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शनिवार, 28 जून 2014

बाकी हैं अभी पत्तों पे जले तिनकों की तहरीरें

मई 14 में सम्पन्न हुए लोकसभा घटना पूर्ण उत्तेजक चुनाव के परिणामों से कुछ और साबित हुआ हो या न हुआ हो यह तो लगभग सिद्ध हो ही गया हे कि इस महान देश की जनता के बड़े हिस्से को धर्मनिरपेक्षता अथवा साम्प्रदायिकता की कोई चिंता नहीं। जबकि धर्मनिरपेक्षता का राजनैतिक सामाजिक दर्शन संघर्षशील जनता ही का हथियार है। उसकी जितनी उपयोगिता दलित, दमित, वंचित वर्गों के लिए है, उतनी साधन सम्पन्न वर्गों के लिए नहीं। इतिहास इसे बार-बार प्रमाणित करता रहा है। हाल के चुनाव में कारपोरेट सेक्टर, देशी धन्ना सेठों ने जिस भामाशाही अन्दाज में पार्टी विशेष के लिए अपनी तिजोरियों के दरवाजे खोल दिए वह भी इसी यथार्थ को प्रमाणित करता है। इसके विपरीत सामाजिक समानता, न्याय के सिद्धांत तथा अवामी एकता के प्रबल पक्षधर लोग, संगठन ही प्रमुख रूप से इस दर्शन का पक्ष लेते रहे हैं। उन्होंने इस लक्ष्य को पाने के लिए कठिन संघर्ष किया, आज भी कर रहे हैं। धर्म निरपेक्षता अवाम के सभी हिस्सों के बीच मजबूत एकता का आवश्यक सिद्धांत है। यह सहसा या ईश्वरीय आदेश नहीं है कि देश की आजादी के बाद ही से साम्प्रदायिक विभेदकारी शक्तियाँ, सरकारों की जनविरोधी नीतियों के पक्ष में खड़ी होती रही हैं। जब कभी वे सत्ता में आईं तो उन्होंने उन्हीं नीतियों का अनुसरण भी किया। यहाँ तक कि वे ऐसी नीतियों कार्यवाइयों के प्रति अधिक उत्साही व उदार नजर आईं। दुःखद घटनाओं की यादें अभी पूरी तरह धूमिल नहीं हुई हैं जिनके कारण अवाम के संकटों से घिरे वर्गों को कठिन स्थितियों का सामना करना पड़ा। दो भिन्न धार्मिक सामाजिक पहचान वाले वर्गों के बीच हिंसक टकराव की स्थितियों का निर्मित होना, फिर उनका भयावह तबाही के यथार्थ का रूप ले लेना अन्ततः किसके हित साधने के काम आता है, आजाद भारत के अनेक दंगों के समान गुजरात एवं जमशेदपुर दंगे भी इसका साक्ष्य प्रस्तुत कर चुके हैं। समय की शिला पर मासूम इंसानों के रक्त से लिखी इबारत बताती है कि इन दंगों में इंसानी प्राणों की बलि ही नहीं चढ़ी, बहुत कुछ जो मूल्यवान व महत्वपूर्ण था, वह भी नष्ट हुआ। देश के मेहनतकश वर्गों, जिनमें छोटे किसान, कुटीर उद्योगों में लगे लोग तथा तमाम तरह के मजदूर शामिल हैं, उनकी तबाही ने बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद ही से अधिक गति पकड़ी। निजी उद्योग पतियों, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को खुली लूट की छूट का इतिहास वहीं से आरंभ होता है। आर्थिक नीतियों में बड़े बदलावों का प्रस्थान बिन्दु भी वही है। एक ओर सबको साथ ले चलने, सबका हित  साधने का दावा दूसरी ओर ऐसी रणनीति को अपनाना कि सबसे अधिक सीटों वाले महाप्रदेश से दूसरे सबसे बड़े समुदाय का एक भी प्रतिनिधि लोकसभा के लिए न चुना जा सके, आबादी के अनुपात में संसद में बहुत कम प्रतिनिधित्व मिल पाना, इस समुदाय को हताश करने वाली स्थिति के प्रति राजनैतिक, सामाजिक व बौद्धिक हलकों में किसी तरह की बेचैनी के लक्षण प्रकट न होना, किन गंभीर खतरों की ओर संकेत कर रहा है, इसे बआसानी समझा जा सकता है। मंत्री मण्डल में देश के दूसरे सबसे बड़े समुदाय को न्यूनतम प्रतिनिधित्व मिलना समुदाय को निराश करने वाली स्थिति है। इस निराशा को निकट भविष्य में होने वाले चुनावों के माध्यम से कम किया जा सकता है। बनने को तो राज्य सभा भी माध्यम बन सकती है। असल चीज तो नीयत व इरादे हैं। किन्हीं भी कारणों से सत्ताधारी दल को वोट न दे सकने वाले मतदाताओं के प्रति अरुचि अथवा कटुता का भाव लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं माना जा सकता। ठीक उसी तरह जैसे चुनाव अभियान का धार्मिक प्रतीकों से आरंभ होना, जैसे गंगा स्नान या आरती के दृश्य, जाहिर सी बात है इनसे धार्मिक भावनाओं का उद्वेलित होना स्वाभाविक ही था और वह हुई जिसकी परिणति धर्म निरपेक्ष देश के प्रमुख के शपथ ग्रहण समारोह में धार्मिक नारों की गूँज तथा धार्मिक नेताओं की उपस्थिति के रूप में दिखाई पड़ी। वह मूल्य और परम्पराएँ जो हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं तथा सभी वर्गों द्वारा समादृत हैं, उनके ध्वंस के उपक्रम से बचना राष्ट्रीय दायित्व के समान है। कहा जा सकता है कि एन0डी0ए0/भाजपा की भारी जीत के पीछे राजनैतिक संस्कृति में बदलाव की इच्छा के साथ ही धार्मिक भावनाओं की आवेगमयिता की भी उपस्थिति रही है। सामाजिक धु्रवीकरण ने निश्चय ही अपना काम किया है। सरकार बनने के बहुत छोटे अन्तराल के बाद ही राम मन्दिर तथा धारा 370 का मुद्दा उठने-गर्माने का संकेत तो यही है कि भाजपा अपनी पुरानी कार्य पद्धति में कोई बड़ी तब्दीली नहीं करने जा रही है जो अन्ततः कांग्रेस तथा दूसरे जातिवाद कथ्य की सेक्युलर संरचना वाली पार्टियों के काम आएगा ही। इस यथार्थ की उपेक्षा कर पाना संभव नहीं है कि मुसलमानों द्वारा कांग्रेस को वोट देने का दबाव, स्वयं कांग्रेस ने नहीं बल्कि भाजपा ने बनाया, ठीक उसी तरह जैसे मुसलमानों पर धार्मिक नेतृत्व थोपने के पीछे जैसी सक्रियता राजनैतिक दलों, (वामपंथियों को छोड़कर) की रही वैसी कोई कोशिश या इच्छा स्वयं मुसलमानों के भीतर से उठती हुई नहीं दिखाई पड़ी। मुसलमानों की बहुसंख्या ने धार्मिक नेतृत्व, मौलवी मुल्ला को मुँह लगाया भी नहीं। उन्होंने आम तौर पर अपने विवेक से मतदान किया। जाति तथा धर्म के नाम पर उन्होंने कभी मतदान किया भी नहीं। यहाँ तक कि वह अपनी तबाही को संभव करने वाले दल के साथ भी खड़े हुए। बहुधा वह मुख्य धारा के साथ रहे। इस तथ्य की ओर ध्यान जाना चाहिए कि प्रचण्ड बहुमत के बावजूद सत्ताधारी गठबंधन तीस से तैंतीस प्रतिशत मतदाताओं का ही विश्वास प्राप्त कर सका । 70 प्रतिशत मतदाता अब भी उससे सहमत नहीं हंै तो क्या 70 प्रतिशत मतदाताओं को दण्डित किया जाएगा। यदि नहीं तो शिक्षा, सेवा क्षेत्र, व्यापार तथा विधान सभाओं एवं संसद में उनका प्रतिशत में अपेक्षित वृद्धि के लिए विशेष अभियान चलाया ही जाना चाहिए। वर्तमान सत्ताधारी गठबंधन ऐसा कर पाने में सक्षम है बस उसे अच्छे दिन के वायदे को याद रखने की जरूरत है।














 -शकील सिद्दीकी
मो.09839123527
 लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

रविवार, 11 अगस्त 2013

धर्म, नास्तिकता और धर्मनिरपेक्षता


पिछले कोई तीन दशकों से सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्रों में धर्म, काफी दबंगता से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। कहीं आतंकवादी हमलों तो कहीं साम्प्रदायिक हिंसा और कहीं धार्मिक दक्षिणपंथियों की बढ़ती ताकत ने आम आदमी के लिए अधिक महत्वपूर्ण मुद्दों जैसे सामाजिक असमानता और  गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को नेपथ्य में धकेल दिया है।
इस सिलसिले में हालिया प्रकाशित एक पुस्तक कुछ दिलचस्प भविष्यवाणियां करती है। पुस्तक के अनुसार, सन् 2040 के दशक तक दुनिया में धर्म के मानने वाले अल्पसंख्यक हो जाएंगे और धर्म के प्रति उदासीन लोगों की संख्या में कई गुना वृद्धि होगी। पुस्तक के लेखक हैं नाईजल बार्बर और उसका शीर्षक है ‘वाय एथियेज्म विल रिप्लेस रिलीजनः द ट्राइम्फ आॅफ अर्थली प्लेजर्स ओवर पाय इन द स्काय‘ (क्यों लेगी नास्तिकता धर्म का स्थान: इस दुनिया की उस दुनिया पर जीत)। पुस्तक, धर्म के उदय और पतन को आर्थिक विकास से जोड़ती है और इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि विकसित देशों में नास्तिकों की संख्या अधिक होती है।
यह पुस्तक लेखक द्वारा 137 राष्ट्रों के अध्ययन पर आधारित है। इस अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि जिस देश में जितनी अधिक और व्यापक जनकल्याण योजनाएं लागू हैं और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था जितनी बेहतर है, वहां नास्तिकों की संख्या उतनी ही अधिक है। दूसरे शब्दों में, पुस्तक मूलतः यह कहती है कि जिन देशों में आय का वितरण जितना समान है, वहां धार्मिक लोगों की संख्या उतनी ही कम है। लेखक जानेमाने मनोविज्ञानी हैं। लेखक की भविष्यवाणी यह है कि अगर फानी दुनिया उनकी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करने लगेगी, तो लोगों को पराभौतिक शक्तियों पर विश्वास करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। ज्ञातव्य है कि अमेरिका में हाल में कराए गए एक सर्वेक्षण में 20 प्रतिशत लोगों ने स्वयं को नास्तिक बताया।
यद्यपि यह अध्ययन अत्यंत तार्किक है तथापि शब्दों के अर्थ को लेकर कुछ भ्रमित भी प्रतीत होता है। जैसे, हम इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि नास्तिकता, कुछ धर्मों के ढांचे का हिस्सा है। इनमें शामिल हैं हिन्दू धर्म के कुछ पंथ जैसे चार्वाक-लोकायत परंपरा। जैन और बौद्ध धर्म भी किसी दैवीय शक्ति के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करते। यह अलग बात है कि बौद्ध और जैन धर्मों के अनुयायियों ने इन धर्मों के पैगम्बरों को ही ईश्वर का दर्जा दे दिया है और उनकी पूजा करने लगे हैं। हिन्दू धर्म में कई धाराएं हैं जिनमें शामिल हैं ब्राहम्णवाद, नाथ, तंत्र, भक्ति, सिद्ध आदि। हिन्दू धर्म में ईश्वर की अवधारणा में भी बहुत विविधता है। कुछ धाराएं बहुईश्वरवादी हैं, जो सैकड़ों देवी-देवताओं में आस्था रखती हैं तो कुछ धाराओं के आराध्य त्रिदेव (ब्रहा, विष्णु, महेश) हैं। कुछ धाराएं केवल एक ईश्वर में विश्वास करती हैं तो कुछ निराकार ब्रम्ह में। और ये सभी अवधारणाएं, एकसाथ हिन्दू धर्म में जीवित हैं।
भारत में चार्वाक को नास्तिकता का पितामह कहा जा सकता है। इस परंपरा को आधुनिक युग में साम्यवादियों ने आगे बढ़ाया। इस सिलसिले में भगतसिंह का प्रसिद्ध लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?‘ महत्वपूर्ण है। कई क्रांतिकारी समाजसुधारक जैसे पेरियार रामास्वमी नायकर भी नास्तिकता के जबरदस्त पक्षधर थे। रेशनलिस्ट्स (तार्किकतावादियों) की संस्थाएं भी इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
अन्य धर्म, जो एक ईश्वर में विश्वास करते हैं, वहां भी ईश्वर की अवधारणा निराकार और साकार के बीच झूलती रही है। कुछ दशकों पहले तक ऐसी पुस्तकें और लेख आम थे जिनमें ईश्वर के अस्तित्व को ही चुनौती दी जाती थी। परंतु पिछले तीन दशकों में, यथास्थितिवादी राजनैतिक ताकतों द्वारा धार्मिक पहचान का दुरूपयोग तेजी से बढ़ा है। इसके पहले, बीसवीं सदी की शुरूआत में, विशेषकर सन् 1920 के दशक में, औद्योगिकरण व शिक्षा के प्रसार के कारण, अफ्रीकी-अमेरिकनों व महिलाओं ने सामाजिक जीवन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना शुरू की। इससे समाज का कुलीन वर्ग स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगा और नतीजे में ईसाई धर्म में एक कट्टरपंथी धारा उभरी। इस्लामिक कट्टरवाद के राजनैतिक अवतार को सबसे पहले आकार मिला ईरान में अयातुल्लाह खौमेनी के शासन में आने के बाद। शनैः-शनैः इस्लामिक कट्टरवाद के कई स्वरूप उभरकर समाने आने लगे, जिनमें से सबसे बदतर था तालिबान। इसी दौर में आमजनों में प्रजातांत्रिक आकांक्षाओं के उदय से भयभीत कुछ शासकों ने इस्लाम के कट्टरवादी संस्करणों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। सऊदी अरब में आम जनता की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को कुचलने के लिए इस्लाम के सलाफी संस्करण का इस्तेमाल किया गया, ताकि अमेरिका और इंग्लैंड की बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियों के टैंकरों में सऊदी तेल का प्रवाह अबाध रूप से जारी रह सके।
इस्लाम के सलाफी संस्करण का अमेरिका ने मध्यपूर्व के तेल भंडारों पर अपना कब्जा बनाए रखने के लिए भी इस्तेमाल किया। अमेरिका के निर्देशन में उसके द्वारा पोषित मदरसे पाकिस्तान में स्थापित किए गए, जिनमें अंकल सैम द्वारा तैयार किए गए पाठ्यक्रम को पढ़कर, मुजाहिदीन, तालिबान और अल्कायदा लड़ाके उभरे। इन लड़ाकों ने अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं को खदेड़ने के अमेरिकी लक्ष्य को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत में दलितों और महिलाओं के सशक्तिकरण ने मध्यम वर्ग के एक हिस्से के मन में यह आशंका पैदा कर दी कि समाज पर उसका दबदबा कम हो जाएगा। इससे उपजे असुरक्षा के भाव को भाजपा ने राम मंदिर जैसे मुद्दे उछालकर जमकर भुनाया। जहां इस पुस्तक के लेखक का कहना यह है कि बढ़ती समृद्धि के साथ लोगों के दिलोदिमाग से ईश्वर और धार्मिकता का रंग उतरने लगता है वहीं दक्षिण एशिया में हालात बिल्कुल उलट दिखलाई पड़ते हैं। पाकिस्तान में सामाजिक मसलों में मुल्लाओं का हस्तक्षेप वहां प्रजातंत्र के जड़ें पकड़ने में सबसे बड़ी बाधा है। श्रीलंका,  जहां लिट्टे का सफाया करने के नाम पर हजारों तमिलों को मौत के घाट उतार दिया गया, में पिछले कुछ समय से ईसाईयों और मुसलमानों पर हमले हो रहे हैं। म्यांनमार में बौद्ध धर्म के नाम पर प्रतिगामी राजनैतिक ताकतें गरीब रोंहिग्या मुसलमानों पर हमले कर रही हैं।
यहां हम यह साफ करना चाहेंगे कि धर्म और धर्मनिरपेक्षता में कोई विरोधाभास नहीं है। पुस्तक के लेखक को यह बात स्पष्ट करनी चाहिए थी। समाज के धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया से पुरोहित वर्ग की भूमिका लोगों के व्यक्तिगत जीवन तक सीमित हो गई परंतु इससे न तो धर्म समाप्त हुआ और ना ही ईश्वर। अब समाज में समृद्धि बढ़ने के साथ अधिकाधिक लोगों की सुरक्षित जीवन पानेे के लिए ईश्वर का सहारा लेने की आवश्यकता कम होती जा रही है। दक्षिण एशियाई देश इस दौरान एक जटिल प्रक्रिया से गुजरे। जहां एक ओर अत्यंत धार्मिक और ईश्वर में विश्वास करने वाले महात्मा गांधी और मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे लोगों ने धर्मनिरपेक्ष राज्य की वकालत की वहीं जिन्ना-जो न नमाज पढ़ते थे और न रोजे रखते थे-ने इस्लाम के नाम पर अलग देश बनाने के आंदोलन का नेतृत्व किया और नास्तिक सावरकर ने हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को आकार दिया।  हिन्दूवादी राजनीति के कई बड़े नेता अपने निजी जीवन में धार्मिक नहीं हैं परंतु राजनीति के क्षेत्र में वे धर्म और ईश्वर के नाम पर जुनून पैदा करने में सिद्धहस्त हैं।
हमारी तो इच्छा यही है कि लेखक की भविष्यवाणी सही सिद्ध हो और हम आशा करते हैं कि यह प्रक्रिया केवल पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं रहेगी। यह समझना महत्वपूर्ण है कि धार्मिकता का तेजी से बढ़ता प्रभाव, दरअसल, सामाजिक असुरक्षा का प्रकटीकरण है जिसका उपयोग यथास्थितिवादी राजनैतिक नेता यह सुनिश्चित करने के लिए कर रहे हैं कि सामाजिक संसाधनों के समाज के कमजोर वर्गों में समान वितरण की प्रक्रिया को बाधित किया जा सके। आज के भारत में हम दो राजनैतिक ताकतों के बीच चल रहे संघर्ष को स्पष्ट देख सकते हैं। एक ओर वे ताकतें हैं जो पूरे समाज के कल्याण की हामी हैं तो दूसरी ओर वे हैं जो धार्मिक आधार पर पूरे समाज का धु्रवीकरण करना चाहती हैं। दूसरी श्रेणी की राजनैतिक ताकतों का   आधार असुरक्षा के भाव से ग्रस्त मध्यम वर्ग में है और उन्हें बड़े औद्योगिक घरानों का समर्थन प्राप्त है। इस संघर्ष को देखकर कबजब मन में अत्यंत निराशा का भाव उत्पन्न होता है और ऐसा लगता है कि क्या कभी वह दिन आएगा जब दक्षिण एशिया में राजनीति के क्षेत्र को ईश्वर व धर्म से मुक्ति मिल सकेगी और फोकस संसाधनों के समान वितरण पर हो सकेगा। मोदी- भाजपा और उनकी जैसी अन्य शक्तियां जिस आर्थिक प्रगति की बात कर रही हैं उसमें समाज के  सभी वर्गों की उन्नति शामिल नहीं है। प्रगति की असली परिभाषा यही है कि वह समाज के सभी वर्गों के जीवन को बेहतर बनाए। साम्प्रदायिक ताकतों के विकास के खोखले दावों का पर्दाफाश करना आवश्यक है और उतना ही आवश्यक है ऐसी प्रगति पर जोर देना जिसमें समानता हो और जिसमें धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों की भलाई के लिए सकारात्मक कार्यक्रमों का समावेश हो। इसके साथ ही, यह भी आवश्यक है कि अंधधार्मिकता और धर्म के नाम पर राजनीति के खिलाफ मोर्चा खोला जाए।
पश्चिमी राष्ट्रों में भी समृद्धि और  प्रगति के फल समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंुच रहे हैं परंतु कम से कम ये देश धार्मिक पहचान की राजनीति से मुक्त हैं, जिसने दक्षिण और पश्चिम एशिया को अपने खूनी पंजे में जकड़ रखा है। यह पुस्तक हमें आशा का संदेश देती है। हम उम्मीद करते हैं कि इस पुस्तक की भविष्यवाणी उन देशों के मामले मंे भी सही सिद्ध होगी जिनमें धार्मिक पहचान की राजनीति, मानवाधिकारों की अवधारणा को कुचल रही है और समाज के दमित और वंचित तबकों के समक्ष अस्त्तिव का संकट खड़ा कर रही है। 


-राम पुनियानी

सोमवार, 5 अगस्त 2013

इंडिया फर्स्ट या उच्च जातियों का कुलीन वर्ग फर्स्ट ?

साम्प्रदायिक बनाम छद्म धर्मनिरपेक्षता


भाजपा अपनी हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति की आकर्षक पैकेजिंग करने के लिए, एक बार फिर धर्मनिरपेक्षता को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास कर रही है। हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति का आधार है अल्पसंख्यकों - विशेषकर मुसलमानों व ईसाइयों - को बदनाम करना। इन दोनों समुदायों का दानवीकरण, इस उद्देश्य से किया जाता है कि बहुसंख्यक समुदाय का कम से कम एक तबका, इस दुष्प्रचार पर यकीन करने लगे कि अल्पसंख्यक समुदाय उसके लिए बड़ा खतरा है। जाहिर है कि असल में इस खतरे का कोई अस्तित्व नहीं होता। बहुसंख्यक समुदाय के इन आशंकित और भयग्रस्त लोगों का इस्तेमाल, एकाधिकारवादी व दमनकारी संस्कृति को, राज्य के जरिए, देश पर लादने के लिए किया जा सकता है। यह संस्कृति केवल आर्थिक व सामाजिक उच्च वर्ग को लाभान्वित करती है। हिन्दू राष्ट्रवादी, वर्षों से ईसाइयों व मुसलमानों पर वही घिसेपिटे आरोप लगाते आ रहे हैं। ईसाइयों के बारे में उनका कहना है कि वे लोभ-लालच व भय के जरिए, बड़ी संख्या में हिन्दुओं को ईसाई बना रहे हैं (यह इस तथ्य के बावजूद कि भारत की आबादी में ईसाइयों का प्रतिशत, सन् 1971 के 2.6 से घटकर सन् 2001 में 2.3 रह गया है)। मुसलमानों पर वे आतंकवादी होने का आरोप लगाते हैं (यह ‘स्वामी’ असीमानंद के इकबालिया बयान व ‘साध्वी’ प्रज्ञा सिंह ठाकुर व अन्यों पर आतंकी हमले अंजाम देने के आरोपों के बावजूद)। वे यह भी कहते हैं कि मुसलमानों की भारत के प्रति वफादारी संदिग्ध है, यह कि मुसलमान हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के प्रति अधिक वफादार हैं व यह कि पाकिस्तान व आईएसआई, भारतीय मुसलमानों का इस्तेमाल, भारत को अस्थिर करने और यहां आतंकी वारदातें करने के लिए करता है। यह भी कहा जाता है कि मुसलमान विघटनकारी हैं, उनमें बहुपत्नी प्रथा का प्रचलन है, जिसके कारण उनकी आबादी तेजी से बढ़ रही है, यह कि वे पड़ोसी बांग्लादेश व पाकिस्तान से बड़े पैमाने पर भारत में घुसपैठ कर रहे हैं व यह कि मुस्लिम शासकांे ने हिन्दू धर्म का नाश करने के लिए हिन्दू मंदिरों को ढहाया था।
अल्पसंख्यकों के दानवीकरण से राज्य को असीमित शक्तियों से लैस करना आसान हो जाता है। राज्य अक्सर इन शक्तियों का बेजा इस्तेमाल करता है और उसके सुरक्षा तंत्र से पारदर्शिता गायब हो जाती है। इससे पूंजीपतियों को  श्रमिकों, किसानों, भूमिहीनों, दलितों आदिवासियों, महिलाओं व समाज के अन्य वंचित वर्गों की कीमत पर, प्रोत्साहन देना आसान हो जाता है। राज्य का सुरक्षातंत्र, वंचित वर्गों को आतंकित रखने के काम आता है। आशंकित और भयग्रस्त वंचित वर्ग, ‘राज्य की सुरक्षा’ के नाम पर अपने प्रजातांत्रिक अधिकारों को समर्पित कर देता है - उन अधिकारों को, जिनका इस्तेमाल वह अपने सामूहिक हितों की रक्षा करने के लिए कर सकता था। हिन्दू राष्ट्रवाद का एक लक्ष्य यह भी है कि बहुसंख्यक समुदाय के सदस्यों, विशेषकर निचले तबके को, प्राचीन हिन्दू गौरव के नाम पर जाति-आधारित सामंती गुणानुक्रम व परम्पराओं से चिपके रहने के लिए प्रेरित किया जाए। दरअसल, वे एक एकाधिकारवादी राज्य की स्थापना करना चाहते हैं, जिसमें अल्पसंख्यकों को दबाकर रखा जायेगा। इसे वे ‘सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता’ बताते हैं। दूसरी ओर, भाजपा, कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता को ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ बताती है और कहती है कि वह ‘अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण’ के अतिरिक्त कुछ नहीं है। अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के आरोप से भाजपा का मतलब यह है कि कांग्रेस, अल्पसंख्यकों के उतने खिलाफ नहीं है, जितनी कि वह है।
मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने के मामले में कांग्रेस का रिकार्ड भी कोई बहुत अच्छा नहीं रहा है। आजादी के बाद से अब तक भारत में साम्प्रदायिक दंगों में 40,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें से अधिकांश अल्पसंख्यक समुदाय से थे। दंगों के दोषियों को बहुत कम मामलों में सजा मिल सकी है। कांग्रेस के राज में हुए दंगों में शामिल हैं - जबलपुर (1961), अहमदाबाद (1969 व 1984), भिवण्डी (1970 व 1984), नेल्ली (1983), सिक्ख-विरोधी दंगे (1984), भागलपुर (1989), मुरादाबाद व गोधरा (1981), मेरठ (1987) इत्यादि। इसके अतिरिक्त, पंजाब में सिक्खों व मंुबई, हैदराबाद, दिल्ली (बाटला हाउस) व अन्य शहरों में मुसलमानों की फर्जी मुठभेड़ों में हत्या की जाती रही है। इन फर्जी मुठभेड़ों से मीडिया को अल्पसंख्यकों के चेहरे पर कालिख पोतने वाली खबरों का प्रसारण/प्रकाशन करने का मौका मिलता है, जिससे उनकी टीआरपी और बिक्री बढ़ती है। इससे आतंकवाद से मुकाबला करने के नाम पर एएफएसपीए, यूएपीए, टाडा व पोटा जैसे प्रजातंत्र-विरोधी कानून बनाना आसान हो जाता है। इन कानूनों से सुरक्षा एजेन्सियों को ढेर सारे अधिकार मिल जाते हैं और वह भी बिना किसी जवाबदेही के। अल्पसंख्यकों को वे अवसर उपलब्ध नहीं होते जो अन्य नागरिकों को होते हैं। उनके साथ शिक्षा, सरकारी नौकरियों, बैंक से मिलने वाले कर्जो, सरकारी ठेकों आदि के मामलों में किस तरह भेदभाव किया जाता है, इसका सच्चर समिति विशद दस्तावेजीकरण कर चुकी है। सुरक्षाभाव न होने, बैंकों द्वारा कर्ज देने मे आनाकानी करने, सरकारी ठेके व नौकरियां न मिलने व रहवास के इलाकों में अधोसंरचना की कमी के कारण, मुसलमान शैक्षणिक, सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से पिछड़ गये हैं। भाजपा नेतृत्व के एक हिस्से ने भी सच्चर समिति की रपट आने के बाद यह स्वीकार किया कि मुसलमानों के साथ भेदभाव होता रहा है।
अल्पसंख्यकों में व्याप्त सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए - देरी से ही सही, घोर अपर्याप्त ही सही - कांग्रेस जब भी कोई कदम उठाती है, उसे अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करने के आरोप से दो चार होना पड़ता है। कांग्रेस पर भाजपा द्वारा एक और संदर्भ  अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करने का आरोप लगाया जाता है। वह यह कि कांग्रेस, अल्पसंख्यकों को उनके पारिवारिक मसलों में पारम्परिक कानून का पालन करते रहने की इजाजत दे रही है। सच यह है कि कांग्रेस ने उच्च जातियों के श्रेष्ठि वर्ग को मुसलमानों की तुलना में कहीं अधिक तरजीह दी है। इस वर्ग के सांस्कृतिक प्रतिमानों को संपूर्ण बहुसंख्यक समुदाय पर लाद दिया गया है। इनमें शामिल हैं परिवार संबंधी नियम, गौवध निषेध व धर्मांतरण-विरोधी कानून। इनमें से कुछ कानूनों का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों को डराने-धमकाने के लिए किया जा रहा है। विहिप के सदस्यों ने कुछ पुलिस अधिकारियों के साथ मिलकर ऐसे दल गठित कर लिये हैं जिनका काम है जानवरों के परिवहन के व्यवसाय में रत अल्पसंख्यकांे से अवैध वसूली करना। यह वसूली तब भी की जाती है जब वे कोई गैरकानूनी काम नहीं कर रहे होते हैं। वसूली की राशि शनैः-शनैः इतनी बढ़ गई है कि कई मुसलमान इस व्यवसाय से बाहर हो गए हैं और उनका स्थान अन्य समुदायों के व्यक्तियों ने ले लिया है।
कांग्रेस सरकारें, उच्च जातियों के श्रेष्ठि वर्ग की संस्कृति व धार्मिक विश्वासों को, कानून के जरिए, देश के अन्य निवासियों पर लाद रही है। उदाहरण के लिए, पहले सरकार ने बाबरी मस्जिद की भूमि का अधिग्रहण किया और बाद में मस्जिद को गिर जाने दिया। इसके बाद, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बाबरी मस्जिद की भूमि को तीन बराबर भागों में बांट कर तीनों ‘पक्षकारों’ को उनका हिस्सा दे दिया। दो-तिहाई भूमि हिन्दू पक्षकारों को मिल गई जबकि जमीन के मूल मालिक को केवल एक-तिहाई हिस्सा मिला और वह भी जमीन के एक कोने में। अगर जमीन का अधिग्रहण नहीं किया गया होता और मस्जिद गिराई न गई होती तो उच्च न्यायालय इस तरह का निर्णय दे ही नहीं सकता था। कुल मिलाकर, हिन्दू राष्ट्रवादी, समाज के उस तबके, जो उच्च जाति के श्रेष्ठि वर्ग का हिस्सा नहीं है, की विविधवर्णी संस्कृति को नष्ट कर देना चाहता है और यह सुनिश्चित करना चाहता है कि राजनीति में केवल उच्च जातियों की संस्कृति का बोलबाला रहे। कांग्रेस, अल्पसंख्यकों की संस्कृति को थोड़ी अधिक तरजीह देती है और राजनैतिक रणनीति के तहत उनके प्रति कुछ नर्म रहती है। भाजपा द्वारा कांग्रेस पर  छद्म धर्मनिरपेक्षता (या अल्पसंख्यक तुष्टिकरण) की नीति अपनाने का आरोप व कांग्रेस का उसे साम्प्रदायिक पार्टी बताना, इसी संघर्ष को प्रतिबिम्बित करते हैं।
भारत पहले
नरेन्द्र मोदी, जो कि स्वयं को एक राष्ट्रीय नेता और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बतौर प्रस्तुत कर रहे हैं, ने धर्मनिरपेक्षता की एक नई परिभाषा दी है-इण्डिया फस्र्ट। रपटों के अनुसार, उन्होंने धर्मनिरपेक्षता को ‘परिभाषित’ करते हुए कहा कि ‘‘भारत की भलाई के अलावा, हमारा कोई लक्ष्य नहीं होना चाहिए और जब ऐसा हो जाएगा, तो धर्मनिरपेक्षता स्वमेव हमारी रगों में बहने लगेगी’’। इस परिभाषा से कई प्रश्न उपजते हैं। पहली बात तो यह है कि ‘भारत की भलाई’ किस में है? यदि कार्पोरेट सेक्टर देश के संसाधनों पर कब्जा कर अटूट मुनाफा कमाए, तो क्या यह देश की भलाई है? क्या ऐसी ‘प्रगति,’ जो गरीबों को न तो रोजगार दे और न सुरक्षित भविष्य, देश की भलाई है? क्या ‘स्टेण्डर्ड एण्ड पुअर’ द्वारा भारत को बेहतर रेटिंग दी जाना देश की भलाई है? क्या जीडीपी में बढ़ोत्तरी को हम देश की प्रगति का सूचक मान सकते हैं? क्या उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण के कारण, देश में अस्थाई तौर पर, ढेर सारे जोखिमों के साथ, विदेशी पूंजी आना, देश की भलाई है? या फिर देश की भलाई इसमें है कि प्रगति ऐसी हो, जिसका लाभ गरीब से गरीब व्यक्ति तक पहुंचे, विकास स्थाई हो और वंचित वर्गों के जीवनस्तर को बेहतर बनाया जाए। यद्यपि मोदी इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देते परन्तु उनकी प्राथमिकताएं इतनी स्पष्ट हैं कि उनके उत्तर क्या होंगे, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। शायद मोदी ‘इण्डिया फस्र्ट’ के नारे के जरिए यह कहना चाहते हैं कि ‘‘सब से गरीब फस्र्ट नहीं, जिसके साथ भेदभाव होता हो, वह फस्र्ट नहीं, पिछड़े क्षेत्र फस्र्ट नहीं, सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग फस्र्ट नहीं, आर्थिक प्रगति के विस्थापित फस्र्ट नहीं, कमजोर, फस्र्ट नहीं’’। क्योंकि अगर इन वर्गों को प्राथमिकता दी जाती है, फस्र्ट रखा जाता है, तो ‘स्टेण्डर्ड एण्ड पुअर’, भारत की रेटिंग को नहीं बढ़ायेगा और ना ही जल्दी से जल्दी ढेर सारा मुनाफा कमाने के लिए कुछ भी करने को तत्पर विदेशी धनकुबेर, भारत में पूंजी निवेश करेंगे।
भाजपा की ‘सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता’
धर्मनिरपेक्षता से क्या आशय है, इस विषय पर बहस जारी है और हर देश, धर्मनिरपेक्षता के अपने अपने संस्करण को लागू कर रहा है। परन्तु धर्मनिरपेक्षता पर कोई स्कूली पाठ्यपुस्तक पढ़ने से भी यह साफ हो जायेगा कि धर्मनिरपेक्षता की सभी परिभाषाओं में कुछ बातें समान हैं। जैसे, राज्य धार्मिक संस्थाओं, धर्मग्रन्थों व धार्मिक शिक्षा  से दूरी बनाए रखेगा और किसी धार्मिक गतिविधि पर अपने संसाधन खर्च नहीं करेगा। परन्तु भाजपा की केन्द्र व राज्य सरकारों के कार्यकलापों से यह साफ है कि भाजपा, धर्मनिरपेक्षता की इस न्यूनतम परिभाषा को भी स्वीकार नहीं करती। जब भाजपा केन्द्र में सत्ता में थी, तब तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने वैदिक ज्योतिष विज्ञान, कर्मकाण्ड और योग चेतना आदि को उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाने का प्रस्ताव किया था। क्या अब भारत के विश्वविद्यालयों से हिन्दू पंडित पढ़कर निकलेंगे? अगर आप वेद पढ़ाते हैं तो आप सकारात्मक धर्मनिरपेक्षतावादी हैं। परन्तु यदि आप कुरान या बाईबिल पढ़ाते हैं तो आप छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने स्कूलों में गीता की पढ़ाई शुरू की है और वह सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों पर सभी धार्मिक समुदायों के बच्चों को योग व सूर्यनमस्कार सिखाने और सरस्वती वंदना का गायन करवाने के लिए दबाव डाल रही है। राज्य भाजपा सरकार ने एक योजना शुरू की है जिसके अन्तर्गत वरिष्ठ नागरिकों को सरकारी खर्च पर भारत के विभिन्न तीर्थस्थलों की  यात्रा करवाई जाती है। एकाध को छोड़कर ये सभी तीर्थस्थल हिन्दू हैं इसलिए कोई मुस्लिम बुजुर्ग शायद ही इस योजना का लाभ उठायेगा। अगर हज यात्रियों को अनुदान दिया जाता है तो यह अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण है परन्तु यदि सरकारी खर्च पर हिन्दुओं को उनके तीर्थस्थलों की यात्रा करवाई जाती है तो यह सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता है? हम हाजियों को दिये जाने वाले अनुदान की निंदा करते हैं। और उतनी ही निंदा हम राज्य द्वारा किसी भी व्यक्ति की धार्मिक आस्थाओं पर किये जाने वाले खर्च की भी करते हैं।
भाजपा की यह मांग रही है कि देश में ऐसे कानून बनाए जाएं जिनसे धर्मांतरण पर राज्य का नियंत्रण स्थापित हो सके। परंतु इसके साथ ही, हिन्दू राष्ट्रवादी कंधमाल जिले में ईसाईयों को जबरदस्ती हिन्दू बना रहे हैं। सन् 2007-08 की ईसाई-विरोधी हिंसा के पीडि़तों को राहत शिविरों में रहने पर मजबूर थे। वे न तो अपने गांव लौट सकते थे, न अपनी जमीन पर खेती कर सकते थे और ना अपने मकानों का पुनर्निमाण कर सकते थे, जब तक कि वे हिन्दू बनने के लिए राजी न हो जाएं। उनपर कड़ी शर्तें लागू की गईं थीं। उन्हें अपने सिर मंुंडवाने होते थे, पूर्व में ईसाई धर्म का पालन करने के लिए भारी जुर्माना चुकाना पड़ता था और यह वायदा करना होता था कि यदि ‘गांव‘ ईसाईयों पर हमला करने का निर्णय करेगा तो वे हमलावरों में शामिल होंगे। जहां किसी भी अन्य धर्म से जबरदस्ती हिन्दू बनाने को ‘घरवापसी‘ कहा जाता है वहीं अपनी इच्छा से ईसाई या मुसलमान बनने वाले व्यक्ति के बारे में यह आरोप लगाया जाता है कि उसका धर्मपरिवर्तन लालच देकर या डरा-धमकाकर कराया गया है।  हिन्दू धर्म त्यागकर इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने की हर घटना का का विरोध होता है।  ऐसे अधिकांश लोग हिन्दू धर्म की दमनकारी जाति व्यवस्था के शिकार होते हैं और उन्हें यह उम्मीद होती है कि उनके नए धर्म में उन्हें गरिमा और बराबरी का दर्जा प्राप्त होगा। स्वैच्छिक धर्मांतरण के अन्य कारण भी हैं जिन पर हम यहां चर्चा नहीं करना चाहेंगे। भाजपा शासनकाल में राजस्थान की सरकार ने एक कानून बनाया, जिसमें यह प्रावधान था कि अपने पूर्वजों के धर्म (अर्थात हिन्दू) को अपनाने को धर्मांतरण नहीं माना जाएगा। मोदी राज में गुजरात विधानसभा ने राज्य के धर्मांतरण-विरोधी कानून को संशोधित करते हुए एक विधेयक पारित किया, जिसके अनुसार सिक्ख, बौद्ध, जैन और हिन्दू धर्म में आपसी धर्मांतरण का कोई नियमन नहीं किया जाएगा क्यांेकि सिक्ख, बौद्ध और जैन अलग धर्म नहीं है वरन् हिन्दू धर्म के पंथ हैं। गुजरात और राजस्थान दोनों सरकारों द्वारा पारित बिलों को वहां के राज्यपालों ने स्वीकृति नहीं दी और उन्हें राष्ट्रपति को अग्रेषित कर दिया। ‘इंडिया फस्र्ट‘ ब्रांड की धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह है कि ईसाईयों को जबरदस्ती हिन्दू बनाया जा सकता है परंतु दलितों को ईसाई धर्म या इस्लाम अपनाने का अधिकार नहीं है। व यह भी कि नागरिकों को उनकी पसंद का धर्म मानने की स्वतंत्रता देना, अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण और राष्ट्र-विरोधी गतिविधि है।
देश में गौवध निषेध कानून कड़े, और कड़े बनते जा रहे हैं और भाजपा-शासित प्रदेशों में उनका इस्तेमाल, अल्पसंख्यकों का दमन करने के लिए हो रहा है। मध्यप्रदेश सरकार ने गौवध निषेध कानून में परिवर्तन कर, अपराधियो को सात वर्ष तक के कारावास से दंडित किए जाने का प्रावधान कर दिया है और स्वयं को निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी आरोपी पर डाल दी गई है। इस तरह के अपराधों में अब जमानत नहीं मिलेगी। पुलिस को यदि संदेह हो कि किसी घर में गौमांस पकाया जा रहा है तो वह रसोईघर में घुसकर बर्तन, खाना पकाने व उसे संग्रहित करने (अर्थात रेफ्रिजेटर इत्यादि) के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरण आदि जब्त कर सकेगी। यह कानून भेदभावपूर्ण और अल्पसंख्यक-विरोधी है। इसका इस्तेमाल अल्पसंख्यकों का दमन करने के लिए किया जा रहा है। गौवध निषेध कानून का केवल एक आधार है-उच्च हिन्दू जातियों की धार्मिक आस्था। आखिर राज्य को क्या अधिकार है कि वह यह तय करे कि देश के नागरिक क्या खाएं और क्या नहीं। और यहां तक कि उनके रसोईघरों में घुसकर, धर्म-आधारित विचारधारा को जबरदस्ती उनपर लादे। इसी तर्ज पर जैनी यह मांग कर सकते हैं कि सरकार को प्याज और लहसुन पर प्रतिबंध लगाना चाहिए और मुस्लिम यह कह सकते हैं कि देश में सुअर का मांस नहीं बिकना चाहिए।

अगर जैनियों और मुसलमानों के धार्मिक विश्वासों को नागरिकों के खानपान पर नियंत्रण का आधार नहीं बनाया जाता तो फिर उच्च जातियों के हिन्दुओं की धार्मिक आस्थाओं को अन्य नागरिकों पर क्यों लादा जाना चाहिए? क्या यह इंडिया फस्र्ट है या उच्च जातियां फस्र्ट। 
नैतिक पुलिस
हिन्दू राष्ट्रवादियों ने एम एफ हुसैन की चित्र प्रदर्शनियों में इस आधार पर तोड़फोड़ की कि वे नागरिकों की धार्मिक भावनाओं को आहत करती थीं। हिंसा और मुकदमेबाजी से परेशान हो हुसैन अंततः देश छोड़कर चले गए। इसी तरह, वाराणसी में ‘वाटर‘ फिल्म की शूटिंग नहीं होने दी गई। बाल ठाकरे ने फिल्म निर्माताओं को अपनी फिल्मों के कई उन हिस्सों को हटाने पर मजबूर किया जिनसे उनके या उनकी पार्टी के हित प्रभावित हो रहे थे। यह इस तथ्य के बावजूद कि फिल्म सेंसर बोर्ड ने इन हिस्सों को अपनी स्वीकृति दी थी। हिन्दू राष्ट्रवादियों ने महिलाओं पर ड्रेस कोड लादने की कोशिश की। वे वेलेन्टाइन डे का विरोध करते हैं, पबों में महिलाओं के साथ मारपीट करते हैं और युवा लड़के-लड़कियों की पार्टियो ंमें बाधा डालते हैं।
इस सिलसिले में हम अन्य कई मुद्दों पर चर्चा कर सकते हैं, जिनमें शामिल हैं समान नागरिक संहिता के नाम पर उच्च जातियों के पारिवार-संबंधी नियमों को लादने की कोशिश। स्थान की कमी के कारण हम इन मुद्दों पर चर्चा नहीं कर रहे हैं। इंडिया फस्र्ट, असल में राजनैतिक सत्ता पाने की सीढ़ी है और पितृसत्तातमक, सामंती व ऊँचनीच को उचित ठहराने वाली उच्च जातियों की संस्कृति को अन्य भारतीयों पर लादने की कोशिश- उन भारतीयों पर जिनकी समृद्ध और विविधवर्णी सांस्कृतिक परंपराएं हैं। भारतीयों को अपनी विविधताओं के बावजूद सद्भाव के साथ रहना अच्छी तरह आता है और इस परंपरा को समाप्त करने की किसी भी कोशिश की केवल निंदा ही की जा सकती है।

-इरफान इंजीनियर

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

धर्मनिरपेक्षता: वोट आधारित या मूल्य आधारित?




हमारे देश   में आर्थिक सुधार कदाचित सबसे अधिक चर्चित विषय है। परंतु इससे शायद थोड़े ही पीछे या इसके बराबरी पर है धर्मनिरपेक्षता। जब मैं  में कहीं भी जाता हूं मुझसे या तो धर्मनिरपेक्षता के भविष्य पर बोलने को कहा जाता है या धर्मनिरपेक्षता के समक्ष उपस्थित चुनौतियों पर या फिर धर्मनिरपेक्षता के अर्थ पर। कश्मीर  से लेकर कन्याकुमारी तक और गुजरात से लेकर उड़ीसा तक मैंने पाया है कि धर्मनिरपेक्षता में आस्था रखने वाला तबका  इसके भविष्य के प्रति गंभीर रूप से चिंतित है। धर्मनिरपेक्षता के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को न तो हल्के में लिया जा सकता है और न ही लिया जाना चाहिए।
अभी हाल में मैंने पटना के ए. एन. सिन्हा इंस्ट्ीटयूट में ‘धर्मनिरपेक्षता को चुनौतियां‘ विषय पर व्याख्यान दिया। मेरे बाद दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विस्वविद्यालय से आए एक राजनीतिविज्ञानी ने भाषण दिया। उन्होंने कहा कि भारत संसदीय प्रजातंत्र के ढांचे के अंतर्गत पूंजीवादी विकास की राह पर चल रहा है। यह बदलाव का दौर है और इस दौर में कई तरह की विरोधाभासी प्रवृत्तियां उभरना स्वाभाविक है। कभी-कभी ऐसा लग सकता है कि साम्प्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता पर भारी पड़ रही है परन्तु अंततः धर्मनिरपेक्षता की विजय सुनिष्चित है। इस तर्क में कुछ सच्चाई है।
उनके अनुसार पूंजीवाद का संबंध केवल बाजार और उत्पादित वस्तुओं की बिक्री से होता है। पूंजीवाद का किसी धार्मिक या नस्लीय समूह से कोई लेना-देना नहीं होता। यह सच है कि बाजार को इससे कोई मतलब नहीं रहता कि खरीददार हिन्दू है या मुसलमान, असमिया है या बंगाली। परंतु यह केवल तब तक सही है जब तक कि आर्थिक विकास, मानवीय वैचारिक हस्तक्षेप के बिना हो रहा हो। परंतु हम जानते हैं कि असल में ऐसा होता नहीं है। व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक, धर्मनिरपेक्षता के विरोध में षक्तिषाली वैचारिक हस्तक्षेप होता रहता है। यह परिवार में होता है, स्कूलों और कालेजों में होता है और सामाजिक-राजनैतिक दुनिया में भी होता है।
इस वैचारिक हस्तक्षेप में कई कारणों से वृद्धि हुई है। इनमें से एक महत्वपूर्ण कारण है राजनीति। हम सब जानते हैं कि हिन्दुत्व की विचारधारा में यकीन रखने वाला एक राजनैतिक दल, जोकि सन् 1950 के दशक में 4 प्रतिषत मत पाने के लिए भी तरसता था, 1990 के दषक के अंत तक 29 प्रतिषत मत पाने की स्थिति में आ गया। यह सही है कि इस दल की ताकत में बढ़ोत्तरी का सिलसिला रूक गया है परंतु ऐसा सिर्फ राजनैतिक अर्थ मंे हुआ है। इस दल की विचारधारा को आज भी व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त है। इस विरोधाभास को स्पष्ट करना आवष्यक है।
कोई व्यक्ति किस पार्टी या व्यक्ति को मत देता है इसका निर्धारण कई कारकों से होता है। इनमें षामिल हैं जाति, धर्म, भाषा, विचारधारा आदि और अक्सर एक ही व्यक्ति अलग-अलग चुनावों में अलग-अलग दलों का समर्थन करता है। परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि मतदाता अधिक या कम धर्मनिरपेक्ष हो जाता है। चुनाव में उसकी पसंद बदलने के बावजूद उसकी धर्मनिरपेक्षता पर कोई असर नहीं पड़ता। धर्मनिरपेक्षता में विष्वास करने वाले केवल चन्द लोग ही विचारधारात्मक कारणों से धर्मनिरपेक्ष दलों या व्यक्तियों का समर्थन करते हैं। धार्मिक अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी व समाज के अन्य वंचित वर्ग भी धर्मनिरपेक्ष दलों का साथ देते हैं परंतु इसके पीछे विचारधारा इकम और उनकी सुरक्षा और आर्थिक उन्नति की चाहत अधिक होती है।
प्रष्न यह है कि धर्मनिरपेक्ष विचारधारा से हमारा क्या आषय है? पष्चिमी  के विपरीत भारत में धर्मनिरपेक्ष विचारधारा का विरूद्धार्थी धार्मिक विचारधारा नहीं है और न ही धर्मनिरपेक्ष का विरूद्धार्थी धार्मिक है। भारत में धर्मनिरपेक्षता का विरूद्धार्थी है साम्प्रदायिकता। अर्थात, बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय या समुदायांे ंपर राजनैतिक और आर्थिक प्रभुत्व स्थापित करना या बहुसंख्यक समुदाय की ऊँची जातियों द्वारा दलितों व अन्य कमजोर वर्गों पर अपना प्रभुत्व कायम रखना और उन्हें राजनैतिक सत्ता और आर्थिक विकास में उनका वाजिब हक पाने से रोकना। 
अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए बहुसंख्यक समुदाय की ऊँची जातियों के सदस्य समय-समय पर हिंसा करते रहते हैं और इसी कारण साम्प्रदायिक दंगे होते हैं। इस हिंसा से धार्मिक अल्पसंख्यकों और नीची जातियों के मन में घोर असुरक्षा का भाव घर कर जाता है। हिंसा का इस्तेमाल इन वर्गों को ‘ठीक करने‘ के लिए किया जाता है। बहुसंख्यक समुदाय के प्रभुत्व को औचित्यपूर्ण और स्वाभाविक बताने के लिए ऐसे मिथक फैलाए जाते हैं जिनमें बहुसंख्यक समुदाय को नायक व अल्पसंख्यक समुदायों और नीची जातियों को खलनायक सिद्ध जाता है।
हमें यह ध्यान में रखना होगा कि इन मिथकों की विष्वसनीयता तब तक कायम नहीं हो सकती जब तक कि देष में एक विषिष्ट सामाजिक-धार्मिक संस्कृति का प्रसार न हो। इस संस्कृति के निर्माण के लिए षैक्षणिक औ सांस्कृतिक संस्थाओं का इस्तेमाल किया जाता है। अगर हमें धर्मनिरपेक्ष विचारधारा को मजबूत करना है तो हमें धर्मनिरपेक्ष संस्कृति की नींव तैयार करनी होगी। परंतु हमारे देष में इस संस्कृति का घोर अभाव है। सरकारी संस्थानों में, जिन्हें पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए, धार्मिक माहौल रहता है। सरकारी कार्यालयों में कई धार्मिक उत्सव मनाए जाते हैं। कई षासकीय कार्यालयों के परिसर में मंदिर हैं। देवी-देवताओं के चित्र अनेक कार्यालयों की दीवारों पर टंगे देखे जा सकते हैं। बैंकों और यहां तक कि पुलिस थानों में यह बहुत सामान्य है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि हर व्यक्ति अपने धर्म का पालन करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है। उस पर किसी तरह की कोई रोक नहीं लगाई जा सकती। परंतु सरकारी संस्थानों में धार्मिकता का खुलेआम प्रदर्षन अगर धर्मनिरपेक्षता-विरोधी नहीं तो कम से कम गैर-धर्मनिरपेक्ष तो है ही। हमारी षिक्षा व्यवस्था भी ऐसी है जो साम्प्रदायिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देती है और महिलाओं को निचले पायदान पर रखना सिखाती है। हमारी पाठ्यपुस्तकें दलितों के खिलाफ वातावरण भी बनाती हैं। आरएसएस द्वारा संचालित षिषु मंदिरों मंे तो धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों व महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रहों को बच्चों के दिलों में बैठाने का काम खुलकर और बहुत बड़े पैमाने पर होता है। इन स्कूलों से हर वर्ष हजारों बच्चे पढ़कर निकलते हैं।
यही बच्चे अंततः सरकारी रोजगार पाते हैं। वे पुलिसकर्मी बनते हैं, षिक्षक बनते हैं और निचले स्तर के सरकारी अधिकारी भी बनते हैं। वे कानून और व्यवस्था संभालते हैं, स्कूलों मंे पढ़ाते हंै और विभिन्न सरकारी योजनाओं को लागू करते हैं। मैंने पुलिसकर्मियों की अनेक कार्यषालाएं आयोजित की हैं और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि निचले पदों पर कार्यरत पुलिसकर्मी घोर साम्प्रदायिक हैं। स्पष्टतः, अगर हम हमारे स्कूली पाठ्यक्रमों का रचनात्मक पुनरावलोकन करें तो हम धर्मनिरपेक्षता को एक मजबूत सामाजिक आधार दे सकते हैं। परंतु दुर्भाग्यवष, पाठ्यपुस्तकंे लिखने वाले तक साम्प्रदायिक विचारधारा से ग्रस्त रहते हैं और इसी संस्कृति को समाज में फैलाते हैं।
समानता, मानवीय गरिमा और लैंगिक बराबरी-धर्मनिरपेक्ष संस्कृति के आवष्यक अंग हंै। हमारी स्कूली पाठ्यपुस्तकों में इन मूल्यों पर जोर देना तो दूर रहा उनकी चर्चा तक नहीं होती। हमारे संवैधानिक मूल्यों और प्रावधानों के बाद भी भारतीय समाज में आज भी ऊँचनीच और भेदभाव का बोलबाला है। जवाहरलाल नेहरू, षिक्षा व्यवस्था के जरिए देष में वैज्ञानिक सोच का विकास करना चाहते थे परंतु हमारी षिक्षा व्यवस्था तो संकीर्ण मानसिकता की वाहक बनकर रह गई है।
बच्चों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने के लिए षायद ही कोई प्रयास हुए हों। यह काम आसान नहीं है, विषेषकर छोटे षहरों और गांवों में। परंतु बड़े षहरों के प्रतिष्ठित स्कूलों तक में इस दिषा में कुछ नहीं किया गया है। इन स्कूलों में अधिकांषतः सामाजिक-आर्थिक उच्च और मध्यम वर्गों के बच्चे पढ़ते हैं और इन स्कूलों का एकमात्र उद्धेष्य इन बच्चों को ऐसे व्यावसासिक पाठ्यक्रमों में प्रवेष के लिए तैयार करना होेता है, जिनसे वे अधिक से अधिक पैसा कमा सकें। विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों व वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने का कोई प्रयास इन मंहगे व प्रतिष्ठित स्कूलों तक में नहीं किया जाता है।
इस प्रकार, दकियानूसीपन और धार्मिक संकीर्णता से भरे वातावरण और कमजोर सांस्कृतिक आधार के चलते हम यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि भारत में धर्मनिरपेक्ष संस्कृति कभी भी पल्लिवत-पुष्पित हो सकेगी। पहले से ही खराब स्थिति को और बर्बाद करते हैं हमारे राजनेता, जो चुनाव जीतने के लिए कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं। वे जाति, धर्म, भाषा और अन्य संकीर्ण पहचानों के आधार पर वोट मांगते हैं और समाज की विघटनकारी ताकतों को मजबूती देते हैं। आज की राजनीति मुख्यतः पहचान की राजनीति बनकर रह गई है।
इस पहचान का उपयोग अपने राजनैतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए करने वाले राजनेताओं के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे उन विभिन्न जाति व धर्म आधारित उत्सवों और कार्यक्रमों मंे भाग लें, जोे दिन-प्रतिदिन बड़े, और बड़े पैमाने पर आयोजित किए जा रहे हैं। स्वाभाविकतः बहुसंख्यक समुदाय के धार्मिक त्यौहारों को सबसे ज्यादा महत्व मिलता है। हर राजनैतिक दल और नेता ऐसे मौकों पर बड़े-बड़े होर्डिग और मंडप लगाता है। रमजान के दौरान राजनैतिक नेताओं और दलों में इफ्तार पार्टियां देने की होड़ सी लग जाती है।
सन् 1999 के चुनाव के पहले भाजपा और कांग्रेस में इफ्तार पार्टियों को लेकर जबरदस्त प्रतिस्पर्धा थी। दोनों दल अपनी-अपनी इफ्तार पार्टियों को दूसरेे से बड़ी और षानदार बनाने की होड़ में लगी हुई थीं। यहां तक कि रोजा अफ्तार पार्टी में कौन से व्यंजन परोसे जाएंगे यह गुप्त रखा जाता था ताकि दूसरा दल कहीं उसकी नकल न कर ले। रोजा इफ्तार पार्टियों का एकमात्र उद्धेष्य वोट कबाड़ना है। इस तरह, हमारे राजनेता यदि धर्मनिरपेक्षता का प्रदर्षन करते भी हैं तो भी उसका उद्धेष्य केवल राजनैतिक लाभ कमाना होता है। हम कह सकते हैं कि हमारी धर्मनिरपेक्षता मूल्य-आधारित नहीं वरन् वोट-आधारित है।
हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण है हमारा संविधान और उसमंे निहित मूल्य। परंतु हमारे राजनेता और उनके समर्थक संवैधानिक मूल्यों और प्रावधानों का मखौल बनाने में जरा भी संकोच नहीं करते, बषर्ते उससे उनका राजनैतिक लक्ष्य सध रहा हो। संकीर्ण पहचानों के आधार पर समर्थन या मत मांगना भी अंसवैधानिक है परंतु जैसा कि पहले कहा जा चुका है, हमारे लगभग सभी राजनेता संकीर्ण पहचानों के आधार पर ही वोट मांगते हैं और चुने जाते हैं।
यह सही है कि मुसलमान और कुछ अन्य समुदाय और जातियां षैक्षणिक और आर्थिक उन्नति की दौड़ में पीछे छूट गई हैं। परंतु इन समुदायों की भलाई के लिए चुनाव के ठीक पहले योजनाओं की घोषणा करना भी असंवैधानिक कहा जाएगा। इससे भाजपा और अन्य साम्प्रदायिक दलों को यह कहने का मौका भी मिल जाता है कि अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण किया जा रहा है। चुनाव के पहले इन समुदायों की भलाई के लिए लंबी-चैड़ी घोषणाएं करने की बजाए सरकारांें को यह कोषिष करनी चाहिए कि आरक्षण व अन्य सकारात्मक कदमों के जरिए ये समुदाय स्वयं ही पिछड़ेपन से बाहर आएं। धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दलों को भारत की स्वतंत्रता के बाद से ही इस दिषा में कोषिष करनी चाहिए थी। अगर ऐसा किया गया होता तो अब तक अल्पसंख्यकों का षैक्षणिक और आर्थिक स्तर इतना बढ़ चुका होता कि न तो उनको बरगलाया जाना संभव होता और न ही उनका हौव्वा बनाकर वोट लेना।
मूल्य आधारित धर्मनिरपेक्षता और मत आधारित धर्मनिरपेक्षता में जमीन-आसमान का फर्क है और अब समय आ गया है कि हम मूल्य आधारित धर्मनिरपेक्षता को अपनाएं।
 
-डा असगर अली इंजीनियर

बुधवार, 22 अगस्त 2012

दो पड़ोसी और अल्पसंख्यक

भारत और पाकिस्तान ये दोनों पड़ोसी सन 1947 के अगस्त महीने के मध्य में स्वतंत्र हुए थे। आज, स्वतंत्रता के 65 साल बाद, इन दोनों देशों में अल्पसंख्यकों की क्या स्थिति है? बेहतर प्रजातंत्र की स्थापना के लिए इस प्रश्न का उत्तर जानना महत्वपूर्ण होगा।
विगत 11 अगस्त को मुंबई के आज़ाद मैदान में 50,000 से अधिक लोग इकठ्ठा हुए। इनमे से अधिकांश मुसलमान थे और वे म्यानमार और असम में मुसलमानों के खिलाफ हो रही हिंसा पर अपना विरोध जताने के लिए जुटे थे। सभा में कुछ उत्तेजक पोस्टर प्रदर्शित किये गए और भडकाऊ भाषण हुए। इसके बाद, भीड़ हिंसक हो गयी और उसने मीडिया को अपना निशाना बनाया। यह इसलिए किया गया क्योंकि श्रोताओं का ख्याल था कि मीडिया ने असम के उन मुसलमानों की बदहाली को पर्याप्त तरजीह नहीं दी, जो कि जुलाई में वहां बोडो और मुसलमानों के बीच भड़की हिंसा के कारण विस्थापित हो गए हैं। असम में हुई हिंसा में 70 लोग मारे जा चुके हैं और 4 लाख से अधिक मुसलमान और बोडो अपने घरबार छोड़ कर शरणार्थी शिविरों में शरण लेने पर मजबूर हो गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम में असम सरकार की भूमिका निहायत शर्मनाक रही है।
मुंबई में भीड़ ने कुछ ओ़बी़ वैनो को आग के हवाले कर दिया। हिंसक भीड़, पुलिसकर्मियों से भी भिड़ गई। महिला पुलिसकर्मियों के साथ अश्लील व अशालीन व्यवहार किया गया व पुरूष पुलिसवालो के साथ मारपीट हुई। हिंसा पर नियंत्रण पाने के लिये पुलिस को गोलीचालन करना पड़ा जिसमें दो युवक मारे गये। भीड़ और पुलिस के बीच हुई भिडं़त में कई पुलिसकर्मी भी घायल हुए। रैली की आयोजक, रज़ा अकादमी, ने हिंसा के लिये माफी मांगी है और कहा है कि भीड़ में कुछ अवांछित व असामाजिक तत्व घुस आये थे। परन्तु आयोजक इस त्रासदी के लिये अपनी जिम्मेदारी से बच नही सकते। किसी भी विरोध प्रदर्शन का पूरी तरह प्रजातांत्रिक और अहिंसक होना आवश्यक है। आम सभाओं में दिये जाने वाले भाषणों में संतुलित भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए। घृणा फैलाने वाली और भड़काऊ बाते करने की इज़ाज़त किसी को नही दी जा सकती।
उसी हफ्ते में यह खबर आयी कि करीब 300 हिन्दू, पाकिस्तान की सीमा लांघ कर भारत आ गये हैं। वे तीर्थ यात्रा के लिये भारत आये थे परन्तु उनमें से कई ने कहा है कि वे वापिस नही जायेंगे क्योंकि पाकिस्तान में वे स्वयं को सुरक्षित महसूस नही करते। इनमें से अधिकांश हिन्दू, सिंध व बलूचिस्तान से हैं। ऐंसी खबरें हैं कि पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर उन्हें जबरन मुसलमान बनाने का सिलसिला जारी है। ऐसा भी कहा जा रहा है कि पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे के नागरिकों के तरह जीना पड़ रहा है। पाकिस्तान में जिन धार्मिक अल्पसंख्यकों का दमन हो रहा है, उनमें हिन्दू, सिक्ख और ईसाईयों के अतिरिक्त शिया और अहमदिया भी शामिल हैं।
स्वतंत्रता के समय, हमने प्रजातांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनने का संकल्प लिया था। आज, 65 वर्ष बाद स्थिति क्या है। भारत तो धर्मनिरपेक्षप्रजातांत्रिक राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया ही था पाकिस्तान जिसका निर्माण इस्लाम के नाम पर भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम बहुल इलाकों को मिला कर किया गया था की नींव भी धर्मनिरपेक्ष सिद्घांतों पर रखी गई थी। मोहम्मद अली जिन्ना का 11 अगस्त 1947 का प्रसिद्ध भाषण इस तथ्य को रेखांकित करता है। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान में राज्य का धर्म से कोई लेनादेना नही होगा और लोग मस्जिदो, मंदिरो, चर्चों या जहाँ भी चाहें वहां ईश आराधना के लिये जाने को स्वतंत्र होंगे। उन्होंने कहा था कि धर्म, नागरिको का व्यक्तिगत मसला है जिससे राज्य को कोई मतलब नही होगा। उन्होंने यह भी कहा था कि पाकिस्तान के झंडे में सफेद रंग अल्पसंख्यकों का प्रतीक है। परन्तु तथ्य यह है कि पाकिस्तान का संपूर्ण तंत्र सांप्रदायिक था। जिन्ना ने अपने भाषणों में चाहे जो भी कहा हो परन्तु पाकिस्तान के निर्माण का आधार वहां के सामंती तत्व थे और उनका नज़रिया बिल्कुल स्पष्ट था। शनै:शनै: पाकिस्तान का सांप्रदायिकीकरण होता गया और सन 1970 के दशक के अंत तक, वहां ज़िया उल हक़ और मौलाना मौदूदी जैसे लोगों का बोलबाला हो गया। मुल्ला, समाज के नेता बन गए और मुल्लामिलिट्री गठबंधन, जिसे अमेरिका का पूरा समर्थन प्राप्त था और जिसकी मर्जी पाकिस्तान में चलती थी, ने जिन्ना के भाषण के परखच्चे उड़ा दिये। यहां तक कि शिया और अहमदिया जैसे मुस्लिम अल्पसंख्यकों को भी पाकिस्तान में भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है और धार्मिक असहिष्णुता के चलते, राजनीति में उनका दखल बहुत कम हो गया है।
दूसरी ओर, भारत में गांधी और नेहरू जिन्होंने कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के मूल्यों को ग़ा था की धर्मनिरपेक्षता के प्रति संपूर्ण और अडिग प्रतिबद्धता थी। गांधी, धर्मप्राण हिन्दू थे तो नेहरू नास्तिक, परन्तु उन दोनो का यह स्पष्ट विचार था कि राज्य को सभी धमोर्ं के लोगो को बराबरी की नजर से देखना चाहिये और आस्था से संबंधित मुद्दों की राज्य के नीति निर्धारण में कोई भूमिका नही होनी चाहिए। इस नीति को लागू करने में नेहरू को दो तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा। पहली यह कि यद्यपि भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष था तथापि समाज पर धार्मिकता का गहरा रंग च़ा हुआ था। इससे धर्मनिरपेक्ष नीतियों को पूरी तरह लागू करने में समस्या आई। दूसरी, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में आस्था रखने वाली कांग्रेस में कई सांप्रदायिक तत्वों ने घुसपैठ कर ली थी। इस सिलसिले में नेहरू द्वारा कई बार चेतावनियां दी गइंर परन्तु उन पर पार्टी के नेताओं ने कोई ध्यान नही दिया और नतीजतन कुछ वषोर्ं बाद, कांग्रेस के कुछ नेताओं और साम्प्रदायिक संगठनो के कर्ताधर्ताओं के बीच कुछ खास अंतर नहीं बचा।
किसी भी देश में प्रजातंत्र की सफलता का मानक होता है वहां अल्पसंख्यकों को प्राप्त सुरक्षा और बराबरी का दर्जा। पिछले तीन दशकों में कई जटिल कारणों से समाज में साम्प्रदायिक तत्वों का बोलबाला हैं। परन्तु इस मामले में पाकिस्तान में स्थिति काफी अलग हैं। पाकिस्तान की राजनीति में साम्प्रदायिक ताकतों के लिये हमेशा से जगह रही है। वहां सैनिक तानाशाहों का राज स्थापित हो जाने से फिरकापरस्त ताकतों का काम और आसान हो गया। अमेरिका के पाकिस्तान के आंतरिक मामलो में हस्तक्षेप और अमेरिका की अफगान नीति के कारण पाकिस्तान में सांप्रदायिक तत्वों की ताकत में और इजाफा हुआ।
भारत में साम्प्रदायिकता में ब़ढोत्तरी के पीछे अन्य कारण थे। इनमें शामिल हैं राजनैतिक अवसरवाद, चुनाव प्रणाली में कमियां, सांप्रदायिक ताकतों की बहुसंख्यक वर्ग के मन में अल्पसंख्यकों का डर पैदा करने में सफलता और राम मंदिर जैसे भावनात्मक मुद्दों पर राजनीति। आज यद्यपि मुसलमान कुल आबादी का केवल 13़4 प्रतिशत हैं तथापि सांप्रदायिक हिंसा का शिकार होने वालों में उनका प्रतिशत 90 से अधिक है। सभी सामाजिकआर्थिक मानकों पर मुसलमानों की स्थिति बहुत खराब है। सच्चर समीति की रिपोर्ट से यह तथ्य पूरी तरह साबित हो गया है। पाकिस्तान में हिन्दू अल्पसंख्यकों का आबादी में प्रतिशत लगातार घटता जा रहा है। सुरक्षा और सामाजिक दर्जे की दृष्टि से उनकी हालत बहुत खराब है। परन्तु किसी एक देश में अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय, किसी दूसरे देश में ऐसा ही करने का औचित्य नही बन सकता। इस तरह की प्रतिक्रियावादी सांप्रदायिकता का इस्तेमाल राजनैतिक ताकतें करती रहीं हैं। भारत में साम्प्रदायिक ताकते, हिन्दुओं के पाकिस्तान से पलायन और असम हिंसा को हिन्दुओं पर आक्रमण बताती हैं तो पाकिस्तान में भारत के मुसलमानों के खिलाफ हो रही ज्यादतियों की खबरों का इस्तेमाल वहां के हिन्दू अल्पसंख्यकों का और अधिक दमन करने के लिये किया जाता है। भारत में बाबरी मस्जिद के हाए जाने की प्रतिक्रिया स्वरूप पाकिस्तान में कई मंदिर जमींदोज़ कर दिये गये थे।
इसमें कोई दो मत नही कि धर्मनिरपेक्षता के मामले मे भारत और पाकिस्तान की स्थिति में जमीन आसमान का फर्क है। अनेक कमियों के बावजूद, धर्मनिरपेक्षप्रजातांत्रिक मूल्य आज भी भारत की व्यवस्था की नींव बने हुए हैं। हालांकि यह भी सही है कि पिछले कुछ समय से ये कमजोर होते जा रहे हैं। पाकिस्तान में तो नाममात्र का प्रजातंत्र हैं और वहां प्रजातंत्र के जड़ें पकड़ने की कोई संभावनाएं भी नज़र नही आ रहीं हैं। दोनो ही देशो में अल्पसंख्यक परेशानहाल हैं। परन्तु पाकिस्तान में उनकी हालत भारत से कहीं बदतर है।
इस सब का अंतिम नतीजा क्या होगा? साम्प्रदायिकता किसी भी देश के विकास में एक बड़ा रोड़ा होती है। समाज के कमजोर वर्गों को आगे ब़ने के मौके उपलब्ध कराने के लिये सकारात्मक कदम उठाये जाना आवश्यक है। उन्हें सुरक्षा और आगे ब़ने के अवसर मुहैय्या कराये जाने चाहिये। हमें हमारे स्वाधीनता आंदोलन के स्वतंत्रता, बंधुत्व और समानता के मूल्यों को याद रखना होगा। भारत में हमारी सामाजिक और राजनैतिक आवश्यकताओं के अनुरूप, चुनाव प्रणाली में व्यापक परिवर्तन किये जाने की आवश्यकता है। सांप्रदायिक हिंसा और अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव से न केवल हमारे राष्टी्रय हितो को नुकसान पहुंचता है वरन ये मानवता के विरूद्ध भी हैं। हमें इन प्रवॢत्तियों को रोकना होगा और उन मूल्यों को ब़ावा देना होगा जिनके कारण हम एक उदार, सहिष्णु और प्रगतिशील समाज कहे जाते हैं। पाकिस्तान को भी चाहिये कि वह जिन्ना के 11 अगस्त 1947 के भाषण में वर्णित मूल्यों को पुनर्स्थापित करे। वहां अल्पसंख्यकों का आबादी में घटता प्रतिशत और उनका देश से पलायन, पाकिस्तान के संस्थापक का घोर अपमान है।
-राम पुनियानी


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