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शनिवार, 22 अप्रैल 2017

अधिवक्ताओं को गुलाम बनाने की साजिश

भारतीय विधि आयोग द्वारा भाजपा सरकार को प्रस्तावित कानून अधिवक्ता अधिनियम 1961 में संशोधन का प्रस्ताव विदेशी कानून फर्मों को भारत में प्रवेश कराने के लिए मुखौटा है और यह भारत के बार कौंसिल और राज्य बार कौंसिल की स्वतंत्रता और स्वायत्तता को नष्ट कर देगा और स्वतंत्र अधिवक्ताओं और एक डेमोक्रेटिक बार के नागरिकों को मजबूर व गुलाम बनाने के लिए एक कठोर प्रावधान हैं।
इस देश के अधिवक्ता लॉ कमीशन ऑफ़ इंडिया द्वारा प्रस्तावित बिल के प्रावधानों को लेकर बहुत उत्तेजित हैं, जो कि भाजपा के कानून मंत्री को अधिवक्ता अधिनियम 1961 में संसोधन के लिए प्रेषित की गयी है.
आश्चर्य नहीं कि यह विधेयक भारत सरकार के विचारों को दर्शाता है जो कि हाल में कुछ जी 7 देशों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय कॉरपोरेट निकायों और वित्तीय संस्थाओं को “भारतीय कानूनी सेवाओं के बाजार" में प्रवेश करवाने के लिए हुए विधायी उपायों से प्रेरित है. जिसकी खिलाफत ढाई दशक से बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया और राज्य बार कौंसिलों और लॉयर्स एसोसिएशनों द्वारा की जा रही थी, क्योंकि इनका आगमन न्यायिक व्यवस्था पर बुरा असर डालेगा. विशेष रूप से संवैधानिक ढांचे और वैधानिक कनूनो जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों सहित आर्थिक नीति को आर्थिक रूप से नष्ट करेगी और परिणामस्वरूप भारतीय राज्य की राजनीतिक संप्रभुता को।
इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर भारत के कानून आयोग की रिपोर्ट के अध्याय XIV को पढ़ने और GATS जो कि ‘General Agreement on Trade and Services’ है,  इस रिपोर्ट के इरादे में लेस मात्र भी संदेह नही छोड़ता है कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था के विचार "पुनः-उपनिवेश" के हैं जो हमारे देश के विभिन्न क्षेत्रों को प्रवेश के लिए खोलने और इस के साथ न्याय वितरण प्रणाली को तोड़ने और कानूनी पेशे की अब तक की स्वायत्तता और लोकतांत्रिक कार्यवाही को नष्ट करना चाहती है जिसने गंभीर हस्तक्षेप के बावजूद भी पक्षपातपूर्ण कॉरपोरेट और राजनीतिक नियंत्रण से अपनी आजादी को बनाए रखा हुआ है.   
इस बिल का निष्ठुर प्रस्ताव अधिवक्ताओं को अधिवक्ताओं से जुड़े किसी महत्वपूर्ण मुद्दे या फिर सत्ता के गंभीर दुरपयोग के खिलाफ सामूहिक हड़ताल या कार्य बहिष्कार से रोकता है. यह अधिवक्ताओं को, राज्य द्वारा अधिवक्ताओं पर हिंसा, गंभीर अन्याय या न्यायपालिका में भ्रष्टाचार, जिसमें शिकायतों के बावजूद कोई उपाय नहीं किया गया है,  सामूहिक, लोकतान्त्रिक और अहिंसक कार्यवाई करने से रोकता है. प्रस्तावित बिल में लोकतान्त्रिक अधिकार को दुर्व्यवहार मानते हुए अधिवक्ताओं पर अनुशासनात्मक, दंडात्मक कार्यवाई और नुकसान की भरपाई असंवैधनिक है और अन्याय व राज्य द्वारा हिंसा के खिलाफ अधिवक्ताओं द्वारा आवाज़ उठाने के अधिकारों का उल्लंघन है. यह आश्चर्य की बात है कि लॉ कमीशन ने इसे प्राथमिकता दी है, 'स्वतंत्रता आंदोलन' की अवधि के अलावा भारत में कानूनी पेशे के इतिहास में, बहुत कम सामूहिक हड़ताल या अदालतों का बहिष्कार किया गया है और आम तौर पर एक दिन से अधिक नहीं किया गया है.
सबसे गंभीर मुद्दे जो मुकदमे और न्याय व्यवस्था झेल रही है वह अदालतों का बहिष्कार नहीं है और न ही एकल न्यायाधीश या अधिवक्ताओं का ‘दुर्व्यवहार’ है, अस्पष्ट शब्द ‘शिष्टाचार’ और ‘निषिद्ध कार्य’ या ‘ गैरकानूनी काम’ या अप्रिय व्यवहार सहित हर चीज़ या सब कुछ सम्मिलित कर जिस प्रकार की परिभाषा को  प्रस्तावित बिल में बढाया गया है. हालांकि ‘दुर्व्यवहार’, ‘शिष्टाचार’ और ‘निषिद्ध कार्य’ या ‘ गैरकानूनी काम’ या ‘अप्रिय व्यवहार’ क्या है इसकी कोई विस्तारपूर्वक परिभाषा नही दी गयी है. इसी तरह, "परिश्रम से काम न करने" के लिए अस्पष्ट संदर्भ हैं जो पेशेवर "कदाचार" की सभी व्यापक परिभाषाओं में शामिल है. इसकी परिभाषा इतनी बड़ी है कि सरकार के कामों का विरोध करने को भी ‘निषिद्ध कार्य’ माना जा सकता है, राजनीतिक संघर्षों के लिए जेल होने पर इसी तरह "गैरकानूनी" माना जा सकता है, जिसके लिए एक वकील के रूप में नामांकन करने के अधिकार से वंचित किया जा सकता है और नया संशोधन का एक और कठोर प्रावधान बार कौंसिल से इस तरह के निष्कासन के लिए कोई सीमित समय निश्चित नहीं करता है; पहली बार यह निलंबन लंबित अनुशासनात्मक कार्यवाही के लिए करता है जो शिकायत साबित होने से पहले भी हो सकता है, ऐसे व्यवसाय में जहां सामाजिक सुरक्षा या स्वास्थ्य देखभाल और पेंशन का पूर्ण अभाव है।
हमारे देश के नागरिक जिन गंभीर और पीड़ादायी समस्याओं का सामना कर रहे हैं वह अदालतों का बहिष्कार नहीं हैं या कुछ अधिवक्ताओं द्बारा किया गया दुर्व्यवहार नही है. बल्कि गंभीर देरी और हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक व्यवस्था का लकवाग्रस्त होना, पर्याप्त संख्या में न्यायधीशों और फाइलों के विशाल ढेर को संचित करने के लिए बुनियादी सुविधाओं का न होना और कुल लंबित मुकदमेबाजी के 50% से अधिक मामूली सरकारी मुकदमे, जहां सख्त अभियोग के बिना सरकार के  सचिवों द्वारा अंतहीन अपील दायर की जाती है और कुछ मामलों में तत्काल जवाबदेही या वित्तीय खर्च से बचने में रुचि रखने वाले सरकार के मंत्रियों के आग्रह पर या कुछ मामलों में अन्य कारणों के लिए न्यायालय के निर्णय के कार्यान्वयन को टालना गंभीर समस्या है।
भारतीय राज्यों और भारतीय संघ द्वारा दायर तुच्छ प्रकार के मुकदमें, पर्याप्त न्यायधीशों की कमी, उच्चतम और उच्च न्यायालयों के विभागों की शामिल कानूनी प्रक्रिया और अक्षमता जिसे सरलीकृत और सुव्यवस्थित होना चाहिए और विभागों के कर्मचारयों को उत्तरदायी तथा न्यायधीशों को बोर्डों के प्रबंधन और मामलों के निपटान में प्रशिक्षण देना चाहिए, लॉ कमीशन इन सभी मुद्दों को महत्व देकर निपटाने से बचता है. वादी और वकीलों के द्वारा ऐसी गंभीर शिकायतें हैं जिस तरह केंद्र व राज्य सरकारों के लॉ अफसर सरकारी अधिकारीयों और अधिवक्ताओं के निर्देशों पर सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के सामने तुच्छ मामलों के लिए आवेदन करते हैं और हमेशा इन स्थगन को मंजूरी देते हैं। गौरतलब है कि सरकार के कानून अधिकारी, उनका 'कदाचार', उनका 'परिश्रम से काम नहीं करना ', उनका '' अप्रिय '' और भ्रष्टाचारी व्यवहार सहित राज्यों के हितों का प्रतिनिधित्व करना , जिसमें रजिस्ट्री विभाग में मामलों में देरी कराना या मामलों को रोक कर रखना, अपील की सिफारिश करना जहाँ कोई भी अपील दायर नहीं किया जाना चाहिए, इस बिल के किसी भी प्रावधान से कहीं भी कवर नहीं किया गया है।
बार कौंसिल ऑफ इंडिया पर एक सीधा हमला है जो एक लोकतांत्रिक रूप से गठित निकाय है, जिसके लिए प्रत्येक राज्य बार कौंसिल को एक सदस्य का चुनाव करने का अधिकार है, यह प्रस्तावित है कि पूरी बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया में सिर्फ नामित सदस्य होंगे, हर राज्य बार कौंसिल उच्चतम न्यायलय में प्रतिनिधित्व करने का अपना संवैधानिक और कानूनी अधिकार खो देगी.  राज्य बार कौंसिल के सिर्फ 5 जोन नामांकन में प्रतिनिधित्व करेंगे, मतलब सिर्फ राज्य बार कौंसिल के सिर्फ एक सदस्य को 5 क्षेत्रों में समूहीकृत किया जायेगा, राज्य बार काउंसिल के केवल पांच सदस्य ही बार काउंसिल ऑफ इंडिया में प्रतिनिधित्व करेंगे, हर राज्य बार काउंसिल नहीं।
इसके अलावा प्रस्तावित विधेयक में कानून के अलावा अन्य विषयों के छह प्रख्यात व्यक्तियों को बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया में भारत के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के अपीलीय निकाय के अध्यक्ष और केंद्रीय सतर्कता आयुक्त, सुप्रीम कोर्ट के जज सदस्यीय एक समिति द्वारा नामित किया जाएगा। यह प्रखाय्त व्यक्ति विभिन्न क्षेत्रों जैसे वाणिज्य, चिकित्सा विज्ञान, प्रबंधन, सार्वजनिक मामलों और राज्य के अधिकारियों, जैसे व्यक्तियों, जो अपनी श्रेष्ठता के बावजूद कानूनी पेशे के कार्य और संगठन के बारे में कुछ नही जानते , या वादी और न्यायालयों को जरूरी सहायता की प्रकृति के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं। नामांकित सदस्य अन्य लोगों के साथ अनुशासनात्मक समितियों और कानूनी शिक्षा और कार्य की देखरेख करेंगे।
इसी तरह उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित किए जाने वाले राज्य सरकारों के अधिकारियों सहित विभिन्न क्षेत्रों के ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों को राज्य बार कौंसिलों में भी नामांकित कर पुनर्गठन की भी मांग की गई है। जबकि न्यायपालिका के सेवानिवृत्त सदस्यों के बार काउंसिल ऑफ इंडिया या स्टेट बार काउंसिल में नामांकन पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती है,  वे वरिष्ठ अधिवक्ताओं के साथ और सभी समितियों के साथ काम करने के लिए सह-चयन कर सकते हैं, क्योंकि इससे बार काउंसिल ऑफ इंडिया के कामकाज में सुधार होगा। लेकिन राज्य सरकार के अधिकारियों और व्यक्तियों को इन निकायों पर काम करने के लिए अनुमति देना भले ही वे अन्य क्षेत्रों में कितने ही प्रतिष्ठित क्यों न हो, अधिवक्ता अधिनियम 1961 के अनुरूप नहीं है और अधिनियम के उद्देश्यों और प्रयोजनों से पूरी तरह असंगत हैं।

अधिवक्ता अधिनियम 1961 में संशोधन करने के लिए लॉ कमीशन द्वारा सरकार को भेजे गए बीमार विधेयक के अन्य विचारों में से इनके मुख्य विचार से, ऐसा लगता है कि संशोधनों का वास्तविक उद्देश्य कुछ जी 7 देशों की बहुदेशीय कंपनियों के निर्देशों के अनुसार, जो पहले औपनिवेशिक शक्तियां थीं जिनके साथ हमारी वर्तमान सरकार चाटुकारिता से पूर्ण भक्तिभाव दिखा रही है, विदेशी कानून फर्मों की दखलंदाजी को भारत में प्रवेश करने की अनुमति देना है।, जो अब कानूनी सेवाओं के भारतीय ‘बाजार’ सहित अपने पूर्व उपनिवेशों के बाजारों को खोलने का हुक्म दे रही हैं। इन प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य व्यवसाय या न्याय प्रणाली या कानूनी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना नहीं है। इन संशोधनों के द्वारा कानूनी शिक्षा पहले की तुलना में अधिक विशिष्ट हो जाएगी। इन प्रस्तावों का वास्तविक उद्देश्य भारत की बार कौंसिल और राज्य बार कौंसिल की स्वायत्तता को ख़त्म कर इन निकायों को गुलाम बनाना है, लोकतांत्रिक ढंग से सदस्य के रूप में निर्वाचित अधिवक्ताओं के प्रतिनिधित्व को कमजोर करना है, कानूनी पेशे के सदस्यों को गुलामी के लिए मजबूर करना और कानूनी पेशे की स्वतंत्रता को नष्ट करना है । इस विधेयक का विरोध होना चाहिए. 
-नीलोफ़र भागवत
मोबाइल 9869014020
अनुवादक भूपेन्दर पाल  सिंह

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -11

मुम्बई शहर में जहाँ छिपी शक्तियाँ  कार्यरत हैं, हममें से कुछ लोगों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया जिसको कि वर्तमान समय मंे सर्वाधिक विध्वंसात्मक गतिविधियों में एक समझा जाता है। बिना किसी आधार के प्रोफेशनलस के चैम्बर को तलाशा गया तथा उनके टेलीफोन एवं मोबाइल को टेप किया गया। नीरा राडिया टेप्स उन लोगों की दृष्टि मंे एक प्रकार से ईश्वरीय न्याय था जिनके कम्प्यूटर को गुप्तचर एजेंसिया खगालती हैं तथा जिनके कम्प्यूटरों को ऐसे व्यक्तियों तथा अधिवक्ताओं के द्वारा खँगाला जाता है जो भारतीय कारपोरेट घरानों एवं विदेशी गुप्तचर एजेंसियों के लिए कार्य करते हैं। यद्यपि कि हमारे कार्य में नाम मात्र की भी अवैधता नहीं थी एवं हर सम्पर्क को रिकार्ड किया गया था एवं सुना गया था।
    सामाजिक रूप से यह समय व्यापक गिरावट का रहा है, क्योंकि दलितों के ऊपर जानलेवा हमला किया गया। राज्यों की पुलिस द्वारा भी शांतिपूर्वक राजनैतिक आन्दोलनों के लिए उनका दमन किया गया। क्षेत्रीय एवं   धार्मिक पहचान को राष्ट्रीय परिवेश की तुलना में ज्यादा उभारा गया। बावजूद इसके कि आधुनिकता, तकनीकी एवं वैज्ञानिक प्रगति का ढिंढोरा पीटा गया। अब संसार में राजनैतिक दलों के पास सामाजिक एवं राजनैतिक परिवर्तन के लिए कोई गंभीर आन्दोलन नहीं है। परिणाम स्वरूप यह राजनैतिक रिक्तता कारपोरेट के द्वारा विदेशों से धन प्राप्त गैर सरकारी संगठनों जैसे फोर्ड, राकफेल्लर अथवा अन्य कारपोरेट फाउन्डेशनों द्वारा भरी जा रही है। ये संगठन जिनको धन प्राप्त होता है,  प्रतिदिन भ्रष्टाचार पर लम्बा चैड़ा भाषण देते हैं एवं इसके पीछे राजनेता एवं नौकरशाहों के भ्रष्टाचार के वास्तविक स्रोत को बड़ी चतुराई से छुपाते हैं क्योंकि कारपोरेटों के द्वारा ऐसा करने की अनुमति नहीं दी जाती है। परिणाम स्वरूप, भ्रष्टाचार के विरोध में चुने हुए शब्दों का निन्दा स्वरूप प्रयोग का उद्देश्य केवल सरकार अथवा संस्था विशेष को गिराना होता है, ताकि वे बेहतर अराजकतावादी विकल्प को ला सकें। देश की राजधानी के निकट खाप पंचायतें बड़ी आजादी के साथ मौत की धमकी निर्गत करती हंै एवं ऐसे लोगों की हत्या कर देती हैं जो अन्तर्जातीय या अन्तर्धर्मी विवाह करते हैं। इस सम्बन्ध में लड़कियों की हत्या आम है।
       एक विद्वान राजनीतिज्ञ एवं आर्थिक टीकाकार जाने बेलामी फास्टर ने स्तवान मेस्जारी की पुस्तक ‘‘राजधानी की संरचनात्मक विपत्ति’’ के प्राकथन में लिखा कि वर्तमान आर्थिक विपत्ति ऐसे खतरों को सामने लाती है जो विश्व की 1929-33 की बड़ी आर्थिक मंदी से भी ज्यादा गंभीर है। यह विपत्ति पूरे विश्व में है। यह ऐतिहासिक विपत्ति है। जैसा कि 19वीं शताब्दी के सांस्कृतिक इतिहासकार जैकब बरखाई ने टिप्पणी की। उनके अनुसार ऐतिहासिक विपत्ति एक ऐसी विपत्ति है जिसमें वस्तुआंे की सभी अवस्थाओं में विपत्ति आती है एवं जिसमें सभी युग एवं सभी सभ्यताओं के सभी लोग शामिल होते हैं। ऐतिहासिक प्रक्रिया अचानक भयंकर रूप से तेज कर दी जाती है। विकास जिसमें अन्यथा सदियों लगते हैं वे महीनों या सप्ताहों मंे परछाइयों की भाँति गुजरते प्रतीत होते हैं एवं पूरे हो जाते हैं।
    हम एक ऐसे ही आर्थिक गिरावट के ऐतिहासिक युग में रह रहे हैं एवं परिणाम स्वरूप देशों की संवैधानिक एवं विधिक व्यवस्थाएँ जो अब तक प्रमुख आर्थिक शक्तियाँ समझी जाती थीं पूरी तरह ढह चुकी हैं। हमने देखा है कि आर्थिक इतिहास में सबसे बड़े बैंक एवं कारपोरेट धोखाधड़ी के परिक्षेत्र में उनकी विधिक व्यवस्थाएँ पंगु हो चुकी हैं। आश्चर्य की बात यह है कि यह वही आर्थिक राजनैतिक, संवैधानिक एवं विधिक नमूने हैं जिसका अनुकरण करने के लिए हमें उत्प्रेरित किया जाता हैं। हम यह भूल गए हैं कि हममें से एक अधिवक्ता अर्थात महात्मा गांधी ही थे जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की मुख्य धारा का नेतृत्व किया, जिसकी कई धाराएँ थी। उसी वकील ने यह इच्छा जाहिर की थी कि हम प्रजातंत्र के इस पश्चिमी राजनैतिक, आर्थिक नमूने का अतिक्रमण करें क्योंकि उन्होंने इस नमूने की प्रारम्भिक अराजकता देखी। गांधी जी कि यह इच्छा थी कि हम समाज के आर्थिक एवं सामाजिक रूप से सबसे कमजोर वर्ग के हितों को अपने नीतियों में प्रमुख स्थान प्रदान करें। डाॅ0 अम्बेडकर जो एक प्रसिद्ध वकील एवं प्रथम श्रेणी के कानूनवेत्ता थे उन्होंने हमें सचेत किया था कि बिना आर्थिक न्याय के हम प्रजातंत्र के सम्पूर्ण संवैधानिक ढाँचे को खतरे में डाल देंगे। जबकि भगत सिंह ने साम्राज्यवाद से अपने आपको स्वतंत्र रखने की आवश्यकता पर बल दिया। तीनों महानुभाव इसके खिलाफ थे कि हम अपने देश को ‘‘भूखों के गणतंत्र’’ में परिवर्तित करें।
    अभी हाल के दिनों डाॅ0 अशोक मिश्रा ने एक पुस्तक ‘‘भारतीय अर्थव्यवस्था: समस्याएँ एवं भविष्य’’ की विवेचना करते हुए यह विचार व्यक्त किया कि ‘आर्थिक उदारवाद के उन्माद ने एक खतरनाक भ्रम उत्पन्न कर दिया है, वह यह कि इतिहास का अपमान’ ’’यह एक भिन्न भारत है एवं योजना आयोग’’ जैसा कि इस समय अस्तित्व में है गरीबों को और गरीब बनाना चाहता है। यह प्रजातंत्र एवं मानवाधिकार को और अधिक विपरीत ढंग से प्रभावित करेगा। जो पहले से ही निगमोें एवं बैंकों के द्वारा शुरू किए गये विश्व व्यापार संगठन के सुधारों से कमजोर हो चुका है। सर्वोच्च न्यायालय के मशहूर जज, जस्टिस लुईस बैन्डिस ने बीसवीं सदी के प्रारम्भ में एक चिंतनीय निर्णय में कहा था कि ‘अमरीकी समाज का निगमों द्वारा गुलाम बनाना अफ्रीकी-अमरीकी समुदाय की गुलामी के समान होगा। यह हमारी मूर्खता होगी यदि हम इस चेतावनी की उपेक्षा करें। 

-नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
मो. 08009513850

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -10

सुधारों का यह समय समाज के विघटन में परिवर्तित हुआ है, हमारी आर्थिक  नीतियों को पश्चिम के प्रमुख आर्थिक केन्द्रों से जोड़ने के नतीजे में ऐसी राजनैतिक व्यवस्था उभरकर सामने आई है जहाँ अपराधीकरण बढ़ रहा है एवं जो विशिष्ट एवं कारपोरेट हितों को लाभांवित कर रहे हैं। इसका यह भी परिणाम हुआ है कि दो दशकों तक अल्पसंख्यकों के प्रति अन्याय होते रहे। साथ ही साथ इस सुधार के समय जवाबी हत्याएँ एवं बम विस्फोट होते रहे हैं जिससे कि समाज में भय एवं असुरक्षा फैल गई है। डाॅ0 विनायक सेन, जिन्होंने आदिवासियों में दीर्घ समय तक समाज सेवा की, वे नागरिक स्वतंत्रता संगठन, पी0यू0सी0एल0 के कार्यकर्ता रहे, उन्हें कुछ अन्य लोगों के साथ गलत ढंग से माओवादी कहा गया, उन पर झूठा मुकदमा चलाया गया एवं उन्हें दो वर्षों से जेल में बन्द कर दिया गया है। उनके खिलाफ यह जाँच भी शुरू की गई कि उन्होंने ‘सलवा जुडूम’ को बेनकाब किया। सलवा जुडूम जैसा कि ग्रामीण विकास मंत्रालय की सूचना है, एक प्राइवेट सेना है जिसको भारत के अग्रणी कारपोरेट घरानों से धन प्राप्त होता है। कारपोरेट घराने आदि वासियों को उनके पैतृक स्थानों से हटाना चाहते थे जिससे कि वे आदिवासियों के क्षेत्र में खनिज पदार्थों पर कब्जा कर सकें। इसी कारण वहाँ गृहयुद्ध शुरू हो गया है। सलवा जुडूम में भर्ती व्यक्तियों को राज्यद्वारा स्वीकार कर लिया गया ताकि सरकार इस अवैध पेशेवर संगठन को सम्मान प्रदान कर सके। जिसका गठन बड़े-बड़े कारपोरेट घरानों के द्वारा किया गया, ताकि वे आदिवासियों को खनिज पदार्थों से समृद्ध स्थानों से बेदखल कर सकें। इन आदिवासी नौजवानों की विशिष्ट पुलिस अधिकारी के रूप में नियुक्ति माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अवैध करार दे दी गई क्योंकि इसके माध्यम से गरीब वर्गों का एक वर्ग, गरीब वर्गों के दूसरे वर्ग की हत्याएँ कर रहा था। राजनैतिक तथा सामाजिक संगठनों के ऐसे अनेक उदाहरण है जैसे कि गांधीवादी एवं दलित आन्दोलन। सामाजिक संगठनों के पदाधिकारियों जिनको गलत एवं जानबूझकर निशाना बनाया गया है, एवं देश के अन्य भागों में माओवादी एवं नक्सलवादी कहकर गिरफ्तार कर लिया गया है ताकि वैकल्पिक शान्तिपूर्ण राजनैतिक संगठन उभरकर सामने न आ जाएँ।
    पुलिस ने इस दौरान एक वर्ग पर आधारित योजना अपनाई। उन्होंने समाज के कमजोर एवं निर्धन वर्गों, किसानों असंगठित मजदूरों एवं अल्पसंख्यकों को समाज का प्रमुख शत्रु समझा। पुलिस प्रशिक्षण  विद्यालयों एवं सिविल सेवा प्रशिक्षण केन्द्रों में इसी तरह की बातें की जाती हैं। नवीन उदारवादी, आर्थिक सुधारों के दो दशकों के दौरान शहर एवं ग्रामीण क्षेत्र कारपोरेट घरानों, पूँजीपतियों, रियल स्टेट कम्पनियों एवं ठेकेदारों के चंगुल में पूरी तरह फँस चुके हैं। इसके प्रत्यक्ष उदाहरण गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ एवं कर्नाटक हैं। कारपोरेट घरानों से जुडे़ हुए अपराधीकृत राजनैतिक समूह राज्य के अन्दर एक अन्य राज्य के रूप में कार्य करते हैं। वे प्रशासन पर पूरा नियंत्रण रखते हैं एवं राजनैतिक गतिविधियों को अपने कब्जे में रखते हैं। इस प्रकार वे नागरिकों की सुरक्षा को प्रत्येक जगह खतरे मंे डालते हैं। बम्बई जैसे बड़े महानगर में भी, जो एक अन्तर्राष्ट्रीय हितों का नगर है तथा राजनैतिक एवं आपराधिक माफियाओं का नगर है, जहाँ कई बम विस्फोट हो चुके हैं, अपराधीकृत राजनैतिक गुटों एवं व्यक्तियों को राजकीय संस्थाओं द्वारा सुरक्षा प्रदान की जाती है।
    गुजरात राज्य के उच्च पुलिस अधिकारी जिसमें कुछ ने नागरिकों के खिलाफ गंभीर अपराध किए हैं एवं दूसरे व्यक्तियों जिन्होंने सरकारी जाँच पड़ताल के दौरान उन अवैध क्रिया कलापों को जाहिर करने का प्रयास किया, उन्हें इन मुठभेड़ों एवं अल्पसंख्यकों की हत्याओं को जाहिर करने के लिए उत्पीडि़त किया गया। ये सारे दृष्टान्त इस सुधार के युग में पुलिस एंव प्रशासन की वास्तविक भूमिका को उजागर करते हैं। संयुक्त कमिश्नर आॅफ पुलिस श्री हेमंत करकरे की ईमानदार पुलिस एवं जाँच अधिकारी के रूप में हत्या एक उदाहरण है। टेलीफोन एवं प्रिंट मीडिया पर श्री करकरे को जान से मारने की  धमकियाँ दी गईं जिसकी कभी गंभीरता से जाँच नहीं की गई। अनेक बम विस्फोटों में श्री हेमंत करकरे द्वारा की गई गंभीर जाँचों को स्वामी असीमानन्द की न्यायिक स्वीकारोक्ति के द्वारा पुष्टि की गई जिसने पूरे देश में एक आक्रोश की लहर फैला दी क्यांेकि यह समाज को धर्म के आधार पर बाँटने के लिए किया गया था, जैसा कि देश के बँटवारे के समय किया गया था। एजेंसियाँ ऐसा करने के लिए विदेशों से पैसा प्राप्त कर रही थीं। हेमंत करकरे की हत्या, उनके सहयोगियों अशोक कामटे, अनेक पुलिसवालों एवं नागरिकों की हत्याएँ, नौजवान अधिवक्ता शाहिद आजमी की बम्बई में उनके चैम्बर में हत्या, क्योंकि उन्होंने अल्पसंख्यक वर्ग के एक निर्दोष व्यक्ति को जिसे फर्जी तौर पर बम विस्फोट में फँसाया जा रहा था, सफलतापूर्वक बचाने का कार्य किया था। इस नौजवान वकील को यह पेशेवर कार्य जिसको एक राष्ट्रीय संगठन ने सौंपा था, उसकी हत्या की पूरी जाँच की कभी माँग नहीं की, हालाँकि राज्य सभा में इस मामले को उठाया भी गया। शाहिद आजमी की हत्या के बारे मंे उस समय की मुम्बई अपराध शाखा द्वारा यह कहा गया कि अपराध जगत के देशभक्तों के द्वारा यह कार्य किया गया। यह अपने आप में स्वयं एक सबक है क्योंकि अधिवक्ताओं के माध्यम से यह बात पहली बार सामने आई कि अपराध जगत में भी देशभक्ति की जड़ें हैं। एक नौजवान अधिवक्ता की उसके चैम्बर में नृशंस हत्या किए जाने पर पूरे देश के बार एसोसिएशनों द्वारा निंदा उस स्तर पर नहीं की गई जिस स्तर पर होनी चाहिए। यह बात अत्यन्त आश्चर्यजनक है। किन्तु जब अल्पसंख्यक वर्ग के निर्दोष व्यक्तियों को बम विस्फोट एवं तथाकथित आतंकवादी कार्यों के लिए आरोपित किया गया तो कई राज्यों के जिला बार एसोसिएशन जिसके सदस्य एक विशेष राजनैतिक दल से जुड़े हुए हैं अवैध प्रस्ताव पारित किए एवं वकीलों का आह्वान किया कि वे बम विस्फोट में आरोपित व्यक्तियों के मुकदमें न लड़ें। इन मुकदमों में पूरे देश के बहुत से निर्दोष नौजवानों को आरोपित किया गया है, जबकि वे क्षेत्र जिनमें सीमा पार आतंकवाद की समस्या है वे ऐसे प्रदेश हैं जिसकी अन्तर्राष्ट्रीय सीमाएँ हैं, न कि वे भारत के केन्द्रीय भाग में स्थित हैं। जिन वकीलों ने इन आरोपित निर्धन व्यक्तियों को बचाने के लिए मुकदमा अपने हाथ में लिया उनको उनके साथी वकीलों द्वारा या तो धमकी दी गई या उन पर हमला किया गया। बार काउंसिल द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई। यह अधिवक्ताओं का ऐसा निंदनीय आचरण है जिसके द्वारा उन्होंने एक दोषारोपित व्यक्ति को अदालत में अपने आप को बचाने के कानूनी अधिकार से वंचित किया। यह कार्य पेशेवराना आचार संहिता के खिलाफ है। इसके विपरीत हमारे देश के उच्च वर्गीय अधिवक्ता जो आपराधिक एवं अराजकतावादी गतिविधियों में लिप्त व्यक्तियों के मुकदमें लड़ते हैं उनको उसी प्रकार न तो धमकी दी जाती है और न उनकी आलोचना की जाती है।
    इससे यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि हमारी विधिक व्यवस्था एवं हमारे पेशे के नैतिक मूल्यों का पूरी तरह ह्रास हो चुका है।
-नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:


गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -9

इस बात को अक्सर अनदेखा किया जाता है कि प्रजातंत्र, संवैधानिक एवं मानवाधिकार भवन की भाँति हैं एवं आर्थिक राजनैतिक एवं सामाजिक स्वरूप उसकी नींव हैं। नीतियों की फिर से विवेचना आवश्यक है जब संसार इस मार्ग से विपरीत ढंग से प्रभावित हो। सरकार की प्रमुख राजनैतिक शक्तियों ने चाहे वह केन्द्र की हो अथवा राज्य की, विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, निजी आर्थिक संस्थाआंे एवं कारपोरेट समूहों द्वारा नामित सलाह कारों एवं नीति निर्धारकों की सारी शर्तें स्वीकार कर ली हैं। जिसके परिणाम स्वरूप सार्वजनिक संसाधनों का अंधाधुंध निजीकरण हो रहा है, जैसे कि हाइड्रोकार्बनिक संसाधन एवं खनिज पदार्थ। फलस्वरूप प्रजातांत्रिक संस्थाएँ विपरीत ढंग से प्रभावित हो रही हैं। करोड़ों लोगों के हितों की सुरक्षा खटाई में पड़ रही है एवं सामाजिक समझौते का पूर्ण ह्रास हो रहा है। इन नीतियों के कारण स्थानीय उत्पादन में गिरावट आई है, जीविकोपार्जन प्रभावित हो रहा है, एवं किसान वर्ग खाद्य एवं आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में बढ़ती हुई मुद्रास्फ़ीति के कारण बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है।
    मुझे व्यक्तिगत रूप से भारत के जहाज़रानी निगम की एक नव रत्न कम्पनी के निजीकरण के निर्णय को वैधानिक रूप से जाँचने का अवसर प्राप्त हुआ, यह घाटे वाली इकाई नहीं थी। इसके साथ ही भारत के जहाज़रानी निगम की मैरीटाइम एकेडमी की भूमि को दीन दयाल उपाध्याय ट्रस्ट के पक्ष में निजीकरण के लिए चिह्नित किया गया। मुझे एन0डी0ए0 गवर्नमेंट द्वारा 2003 में कैबिनेट कमेटी के निजीकरण के निर्णय को भी जाँच पड़ताल करने का अवसर मिला। यह निजीकरण जनहित में बिल्कुल नहीं था। यदि आर्थिक दृष्टिकोण से इस पर नजर डाली जाए तो यह पूरी तरह से निजी बड़ी कम्पनियों के हित में था। यह निर्णय केवल इस इकलौती विचार धारा से प्रभावित था कि सार्वजनिक सम्पत्ति को कैसे सर्वाधिक प्रिय निजी कम्पनियों को हस्तांतरित कर दिया जाए। इस व्यवस्था को (दोस्ताना) पूँजीवाद कहा जाता है तथा इस व्यवस्था की संपूर्ण विश्व में आलोचना की जा रही है। सौभाग्य वश निजीकरण को रोक दिया गया, जब हमने इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी। इस निर्णय की प्रकृति से प्रथम दृष्टया ही स्पष्ट था कि जिस निजीकरण की नीति को व्यावहारिक  बताकर, विशाल सार्वजनिक संसाधनों, वित्त एवं सम्पदा को, जिसको कि स्वतंत्रता के बाद बड़े कष्ट से बनाया गया था, उस धन को निजी पूँजीपतियों के घरानों को सौंपा जा रहा था एवं संविधान के आदेशों की अवहेलना करके भारतीय गणराज्य को कारपोरेटों के हवाले किया जा रहा था, क्योंकि राजनैतिक संस्थाओं का पूरे विश्व में पतन हुआ है एवं यह ‘प्लूटोवाद’ की तरफ लौट रही है। नीरा राडिया टेप अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे आर्थिक नीतियों पर कारपोरेट जगत के प्रभाव को स्पष्ट करते हैं। इसके साथ-साथ वे मीडिया तथा सरकार पर भी उसके प्रभाव को उजागर करते हैं। मीडिया से यह आशा की जाती है कि वे जनता से संबंधित समस्त समस्याओं को निष्पक्ष भाव से प्रकाशित करेंगे। 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला, जहाँ कई राजनैतिक दल राष्ट्रीय अर्थ के मुद्दों पर राज्य की नीतियों के प्रभाव के सम्बंध में उदासीन रहे। सार्वजनिक नागरिक उड्डयन विभाग का दिवालियापन,इसके पीछे बोइंग कम्पनियों से एयरक्राफ़्ट आयातित करने का फैसला शक्तिशाली मन्टीनेशनल कम्पनी के प्रति एक तरह से श्रद्धांजलि थी। यह कुछ ऐसे उदाहरण हैं कि जिसको भारत के महालेखाकार ने खुलासा किया। हाइड्रोकार्बन के क्षेत्र में भी निजीकरण किया गया। यह इस बात का साक्ष्य है कि राष्ट्रीय धन को प्रत्येक क्षेत्र के निजीकरण के होड़ में नष्ट किया जा रहा है। हम प्रतिदिन ऐसी नीतियों से घनिष्ट होते जा रहे हैं जिसके कारण पश्चिमी संसार के बहुत से देश दिवालिया घोषित हो रहे हैं तथा बैंकों की अलाभकारी संपत्तियों से सब्सिडी के नक़ाब के पीछे तथा कारपोरेट सेक्टर को 5 लाख करोड़ से अधिक टैक्स छूट प्रदान करके जनता की नजरों से ओझल किया जा रहा है।
    यह कुछ ऐसे तज़ुर्बे हैं जो पश्चिमी जगत के बैंकों, आर्थिक संस्थानों के धराशायी होने से सामने आए हैं। अमरीका की नीतियाँ जो कि लोगों के लिए आर्थिक कष्ट उत्पन्न कर रही हैं एवं जिससे संवैधानिक संकट भी उत्पन्न हो रहा है। रिजर्व बैंक की यह घोषणा कि निजी बैंकों को जहाँ कि विदेशों की 60 प्रतिशत हिस्सेदारी हो, को अनुमति प्रदान करना एवं बैंकों को कारपोरेट कंपनियों के लिए सुविधा प्रदान करना है। यह ऐसी नीति है कि स्वयं अमरीका अपने देश में इसकी अनुमति नहीं प्रदान करता। फलस्वरूप इससे हमारी आर्थिक व्यवस्था प्रभावित होगी तथा संवैधानिक एवं आर्थिक ढाँचा चरमरा जाएगा।

 -नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:


मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -7

अन्तर्राष्ट्रीय समझौते के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर का उल्लंघन पूरी स्वतंत्रता से किया जा रहा है। उसको सदैव आधारभूत समझा गया कि संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य एवं सिद्धांत के   सम्बन्ध में अध्याय एक, धारा चार में यह कहा गया है कि सभी सदस्य देश अपने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बंधों में किसी भी देश की राजनैतिक स्वतंत्रता एवं भूभागीय एकता के खिलाफ धमकी एवं बल का प्रयोग करने से परहेज करेंगे। अध्याय एक, धारा सात के अन्तर्गत यह आवश्यक है कि ‘‘इस चार्टर के अन्तर्गत संयुक्त राष्ट्र संघ किसी राष्ट्र के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा या किसी राष्ट्र को चार्टर के अन्तर्गत किसी निपटारे के लिए विवश नहीं करेगा। परन्तु यह सिद्धांत अध्याय सात के अन्तर्गत किए गए किसी प्रकार के समाधान पर लागू नहीं होगा।
    अध्याय आठ, धारा 52 के अन्तर्गत जो क्षेत्रीय व्यवस्थाओं से सम्बंधित हैं, यह उल्लेख किया गया है कि वर्तमान चार्टर के अन्तर्गत क्षेत्रीय व्यवस्थाओं अथवा ऐसे मामलों के निपटारा करने में शीघ्रता करने से कदापि रोका नहीं गया जिनका सम्बंध अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा को बनाए रखना है, शर्त यह कि ऐसी व्यवस्था संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धांत एवं उद्देश्यों से भिन्न न हो।
    इन सभी नियमों की स्पष्टवादिता के बावजूद बिना किसी न्यायोचितता के लीबिया के आन्तरिक मामलों में खुला हस्तक्षेप किया गया। जबकि अफ्रीकी संगठन ने शांतिपूर्वक निपटारें के लिए सिफारिशें पेश की थीं। एक पूरे समाज एवं उसके मानव निर्मित नई व्यवस्था को नष्ट कर दिया गया। नाटों देश, दूसरी तरफ यह चाहते हैं कि हम यह विश्वास करें कि उन्होंने ऐसा नागरिकों की सुरक्षा के लिए ‘‘नो फ्लाई जोन’’ प्रस्ताव संख्या 1973 (2011) के अन्तर्गत किया। नाटो वायुयानों को उड़ान भरने की छूट थी। नेशनल ट्रांजीशनल काउसिंल को महासभा एवं सुरक्षा परिषद द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में उस समय स्थान प्रदान किया जबकि लीबिया के अधिकतर भागों पर इसका नियंत्रण जाता रहा था। इसके विपरीत पैलिस्टीनियन राज्य एवं सरकार को संयुक्त राष्ट्र संघ मंे कोई स्थान प्रदान नहीं किया गया। जबकि अरब राज्य, पैलिस्टाइन की सीमाओं का निर्धारण संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा किया गया जैसा कि इस्राइल की सीमाओं का निर्धारण किया गया था। इस राज्य को पैलेस्टाइन राज्य की जमीन पर अवैध कब्जा करके बनाया गया था।
    डेनिस साउथ, नामक टीकाकार, ने टिप्पणी की है कि ‘‘युद्ध कर्नल-गद्दाफी के बारे में नहीं, युद्ध न्याय बनाम अन्याय के मध्य है। यह गुलामी बनाम आजादी के मध्य है। यह नृशंस जातिवादी आधिपत्य बनाम उदार इंसानी सहयोग एवं प्रेम के मध्य है।
    नेशनल ट्रांजीशनल काउसिंल प्रथम संस्था थी जिसने तथाकथित सीरियाई गठबंधन को मान्यता प्रदान की थी जिसे नाटों देशों ने तुर्की की मदद से बनाया था। सीरिया को पहले से ही नाटो एवं उसके पड़ोसी देशों जैसे सऊदी अरब, जार्डन एवं तुर्की के द्वारा सशस्त्र विद्रोहियों के माध्यम से निशाना बनाया गया। टर्की, जो एक नाटो देश है उसने लीबिया के अधिग्रहण को संगठनात्मक समर्थन प्रदान किया है। उसने अफगानिस्तान में सैनिक भेजे एवं सीरिया को आक्रमण की धमकी दी एवं उत्तरी इराक में कुर्दों के खिलाफ युद्ध किया। ईरान ने लीबिया की नेशनल ट्रांजीशनल काउंसिल को समर्थन प्रदान किया, तथा अपने हित में उसने अमरीकी आधिपत्य वाली सेनाओं को अफगानिस्तान तथा इराक में सहयोग प्रदान किया, किन्तु फिर ईरान, उन देशों की सूची में बहुत आगे है, जिनको नाटो देशों के द्वारा निशाना बनाया जा सकता है। कूटनीतिक तटस्थता के सारे आडम्बरों को ताक पर रखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बानकी मून ने खुले ढंग से अपनी निराशा को व्यक्त किया कि कुछ लीबिया में घटित हुआ इसके बावजूद सीरिया के बारे में प्रस्ताव को वीटो कर दिया गया। संक्षेप में संयुक्त राष्ट्र संघ की गिरावट का यह खुला हुआ उदाहरण है। संयुक्त राष्ट्र संघ अब मानवाधिकार, प्रजातंत्र एवं मानवता की सेवा करने के बजाए, विश्व के प्रबल आर्थिक एवं कारपोरेट हस्तियों की सेवा में रत है।
-नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -6

अन्तर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय का इस सम्बन्ध में रिकार्ड बहुत अच्छा नहीं है, हालाँकि इसे बड़े जोर शोर से शुरू किया गया था। इसने अमरीकी सरकार के नेताओं, सैन्य अधिकारियों, ठेकेदारों, प्राइवेट सुरक्षा ऐजेंसियों के खिलाफ, सुरक्षा परिषद द्वारा मुकदमा न चलाने की स्वतंत्रता प्रदान कर दी है। यद्यपि कि उन्होंने नरसंहार, मानवता के खिलाफ अपराध एवं युद्ध  अपराध किए हैं जिसकी कोई उपमा मानव इतिहास में उपलब्ध नहीं है। इसके विपरीत, अफ्रीकी देशों के राष्ट्राध्यक्षों, जिन्होंने अपनी अर्थ व्यवस्था पर उप निवेशिक राजनैतिक नियंत्रण का विरोध किया, को खुले तौर से गिरफ्तारी के वारन्ट से धमकाया गया, जिसके फलस्वरूप अफ्रीकी संघ ने सुरक्षा परिषद एवं अन्तर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय द्वारा गठित विशिष्ट न्यायालयों के राजनैतिक एवं द्वेषपूर्ण प्रकृति की घोर आलोचना की।
    मानवाधिकार संगठन जो कि मौत की सजा को व्यक्तिगत मामलों में उन्मूलन के लिए कार्यरत हैं अभी तक वे इस सच्चाई के प्रति नहीं जागे हैं कि जो कुछ नाटो शक्तियों के द्वारा उद्घोषित किया गया है, वह सभी देशों के नागरिकों के लिए सामूहिक मौत की सजा है। वे ऐसे हथियारों का प्रयोग कर रहे हैं, जो नागरिकों की हत्या कर रहे हैं जैसे कि डिप्लीटेड यूरेनियम हथियार, जो न्यूकिलयर उद्योग के रद्दी या बचे हुए उत्पादों से बना हैं एवं जो मानव के जीन कोड को नष्ट कर देता है एवं मार देता है, फ्यूल एअर इक्सप्लोसिव, डेयसी कटर बम, सफेद फासफोरस, नेपास, क्लस्टर बम, न्यूट्रान बम एवं छोटे न्यूक्लियाई हथियार जिनका प्रयोग तथाकथित रूप से लीबिया के सर्टे नामक स्थान पर किया गया। इन सारे हथियारों को अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के द्वारा प्रतिबंधित किया गया है।
    युद्ध के नियमों के सम्बन्ध में जेनेवा एवं हेग परम्परा जो सभी प्रकार के न्यूक्लियाई हथियारों एवं उन सभी हथियारों को  प्रतिबंधित करती है जो नागरिक जनसंख्या को प्रभावित करते हैं। 25 अगस्त 2011 तक नाटो देशों द्वारा 27,000 से अधिक बम गिराए गए। नार्वे एवं डेनमार्क के द्वारा अकेले 700 बम गिराए गए। इसमें वह प्राणघातक बमबारी शामिल नहीं है जो इराक में सर्टी, बनी वलीद एवं फलूजा में की गई।
    संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा स्थापित यू0एन0 मानवाधिकार सभा क्या भूमिका अदा कर रही हैं? क्या यह करोड़ों लोगों के मानवाधिकारों, जिनके ऊपर अवैध कब्जा जमाया गया है को सुरक्षा प्रदान करने में सफल हुआ है? आक्रमणकारी युद्धों, इराक एवं अफगानिस्तान में नरसंहारों, एवं  अधिग्रहण सम्बंधी युद्ध अपराधों की सूचनाओं का क्या परिणाम हुआ? उन सूचनाओं को महासभा में कार्यवाही एवं प्रतिबंधों के लिए पेश नही किया गया है क्योंकि कुछ स्थाई सदस्य इसमें सम्मिलित थे। क्या नाटो राज्यों के किसी भी सदस्य के खिलाफ जो इन आपराधिक युद्धों मंे शामिल हैं, महासभा में उनकी सदस्यता की समाप्ति के सम्बन्ध में प्रस्ताव पारित किया गया? या उनके सम्बन्ध में विशेष अदालत का गठन किया गया या अन्तर्राष्ट्रीय अदालत में उन पर मुकदमा चलाया गया। 60,000 लीबियाई नागरिकों की हत्या पर एवं कर्नल गद्दाफी की हत्या पर मानवाधिकार संगठनों द्वारा सुरक्षा परिषद में कोई प्रतिनिधित्व क्यों नहीं किया गया। क्या हमें अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों की विफलता एवं पतन, संयुक्त राष्ट्र संघ की नाकामयाबी का कोई अन्य प्रमाण चाहिए?

-नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

रविवार, 1 अप्रैल 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -5

                                               प्रथम खाड़ी युद्ध (1990-91) के दौरान पहली बार यह साक्ष्य सामने आया कि संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद दबंग पश्चिमी आर्थिक एवं कारपोरेट घरानों की गुलाम बन चुकी है। इराक के लोगों पर उस समय प्रतिबंध लगाए गए ताकि इराक को आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक रूप से पूरी तरह से नष्ट किया जा सके। इस अवैध प्रस्ताव और तथाकथित भोजन के लिए तेल अभियान ने इराक के नागरिकों को पूरी तरह प्रभावित किया है। अनेक प्रतिबंधों के चलते बहुत सी सामग्रियाँ और वस्तुएँ जो सैनिक प्रकृति की नहीं थीं, उनको आयातित करने की अनुमति नहीं प्रदान की गई एवं इराक को तेल उत्पादन क्षेत्रों में पहुँच की अनुमति नहीं प्रदान की गई। केवल जनसंख्या की पौष्टिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उन क्षेत्रों पर जाने की अनुमति प्रदान की गई। नागरिकों के लिए भयंकर परिस्थितियों के प्रतिक्रिया स्वरूप जो कि इराक पर लगाए गए प्रतिबंधों का सीधा परिणाम था, संयुक्त राष्ट्र संघ के दो सहायक महासचिव वान स्पोनेक एवं डेनिस हैली डे हैं जिनको इस कार्यक्रम के निरीक्षण के लिए नियुक्त किया गया था, उन्होंने त्याग पत्र दे दिया। उन्होंने घोषणा की कि इराक के लोगों पर जो प्रतिबंध लगाए गए हैं वे एक प्रकार से इराक के विरुद्ध युद्ध की घोषणा हैं एवं संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्यों के प्रतिकूल हैं। पूँजी संचय, युद्ध में प्राप्त धन एवं बल द्वारा प्राप्त अन्य लाभ इस बात के लिए बाध्य करते हैं कि अर्थशास्त्री जो कि विश्व व्यापार व्यवस्था के वैश्वीकरण से प्रेरित हैं, उन्हें यह चिंतन करना होगा कि उन्होंने जी-7 देशों की कम्पनियों को जो सर्वाधिक प्रिय कम्पनियों का दर्जा दिया है, उस पर उन्हें पुनः विचार करना पड़ेगा।
                         जब से सेसुरक्षा परिषद ने यूगोस्लाविया एवं रवान्डा के लिए विशेष न्यायालयों का गठन किया है तब से यह देखा गया है कि रवान्डन पैट्रियाटिक फ्रंट के विरोधी दलों के नेता, सैन्य अधिकारी एवं राष्ट्राध्यक्षों को या तो अवैध रूप से गिरफ्तार कर लिया गया या उन्हें जेल भिजवा दिया गया। स्वर्गीय राष्ट्रपति मिलो सेविक  ने जो साक्ष्य अपने बचाव में पेश किया वे सुरक्षा परिषद एवं नाटों देशों के लिए इतनी ज्यादा परेशानी में डालने वाले थे कि उन्हें बहुत ज्यादा राहत मिली जब मिलोसेविक का हृदय रोग के कारण देहावसान हो गया। यद्यपि मिलोविक एक भूतपूर्व चयनित राष्ट्राध्यक्ष थे एवं ब्रिटेन उनकी बीमारी से पूरी तरह भिज्ञ था फिर भी उनके प्रति वह शिष्टाचार नहीं प्रदर्शित किया गया जो शिष्टाचार जनरल पिनोशित के प्रति प्रदर्शित किया गया। राष्ट्रपति मिलोसेविक पर विशेष न्यायालय द्वारा मुकदमा और भी तेजी से चलाया गया, यद्यपि कि उन्होंने साक्ष्य प्रस्तुत किया था कि नरसंहार का आरोप जो उन पर लगाया है कि वह वास्तव में नाटो की बमबारी का परिणाम था जिसके कारण कोसोवो एवं बेलग्रेड में नागरिकों की हत्याएँ हुईं। नाटो शक्तियों एवं संयुक्त राष्ट्रसंघ के सैन्य बलों द्वारा आपराधिक संगठनों को सहायता प्रदान की गई। ये आपराधिक संगठन इस्लामी मुखौटा पहने हुए थे, इनको कुछ इस्लामी देशों के संगठनों द्वारा सहायता भी प्रदान की गई ताकि वे यूगोस्लाविया का बटवारा कर सकें एवं उसके पश्चात सर्बिया का बँटवारा करंे ताकि सर्वों की सामूहिक हत्याओं की जिम्मेदारी न रहे। नागरिकों द्वारा यूगोस्लाविया के न्यायालय के मुख्य सरकारी वकील से शिकायतें की गईं कि वे बेलगे्रड में नाटो देशों द्वारा की गई बमबारी की जाँच करें, परन्तु उनमें से एक पर भी मुकदमा नहीं चलाया गया। इसी प्रकार रवाण्डा में भी हत्याएँ की गईं जो नरसंहार की परिधि में थीं। रवान्डन पैट्रियाटिक फ्रंट द्वारा की गई सामूहिक हत्याओं की जाँच नहीं की गई यद्यपि कि साक्ष्य मौजूद था कि सभी हत्याएँ रवान्डन पैट्रियाटिक फ्रंट द्वारा की गई हैं, फिर भी कोई जाँच नहीं हुई क्योंकि रवान्डन पैट्रियाटिक फ्रन्ट के अमरीका एवं ब्रिटेन से घनिष्ठ सम्बन्ध थे। वजह यह थी कि अमरीका एवं ब्रिटेन कान्गो तक फैले हुए सम्पूर्ण क्षेत्र के संसाधनों पर नियंत्रण करना चाहते थे। समकालीन युग के बहुत से देशों में धार्मिक या साम्प्रदायिक संगठनों की सहायता की गई कि वे आपराधिक प्रकृति के व्यक्तियों को संगठित करें ताकि वे गृह युद्ध को प्रारम्भ कर सकें एवं नाटो देश उस राष्ट्र में हस्तक्षेप करने का बहाना ढूढ सकें या छाया सरकारों द्वारा उन पर नियंत्रण कर सकंे। 
 -नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

शनिवार, 31 मार्च 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन - 4

अन्तर्राष्ट्रीय वैधानिक व्यवस्था एवं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा व्यवस्था का पतन एवं अन्तर्राष्ट्रीय विधिक न्यायालय एवं संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति की निष्क्रियता।
    संयुक्त राष्ट्र संघ चार्टर की प्र्रस्तावना में यह लिखा हुआ है कि हम ‘‘संयुक्त राष्ट्र संघ’’ के लोग आने वाली पीढि़यों को युद्ध की विभीषिका से बचाने के लिए कृत संकल्प हैं, जिसने कि मानवता को दो बार अनगिनत कष्टों में लिप्त किया है। इस घोषणा के बावजूद सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य जिन्होंने द्वितीय युद्ध के पश्चात व्याप्त भौगोलिक राजनैतिक, परिस्थिति के फलस्वरूप विशेष दर्जा प्राप्त किया। सहयोगी शक्तियों के राजनैतिक एवं सैनिक रूप से प्रबल होने के कारण स्थाई सदस्यों ने संयुक्त राष्ट्र संघ को निरन्तर एवं कभी न समाप्त होने वाले युद्धों की ओर ढकेला है, संयुक्त राष्ट्रों के आन्तरिक मामलों में सैनिक हस्तक्षेप किया है एवं छोटे देशों के खिलाफ आर्थिक रोक लगाई है ताकि वे उनके संसाधनों पर अनधिकृत कब्जा कर सकें। विश्व की नवीन राजनैतिक व्यवस्था जो कि मानवता के विपरीत है उस समय उत्पन्न हुई जब पूर्व सोवियत समाजवादी गणराज्य संगठन की पोलिट ब्यूरो 1991 में धराशायी हो गई। यह वह समय था जबकि विश्व के पश्चिमी देशों में अर्थ व्यवस्था मुसीबत से घिर चुकी थी, परन्तु लोगों की नजरों से यह बात छिपी हुई थी।
    चीन ने इन घटनाओं से पहले पश्चिमी संसार से यह समझौता किया था कि वह अपनी अर्थव्यवस्था और राजनीति को बदल देगा, यदि उसको सर्वाधिक प्रिय राष्ट्र का दर्जा प्रदान किया जाएगा।
    इसके बदले वह अमरीका तथा यूरोपियन कम्पनियों को एवं जी0 7 राष्ट्रों की अन्य कम्पनियों को चीन में व्यापार करने की अनुमति प्रदान करेगा तथा सभी प्रकार के व्यापारिक प्रतिबंधों को उठा लेगा। चीन इस बात पर सहमत हुआ कि वह विश्व के राजनैतिक एवं रणनीति सम्बंधी आदेशों को जिस पर अमरीका और उसके सहयोगी राष्ट्रों का पूरा दबदबा है, से पूरी तरह सहमत रहेगा। परिणाम स्वरूप चीन ने ईराक के विरुद्ध लगाए गए प्रतिबंधों पर अपने वीटों का प्रयोग नहीं किया। वह इस बात पर भी सहमत हुआ कि वह चीन का सस्ता लेबर बिना मोल भाव किए हुए प्रदान करेगा, बहुत से क्षेत्रों में राज्य द्वारा चलाई गई कम्पनियों को समाप्त कर देगा एवं इन कम्पनियों के मुनाफे को स्वदेश सुरक्षित भेज देगा एवं उत्पादन की कीमत को घटाएगा।
    सुरक्षा परिषद के द्वारा 1989 के पश्चात पारित किए गए अधिकतर प्रस्ताव अप्रजातांत्रिक हैं क्योंकि ये प्रस्ताव कमजोर राष्ट्रों को आर्थिक एवं सैनिक रूप से धमकाना चाहते हैं जो पहली दृष्टि में ही संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर का खुला हुआ अतिक्रमण है।
संयुक्त राष्ट्र संघ का चार्टर, यदि व्याख्या सम्बंधी कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो वह सभी समझौतों से सर्वोपरि है। केवल कुछ उदाहरण ही पर्याप्त हैं इस बात को साबित करने के लिए कि संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह से धराशायी हो चुकी है एवं संयुक्त राष्ट्र संघ सैनिक रूप से कमजोर, छोटे सदस्यों के हितों को अब सुरक्षा प्रदान नहीं करता। सुरक्षा परिषद के अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र संघ की महा सभा ने भी लीबिया के वर्तमान मामले में आश्चर्य जनक रूप से स्वेच्छाचारिता से काम लिया है। उसने संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार सभा एवं सुरक्षा परिषद की सिफारिश पर बगैर तथ्यों की जाँच किए हुए लीबिया को संयुक्त राष्ट्र संघ से निलम्बित कर दिया। कर्नल गद्दाफी पर यह आरोप लगाया गया था कि उन्होंने 600 बगाज़ी नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया है। संयुक्त राष्ट्र संघ मंे भारत के स्थायी दूत श्री हरिदीप पुरी ने सुरक्षा परिषद द्वारा लीबिया के ऊपर पारित दो प्रस्तावों के संदर्भ में यह बात कही कि किसी विश्वसनीय जाँच का अभाव है। विडम्बना यह है कि नेशनल ट्रांजीशनल काउंसिल के नाटो के साथ सहयोग के बावजूद 60,000 लीबियाई नागरिकों की हत्या की गई, फिर भी सुरक्षा परिषद, महासभा एवं संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार सभा ने एन0टी0सी0 एवं नाटों शक्तियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की।
-नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन - 3

विश्व स्तर पर प्रमुख आर्थिक एवं कार्पोरेट घरानों ने, जिन्हें उमड़ते हुए जन सैलाब का भय सता रहा है जैसा कि ग्रीस में देखा गया है, यह फैसला किया है कि वे लोगों के संवैधानिक अधिकारों को समाप्त करेंगे, हालाँकि इन घरानों के प्रमुख वक्ताओं ने अपने आधिकारिक वक्तव्यों में प्रजातंत्र एवं मानवाधिकारों का झूठा ढिंडोरा पीटा है। अधिकतर देशों में जहाँ कि अर्थव्यवस्था प्रबल है वहाँ की सरकारें चाहे वे सत्ता पक्ष की हों या विपक्ष की हों, उन्होंने मजदूर वर्ग एवं मध्यम वर्ग की आवाजों को दबाने का कार्य किया है। उन्होंने उचित एवं शांतिमय प्रतिरोधों को, भाषण एवं संगठन की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार के बावजूद, पूरी तरह से कुचल दिया है। राजनैतिक आन्दोलनों में धन लगाने वाले यह सुनिश्चित करते हैं कि यदि कही गंभीर प्रतिरोध की आवाज उठे तो उसको कभी भी गंभीरता से न सुना जाए। एक कारपोरेट मीडिया उस आन्दोलन को या तो दबा देती है या उसको तोड़ मरोड़ कर पेश करती है या ध्यान को दूसरी तरफ केन्द्रित कर देती हैं या गैर सरकारी संगठन (एन0जी0ओ0) जो कारपोरेट घरानों से धन प्राप्त करते हैं उनको इस मीडिया के माध्यम से विशेष रूप से प्रसारित किया जाता है। यह मीडिया थोड़ा बहुत प्रतिरोध या (फर्जी) प्रतिरोध को उभरने देता है ताकि असहमति की आवाजंे विस्फोटक न बनने पाएँ। कारपोरेट घरानों से धन प्राप्त कर रहे गैर सरकारी संगठनों को एक विशेष कार्य परिक्षेत्र आवंटित किया जाता है जैसे कि मानवाधिकार, पर्यावरण, भ्रष्टाचार एवं सार्वजनिक हितों वाले मुद्दे (पी.आई.एल.) और जब पूँजीपति एवं कारपोरेट घराने वालों का आर्थिक एवं राजनैतिक रास्ता दुष्कर हो जाता है तो वे राजनैतिक विकल्प के रूप में अराजकता वादी समूहों को बढ़ावा देते हैं जो कि आपराधिक एवं छिपे तरीकों से नियंत्रण करने की कोशिश करते हैं।
                                          इन्हीं क्षणों में धन प्राप्त करने वाले गैर सरकारी संगठन (फर्जी) विरोधी दलों के साथ मिलकर सत्ता से अपदस्थ किए जाने वाली पार्टी के खिलाफ षड्यंत्र रचते हैं। सामाजिक समझौता जो पश्चिमी समाज के देशों के संगठित वेतनभोगी अथवा श्रमिक वर्ग एवं मध्य आय वर्ग के समूहों के साथ हुआ, वह पूर्व यू0एस0एस0आर0 एवं अन्य समाजवादी देशों की राजनैतिक समाप्ति के पश्चात धीरे-धीरे लुप्त होता गया। इन देशों को यह भय था कि कोई वैकल्पिक एवं आर्थिक व्यवस्था इसके स्थान पर आ जाएगी। इस राजनैतिक व्यवस्था के स्थान पर अब इन देशों में पुलिस राज्य स्थापित हो गया। संवैधानिक अधिकारों के ह्रास के सबसे प्रमुख उदाहरण संयुक्त राज्य अमरीका एवं ब्रिटेन हैं जहाँ भाषण देने की स्वतंत्रता का अधिकार, गोपनीयता का अधिकार, अनचाही गिरफ्तारी से स्वतंत्रता का अधिकार एवं दूसरे अधिकार जो केवल मध्यम एवं उच्च वर्ग एवं नस्ल विशेष को ही प्राप्त हैं, इनके ऊपर पिछले दो दशकों से बहुत ही व्यापक एवं गूढ़ निगरानी की जा रही है। विभिन्न वर्गों के बीच धन की विषमताएँ इतनी ज्यादा गहन है कि उन्हें भयावह की संज्ञा दी जा सकती है।
                                                   अभी हाल के दिनों मंे ब्रिटेन में जब पुलिस हत्याओं के विरोध में स्वाभाविक आंदोलन छिड़ा जिसके बाद गिरती हुई सामाजिक परिस्थितियों, बढ़ती हुई बेरोजगारी एवं गरीबी के फलस्वरूप दंगा भी हुआ। विरोधों का बर्बरता पूर्वक दमन कर दिया गया एवं रात को मजिस्टेªट नियुक्त किए गए जिन्होंने प्रथम बार के किशोर आरोपियों को भी जमानत नहीं दी, एवं उनके परिवारों को यह धमकी दी गई कि उनको सरकार द्वारा प्राप्त आवास से बेदखल कर दिया जाएगा। अमरीका में वकील एवं मुअक्किल के दरमियान पेशे वराना सम्बन्ध जो पहले बहुत पवित्र समझा जाता था, उस पर अब प्रतिबंध लगा दिया गया है। उन्हें सम्पर्क की गोपनीयता से अब वंचित कर दिया गया है। जिन राष्ट्रांे में नाटों शक्तियों एवं उनके सहयोगियों ने अधिग्रहण कर रखा है वे अब प्रजातांत्रिक देश नहीं रहें। उन्हें छावनियों में तब्दील कर दिया गया है ताकि वहाँ वे अधिक उत्पादों पर कब्जा जमा सकें। इन देशों में व्यक्तिगत एवं सामूहिक हत्याएँ आम हो गई हैं। आए दिन बम विस्फोट होते रहते हैं जैसा कि अफगानिस्तान एवं ईराक के उदाहरण से स्पष्ट हैं। ये सारी घटनाएँ नाटो शक्तियों अथवा उनकी सहयोगी सरकारों के द्वारा कराई जाती हैं, तथा इनकी कोई वैधानिक जिम्मेदारी भी नही .



 -नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

गुरुवार, 29 मार्च 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -2

कारपोरेट एवं बैंकर्स फाउन्डेशन के सबसे बुद्धिमान एवं सर्वश्रेष्ठ पश्चिमी विचारकों ने सिफारिश की है कि विभिन्न देशों के संसाधनों, वित्त एवं राष्ट्रीय बजटों को नियंत्रित करने एवं उनके हाईड्रोकार्बन एवं खनिज पदार्थों को हड़पने का सबसे अच्छा तरीका युद्ध है। इसके माध्यम से वे अफगानिस्तान के नारकोटिक्स व्यापार को भी नियंत्रित कर रहे हैं जिससे प्राप्त आय को वे पश्चिमी बैंकों एवं प्रमुख आर्थिक संस्थाओं में जिनमें कि साख निर्गमन की सर्वाधिक शेयर होल्डिंग रखने वाली संस्थाएँ भी सम्मिलित हैं, लगाते हैं। उनके प्रमुख प्रस्तावित कार्यक्रमों में से एक यह भी है
कि वे तेल उत्पादन को नियंत्रित करना चाहते हैं, वे यह भी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि हाइड्रोकार्बन का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार केवल डालर के माध्यम से चलाया जाए। डालर एक ऐसी करेंसी है जो निरन्तर गिर रही हैं फिर भी यह विश्व की रिजर्व करेंसी के रूप में कार्य कर रही है।
    निरन्तर युद्ध की नीति से दो उद्देश्यों को प्राप्त करना है। एक, यह कि-उन राष्ट्रों के नागरिकों को, जिन्होंने युद्ध घोषित कर दिया है निरन्तर अधीनता में रखना। दो, दूसरी सरकारों एवं राष्ट्रों को धमकाना एवं विवश करना। अनेक देशों की राजनैतिक व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। हर जगह अनिश्चितता है एवं ‘‘वर्तमान परिस्थिति में निरन्तर एवं लगातार परिवर्तन, अस्थाई गणनाओं को भी प्रभावित देशों के राज्यों, उद्योगों, सामाजिक समूहों एवं व्यक्तियों के लिए अत्यधिक समस्यात्मक बना देते हैं। ऐसे अवसर आते हैं जबकि विशिष्ट राज्यों एवं विश्व के लिए शांति के क्षण होते हैं, परन्तु इन क्षणों को बड़ी शीघ्रता से नष्ट किया जा सकता है। जो चीज इस शांति एवं आराम के क्षण को भंग कर रही है, उनमें से एक दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली वस्तुएँ ऊर्जा, खाद्यान्न आदि की कीमतों में तेजी से हो रही वृद्धि है। इन उतार चढ़ाओं के कारण विश्व के सभी स्थानों पर गरीब राज्यों, गरीब समूहों एवं गरीब व्यक्तियों के लिए समस्या उत्पन्न हो रही है।’’ इमानुअल वालर स्टीन की पुस्तक ’’विश्व में संरचनात्मक संकट’’ के अंश।
    वर्तमान समय में पूरे विश्व में अनिश्चिता है। निश्चितता केवल पश्चिमी संसार की आर्थिक व्यवस्था में अन्तहीन गिरावट है। जिसके कारण सर्वत्र रक्त, श्रम एवं आँसुओं की एक लकीर सी बन गई है। यह विश्व बैंक एवं अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के द्वारा हर समाज पर थोपी गई नवीन उदारवाद एवं संरचनात्मक समायोजन की नीतियों का सीधा परिणाम है। व्यापक बेरोजगारी एवं खाद्यान्न असुरक्षा की समस्या हर समाज में उत्पन्न हो रही है। जिन राष्ट्रों ने इन आर्थिक नीतियों को नहीं अपनाया है, उन्हें युद्ध द्वारा तबाह किया जा रहा है। नाटों देशों के नागरिक अपने राष्ट्रीय बजट में घाटा उठा रहे हैं क्योंकि वे सेना पर ज्यादा व्यय कर रहे हैं। वे इस सच्चाई की उपेक्षा कर रहे हैं कि वियतनाम में आक्रमण से ही अमरीका की आर्थिक व्यवस्था में गिरावट की शुरूआत हुई है।
    यहाँ पर यह आवश्यक है कि हम इस ऐतिहासिक विपत्ति की गंभीरता एवं सीमा को ध्यान में रखें, क्योंकि पश्चिमी देशों के संवैधानिक प्रजातंत्र में उदारवाद की नीति के धराशायी होने के कारण एवं मुसोलिनी की अराजकतावादी व्यापारिक नीति के अपनाए जाने के कारण यह आर्थिक संकट उत्पन्न हुआ है। पहले भी विश्व इतिहास में कई बार यह घटित हो चुका है कि व्यापार की अधिकता की परिणति उसकी समाप्ति में हुई है। परन्तु इस बार यह व्यवस्था आर्थिक संचय की विफलता के परिणाम से ग्रसित है जो कि इस व्यवस्था द्वारा पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता है या उन देशों के नागरिकों को सामूहिक रूप से मौत के घाट उतार देने की घोषणा  के पश्चात भी संभव नहीं, जिनके संसाधनों को सेना के द्वारा अधिगृहीत कर लिया गया है।
 -नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

बुधवार, 28 मार्च 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -1




पश्चिमी आर्थिक व्यवस्था की संरचनात्मक विपत्ति का प्रभाव संसार की सभी राजनैतिक व्यवस्थाओं पर हुआ है, इसके फलस्वरूप विश्व एक ऐतिहासिक मुसीबत में डूब चुका है। इसका प्रभाव सभी प्रजातंत्रों, संवैधानिक सरकारों पर हुआ है और करोड़ों लोगों के मानवाधिकारों का हनन हुआ हैं।
पश्चिम की अब तक प्रसुप्त आर्थिक व्यवस्था में एक अप्रत्याशित ऐतिहासिक विपत्ति के कारण संसार के सभी लोग एवं सभी संवैधानिक एवं विधिक व्यवस्थाएँ प्रभावित हुई हैं। राजनैतिक अर्थशास्त्रियों ने इसे दोहरी मंदी की संज्ञा दी हैं, उन्होंने स्वीकार किया है कि यह पश्चिम में तीस के दशक में आई ‘ग्रेट डिप्रेशन’ (विराट आर्थिक गिरावट) से भी ज्यादा गंभीर है। जिसकी परिणति संसाधनों पर नियंत्रण की वैष्विक होड़ में हुई एवं अन्ततोगत्वा द्वितीय विष्व युद्ध का इसने मार्ग प्रशस्त किया। इस युद्ध को पूँजीपतियों (बैंकर्स) द्वारा संसाधनों पर नियंत्रण का युद्ध भी कहा गया है। इस प्रकार की निर्ममता के सीधे कारकों में से एक कारक यह भी था कि प्राइवेट बैंकर्स ने प्रथम विश्व युद्ध में राष्टों को जो कर्ज दिया था उन्होंने उसका सूद वसूलना प्रारम्भ कर दिया एवं पराजित देशों की सरकारों से युद्ध में हुई क्षतिपूर्ति भी वसूलना प्रारम्भ कर दिया था। यह कार्य कुख्यात ‘‘वर्सिलीज’’ संधि के माध्यम से हुआ जिसको अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस के राष्ट्राध्यक्षों एवं बैंकर्स के अधिकारियों द्वारा जबरदस्ती इन राष्ट्रों पर थोपा गया, युद्ध क्षतिपूर्ति उन देशों के नागरिकों के द्वारा अदा की गई, जिन्होंने उस निर्णय में हिस्सा नहीं लिया था। उन राष्ट्रों की आर्थिक व्यवस्था बिल्कुल ढह गई एवं भीषण मुद्रास्फीति का जन्म हुआ, जिससे यूरोप के करोड़ों नागरिक बिल्कुल दरिद्र हो गए। समकालीन परिस्थिति एक बार फिर इसी प्रकार की पाश्विक घटनाओं की एक भिन्न ऐतिहासिक युग में पुनरावृत्ति है। अन्तर केवल यह है इसकी भीषणता पहले से कहीं अधिक है, क्योंकि इसका प्रभाव प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्ध के मुकाबले में अधिक दूरगामी है। इन्हीं पूँजीवादी तथा आर्थिक हितों के उत्तराधिकारियों द्वारा एक बार फिर विश्व के भिन्न-भिन्न राष्ट्रों का शोषण किया जा रहा हैं। वहीं बैंकिंग एवं कार्पोरेट हितों वाले अपनी सरकारों के माध्यम से फिर से, उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया में लिप्त हैं। उन्होंने ऐसी नीतियों को अपनाया है जिससे कि इन देशों की सामाजिक सुरक्षा का सम्पूर्ण ढाँचा नष्ट हो रहा है।
वे इन राष्ट्रों के राजकोषों से बड़ी-बड़ी आर्थिक सहायता (सब्सीडी) प्रदान करवा रहे हैं। बैंकों एवं निगमों पर अपना आधिपत्य जमा रहे हैं जिससे मध्यम एवं कार्य करने वाले वर्ग की सम्पत्तियों एवं बचत पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। परिणाम स्वरूप, ये राष्ट्र कर्ज में डूब रहे हैं और दिवालिया बन रहे हैं। प्रमुख रेटिंग ऐजेंसियों जैसे ‘‘स्टैण्डर्ड पुअर’’ ने इन सरकारों की आर्थिक विकास क्षमता की दर को कम कर दिया है जिसमें पूर्व के आर्थिक दैत्य अमरीका एवं जापान भी सम्मिलित हैं। फ्रांस जो कि सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य है, वह भी इस प्रकार की स्थिति का सामना कर रहा है। जबकि विश्व की जी0डी0पी0 (सकल घरेलू उत्पाद) लगभग 65 ट्रिलियन या मोटे तौर पर विश्व सार्वभौमीकरण विपणन का 10.83 प्रतिशत है जैसा कि प्रमुख अखबार ‘‘दि एकोनाॅमिस्ट ने सूचना दी है। विश्व के चार बड़े बैंकों की साख रेटिंग भी कम कर दी गई है। बैंक आफ अमरीका, सिटीग्रुप, जे0पी0 मोरगन, गोल्डमैन साच, विशैली साख निर्गमन का 95 प्रतिशत नियंत्रित कर रहे हैं जो आर्थिक व्यवस्था को गलत ढंग से डुबाए हुए थीं। यह केवल बैंकों का ही प्रश्न नहीं रहा बल्कि पश्चिमी संसार की अधिकतर देशों की सरकारें अब आर्थिक रूप से विकासशील नहीं हैं।
कारपोरेट लालसा, बेरोजगारी, तालाबंदी एवं 2008 की कारपोरेट को छूट के विरोध में अब विश्व के 80 देशों में आन्दोलन फैल चुका है। वाल स्ट्रीट, सिटी आफ लाडर््स जोकि बैंकिंग एवं आर्थिक हितों के प्रमुख केन्द्र हैं तथा जिन्होंने वित्तीय अनियमितताएँ बड़े पैमाने पर की हैं, उनको बैंकिंग संसार का ‘ग्वान्टा नामो वे’ कहा जा रहा है। विभिन्न सरकारों का बैंक डिपाजिट एवं इन्वेस्टमेंट जो कि सत्ता परिवर्तन के लिए प्रयोग किया जाता है वह अमरीका, ब्रिटेन एवं अन्य यूरोपियन देशों में निवेश किया जाता है। अमरीका तथा ब्रिटेन की सरकारों के प्रशासनिक आदेशों द्वारा इनको अधिगृहीत कर लिया गया है ताकि लीबिया, ईराक एवं अन्य देशों में सत्ता परिवर्तन किया जा सके एवं नाटो शक्तियों के प्राइवेट बैंकों एवं निगमों की बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सके।
नाटो शक्तियों ने इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को खतरे में डाल दिया है एवं उनके नागरिकों की बचत को या तो हड़प लिया है या नष्ट कर दिया है, जबकि बैंकर्स ने स्वयं अपने आपको करोड़ों रूपयों का बोनस प्रदान किया है। पुलिस ने बैंक खातेदारों को गिरफ्तार कर लिया है, ताकि वे उनके धन को निकाल सकें और खाते को बंद कर सकें। इन पाश्विक रणनीतियों की प्राप्ति के उद्देश्य से पूँजीपति एवं कापोरेट वर्ग, नागरिक एवं उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन करने में नहीं चूकते।
दिलचस्प बात यह है कि एक प्रभावशाली नाटो राष्ट्र के प्रतिनिधि ने हड़प करने वाली सरकारों के द्वारा बुलाए गए लीबिया सम्मेलन में जिसमें कि तेल कम्पनियों एवं पूँजीपतियों के प्रतिनिधि भी शामिल थे, उस देश को ‘‘मुकुट मंे आभूषण’’ की संज्ञा दी। यह एक ऐसा वाक्य है जिसके अर्थ से हम हिन्दुस्तानी खूब परिचत हैं। वास्तविकता यह है कि नाटो शक्तियों की राजनैतिक व्यवस्था अब संवैधानिक रूप से प्रजातांत्रिक व्यवस्था नहीं कही जा सकती, क्योंकि आर्थिक कुलीनतंत्रों ने इन देशों की राजनैतिक तथा आर्थिक व्यवस्था पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया है। उन देशों का पुनः उपनिवेशीकरण जो कभी उपनिवेशवाद से मुक्त हुए के अतिरिक्त शक्तिशाली पूँजीवादी हितों की दूसरी रणनीति जो नाटो को नियंत्रित कर रहे हैं उन देशों की सरकारों की राजनैतिक व्यवस्था को समाप्त करना है, जो उनके उद्देश्य में रोड़ा बन रहे हैं। इसके लिए वह उन देशों में ऐसे आन्दोलन चलाते हैं जिसका पैसा नेशनल इनडाउनमेंट फार डेमोक्रेसी अथवा ‘द फोर्ड’ अथवा ‘राकफेलर फाउन्डेशन अथवा अन्य बैंकिंग एवं कारपोरेट हितों के फाउन्डेशन जो यू0एस0ए0, यू0के0, एवं यूरोप के अश्वेत क्रांति के लिए प्रयोग किए जाते हैं। इस उद्देश्य के लिए वे मानव अधिकारोंके हनन का बहाना लेते हैं अथवा फर्जी नरसंहार का आरोप लगाते हैं अथवा जिस सरकार को गिराना होता है उस पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हैं। वे इस प्रकार की सरकार के स्थान पर दूसरी ऐसी सरकार या नेता को लाते हैं जो उनके आदेशों के पूरे गुलाम होते हैं।
-नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

रविवार, 19 सितंबर 2010

महात्मा गांधी की राजनैतिक सार्थकता, भाग 2

एक क्रान्तिकारी की पहचान इस बात से भी होती है कि उसके शिष्य कैसे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग उभरे एवं वह महात्मा गांधी के पद चिन्हों पर चले। अमेरिकी इतिहास के एक बहुत बड़े आन्दोलन का उन्होंने नेतृत्व किया। उन्होंने यू0एस0 के मिलिट्रीवाद का विरोध तथा अमेरिका के अफ्रीकी लोगों की मुक्ति का आन्दोलन चलाया। उनका मत था कि सेना का अन्याय वहाँ के कामकाजी लोगों के खिलाफ हैं, यह मानवता के विरुद्ध है तथा नस्लवाद एवं शोषण को बढ़ावा देता है। महात्मा गांधी का मत था कि एक ऐसे देश में जहाँ लाखों भूखे हांे, खाना ही प्रथम आवश्यकता है। वे कहते थे कि धार्मिक-दर्शन पूरी मानवता के सम्मान का उपदेश देता है, इसमें संस्कृतियों के आधार पर कोई भेद-भाव नहीं है। मार्टिन लूथर किंग इस बात पर जोर देते हैं ‘‘कोई भी धर्म जो मनुष्य की आत्मा की तो चिंता करे और उस गंदी बस्ती की चिंता न करे जिसमें आत्मा पैदा हुई और जहाँ की आर्थिक दशाओं ने उसे लँगड़ा कर रखा है, वह धर्म बीमार है उसे खून देने की जरूरत है’’ राजनैतिक प्रशिक्षण के आलोक में गांधी ने राजनैतिक रणनीति के तौर पर सविनय अवज्ञा, असहयोग, आन्दोलन तथा सत्याग्रह को चुना। भारतीय आन्दोेलन पर भी इस का यह प्रभाव पड़ा कि यहाँ लाखों लोग इस जनसंघर्ष में कूद पड़े जिससे ब्रिटिश साम्राज्यवाद को अपना शासन चलाना मुश्किल हो गया। वर्तमान में बोलोविया की स्थिति पर अगर ग़ौर करें तो वहाँ के देशी लोगों ने एक बड़ा असहयोग आंदोलन चलाकर, राजनैतिक और आर्थिक न्याय को हासिल करने के लिए वहाँ का तख़्ता पलट दिया था।
अब देखिए, दूसरी ओर भारत में मुख्य धारा की राजनैतिक पार्टियों ने ‘आपरेशन ग्रीन हन्ट‘ का कोई विरोध नहीं किया। बहुत बड़ा ‘पैरा मिलिट्री‘ अभियान मध्य एवं पूर्वी भारत के देशी आदिवासियों एवं किसानो के ख़िलाफ़ छेड़ दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी ‘सल्वा जुडुम‘ को बन्द करने के निर्देश दिए थे। जिसकी वित्तीय सहायता मध्य एवं पूर्वी भारत में भारतीय एवं विदेशी मल्टीनेशनल कार्पोरेट खान उत्खनन जगत करता था, जिनका उद्देश्य था उस जमीन को खाली करा लेना जो मिनरल पदार्थों से परिपूर्ण है तथा यह हज़ारों एकड़ जमीन वहाँ के आदिवासियों और किसानो के क़ब्ज़े में पुराने ज़माने से रही है तथा उस पर वह खेती करते चले आ रहे हैं। औद्योगिक स्वार्थों के तहत उस ज़मीन पर बड़े पैमाने पर क़ब्ज़े किए गए तथा गरीब बस्तियों को उजाड़ा गया। कुछ लोगों ने इस ज़्यादती को ‘आन्तरिक उपनिवेशवाद‘ की संज्ञा दी है। कृषि एवं उद्योग के बीच ‘बैलेंस‘ बनाने हेतु अगर गांधी होते तो क्या करते? आज का हाल तो यह है कि कुछ गंाधीवादी जो यहाँ के आदिवासियों एवं कृषकों के हित में काम कर रहे थे वे निशाना बनाए गए तथा जेलों में डाल दिए गए।
गांधी जी की ग़लत तस्वीर पेश की गई, उन्होंने औद्यीगीकरण तथा आर्थिक विकास का कभी विरोध नहीं किया। उनका नज़रिया यह था कि जो भी बड़ी या छोटी इन्डस्ट्री हो उसका मुुख्य उद्देश्य देहातों व शहरों में बेरोज़गारी का ख़त्म करना, होना चाहिए। उनका दृष्टिकोण था कि भारी उद्योगों पर सामाजिक कन्ट्रोल हो, प्रबंधन के सभी सेक्टरों में श्रमिकों की भागीदारी हो और उन्नत कृषि तकनीक हेतु भारी प्रयास किए जाएँ। उनका इस बात पर ज़ोर था कि ग्रामीण ढाँचागत विकास के तहत साफ़ पानी, सफ़ाई, स्वास्थ्य, साक्षरता, शिक्षा, तथा आधारभूत निवास को त्वरित प्राथमिकता दी जानी चाहिए। महात्मा गांधी और माओत्सेतुंग के प्रोग्रामों में बहुत सी समानताएँ हैं। ख़ास तौर से उन देशों में जो उपनिवेशवाद के कारण ऐतिहासिक रूप से तबाह हुए, जहाँ खेतियाँ बर्बाद हुईं, वहाँ आर्थिक उत्थान का आरम्भ कैसे किया जाए, हालाँकि दोनों के तरीक़ों में अन्तर था। माओ एक ऐसे राष्ट्रवादी थे जिनकी चिंताएँ चीन-वासियों हेतु थीं। महात्मा गांधी हालाँकि भारतीय समाज के विशिष्ट हालात को बखूबी समझते थे फिर भी उनकी चिंताएँ समस्त मानवता के लिए थीं। 20वीं सदी के राजनैतिक आन्दोलनों की पूरी समझ रखते थे तथा वे एक राजनैतिक यर्थाथवादी भी थे। महात्मा गांधी ने ‘सेलेक्टेड वकर््स‘ तीसरे खण्ड में ‘रिकान्सट्रकशन प्रोग्राम‘ के अन्तर्गत, जो 1941 में, फिर संशोघित 1945 में प्रकाशित हुआ ‘इकोनामिक इक्वैलिटी‘ के शीर्षक से पैरा 13 में यह कह कर सावधान किया, ‘‘जब तक धनवानों एवं लाखों भूूखों के बीच एक बड़ी खाई बनी रहेगी, एक हिंसा रहित सरकारी-तंत्र का स्थापित होना असंभव है। जब तक नई दिल्ली के बड़े-बड़े महलों एवं गरीब श्रमिक वर्ग की दुखदायी झोपड़ पट्टियों का अन्तर बाकी रहेगा एक न एक दिन हिंसक और खूनी क्रान्ति निश्चित है। जब तक कि धनी वर्ग स्वेच्छा से अपनी सम्पदा और शक्ति को आम भलाई के कामों मंे न लगा दे।
गांधी आज कल के भारतीय एवं अन्य स्थानों के राजनैतिक वर्ग के स्तर तथा व्यक्तिगत स्तर पर स्व-चरित्र के उदाहरण पेश करने पर ज़ोर देते थे। विलासिता पूर्ण, अविवेकी, निर्लज्ज जीवन बिताने हेतु, जीवन भर के लिए ज़रूरत से अधिक सामान एवं धन-सम्पदा एकत्र करना तथा दूसरी ओर एक बड़े समूह का इन सब से वचिंत होना, गांधी जी के विचार में अत्यंत घातक था। वे चाहते थे कि देशवासी सादा, सरल, नैतिक जीवन का ढंग अपनाएँ क्योंकि आज के भारतीय राजनैतिक वर्ग अथवा अन्य का आचरण इसके विपरीत है। अनेक देशों के सरकारी तंत्र भी क़र्ज लेते-लेते इसी चक्रव्यूह में फँसते हैं जिससे उनमें रहने वाले समाज पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।
यह बात निर्विवाद है कि महात्मा गांधी के राजनैतिक संघर्ष का एक मानवीय पहलू भी था, जिसके कारण उन्हें पिछाड़ पाना कठिन था। उन्हों ने व्यक्ति के बजाय समाज की नाइंसाफियों तथा उस राजनैतिक प्रणाली पर अपना ध्यान केन्द्रित रखा जो मानव को दासता की ओर ले जाता है। उनके पास आगे बढ़ने और पीछे पिछड़ने का राजनैतिक कौशल तथा राजनैतिक अनुभवों की गहरी समझ थी। उपनिवेशवाद के खिलाफ़ किसी भी आन्दोलन को इतना अधिक सहयोग एवं विभिन्न विचार धाराओं के लोगों का समर्थन नहीं मिला जितना उनके आन्दोलन को।

-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष-इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लायर्स
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर
फोन-05248-220866
(क्रमश:)

शनिवार, 18 सितंबर 2010

महात्मा गांधी की राजनैतिक सार्थकता, भाग 1

समस्त संसार में ये पूर्वानुमानों के दौर हैं। अनेक क्षेत्रों में हम आर्थिक और वित्तीय गिरावट देख रहे हैं जिसकी बहुत कुछ जिम्मेदारी साम्राज्यवाद के ऐतिहासिक विकास में निहित है। साथ ही साथ मानवीय इतिहास में वह महायुद्ध भी हैं, जिनका उद्देश्य था सभी महाद्वीपों के स्वतंत्र राष्ट्रों को नव उपनिवेश बनाना और बरबाद करना, देशों के बजट, उनके आर्थिक क्षेत्रों व बाजारों को छीनना, प्रत्यक्ष रूप से उस नागरिक आबादी के खात्मे को लक्ष्य बनाना जिसे वे उपभोग और प्राकृतिक संसाधनों के प्रयोग में अपना प्रतिद्वंदी मानते हैं।
अनेक देशों पर सैनिक आक्रमण हुए तथा कब्जे भी हुए जैसे फिलिस्तीन, कांगो, पूर्व योगोस्लाविया, अफगानिस्तान, इराक, सोमालिया, यमन, हैती और वे देश भी जिनको धमकियाँ दी जा रही हैं या आगे जिन पर कार्यवाही होना है जैसे ईरान, रूस, चीन। इन बातों के बावजूद आज तक विस्तारवाद, साम्राज्यवाद, फासिस्टवाद की समस्या के हल के लिए कोई गंभीर राजनैतिक प्रयास नहीं हुए, हालाँकि राजनैतिक आंदोलनों तथा जमीनी मुठभेड़ों के साहस जोर पकड़ते रहे हैं। बहरहाल नतीजा यह निकला कि एक के बाद एक देश सैनिक हमलों से या तो बर्बाद कर दिए गए या फिर आन्तरिक फासिस्टों के आगे नत-मस्तक हुए। इस प्रकार से सैनिक आक्रमण के साथ-साथ घातक प्रोपोगण्डा जो इस समय विश्व स्तर पर हो रहा है उसके खिलाफ नागरिकों को शिक्षित करने में हमारी वैचारिक विफलता जिम्मेदार है और नागरिकों तथा समाज के दीर्घ कालिक राजनैतिक स्वतंत्रता के लिए यह बात घातक भी है। यही बात उन सरकारों के लिए भी है जो ऐतिहासिक क्रांतियों के बाद स्थापित हुईं और जिनके सामथ्र्य को कमजोर कर दिया गया।
अन्य समाजों या संघों के साथ-साथ भारत एवं इसमें रहने वाले एक बार फिर वैश्विक तथा भारतीय बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए आर्थिक एवं वित्तीय वरदान बन गए हैं। भारत सरकार की तीन कमेटियों ने भी यह रिपोर्ट दी है कि भारत की तिहाई आबादी से अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करते हैं और असंगठित कार्य क्षेत्र के लगभग 700 मिलियन श्रमिक प्रतिदिन एक डालर से कम पर और अनेक ऐसे भी हैं जो लगभग बीस रूपये रोज पर जो आधे डालर से कम हैं, जिन्दगी गुजारते हैं। इन हालात के तहत एक चैथी कमेटी ‘‘कृषि सुधार और भूमि सुधार के अधूरे कार्य‘‘ ने भूमि अधिग्रहण की राज्य की नीतियों की आलोचना की है और कहा है यह सब विदेशी तथा भारतीय बहुराष्ट्रीय निगमों को लाभ पहुँचाने के लिए है। यह भी कहा कि वैधानिक अनुशासनहीनता, गरीबी और हिंसा की जो साइकिल है उसका कारण है राज्य का नव उदारवाद का आर्थिक एजेन्डा और उन कानूनों का संशोधन जिनके द्वारा देशी जनजातियों तथा कृषकों के लिए बहुत समय से उन जमीनों को सुरक्षित कर दिया गया था। जिनमें वे खेती करते थे और जिन्हें उनसे छीना नहीं जाता था। व्यापारिक वस्तुओं की अनुमान आधारित फारवर्ड टेªडिंग जो स्वतंत्रता के बाद दशकों तक निषिद्ध थी अब सरकारों ने महज राजनैतिक रंगों के दिखावे के लिए उनकी इजाजत दे दी ताकि फ्री-मार्केट एवं अंधाधुंध विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया जाए। यहाँ तक कि कृषि-व्यापार कम्पनियों के फायदे के लिए खाद्य-पदार्थों के दामों में बेतहाशा वृद्धि भारत को बरबाद करने के लिए की गई। जबकि यह देश हजारों वर्षों से एक कृषि क्षेत्र के रूप में जाना जाता था अनेक प्रकार से खाद्यान्न पैदा किए जाते थे। जहाँ ‘सरप्लस’ की स्थिति होती थी। अब ‘इस्लामी आतंक’ को भी इन्हीं बातों से जोड़ा गया। अनेक क्रूरताओं का जिक्र करें तो देखते हैं कि तमाम बेकुसूर मार डाले जाते हैं बाद में पता चलता हैं कि इनके लिए झूठी कहानियाँ गढ़ी गई थीं तमाम लोगों को बेवजह फाँसा जाता है, इन बातों को अक्सर बचाव पक्ष के वकीलों ने खोला।
मानव जाति को इन तमाम क्रूरताओं से मुक्ति दिलाने हेतु जब हम रणनीति तलाश करते हैं तो 20वीं सदी के तमाम आन्दोलनों में से, इस समय हम को महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले राजनैतिक संघर्ष को याद करना चाहिए। उन्होंने भारतीय आर्थिक क्षेत्र में विदेशी कम्पनियों के दखल का सख्ती से विरोध किया था। विश्व स्तर पर उनकी चिंताएँ इस बात से जाहिर होती हंै कि जब ब्रिटिश सरकार ने यूरोपीय यहूदीवाद से साठ-गाँठ के तहत ‘बालफोर डिक्लेरेशन’ फिलिस्तीन को उपनिवेश बनाने हेतु लागू करना चाहा तो गांधी जी ने उसका विरोध किया। मानव जाति की बरबादी के खिलाफ उनकी आलोचनाएँ जो उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद के कारण र्हुइं तथा अन्यायी राजनैतिक व्यवस्था को उखाड़ फेकने के लिए राजनैतिक प्रशिक्षण हेतु उनकी रणनीति, बहुलवादी संघर्ष, सविनय अवज्ञा एवं असहयोग आदि सभी बातें उन लोगों के लिए अब भी उपयुक्त हैं जो इस, 21वीं सदी में मानव समाज की नई संरचना के उपायों की तलाश में लगे हैं।
1857 के भारतीय स्वतंत्रता के महान युद्ध की विफलता के बाद जिसमें 10 मिलियन भारतीयों की हत्या ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना ने की थी, उपनिवेश वाद की विरोधी ताकतें भी कुछ न कर सकी थीं, महात्मा गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि छिटकी हुई उग्र घटनाएँ ब्रिटिश शासन को नहीं हरा सकतीं। इसके लिए सतत राजनैतिक जागरूकता की शिक्षा,तथा मुख्य मुद्दों पर बहुजन संघर्ष की जरूरत है और यह भी जरूरी बताया कि प्रशासन के प्रत्येक क्षेत्र में इतना अधिक असहयोग हो कि नाइंसाफी का शासन पंगु हो जाए। इस प्रकार असहयोग आंदोलन ने विदेशी राजनैतिक एवं आर्थिक ढाँचे को
ध्वस्त कर दिया, जिससे हम ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ों आन्दोलन’ तक पहुँच गए।


-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष-इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लायर्स
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर
फोन-05248-220866
(क्रमश:)
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