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शनिवार, 28 सितंबर 2013

भगत सिंह का दर्शन

                                   
भगत सिंह और उनके साथियों का सन 1920 में अंग्रेज साम्राज्यवादियो सत्ता के विरुद्ध मोर्चा लेना , भारतीय  स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सदैव ही एक गौरवशाली अध्याय बना रहेगा | एक उच्च आदर्श के लिए अडिग निष्ठा और उस आदर्श को पूरा करने की राह  में आई मुसीबतों की  कहानी , देश वासियों को सदैव विदेशी आधिपत्य या जनता के किसी भी प्रकार के आर्थिक बंधन का नामो -- निशाँ तक मिटा देने के लिए संघर्ष को प्रेरित करती रहेगी |

  भगत सिंह
उनके बालपन में जनता के संघर्ष
जनता का गुसा '' रौलेक्ट एक्ट '' के खिलाफ था , जिसके द्वारा अंग्रेज सरकार ने यह कोशिश की थी कि प्रथम विश्व युद्ध के समय की असाधारण दमनकारी धाराओं को युद्ध के बाद भी जारी  रखा जाए | सारे देश में उथल पुथल थी , प्रदर्शन हो रहे थे , जगह - जगह हडतालो की बाढ़ आ गयी थी |  बम्बई की हडतालो में सूती मिलो के एक लाख से भी ज्यादा मजदूर काम छोड़कर सडको पर आ गये थे | सरकार जनता पर भीषण दमन का चक्र चला रही थी | अप्रैल 1919  में अमृतसर के जलियावाला बाग़ में जनरल डायर ने सभा में एकत्र हुए जन समूह पर गोलिया बरसाकर निहत्थे आदमियों , औरतो तथा बच्चो का कत्ल  कर दिया , पर आन्दोलन रुका नही चलता रहा |
 कांग्रेसी वालन्टियर के रूप में
भगत सिंह का जन्म लाहौर से कुछ मील दूर सिन्दा गाँव में किसानी करने वाले एक सिख परिवार में हुआ था | उनके पिता -- सरदार किशन सिंह आर्य समाज के समाज सुधार आन्दोलन में शामिल होने के कारण प्रसिद्ध थे | भगत सिंह ने अपने स्कूली जीवन में  ''रौलेक्ट एक्ट  '' के खिलाफ होने वाले जनता के प्रदर्शनों के उथल पुथल भरे दिन देखे थे | अग्रेजी शासन के खिलाफ आम जनता की घृणा ने -- जो अपने -- आप फूट पड़ी थी और जिसका इजहार लाहौर में तीन मील लम्बे जलूस तथा उसके बाद होने वाली सप्ताह भर की शानदार हड़ताल में हुआ था -- स्वाभाविक  तौर पर इस बारह वर्ष के बालक के दिमाग पर एक गहरा असर डाला था | उसके कोमल मस्तिष्क पर अपनी गहरी छाप छोड़ी थी |
दो वर्ष बाद  भगत सिंह ने असहयोग -- आन्दोलन में एक कांग्रेसी वालंटियर की हैसियत से अपनी सक्रिय राजनैतिक शिक्षार्थी -- जीवन  की शुरुआत की | उन्होंने सिख गुरुद्वारे के प्रचार -- आन्दोलन में भी सक्रिय भाग लिया | यह आन्दोलन गुरुद्वारे की विशाल भूमि की सम्पत्ति पर थोड़े से महन्तों का ही सम्पत्ति -- अधिकार बनाये रखने के विरुद्ध , और उसे सारे सिख समुदाय की पंचायत के अधिकार में लाने के लिए था | सत्याग्रह सफल हुआ | पर उसके बाद , सिखों के एक हिस्से में साम्प्रदायिकता बढने लगी , परन्तु भगत सिंह साम्प्रदायिकता से दूर रहे उन्होंने उसमे सहयोग नही दिया | इतनी कुछ सक्रियता के बाद भगत सिंह ने पंजाब नेशनल कालेज में नाम लिखाया , तब वह अपने संक्षिप्त पर सितारे की तरह झिलमिलाते हुए क्रांतिकारी जीवन के द्वार पर ही थे |
यही पर वह सुखदेव और उन दूसरे साथियों से मिले जो आगे चलकर क्रांतिकारी कार्य
में उनके साथी बने | इसी दौरान में उत्तर परदेश के क्रान्तिकारियो द्वारा संगठित '' हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी '' से सम्पर्क किया 
'' हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियसन ''
सितम्बर सन 1928 में इन क्रान्तिकारियो का काम एक महत्वपूर्ण मंजिल तक पहुच गया था जब मुख्यत: भगत सिंह , सुखदेव , विजय कुमार सिन्हा और शिव वर्मा के प्रयत्नों से उत्तर प्रदेश, पंजाब , राजपुताना  , और बिहार के क्रांतिकारी दलों के प्रतिनिधियों ने दिल्ली में फिरोजशाह कोटला के पास कांफ्रेंस की | दो दिन की बहस के बाद एक नया  संगठन बनाया गया जिसका नाम '' दि हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन रखा गया | उसकी केन्द्रीय समिति भी चुनी गयी और सभी प्रान्तों से सम्पर्क रखने का कम विजय कुमार सिन्हा और भगत सिंह को सौपा गया इस कांफ्रेंस में समाजवादी जनतांत्रिक राज्य की स्थापना के उद्देश्य का स्वीकृत होना बताता है कि रुसी क्रांति के फलस्वरूप भारत के अधिकाधिक तरुणों में समाजवादी विचारों का प्रसार होता जा रहा था | भगत सिंह कुछ समय के लिए '' कृति ''  के दफ्तर से भी काम कर चुके थे | इस समाजवादी पत्र को पंजाब के कम्युनिस्ट नेता सरदार सोहन सिंह '' जोश '' ने शुरू किया था | भारत के साम्राज्यवाद ---- विरोधी संघर्ष में मार्क्सवाद -- लेलिनवाद के अस्त्र को काम  में लाने का पूरा अर्थ तो इन क्रान्तिकारियो ने भी अभी तक नही समझा था लेकिन उनमे इस विश्वास ने जड़ जमा ली थी कि मनुष्य द्वारा होने वाले मनुष्य के शोषण को सिर्फ समाजवाद ही खत्म कर सकता है |
उनके इरादे
क्या भगत सिंह और उनके साथी गोरी चमड़ी वाले अफसरों के खिलाफ थे जो अन्याय करते थे  | साण्डर्स को गोली मारने के बाद बाटे हुए उनके पर्चे को देखने पर , कोई भी उन पर ऐसा लाक्षण नही लगा सकता था | असेम्बली भवन में बाटे हुए उनके पर्चे भी यही बताते है | उन पर्चो से मनुष्यों के रक्तपात के प्रति उनकी दिली नफरत और न्याय के लिए उनकी ललक की भी झलक मिलती है | अंग्रेज शासन का हित इसी में था कि जनता के सामने भगत सिंह के कार्यो को दूसरे ही रंगों में पेश किया जाए नही तो उनकी अमानुषिक दण्ड देने पर सारे  देश की संवेदना और क्रोध का ज्वार उमड़ पड़ता | इसीलिए उस परचे पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था | हिन्दुस्तान टाइम्स के एक उत्साही सवाददाता ने किसी तरह विस्फोट के ठीक बाद ही उस परचे की एक प्रति हासिल कर ली और उसी दिन दोपहर को अखबार का एक विशेष संस्करण निकला जिसने उसके विषय की जानकारी को जनता की सम्पत्ति बना दिया |
परचा इस प्रकार था -----'' बधिरों को सुनाने के लिए एक भारी आवाज की आवश्यकता पड़ती है |
ऐसे ही एक अवसर पर , एक फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद -- भाईयो -- द्वारा कहे गये इन अमर शब्दों के साथ   '' हम दृढतापूर्वक  अपने इस कार्य को न्यायपूर्ण ठहराते है | ''
'' हम यहाँ सुधारों ( माटेग्यु - चेम्सफोर्ड सुधारों ) के लागू होने के पिछले दस वर्षो के अपमानजनक इतिहास की कहानी को बिना दोहराए और भारत के माथे पर इस सदन -- इस तथा कथित भारतीय प्रालियामेंट द्वारा मढ़े हुए अपमानो का भी बिना कोई जिक्र किये देख रहे है कि इस बार फिर , जबकि साइमन कमीशन  से कुछ और सुधारों की आशा करने वाले लोग उन टुकडो के बटवारे के लिए ही एक दूसरे पर भौक रहे है ,, सरकार हमारे उपर पब्लिक सेफ्टी ( जन सुरक्षा ) और ट्रेडर्स डिस्प्यूट्स ( औद्योगिक विवाद ) जैसे दमनकारी बिलों ( विध्येको ) को थोप रही है | ' प्रेस सेडीशन बिल ' को उसने अगली बैठक के लिए रख छोड़ा है | खुले आम काम करने वाले मजदूर नेताओं की अन्धाधुन्ध गिरफ्तारिया साफ़ बताती है कि हवा का रुख किस तरफ है |
इस अत्यंत ही उतेजनापूर्ण  परिस्थितियों में पूरी स्जिदगी के साथ अपनी पूरी जिम्मेदारी महसूस करते  हुए , ( हि. सो , रि ए  ) ने अपनी सेना को यह विशेष कार्य करने का आदेश दिया है जिससे कि इस अपमानजनक नाटक पर परदा गिराया जा सके | विदेशी नौकरशाह शोषक मनमानी कर ले | लेकिन जनता की आँखों के सामने उनका असली रूप  प्रकट होना चाहिए |
जनता के प्रतिनिधि अपने चुनाव -- क्षेत्रो में वापिस लौट जाए और जनता को आगामी क्रान्ति के लिए तैयार करे | और सरकार भी यह समझ ले कि असहाय भारतीय जनता की ओर से ' पब्लिक सेफ्टी ' और ट्रेडर्स डिस्प्यूटस ' बिलों तथा लाला लाजपत राय की निर्मम हत्या का विरोध करते हुए हम उस पाठ पर जोर देना चाहते है जो इतिहास अक्सर दोहराया करता है |
यह स्वीकार करते हुए दुःख होता है कि हमे भी जो मनुष्य को जीवन को इतना पवित्र मानते है , जो एक ऐसे वैभवशाली भविष्य का सपना देखते है जब मनुष्य परम शान्ति और पूर्ण स्वतंत्रता भोगेगा , मनुष्य का रक्त  बहाने पर विवश होना पड़ा है | लेकिन मनुष्य द्वारा होने वाले मनुष्य के शोषण को असम्भव बनाकर सभी के लिए स्वतंत्रता लाने वाली महान क्रान्ति की वेदी पर कुछ व्यक्तियों  का बलिदान अवश्यभावी है |
इन्कलाब जिंदाबाद    हस्ताक्षर
 बलराज ( कमांडर इन चीफ ) 
भगत सिंह का दर्शन -- के  क्रांति और बमो के संदर्भ में
 भगत सिंह क्रान्ति को किस रूप में समझते थे ?
दिल्ली सेशन जज द्वारा आजन्म कैद की सजा के फैसले के खिलाफ लाहौर हाईकोर्ट  में अपनी अपील की सुनवाई के समय उन्होंने अदालत में कहा था : -- '' क्रान्ति संसार  का नियम है , वह मानवीय प्रगति का रहस्य है | लेकिन '' उनमे रक्तरंजित संघर्ष बिलकुल लाजिमी नही है और न उसमे व्यक्तिगत प्रति  -- हिंसा  की ही कोई जगह है | वह बम और पिस्तौल का सम्प्रदाय नही है |
लेकिन तब भगत सिंह और उनकी पार्टी द्वारा  संगठित साण्डर्स गोलीकांड और तमाम बमो के विस्फोटो का क्या अर्थ लगाया जाना चाहिए ? साण्डर्स से असेम्बली के बम फोड़ने  के बाद बाटे गये परचे इन कृत्यों के कारणों को बताते है | दिल्ली लाहौर की अदालतों में दिए गये भगत सिंह के वक्तव्य में उन्हें विस्तृत रूप से रखा गया था | उन्होंने बिलकुल स्पष्ट तौर पर कहा था वह और उनके साथी विदेशी शासन के कसमसिया  दुश्मन होते हुए भी किसी व्यक्ति के प्रति अंधी और कुत्सित घृणा की भावना से प्रेरित नही थे |
बटुकेश्वर दत्त के साथ , एक संयुक्त वक्तव्य में उन्होंने स्पष्ट रूप से घोषित किया था :: '' हम मानवीय जीवन को अकथनीय पवित्रता देते है | मानवता की सेवा किसी को हानि पहुचाने की अपेक्षा शीघ्र ही अपने स्वंय के जीवन को होम कर देगे | हम समाजवादी सेना के भाड़े के सैनिको के तरह नही है , जिन्हें बिना किसी अफ़सोस के हत्या करने का अनुशासन सिखाया जाता है | हम मानवीय जीवन का आदर करते है जहा तक बनता है उसे बचाने के कोशिश करते है | इस पर भी , हम असेम्बली भवन में जानबूझकर बम फेकने के काम को स्वीकार करते है | तथ्य स्वंय ही अपनी कहानी कहते है और उद्देश्यों  की परख उस काम प्रणाम को देखकर ही करनी चाहिए , न कि कल्पित परिस्थितियों और मनमानी धारणाओं के आधार पर |
'' सरकारी पक्ष के विशेषज्ञ के सबूतों के बावजूद , असेम्बली भवन में फेके जाने वाले बमो से आधे दर्जन से भी कम लोगो को कुछ खरोचे भर लगी यदि उन बमो में कुछ ज्यादा क्लोरेट पोटाश का पूत दे दिया जाता  और जेल किस्म की पिक्रेट ( एसिड ) का भी मिश्रण  होता , तो उनसे चारो ओर का टीम -- ताम ही चकनाचूर हो जाता और विस्फोट के कुछ गजो के दायरे में तमाम लोग धाराशायी हो जाते | यदि , उन बमो में कुछ दूसरे अधिक विस्फोटक प्रदार्थ व नाशकारी चहरे या सुइया आदि भी मिला दी जाती तो वह विधान सभा के अधिकांश सदस्यों को खत्म करने के लिए काफी होते | इस पर भी हम उन्हें अफसरों के बैठने के स्थान पर फेंक सकते थे जहा बहुत ख़ास -- ख़ास लोग ठसाठस भरे थे | और अंत में हम उन बमो का निशाना सर जान  साइमन को भी बना सकते थे जो उस समय अध्यक्ष की गैलरी में बैठा था , जिसके अभागे कमिशन से सभी जिम्मेदार आदमी नफरत करते थे | लेकिन यह सब कुछ तो हमारा उद्देश्य नही था | बमो ने ठीक उतना ही काम  किया जितने के लिए वे बनाये गये थे | जिसे चमत्कार कहा जाता है वह कुछ और नही , एक समझा बुझा हुआ उद्देश्य ही था , जिसके कारण वे हानिरहित स्थानों पर ही फेंके गये थे | ''
अपने  मुकदमे में बहस करते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि विठ्ठल  भाई पटेल  , पंडित मोतोलाल नेहरु  , पंडित मदन मोहन मालवीय तथा दूसरे आदरणीय नेताओ पर संहारक बम फेकने  की बात वे सपने में भी नही सोच सकते थे -- यह अलग बात थी कि क्रांतिकारी  उन नेताओं के विचारो से सहमत नही थे | उनके साधनों में विश्वास नही करते थे | भगत सिंह ने मिस्टर जसिस्ट फोर्ड से पूछा था : '' यदि एक आदमी इस तरकीब से एक बम बनाता है कि उससे किसी को भी कोई गम्भीर चोट नही लग सकती और वह उसके फटने के वक्त ज्यादा से ज्यादा सावधानी बरतता है कि कोई ऐसी चोट न लग सके , तब भी क्या वह आदमी हत्या का पर्यटन करने का अपराधी होगा ?
मिस्टर फोर्ड :  '' तुमको यह साबित करना होगा कि वह बम इसी प्रकार का था , और उसको ऐसे ढंग से फेंका गया था कि किसी आदमी के जीवन को खतरा पैदा न हो | "
भगत सिंह : '' हम उन बमो की सीमित शक्ति जानते थे , और किसी को भी चोट न लगने देने के लिए हमने हर संभव सावधानी बरती थी | ''
उन्होंने आगे कहा कि जनरल दायर ने जालियावाला बाग़ में सैकड़ो आदमियों की हत्या की थी , लेकिन उस पर कभी भी मुकदमा नही चलाया गया था | इसके विपरीत उसके  देश के लोगो ने उसे लाखो का इनाम दिया था | वह कहते गये उसकी तुलना में
'' हम एक कमजोर बम बनाते है और जानबूझकर उसे एक खाली  स्थान पर फेंकते है | पर हम , पर मुकदमा चलाया जाता है और आजन्म कैद की सजा सुनाई  जाती है | किसी की हत्या करने का  हमारा इरादा नही था | द्देष शब्द को निकल दीजिये बस मुझे संतोष हो जाएगा | हमारा एक निश्चित आदर्श है हम अपने आदर्श को पाने के लिए कुछ साधन अपनाए थे | ''
भगत सिंह को ऐसा कोई बचकाना भ्रम नही था कि बमो से ही क्रान्ति आ जायेगी | या ऐसा करना क्रान्ति की ओर एक आगे बढा हुआ कदम होगा | परतंत्र मातृभूमि की वेदना ने उनके हृदय में विद्रोह की भावना जगा दी | बमो का प्रयोग देशवासियों की हृदय -- विदारक पीड़ा के प्रति उनके '' क्षोभ का अभिव्यक्तिकरण ही था |

दिल्ली के अदालत में उन्होंने कहा था '' समाज का वास्तविक पोषक मजदूर है | जनता का प्रभुत्व मजदूरो का अंतिम  भाग्य है | इन आदर्शो और विश्वासों के लिए , हम हर उस कष्ट का स्वागत करेंगे जिसकी हमे सजा दी जायेगी | हम अपनी तरुणाई को इसी क्रान्ति की वेदी पर होम करने लाये है क्योकि इतने गौरवशाली उद्देश्य के लिए कोई भी बलिदान बहुत बड़ा नही है | क्रान्ति के आगमन की प्रतीक्षा करने में हमे संतोष है '' |
उनके विचार से क्रान्ति का उद्देश्य '' स्पष्ट रूप से अन्याय पर खड़ी हुई वर्तमान व्यवस्था '' को बदलना था | यह अन्याय किस जगह पर होता है ?
'' समाज के सबसे आवश्यक तत्व होते हुए भी उत्पादन करने वालो या मजदूरो से उनके शोषक उनकी मेहनत का फल लूट लेते है , और उनको प्रारम्भिक अधिकारों से भी वंचित कर देते है | एक ओर तो सभी के लिए अनाज पैदा करने वाले किसानो के परिवार भूखो मरते है सारे संसार के बाजारों को सूत जुटाने वाला जुलाहा अपना और अपने बच्चो का तन ढकने के लिए भी पूरा कपडा नही जूता पता शानदार महल खड़े करने वाले राज लुहार और बढ़ई झोपड़ियो में ही बसर करते और मर जाते है और दूसरी ओर पूजीपति शोषक -- समाज की जोंके  -- अपनी संको पर ही करोड़ो बहा  देते है | ''  भगत सिंह ने कहा था कि इसीलिए एक उग्र परिवर्तन की आवश्यकता थी और लोग भी महसूस कर चुके थे उनका कर्तव्य था कि '' एक  समाजवादी आधार पर समाज का पुनर्गठन करे | ''
'' जब तक यह नही किया जता और मनुष्य द्वारा होने वेक मनुष्य के , तथा साम्राज्यवाद का चोगा पहने हुए देश द्वारा देश के शोषण का अंत नही किया जता , मानवता की इस मुसीबत और खूनखराबे को , जो आज उसे धमका रही है , नही रोका जा सकता | दरअसल इसके बिना युद्धों को अंत करने और विश्व व्यापी शान्ति के युग को लाने की सारी बाते ऐसी व्यवस्था की स्थापना जिसमे इस प्रकार के हडकम्प का भय न हो और जिसमे मजदुर वर्ग के प्रभुत्व को मान्यता दी जाए और उसके फलस्वरूप विश्व संघ पूजीवाद के बन्धनों , दुखो तथा युद्धों की मुसीबतों से मानवता का उद्धार कर सके | '' आज भी भगत सिंह के विचार प्रासंगिक है |

-सुनील दत्ता
 स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक

शनिवार, 22 सितंबर 2012

इस्लाम के दानवीकरण का दुष्चक्र



हम एक अजीब-से दौर से गुजर रहे हैं। एक ओर विज्ञान तकनीक और तार्किक सोच ने हमें मानवता की बेहतरी के लिए अनेक भौतिक और बौद्धिक उपाय दिए हैं वहीं हमारी दुनिया ने इन दिनों भड़काऊ बातें कहने का फैशन सा बन गया है। साहित्य और विशेष कर फिल्मों के जरिए एक धर्म विशेष-इस्लाम-का दानवीयकरण करने के प्रयास हो रहे हंै। मुस्लिम समुदाय का एक हिस्सा स्वयं को आतंकित और असुरक्षित महसूस कर रहा है और अपने धर्म के अपमान के विरोध में सड़कों पर उतर आया है। अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस भी जारी है परन्तु यह समझना मुश्किल है कि अभिव्यक्ति की आजादी का उपयोग हमेशा एक धर्म विशेष को अपमानित करने और उसका दानवीयकरण करने के लिए ही क्यांे किया जाता है।
इन दिनों (सितम्बर 2012) दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अमेरिकी दूतावासों के सामने विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इन विरोध प्रदर्शनों में हिंसा भी हुई है जिसमें राजदूत क्रिस स्टिवेंस सहित चार अमेरिकी राजनयिक बेन्गाजी में मारे गये हैं। कई देशो ने गूगल, जो कि यूट्यूब का मालिक है, से कहा है कि यूट्यूब से यह उत्तेजक और अपमानजनक विडि़यो क्लिप हटा दी जाए। अमेरीका अब तक “अभिव्यक्ति की आजादी” के नारे पर अटका हुआ है और  बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी देश की सड़कों पर अपना विरोध व्यक्त कर रहे हैं।
यह विडि़यो क्लिप लगभग 14 मिनट लम्बी है और एक फीचर फिल्म का हिस्सा है, जिसके निर्माता अमेरिका में रहने वाले एक ईसाई नकोला बेसीले हैं। फिल्म में इस्लाम का जम कर अपमान किया गया है। दाढ़ी वाले आधुनिक मुसलमानांे की भीड़ को ईसाईयों पर हमला करते दिखाया गया है। फिल्म अपने दर्शकों को अतीत में भी ले जाती है जहां पैगंबर मोहम्मद के जीवनवृत्त को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है। फिल्म मे बताया गया है कि पैगंबर साहब का व्यक्तित्व व सोच, अत्यंत नकारात्मक और आक्रामक थी। इस फिल्म में देखने लायक कुछ भी नही है और इसे बनाने वालों के इरादे भी संदिग्ध हैं। मुसलमानों के एक तबके ने इस फिल्म पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है। यहां यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि इस मामले मे सभी मुसलमानों की प्रतिक्रिया एक सी नही रही है। कुछ धर्मगुरूओं ने मुसलमानो से धैर्य बनाये रखने के लिए कहा है। इन लोगांे का कहना है कि इस्लाम शांति का धर्म है और इसलिए किसी भी प्रकार के हिंसक विरोध प्रदर्शन नही होने चाहिए। कुत्सित इरादों से बनाई गई इस घटिया फिल्म का सबसे अच्छा जवाब दिया है मुसलमानो के एक समूह ने, जो कि अमन के संदेशवाहक, पैगंबर मोहम्मद के जीवन पर लिखी गई किताबें बांट रहे हंै।
पिछले कुछ सालों से पश्चिमी देशों और यहां भारत में भी, इस्लाम का दानवीकरण करने की परंपरा सी बन गई है। हम सब को वह डैनिश कार्टून याद है जिसमें पैगम्बर मोहम्मद को अपनी पगड़ी में बम छुपाए एक आतंकवादी के रूप में दिखाया गया था। फ्लोरिडा के एक पास्टर ने यह घोषणा की थी कि चूंकि कुरान हिंसा सिखाती है इसलिए वे उसे सार्वजनिक रूप से जलाएंगे। अफगानिस्तान में कुछ अमेरिकी सैनिको ने भी यह कह कर कुरान की प्रतियां जलाई थीं कि उनमंे आतंकवादियों के कुछ गुप्त संदेश लिखे हुए हैं।
इस्लाम और मुसलमानांे के दानवीकरण में हम एक प्रकार की योजना और एजेंडा देख सकते हैं। ये कार्टून और फिल्में दरअसल उस राजनैतिक प्रक्रिया की उपज हैं, जिसका उद्देश्य पश्चिम एशिया में तेल के कुओं पर कब्जा करना है। इरान में अमेरिका के पिट्ठू रज़ा पहलवी को हटा कर अयातुल्लाह खुमैनी के सत्ता में आने के बाद से ही, अमेरिका “इस्लाम-नया खतरा” का नारा बुलंद करता आ रहा है।  अमेरिका ने ही पाकिस्तान में मदरसे स्थापित किए ताकि मुस्लिम युवकों को अलकायदा और तालिबान के झंडे तले अफगानिस्तान पर काबिज़ सोवियत सेना से लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। इससे हालात और बिगड़े। इन मदरसों में काफिर और जिहाद जैसे शब्दो का अर्थ तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता था ताकि मुस्लिम युवको को धर्म के नाम पर हिंसा करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। वल्र्ड टेªड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद अमेरिकी मीडिया ने बड़ी चालाकी से “इस्लामिक आतंकवाद” शब्द गढ़ लिया। इस शब्द का अन्य देशांे का मीडिया भी इस्तेमाल करने लगा और धीरे धीरे यह सामूहिक सामाजिक सोच का हिस्सा बन गया। यह पूरा घटनाक्रम एक साम्राज्यवादी ताकत द्वारा अपने राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए धर्म के दुरूपयोग का उदाहरण है। दरअसल, इस्लाम का दानवीकरण, अमेरिकी नीति का भाग है। इसके पीछे अमेरिका अपने असली उद्देश्य-अर्थात तेल संसाधनो पर कब्जा-को छिपाना चाहता है। नोयम चोमोस्की ने एक शब्द गढ़ा था “सहमति का उत्पादन”। अमेरिका ने इस्लामिक आतंकवाद शब्द को इसलिए गढ़ा ताकि उसके, अफगानिस्तान और ईराक पर सैनिक आक्रमण करने के लिए “सहमति का उत्पादन” किया जा सके।
अमेरिका की इस नीति से दो अलग-अलग प्रक्रियाएं शुरू हुई हैं। एक ओर इस्लाम के खिलाफ घृणा फैलाने के अभियान ने हालिया फिल्म, डेनिश कार्टून और पास्टर द्वारा कुरान को जलाने जैसी घटनाओं को जन्म दिया है। अमेरिकी प्रचार को विश्वसनीयता प्रदान करने के लिए अमेरिका ने “सभ्यताओं का टकराव” के सिद्धांत का अविष्कार किया है। इस सिद्धांत के अनुसार, आधुनिक विश्व इतिहास, पिछड़ी हुई इस्लामिक सभ्यताआंे के विकसित पश्चिमी सभ्यताओं पर आक्रमण का इतिहास है। इसी तोड़ी-मरोड़ी हुई सोच और विचारधारा का इस्तेमाल पश्चिम एशिया मे अमेरिकी एजेंडे को लागू करने के लिए किया जाता है। इस सबसे पूरे विश्व के मुसलमानों की सोच मंे अंतर आया है।  कुछ मुसलमान यह मानने लगे हैं कि अफगानिस्तान व इराक पर अमेरीकी हमले के बाद, वे इस दुनिया में सुरक्षित नहीं रह गये हैं। भारत में संघ परिवार की राजनीति ने इस समस्या को नया आयाम दिया। संघ ने राममंदिर का मुद्दा उठाकर मुसलमानो को कटघरे में खड़ा कर दिया। भारतीय मुसलमानांे के एक बड़े हिस्से को यह लगने लगा कि उसे आतंकित किया जा रहा है और सब ओर से घेर लिया गया है। इस परिस्थिति में पहचान से जुडे़ मुद्दो को लेकर मुसलमानों को एक करना आसान हो गया। जब भी कोई समुदाय स्वयं को हर तरफ से घिरा हुआ पाता है तब उसे उत्तेजित करना और किसी भी आक्रामक धार्मिक अभियान का हिस्सा बनाना, आसान हो जाता है।
यह एक तरह का दुष्चक्र है जिसमें इस्लाम का डर एक ओर है और घुटन महसूस कर रहा  आतंकित मुस्लिम समाज दूसरी ओर। इन परिस्थितियों में वे मुस्लिम धर्मगुरू ही समुदाय की प्रेरणा के स्त्रोत हो सकते हैं जो  शांति की बात कर रहे हंै। जो मुसलमान पैगम्बर मोहम्मद के जीवन पर आधारित पुस्तकें बांट रहे हैं, वे बधाई के हकदार है समुदाय की प्रतिक्रिया इसी प्रकार की होना चाहिए। अमेरिका के साम्राज्यवादी इरादों और उसके भारी भरकम प्रचार तंत्र से कैसे निपटा जाए, जिनके जरिए अमेरिका दुनिया के कई इलाकों में गड़बडियां फैला रहा है? क्या इस पर किसी तरह से नियंत्रण पाया जा सकता है? ?
जिन दिनो कोफी अन्नान संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव थे, एक उच्चस्तरीय समिति ने एक रपट तैयार की थी जिसका शीर्षक था “सभ्यताओं का गठजोड़” परन्तु इस्लाम को बदनाम करने के अभियान की तुलना में इस रपट को समुचित प्रचार न मिल सका। अब समय आ गया है कि मानवता उन मानवीय मूल्यों को अपनाए जो हमारी सभ्यता में सदियों के विचार-विनिमय के आधार पर उभरे हंै-उन मूल्यों को, जिनके कारण संयुक्त राष्ट्रसंघ ने सभी के लिए मूल मानवाधिकारों के घोषणापत्र जारी किये हैं और जिनके कारण “सभ्यताओं के गठजोड़” जैसी रपटें बनती हैं।
मुसलमानों का एक तबका ऐसा भी है जो अनुचित ढंग से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है। दरअसल जो लोग या ताकतें इस्लाम के दानवीकरण और इस तरह की फिल्मों के निर्माण के पीछे हैं, वही कुछ मुसलमानों की हिंसक कार्यवाहियों के लिए भी जिम्मेदार हैं। क्या हम संयुक्त राष्ट्रसंघ को एक ऐसे वैश्विक मंच के रूप में पुनर्जीवित नही कर सकते जो यह सुनिश्चित करे कि विभिन्न राष्ट्रांे और उनके मीडिया का आचार- व्यवहार ऐसा हो जिससे प्रजातंत्र और मानवीय गरिमा में अभिवृद्धि हो? क्या पूरा विश्व दुनिया की एकमात्र विश्वशक्ति के आक्रामक तेवरों से निपटने के लिए आगे नहीं आ सकता? अगर ऐसा हुआ तो इस तरह की फिल्मों पर हिंसक प्रतिक्रिया नहीं होगी। बल्कि शायद दूसरों के धर्म को अपमानित करने के प्रयासों मंे भी कमी आयेगी। अगर कुछ लोग इस तरह की फिल्म बनांएगे तो कुछ वैसी फिल्मे भी बनेंगी जो पैगंबर मोहम्मद के दुनिया को शांति के संदेश पर आधारित होंगी।
अंत में, हमें अभिव्यक्ति की आजादी को तो कायम रखना होगा। परन्तु इसकी कुछ सीमाएं भी तय करनी होंगी। हमे विरोध व्यक्त करने के ऐसे तरीकों का विकास करना होगा जिनसे उन्माद के स्थान पर मर्यादित व तार्किक ढंग से विरोध दर्ज कराया जा सके।

 -राम पुनियानी

गुरुवार, 22 मार्च 2012

23 मार्च:शहीदे आजम भगत सिंह


अजीब था शहीदे आजम भगत सिंह
हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली
ये मुश्ते -ख़ाक हैं ,फानी रहे रहे न रहे |
फांसी के समय भगत सिंह की उम्र कुल 23 साल थी |उनके क्रांतिकारी जीवन की कुल अवधि 1923 से लेकर 1931 तक के कुल 8 वर्षो की ही रही |इतनी कम उम्र और इतने कम राजनितिक जीवन में भगत सिंह ब्रिटिश साम्राज्य से राष्ट्र की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए देश के मेहनतकशो की मुक्ति के लिए वैचारिक एवं व्यावहरिक क्रान्ति का विराट और अथक प्रयास करते रहे |यह दुर्भाग्यपूर्ण है की देश का जन मानस उन्हें बम -पिस्तौल वाले बहादुर नौजवान राष्ट्रभक्त क्रांतिकारी के रूप में ही जानते है |विदेशी शोषण -लूट व परतंत्रता के संबंधो से राष्ट्र की पूर्ण स्वतंत्रता और राष्ट्र के मेहनत कशो के हित में समाज के क्रांतिकारी बदलाव के उनके महान वैचारिक और बहुआयामी प्रयासों को नही जानता |जबकि भगत सिंह की उच्चता ,महानता को समझने के लिए वर्तमान परिस्थितियों में राष्ट्र व समाज के क्रांतिकारी बदलाव के लिए भी देश के जनसाधारण को उनके उन प्रयासों को जानना जरूरी है |भगत सिंह के विचारों को आज के संदर्भ में जानने समझने का प्रयास जरुर किया जाना चाहिए |आज भगत सिंह हमारे बीच नही है लेकिन उनके चिंतन व विचार मौजूद है |

स्वतंत्रता आन्दोलन के क्रान्तिकारियो ,शहीदों में सबसे ज्यादा प्रसिद्धि प्राप्त नाम भगत सिंह का ही है |23 मार्च 1931 के दिन राजगुरु व सुखदेव के साथ उन्हें फांसी दी गयी थी |तब से आज तक देश के हर क्षेत्र में भगत सिंह व उनके साथियो के शहादत के दिन को 'शहीद दिवस ' के रूप में मनाया जाता है |भगत सिंह की शहादत के सर्वाधिक ऊँचे मूल्याकन के फलस्वरूप देश का जन मानस उन्हें 'शहीदे -आजम 'भगत सिंह के रूप में याद करता आ रहा है |उनके 81 वे शहादत दिवस के अवसर पर यह देखना और समझना बेहतर रहेगा कि उनकी शहादत का इतना उंचा मूल्याकन आखिर क्योंकर किया जाता है ?और हमे यह भी समझना होगा कि वर्तमान दौर में भगत सिंह और अन्य क्रान्तिकारियो को याद करने के साथ उनके क्रांतिकारी विचारों ,व्यवहारों से कुछ प्रेरणा ली जा सकती है या ली जानी चाहिए ?
जंहा तक भगत सिंह के सर्वाधिक मूल्याकन का सवाल है तो इसके लिए केवल भगत सिंह के जीवन एवं संघर्ष को ही जानना काफी नही होगा बल्कि उस दौर कि यानी 1907 से 1931 के दौर कि परिस्थितियों को तथा उसके महत्व व महानता को जानना ,समझना भी एकदम जरूरी है |क्योंकि ऐसी परिस्थितिया ही भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारी विभूतियों कि सृजनकर्ता होती है |ऐसी परिस्थितिया ही एक नही अनेकानेक महान विभूतियों को क्रान्तिकारियो और शहीदों को जन्म देती है |उनमे से कुछ विभूतियों को महानता के शिखर पर पहुचने का अवसर प्रदान करती है |भगत सिंह और उनकी शहादत कि महानता कि पृष्ठभूमि में भी ऐसी महान परिस्थितिया मौजूद रही है |कोई महान परिस्थिति भी अचानक नही बन जाती बल्कि वह अपेक्षित सामाजिक संघर्षो कि एक कड़ी के रूप में विकसित होती है |1905 -06 के बाद राष्ट्रीय संघर्षो के उभार कि परिस्थितियों के निर्माण में भी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उसके पहले और बाद में चले ब्रिटिश विरोधी आंदोलनों ,संघर्षो का निश्चित योगदान था |इतिहास कि थोड़ी बहुत जानकारी रखने वाला हर व्यक्ति जानता है कि भगत सिंह के समय कि वैश्विक परिस्थितिया महान परिवर्तनकारी परिस्थितिया थी |खासकर प्रथम विश्व युद्ध (1914-1917)के दौरान और उसके बाद रूस व कई यूरोपीय देशो में समाजवादी आंदोलनों व संघर्षो का सिलसिला चल पडा था |इसी के साथ हिन्दुस्तान जैसे तमाम पिछड़े व गुलाम देशो में विदेशी साम्राज्यी ताकतों के विरुद्ध राष्ट्र के स्वतंत्रता संघर्षो का सिलसिला भी तेज़ी से बढने लगा था |
विश्व युद्ध के दौर में ही रूस में 'मजदूर क्रान्ति ' सम्पन्न हुई थी |इस क्रान्ति ने दुनिया के तमाम पिछड़े देशो के मजदूरों ,किसानो एवं अन्य जनसाधारण को साम्राज्यी ताकतों की शोषण ,लूट तथा परतंत्रता व प्रभुत्व के संबंधो से अपने आप को पूरी ताकत से मुक्त कर लेने का पुरजोर आह्वान किया था और उसके लिए यथासंभव प्रेरणा व मदद भी दी थी |इसके फलस्वरूप इस देश में भी राष्ट्र की स्वतंत्रता के साथ जनसाधारण मजदूरों ,किसानो की स्वतंत्रता का लक्ष्य लेकर आंदोलनों ,संघर्षो की शुरुआत हो गयी |
अपने पुरवर्ती क्रान्तिकारियो ,शहीदों की तुलना में भगत सिंह और उनके साथियो की महानता इन्ही वैश्विक परिस्थितियों की देन थी |उन्होंने और उनके साथियो ने ब्रिटिश साम्राज्यी ताकतों से राष्ट्र की पूर्ण स्वतंत्रता के साथ -साथ इस राष्ट्र के नये पुराने धनाढ्य वर्गो से देश के जनसाधारण की मेहनत कशो की स्वतंत्रता का मुद्दा भी उठा दिया |ब्रिटिश राज को हटाकर हिन्दू राज ,मुस्लिम राज या जनतांत्रिक राष्ट्र -राज बनाने की जगह ,उन्होंने देश के मेहनतकशो के नेतृत्त्व में समाजवादी -प्रजातांत्रिक राष्ट्र राज के पक्ष में खुली घोषनाये की |
भगत सिंह के क्रांतिकारी जीवन पर अमेरिका व कनाडा में रह रहे हिन्दुस्तानियों द्वारा गठित गदर पार्टी के संघर्षो व प्रयासों का भी असर जरुर पडा था |भगत सिंह अपने क्रांतिकारी जीवन में 1857 के स्वतंत्रता संघर्ष से लेकर गदर पार्टी के उद्देश्यों व क्रियाकलापों से प्रेरणा व उर्जा ग्रहण करते रहे थे |जंहा तक उस दौर की राष्ट्रीय परिस्थितियों का सवाल है तो 1905 में बंगाल के विभाजन के विरुद्ध राष्ट्रवादी आंदोलनों व संघर्षो का ज्वार उठा हुआ था |यह ज्वार विदेशी बहिष्कार के साथ ,स्वदेशी अपनाने राष्ट्रीय -शिक्षा -संस्कृति को बढावा देने तथा स्वराज्य का लक्ष्य हासिल करने के लिए राष्ट्रवादी संघर्ष के रूप में आगे बढ़ता रहा था |राष्ट्रीय आंदोलनों के इसी उभार के दिनों में लोकमान्य तिलक का यह राष्ट्रवादी सन्देश पूरे देश में गूजने लगा था की "स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे |"
राष्ट्र की इन्ही महान संघर्षशील एवं क्रांतिकारी परिस्थितियों में पंजाब के लायलपूर जिले के बंगा गाँव में 27 अक्तूबर 1907 को भगत सिंह का जन्म हुआ था |भगत सिंह का बचपन पंजाब में खासतौर पर प्रथम विश्व युद्ध के दौर में अंग्रेजी शासन के भारी दमन व उत्पीडन को देखते और भोगते बीता था |1919 में घटा जलियावाला बाग़ काण्ड उसकी चरम अभिव्यक्ति था |उस समय 7 वीक्लास का छात्र रहा 12 साल का भगत सिंह जलियावाला बाग़ की घटना के बाद वहा की मिट्टी लेने गया और उसे अपने साथ लाया भी |यह जलियावाला बाग़ काण्ड के साथ -साथ ब्रिटिश शासन द्वारा किए जाते रहे दमन के प्रति बालक भगत सिंह में उठते विद्रोह व विरोध का एक परिलक्षण भी था | ब्रिटिश शासन के दमन -अत्याचार के विरुद्ध पंजाब में खड़े होते रहे आंदोलनों ,संघर्षो की परिस्थियों ने भी भगत सिंह और उनके साथियो को महान क्रांतिकारी बनाने में महत्व पूर्ण भूमिका निभायी |
इन आम परिस्थियों के अलावा भगत सिंह के साथ जुडी विशिष्ठ परिस्थितियाँ भी थी |भगत सिंह का स्वंय एक राष्ट्रवादी -क्रांतिकारी परिवार में जन्म और पालन -पोषण |भगत सिंह के जन्म के समय पिता किशन सिंह और चाचा अजित सिंह ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोधी ,राष्ट्रवादी गतिविधियों कर कारण जेल में थे |ठीक उनकी पैदाइश के ही दिन दोनों रिहा होकर घर पहुचे थे |इसलिए घरवालो ने भगत सिंह का नाम भागो वाला (यानी भाग्य वाला )रख दिया |निसंदेह:भगत सिंह की पारिवारिक पृष्ठ भूमि ने उन्हें भागो वाला से महान क्रांतिकारी भगत सिंह बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी |दूसरी भूमिका लाहौर के नेशनल कालेज की परिस्थितियों की थी |इस कालेज में भगत सिंह ने उच्च शिक्षा लेने के लिए दाखिला लिया था |उस समय लाला छबीलदास उस कालेज के प्रिंसिपल थे वे नौजवानों को पाठ्य पुस्तके पढने के साथ -साथ इस बात को प्रोत्साहित करते रहते थे की उन्हें राष्ट्र व समाज हित में क्या कुछ पढ़ना और जानना चाहिए|
लाहौर में लाला लाजपत राय की 'द्वारका दास लाइब्रेरी 'और लाहौर के ही अनारकली बाज़ार में 'रामकृष्ण एंड सन्स' की किताबो की दूकान से भगत सिंह को मैगजीन ,गैरी बाल्डी,वाल्टेयर,जैसे यूरोपीय क्रान्तिकारियो के जीवन संघर्ष को पढने और जानने के साथ विक्टर ह्यूगो ,टालस्टाय,बर्नाड शा ,मैक्सिम गोर्की आदि जैसे महान लोगो के साहित्य को भी पढने का सुअवसर मिला और उससे उन्होंने भरपूर मार्ग दर्शन लिया | भगत सिंह को देश के जनसाधारण के प्रति मेहनत कशो के प्रति सिद्धांतनिष्ठ एवं कर्तव्यनिष्ठ होने का मार्गदर्शन देने में सोहन सिंह जोश ने अहम भूमिका निभायी |वे कम्युनिस्ट नेता होने के साथ -साथ 'कीरति' मासिक पत्रिका के सम्पादक भी थे |
वे भगत सिंह से विभिन्न विषयों पर चर्चा करने के साथ -साथ उन्हें 'कीरति 'में लिखने के लिए प्रोत्साहित भी करते रहते थे |उन्ही के शुरूआती प्रयासों के फलस्वरूप भगत सिंह कई अखबारों के लेखन ,सम्पादन में महत्व पूर्ण भूमिका निभाने में सफल रहे |
इसके अलावा वे ब्रिटिश ताकतों के विरुद्ध देश में होते रहे विरोधो ,विद्रोहों के खासकर 1857 के और फिर उससे भी ज्यादा गदर पार्टी के विरोध -विद्रोह के प्रयासों को जानने समझने में लगे रहते थे |वे गदर पार्टी के महान नेता करतारसिंह सराभा की फोटो अपने पास रखते थे और कहते थे कि यह मेरा गुरु ,मेरा साथी और मेरा भाई है | याद रखने की बात है कि करतार सिंह सराभा को भगत सिंह से कम उम्र में (19 )वर्ष फांसी के फंदे पर झुलना पडा था |यह बात स्मरणीय है कि गदर पार्टी के करतार सिंह सराभा जैसे ज्यादातर पंजाब से जुड़े हुए थे |इन्ही महान संघर्षशील अन्तराष्ट्रीय व राष्ट्रीय तथा स्थानित परिस्थितियों ने भगत सिंह को महान क्रांतिकारी की भूमिका निभाने के लिए उनका पथ प्रशस्त किया |उन्हें वैचारिक व व्यहारिक रूप में राष्ट्रीय व सामाजिक क्रान्ति का अग्रदूत बनने का सुअवसर प्रदान किया |यह बात दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश कि बहुसंख्यक जनता उन्हें बम पिस्तौल वाले बहादुर नौजवान एवं राष्ट्रभक्त क्रांतिकारी बलिदानी के रूप में जानती है |जबकि राष्ट्र स्वतंत्रता से लेकर समाज के बदलाव के बारे में उनके वैचारिक क्रान्ति के प्रयास कही ज्यादा है |देश कि आम जनता के लिए आज के दौर में भी वे प्रयास मार्गदर्शक और दिशानिर्धारक है |
देश काल कि उपरोक्त परिस्थितियों से उर्जा लेते हुए सबसे पहले नेशनल कालेज के छात्र के रूप में भगत सिंह और उनके साथियो ने 1926 में लाहौर में नौजवान भारत सभा का गठन किया |भगत सिंह इस सभा के महासचिव और भगवती चरण वोहरा प्रचार मंत्री बने |1928 में अमृतसर में हुए सम्मलेन में नौजवान भारत सभा ने अपना घोषणा पत्र जारी किया उसमे साफ़ कहा गया है कि "हमे अपनी जनता को आने वाले महान संघर्ष के लिए करना पडेगा |हमारी राजनैतिक लड़ाई 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के ठीक बाद से ही आरम्भ हो गयी थी |वह कई दौरों से होकर गुजर चूकि है |20 वी शताब्दी के आरम्भ से अंग्रेज नौकरशाही ने भारत के प्रति एक नयी नीति अपनाई है |वे हमारे देश के पूंजीपतियों तथा निम्न पूंजीपति वर्ग को सहूलियत देकर उन्हें अपनी तरफ मिला रहे है |दोनों का हित एक हो रहा है |भारत में ब्रिटिश पूंजी के अधिकाधिक प्रवेश का अनिवार्यत:यही परिणाम होगा |निकट भविष्य में बहुत शीघ्र हम उस वर्ग को तथा उसके नेताओं को विदेशी शासको के साथ जाते देखेंगे |अत:'अब देश को तैयार करने के भावी कार्यक्रम का शुभारम्भ इस आदर्श वाक्य से होगा -क्रान्ति जनता द्वारा जनता के हित में |दूसरे शब्दों में 98 प्रतिशत के लिए स्वराज्य जनता द्वारा प्राप्त ही नही बल्कि जनता के लिए भी |
यह एक बहुत कठिन काम है ...........युवको के सामने काफी कठिन काम है और उनके साधन बहुत थोड़े है |उनके मार्ग में बहुत सी बाधाये भी आ सकती है लेकिन थोड़े किन्तु निष्ठावान व्यक्तियों की लगन उन पर विजय पा सकती है |युवको को आगे जाना चाहिए |उनके सामने जो कठिन एवं बाधाओं से भरा मार्ग है ,और उन्हें जो महान कार्य सम्पन्न करना है ,उसे समझना होगा |उन्हें अपने दिल में यह बात रख लेनी चाहिए कि सफलता मात्र एक संयोग है जबकि बलिदान एक नियम |.......................... इस बीच नौजवान भारत सभा के क्रान्तिकारियो ने काकोरी ट्रेन डकैती में पकडे गये रामप्रसाद बिस्मिल जैसे क्रान्तिकारियो को जेल से छुडा लेने की योजना भी बनाई ,परन्तु ब्रिटिश पुलिस प्रशासन की बड़ी और संगठित ताकत के चलते वह योजना अमल में नही लायी जा सकी |
इसी दौरान भारत में संवैधानिक सुधारों के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा मनमाने ढंग से गठित साइमन कमीशन का देश में आगमन हुआ |इस कमीशन का देश भर में विरोध हुआ |30 अक्तूबर 1928 को यह कमीशन लाहौर पहुचा |विरोध प्रदर्शन में हुए लाठी चार्ज के चलते लाला लाजपत राय पर लाठियाँ बरसाने के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारी साडर्स की हत्या कर दी |भगत सिंह ने इसमें प्रमुख भूमिका निभाई |साडर्स -वध के बाद क्रान्तिकारियो द्वारा गठित हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक संगठन की तरफ से जारी नोटिस में यह घोषणा की गयी कि.....'मनुष्य का रक्त बहाने के लिए हमे खेद है |परन्तु क्रान्ति की बलि वेदी पर कभी -कभी रक्त बहाना अनिवार्य हो जाता है |हमारा उद्देश्य एक ऐसी क्रान्ति से है जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अन्त कर देगी ।इन कारवाइयो के साथ -साथ भगत सिंह कीरति नाम की पंजाबी पत्रिका में तथा हिदी के प्रताप ,प्रभा महारथी ,चाँद आदि पत्रिकाओं में राष्ट्र की स्वतंत्रता और समाज कीं विभिन्न समस्याओं को लेकर लिखते रहे |उनके लेखो में पंजाब -की भाषा तथा लिपि की समस्या (1924) 'विश्व प्रेम '(1929 )'युवक '(1925) 'धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम (1928 )'साम्प्रदायिक दंगे 'और उनका इलाज़ '(1928) 'अछूत 'समस्या (1928) 'मैं नास्तिक क्यों हूँ '(1930 )आदि जैसे महत्वपूर्ण लेख है |राजनीतिक लेखो में वे और उनके क्रांतिकारी साथी राष्ट्र की क्रांतिकारी घटनाओं और शहीदों के जीवन संघर्षो को लेकर निरंतर लेख लिखते और प्रकाशित करते रहे
इनमे 'होली के दिन रक्त के छीटे' (1926) 'काकोरी के वीरो से परिचय ''काकोरी के शहीदों की फांसी के हालात' (1928) 'काकोरी के शहीदों के लिए प्रेम के आंसू 'सूफी अम्बा प्रसाद (1928) बलवंत सिंह (1928) डाक्टर मथुरा सिंह (1928) शहीद करतार सिंह सराभा (1928) मदनलाल धिगरा (1928) शहीद खुदीराम बोस (1928) अराजकता वाद (1928) विद्यार्थी और राजनीत (1928) 'नौजवान भारत सभा लाहौर का घोषणा पत्र (1928) हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएसन का घोषणा पत्र (1929 )बम का दर्शन (1930 )क्रांतिकारी मसौदा (1931) युद्ध अभी जारी है (1931 ) तथा अन्य बहुत सारे सारगर्भित एवं महत्वपूर्ण लेख तथा पर्चे व पत्र आदि शामिल है |भगत सिंह के जीवन के बाद की घटनाओं में असेम्बली बम काण्ड प्रमुख है |ब्रिटिश साम्राज्य का जन विरोधी और मजदूर विरोधी नीतियों को बढावा देने के लिए सरकार सदन में चर्चा के बाद सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक (पब्लिक सेफ्टी बिल )और 'औद्योगिक विवाद विधयेक (ट्रेड डिस्प्यूट बिल ) लागू करने जा रही थी |असेम्बली हाल में उन्ही बिलों पर चर्चा के दौरान भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को हाल की खाली जगह पर दो बमो का धमाका करने के साथ हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना की तरफ से पर्चे फेके |इस बम विस्फोट से कोई मारा नही गया और न ही बम फेकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त वहा से भागे नही |उन्होंने पूर्वनियोजित योजना के अनुसार अपनी गिरफ्तारिया दी |इसके बाद उसी योजनानुसार न्यायालय की सुनवाई के दौरान भगत सिंह ने अपना ब्यान अदालत के माध्यम से पूरे देश में पहुचा दिया |वे ब्यान भी एक महत्वपूर्ण एतिहासिक दस्तावेज बन चुके है |न्यायालय में पहला मुकदमा असेम्बली बम काण्ड को लेकर था जिसकी जिमीदारी दोनों ने बम के साथ पर्चे फेकने के रूप में ही ले ली थी |अदालत में उन्होंने स्पष्ट कहा की उनका उद्देश्य भरी सरकार की जनविरोधी बिलों के प्रति अपने विरोध को सुनाना था न की किसी को मारना |इस केस में दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी | लाहौर षड्यंत्र केस में भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव को मृत्यु दंड दिया गया |मुकदमे के दौरान भगत सिंह ने क्रान्तिकारियो के साथ जेल में होते रहे अमानुषिक व्यवहार व अत्याचार के विरुद्ध लंबा अनशन किया |लेकिन इस बीच उनका लिखना पढ़ना और पत्र व्यवहार निरन्तर जारी रहा |अनशन के दौरान कमजोर हालात में स्ट्रेचर पर लाये जाने के वावजूद उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य और उसकी न्यायालयी व्यवस्था के ढोंग ,पाखण्ड को नगा करने के साथ -साथ क्रान्तिकारियो के लक्ष्यों ,उद्देश्यों को स्पष्ट करने तथा उनके विरुद्ध होते रहे दुष्प्रचारो का जबाब देना जारी रखा |23 मार्च 1931 के दिन सारे नियम -कानून ताक पर रखकर भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव को शाम के समय फांसी दे दी गयी |जेल प्रशासन ने उनकी लाशें परिजनों को भी नही दी |उनको सतलुज के किनारे जलाकर खत्म कर दिया |क्योंकि उनको डर था की लाशें पाकर भारी जन समूह इकठ्ठा हो सकता है और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ उग्र विरोध के लिए खड़ा हो सकता है |साम्राज्यवादियों की यह करतूत एकदम समझ में आने वाली है |लेकिन कडवी सच्चाई यह भी है की 1947 से पहले और उसके बाद भी देश के ख्याति प्राप्त नेताओं द्वारा भी भगत सिंह और उनके साथियो के साथ भारी अन्याय किया जाता रहा है |उनके क्रान्ति के महान व गंभीर उद्देश्यों पर पर्दा डालने का काम किया जाता रहा है |उन्हें मुख्य रूप से कांग्रेस व गांधी जी के अहिंसा के पथ के विपरीत हिंसा के पथ के अनुगामी के रूप में चित्रित किया जाता रहा |आज भी देश का जन मानस गांधी व अन्य कांग्रेसी नेताओं को अहिंसावादी देशभक्त तथा भगत सिंह व अन्य क्रान्तिकारियो को हिंसावादी देशभक्त के रूप में ही जानता है |
जबकि सच्चाई एकदम दूसरी है |वह यह की 1922 -24 के बाद से देश का धनाढ्य एवं उच्च हिस्सा कांग्रेस व मुस्लिम लीग जैसी पार्टियों की अगुवाई में ब्रिटिश साम्राज्यवाद से समझौता करते हुए सत्ता की बागडोर को अपने हाथ में लेना चाहता था |देश पर 250 सालो से आधिपत्य जमाए रहे ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के लूट के संबंधो को बरकरार रखते हुए देश के संसाधनों पर और शासन सत्ता पर धनाढ्य एवं उच्च वर्गो का पूर्ण अधिकार स्थापित करना चाहता था |इन्ही अधिकारों को ब्रिटिश साम्राज्य के साथ किए जाते रहे समझौतों के जरिये बढाया भी जाता रहा था |और फिर समझौतों की अगली व अंतिम कड़ी के रूप में 1947 की स्वतंत्रता का समझौता भी पूरा कर लिया गया |इसकी भविष्यवाणी भगत सिंह के संगठन हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक संगठन ने अपने घोषणा (वर्ष 1929 ) में पहले ही कर दी थी |इसे आप संगठन के घोषणा पत्र में देख सकते है |उस घोषणा पत्र के कुछ अंश "".भारत साम्राज्यवाद के जुए के नीचे पिस रहा है |इसमें करोड़ो लोग आज अज्ञानता और गरीबी के शिकार हो रहे है |भारत की बहुत बड़ी जनसख्या मजदूरों और किसानो की है ,उनको विदेशी दबाव एवं आर्थिक लूट ने पस्त कर दिया है |भारत के मेहनतकश वर्ग की हालत आज बहुत गंभीर है |उसके सामने दोहरा खतरा है -विदेशी पूंजीवाद का एक तरफ से और भारतीय पूंजीवाद के धोखे भरे हमले का दूसरी तरफ से |भारतीय पूंजीवाद विदेशी पूंजी के साथ हर रोज बहुत से गठजोड़ कर रहा है |कुछ राजनैतिक नेताओं का डोमिनियन (प्रभुता सम्पन्न ) का रूप स्वीकार करना भी हवा के उसी रुख को स्पष्ट करता है |......
भारतीय पूंजीपति भारतीय लोगो को धोखा देकर विदेशी पूंजीपति से विश्वास घात की कीमत के रूप में सरकार से कुछ हिस्सा प्राप्त करना चाहता है |......... फिर फांसी से 13 दिन पहले जेल से लिखे लेख 'युद्ध अभी जारी है (10 मार्च 1931 ) में भगत सिंह ,राजगुरु ,सुखदेव ने यह घोषणा की है की "अंग्रेज जातिऔर भारतीय जनता के मध्य एक युद्ध चल रहा है |....हमने निश्चित रूप से इस युद्ध में भाग लिया है |...यह युद्ध तब तक चलता रहेगा जब तक शक्तिशाली व्यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिको की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है |चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूंजीपति और अंग्रेज या सर्वथा भारतीय ही क्यों ना हो |उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी चाहे शुद्ध भारतीय पूंजीपति के द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तब भी |..इससे कोई अन्तर नही पड़ता |यह युद्ध जारी रहेगा ..जब तक की समाज का वर्तमान ढ़ाचा समाप्त नही हो जाता |.....
क्या यह युद्ध आज भी जारी नही है ? एकदम जारी है |अमेरिका इंग्लैण्ड जैसे साम्राज्यी देशो की साम्राज्यी कम्पनियों ,सरकारों और उनकी सहयोगी बनी भारत -पाक जैसे पिछड़े देशो की धनाढ्य कम्पनियों व सरकारों में गठजोड़ व सहयोग से जारी है |पिछड़े देशो के जनसाधारण पर हो रहे आर्थिक ,कुटनीतिक एवं सैन्य हमलो के रूप में जारी है |पिछले 20 सालो से देश दुनिया के धनाढ्य वर्गो के हितो को बढाने और जनसाधारण के हितो को काटने -घटाने वाली वैश्वीकरणवादी आर्थिक नीतियों और भोगवादी संस्कृति नीतियों के रूप में प्रत्यक्ष:जारी है |फिर यह युद्ध ईराक ,अफगानिस्तान ,लीबिया जैसे पिछड़े देशो में हमलावार सैन्य साम्राज्यी नीतियों के रूप में भी प्रत्यक्ष:जारी है इस युद्ध और हमले को देश का जनसाधारण महंगाई ,बेकारी के रूप में ,खेती -किसानी एवं छोटे स्तर के कारोबारों की टूटन के रूप में महंगाई और पहुच से बाहर होती जा रही शिक्षा के रूप में ,नग्न -अर्धनग्न लचर भोगवादी संस्कृति के रूप में और सामाजिक टूटन -बिखराव आदि के रूप में झेलता जा रहा है |दुःख कष्ट और जिल्लत से जीने की मजबूरी के साथ वह आत्महत्या का रास्ता भी पकड़ता जा रहा है |क्योंकि वह इस युद्ध को देख नही पा रहा है ,समझ नही पा रहा है |आवश्यकता है इस जारी युद्ध को समझने की और संगठित होकर उसका मुकाबला करने की |विदेशी वैश्विक नीतियों के विरोध के साथ राष्ट्र व राष्ट्र के जनसाधारण को वैश्विक लूट व प्रभुत्व के संबंधो से मुल्त करने के लिए नया क्रांतिकारी युद्ध छड़ने की |उसके लिए भगत सिंह व अन्य राष्ट्रीय अन्तराष्ट्रीय क्रान्तिकारियो से सबक ,शिक्षा व मार्ग दर्शन ग्रहण करने की |
युद्ध अभी जारी है ...

-सुनील दत्ता
पत्रकार
साभार चर्चा आज कल
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