी शिक्षा नीति के लागू किए जाने के बाद से चरणबद्ध रूप से हटाती भी रही है | अब वह स्कूली शिक्षा को भी निजी विद्यालयों के छोटे -- बड़े मालिको के हाथ में सौप्ति जा रही है | 21 हजार स्कूलो के बन्द होने का असली कारण भी यही है | लेकिन तब शिक्षा में पिछड़े बताये गये राज्यों में विद्यालयों की संख्या बढ़ क्यों रही है ? उसके बढने का पहला कारण तो गरीब घरो के बच्चो का प्राइवेट स्कूलो में पहुचने की असर्मथता और मिड -- डे -- मील है | इसका दुसरा बड़ा कारण स्वंय ऐसे प्राइवेट स्कूल है , जिनको अभी मान्यता नही मिल पायी है | उनके बच्चे तो पढ़ते है गैर मान्यता प्राप्त स्कूलो में पर उनका नाम सरकारी स्कूल रजिस्टर में दर्ज है |
प्राप्त सूचनाओं के अनुसार सरकारी स्कूलो में इन बच्चो की संख्या , कुल बच्चो की संख्या के आधे से ज्यादा ही है | यह है इन प्रान्तों के स्कूलो के ज्यादा खुलने या बढने की स्थितियों का प्रमुख कारण | सही कहा जाए तो यह इन प्रान्तों के भी स्कूलो के भविष्य में बन्द होने की स्थितिया है , न की उनके लगातार चलने व बढने की | यह स्थिति खासकर सरकारी जूनियर हाई स्कूल के दर्जो में एकदम स्पष्ट दिखाई पड रही है | सरकारी स्कूलो के कक्षा 6 , 7 , और 8 के बच्चो की संख्या में भारी कमी आई है | साफ़ बात है की सरकारी स्कूलो के बन्द होने की यह स्थितिया न तो आबादी वृद्धि दर में कमी आने से हो रही है और न ग्रामीण आबादी के पलायन से | बल्कि यह स्थिति खुद सरकारों द्वारा सरकारी स्कूलो को हतोत्साहित करने और प्राइवेट स्कूलो को बढावा देने की नीतिगत बदलावों के चलते खड़ी हो रही है और बढती भी जा रही है |
बताने की जरूरत नही हैं की यह नीतिगत बदलाव समाज के निचले स्तर प्र्पदे और कल को निचले स्तर पर पहुचने वाले लोगो को स्कूली शिक्षा से बाहर कर देगा और कर भी रहा है | फिर यह बदलाव शिक्षण संस्थाओं के निजी मालिको को छोटे -- बड़े स्तर तक के मालिको को खासकर उच्च स्तरीय शिक्षण संस्थानों से भारी लाभ कमाने की छूट देने और इसे बढाने का भी काम कर रहा है | शिक्षा के क्षेत्र में यह नीतिगत बदलाव वैश्वीकरणवादी , आर्थिक नीतियों व डंकल प्रस्ताव का अहम हिस्सा है | सरकारी स्कूलो को धीरे -- धीरे बन्द किया जाना और उसे निजी हाथो में सौपा जाना डंकल प्रस्ताव के सेवा के व्यापार के अंतर्गत है | उसका नियोजित क्रियान्वन है | जागो -- जागी अब भी वक्त है अगर नही जागे तो तुम्हारे बच्चो का भविष्य पूरी तरह अँधेरे में होगा रौशनी का एक दिया भी नही होगा उनके जीवन में .......................................आने वाले कल की खातिर जागो |

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

रविवार, 19 जून 2011

नील -आन्दोलन और किसानो के लिए सबक

इस देश में नील की खेती की शुरुवात फ्रांसीसियो ने की थी लेकिन अंग्रेजो ने उसे आगे बढाया |1778 में कैरेल ब्लूम नामक अंग्रेज ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के गवर्नर जनरल से बड़े पैमाने पर नील की खेती करने का अनुरोध किया |इसे कम्पनी के लिए बड़े मुनाफे का साधन बताया | ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के बाद ,कपड़ो में डालने के लिए नील की मांग फ़्रांस ,इटली ,आस्ट्रेलिया ,मिस्र व ईरान आदि देशो में भी बढ रही थी |इसीलिए कम्पनी सरकार ने नील की खेती को बढावा दिया| बंगाल और बिहार इसकी खेती के प्रमुख क्षेत्र बने |इसके अलावा उड़ीसा ,बनारस ,इलाहाबाद ,गाजीपुर आदि जगहों पर नील उत्पादन को बढावा दिया गया |नील की खेती के अंग्रेज मालिको को लोग निलहे साहब कहकर सम्बोधित करते थे |प्रारंभ में निलहे साहब किसानो से नील की खेती करवाते थे |फिर ईस्ट इंडिया कम्पनी को बेच देते थे |कम्पनी उसे ब्रिटेन तथा अन्य देशो को निर्यात करके भारी लाभ कमाती थी |निलहे साहब किसानो को निहायत अन्याय पूर्ण अनुबंधो के साथ नील की खेती करने के लिए हर तरह की जोर जबरदस्ती को मजबूर कर देते थे |नील की खेती के लिए बीज आदि को किसानो को महगे कर्ज़ के रूप में देकर उनसे अत्यंत सस्ते मूल्य पर नील खरीद लेते थे |खेती का सारा खर्च भी किसानो से ही वसूलते थे |फलत: किसान कभी भी उनके कर्ज़ से मुक्त नही हो पाता था |समूचे नील उत्पादन को सौप देने के बावजूद कर्जो की पूरी अदायगी नही कर पाता था| बकाया कर्ज़ व ब्याज की राशि को निलहे साहबो द्वारा अगली बार की खेती के लिए ,दिए जाने वाले कर्जो में से काट लिया जाता था |फलस्वरूप किसानो पर कर्ज़ की रकम बढती जाती थी |व्यवहारत:उसे चुकता न कर पाने के कारण भी वह पुश्त दर पुश्त निलहे साहबो के साथ गुलाम की तरह बंधा रहता था |निलहे साहबो द्वारा इतिहास में कुख्यात भयंकर शोषण अत्याचार को बर्दाश्त करने के लिए मजबूर बना रहता था |कम्पनी की पुलिस -प्रशासन से लेकर निलहे साहबो के अपने लठैतो का दल -बल किसानो को नील की खेती के शोषण ,लूट ,अन्याय- अत्याचार को सहने के लिए मजबूर किये रहता था |१८३३ में ब्रिटेन की सरकार ने ईस्ट इंडिया कम्पनी की इजारेदारी खत्म कर दी |अब हर अंग्रेज को अधिकार दे दिया गया कि वह भारत में आ कर इस व्यवसाय के लिए बस सकता था |इसके फलस्वरूप अंग्रेजो ने बड़ी - बड़ी जमीदारिया खरीदकर उसमे नील की खेती शुरू कर दी |इन जमीदारियो में "बंगाल इडिगो कम्पनी " की जमीदारी सबसे बड़ी थी |उसने बंगाल के नदिया जिले के ५९४ गावो की जमीदारी हथिया ली थी |नील की इस बढती व्यावसायिक खेती ने उसमे लगे किसानो के भरण -पोषण व जीवन को अत्यंत कष्ट कर बना दिया था | नील किसानो की दुर्दशा को उस समय के बंगाली समाचार -पत्रों में बारम्बार उठाया गया |बंगाल के संभ्रांत व प्रबुद्ध हिस्से इन किसानो के ऊपर किये जा रहे भयंकर शोषण व अत्याचार को घटाने के लिए शासन -प्रशासन से अपील पर अपील करते रहे |1850 में रवीन्द्रनाथ टैगोर के पिता श्री देवेन्द्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित "तत्वबोधिनी "पत्रिका ने प्रकाशित किया -----" जो किसान जमीन में धान या दूसरा अन्न बोकर आसानी से सारे साल परिवार का पेट पाल सकता था |उसे निलहे साहब के नील बोने से कर्ज़ के मजबूत जाल के अलावा कुछ नही मिल पाता था |अत्यधिक शक्तिशाली निलहे साहबो की अनुमति के खिलाफ जाना दीन-दरिद्र प्रजा के लिए सम्भव नही है |......
बढ़ते शोषण अत्याचार के विरुद्ध नील की खेती करने वाले किसान १८५० के बाद से ही आंदोलित व संगठित हुए |वे नदिया जिले में वे पहले संगठित हुए |वंहा के कई गावो के किसानो ने नील की खेती न करने की शपथ ली |दो वर्ष (1858-60 )के भीतर ही नील की खेती न करने की शपथ का सिलसिला बंगाल के अन्य जिलो और गावो में भी फ़ैल गया |निलहे साहबो ने इसके विरोध में किसानो पर अत्याचार और जुल्म करना शुरू कर दिया |नील की खेती न करने को ढृढ़ निश्चयी आन्दोलन रुका नही |किसानो के अलावा बंगाली समाज के सुशिक्षित हिस्से का एक धडा भी नील किसानो की दुर्दशा और विरोध को लेखो ,नाटको ,गीतों के माध्यम से पूरे बंगाल के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रो में फैलाने में लगा हुआ था |फलस्वरूप नील की खेती का विरोध नील मालिको और कम्पनी शासन के विरुद्ध विद्रोह का रूप लेने लगा था |
कम्पनी
सरकार ने भी मामले कि नजाकत को देखते हुए नील कमीशन नियुक्त कर दिया |

कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में नील किसानो पर होने वाले भारी शोषण ,अत्याचार को कबूलते हुए उनकी सुरक्षा के लिए कुछ सुझाव भी दिया |1860 में कमीशन ने अपनी रिपोर्ट दी| सुरक्षा के सुझाव के साथ भी बंगाल के किसान नील की खेती करने के लिए बिलकुल तैयार नही हुए |लिहाज़ा बंगाल में नील की खेती समाप्त हो गयी |किसानो के इस अहिंसात्मक ,परन्तु जोरदार आन्दोलन के साथ -साथ बंगाल से नील की खेती खत्म होने का एक दूसरा प्रमुख कारण यह भी था कि अब एनिलिन डाई से कृतिम नील बनाया जाने लगा था |इसके बावजूद नील की खेती पूरी तरह से खत्म नही हुई | बिहार में वह खेती अगले पचास सालो तक चलती रही |नील की खेती कम्पनी शासन के अंतर्गत शुरू हुई पहली बड़ी व्यावसायिक खेती थी |केवल औद्योगिक आवश्यकता के लिए की जाने वाली खेती थी |धनाढ्य व ताकतवर नील मालिको और गरीब तथा शक्तिहीन नील किसानो के बीच एक अनुबंध खेती थी |किसान के गाव -घर में उसका कोई इस्तेमाल नही था |जबकि इस खेती से नील मालिको ,नील कम्पनियों और ईस्ट इंडिया कम्पनी को लाभ ही लाभ था |ब्रिटिश राज द्वारा बनाये व लागू किये गये सारे कानूनों का लाभ भी मिल मालिको को मिलता था ,लेकिन किसानो को उन्ही कानूनों के तहत दंड का भागीदार होना पड़ता था |आन्दोलन के सिवाय उनके पास खेती और जीवन के बचाव का दूसरा कोई रास्ता नही रह गया था |आज १५० वर्ष बाद ,स्थितिया चाहे जितनी बदल गयी हो , लेकिन नील की खेती की वे चारित्रिक विशेषताए ज्यो -कि त्यों बनी हुई है और पहले से कंही ज्यादा व्यापक हो गयी है |बढ़ते बाजारवादी ,वैश्वीकरण के साथ पिछले २० सालो में तो कम्पनियों के द्वारा अपने बीजो के साथ ठेके पर खेती व अनुबंध खेती को खुलेआम बढावा दिया जा रहा है |फिर उसका नतीजा भी नील की खेती जैसा ही आ रहा है |कृषि के उत्पादन व्यापार में लगी देशी -विदेशी कम्पनिया व्यावसायिक व गैर व्यावसायिक फसलो से लाभ कमा रही है |परन्तु किसान कर्जो में फंसते जा रहे है |तबसे आज तक में फर्क है तो यह कि वह देश के बाजारवादी ,वैश्वीकरण का प्रारम्भिक दौर था | |इसे विदेशी ब्रिटिश राज द्वारा लागू किया जा रहा था |किसानो के नग्न शोषण के साथ ,पुलिस बलों ,लठैतो ,गुंडों के जरिये किसानो का भारी दमन भी होता रहा था |आज हम वैश्वीकरण के चरम विकास के दौर में है |हर तरह की खेती का व्यवसायी करण और अंतर्राष्ट्रीयकरण हो गया है |विदेशी कम्पनियों के साथ देश की धनाढ्य कम्पनिया ,देश की जनतांत्रिक कंही जाने वाली सत्ता -सरकारे ,आधुनिक खेती के साधनों और बाजारों के जरिये किसानो के शोषण ,लूट को बढाती जा रही है |तब से आज तक के दौर में एक फर्क और भी है ,वह यह कि उस समय के बंगाल के प्रबुद्ध संभ्रांत वर्ग का खास हिस्सा नील किसानो के समर्थन में खड़ा हो गया था |किन्तु आज का बौद्धिक व उच्च हिस्सा आमतौर पर किसानो के साथ खड़ा होने वाला नही है |उनकी बढती समस्याओं को उठाने वाला भी नही है |नील किसानो के पास भी संगठित होने और आंदोलित होने के लिए कोई रास्ता नही बचा था |आज के किसानो के पास भी खेती का ,जमीन का मालिकाना ले रही धनाढ्य कम्पनियों और सहायता -सहयोग दे रही सत्ता - सरकारों का विरोध करने और उसके लिए संगठित आन्दोलन चलाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नही है |
फिर भी मुझे उम्मीद के रूप में दुष्यंत कुमार का एक शेर याद आ रहा है-

कुछ भी बन बस कायर मत बन ।
ठोकर मार पटक मत माथा
तेरी राह रोकते पाहन
कुछ भी बन बस कायर मत बन ।


-सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

पति पीड़ित विधायक


लोकतांत्रिक देशों में लिंगभेद के आधार पर कोई फैसला नहीं होता है लेकिन वास्तव में अधिकांश फैसले पुरुषवादी मानसिकता के तहत होते हैं। भारत में स्त्री को दुर्गा, सरस्वती, पार्वती जैसे विश्लेषण से विभूषित किया जाता है लेकिन सच यह भी है कि पूरी दुनिया में स्त्रियों की बुरी दशा है और एक बड़ी संख्या में स्त्रियों को देह व्यापार जैसे कार्यों में जबरदस्ती लगाया गया है। स्त्रियों की दुर्दशा का अभी महत्वपूर्ण मामला बिहार में देखने को आया है। 2005 में राष्ट्रीय जनता दल से विधायक चुनी गयी बीमा भारती को उनके पति अवधेश मंडल ने बुरी तरह मारा पीटा की उनको अस्पताल में भर्ती करना पड़ा है। घटना के समय विधायक के अंगरक्षक तमाशा देखते रहे। इस समय भी बीमा भारती सत्तारूढ़ दल जनता दल (यू) की विधायक हैं। बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार उनका हाल-चाल लेने के लिए अस्पताल भी गए।
अपने देश में महिलाओं के आरक्षण के तहत जिला पंचायत अध्यक्ष से लेकर सदस्य ग्राम पंचायत तक महिलाएं निर्वाचित होकर पदासीन होती हैं वहीँ संसद तथा विधान सभाओं में निर्वाचित होकर मंत्री बनती हैं। देश की राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल हैं। इन में कितनी निर्वाचित महिलाओं की पिटाई आये दिन उनके पति करते होंगे और वह बेचारी समाज में अपनी पदीय विवशता के कारण अपनी बात को भी नहीं कह सकती हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि हमारी शिक्षा दीक्षा इस तरह से निर्धारित कि जाए की उस में लिंग भेद समाप्त हो अन्यथा हम आप नारे लगते रहेंगे और महिलाओं कि दशा में कोई सुधार नहीं होगा।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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