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मंगलवार, 19 जून 2018

कर्नाटक चुनाव

इस बार यह कीर्तिमान कर्नाटक के हिस्से में आया। 55 घंटे में ही सरकार गिर गई। येदुरप्पा ने विधानसभा के पटल पर मत विभाजन का सामना किए बिना ही उसी राज्यपाल को अपनी सरकार का त्याग पत्र सौंप दिया जिसने उन्हें 55 घंटे पहले मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई थी। येदुरप्पा ने इस तरह से अपने पूर्व के दावे के उलट यह स्वीकार कर लिया कि उनके पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त विधायकों का समर्थन नहीं था। यह बात राज्यपाल महोदय को पता थी, कर्नाटक और देश की जनता भी जानती थी। राजनैतिक दायरों में यह आम धारणा थी कि सरकार बनाने के लिए भाजपा हर अनैतिक कदम उठाने से गुरेज नहीं करेगी। इसमें भी किसी को शक नहीं था कि महामहिम ने बहुमत सिद्ध करने के लिए जो 15 दिन का समय दिया था उसमें भाजपा विधायकों की खरीद फरोख्त करेगी। कांग्रेस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गई। एक नहीं दो बार। पहले सुप्रीम कोर्ट ने महामहिम के फैसले में टाँग अड़ाने से इनकार कर दिया। शपथ ग्रहण की औपचारिकता पूरी हो गई। कांग्रेस दूसरी बार सुप्रीम कोर्ट गई। खरीद फरोख्त का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत सिद्ध करने की समय सीमा घटा दी। वह समय सीमा शनिवार को शाम चार बजे खत्म होनी थी। कर्नाटक के राज्यपाल वाजूभाई वाला ने कभी मोदी के लिए गुजरात में अपनी सीट छोड़ी थी। हमेशा वफादार रहे थे। कर्नाटक में उसी वफादारी की नवीनीकरण का समय था। सदन के पटल पर मत विभाजन के समय स्पीकर की भूमिका अहम हो सकती थी। परंपरा के हिसाब से दसवीं बार विधान सभा के लिए चुने गए कांग्रेस के रघुनाथ विश्वनाथ देशपांडे प्रोटेम स्पीकर बनने के हकदार थे। चूंकि देशपांडे से भाजपा के हक में बेइमानी की उम्मीद नहीं की जा सकती थी इसलिए परंपरा से इतर जाते हुए वाजूभाई वाला ने तीसरी बार चुनकर सदन में जाने वाले के०जी० बुपय्यह को प्रोटेम स्पीकर बना दिया। बुपय्यह इससे पहले येदुरप्पा सरकार में स्पीकर रह चुके थे और उन पर येदुरप्पा की सरकार को बचाने के लिए विपक्ष के कई विधायकों को निलम्बित करने का आरोप लग चुका है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की वजह से समय हाथ से निकला जा रहा था। पहला विकल्प विधायकों की खरीद का था। समय कम था इसलिए इस काम की शुरूआत ही उच्चतम स्तर से कर दी गई। खुद येदुरप्पा और जनार्दन रेड्डी विधायकों को फोन करके आफर देने लगे। सरकारी मशीनरी का भी इस्तेमाल हुआ। काम जल्दी में निपटाना था। कांग्रेस और जनता दल (एस) अपने विधायकों को बचाने में लगे रहे। कहीं रिसॉर्ट की बुकिंग कैंसिल तो कही फ्लाइट नहीं उड़ी। इस बीच विधायकों की बोली 150 करोड़ और मंत्री पद तक पहुँच गई। येदुरप्पा और जनार्दन रेड्डी के बोली लगाने वाले आडियो टेप भी आ गए। बात नहीं बनी। विश्वास मत हासिल कर पाना असम्भव हो गया इसलिए मत विभाजन से पहले ही येदुरप्पा और उनके विधायक राष्ट्रगान बजने के दौरान ही सदन छोड़कर चले गए। राष्ट्रगान के सम्मान में फिल्म थिएटरों में खड़े होने की वकालत करने वालों को यह अंदाजा ही नहीं हुआ कि राष्ट्रगान बज रहा है। सत्ता हाथ से निकली तो उन्हें यह भी याद नहीं रहा कि राष्ट्रगान को राष्ट्रवाद और देशभक्ति का मानक उन्हीं लोगों ने बनाया था। फिर भी अब डैमेज कंट्रोल की बारी थी। हार को जीत बताने की बारी। त्यागपत्र को नैतिक आधार देने के प्रयास किए जाने लगे। कुछ अपवाद के साथ इस दौरान मीडिया ने सत्ता के पक्ष में “धूर्तबाजी को अकलमंदी और आपराधिक लम्पटई को बहादुरी” बताने वाला अपना पूर्व का रवैया कायम रखा। लोकतांत्रिक मूल्यों का चीरहरण करते हुए त्यागपत्र देने को मीडिया ने मास्टर स्ट्रोक बना दिया। यह नहीं बताया कि गोल अपनी ही पोस्ट में मार ली गई है। नया अभियान शुरू किया गया। कांग्रेस जनता दल सेक्युलर के गठबंधन को अनैतिक बताने में पूरी ऊर्जा लगा दी गई। हालाँकि गोवा, मेघालय और मणिपुर में इसका व्यवहार कर्नाटक का ठीक उलटा था। देश को यह बताने की सर तोड़ कोशिश होने लगी कि जनादेश इस 
गठबंधन को नहीं मिला है। 
कर्नाटक भाजपा के लिए अहम था। उत्तर पूर्व के बाद दक्षिण भारत में अपनी मौजूदगी दर्ज करवाने के लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार थी। कांग्रेस के लिए भी भाजपा के विजय रथ को रोकना चुनौती थी। गोवा, मणिपुर, मेघालय में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया था। नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के मनोबल का भी सवाल था। राहुल गांधी की अध्यक्षता में कांग्रेस पहला चुनाव लड़ रही थी। 2019 को सामने रख कर देखें तो दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए कर्नाटक काफी अहम हो जाता है। यह दक्षिण का गेट है। इसीलिए भाजपा का जोर इस बात पर है कि वह चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है तो वहीं कांग्रेस मत प्रतिशत की बात करती है। चुनाव का गणित भी कुछ अलग होता है। कांग्रेस को इस चुनाव में 38 प्रतिशत मत मिले हैं जबकि भाजपा का मत प्रतिशत 36.2 रहा है। लगभग दो प्रतिशत का अंतर सीटों में बड़ा अंतर लेकर आता है। यह अंतर यहाँ भी मौजूद है मगर उलटा। भाजपा को 104 सीटों पर जीत मिली है जबकि कांग्रेस को मात्र 78 सीटों पर ही संतुष्ट होना पड़ा। जनता दल (एस) 18.3 प्रतिशत मतों के साथ 37 सीटें जीतने में सफल रही। 224 विधायकों वाली कर्नाटक विधान सभा के लिए 222 घोषित परिणामों में एक सीट निर्दलीय विधायक को और एक अन्य छोटे स्थानीय दल (कर्नाटका प्रगन्यावंथा जनता पार्टी) को मिली है। समाजवादी पार्टी ने भी इस चुनावी समर में अपने प्रत्याशी उतारे थे। सपा के 24 प्रत्याशियों को कुल 10,385 वोट मिले जिसे प्रतिशत में बदल कर पढ़ लेना आसान नहीं है। पार्टी को सबसे अधिक 3,471 मत नरसिम्हा राजा सीट पर मिले। कई स्थानों पर प्रत्याशी 100 का आँकड़ा भी नहीं पार कर पाए। वहीं बसपा जनता दल (एस) के साथ गठबंधन में थी, 18 सीटों पर चुनाव लड़ी, कोल्लेगल की सीट पर जीत भी दर्ज किया लेकिन उसके अलावा कहीं पर जमानत नहीं बचा पाई। बसपा को कुल 1,08,592 मतों (71792 कोल्लेगल सीट पर) के साथ 0.3 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। 28 प्रत्याशियों को कुल 23,441 मत प्राप्त हुए जिसमें अधिकतम 3,311 वोट देवर हिप्पर्गी सीट से आसिफ को मिले। यह सीट भाजपा ने 3,353 वोटों के अंतर से जीती। इसी तरह जनता दल यू को 23 सीटों पर कुल 41,638 वोट मिले जिसमें कुंडगोल सीट पर मिलने वाले 7,318 वोट शामिल हैं। स्वराज इंडिया ने भी इस चुनाव में अपनी किस्मत आजमाई। 10 सीटों पर चुनाव लड़ी। मेलूकोटे सीट पर 73,779 मतों के साथ दूसरे नम्बर पर रही लेकिन कुल 79,400 मत ही प्राप्त कर पाई। इसी तरह शिवसेना को 34 सीटो पर 13,790 तो आरपीआई को 8 सीटों पर 10,465 वोट मिले। अगर गौर से देखा जाए तो साफ मालूम होता है कि वोटों का धु्रवीकरण भाजपा, कांग्रेस और जनता दल एस गठबंधन के पक्ष में हुआ। हिंदुत्व के आधार पर ध्रुवीकरण का फायदा केवल भाजपा को मिला जबकि धर्मनिर्पेक्षता के नाम पर होने वाली गोलबंदी दो ध्रुवी रही और यह गोलबंदी उतनी मजबूत भी नहीं थी। ऐसा शिवसेना और दूसरे हिंदुत्ववादी दलों को मिलने वाले वोटों से स्पष्ट होता है जबकि दूसरी तरफ देखें तो एसडीपीआई को तीन सीटों पर 45,781 मत प्राप्त हुए। यहाँ यह बात अहम हो जाती है कि जब एमआईएम उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ती है तो समाजवादी पार्टी उसका विरोध इस आधार पर करती है कि इससे सेक्युलर वोटों का बिखराव होगा। यही तकलीफ दिल्ली में आम आदमी पार्टी को रहती है। इन्हीं बुनियादों पर एमआईएम को भाजपा का एजेंट भी घोषित कर दिया जाता है। लेकिन कर्नाटक चुनाव नतीजे साफ जाहिर करते हैं कि इन दोनों दलों का वहाँ कोई नेटवर्क नहीं था फिर बिना किसी तैयारी के उनके वहाँ चुनाव में कूदने को क्या नाम दिया जाए। यही बात स्वराज इंडिया, एनसीपी या 18 सीटों पर 81,191 वोट पाकर सभी सीटों पर जमानत गंवा देने वाली भारत की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी पर भी लागू होती है। इस बात में कोई शक नहीं कि अगर थोड़ा और समझदारी से काम लिया जाता तो परिणाम काफी भिन्न भी हो सकते थे। इसे केवल चुनाव में हासिल होने वाले मतों के आधार पर नहीं देखा जा सकता बल्कि समझदारी से काम लेने पर जो वातावरण तैयार हो सकता था उससे परिदृश्य काफी कुछ बदला हुआ होता। 
कर्नाटक चुनाव प्रचार भी बहुत खास था। इस चुनाव में प्रधानमंत्री के अलावा भाजपा शासित राज्यों के कई मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों और विधायकों का कर्नाटक में जमावड़ा रहा। प्रधानमंत्री द्वारा चुनावी सभा को सम्बोधित करते हुए कई बार जनता को आभास कराने का प्रयास किया गया कि कांग्रेसी परिवार को देश के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले वीर क्रान्किरियों की कोई परवाह नहीं थी। वैसे भी भाजपा सरकार जब से सत्ता में आई है वह लगातार यह जताने का प्रयास करती रही है कि कांग्रेस सेना और सेना के अधिकारियों का सम्मान नहीं करती थी। स्वभाविक है कि उनके निशाने पर सबसे अधिक पंडित नेहरू होते हैं क्योंकि संघ भाजपा ने आजादी के दो बड़े नेताओं पंडित नेहरू और सरदार पटेल को दो खानों में बाँट दिया है। बार-बार यह जताने का प्रयास करते रहे हैं (उनके पैमाने के हिसाब से) कि पटेल के मुकाबले नेहरू कुछ कम राष्ट्रवादी या देशभक्त थे। प्रधानमंत्री ने कई बार अपने पद की गरिमा को दाँव पर लगाकर भी पंडित नेहरू में कमियाँ ढूँढने बल्कि कहा जाना चाहिए कि कमियाँ गढ़ने का प्रयास किया है। बीदर की रैली में प्रधानमंत्री ने भगत सिंह का नाम लेकर कहा कि जब वह जेल में थे, मुकदमा चल रहा था तो क्या कांग्रेसी परिवार का कोई व्यक्ति जेल में उनसे मिलने गया। उसके बाद बटुकेश्वर दत्त का नाम लेकर भी यही बात कही कि क्या उनसे जेल, कोर्ट या अस्पताल में कोई मिलने गया। यह आरोप लगाने से पहले प्रधानमंत्री ने बताया कि उन्होंने इतिहास पढ़ा है लेकिन अगर कोई गलती हो तो वह उसमें सुधार कर लेंगे। इतिहास में इसका संदर्भ ढूंढना मुश्किल नहीं है। जिस समय भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त सरीखे क्रान्तिकारी जेल में अनशन कर रहे थे पंडित नेहरू उनसे मिले थे। 9,10 अगस्त 1929 के ट्रिब्यून अखबार में इसका ब्योरा है। जवाहर लाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में भी उन मुलाकातों के बारे में लिखा है। नेहरू देश के लिए कुर्बान होने वाले उन वीर योद्धाओं के बारे में इन शब्दों का प्रयोग करते हैं “मैं नायकों की दुर्दशा देखकर बहुत ज्यादा दुखी हूँ। उन्होंने अपनी जान इस संघर्ष में लगा दी है। मुझे उम्मीद है कि उनका बलिदान सफल होगा”। एक बार वायसराय को चुनौती देते हुए पंडित नेहरू ने भगत सिंह के बारे में कहा “मेरे मन में भगत सिंह जैसे व्यक्तित्व के साहस और बलिदान के लिए श्रद्धा भरी है। भगत सिंह जैसा साहस दुर्लभ है। अगर वायसराय हमसे उम्मीद करते हैं कि कि वे हमें इस आश्चर्यजनक साहस और उसके पीछे के ऊँचे उद्देश्यों की तारीफ करने से रोक सकते हैं, तो वह गलत समझते हैं”। नेहरू ने कांग्रेस बुलेटिन में भगत सिंह द्वारा अदालत के सामने दिया गया बयान भी छापा। अगर प्रधानमंत्री चाहें तो इतिहास की इन घटनाओं से रूबरू हो सकते हैं। राजनैतिक लाभ के लिए पंडित नेहरू पर लांछन लगाने के क्रम में उन्होंने कर्नाटक के सेना अधिकारियों, फील्ड मार्शल करिअप्पा और जनरल के०एस० थिम्मैया का अपमान करने के गंभीर आरोप लगाए। ये आरोप भी पूरी तरह निराधार निकले। वास्तव में देखा जाए तो ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर अगर बात करना आवश्यक भी हो जाए तो एक पूर्व प्रधानमंत्री के मामले में आम चुनावी सभा में कुछ कहना अमर्यादित है। लेकिन अगर वह झूठ और गढ़ा हुआ हो तो प्रधानमंत्री की गंभीरता पर ही सवाल उठना स्वाभाविक है, और ऐसा बार-बार हो रहा है। चार साल तक देश की सरकार चलाने के बाद भी सत्ताधारी दल के पास देश को बताने के लिए उपलब्धियों का टोटा ही है वह जन सरोकार के मुद्दों पर वह बात नहीं करना चाहती। उसे झूठे इतिहास गढ़ने और भावनाओं से खेलने के लिए बाध्य होना पड़ता है।
कर्नाटक का संदेश और राहुल गांधी की अध्यक्षता मे कांग्रेस की रणनीति बहुत स्पष्ट है। कर्नाटक में जब येदुरप्पा के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया था तो भाजपा की स्थिति इससे कहीं बेहतर थी। इस बार मोदी का करिश्मा और अमित शाह के प्रबंधन के बावजूद उसका मत प्रतिशत और सीटें दोनों घटी हैं। इस चुनाव में मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की पूरी फौज भाजपा ने कर्नाटक में उतार दी थी। पैसों और सरकारी मशीनरी का जम कर इस्तेमाल किया गया। प्रचार अभियान के दौरान चुनाव आयोग ने आँखे बंद रखी थीं। राज्यपाल की सेवा भी उपलब्ध थी। कुछ अपवादों के साथ मीडिया हर सही को गलत और गलत को सही प्रचारित करने को तत्पर था। उसके बावजूद साधारण बहुमत भी नहीं मिला और सरकार बनाकर अपमानित होना पड़ा। फिर भी ढिठाई देखिए, खुद को सबसे बड़ी पार्टी का अध्यक्ष कहलाने वाला यह कहने से गुरेज नहीं करता है कि अगर विधायकों को छुपाया नहीं गया होता तो वह विश्वास मत प्राप्त कर लेता। दूसरी ओर कांग्रेस जनता दल (एस) के साथ अन्य दलों ने चुनाव प्रचार के दौरान शालीनता बनाए रखी। जनता दल (एस) को बिना शर्त समर्थन देकर आगामी लोकसभा चुनाव के लिए गोलबंदी का मजबूत आधार बना दिया। राहुल के इस संदेश को उत्तर प्रदेश और बिहार में भी खुली आँखों देखा और पढ़ा जा सकता है। आने वाले दिनों में इसे और व्यापकता मिल सकती है। इसी के साथ यह भी गौरतलब है कि फासीवाद के वर्तमान स्वरूप को खाद पानी भी इन्हीं सेक्युलर दलों की वजह से मिली थी। इसने देश को उस जगह ले जाकर खड़ा कर दिया जहाँ चार साल पूरा होने के बावजूद सरकार की उपलब्धियाँ और जन समस्याएँ, महँगाई, बेरोजगारी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाईं। भारतीय लोकतंत्र को फिर से पटरी पर लाना है तो संस्थाओं के अलोकतांत्रीकरण और केंद्रीकरण के खिलाफ भी ठोस कार्यनीति के साथ आना होगा। सबसे बढ़कर यह कि खुद अपने अंदर मौजूद और पनप रहे फासीवादी कीटाणुओं को भी नष्ट करना होगा।

-मसीहुद्दीन संजरी
लोकसंघर्ष पत्रिका जून 2018 अंक में प्रकाशित

रविवार, 30 अगस्त 2015

रामसेना पर पाबन्दी क्यों नहीं ? फिरकापरस्त आजाद क्यों...




रामसेना पहले से ही मुस्लिम मुखालिफ  शिद्दत पसंद तंज़ीम है.२०१० में आजतक पर रामसेना के के प्रमोद मुतालिक को स्टिंग ऑपरेशन के ज़रिये पर्दाफाश किया गया था और इस बात को मंज़रे आम लाया गया था के रामसेना दरअसल रावण सेना है इसलिए के राम के आदर्श ये नहीं के पैसे लेकर कोई फसाद करवाता है. मंगलोर में भी औरतों को बेरहमी से मारने पीटने वाले रामसेना के बहाद्दुर ही थे.सिंदगी(गुलबर्गा )में पाकिस्तानी परचम लहरा कर मुसलामानों को बदनाम करने कि साज़िश में किस कदर  रामसेना मुलव्विस थी सभी जानते है.अखबारों और न्यूज़ चैनलों ने भी इसे शया किया था.राम्दुर्ग के सालहल्ली गांव में ईद के वक़्त खुद ही मंदिर पर हरा और ईदगाह पर भगवा परचम लहरानेवाले रामसेना के जिलाः बेलगाम सचिव को गिरफ्तार किया गया.गोवा में भी रामसेना ने ज़ेहर को घोलने की कोशिश की.लेकिन भाजपा हुकूमत होने के बावजूद रामसेना पर पाबंदी आएद कर दी गयी.और हुकूमत की जानिब से ये ऐलान भी किया गया के अगर कोई भी हरकत रामसेना या उसका सरगना प्रमोद मुतालिक गोवा में कदम भी रखेगा  तो गिरफ्तार किया जाएगा.और सख्त कार्रवाई की जायेगी.पिछले कई सालों से गोवा में अम्न ओ अमां कायम है.पाबंदी के बाद और भी इत्मीनान गोवा के मुस्लिम ईसाई महसूस कर रहे है.सवाल एहि उठता है के अगर गोवा हुकूमत पाबंदी आएद कर सकती है तो कर्णाटक में तो कांग्रेस की सेकुलर हुकूमत है.और रामसेना जैसे फिरकापरस्त तंज़ीम सिर्फ कर्णाटक में पैदा ही नहीं हुयी बल्कि दिन बा दिन मुख्तलिफ शहरों में अपनी सरगर्मियां बढ़ा भी रही है.कर्णाटक के तक़रीबन शहरों में रामसेना के ज़ेरे मातहत फसाद होने  की दलीले भी इंतजामिया के पास मौजूद है.फिर कर्णाटक हुकूमत क्यों पाबन्दी आएद नहीं कर रही..?गोवा हुकूमत कर सकती है तो कांग्रेस क्यों नहीं कर सकती...?जब के कर्णाटक तो अपने आप को सेक्युलर और सभी मज़ाहिब के लोगों को समानता का दावा करनेवाली हुकूमत है.फिर अब तक क्यों रामसेना पर कार्रवाई नहीं...?सिर्फ बेलगाम शहर ही नहीं बल्कि हुबली,मंगलोर गोकाक दावणगेरे,बेंगलूरु में रामसेना के कारकुनों पर मुकद्दमे दायर है.आखिर क्या वजह है के जब गोवा हुकूमत पाबंदी आएद कर सकती है तो कर्नाटक पाबन्दी आएद करने की जुर्रत क्यों नहीं दिखा पा रही.....?अवाम में इन शुबात का भी इजहार किया जा रहा है कई जुर्म में रामसेना के अफ़राद शरीक होने के बावजूद कार्रवाई ना होना सिर्फ इसलिए तो नहीं के फसाद की राजनीति की जा रही और सभी सियासी पार्टियां इन फिरकापरस्तों को इस्तेमाल कर रहे है.और फसाद के ज़रिये राजनितिक समीकरणों को बदलने की कोशिश की जाती है...?

    बेलगाम वैसे तो अम्न पसंद  शहर  के नाम से जाना जाता था.इसकी तारीख कभी मजहबी तशद्दुद को लेकर पहचान ना बनी थी.लेकिन फिरकापरस्तों ने ना सिर्फ बेलगाम शहर बल्कि पुरे मुल्क को अपनी चपेट में ले लिया है. इस मुल्क की तहजीब ही गंगा जमुनी तहजीब के नाम से जानी जाती है.लेकिन अफसोस के बाबरी मस्जिद की शहादत ने मुल्क की फिजा को ही आलूदा बना दिया.हिन्दू मुसलामानों में नफरत की दीवार को खड़ा कर दिया .जहाँ दिवाली और ईद साथ मनाया करते थे वही पर  ईद त्योहारों के वक्त एक डर सा लगने लगा के क्या इस ईद  पर कही फसाद तो बरपा नहीं होगा..? डर और खौफ के साये में लोग जीने लगे.बार बार इंतजामिया पर भी सवाल खड़े किये जाने लगे...अवाम चाहती है के मुजरिम का कोई मजहब नहीं होता और मुजरिम को सजा जरूर मिलनी चाहिए....फिर वो हिन्दू हो या मुसलमान...
सियासत दानों के लिए मजहब...नफरत... फसाद.... ये इख्तदार हासिल करने के जराये बन चुके है. इख्तदार हासिल करने के लिए भी फसाद और किसी को इख्तदार से उतारने के लिए भी फसाद.... और इस फसाद के शोलों में बेलगाम जैसा अम्न पसंद शहर भी   लपटों में आ गया. फिरकापरस्त तंजीमों ने अपना यहा डेरा जमा दिया और देखते देखते नफरतों की चिंगारियों  ने भाईचारगी को राख के ढेर में तब्दील कर दिया.
हाल ही में गांधीनगर में जो फसाद हुआ है इसकी तस्वीर साफ होती नजर आ रही है.रामसेना के सरगना रमाकांत कुंदुस्कर को गिरफ्तार किया गया है उसे बेल्लारी जेल भी भेज दिया गया है.लेकिन अवाम ये चाहती है के जब शहर के हर फसाद में रामसेना का हाथ होने के या इसकी शय या दलील होने के बावजूद इस पर क्यों पाबन्दी नहीं डाली जा रही...?पिछले कई फसाद में रामसेना का कोई न कोई कारकुन या गुंडा फसाद में पहल करता नजर  आया है .पिछले महीने ही बालू पवार को गुंडा एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया.वडगांव विष्णु गल्ली(निजामिया मस्जिद ,निजामिया मोहल्ला )में पथराव करनेवालों में अक्सर रामसेना के गुंडे ही शरीक होने की बात मोहल्लेवालों ने बताई.वडगांव एरगट्टी  चॉल में घुस कर माजूर शख्स आसिफ मन्नुरकर का कत्ल करनेवालों में भी रामसेना का हाथ रहा.अंगोल में मस्जिद पर जान बुझ कर रामसेना का बोर्ड लगाने की शरारत कर फिर मुस्लिम नौजवानों पर तलवार से हमला कर शदीद जख्मी करनेवाले भी रामसेना के ही लोग थे.लव जिहाद की कहानी बना कर जान बुझ कर मुस्लिम नौजवानों को बेरहमी से पिटनेवाले सरगर्म देश भक्त भी आप को इसी राम सेना से ही मिलेंगे.ईद ए मिलाद के वक्त झुटे नारे खुद लगा कर मिलाद के जुलुस से घर लौटने वालों पर मुकद्दमे दर्ज करनेवालों में रामसेना के ही लोग थे.शहर के तमाम फसाद के पीछे अगर संजीदगी से गौर किया जाय तो रामसेना का ही हाथ नजर आएगा.और ये कोई छिपी बात नहीं बल्कि पुलिस दस्तावेज में भी मौजूद है.रामसेना के बैनरों पर भी आप को मजहबी तशद्दुद फैलानेवाले मजमून ही मिलेंगे.इन  को देखते हुए शहर ए बेलगाम के तमाम अम्न पसंद लोगों का मुजाहरा है के जल्द से जल्द राम सेना पर पाबंदी लगा कर शहर में पुर सुकून माहोल को बनाये रखने में मदद करे.हाल ही में गांधी नगर में जो फसाद बरपा हुआ उसमे ये देखा गया के फिरकापरस्त बेखौफ हो कर तलवारों का मुजाहरा करते दिखाई देते है.हथियार लेकर किसी को भी जख्मी या कत्ल करने में इन्हे कोई डर नहीं लगता.इनकी नकिल कस्ना है तो गिरफ्तारी के बाद जल्द इन्हे जमानत ना दी जाय.
कर्नाटक में पर सुकून माहोल के लिए रास्ते हमवार करने है तो फौरी तौर पर रामसेना पर पाबंदी आएद कर दी जाय.गिरफ्तार होने के बाद ज़मानत पर रिहा ना किया जाय.देखा ये भी गया है के बेलगाम जेल में इन्हे तमाम सहूलते मुहैया करायी जाती है.सुबह शाम बेहतरीन खाने फिरकापरस्तों को लिए परोसे जाते है.मुस्लिम नौजवानों को जेल की सफाई और झाड़ू पोछा लगवाने का काम करवाया जाता है.मुस्लिम लीडर जेल में जाकर पूछताछ भी नहीं करता दूसरी तरफ बजरंगदल,रामसेना और भाजपा के एमपी,एमएलए दिन में दो बार फसादियों से मिलते है.उनकी हिम्मत अफ़ज़ाई करते है.ताके बाहर आने के बाद फसाद में हिस्सा ले.गांजा शराब जैसी नशीली चीज़े भी जेल इंतजामिया फिरकापरस्तों को सप्लाई करवाती है.जेल इनके लिए होटल होती है.इनपर कोई दबाव नहीं होता.इसपर भी रोक लगा दी जाय ताके फिरकापरस्त जेल जानेसे डरने लगे.
- इक़बाल अहमद जकाती
एडिटर
पैगाम ए इत्तेहाद
बेलगाम ,कर्नाटक
 

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

सांप्रदायिक हिंसा 2013 -भाग-2

किश्तवार, जम्मू एवं कश्मीर
9 अगस्त को ईद-उल-फित्र की नमाज के बाद अचानक पत्थरबाजी शूरू हो गई। नमाज के बाद बाहर निकल रहे लोगों का सामना अफजल गुरू और मकबूल भट्ट को फांसी दिए जाने से संबंधित भड़काऊ पोस्टरों से हुआ। कुछ अन्य लोगों का कहना है कि मस्जिद से निकल रहे लोग, भारत-विरोधी नारे लगा रहे थे जिसके कारण पत्थरबाजी हुई। यह बात अधिक विश्वसनीय नहीं लगती क्योंकि जम्मू में रहने वाले मुसलमानों का कश्मीरी राष्ट्रवादियों की स्व-निर्णय की मांग से बहुत लेनादेना नहीं है। बाद में भड़के दंगों में हिदयाल गांव में तीन व्यक्ति मारे गए और 80 घायल हुए। मृतकों में 23 साल का अरविंद कुमार भगत शामिल था, जो गोली लगने से मारा गया। हिन्दुओं का कहना है कि उसे किसी व्यक्ति ने गोली मारी जबकि मुसलमान कहते हैं कि वह पुलिस की गोली से मारा गया। बशर अहमद मोची पर भीड़ ने हमला किया और बाद में उसे जिंदा जला दिया। जम्मू क्षेत्र के आठ जिलों में कफ्र्यू लगाया गया। किश्तवार में मुसलमानों और हिन्दुओं की आबादी का नाजुक संतुलन है। हिन्दू, आबादी का 45 प्रतिशत हैं और मुसलमान 55। गृह राज्य मंत्री सज्जाद किचलू, जो किश्तवार के रहने वाले हैं, का दावा है कि दंगों की तैयारी पिछले कम से कम एक महीने से जारी थी और हथियारबंद समूह अल्पसंख्यकों पर हमला करने की योजना बना रहे थे। केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिंदबरम ने संसद मंे दिए गए अपने एक वक्तव्य में सांप्रदायिकता की आग भड़काने के लिए बजरंग दल को दोषी ठहराया।
किश्तवार में हुई सांप्रदायिक हिंसा के पीछे अलगाववादी राजनीति नहीं बल्कि वोट बैंक की राजनीति थी। यही कारण है कि एक छोटा सा झगड़ा बहुत जल्दी दंगे में बदल गया। भाजपा ने इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का राजनीतिकरण करने के लिए अरूण जेटली को किष्तवार भेजा। जम्मू कश्मीर में ऐसी सैंकड़ों घटनाएं हुईं हैं जिनमें लोग मारे गए और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया परंतु कोई भाजपा नेता वहां नहीं गया। भाजपा ने किश्तवार के दंगा पीडि़तों के लिए मुआवजे की राशि  बढ़ाने की मांग भी की। ऐसी मांग उसने पहले कभी नहीं की थी। किश्तवार दोनों समुदायों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्तों के लिए जाना जाता था।
ऊत्तर प्रदेश
रमजान के महीने में मेरठ में सड़कों पर नमाज पढ़े जाने पर भगवा ब्रिगेड ने आपत्ति उठाई। इससे दोनों समुदायों में तनाव बढ़ा परंतु पुलिस की तैनाती कर इस तनाव को हिंसा में नहीं बदलने दिया गया।
मेरठ जिले के नंगलामल गांव में एक मस्जिद के नजदीक स्थित मंदिर के बाहर लाउडस्पीकर के उपयोग को लेकर भड़की हिंसा में 26 जुलाई को एक व्यक्ति मारा गया और एक दर्जन घायल हो गए। दोनों समुदायों के बुजुर्गों ने हस्तक्षेप किया और मामले को शांतिपूर्ण ढंग से निपटा दिया। इसके बाद, एक इफ्तार पार्टी के दौरान श राब के नशे  में चूर कुछ लोगों द्वारा बदतमीजी किए जाने पर हिंसा भड़क उठी। हिंसा के दौरान गोलियां चलाई गईं और पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा। सुनील नामक एक युवक गोली से मारा गया और शाहिद को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। गांव के मुस्लिम रहवासियों का आरोप है कि पुलिस ने उनके घरों में घुसकर फर्नीचर और अन्य घरेलू सामान को नुकसान पहुंचाया और लोगों को पीटा (संडे एक्सप्रेस 28.07.2013)।
उत्तरप्रदेश  में सांप्रदायिक हिंसा की अधिकांश  घटनाएं सितंबर 7 और 8 को हुईं। अगस्त की 27 तारीख से लेकर 16 सितंबर के बीच सांप्रदायिक हिंसा की 128 घटनाएं हुईं। लगभग 50,000 लोग घर से बेघर हो गए और मुजफ्फरनगर में अमानवीय परिस्थितियों में राहत शिविरों में रह रहे हैं। सरकार ने उनके प्रति जुबानी सहानुभूति तो दिखलाई परंतु राहत शिविरों के हालात बेहतर करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए। कड़ाके की सर्दी और कंबलों की कमी के कारण राहत शिविरों में 40 बच्चे मौत के शिकार हो गए (इंडियन एक्सप्रेस दिनांक  3.12.2013)। मुजफ्फरनगर दंगों में 6 अक्टूबर तक 46 मुसलमान और 16 हिन्दू मारे जा चुके थे जबकि 57 मुसलमान और 11 हिन्दू घायल हुए थे। ये आधिकारिक आंकड़े हैं। अक्टूबर की 13 तारीख तक 352 एफ.आई.आर. दर्ज की गईं थीं जिनमें 5 जिलों- मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, बागपत व सहारानपुर- में हुई साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं के सिलसिले में 1068 व्यक्तियों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए थे। कुल मिलाकर 243 लोगों को गिरफ्तार किया गया जिनमें से अधिकांश  हिन्दू थे। अब भी करीब 17 हजार लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं। मेरठ जिले के भाजपा विधायक संगीत सोम को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया परंतु उन्हें सलाहकार परिषद के आदेश  पर जल्दी ही रिहा कर दिया गया। इसका कारण यह था कि उनके खिलाफ मामला मजबूत नहीं था। ऐसा मिलीभगत के चलते हुआ या लापरवाही से, यह कहना मुष्किल है। भाजपा ने अपने
विधायकों और अन्य आरोपियों के जमानत पर रिहा होने के बाद उनका सार्वजनिक सम्मान किया।
मुजफ्फरनगर दंगों में पुलिस की भूमिका घोर लापरवाही की रही। पुलिस ने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया। राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण हालात और बिगड़े। पुलिस महानिदेशक ने यह स्वीकार किया कि पुलिस ने अपेक्षित  भूमिका नहीं निभाई (टाईम्स आॅफ इंडिया दिनांक 25/09/2013)। पुलिस उस समय हस्तक्षेप कर सकती थी जब ‘लव जेहाद‘ के नाम पर मुस्लिम समुदाय को बदनाम किया जा रहा था परन्तु पुलिस ने कुछ नहीं किया। सचिन और गौरव की हत्या के मामले में पुलिस ने कई मुसलमानों को गिरफ्तार किया परंतु स्टिंग आपरेशनों से यह पता चला है कि आजम खान के दबाव में उन्हें छोड़ दिया गया। इसके बाद, निषेधाज्ञा लागू होने के बावजूद मुसलमानों की एक सभा आयोजित की गई जिसमें बसपा व सपा के सांसद मौजूद थे। जिले के एसपी ने स्वयं इस गैरकानूनी सभा के नुमांइदों से ज्ञापन स्वीकार किया। तत्पश्चात भाजपा ने जाटों की महापंचायत आयोजित करने का फैसला किया। इसमें भाग लेने के लिए हजारों हथियारबंद जाट पहुंचे और उन्होंने रास्ते में कई मुसलमानों का अपहरण कर लिया। हथियारों से लैस ये लोग कई पुलिस चौकियों व नाकों से गुजरे परंतु उन्हें किसी ने नहीं रोका। सभा के आयोजन पर लगे प्रतिबंध का पालन करवाने की कोई कोशिश  नहीं की गई जबकि यह स्पष्ट था कि सभा में भाग लेने जा रहे हथियारबंद लोग गुस्से से भरे हुए थे। महापंचायत में भड़काऊ भाषण दिए गए और इसके बाद दंगे शुरू हो गए। सभा से लौट रहे लोगों ने मुस्लिम गांवों पर हमला किया। कुछ अपवादों को छोड़कर, पुलिस उन स्थानों पर नहीं पहुंची जहां से हिंसा की खबरें आ रही थीं।
मुसलमानों ने ट्रेक्टर से अपने गांव लौट रहे जाटों को रोका और उन्हें गन्ने के एक खेत में ले जाकर मौत के घाट उतार दिया। जिन गांवों में मुसलमान बहुसंख्या में थे वहां हिन्दुओं पर हमले हुए। खराद गांव के सरपंच ने 150 मुसलमानों को अपने घर में शरण देकर उनकी जान बचाई।
कुछ दंगा पीडि़तों के समक्ष यह प्रस्ताव रखा गया कि अगर वे यह शपथपत्र दे दें कि वे अपने गांव नहीं लौटेंगे तो उन्हें 5 लाख रूपये का मुआवजा दिया जाएगा। सरकार ने इस आशय की अधिसूचना भी जारी की। यह एक अभूतपूर्व कदम था। भारत के संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को देश में कहीं भी बसने का अधिकार देता है और कार्यपालिका को कतई यह हक नहीं है कि वह नागरिकांे से उनके गांव में रहने का हक ‘खरीद‘ ले। सरकार ने दंगाईयों के अधूरे काम को पूरा करते हुए पीडि़तों को उनके गांवों से बाहर कर दिया। उनसे इस आशय के शपथपत्र हासिल कर लिए गए कि वे अपने गांव वापिस लौटना नहीं चाहते। अगर किसी को भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच मिलीभगत का प्रमाण चाहिए तो वह यह है।
समाजवादी पार्टी और भाजपा, दोनों को इन दंगों में अपना फायदा नजर आ रहा था। परंतु हिंसा इतना बड़ा स्वरूप ग्रहण कर लेगी,  इसका समाजवादी पार्टी को अंदाजा नहीं था और अब इस पार्टी को इन दंगों से नुकसान ही होगा। मुसलमान अब समाजवादी पार्टी से दूर हो रहे हैं। पष्चिमी उत्तरप्रदेष और विशेषकर दंगा प्रभावित जिले, अजीत सिंह की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय लोकदल के गढ़ हैं। चरण सिंह ने इस इलाके के मुसलमानों और जाटों में अपनी गहरी पैठ बना ली थी। साम्प्रदायिक धु्रवीकरण से अजीत सिंह की पार्टी को नुकसान होगा क्योंकि जाट मत भाजपा की ओर चले जाएंगे। समाजवादी पार्टी को यह उम्मीद थी कि मुसलमानों को कुछ मुआवजा देकर वह उनके बीच अपनी पकड़ मजबूत कर लेगी। इस तरह इन दंगों से भाजपा और सपा दोनों को यह आशा  थी कि वे  अजीत सिंह की पार्टी की कीमत पर अपना आधार बढ़ा लंेगीं। लाशों पर इस तरह के राजनैतिक खेल खेले जाना दुर्भाग्यपूर्ण किंतु कटु सत्य है। जब समाजवादी पार्टी की सरकार 84 कोसी परिक्रमा को रोक सकती थी तब वह जाट महापंचायत को भी रोक सकती थी। ऐसा न करके उसने आपराधिक लापरवाही की है। मुजफ्फरनगर दंगों के लिए भाजपा के साथ-साथ सपा भी जिम्मेदार है।  
मध्यप्रदेश
इंदौर के चंदननगर थाना क्षेत्र में 20 अगस्त को भड़की साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान हुई पत्थरबाजी में 30 पुलिसकर्मियों सहित 45 लोग घायल हो गए। झगड़े की शुरूआत एक क्रिकेट मैच के नतीजे और एक मंदिर के पास किसी जानवर का शव पाए जाने के साथ हुई। संघ परिवार से जुड़े लोगों ने भड़काऊ नारेबाजी की। दुकानों को नुकसान पहुंचाया गया और करीब 100 वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया। दो पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए।
हरदा जिल के छीपाबड़ में 19 सितंबर को हुई साम्प्रदायिक हिंसा में कई घरों को भारी नुकसान पहुंचाया गया और 22 लोग घायल हुए। हिंसा का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह था कि इससे पीडि़तों, विषेषकर महिलाओं और बच्चों को गहरा सदमा लगा और वे अब तक उससे उबर नहीं सके हैं। बजरंग दल के गुुंडों ने मुसलमानों के घरों को आग के हवाले कर दिया और यहां तक कि घरों में अनाज का एक दाना भी नहीं बचा। घरों में आग लगाने के लिए नजदीक के एक पेट्रोल पंप से पेट्रोल लाया गया। लगभग 60-70 बच्चों ने स्कूल जाना बंद कर दिया। हिंसक भीड़ एक स्कूल में पहुंची और यह मांग की कि मुसलमान बच्चों को उसके हवाले कर दिया जाए। परंतु स्कूल के शिक्षकों ने मुस्लिम बच्चों को पहले ही एक कमरे में बंद कर दिया था और उन्होंने भीड़ से कहा कि बच्चे अपने घर चले गए हैं। एल. एस. हरदेनिया के नेतृत्व में दंगों की जांच करने गए एक दल ने सुरेन्द्र राजपुरोहित उर्फ टाईगर की गिरफ्तारी की मांग की जिसकी कथित रूप से हिंसा भड़काने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। जांचदल ने यह मांग भी की कि हिंसा में एक स्थानीय भाजपा विधायक एवं पूर्व मंत्री के पुत्र की भूमिका की जांच की जाए और सभी दोषियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए जाएं।
बिहार
राज्य के बेतिया में 9 अगस्त को नागपंचमी के जुलूस के दौरान हिंसा हुई। पत्थर फेंके गए और जिला मजिस्ट्रेट और एसपी के वाहनों को जला दिया गया। जिले में कफ्र्यू लगाना पड़ा। नागपंचमी के धार्मिक जुलूस में शामिल लोग बिहार के मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के खिलाफ नारे लगा रहे थे। यह जदयू के एनडीए से अलग हो जाने का नतीजा था। महावीर अखाड़े के लठैत जुलूस मंे आगे चल रहे थे और उनके हाथों में तख्तियां थीं जिनपर राजनैतिक   नारे लिखे हुए थे।
नवादा में दो समुदायों की हिंसक भीड़ के बीच लगभग 48 घंटे तक खूनी संघर्ष चला, जिसमें 2 लोग मारे गए। हिंसा की शुरूआत 10 अगस्त को हुई जब कुछ मुस्लिम युवकों ने नवादा शहर के बाहरी हिस्से में स्थित ‘बाबा का ढाबा‘ में बुर्का पहने हुए कुछ मुस्लिम लड़कियों की उपस्थिति पर आपत्ति की। इस ढाबे का मालिक एक हिन्दू था। युवकों ने ढाबे पर हमला किया और वहां तोड़फोड़ की। इसके बाद दोनों समुदायों के बीच जमकर पत्थरबाजी हुई जिसमें कई लोग घायल हो गए। मुसलमानों की कई दुकानें जला दी गईं। जब पुलिस स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही थी तब बहुसंख्यक वर्ग के एक युवक ने एक पुलिसकर्मी की बंदूक छीननेे की कोशिश की। इसके बाद पुलिस ने गोलीचालन किया जिसमें वह युवक मारा किया। जुलाई में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भाजपा से नाता तोड़ा था। तबसे लेकर 9 अगस्त तक बिहार में 6 दंगे हुए।
कर्नाटक
चिकमंगलूर में 28 दिसंबर को भड़की साम्प्रदायिक हिंसा में 31 लोग घायल हुए जिनमें दो पुलिसकर्मी शामिल हैं। दिनांक 1 जनवरी 2014 के ‘इंकलाब‘ अखबार के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने अल्पसंख्यकों के साथ अत्यंत क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया। महात्मा गांधी रोड पर स्थित एक पूजास्थल केे पास एक जानवर का कटा हुआ सिर पाया गया। इसका विरोध करने लोग सड़कों पर उतर आए। पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया। टीपूनगर के 61 वर्षीय साहब जान को पुलिस ने सड़क पर घसीट-घसीटकर पीटा। यह तब हुआ जब साहब जान मृत जानवर के अवशेशों  को हटाकर उस स्थान को पानी से धो रहा था।
असम
कछार जिले के रंगपुर में 25 अगस्त को तीन मंदिरों के पास मांस के टुकड़े पाए गए। इसके बाद हुई हिंसा मंे सात पुलिसकर्मी घायल हो गए और शांति स्थापित करने के लिए सेना की तैनाती करनी पड़ी। मुख्यमंत्री तरूण गोगोई ने दंगों के लिए विहिप और भाजपा को जिम्मेदार बताया। कई दुकानें और वाहन जला दिए गए।
निष्कर्ष
हमारे देश में दंगे भड़काने के लिए कोई कारण छोटा नहीं होता। किसी मुसलमान द्वारा गाय को मार कर भगाना, मंदिरों / मस्जिदों के पास मांस के टुकड़े मिलना, महिलाओं के साथ छेड़छाड़, अंतःधार्मिक विवाह/प्रेम संबंध, लाउडस्पीकरों का उपयोग, रेस्टोरेंट के बिल पर विवाद, धार्मिक लबादे में राजनैतिक जुलूस आदि कुछ ऐसे मसले हैं जो गुजरे साल, दंगों का कारण बने। पुलिस द्वारा समय पर कार्यवाही न करने या कबजब उसकी दंगाईयों से मिलीभगत से असामाजिक तत्वों का हौसला बढ़ता है और वे शनैः-शनैः ताकतवर होते जाते हैं और राजनीति में भी उतर जाते हैं। यद्यपि इस तरह की घटनाओं से संवेदनशीलता और कड़ाई से निपटने की जरूरत है तथापि असली चुनौती यह है कि हम साम्प्रदायिक सोच का जड़मूल से सफाया करने की कोषिष करें ताकि हममें से हरेक हमारे देश की विविधता का आनंद लेना सीख सके और अपने से अलग ढंग से आराधना करने वालों, अपने से अलग खानपान की आदत वालों, अपने से अलग कपड़े पहनने वालों और अपने से अलग तरीके से जीने वालों को अपना शत्रु मानना बंद करे। ‘दूसरे‘ के प्रति दुराग्रह ही वह सीमेंट है जो साम्प्रदायिक पहचान को मजबूती देता है। इसके स्थान पर हमें मानवता, प्रेम, न्याय और सबके प्रति सहानुभूति के भाव को बढ़ावा देना चाहिए जिससे अंतःधार्मिक रिश्ते मजबूत हों। एक ऐसे कानून की भी आवश्यकता है जो दंगे रोकने में राज्य तंत्र की विफलता की स्थिति में संबंधित अधिकारियों/कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय करे।

 -इरफान इंजीनियर



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