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मंगलवार, 23 मार्च 2021

भगत सिंह के सपनों का भारत बनाने के लिए मुखबिर राज समाप्त करें-रणधीर सिंह सुमन

 


बाराबंकीः भगत सिंह के सपनों का भारत बनाने के लिए मुखबिर राज समाप्त कर किसान मजदूरों का राज स्थापित करना होगा अखिल भारतीय नौजवान सभा द्वारा आयोजित शहीद दिवस के अवसर पर श्रद्धांजलि सभा को सम्बोधित करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य परिषद सदस्य अधिवक्ता रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि भगत सिंह शोषण विहीन मजदूर किसान राज चाहते थे, वहीं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि अगर आज भगत सिंह होते तो वर्तमान किसान मजदूर विरोधी सरकार उन्हे पुनः जीवित फांसी पर लटका देती है’’ भगत सिंह को फांसी कराने में इन्ही तत्वों का हाथ था। पार्टी के जिला सहसचिव शिवदर्शन वर्मा ने कहा कि किसान आन्दोलन चल रहा है, मजदूर आन्दोलन चल रहा है सरकार चुनाव लड़ने में व्यस्त है। चुनाव मंे मोदी की लहर नहीं है लेकिन कार्पोरेट सेक्टर की धन की लहर है।
किसाना सभा के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि किसान आन्दोलन तय करेगा कि किसानों के हालात सुधरंगे या नहीं है। इसलिए आवश्यक है कि किसानों मंे आन्दोलन को हम सब मदद कर भगत सिंह के सपनों को सरकार करें। 

श्रद्धांजलि सभा मेें  धीरेन्द्र कुमार यादव, रमेश कुमार सच्चिदानन्द, संदीप तिवारी, राम दुलारे यादव, लवकुश वर्मा, योेगेन्द सिंह, महेन्द्र यादव, राजकुमार दीपक वर्मा, आशीष शुक्ला, राजेन्द्र सिंह राणा, मो0 फदीर, धर्मेन्द्र, दिग्विजय सिंह, कुलदीप यादव, मुनेश्वर प्रसाद गोस्वामी, विनोद यादव, गिरीश चन्द्र तथा श्याम सिंह आदि प्रमुख लोग थे।
श्रद्धांजलि सभा का संचालन किसान सभा के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने किया सभा में प्रारम्भ मंे सभी लोगों ने भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू के चित्रों पर माल्यापर्ण कर श्रद्धांजलि दी।

शनिवार, 10 मार्च 2018

संघी तालिबानियों ने लेनिन की मूर्ति को गिरा दिया


5 मार्च को त्रिपुरा में वाम दलों के गठबंधन के चुनाव में पराजित होने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने  मजदूरों और किसानों का राज्य स्थापित करने वाले तथा भारत के स्वतंत्रता संग्राम को समर्थन करने वाले दुनिया के महान क्रांतिकारी लेनिन की मूर्ति को भाजपा नेतओं ने बुलडोज़र लगा कर गिरा दिया. यह काम उसी तरह किया गया जिस तरह अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान ने अपने 25 कैदियों के माध्यम से 2 मार्च 2001 को पहले उन्होंने बुद्ध प्रतिमा पर टैंक और भारी गोलियों से हमला किया और जब वह नाकाम रहे तो उन्होंने उसे नष्ट करने के लिए उसमें विस्फोटक लगा कर गिरा दिया था. बामियान की बलुआ पत्थर की मशहूर प्राचीन बुद्ध प्रतिमा कभी विश्व भर में बुद्ध की सबसे ऊंची 56 मीटर ऊंची मूर्ति हुआ करती थी.
                तालिबान ने विश्व धरोहर बुद्ध प्रतिमा को विष्फोटक लगा कर उड़ा दिया था और संघी तालिबानियों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन को समर्थन देने वाले लेनिन की प्रतिमा को गिरा. अफगानिस्तान में लोकतंत्र नहीं था जबकि उसके विपरीत देश में लोकतांत्रिक सरकार के रहते हुए लेनिन की मूर्ति को गिरा दिया गया. इन दोनों घटनाओं में मुख्य समानता यह है कि अफगानिस्तान के तालिबानी अमेरिका द्वारा समर्थित थे और देश की सरकार भी अमेरिकी ट्रम्प से समर्थित है. 
                 बुद्ध प्रतिमा गिराए जाने के बाद मुल्ला मुहम्मद ओमार ने कहा था कि “मुसलमानों को इन प्रतिमाओं के नष्ट होने पर गर्व करना चाहिए। उसी तर्ज पर महाराष्ट्र में बीजेपी के वरिष्ठ नेता राज पुरोहित ने  कहा है कि वह लेनिन की मूर्ति गिराए जाने से बेहद खुश हैं। उन्होंने मूर्ति को पुतला बताते हुए कहा कि लेनिन का पुतला अपमान का प्रतीक है और उनके जितने भी पुतले हों, सभी गिरा देने चाहिए। बीजेपी नेता सुब्रमण्यन स्वामी ने मामले में प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, 'लेनिन तो विदेशी है, एक प्रकार से आतंकवादी है, ऐसे व्यक्ति की मूर्ति हमारे देश में क्यों?   बीजेपी नेता राम माधव और त्रिपुरा के राज्यपाल तथागत रॉय ने भी इसे जायज ठहरा दिया।  
महान क्रांतिकारी भगत सिंह के आदर्श लेनिन थे और जेल की अदालत में लेनिन दिवस के अवसर पर भगत सिंह समेत उनके साथी क्रांतिकारियों ने उन सभी को हार्दिक अभिनन्दन भेजते हैं जो महान लेनिन के आदर्शों को आगे बढ़ाने के लिए कुछ भी कर रहे हैं। हम रूस द्वारा किये जा रहे महान प्रयोग की सफलता की कमाना करते हैं। सर्वहारा विजयी होगा। पूँजीवाद पराजित होगा। साम्राज्यवाद की मौत हो।
             आजादी की लड़ाई में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ रहने वाले लोगों की विचारधारा को मानने वाले लोगों ने देश के अन्दर हर उस व्यक्ति की चरित्र हत्या का कार्य शुरू कर दिया है जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ था. गाँधी से लेकर नेहरु, टैगोर की चरित्र हत्या का कार्य संघी तालिबानी कर रहे हैं.

सुमन 

बुधवार, 23 मार्च 2016

साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज- भगत सिंह

1919 के जालियँवाला बाग हत्याकाण्ड के बाद ब्रिटिश  सरकार ने साम्प्रदायिक दंगों का खूब प्रचार शुरु किया। इसके असर से 1924 में कोहाट में बहुत ही अमानवीय ढंग से हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। इसके बाद राष्ट्रीय राजनीतिक चेतना में साम्प्रदायिक दंगों पर लम्बी बहस चली। इन्हें समाप्त करने की जरूरत तो सबने महसूस की, लेकिन कांग्रेसी नेताओं ने हिन्दू-मुस्लिम नेताओं में सुलहनामा लिखाकर दंगों को रोकने के यत्न किये।
इस समस्या के निश्चित हल के लिए क्रान्तिकारी आन्दोलन ने अपने विचार प्रस्तुत किये। प्रस्तुत लेख जून, 1928 के ‘किरती’ में छपा। यह लेख इस समस्या पर शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के विचारों का सार है। – सं. भारत वर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं। अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर शत्रु होना है। यदि इस बात का अभी यकीन न हो तो लाहौर के ताजा दंगे ही देख लें। किस प्रकार मुसलमानों ने निर्दोष सिखों, हिन्दुओं को मारा है और किस प्रकार सिखों ने भी वश चलते कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह मार-काट इसलिए नहीं की गयी कि फलाँ आदमी दोषी है, वरन इसलिए कि फलाँ आदमी हिन्दू है या सिख है या मुसलमान है। बस किसी व्यक्ति का सिख या हिन्दू होना मुसलमानों द्वारा मारे जाने के लिए काफी था और इसी तरह किसी व्यक्ति का मुसलमान होना ही उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था। जब स्थिति ऐसी हो तो हिन्दुस्तान का ईश्वर ही मालिक है।
ऐसी स्थिति में हिन्दुस्तान का भविष्य बहुत अन्धकारमय नजर आता है। इन ‘धर्मों’ ने हिन्दुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है। और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे। इन दंगों ने संसार की नजरों में भारत को बदनाम कर दिया है। और हमने देखा है कि इस अन्धविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं। कोई बिरला ही हिन्दू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग ठण्डा रखता है, बाकी सब के सब धर्म के यह नामलेवा अपने नामलेवा धर्म के रौब को कायम रखने के लिए डण्डे लाठियाँ, तलवारें-छुरें हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में सर-फोड़-फोड़कर मर जाते हैं। बाकी कुछ तो फाँसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिये जाते हैं। इतना रक्तपात होने पर इन ‘धर्मजनों’ पर अंग्रेजी सरकार का डण्डा बरसता है और फिर इनके दिमाग का कीड़ा ठिकाने आ जाता है।
यहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्रा कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज्य-स्वराज्य’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले हैं। सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो साम्प्रदायिक आन्दोलन में जा मिले हैं, जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं। जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं। और साम्प्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आयी हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे। ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है।
दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, अखबार वाले हैं। पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था। आज बहुत ही गन्दा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक बहुत कम है जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो।
अखबारों का असली कर्त्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्त्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’
जो लोग असहयोग के दिनों के जोश व उभार को जानते हैं, उन्हें यह स्थिति देख रोना आता है। कहाँ थे वे दिन कि स्वतन्त्राता की झलक सामने दिखाई देती थी और कहाँ आज यह दिन कि स्वराज्य एक सपना मात्रा बन गया है। बस यही तीसरा लाभ है, जो इन दंगों से अत्याचारियों को मिला है। जिसके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया था, कि आज गयी, कल गयी वही नौकरशाही आज अपनी जड़ें इतनी मजबूत कर चुकी हैं कि उसे हिलाना कोई मामूली काम नहीं है।
यदि इन साम्प्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो हमें इसका कारण आर्थिक ही जान पड़ता है। असहयोग के दिनों में नेताओं व पत्राकारों ने ढेरों कुर्बानियाँ दीं। उनकी आर्थिक दशा बिगड़ गयी थी। असहयोग आन्दोलन के धीमा पड़ने पर नेताओं पर अविश्वास-सा हो गया जिससे आजकल के बहुत से साम्प्रदायिक नेताओं के धन्धे चौपट हो गये। विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल जरूर होता है। कार्ल मार्क्स के तीन बड़े सिद्धान्तों में से यह एक मुख्य सिद्धान्त है। इसी सिद्धान्त के कारण ही तबलीग, तनकीम, शुद्धि आदि संगठन शुरू हुए और इसी कारण से आज हमारी ऐसी दुर्दशा हुई, जो अवर्णनीय है।
बस, सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है दरअसल भारत के आम लोगों की आर्थिक दशा इतनी खराब है कि एक व्यक्ति दूसरे को चवन्नी देकर किसी और को अपमानित करवा सकता है। भूख और दुख से आतुर होकर मनुष्य सभी सिद्धान्त ताक पर रख देता है। सच है, मरता क्या न करता। लेकिन वर्तमान स्थिति में आर्थिक सुधार होेना अत्यन्त कठिन है क्योंकि सरकार विदेशी है और लोगों की स्थिति को सुधरने नहीं देती। इसीलिए लोगों को हाथ धोकर इसके पीछे पड़ जाना चाहिये और जब तक सरकार बदल न जाये, चैन की सांस न लेना चाहिए।
लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की जरूरत है। गरीब, मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं। इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथों मंे लेने का प्रयत्न करो। इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरें कट जायेंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतन्त्राता मिलेगी।
जो लोग रूस का इतिहास जानते हैं, उन्हें मालूम है कि जार के समय वहाँ भी ऐसी ही स्थितियाँ थीं वहाँ भी कितने ही समुदाय थे जो परस्पर जूत-पतांग करते रहते थे। लेकिन जिस दिन से वहाँ श्रमिक-शासन हुआ है, वहाँ नक्शा ही बदल गया है। अब वहाँ कभी दंगे नहीं हुए। अब वहाँ सभी को ‘इन्सान’ समझा जाता है, ‘धर्मजन’ नहीं। जार के समय लोगों की आर्थिक दशा बहुत ही खराब थी। इसलिए सब दंगे-फसाद होते थे। लेकिन अब रूसियों की आर्थिक दशा सुधर गयी है और उनमें वर्ग-चेतना आ गयी है इसलिए अब वहाँ से कभी किसी दंगे की खबर नहीं आयी।
इन दंगों में वैसे तो बड़े निराशाजनक समाचार सुनने में आते हैं, लेकिन कलकत्ते के दंगों मंे एक बात बहुत खुशी की सुनने में आयी। वह यह कि वहाँ दंगों में ट्रेड यूनियन के मजदूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर गुत्थमगुत्था ही हुए, वरन् सभी हिन्दू-मुसलमान बड़े प्रेम से कारखानों आदि में उठते-बैठते और दंगे रोकने के भी यत्न करते रहे। यह इसलिए कि उनमें वर्ग-चेतना थी और वे अपने वर्गहित को अच्छी तरह पहचानते थे। वर्गचेतना का यही सुन्दर रास्ता है, जो साम्प्रदायिक दंगे रोक सकता है।
यह खुशी का समाचार हमारे कानों को मिला है कि भारत के नवयुवक अब वैसे धर्मों से जो परस्पर लड़ाना व घृणा करना सिखाते हैं, तंग आकर हाथ धो रहे हैं। उनमें इतना खुलापन आ गया है कि वे भारत के लोगों को धर्म की नजर से-हिन्दू, मुसलमान या सिख रूप में नहीं, वरन् सभी को पहले इन्सान समझते हैं, फिर भारतवासी। भारत के युवकों में इन विचारों के पैदा होने से पता चलता है कि भारत का भविष्य सुनहला है। भारतवासियों को इन दंगों आदि को देखकर घबराना नहीं चाहिए। उन्हें यत्न करना चाहिए कि ऐसा वातावरण ही न बने, और दंगे हों ही नहीं।
1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था। वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है इसमें दूसरे का कोई दखल नहीं। न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए क्योंकि यह सरबत को मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता। इसलिए गदर पार्टी जैसे आन्दोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़कर फाँसियों पर चढ़े और हिन्दू मुसलमान भी पीछे नहीं रहे।
इस समय कुछ भारतीय नेता भी मैदान में उतरे हैं जो धर्म को राजनीति से अलग करना चाहते हैं। झगड़ा मिटाने का यह भी एक सुन्दर इलाज है और हम इसका समर्थन करते हैं।
यदि धर्म को अलग कर दिया जाये तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते है। धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें।
हमारा ख्याल है कि भारत के सच्चे हमदर्द हमारे बताये इलाज पर जरूर विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है, उससे हमे बचा लेंगे।
आभार : यह फाइल आरोही, ए-2/128, सैक्टर-11, रोहिणी, नई दिल्ली — 110085 द्वारा प्रकाशित संकलन ‘इन्कलाब ज़िन्दाबाद’ (सम्पादक : राजेश उपाध्याय एवं मुकेश मानस) के मूल फाइल से ली गयी है।

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

ड्रीमलैंड की भूमिका ---- भगत सिंह

उस समय भगत सिंह स्वंय फाँसी  के फंदे की प्रतीक्षा कर रहे थे | वे जानते थे कि ऐसे क्षण में भगवान की शरण लेना बहुत सरल है |  '' भगवान से मनुष्य को गहरी सांत्वना तथा आश्रय मिल सकता है | "" दूसरी ओर , अपनी स्वंय की आंतरिक शक्ति पर निर्भर रहना सरल काम नही है | उन्होंने कहा ,  '' तुफानो तथा आधियो में अपने पाँव पर खड़े रहना बच्चो का खेल नही है  | '' वे यह भी जानते थे कि इस कार्य के लिए अत्यधिक नैतिक शक्ति की आवश्यकता थी तथा आधुनिक क्रांतिकारी एक अनूठे नैतिक रास्ते पर चल रहे थे | यह रास्ता मनुष्य को '' मानव जाति की सेवा तथा  ''दुखी  मानवता की स्वतंत्रता ' के प्रति समर्पण के लिए प्रेरित करता था | इस रास्ते पर वही नर -- नारी चल रहे थे , जो साहस के साथ '' दमनकर्ताओं , शोषको तथा जालिमो ' को ललकार रहे थे , जो  ' मानसिक जड़ता ' का विरोध कर रहे थे तथा आत्मचिंतन पर बल दे रहे थे | जैसा कि भगत सिंह ने आगे कहा था , '' आलोचना तथा स्वतंत्र चिंतन एक क्रांतिकारी की दो अनिवार्य विशेषताए है | '' ऐसे ही पलो में भगत सिंह ने ड्रीमलैंड की भूमिका लिखी
ड्रीमलैंड की भूमिका ---- भगत सिंह  
भगत सिंह ने अपने अंतिम दिनों में अपने क्रांतिकारी साथी लाला रामसरन दास की काव्यकृति '' द ड्रीमलैंड '' की भूमिका लिखी थी |
मेरे करीबी दोस्त लाला रामसरन दास  ने मुझसे कहा अपनी काव्यकृति '' द ड्रीमलैंड '' की भूमिका लिखने के लिए कहा है | मैं न तो कवि हूँ , न साहित्यकार हूँ , और न पत्रकार या आलोचक ही हूँ , इसीलिए उनकी इस मांग का औचित्य मैं किसी भी तरह से नही समझ पा रहा हूँ | लेकिन जिन हालातो में मैं हूँ , लेखक से इस बारे में बहस -- मुबाहसा कर पाना संभव नही है , इसीलिए मेरे सामने दोस्त की ख्वाहिश पूरी करने के अलावा कोई रास्ता नही रह जाता है | चूकी मैं कवि  नही हूँ , इसीलिए मैं उस दृष्टिकोण से इस पर बहस करने नही जा रहा हूँ | मैं छन्दों - तुको के ज्ञान से सर्वथा अनभिज्ञ हूँ और यह भी नही जानता कि छन्दों के मानदडो पर कविताएं खरी उतरेगी  या नही | एक साहित्यकार न होने के नाते मैं राष्ट्रीय साहित्य में इस कृति को उचित स्थान दिलाने के दृष्टिकोण से इस पर बहस करने नही जा रहा हूँ |

एक राजनितिक कार्यकर्ता होने के नाते अधिक से अधिक मैं इस पर उसी दृष्टिकोण से बहस कर सकता हूँ | लेकिन यहाँ भी एक बात मेरे काम  को व्यवहारिक तौर पर असम्भव , या कम से कम बहुत कठिन बना देती है | नियमानुसार भूमिका हमेशा वह आदमी लिखता है जो कृति की विषय वस्तु के बारे में वही विचार रखता हो जो लेखक रखता है | लेकिन यहाँ मामला काफी भिन्न है | मैं अपने मित्र से सभी मामलो पर एकमत नही हूँ | वे इस तथ्य से परिचित थे कि कई विषयों पर मेरी राय उनसे बिलकुल अलग हो | इसीलिए , मैं यह जो लिख रहा हूँ , कम - से - कम इस पुस्तक की भूमिका नही होने जा रही है , और चाहे जो हो | यह काफी हद तक उसकी आलोचना हो सकती है , इसीलिए इसका स्थान पुस्तक के अन्त में होगा , न कि आरम्भ में |

राजनितिक क्षेत्र में ' ड्रीमलैंड ' का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है | आज के हालत में वह आन्दोलन के एक जरूरी खालीपन को भरती  है | वास्तव में हमारे देश के सभी राजनितिक आन्दोलनों में , जिन्होंने हमारे आधुनिक इतिहास में कोई न कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है , उस आदर्श की कमी रही है , जिसकी प्राप्ति उसका लक्ष्य था | क्रांतिकारी आन्दोलन इसका अपवाद नही है , एक गदर पार्टी को छोड़कर | जिसने अमेरिकी प्रणाली की सरकार से प्रेरित होकर स्पष्ट शब्दों में कहा था कि वे मौजूदा सरकार की जगह गणतांत्रिक ढंग की सरकार कायम करना चाहते है , मुझे अपनी तमाम कोशिशो के वावजूद एक भी  ऐसी क्रांतिकारी पार्टी नही मिली जिसके सामने यह विचार स्पष्ट हो कि वे आखिर लड़ किस लिए रही है | सभी पार्टियों  में केवल ऐसे लोग थे जिनके पास केवल एक विचार था और वह यह कि विदेशी शासको के विरुद्द संघर्ष करना है | यह विचार पूर्ण रूप से सराहनीय है , लेकिन इसे एक क्रांतिकारी विचार नही कहा जा सकता | हमे यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि क्रान्ति का अर्थ मात्र उथल -- पुथल या रक्तरंजित संघर्ष नही होता है | क्रान्ति में , मौजूदा हालात ( यानी सत्ता ) को पूरी तरह से ध्वस्त करने के बाद , एक नये और बेहतर स्वीकृत आधार पर समाज से सुव्यवस्थित पुनर्निर्माण का कार्यक्रम अनिवार्य रूप से अंतर्निहित रहता है |

राजनितिक क्षेत्र में , उदारवादी लोग मौजूदा सरकार में ही कुछ सुधार चाहते थे , जबकि क्रांतिकारी इसे कुछ अधिक चाहते थे और उस उद्देश्य के लिए हथियारों का उपयोग करने के लिए तैयार थे | क्रांतिकारी लोग हमेशा अतिवादी साधनों को अपनाने के पक्षधर रहे है और उनका एक ही उद्देश्य रहा है --- विदेशी प्रभुत्व को उखाड़ फेकना | बेशक इनमे कुछ ऐसे लोग भी रहे है जो इन साधनों से कुछ सुधार प्राप्त करने के पक्षधर थे |
इन सभी आन्दोलनों की संज्ञा नही दी जा सकती |
लेकिन लाला रामसरन दस पहले क्रांतिकारी है , जिन्हें 1908 में एक बंगाली फरार ( क्रांतिकारी ) ने पंजाब में औपचारिक रूप से क्रांतिकारी पार्टी में शामिल किया था | तब से वे लगातार क्रन्तिकारी आन्दोलन से जुड़े रहे और इस तरह वे गदर पार्टी में शामिल हो गये , लेकिन उन्होंने अपने उन विचारो का परित्याग नही किया जो आन्दोलन के आदर्शो के बारे में पुराने क्रांतिकारियों के थे | पुस्तक के आकर्षण और मूल्य को बढ़ाने वाला यह दूसरा दिलचस्प तथ्य है | लाला रामसरन दास  को 1915 में मौत की सजा सुनाई  गयी थी और बाद में उसे आजीवन कारावास में बदल दिया गया था | आज खुद फाँसी की काल  कोठरी में बैठकर मैं पाठको को साधिकार बता सकता हूँ कि आजीवन कारावास मौत की अपेक्षा कही अधिक कठोर है | लाला रामसरन दास  ने पूरे चौदह वर्ष जेल में काटे है | यह कविता उन्होंने दक्षिण की किसी जेल में लिखी थी | लेखक की उस समय की मन: स्थिति और मानसिक संघर्ष का कविता पर स्पष्ट प्रभाव है , जो इसे और अधिक सुन्दर और दिलचस्प बना देता है | उसने जिस समय इसे लिखने का निश्चय किया उस समय वह किन्ही निराशापूर्ण मनोभावों के विरुद्द कठिन  संघर्ष कर रहा था | उन दिनों में जब बहुत से साथी माफीनामा देकर छुट चुके थे और सबके सामने , उसके ( लेखक के ) सामने भी बड़े -- बड़े लोभ -- लालच थे , और जब पत्नी और बच्चो की मधुर दुःखदायी यादे अपनी मुक्ति की आकाक्षा को और अधिक मजबूत कर रही थी , ऐसे हालात में लेखक को इन बातो के हिम्मत पस्त करने वाले प्रभाव के विरुद्द कठिन संघर्ष करना पड़ा था और उसने अपना ध्यान इस रचना -- कार्य की ओर मोड़ दिया था | इसीलिए प्रारम्भिक पदों में हमे इस तरह का आकस्मिक भावोद्वेग मिलता है ------
' मुझे हर समय घेरे रखने वाले
मेरे पत्नी , बच्चे और मित्र ,
वे चारो और घूमते
जहरीले सापो के समान थे | '


( '' Wife , children , friends that me surround
were poisonous snakes aal arround . ''
)
वह शुरू में दर्शन की चर्चा करता है | यह दर्शन बंगाल और पंजाब के सभी क्रांतिकारी आन्दोलनों की रीढ़ है | इस बिंदु पर मैं लेखक से बहुत व्यापक मतभेद रखता हूँ | उसकी ब्रमाहंड की व्याख्या हेतुवादी और अधिभौतिक है , जबकि मैं एक भौतिकवादी हूँ और इस परिघटना ( फेनामेना ) की मेरी व्याख्या तार्किक होगी | फिर भी किसी भी तरह से यह रचना देश -- काल की दृष्टि से अनुपयुक्त नही है | जो सामान्य विचार हमारे देश में मौजूद है , वे लेखक द्वारा अभिव्यक्त विचारों के अनुरूप अधिक है | अपनी नैराश्यपूर्ण मनोदशा से संघर्ष के लिए अपनी प्रार्थना का रास्ता अख्तियार किया है | यह इस बात से स्पष्ट है कि पुस्तक का प्रारम्भ पूरी तरह ईश्वर , उसकी महिमा के वर्णन और उसकी परिभाषा को समर्पित है | ईश्वर में विश्वास रहस्यवाद का प्रणाम है जो निराशा का स्वाभाविक प्रतिफलन है | यह विश्व एक '' माया '' , एक स्वपन या कल्पना है -- यह स्पष्टत: रहस्यवाद है जिसे शंकराचार्य तथा दुसरे अन्य प्राचीन कल के हिन्दू संतो ने जन्म दिया और विकसित किया है | लेकिन भौतिकवादी दर्श में इस चिंतन -- पद्दति के लिए कोई स्थान नही है |  फिर भी लेखक का यह रहस्यवाद किसी भी तरह से हेय या खेदजनक नही है | इसका अपने सौन्दर्य और आकर्षण है | उसके विचार उत्साहप्रद है , उदाहरण के लिए ---
'' नीव के पत्थर बनो , अनजाने - अज्ञात
और अपने सीने  पर सहो ख़ुशी - ख़ुशी
विशाल भारी -- भरकम का बोझ ,
प् लो आश्रय कष्ट सहन में ,
मत करो ईर्ष्या शीर्ष पर जड़े पत्थर से
जिस पर उड़ेली जाती है सारी लौकिक प्रशसा , ''
आदि -- आदि |

'' Be a foundation - stone obscure ,
And on thy breast cheerfully bear
The architecture vast and huge ,
In suffering find true refuge .
Envy not the plastered top - stone .
On which all worldly praise is thrown ''


अपने निजी अनुभव के आधार पर मैं अधिकार पूर्वक कह सकता हूँ कि गुप्त कार्यो के दौरान , जब मनुष्य बिना किसी आशा और भय के लगातार अपरिचित , असम्मानित , अप्रशसित व्यक्ति की मौत के लिए तैयार रहते हुए लगातार एक जोखिम -- भरी जिन्दगी बिताता है , तो वह व्यक्तिगत प्रलोभनों और इच्छाओं से सिर्फ इस तरह से रहस्यवाद के सहारे ही लड़ सकता है और ऐसा रहस्यवाद किसी भी तरह से हिम्मत को पस्त करने वाला नही होता | असली बात , जिसका उन्होंने वर्णन किया है , वह एक क्रांतिकारी की मानसिकता है | लाला रामसरन दास जिस क्रांतिकारी पार्टी के सदस्य थे , उसे कई हिंसात्मक कार्यो के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था | लेकिन इससे किसी भी तरह यह साबित नही होता कि क्रांतिकारी विनाश में सुख अनुभव करने वाले खून से प्यासे राक्षस होते है |
पढिये ------' अगर जरूरत हो , ऊपर से उग्र बनो
लेकिन रहो हमेशा नरम अपने दिल में
अगर जरूरत हो , तो फुफकारो पर डसो मत
दिल में प्यार को ज़िंदा रखो और लड़ते रहो ऊपरी तौर पर | '  
'' If need be , outwardly be wide ,
But in thy heart be always mild
Hiss if need be , but do not bite
Love in thy heart and outside fight ''
संरचना के लिए विनाश जरूरी ही नही , अनिवार्य है | क्रान्तिकारियो को इसे अपने कार्यक्रम के एक आवश्यक अंग के रूप में अपनाना पड़ता है , और उपर की पंक्तियों में हिंसा और अहिंसा के दर्शन को खुबसूरत ढंग से ब्यान किया गया है | लेनिन ने एक बार गोर्की से कहा कि उन्हें ऐसा संगीत सुनने को नही मिला जो कभी नाड़ियो -- शिराओ को झकझोर दे और जिसे सुनकर कलाकार का सिर थपथपाने की इच्छा पैदा हो जाये | '' लेकिन '' उन्होंने आगे कहा था , '' यह समय सिर थपथपाने का नही है |
यह समय हाथो से खोपड़ियो को तोड़ने का है , हालाकि हमारा अंतिम उद्देश्य हर प्रकार की हिंसा को समाप्त करना है | "" एक भयानक आवश्यकता के रूप में हिंसात्मक साधनों का उपयोग करते हुए क्रांतिकारी भी ठीक ऐसा ही सोचते है |
इसके बाद लेखक धर्मो की परस्पर विरोधी विचारधाराओं की समस्या का उल्लेख करता है | वह सभी धर्मो में सामंजस्य स्थापित करने की चेष्टा करता है जैसा कि प्राय: सभी राष्ट्रवादी किया करते है | इस सवाल को हल करने का यह तरीका लम्बा और गोलमोल है | जहा तक मेरा प्रश्न है , मैं इस मसले को कार्ल मार्क्स के एक वाक्य द्वारा खारिज कर दूंगा कि '' धर्म जनता के लिए अफीम है | ''
अन्त में उसकी कविता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा आता है , जहा उसने उस भावी समाज के बारे में लिखा है , जिसकी रचना करने के लिए हम सभी लालायित है | लेकिन मैं शुरू से ही एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि '' ड्रीमलैंड '' दरअसल एक यूटोपिया ( काल्पनिक ) है | लेखक ने स्वंय इस बात को स्पष्ट रूप से शीर्षक में ही स्वीकार किया है | वह इस विषय पर कोई वैज्ञानिक शोधपत्र लिखने का दावा नही करता | यह बात सही है कि समाज के विकास में यूटोपिया की महत्वपूर्ण भूमिका है |
सेंट् साइमन , फूरिये , राबर्ट ओवेन और उनके सिद्दान्तो के अभाव में वैज्ञानिक -- मार्क्सवादी  समाजवादी भी नही होता | लाला रामसरन दास की '' यूटोपिया '' ( काल्पनिक ) का भी उसी तरह से महत्व है | जब हमारा कार्यकर्ता अपने आन्दोलन के दर्शन को व्यवस्थित रूप देने और एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का महत्व समझेगा , उस समय यह पुस्तक उसके लिए बहुत ही उपयोगी साबित होगी |
इस बात की और मेरा ध्यान गया है कि लेखक की अभिव्यक्ति की शैली अनगढ़ है | अपने '' यूटोपिया '' का वर्णन करते हुए लेखक वर्तमान समाज के विचारों से अछूता नही रह पाता है |

-सुनील दत्ता
स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक     
आभार '' मैं नास्तिक क्यों हूँ - अनुवाद - पंकज चतुर्वेदी
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शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

सरदार पटेल भी भाजपा के प्रतीक नहीं बन पायेंगे

आरएसएस, भाजपा (और भाजपा के पूर्व संस्करण जनसंघ) हमेशा एक प्रतीक की तलाश में रहे हैं। उनका अपना कोई ऐसा नेता पैदा नहीं हुआ जो खुद प्रतीक के रूप में याद किया जा सकता। ऐसे अकाल में निश्चय ही उन्हें एक प्रतीक के लिए भटकना पड़ रहा है। सत्तर के दशक में जनसंघ ने स्वामी विवेकानन्द को अपना प्रतीक गढ़ने का नापाक असफल प्रयास किया परन्तु विवेकानन्द के ऐतिहासिक शिकागो वक्तव्य ने जनसंघ की राह में रोड़े अटकाये जिसमें उन्होंने बड़ी शिद्दत से कहा था कि ”भूखों को धर्म की आवश्यकता नहीं होती है“। विवेकानन्द ने भूखों के लिए पहले रोटी की बात की जबकि जनसंघ और आरएसएस उस समय भारतीय पूंजीपतियों के एकमात्र राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में भारतीय राजनीति में कुख्यात थे।
उसी दशक में जनसंघ का अवसान हुआ और उसके नये संस्करण भाजपा का जन्म। भाजपा ने अपने जन्मकाल से सत्ता प्राप्ति के साधन के रूप में दो रास्ते निर्धारित किये - एक तो समाज के अंध धार्मिक विभाजन के जरिये मतों का ध्रुवीकरण और दूसरा एक प्रतीक को अंगीकार कर उसके आभामंडल के जरिये कुछ लाभ प्राप्त करना। पहले मंतव्य में तो भाजपा कुछ हद तक एक दौर में सफल रही परन्तु दूसरे मोर्चे पर उसके लगातार पराजय मिली है।
उन्होंने भगत सिंह को अपना प्रतीक बनाने की कोशिश इसलिए की क्योंकि शहीदे आजम भगत सिंह निर्विवाद रूप से भारतीय जन मानस में, और विशेष रूप से नवयुवकों में, एक नायक के रूप में जाने और पहचाने जाते हैं। भाजपा की यह बहुत बड़ी गलती थी क्योंकि भारतीय क्रान्तिकारियों में भगत सिंह उन नायकों में शामिल थे जिनके विचारों को पहले से ही बहुत प्रचार मिल चुका था। भगत सिंह के आदर्शों को भाजपा स्वीकार नहीं सकती क्योंकि वह ‘मार्क्सवादी’ दर्शन था। उन्होंने साम्प्रदायिकता के खिलाफ भी बोला और लिखा था जो पहले ही प्रकाशित हो चुका था। भाजपा एक बार फिर बुरी तरह असफल रही।
तत्पश्चात् भाजपा ने महात्मा गांधी को अपना प्रतीक बनाने की एक कोशिश की। अस्सी के दशक में ‘गांधीवादी समाजवाद’ लागू करने का नारा दिया गया। यह पहले की गल्तियों से कहीं बड़ी गलती थी। इस बात में कोई सन्देह नहीं कि गांधी एक महापुरूष थे और दुनियां के तमाम देशों में स्वतंत्रता और दमन के खिलाफ संघर्ष करने वालों ने उनके ‘सत्याग्रह’ के विचारों को लागू करने के सफल प्रयास किये परन्तु गांधी जी कभी समाजवादी नहीं रहे थे। इसलिए आम जनता कथित ‘गांधीवादी समाजवाद’ को स्वीकार भी नहीं कर सकती थी। दूसरे भाजपा की नाभि आरएसएस पर गांधी की हत्या का आरोप उस समय लग चुका था जब न तो जनसंघ वजूद में था और न ही भाजपा।
कांग्रेस नीत संप्रग अपने दो कार्यकाल पूरे कर रही है। निश्चित रूप से उसे पिछले 10 सालों के अपने काम-काज के कारण जनता में व्याप्त असंतोष का सामना आसन्न लोक सभा चुनावों में करना होगा। भाजपा इस अवसर का लाभ उठाने के लिए बहुत व्याकुल है। एक ओर वह अपने एक साम्प्रदायिक प्रतीक नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का प्रत्याशी घोषित कर ध्रुवीकरण का प्रयास कर रही है तो दूसरी ओर ‘लौह पुरूष’ के नाम से विख्यात कांग्रेसी नेता सरदार पटेल को अपना प्रतीक बना लेने की कोशिशें कर रही हैं।
भाजपा द्वारा मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किये जाने के पहले ही मोदी यह घोषणा कर चुके थे कि वे नर्मदा जिले में सरदार सरोवर बांध के पास सरदार पटेल की लोहे की एक 182 मीटर ऊंची विशालकाय प्रतिमा बनवायेंगे जो दुनियां की सबसे ऊंची प्रतिमा होगी। इस प्रतिमा के निर्माण के लिए गांव-गांव से खेती में प्रयुक्त होने वाले लोहे के पुराने बेकार पड़े सामानों को इकट्ठा किया जायेगा। अभी हाल में उन्होंने इस प्रतिमा का शिलान्यास समारोह भी सम्पन्न करवा दिया। समारोह के पहले मोदी ने पटेल के प्रधानमंत्री न बनने पर अफसोस जताकर गुजराती अस्मिता को उभारने की कोशिश की। उन्होंने यहां तक कह दिया कि सरदार पटेल की अंतेष्टि में जवाहर लाल नेहरू उपस्थित नहीं थे। एक तरह से मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर आक्रमण के जरिये ‘सोनिया-राहुल’ को भी निशाने पर लेना चाह रहे थे। कांग्रेस का मोदी पर पलट वार स्वाभाविक था।
भाजपा के किसी जमाने के कद्दावर नेता लाल कृष्ण आणवानी आज कल आरएसएस की बौद्धिकी का काम संभाल चुके हैं। सोशल मीडिया पर ब्लॉग लेखन वे काफी समय से कर रहे हैं। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मोदी के नाम की घोषणा पर उन्होंने कुछ नाक-भौ जरूर सिकोड़ी थी परन्तु आज कल वे अपने ब्लॉग के जरिये मोदी के एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं। आरएसएस की यह पुरानी रणनीति रही है कि वह अपने सभी अस्त्र-शस्त्र एक साथ प्रयोग नहीं करती बल्कि किश्तों में करती है जिससे मुद्दा अधिक से अधिक समय तक समाचार माध्यमों में छाया रहे।
आणवानी जी ने पहला शिगूफा छोड़ा कि नेहरू ने कैबिनेट बैठक में 1947 में सरदार पटेल को साम्प्रदायिक कहा था। इसका श्रोत उन्होंने एक पूर्व आईएएस अधिकारी को बताया। इस बात पर भी प्रश्न चिन्ह है कि जिस अधिकारी का हवाला दिया गया है वह उस समय सेवा में था अथवा नहीं और अगर सेवा में था तो भी वह कैबिनेट बैठक में कैसे पहुंचा। ध्यान देने योग्य बात यह है कि आजादी के पहले आईएएस नहीं आईसीएस होते थे। दो दिन बाद ही उन्होंने पूर्व फील्ड मार्शल मानेकशॉ के हवाले से अपने ब्लॉग में लिखा कि नेहरू 1947 में पाकिस्तान की मदद से कबाईलियों द्वारा कश्मीर पर हमले के समय फौज ही भेजना नहीं चाहते थे और फौज भेजने का फैसला सरदार पटेल के दवाब में लिया गया था। यह मामला भी कैबिनेट बैठक का बताया जाता है। इस पर भी प्रश्नचिन्ह है कि 1947 में मॉनेकशा फौज के एक कनिष्ठ अधिकारी थे और वे कैबिनेट बैठक में मौजूद भी हो सकते थेे अथवा नहीं। आने वाले दिनों में इसी तरह के न जाने कितने रहस्योद्घाटन आरएसएस की फौज करेगी जिससे मामला बहस और मीडिया में लगातार बना रह सके।
उत्सुकता स्वाभाविक है कि आखिर सरदार पटेल को इस गंदे खेल के मोहरे के रूप में क्यों चुना गया है? बात है साफ, दलीलों की जरूरत क्या है। एक तो भाजपा सरदार पटेल के नाम पर गुजराती वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहती है। दूसरे पटेल गुजरात की एक ताकतवर जाति है और उत्तर भारत की एक ताकतवर पिछड़ी जाति ‘कुर्मी’ भी अपने को सरदार पटेल से जोड़ती रही है। इस तरह उत्तर भारत में ‘कुर्मी’ वोटरों का ध्रुवीकरण भी उसका मकसद है।
मकसद कुछ भी हो, एक बात साफ है कि जब स्वामी विवेकानन्द भाजपा के न हो सके, न ही भगत सिंह और महात्मा गांधी तो फिर सरदार पटेल भी भाजपा के प्रतीक नहीं बन पायेंगे। सम्भव है कि चुनावों के पहले इसका भी रहस्योद्घाटन हो ही जाये कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध भी सरदार पटेल ने ही लगाया था और तत्कालीन संघ प्रमुख गोलवलकर से माफी नामा भी उन्होंने ही लिखाया था क्योंकि वे उस समय अंतरिम कैबिनेट में गृह मंत्री थे।
- प्रदीप तिवारी

शनिवार, 28 सितंबर 2013

भगत सिंह का दर्शन

                                   
भगत सिंह और उनके साथियों का सन 1920 में अंग्रेज साम्राज्यवादियो सत्ता के विरुद्ध मोर्चा लेना , भारतीय  स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सदैव ही एक गौरवशाली अध्याय बना रहेगा | एक उच्च आदर्श के लिए अडिग निष्ठा और उस आदर्श को पूरा करने की राह  में आई मुसीबतों की  कहानी , देश वासियों को सदैव विदेशी आधिपत्य या जनता के किसी भी प्रकार के आर्थिक बंधन का नामो -- निशाँ तक मिटा देने के लिए संघर्ष को प्रेरित करती रहेगी |

  भगत सिंह
उनके बालपन में जनता के संघर्ष
जनता का गुसा '' रौलेक्ट एक्ट '' के खिलाफ था , जिसके द्वारा अंग्रेज सरकार ने यह कोशिश की थी कि प्रथम विश्व युद्ध के समय की असाधारण दमनकारी धाराओं को युद्ध के बाद भी जारी  रखा जाए | सारे देश में उथल पुथल थी , प्रदर्शन हो रहे थे , जगह - जगह हडतालो की बाढ़ आ गयी थी |  बम्बई की हडतालो में सूती मिलो के एक लाख से भी ज्यादा मजदूर काम छोड़कर सडको पर आ गये थे | सरकार जनता पर भीषण दमन का चक्र चला रही थी | अप्रैल 1919  में अमृतसर के जलियावाला बाग़ में जनरल डायर ने सभा में एकत्र हुए जन समूह पर गोलिया बरसाकर निहत्थे आदमियों , औरतो तथा बच्चो का कत्ल  कर दिया , पर आन्दोलन रुका नही चलता रहा |
 कांग्रेसी वालन्टियर के रूप में
भगत सिंह का जन्म लाहौर से कुछ मील दूर सिन्दा गाँव में किसानी करने वाले एक सिख परिवार में हुआ था | उनके पिता -- सरदार किशन सिंह आर्य समाज के समाज सुधार आन्दोलन में शामिल होने के कारण प्रसिद्ध थे | भगत सिंह ने अपने स्कूली जीवन में  ''रौलेक्ट एक्ट  '' के खिलाफ होने वाले जनता के प्रदर्शनों के उथल पुथल भरे दिन देखे थे | अग्रेजी शासन के खिलाफ आम जनता की घृणा ने -- जो अपने -- आप फूट पड़ी थी और जिसका इजहार लाहौर में तीन मील लम्बे जलूस तथा उसके बाद होने वाली सप्ताह भर की शानदार हड़ताल में हुआ था -- स्वाभाविक  तौर पर इस बारह वर्ष के बालक के दिमाग पर एक गहरा असर डाला था | उसके कोमल मस्तिष्क पर अपनी गहरी छाप छोड़ी थी |
दो वर्ष बाद  भगत सिंह ने असहयोग -- आन्दोलन में एक कांग्रेसी वालंटियर की हैसियत से अपनी सक्रिय राजनैतिक शिक्षार्थी -- जीवन  की शुरुआत की | उन्होंने सिख गुरुद्वारे के प्रचार -- आन्दोलन में भी सक्रिय भाग लिया | यह आन्दोलन गुरुद्वारे की विशाल भूमि की सम्पत्ति पर थोड़े से महन्तों का ही सम्पत्ति -- अधिकार बनाये रखने के विरुद्ध , और उसे सारे सिख समुदाय की पंचायत के अधिकार में लाने के लिए था | सत्याग्रह सफल हुआ | पर उसके बाद , सिखों के एक हिस्से में साम्प्रदायिकता बढने लगी , परन्तु भगत सिंह साम्प्रदायिकता से दूर रहे उन्होंने उसमे सहयोग नही दिया | इतनी कुछ सक्रियता के बाद भगत सिंह ने पंजाब नेशनल कालेज में नाम लिखाया , तब वह अपने संक्षिप्त पर सितारे की तरह झिलमिलाते हुए क्रांतिकारी जीवन के द्वार पर ही थे |
यही पर वह सुखदेव और उन दूसरे साथियों से मिले जो आगे चलकर क्रांतिकारी कार्य
में उनके साथी बने | इसी दौरान में उत्तर परदेश के क्रान्तिकारियो द्वारा संगठित '' हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी '' से सम्पर्क किया 
'' हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियसन ''
सितम्बर सन 1928 में इन क्रान्तिकारियो का काम एक महत्वपूर्ण मंजिल तक पहुच गया था जब मुख्यत: भगत सिंह , सुखदेव , विजय कुमार सिन्हा और शिव वर्मा के प्रयत्नों से उत्तर प्रदेश, पंजाब , राजपुताना  , और बिहार के क्रांतिकारी दलों के प्रतिनिधियों ने दिल्ली में फिरोजशाह कोटला के पास कांफ्रेंस की | दो दिन की बहस के बाद एक नया  संगठन बनाया गया जिसका नाम '' दि हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन रखा गया | उसकी केन्द्रीय समिति भी चुनी गयी और सभी प्रान्तों से सम्पर्क रखने का कम विजय कुमार सिन्हा और भगत सिंह को सौपा गया इस कांफ्रेंस में समाजवादी जनतांत्रिक राज्य की स्थापना के उद्देश्य का स्वीकृत होना बताता है कि रुसी क्रांति के फलस्वरूप भारत के अधिकाधिक तरुणों में समाजवादी विचारों का प्रसार होता जा रहा था | भगत सिंह कुछ समय के लिए '' कृति ''  के दफ्तर से भी काम कर चुके थे | इस समाजवादी पत्र को पंजाब के कम्युनिस्ट नेता सरदार सोहन सिंह '' जोश '' ने शुरू किया था | भारत के साम्राज्यवाद ---- विरोधी संघर्ष में मार्क्सवाद -- लेलिनवाद के अस्त्र को काम  में लाने का पूरा अर्थ तो इन क्रान्तिकारियो ने भी अभी तक नही समझा था लेकिन उनमे इस विश्वास ने जड़ जमा ली थी कि मनुष्य द्वारा होने वाले मनुष्य के शोषण को सिर्फ समाजवाद ही खत्म कर सकता है |
उनके इरादे
क्या भगत सिंह और उनके साथी गोरी चमड़ी वाले अफसरों के खिलाफ थे जो अन्याय करते थे  | साण्डर्स को गोली मारने के बाद बाटे हुए उनके पर्चे को देखने पर , कोई भी उन पर ऐसा लाक्षण नही लगा सकता था | असेम्बली भवन में बाटे हुए उनके पर्चे भी यही बताते है | उन पर्चो से मनुष्यों के रक्तपात के प्रति उनकी दिली नफरत और न्याय के लिए उनकी ललक की भी झलक मिलती है | अंग्रेज शासन का हित इसी में था कि जनता के सामने भगत सिंह के कार्यो को दूसरे ही रंगों में पेश किया जाए नही तो उनकी अमानुषिक दण्ड देने पर सारे  देश की संवेदना और क्रोध का ज्वार उमड़ पड़ता | इसीलिए उस परचे पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था | हिन्दुस्तान टाइम्स के एक उत्साही सवाददाता ने किसी तरह विस्फोट के ठीक बाद ही उस परचे की एक प्रति हासिल कर ली और उसी दिन दोपहर को अखबार का एक विशेष संस्करण निकला जिसने उसके विषय की जानकारी को जनता की सम्पत्ति बना दिया |
परचा इस प्रकार था -----'' बधिरों को सुनाने के लिए एक भारी आवाज की आवश्यकता पड़ती है |
ऐसे ही एक अवसर पर , एक फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद -- भाईयो -- द्वारा कहे गये इन अमर शब्दों के साथ   '' हम दृढतापूर्वक  अपने इस कार्य को न्यायपूर्ण ठहराते है | ''
'' हम यहाँ सुधारों ( माटेग्यु - चेम्सफोर्ड सुधारों ) के लागू होने के पिछले दस वर्षो के अपमानजनक इतिहास की कहानी को बिना दोहराए और भारत के माथे पर इस सदन -- इस तथा कथित भारतीय प्रालियामेंट द्वारा मढ़े हुए अपमानो का भी बिना कोई जिक्र किये देख रहे है कि इस बार फिर , जबकि साइमन कमीशन  से कुछ और सुधारों की आशा करने वाले लोग उन टुकडो के बटवारे के लिए ही एक दूसरे पर भौक रहे है ,, सरकार हमारे उपर पब्लिक सेफ्टी ( जन सुरक्षा ) और ट्रेडर्स डिस्प्यूट्स ( औद्योगिक विवाद ) जैसे दमनकारी बिलों ( विध्येको ) को थोप रही है | ' प्रेस सेडीशन बिल ' को उसने अगली बैठक के लिए रख छोड़ा है | खुले आम काम करने वाले मजदूर नेताओं की अन्धाधुन्ध गिरफ्तारिया साफ़ बताती है कि हवा का रुख किस तरफ है |
इस अत्यंत ही उतेजनापूर्ण  परिस्थितियों में पूरी स्जिदगी के साथ अपनी पूरी जिम्मेदारी महसूस करते  हुए , ( हि. सो , रि ए  ) ने अपनी सेना को यह विशेष कार्य करने का आदेश दिया है जिससे कि इस अपमानजनक नाटक पर परदा गिराया जा सके | विदेशी नौकरशाह शोषक मनमानी कर ले | लेकिन जनता की आँखों के सामने उनका असली रूप  प्रकट होना चाहिए |
जनता के प्रतिनिधि अपने चुनाव -- क्षेत्रो में वापिस लौट जाए और जनता को आगामी क्रान्ति के लिए तैयार करे | और सरकार भी यह समझ ले कि असहाय भारतीय जनता की ओर से ' पब्लिक सेफ्टी ' और ट्रेडर्स डिस्प्यूटस ' बिलों तथा लाला लाजपत राय की निर्मम हत्या का विरोध करते हुए हम उस पाठ पर जोर देना चाहते है जो इतिहास अक्सर दोहराया करता है |
यह स्वीकार करते हुए दुःख होता है कि हमे भी जो मनुष्य को जीवन को इतना पवित्र मानते है , जो एक ऐसे वैभवशाली भविष्य का सपना देखते है जब मनुष्य परम शान्ति और पूर्ण स्वतंत्रता भोगेगा , मनुष्य का रक्त  बहाने पर विवश होना पड़ा है | लेकिन मनुष्य द्वारा होने वाले मनुष्य के शोषण को असम्भव बनाकर सभी के लिए स्वतंत्रता लाने वाली महान क्रान्ति की वेदी पर कुछ व्यक्तियों  का बलिदान अवश्यभावी है |
इन्कलाब जिंदाबाद    हस्ताक्षर
 बलराज ( कमांडर इन चीफ ) 
भगत सिंह का दर्शन -- के  क्रांति और बमो के संदर्भ में
 भगत सिंह क्रान्ति को किस रूप में समझते थे ?
दिल्ली सेशन जज द्वारा आजन्म कैद की सजा के फैसले के खिलाफ लाहौर हाईकोर्ट  में अपनी अपील की सुनवाई के समय उन्होंने अदालत में कहा था : -- '' क्रान्ति संसार  का नियम है , वह मानवीय प्रगति का रहस्य है | लेकिन '' उनमे रक्तरंजित संघर्ष बिलकुल लाजिमी नही है और न उसमे व्यक्तिगत प्रति  -- हिंसा  की ही कोई जगह है | वह बम और पिस्तौल का सम्प्रदाय नही है |
लेकिन तब भगत सिंह और उनकी पार्टी द्वारा  संगठित साण्डर्स गोलीकांड और तमाम बमो के विस्फोटो का क्या अर्थ लगाया जाना चाहिए ? साण्डर्स से असेम्बली के बम फोड़ने  के बाद बाटे गये परचे इन कृत्यों के कारणों को बताते है | दिल्ली लाहौर की अदालतों में दिए गये भगत सिंह के वक्तव्य में उन्हें विस्तृत रूप से रखा गया था | उन्होंने बिलकुल स्पष्ट तौर पर कहा था वह और उनके साथी विदेशी शासन के कसमसिया  दुश्मन होते हुए भी किसी व्यक्ति के प्रति अंधी और कुत्सित घृणा की भावना से प्रेरित नही थे |
बटुकेश्वर दत्त के साथ , एक संयुक्त वक्तव्य में उन्होंने स्पष्ट रूप से घोषित किया था :: '' हम मानवीय जीवन को अकथनीय पवित्रता देते है | मानवता की सेवा किसी को हानि पहुचाने की अपेक्षा शीघ्र ही अपने स्वंय के जीवन को होम कर देगे | हम समाजवादी सेना के भाड़े के सैनिको के तरह नही है , जिन्हें बिना किसी अफ़सोस के हत्या करने का अनुशासन सिखाया जाता है | हम मानवीय जीवन का आदर करते है जहा तक बनता है उसे बचाने के कोशिश करते है | इस पर भी , हम असेम्बली भवन में जानबूझकर बम फेकने के काम को स्वीकार करते है | तथ्य स्वंय ही अपनी कहानी कहते है और उद्देश्यों  की परख उस काम प्रणाम को देखकर ही करनी चाहिए , न कि कल्पित परिस्थितियों और मनमानी धारणाओं के आधार पर |
'' सरकारी पक्ष के विशेषज्ञ के सबूतों के बावजूद , असेम्बली भवन में फेके जाने वाले बमो से आधे दर्जन से भी कम लोगो को कुछ खरोचे भर लगी यदि उन बमो में कुछ ज्यादा क्लोरेट पोटाश का पूत दे दिया जाता  और जेल किस्म की पिक्रेट ( एसिड ) का भी मिश्रण  होता , तो उनसे चारो ओर का टीम -- ताम ही चकनाचूर हो जाता और विस्फोट के कुछ गजो के दायरे में तमाम लोग धाराशायी हो जाते | यदि , उन बमो में कुछ दूसरे अधिक विस्फोटक प्रदार्थ व नाशकारी चहरे या सुइया आदि भी मिला दी जाती तो वह विधान सभा के अधिकांश सदस्यों को खत्म करने के लिए काफी होते | इस पर भी हम उन्हें अफसरों के बैठने के स्थान पर फेंक सकते थे जहा बहुत ख़ास -- ख़ास लोग ठसाठस भरे थे | और अंत में हम उन बमो का निशाना सर जान  साइमन को भी बना सकते थे जो उस समय अध्यक्ष की गैलरी में बैठा था , जिसके अभागे कमिशन से सभी जिम्मेदार आदमी नफरत करते थे | लेकिन यह सब कुछ तो हमारा उद्देश्य नही था | बमो ने ठीक उतना ही काम  किया जितने के लिए वे बनाये गये थे | जिसे चमत्कार कहा जाता है वह कुछ और नही , एक समझा बुझा हुआ उद्देश्य ही था , जिसके कारण वे हानिरहित स्थानों पर ही फेंके गये थे | ''
अपने  मुकदमे में बहस करते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि विठ्ठल  भाई पटेल  , पंडित मोतोलाल नेहरु  , पंडित मदन मोहन मालवीय तथा दूसरे आदरणीय नेताओ पर संहारक बम फेकने  की बात वे सपने में भी नही सोच सकते थे -- यह अलग बात थी कि क्रांतिकारी  उन नेताओं के विचारो से सहमत नही थे | उनके साधनों में विश्वास नही करते थे | भगत सिंह ने मिस्टर जसिस्ट फोर्ड से पूछा था : '' यदि एक आदमी इस तरकीब से एक बम बनाता है कि उससे किसी को भी कोई गम्भीर चोट नही लग सकती और वह उसके फटने के वक्त ज्यादा से ज्यादा सावधानी बरतता है कि कोई ऐसी चोट न लग सके , तब भी क्या वह आदमी हत्या का पर्यटन करने का अपराधी होगा ?
मिस्टर फोर्ड :  '' तुमको यह साबित करना होगा कि वह बम इसी प्रकार का था , और उसको ऐसे ढंग से फेंका गया था कि किसी आदमी के जीवन को खतरा पैदा न हो | "
भगत सिंह : '' हम उन बमो की सीमित शक्ति जानते थे , और किसी को भी चोट न लगने देने के लिए हमने हर संभव सावधानी बरती थी | ''
उन्होंने आगे कहा कि जनरल दायर ने जालियावाला बाग़ में सैकड़ो आदमियों की हत्या की थी , लेकिन उस पर कभी भी मुकदमा नही चलाया गया था | इसके विपरीत उसके  देश के लोगो ने उसे लाखो का इनाम दिया था | वह कहते गये उसकी तुलना में
'' हम एक कमजोर बम बनाते है और जानबूझकर उसे एक खाली  स्थान पर फेंकते है | पर हम , पर मुकदमा चलाया जाता है और आजन्म कैद की सजा सुनाई  जाती है | किसी की हत्या करने का  हमारा इरादा नही था | द्देष शब्द को निकल दीजिये बस मुझे संतोष हो जाएगा | हमारा एक निश्चित आदर्श है हम अपने आदर्श को पाने के लिए कुछ साधन अपनाए थे | ''
भगत सिंह को ऐसा कोई बचकाना भ्रम नही था कि बमो से ही क्रान्ति आ जायेगी | या ऐसा करना क्रान्ति की ओर एक आगे बढा हुआ कदम होगा | परतंत्र मातृभूमि की वेदना ने उनके हृदय में विद्रोह की भावना जगा दी | बमो का प्रयोग देशवासियों की हृदय -- विदारक पीड़ा के प्रति उनके '' क्षोभ का अभिव्यक्तिकरण ही था |

दिल्ली के अदालत में उन्होंने कहा था '' समाज का वास्तविक पोषक मजदूर है | जनता का प्रभुत्व मजदूरो का अंतिम  भाग्य है | इन आदर्शो और विश्वासों के लिए , हम हर उस कष्ट का स्वागत करेंगे जिसकी हमे सजा दी जायेगी | हम अपनी तरुणाई को इसी क्रान्ति की वेदी पर होम करने लाये है क्योकि इतने गौरवशाली उद्देश्य के लिए कोई भी बलिदान बहुत बड़ा नही है | क्रान्ति के आगमन की प्रतीक्षा करने में हमे संतोष है '' |
उनके विचार से क्रान्ति का उद्देश्य '' स्पष्ट रूप से अन्याय पर खड़ी हुई वर्तमान व्यवस्था '' को बदलना था | यह अन्याय किस जगह पर होता है ?
'' समाज के सबसे आवश्यक तत्व होते हुए भी उत्पादन करने वालो या मजदूरो से उनके शोषक उनकी मेहनत का फल लूट लेते है , और उनको प्रारम्भिक अधिकारों से भी वंचित कर देते है | एक ओर तो सभी के लिए अनाज पैदा करने वाले किसानो के परिवार भूखो मरते है सारे संसार के बाजारों को सूत जुटाने वाला जुलाहा अपना और अपने बच्चो का तन ढकने के लिए भी पूरा कपडा नही जूता पता शानदार महल खड़े करने वाले राज लुहार और बढ़ई झोपड़ियो में ही बसर करते और मर जाते है और दूसरी ओर पूजीपति शोषक -- समाज की जोंके  -- अपनी संको पर ही करोड़ो बहा  देते है | ''  भगत सिंह ने कहा था कि इसीलिए एक उग्र परिवर्तन की आवश्यकता थी और लोग भी महसूस कर चुके थे उनका कर्तव्य था कि '' एक  समाजवादी आधार पर समाज का पुनर्गठन करे | ''
'' जब तक यह नही किया जता और मनुष्य द्वारा होने वेक मनुष्य के , तथा साम्राज्यवाद का चोगा पहने हुए देश द्वारा देश के शोषण का अंत नही किया जता , मानवता की इस मुसीबत और खूनखराबे को , जो आज उसे धमका रही है , नही रोका जा सकता | दरअसल इसके बिना युद्धों को अंत करने और विश्व व्यापी शान्ति के युग को लाने की सारी बाते ऐसी व्यवस्था की स्थापना जिसमे इस प्रकार के हडकम्प का भय न हो और जिसमे मजदुर वर्ग के प्रभुत्व को मान्यता दी जाए और उसके फलस्वरूप विश्व संघ पूजीवाद के बन्धनों , दुखो तथा युद्धों की मुसीबतों से मानवता का उद्धार कर सके | '' आज भी भगत सिंह के विचार प्रासंगिक है |

-सुनील दत्ता
 स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक

शनिवार, 23 मार्च 2013

चुनाव का खर्चा कारपोरेट सेक्टर ही उठा रहे है : कामरेड अशोक मिश्रा

ब्रिटिश साम्राज्यवाद से अमरीकी साम्राज्यवाद के सफर में सरकारों का संचालन अपने मुनाफे के लिए कारपोरेट सेक्टर करने लगा है। सरकारे उसकी इच्छानुसार नही चलती है तो उन सरकारों को उन्हे साम्राज्यवाद नेस्तनाबूत कर देता है।
    यह विचार शहीद भगत सिंह के बलिदान दिवस के अवसर पर आयोजित संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय परिषद सदस्य कामरेड अशोक मिश्रा ने कहा कि आज सत्तारूढ दल और विपक्षी दल दोनो पार्टियों  को कारपोरेट सेक्टर ही संचालित कर रहा है। उनके चुनाव का खर्चा कारपोरेट सेक्टर ही उठा रहे है। जनेस्मा प्रवक्ता डा0 राजेश मल्ल ने कहा कि अमेरिकी साम्राज्यवाद नंगा हो चुका है और इराक से लेकर उत्तरी माली तक अपनी सरकारे अपने फौजो के दम पर बना रहा है।
    पार्टी के सहसचिव कामरेड रणधीर सिंह सुमन संगोष्ठी में बोलते हुए कहा कि शहीद भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव की सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब उनका जन्म पडोसी के घर मे न होकर हमारे घर में जन्म ले। बेईमान भ्रष्ट अफसर दुश्मनों के घर में हो जिससे उनका आत्मसम्मान गिरे।
    पार्टी के जिला सचिव बृज मोहन वर्मा ने कहा कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद से तो मुक्ति पा ली गयी थी किन्तु अमरीकी साम्राज्यवाद से छुटकारा पाना बडा दुष्कर कार्य है क्योकि एन0जी0ओ0 के माध्यम से सेवा भाव का ड्रामा करते हुए अमरीकी साम्राज्यवाद का बढावा दे रहा है।
    पार्टी के सहसचिव डा कौसर हुसैन ने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि भगत सिंह के बम दर्शन को नवजवानों के बीच में ले जाया जाये जिससे नवजवान क्रान्तिकारी के रास्ते पर चल सके।
    गांधी भवन में आयोजित शहीद भगत सिंह की पुण्य तिथि पर कार्यक्रम का शुभारम्भ कामरेड अशोक मिश्रा ने भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव के चित्रों पर माल्र्यापण कर किया। संगोष्ठी को अनूप कल्याणी, श्री राम सुमन, बलराम सिंह, डा0 एस0एम0 हैदर, पवन वैश्य, आदि ने सम्बोधित किया।
    कार्यक्रम में विपतराम ,विनय दास, पुष्पेन्द्र कुमार सिंह, नीरज वर्मा, निर्मल वर्मा, डा0 उमेश चन्द्र वर्मा, आदि प्रमुख लोग उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन विनय कुमार सिंह ने किया।

नीरज कुमार वर्मा

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

वीर भगत सिंह आज अगर, उस देश की तुम दुर्दशा देखते






शहीद दिवस के अवसर पर विशेष

जिस पर अपना सर्वस्व लुटाया, जिसके खातिर प्राण दिए थे।
वीर भगत सिंह आज अगर, उस देश की तुम दुर्दशा देखते॥
आँख सजल तुम्हारी होती, प्राणों में कटु विष घुल जाता।
पीड़ित जनता की दशा देखकर, ह्रदय विकल व्यथित हो जाता ॥
जहाँ देश के कर्णधार ही, लाशों पर रोटियाँ सेकते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
तुम जैसे वीर सपूतों ने, निज रक्त से जिसको सींचा था।
यह देश तुम्हारे लिए स्वर्ग से सुन्दर एक बगीचा था॥
अपनी आँखों के समक्ष, तुम कैसे जलता इसे देखते ।
वीर भगत सिंह आज अगर........
जिस स्वाधीन देश का तुमने, देखा था सुन्दर सपना।
फांसी के फंदे को चूमा था, करने को साकार कल्पना॥
उसी स्वतन्त्र देश के वासी, आज न्याय की भीख मांगते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
अपराधी, भ्रष्टों के आगे, असहाय दिख रहा न्यायतंत्र।
धनपशु, दबंगों के समक्ष, दम तोड़ रहा है लोकतंत्र।
जहाँ देश के रखवालों से, प्राण बचाते लोग घुमते॥
वीर भगत सिंह आज अगर........
साम्राज्यवाद का सिंहासन, भुजबल से तोड़ गिराया था
देश के नव युवकों को तुमने, मुक्ति मार्ग दिखाया था॥
जो दीप जलाये थे तुमने, अन्याय की आंधी से बुझते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
जिधर देखिये उधर आज, हिंसा अपहरण घोटाला है।
अन्याय से पीड़ित जनता, भ्रष्टाचार का बोल बाला है॥
लुट रही अस्मिता चौराहे पर, भीष्म पितामह खड़े देखते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
साम्राज्यवाद के प्रतिनिधि बनकर, देश लुटेरे लूट रहे।
बंधुता, एकता, देश प्रेम के बंधन दिन-दिन टूट रहे॥
जनता के सेवक जनता का ही, आज यहाँ पर रक्त चूसते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
बंधू! आज दुर्गन्ध आ रही, सत्ता के गलियारों से।
विधान सभाएं, संसद शोभित अपराधी हत्यारों से।
आज विदेशी नहीं, स्वदेशी ही जनता को यहाँ लूटते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
पूँजीपतियों नेताओं का अब, सत्ता में गठजोड़ यहाँ।
किसके साथ माफिया कितने, लगा हुआ है होड़ यहाँ ॥
अत्याचारी अन्यायी, निर्बल जनता की खाल नोचते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
शहरों, गाँवों की गलियों में, चीखें आज सुनाई देती।
अमिट लकीरें चिंता की, माथों पर साफ़ दिखाई देती॥
घुट-घुट कर मरती अबलाओं के, प्रतिदिन यहाँ चिता जलते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
घायल राम, मूर्छित लक्ष्मण, रावण रण में हुंकार रहा।
कंस कृष्ण को, पांडवों को, दुःशासन ललकार रहा॥
जनरल डायर के वंशज, आतंक मचाते यहाँ घूमते।
वीर भगत सिंह आज अगर, उस देश की तुम दुर्दशा देखते॥


-मोहम्मद जमील शास्त्री
( सलाहकार लोकसंघर्ष पत्रिका )
शहीद दिवस के अवसर पर भगत सिंह, राजगुरु व सहदेव को लोकसंघर्ष परिवार का शत्-शत् नमन

बुधवार, 30 जनवरी 2013

सूफी अम्बा प्रसाद



यह बात एकदम सच है कि 1857 के बाद के काल में खड़े होते रहे राष्ट्रीय आन्दोलनों व संघर्षो में 1857 के स्वतंत्रता युद्ध से उपजी राष्ट्रीय भावना ने एक आधार व प्रेरणा का काम किया | खासकर उस युद्ध में हिनुस्तानियो की हार के बाद ब्रिटिश शासको द्वारा आम हिन्दुस्तानियों पर किये गये अत्याचार व अनाचार ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय भावनाओं को अंकुरित करने के आधार बने | फिर ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा हिन्दुस्तान का निरंतर चलता लूट , शोषण , दमन के रूप में उसका आधार पहले से ही विद्यमान था | यही कारण था कि 1857 के तुरंत बाद कूका विद्रोह , नील विद्रोह से लेकर बलवन्त फडके   के रूप में क्रांतिकारी विद्रोही की छोटी -- बड़ी ज्वालाए फूटने लग गयी |
अब देश का उच्च एवं माध्यम वर्गीय बौद्धिक हिस्सा भी राष्ट्रीय भावनाओं के साथ ब्रिटिश साम्राज्यवाद  के विरोध  की अभिव्यक्तिया करने लग गये थे | सूफी अम्बा प्रसाद भी उनमे से एक थे | सूफी अम्बा प्रसाद के जीवन व कृतित्व का यह लेख भगत सिंह ने '' विद्रोही '' छद्म नाम से 1928 में लिखा था | इस लेख को हमने भगत सिंह एवं साथियो के दस्तावेज नाम की पुस्तक से लिया हुआ है |  सूफी अम्बा प्रसाद की मृत्यु  ईरान में हुई और वही उनके कब्र बनी हुई है | वहा  हर साल मेला लगता था | वर्तमान में इसकी क्या दशा है इसकी कोई सूचना नही मिल पायी है ||  कयोंकि स्वतंत्रता के लिए अपना तन -- मन -- धन कुर्बान कर देने वाले  राष्ट्रभक्तो की इस देश में घनघोर उपेक्षा की जाती  रही है | बहुतेरे नामी गिरामी राष्ट्रभक्तो शहीदों का तो लोग नाम तक नही जानते | इनकी जगह धन -- सत्ता , पद -- प्रतिष्ठा पर चढ़ रहे ऐसे लोग अब इस राष्ट्र  के नायक बनते जा रहे है , जिन्होंने खोया तो कुछ नही है और पाया सब कुछ है | स्वाभाविक बात है कि उन्हें सूफी अम्बा प्रसाद व अन्य राष्ट्रवादी क्रान्तिकारियो को याद करने -- कराने की जरूरत भी नही है | इसीलिए उन्हें याद करने कराने का काम देश के जनसाधारण पर आ पडा है कयोंकि उन्हें ही इनके त्याग बलिदान से प्रेरणा लेकर राष्ट्रहित एवं जनहित में नए आन्दोलनों एवं संघर्षो के लिए खड़ा होना है और अपरिहार्य रूप से खड़ा होना है ...................

आज भारत वर्ष में कितने लोग सूफी अम्बा प्रसाद का नाम जानते है ? कितने उनकी स्मृति में शोकातर होकर आँसू भाते है | कृतघ्न भारत ने कितने ही ऐसे रत्न खो दिए है | वे सच्चे देशभक्त थे | उनके हृदय में देश के लिए दर्द था | वे भारत की प्रतिष्ठा देखना चाहते थे भारत को उन्नति के शिखर पर पहुंचाना चाहते थे , तो भी आज भारत के बहुत कम लोग उनका नाम जानते है | उनकी कदर भी की तो इरान ने आज यहाँ आका सूफी का नाम सर्वप्रिय हो रहा है | सूफी जी का जन्म 1858 में मुरादाबाद में हुआ था | आपका दाहिना हाथ जन्म से ही कटा था | आप हँसी में कहा करते थे -- अरे भाई ! हमने सत्तावन में अंग्रेजो के विरुद्ध युद्ध किया | हाथ कट गया | मृत्यु हो गयी | पुनर्जन्म हुआ हाथ कटे का कटा आ गया | आपने मुरादाबाद , बरेली और जालन्धर आदि कई शहरों में शिक्षा पाई | एम् ए पास करने के पश्चात आपने वकालत  पास कर ली , परन्तु की नही | आप उर्दू के प्रभावशाली लेखक थे | आप ने यही काम सम्भाला |
सन 1890 में आपने मुरादाबाद से जाम्युल इलुक नामक उर्दू साप्ताहिक पत्र निकाला इसका प्रत्येक शब्द उनकी आंतरिक व्यवस्था का परिचय देता था | वे हास्य रस के प्रसिद्ध लेखक थे , परन्तु इनमे गंभीरता भी कम न थी | वे हिन्दू -- मुस्लिम एकता के कट्टर पक्षपाती थे और शासको की कड़ी आलोचना किया करते थे |
सन 1897 में आपको राजद्रोह के अपराध में डेढ़ वर्ष का कारागार मिला .......1899 में छूटकर आये तो यू .पी के कुछ छोटे राज्यों पर अंग्रेज लोग हस्तक्षेप कर रहे थे | सूफी जी ने वहा  के अंग्रेजो तथा रेजीडेनटो का खूब भंडा फोड़ किया | आप पर मिथ्या दोषारोपण का अभियोग चलाया गया और सारी  जायदाद जब्त कर छ: साल का कारागार दिया गया | जेल में उन्हें अकथनीय कष्ट सहन  करने पड़े , परन्तु वे कभी विचलित नही हुए |
सूफी जी जेल में बीमार पड़े | एक गलीज कोठरी में बंद थे | उन्हें औषधि नही दी जाती थी यहाँ तक कि पानी आदि का भी ठीक प्रबंध न था | जेलर आता और हंसता हुआ प्रश्न करता -- सूफी , अभी तुम ज़िंदा हो ? खैर ! ज्यो -- त्यों कर जेल कटी और 1906 के अंत में आप बाहर आये |
सूफी जी का निजाम हैदराबाद से घनिष्ट सम्बन्ध था | जेल से छूटते ही वह हैदराबाद गये | निजाम ने उनके लिए एक अच्छा -- सा मकान बनवाया | मकान बन जाने पर उन्होंने सूफी जी से कहा -- आप के लिए मकान तैयार हो गया है | आपने उत्तर दिया -- हम भी तैयार हो गये है | आपने वस्त्रादि उठाए और पंजाब के लिए चल दिए | वहा  जाकर आप '' हिन्दुस्तान '' अखबार में काम करने लगे | सुनते है वह आपकी चतुरता , वाक्पटुता और समझदारी देखकर सरकार की ओर से 1000 रुपया मासिक जासूस विभाग से पेश किये गये थे , परन्तु आपने उनके उपेक्षा जेल और दरिद्रता को श्रेष्ठ समझा | बाद को '' हिन्दुस्तान '' -- सम्पादक से भी आपकी न बनी | आपने वहा  से भी त्याग -- पत्र दे दिया |
उन्ही दिनों सरदार अजीत सिंह ने भारत माता सोसायटी की नीव डाली और पंजाब के न्यू कालोनी  बिल के विरुद्ध आन्दोलन आरम्भ कर दिया | सूफी जी का भी मेल उनसे बनने लगा | उधर वे भी इनकी ओर आकर्षित होने लगे | सन 1906 में पंजाब में फिर धर -- पकड शुरू हुई तो सरदार अजीत सिंह के भाई सरदार किशन सिंह और भारत माता सोसायटी के मंत्री मेहता आनन्द किशोर के साथ वे नेपाल चल दिए | वह नेपाल राज्य के गवर्नर श्री
जंगबहादुर जी से आपका परिचय हो गया | वे इनसे बहुत अच्छी तरह पेश आये |

बाद को श्री जंगबहादुर  जी सूफी को आश्रय देने के कारण ही पदच्युत कर दिए गये | उनकी संम्पत्ति जब्त कर ली गयी | खैर सूफी जी वहा  पकडे गये और लाहौर लाये गये | लाला पिण्डीदास जी के पत्र '' इंडिया '' में प्रकाशित आपके लेखो के सम्बन्ध में ही आप पर अभियोग चलाया गया , परन्तु निर्दोष सिद्ध होने के बाद में आपको छोड़ दिया गया |
तत्पश्चात सरदार अजीत सिंह भी छूटकर आ गये | और सन 1909 में भारत माता बुक सोसायटी की नीव डाली गयी | इसका अधिकतर कार्य सूफी जी किया करते थे | आपने बागी मसीह या विद्रोही मसीह नामक पुस्तक प्रकाशित करवाई जो बाद में जब्त कर ली गयी | इसी वर्ष लोकमान्य तिलक पर अभियोग चलाया गया और उन्हें भी 6 वर्ष का कारावास मिला | तब देशभक्त -- मंडल के सभी सदस्य साधू बनकर पर्वतों की ओर यात्रा करने निकल पड़े | पर्वतों के उपर जा रहे थे | एक भक्त भी साथ आया | साधू बैठे तो उस भक्त ने सूफी जी के चरणों पर सीस नमस्कार किया | बड़ा सभ्य था | खूब सूट बूट पहने था | सूफी जी के चरणों पर शीश रखा और पूछने लगा -- बाबा जी आप कहा रहते है ?
सूफी जी ने कठोर शब्दों में उत्तर दिया -- रहते है तुम्हारे सर में !

साधू जी , आप नाराज हो गये ?
- अरे बेवकूफ ! तूने मुझे क्यों नमस्कार किया ! इतने और साधू भी थे , इनको प्रणाम क्यों न किया ?
मैं आपको साधू समझा था |
अच्छा खैर जाओ , खाने -- पीने  की वस्तुए  लाओ | वह कुछ देर बाद अच्छे -- अच्छे खाद्य प्रदार्थ लेकर आया | खा पीकर सूफी जी ने उसे फिर बुलाया और कहने लगे -- क्यों बे हमारा शीघ्र पीछा छोड़ेगा या नही ?
भला मैं आपसे क्या कहता हूँ जी ?
चालाकी को छोड़ | आया है जासूसी करने ! जा अपने बाप से कह देना कि सूफी पहाड़ में गदर करने जा रहे है | वह चरणों पर गिर पड़ा -- हुजूर पेट की खातिर सब कुछ करना पड़ता है |

आपने सन 1909 में ' पेशवा '' अखबार निकाला | उन्ही दिनों बंगाल में क्रांतिकारी आन्दोलन ने जोर पकड़ा | सरकार को चिंता हुई कि कही यह पंजाब को भी जला न डाले | अस्तु दमन -- चक्र आरम्भ हुआ | तब सूफी जी , सरदार अजीत सिंह और जिया -- उल -- हक ईरान चले गये | वह पहुंचकर जिया - उल - हक की नियत बदल गयी | उसने चाहा , इन्हें पकडवा दू तो इनाम भी मिलेगा | और सजा भी न होगी | परन्तु सूफी जी ताड़ गये | उन्होंने आगे भेज दिया ( फलस्वरूप वह ) स्वंय ही पकड़ा गया और ये दोनों बच निकले | इरान  में कैसे रहे , क्या हुआ , यह बाते तो किसी अवसर पर खुलेगी परन्तु जो कुछ सुनने में आया , उसी का उल्लेख इस स्थान पर किया जाता है | ईरान में अंग्रेजो ने उनकी बहुत खोज की और उन्हें कई प्रकार के कष्ट सहन  करने पड़े | कहा जाता है कि वे एक स्थान पर घेर लिए गये | वहा से निकलना असम्भव -- सा हो गया | वहा व्यापारियों का एक काफिला ठहरा हुआ था | ऊँटो पर बहुत -- से बंदूक लादे थे | आगे वस्त्र आदि भरे थे | एक ऊंट के दोनों संदूको में सूफी जी तथा अजीत सिंह को बंद कर दिया गया और वहा से बचाकर निकाला  गया | फिर किसी अमीर के घर ठहर | पता चल गया और फिर वह घेर लिए गये | उसी समय उन दोनों को बुर्का पहना जनाने में बिठा दिया गया | सबकी तलाशी ली गयी और अन्त में स्त्रियों की तलाशी ली जाने  लगी | एक दो स्त्रियों के बुर्के उठाए भी गये परन्तु मुसलमान लोग लड़ने -- मरने को तैयार हो गये और फिर अन्य किसी स्त्री का बुर्का नही उठाने दिया गया | इस तरह वे दोनों वहा से भी बचे |

उन्होंने वहा से '' आबे हयात '' नामक पत्र निकाला और राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लगे | सरदार साहिब के टर्की चले जाने पर वहा  का
सारा कार्य इन्ही के सर पर आ पडा और फिर ये वहा आकर सूफी के नाम से प्रसिद्द हुए | सन 1915 में जिस समय ईरान में अंग्रेजो  ने पूर्ण प्रभुत्व जमाना चाहा तो फिर कुछ उथल -- पुथल मची थी | शिराज पर घेरा डाला गया | उस समय सूफी जी ने बाए हाथ से रिवाल्वर चलाकर मुकाबला किया था , परन्तु अंत में आप
अंग्रेजो के हाथ आ गये | उनका कोर्ट मार्शल किया गया | फैसला हुआ कि कल गोली से उड़ा दिए जायेंगे | सूफी कोठरी में बंद थे | प्रात: समय देखा तो समाधि की अवस्था में थे | उनके प्राण पखेरू उड़ चुके थे | उनके जनाजे के  साथ असंख्य ईरानी गये और उन्होंने बहुत शोक मनाया | कई दिन तक नगर में उदासी छाई  रही | सूफी जी की कब्र बनाई गयी | अभी तक हर वर्ष उनकी कब्र पर उत्सव मनाया जाता है | लोग उनका नाम सुनते ही श्रद्धा से सर झुका लेते है |
वे पैर से भी लेखनी पकड़कर अच्छी तरह लिख सकते थे | एक दिन एक महाशय कह रहे थे कि मुझे उन्होंने पैर से ही लिखकर नुस्खा दिया था |
एक और कहानी
मित्रो ने सुनाई थी | पता नही कहा तक सच है | परन्तु बहुत संभव है वह सच हो | कहते है जब भोपाल या किसी स्टेट में रेजिडेंट कुछ गड़बड़ कर रहे थे और उसके हड़प करने की चिंता में थे तो वहा  का भेद प्रकाशित करने के लिए अमृत बाजार पत्रिका की ओर से सूफी जी वह भेजे गये थे | यह बात 1890 के लगभग की है |
एक पागल -- सा मनुष्य रेजीडेनट  के पैर के पास नौकरी की खोज में आया अंत में केवल भोजन पर ही रख लिया गया | वह पागल बर्तन साफ़ करता तो , मिटटी में लथपथ हो जाता | मुँह पर मिटटी पोत लेता | वह सौदा खरीदने में बड़ा चतुर था , अस्तु चीजे खरीदने वही भेजा जाता था | उधर अमृत बाजार पत्रिका में रेजिडेंट के विरुद्ध धडाधड लेख निकलने लगे | अंत में इतना बदनाम हुआ कि पद्चुत कर दिया गया | जिस समय वह स्टेट से बाहर पहुंच गया तो एक जक्सन पर एक काला -- सा आदमी हैट लगाये पतलून -- बूट पहने उसकी ओर आया |
उसे देखकर रेजिडेंट चकित -- सा रह गया | ये तो वही है जो मेरे बर्तन साफ़ किया करता था |
आज पागल नही | उसने आते ही अंग्रेजी में बातचीत शुरू की
उसे देखकर रेजिडेंट कापने लगा | आखिर उसने कहा -- तुम्हे इनाम तो दिया जा चुका है , अब तुम मेरे पास क्यों आये हो ?
आपने कहा था -- जो आदमी उस गुप्तचर को जिसने कि आपका भेद खोला है पकड़वाये  तो आप कुछ इनाम देंगे |
हां कहा था | क्या तुमने उसे पकड़ा ? हां , हां ... इनाम दीजिये | .......
वह मैं स्वंय  हूँ |
वह थर थर कापने लगा | बोला -- यदि राज्य के अन्दर ही मुझे तेरा पता चल जाता तो तुझे बोटी -- बोटी उडवा देता | खैर उसने उन्हें एक सोने की घड़ी दी और कहा -- यदि तुम स्वीकार करो तो जासूस विभाग से 1000 रूपये मासिक वेतन दिला सकता हूँ | परन्तु सूफी जी ने कहा __ अगर वेतन ही लेना होता तो आपके बर्तन क्यों साफ़ करता ?
आज सूफी जी इस देश में नही है | पर ऐसे देशभक्त का स्मरण ही स्फूर्तिदायक होता है |


-सुनील दत्ता
पत्रकार

रविवार, 16 दिसंबर 2012

कूका विद्रोह और उसके नायक रामसिंह ........भगत सिंह

शहीद भगत सिंह ने राष्ट्र के स्वतंत्रता आन्दोलन के नायको के जीवन और उनके क्रांतिकारी  क्रिया कलाप , त्याग व बलदान पर श्रृखलाबद्ध लेख लिखा था | कूका विद्रोह और उसके महानायक राम सिंह पर उन्होंने दो लेख लिखे थे | पहला लेख फरवरी 1928 में उन्होंने बी . ए. सिधु के नाम से दिल्ली से प्रकाशित '' महारथी '' और दूसरा लेख अक्तूबर 1928 में विद्रोही के नाम से किरति '' नामक पत्रिका में लिखा था | एक और बात -- कूका विद्रोह के महानायक राम सिंह से देश के धर्मज्ञो और धर्म गुरुओं से लेकर नए पुराने धर्म के अनुयायियों को भी सीख  लेनी चाहिए और वह भी वर्तमान राष्ट्रीय व सामाजिक संदर्भो में | आज विदेशी शक्तिया पुन: देश के हर क्षेत्र में अधिकाधिक व आधिकारिक रूप से घुसपैठ करती जा रही है | इसके फलस्वरूप देश के बहुसंख्यक जनसाधारण का जीवन निरंतर तबाही व बर्बादी की दिशा में बढ़ता जा रहा है | इस दिशा में उसे विदेशी साम्राज्यी शक्तियों के अलावा देश के हर धर्म सम्प्रदाय के धनाढ्य व उच्च हिस्सों द्वारा ढकेला जा रहा है | इसीलिए वर्तमान दौर में कूका विद्रोह और गुरु राम सिंह के बारे में भगत सिंह का लेख  पढने के लिए ही नही पढ़ा जाना चाहिए , बल्कि उसे अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसे देशो और उनकी पूंजी तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के चंगुल से राष्ट्र व समाज की मुक्ति संघर्ष के लिए भी पढ़ा जाना चाहिए ............................
आज हम पंजाब के तख्ता पलटने के आन्दोलन और राजनितिक जागृति का इतिहास पाठको के सामने रख रहे है | पंजाब में सबसे पहली राजनितिक हलचल कूका आन्दोलन से शुरू होती है | वैसे तो वह आन्दोलन साम्प्रदायिक -- सा नजर आता है , लेकिन जरा गौर  से देखे तो वह बढा भारी राजनैतिक आन्दोलन था , जिसमे धर्म भी मिला था जिस तरह कि सिक्ख आन्दोलन में पहले धरम और राजनीति मिली -- जुली थी | खैर हम देखते है कि हमारी आपस की साम्प्रदायिक और तंगदिली का यही परिणाम निकलता है कि हम अपने बड़े -- बड़े महापुरुषों को इस तरह भूल जाते है जैसे कि वे हुए ही न हो | यही स्थिति हम हम अपने बड़े भारी महापुरुष '' गुरु राम सिंह के सम्बन्ध में देखते है | हम '' गुरु नही कह सकते और वे गुरु कहते है , इसीलिए हमारा उनसे कोई सम्बन्ध नही -- आदि बाते कहकर हमने उन्हें दूर फेंक रखा है | यही पंजाब का सबसे बड़ा घाटा है | बंगाल के जितने भी बड़े -- बड़े आदमी हुए है , उनकी हर साल बरसिया मनाई जाती  है , सभी अखबारों में उन पर लेख दिए जाते है , यह समझा जाता है कि मौक़ा मिला तो इस पर विचार करेंगे |
पंजाब को सोए थोड़े ही दिन हुए थे , लेकिन नीद बड़ी गहरी आई | हालाकि अब फिर होश आने लगा है | बड़ा भारी आन्दोलन  उठा | उसे दबाने की कोशिश की गयी | कुछ ईश्वर ने स्थिति भी ऐसी ही पैदा कर दी --- वह आन्दोलन भी कुचल दिया गया | उस आन्दोलन का नाम था'' कूका आन्दोलन'' | कुछ ध्रामिक , कुछ सामाजिक रंग -- रूप रखते हुए भी वह आन्दोलन एक तख्ता पलटने का नही , युग पलटने का था | चूकी अब इन सभी आंदोलनों का इतिहास यह बताता है कि आजादी के लिए लड़ने वाले लोगो का एक अलग ही वर्ग बन जाता है , जिनमे न दुनिया का मोह होता है और न पाखंडी साधुओ -- जैसा दुनिया का त्याग ही | जो सिपाही तो होते थे लेकिन भाड़े के लिए लड़ने वाले नही , बल्कि सिर्फ अपने फर्ज के लिए या किसी काम के लिए कहे , वे निष्काम भाव से लड़ते और मरते थे | सिक्ख इतिहास यही कुछ था | मराठो का आन्दोलन भी यही कुछ बताता है | राणा प्रताप के साथी राजपूत भी इसी तरह के योद्धा थे | बुन्देलखंड के वीर छत्रसाल के साथी भी ऐसे थे |
ऐसे ही लोगो का वर्ग पैदा करने वाले बाबा रामसिंह ने प्रचार और संगठन शुरू किया | बाबा रामसिंह का जन्म 1824 में लुधियाना जिले के भैणी गाँव में हुआ | आपका जन्म बढ़ई घराने में हुआ था | जवानी में महाराजा रणजीत सिंह की सेना में नौकरी की | ईश्वर  -- भक्ति अधिक होने से नौकरी -- चाकरी छोड़कर गाँव जा रहे | नाम का प्रचार शुरू  कर दिया |
1857 के गदर में जो जुल्म हुए वे सब देखकर और पंजाब की गद्दारी देखकर कुछ असर जरुर हुआ होगा | किस्सा यह है कि बाबा रामसिंह जी ने उपदेश शुरू करवा दिया | साथ -- साथ बताते गये कि फिरंगियों से पंजाब की मुक्ति जरूरी है | उन्होंने तब उस असहयोग का  प्रचार किया , जैसे वर्षो बाद 1920 में महात्मा गांधी ने किया | उनके कार्यक्रम में अंग्रेजी राज की शिक्षा , नौकरी अदालतों आदि का और विदेशी चीजो का बहिष्कार तो था ही , साथ में रेल और तार का भी बहिष्कार किया गया |
पहले -- पहले सिर्फ नाम का ही उपदेश होता था | हां यह जरुर कहा जाता था कि शराब -- मांस का प्रयोग बिलकुल बंद कर दिया जाए | लडकिया आदि बेचने जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी प्रचार होता था , लेकिन बाद में उनका प्रचार राजनितिक रंग में रंगता गया |
पंजाब सरकार के पुराने कागजो में एक स्वामी रामदास का जिक्र आता है , जिसे कि अंग्रेजी सरकार एक राजनितिक आदमी समझती थी और जिस पर निगाह रखी जाती थी |  1857 के
बाद जल्द ही उसके रूस की ओर जाने का पता चला है | बाद में कोई खबर नही मिलती | उसी आदमी के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उसने एक दिन बाबा रामसिंह से कहा कि अब पंजाब में राजनितिक कार्यक्रम और प्रचार की जरूरत है | इस समय देश को आजाद करवाना बहुत जरूरी है | तब से आपने स्पष्ट रूप से अपने उपदेश में इस असहयोग को शामिल कर लिया
1863 में पंजाब सरकार के मुख्य सचिव रहे टी .डी. फार्सिथ ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि 1863 में ही मैं समझ गया था कि यह धार्मिक -- सा आन्दोलन किसी दिन बड़ा गदर मचा देगा | इसीलिए मैंने भैणी के उस गुरुद्वारे में ज्यादा आदमियों का आना -- जाना और इकठ्ठे होना बन्द कर दिया | इस पर बाबा जी ने भी अपना काम का ढंग बदल लिया | पंजाब प्रांत को 22 जिलो में बाट लिया | प्रत्येक जिले में एक -- एक व्यक्ति प्रमुख नियुक्त किया गया , जिसे '' सूबा  '' कहा जाता था | अब उन्होंने '' सूबों '' में प्रचार और संगठन का काम शुरू किया | गुप्त तरीको से आजादी का भी प्रचार जारी रखा | संगठन बढ़ता गया , प्रत्येक नामधारी सिक्ख अपनी आय का दसवा हिस्सा अपने धर्म के लिए देने लगा | बाहर का हंगामा बंद हो जाने से सरकार का शक दूर हो गया और 1869 में सभी बंदिशे हटा ली गयी | बंदिशे हटते ही खूब जोश बढ़ा |
एक दिन कुछ कूके अमृतसर में से जा रहे थे | पता चला कि कुछ कसाई हिन्दुओं को तंग करने के लिए उनकी आँखों के सामने गोहत्या करते है | गाय के तो वे बड़े भक्त थे | रातो -- रात सभी कसाइयो को मार डाला गया और रास्ता पकड़ा | बहुत से हिन्दू पकडे गये | गुरु जी ने पूरी कहानी सुनी | सबको लौटा दिया कि निर्दोष व्यक्तियों को छुडाये और अपना अपराध स्वीकार करे | यही हुआ और वे लोग फांसी चढ़ गये | ऐसी ही कोई घटना फिरोजपुर जिले में भी हो गयी थी | फांसियो से जोश बढ़ गया | उस समय उन लोगो के सामने आदर्श था पंजाब में सिख -- राज स्थापित करना और गोरक्षा को वे अपना सबसे बढ़ा धर्म मानते थे | \इसी आदर्श की पूर्ति के लिए वे प्रत्यन करते रहे |
13 जनवरी  1872 को भैणी में माघी को मेला लगने वाला था | दूर -- दूर से लोग आ रहे थे | एक कूका मलेर कोटला से गुजर रहा था | एक मुसलमान से झगड़ा हो जाने से वे उसे पकड़कर कोतवाली में ले गये और उसे बहुत मारा पिटा व एक बैल की हत्या उसके सामने की गयी | वह बेचारा दुखी हुआ भैणी पंहुचा | वह जाकर उसने अपनी व्यथा सुनाई | लोगो को बहुत जोश आ गया | बदला लेने का विचार जोर पकड गया | जिस विद्रोह का भीतर -- भीतर प्रचार किया गया था , उसे कर देने का विचार जोर पकड़ने लगा , लेकिन अभी मनचाही तैयारी भी नही हुई थी | बाबा रामसिंह ऐसी स्थिति में क्या करते ? यदि उन्हें मना करते है तो वे मानते नही और यदि  उनका साथ देते है तो सारा किया -- धरा तबाह होता है | क्या करे ? आखिर जब 150 आदमी चल ही पड़े तो आपने पुलिस को खबर भेज दी कि यह व्यक्ति हंगामा कर रहे है और शायद कुछ खराबी करे मैं जिम्मेदार नही हूँ | ख्याल था कि हजारो आदमियों के संगठन में से सौ---- डेढ़ सौ आदमी मारे गये और बाकी संगठन बचा रहे तो यह कभी तो पूरी हो जायेगी और जल्द ही फिर पूरी तैयारी होने से विद्रोह हो सकेगा | लेकिन हम यह देखते है कि परिणाम से तय होता है कि तरीके जायज थे या नाजायज का सिद्धांत राजनीति के मैदान में प्राय: लागू होता है | अर्थात यदि सफलता मिल जाए तब तो चाल नेकनीयती से भरी और सोच -- समझकर चली गयी कहलाती है और यदि असफलता मिले तो बस फिर कुछ भी नही | नेताओं को बेवकूफ , बदनीयत आदि खिताब मिलते है | यही बात यहाँ हम देखते है | जो चाल बाबा रामसिंह ने अपने आन्दोलन से बचने के लिए चली , वह कयोंकि सफल नही हुई , इसीलिए अब कोई उन्हें कायर और बुजदिल कहता है और कोई बदनीयत व कमजोर बताता है | खैर
हम तो समझते है कि वह राजनीति के एक चाल थी | उन्होंने पुलिस को खबर कर दी ताकि वे कोई ऐसा इलाज कर ले जिससे कोई बड़ी खराबी पैदा न हो , लेकिन सरकार उनके इस भारी आन्दोलन से डरती थी और उसे पीस देने का अवसर खोज रही थी | उसने कोई ख़ास कार्यवाही न की और उन्हें मर्जी अनुसार जाने दिया |
लेकिन 11 जनवरी के पात्र में डिप्टी  कमिश्नर लुधियाना मि कावन कमिशनर को लिख भेजी कि रामसिंह ने उन लोगो से अपने सम्बन्ध न होने की बात जाहिर की है और उनके सम्बन्ध में हमे सावधान भी कर दिया है | खैर वे 150 नामधारी सिंह बड़े जोश -- खरोश में चल पड़े |
जब वे 150 व्यक्ति वह से बदला लेने के विचार से चल पड़े तो पुलिस को पहले से बताया जा चुका था , लेकिन सरकार ने कोई इंतजाम नही किया | क्यों ? कयोकी वे चाहते थे कि कोई छोटी -- मोटी गड़बड़ हो जाए , जिससे कि वे उस आन्दोलन को पीस दे | सो वह अब मिल गया | वे कूके वीर उस दिन तो पटियाला राज्य की सीमा पर एक गाँव रब्बो में पड़े रहे | अगले दिन भी वही टिके रहे | 14 जनवरी 1872 की शाम को उन्होंने मलोध के किले पर धावा बोल दिया | यह किला कुछ सिक्ख सरदारों का था , लेकिन इस पर हमला क्यों किया ? इस सम्बन्ध में डिस्ट्रिक गजेटियर में लिखा है कि उन्हें उम्मीद थी कि मलोध सरकार उनके विरोध की नेता बनेगी , लेकिन उन्होंने मना कर दिया और इन्होने हमला कर दिया | बहुत संभव है कि बाबा रामसिंह की बड़ी भारी तयारी में मलोध सरकार ने मदद देने का वादा किया हो , लेकिन जब उन्होंने देखा कि विद्रोह तो पहले से ही हो गया है और बाबा रामसिंह भी साथ नही है और पूरी संगत भी नही बुलाई गयी है तो उन्होंने मना कर दिया होगा | खैर! जो भो वह लड़ाई हुई | कुछ घोड़े हथियार और तोपे ले वे वह से चले गये | दोनों ओर के दो -- दो आदमी मारे गये और कुछ घायल हुए |
अगले दिन सवेरे 7 बजे वे मलेर कोटला  पंहुचे गये |
अंग्रेजी सरकार ने मलेर कोटला सरकार को पहले सूचित कर रखा था | उपर बड़ी तैयारिया की गयी थी | सेना हथियार लिए कड़ी थी लेकिन इन लोगो ने इतने बहादुरी से हमला किया कि सेना और पुलिस में कुछ वश न रहा | हमला कर वे शहर में घुस गये और जाकर महल पर हमला कर दिया | वह भी सेना उन्हें नही रोक पायी | वे जाकर खजाना लूटने की कोशिश करने लगे | लूट ही लिया जाता , लेकिन दुर्भाग्य से वे एक और दरवाजा तोड़ते रहे जिससे कि उनका बहुत -- सा समय नष्ट हो गया और भीतर से कुछ भी न मिला | उधर से सेना ने बड़े जोर से धावा बोल दिया | आखिर लड़ते -- लड़ते वहा  से लौटना पडा | उस लड़ाई में उन्होंने 8 सिपाही मारे और 15 को घायल हो गये | उनके सात आदमी मारे गये | वहा  से भी कुछ हथियार और घोड़े लेकर भाग निकले | आगे -- आगे वे और पीछे -- पीछे मलेर कोटला की सेना |
वे भागते जा रहे थे | और लड़ते जा रहे थे | उनके और कई आदमी घायल हो गये और वे उन्हें भी साथ ही उठा ले जाते थे | आखिर कार पटियाला राज्य के रुड गाँव में ये पहुंचे और जंगल में छिप गये | कुछ घंटो के बाद शिवपुर के नाजिम ने फिर हमला बोल दिया | लड़ाई छिड़ गयी पर बेचारे कूके थके -- हारे थे | आखिर 68 व्यक्ति पकड लिए गये | उनमे  से दो औरते थी , वे पटियाला राज को दे दी गयी |
अगले दिन मलेर कोटला लाकर तोप  गाड दी गयी और एक -- एक कर 50 कूके वीर तोप के आगे बाँध -- बंद कर उड़ा दिए गये | हरेक बहादूरी से अपनी -- अपनी बारी पर  तोप के आगे झुक जाता और सतत श्री अकाल कहता हुआ तोप से  उड जाता | फिर कुछ पता नही चलता कि वह किस संसार में चला गया | इस तरह 49 व्यक्ति उड़ा दिए गये | पचासवा एक तेरह साल का लड़का था | उसके पास झुकर डीपटी   कमिशनर ने कहा कि बेवकूफ रामसिंह का साथ छोड़ दे , तुम्हे माफ़ कर दिया जाएगा | लेकिन वह बालक यह बात सहन  नही कर सका और उछलकर उसने कावन की दाढ़ी पकड ली और तब तक नही छोड़ी जब तक उसके दोनों हाथ न काट दिए गये | बाकी 16 आदमी अगले दिन मलोध जाकर फांसी पर लटका दिए गये | उधर बाबा रामसिंह को उनके चार सूबों के साथ गिरफ्तार करके पहले इलाहाबाद और बाद में रंगून भेज दिया गया | यह गिरफ्तारी ( रेगुलेशन  ) 1818 के अनुसार हुई |
जब यह खबर देश में फैली तो और लोग बहुत हैरान हुए कि यह क्या बना | विद्रोह शुरू करके बाबा जी  ने हमे भी क्यों न बुलाया और सैकड़ो  लोग  घर -- बार छोड़कर भैणी की ओर चल पड़े | एक गिरोह जिसमे १७२ आदमी थी , कर्नल वायली से मिला | वह अधीक्षक था | उसने झट उन्हें भी गिरफ्तार करवा लिया | उनमे से 120 को तो घरो को लौटा दिया , लेकिन 50 ऐसे थे कि कोई घरबार नही था | वे सब सम्पत्ति आदि बेचकर लड़ने -- मरने के लिए तैयार थे | उन्हें जेल में डाल  दिया | इस तरह वह आन्दोलन दबा दिया गया और बाबा रामसिंह का पूरा यत्न निष्फल हो गया | बाद में देश में जितने कूके थे वे सभी एक तरह से नजरबंद कर दिए गये | उनकी हाजरी ली जाती थी | भैणी साहिब में आम लोग का आना -- जाना बंद कर दिया गया | ये बंदिशे 1920 में आकर हटाई गयी | यही पंजाब की आजादी  के लिए दी गयी सबसे  पहली कोशिश  का संक्षित इतिहास है |



प्रस्तुती
-सुनील दत्ता
पत्रकार

शनिवार, 25 अगस्त 2012

आदर्श के लिए जीना


आदर्श मरना नही आदर्श के लिए जीना ...भगत सिंह


आतंकवाद के चुभते सवाल के बारे में हमें बहुत साफ़ विचार रखने चाहिए | बम का यह रास्ता काफी पुराना है | 1905 से चल रहा है | यह क्रांतिकारी भारत पर दुखद: टिप्पणी है की वे अभी तक यह भी नही जान पाए की इसमें लाभ -- हानि क्या है ? आतंकवाद इस चीज का पाश्चाताप है की जनता से अभी तक क्रांतिकारी भावनाए नही पनपी है | इस तरह से इससे हमारी अपनी असफलता की स्वीकारोक्ति होती है | शुरू शुरू में इसका कुछ लाभ जरुर था , क्योंकि इसकी मदद से राजनितिक नैतिकता के साथ जुड़े डर को भगाया गया | नौजवान बुद्धिजीवियों की कल्पनाओं को जगाया गया | उनके स्वंय के बलिदान करने के उत्साह को बढाया गया | दुनिया और दुश्मनों के सामने उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन की शक्ति और सत्य का प्रदर्शन किया , लेकिन अपने आप में यह काफी नही , क्योंकि हर देश में चाहे फ्रांस हो या रूस , बाल्कन देश हो या जर्मनी हो या स्पेन हो या कही और आतंकवाद का इतिहास एक पराजय का इतिहास है | इसके अन्दर ही इसको खाकर नष्ट कर जाने के कीटाणु मौजूद रहते है | साम्राज्यवादी जानते है की तीस करोड़ लोगो पर राज करने के लिए वे हर साल तीस कर्मचारियों की कुर्बानी देते है | राज करने की ख़ुशी तो बम या पिस्तौल से बर्बाद की जा सकती है , पर अपनी लूट के वास्तविक लाभ को तो वे अपने राज के साथ पूरी तरह चिपकाए रखेंगे | जितने हथियार हम चाहते है अगर वे हमें मिल जाए और उनका हम खूब अच्छी तरह इस्तेमाल भी कर ले तो आतंकवाद साम्राज्यवादी शक्ति और पार्टी को समझौते तक ही लेकर जा सकता है | ऐसे समझौते कम हो या ज्यादा , पूर्ण स्वराज के उद्देश्य तक नही पहुच पायेंगे | आतंकवाद उसी चीज की आशा करता है जो की गांधी वाद प्राप्त करना चाहता है -- यानी की समझौता , सुधारों की एक किस्त और दिल्ली से सफेद राज को हटाकर भूरे राज को ले आये , क्योंकि ऐसा राज लोगो के जीवन से टूटा हुआ होगा और एक बार राज प्राप्त करके अत्याचारी राज में बदलने का खतरा बना रहेगा |
आयरलैंड की समानता में हमारे देश का समाज नही चल सकता है , इसकी मैं चेतावनी देना चाहता हूँ | आयरलैंड में इक्का -- दुक्का गतिविधिया नही थी , बल्कि वह एक राष्ट्र व्यापी विद्रोह की न्यायिक बगावत थी | वह बंदूकधारी से पार्टी के जनसाधारण सिपाही की मात्र हमदर्दी से पैदा हुई घटनाए नही थी | अमेरिकी , आयरिश लोगो की मदद से हथियार उनको आसानी से मिल जाते थे | आयरलैंड की भौगोलिक रचना ऐसे युद्ध के लिए मददगार भी थी | परन्तु इन सबके वावजूद आयरलैंड को अधूरी प्राप्ति से ही संतुष्ट हो जाना पडा | उनकी जंजीरे ढीली तो पद गयी थी लेकिन आयरलैंड का मजदूर देशी और विदेशी पूंजीपति से मुक्त न हो पाया | आयरलैंड भारत के लिए एक सबक है -- एक चेतावनी है की राष्ट्रवादी आदर्शवाद , जिसमे क्रांतिकारी राजनैतिक सामाजिक आधार न हो , हालात पक्ष में होते हुए भी साम्राज्यवाद से समझौते के कीचड़ में फंस जाता है | क्या भारत को अब भी आयरलैंड की नकल करनी चाहिए | एक तरह से गांधीवाद भी क्रान्ति विरोधी चुप्पी साधे रहने के सिद्धांत के वावजूद इंकलाबी विचारों के नजदीक पहुंचता है , क्योंकि वह पीछे जन कार्यवाही में विश्वास रखता है | हालाकि वह जनता के लिए नही होती , उन्होंने मजदूर क्रान्ति के लिए रास्ता बनाया है | क्योंकि लोगो को उन्होंने अपने स्वार्थो से जगाने का राजनितिक कार्यक्रम बनाया है | क्रान्तिकारियो को अहिंसा के फरिश्ते का इसके लिए सत्कार करना चाहिए | आतंकवाद के शैतान के साथ कोई सदभावना दिखाने की जरूरत नही है | आतंकवादियों ने बहुत कुछ सिखाया है और शायद अब भी उसका कुछ लाभ हो सकता है बशर्ते की हम अपने तरीको में कोई भ्रान्ति न होने दे | बहुत ही कष्टों के साथ अच्छे प्रचार के लिए आतंकवादी कारवाई की जा सकती है | यह तो सिर्फ पटाखे चलाने का काम ही होगा | किसी क्रांतिकारी को इस दूषित चक्र में जहा लक्ष्यहीन बगावत है , चक्कर काटने की जरूरत नही | साधारण कार्यकर्ता के लिए प्रेरक आदर्श मरना नही होना चाहिए , बल्कि आदर्श के लिए जीना -- वह भी लाभदायक और उपयुक्त ढंग से |''
-सुनील दत्ता
साभार .
'' ड्राफ्ट आफ रिवोल्यूशनरी प्रोग्राम '' का एक अंश ''

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

शोषण रहित प्रजातंत्र:चन्द्रशेखर आजाद


चन्द्रशेखर आजाद
( जन्म दिन 23 जुलाई 1906 )

क्रांतिकारी ही नही बल्कि क्रान्त्कारियो का नायक बनने के लिए ऊँची शिक्षा -- दीक्षा कि जरूरत नही है , बल्कि उसके लिए क्रान्ति के प्रति अगाध विश्वास के साथ अदम्य साहस और अभूतपूर्व त्याग बलिदान कि जरूरत है शिक्षा व ज्ञान में पहुंच रखने वाले क्रान्तिकारियो साथियो से सिद्धांत व ज्ञान को सीखते रहने की जरूरत है | इसका सबसे बड़ा सबूत महान राष्ट्र भक्त क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद है | शिक्षा ज्ञान कि कमी के वावजूद वे
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी व आर्मी के नायक बने रहे | गरीबी में जन्मे और गरीबी में पले-- बढे आजाद ने अपनी निजं कि गरीबी दूर करने की जगह राष्ट्र को परतंत्रता से मुक्ति दिलाने का व्रत लिया | किशोरावस्था से ही इस रास्ते पर आगे बढे | अदम्य साहस और त्याग के साथ आगे बढे | आजाद का जीवन उन सभी के लिए स्मरणीय है जो आज भी राष्ट्र कि उस क्रांतिकारी आजादी का सपना सजोये है , जिसे हिन्दुस्तान सोशलिस्ट पार्टी के सदस्यों ने देखा था |

23 जुलाई के दिन पैदा हुए चन्द्रशेखर आजाद , इसी दिन पैदा ही लोकमान्य तिलक से 50 वर्ष छोटे थे | भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी संघर्ष के सेनानायको में चन्द्रशेखर आजाद का नाम अग्रणी है | वे उत्कट देशभक्त असीम त्याग , अपरिमित शौर्य , अदभुत साहस और अनुभवी सैन्य -- नेतृत्त्व की साकार प्रतिमा थे |
पण्डित चन्द्रशेखर आजाद का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदरका1 गाँव में २३ जुलाई सन् १९०६ को हुआ था।अलीराजपुर जिले मध्य प्रदेश के भावरा नामक ग्राम मे रहने का भी गौरव प्राप्त हुआ | भावरा ग्राम मध्य प्रदेश के आदिवासी मूल झाबुआ जिले में है | सीताराम तिवारी गाँव की सीमा पर एक झोपड़ी में रहते थे | आजीविका के लिए एक बाग़ में रखवाली करते थे| वे अत्यंत निर्धन थे | चन्द्रशेखर उनकी पांचवी संतान थे | तीन संताने अल्पायु रही | इस पांचवी संतान का पालन -- पोषण उनकी माता ने अत्यंत कष्ट से निर्धनता में किया | निर्भीकता चन्द्रशेखर के स्वाभाव में जन्मजात थी |
एक दिन वे घर से अचानक बिना किसी को बताये बनारस जा पहुचे | संस्कृत सीखने की अपनी इच्छा अपने साथियो पर प्राय: व्यक्त किया करते थे | अत: बनारस पहुचकर एक मठ में संस्कृत का अध्ययन करने लगे घर की दयनीय आर्थिक स्थिति और संस्कृत पढने की अभिलाषा ही उन्हें बनारस खीच लायी थी |
देश में सर्वत्र असहयोग आन्दोलन का वातावरण था | विदेशी कपड़ो का बहिष्कार की भारत -- भर में धूम थी | 1921 में च्न्र्शेख्र 14 वर्ष के किशोर थे | इस किशोर अवस्था में वे स्वेदेशी आन्दोलन में आ गये | भावरा की कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करने वाला बना दिया था | इसी वर्ष के अन्त में ब्रिटेन के युवराज दयक आफ विद्स्र भारत यात्रा पर आये | कांग्रेस ने उनके आगमन का विरोध किया सर्वत्र हड़ताल रखी गयी |
सरकार ने अपना दमन चक्र प्राम्भ किया | गांधी को छ: महीने का कारावास मिला |चन्द्रशेखर ने बनारस के सरकारी विद्यालय पर धरना दिया | इसी अपराध में इस किशोर पर मुकदमा चला | सुनवाई के दौरान चन्द्रशेखर ने जो उत्तर दिया वे इतिहास की धरोहर है
| न्यायाधीश ने पूछा तुम्हारा नाम ? आजाद ,पिता का नाम
नाम ? स्वतंत्र ,तुम्हारा निवास ? जेलखाना | चन्द्रशेखर के इन निर्भीक उत्तरों से न्यायाधीश क्रुद्ध हो उठे | उन्होंने इस बालक को 15 कोड़ो की सजा सुनाई गयी | उनके साथियो को जिले के कारागृह में भेजा गया | वह सिपाही नगे
बदन पर कोड़े बरसा रहे थे और वे '' वन्देमातरम '' के नारे लगा रहे थे | अन्त में मूर्क्षित होकर गिर पड़े | काशी के इतिहास में वह एक अविस्मरनीय घटना है | सारी काशी नगरी आततायी सरकार से टक्कर लेने वाले उस किशोर को देखने व उसका प्रेम से अभिवादन करने के लिए उमड़ पड़ी | अनेको भाषण हुए आजाद को मंच पर लाया गया | छोटे से आजाद को मेज पर खड़ा किया गया उनका सारा शरीर फूलो के हारो से ढक गया | उस दिन चन्द्रशेखर तिवारी से चन्द्रशेखर आजाद हो गये | चौरी -- चौरा काण्ड के कारण असहयोग आन्दोलन स्थगित हो गया और महात्मा गांधी के अहिसंक मार्ग से उनकी आस्था डिगने लगी | इसी समय प्रख्यात शचीन्द्रनाथ सान्याल
संयुक्त प्रांत में क्रान्तिकारियो को संगठित कर रहे थे | श्री सान्याल '' हिदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन नामक एक दल तैयार किया | प्रणवेश चटर्जी इस सभा के सदस्य थे | उनका ध्यान चन्द्रशेखर आजाद की ओर गया | चन्द्रशेखर आजाद विद्यापीठ की पढ़ाई छोडकर पुन: संस्कृत पढने लगे थे | संभवत: मठ में स्वतंत्रता संघर्ष के अनुकूल वातावरण रहा होगा |, चटर्जी ने मंथननाथ गुप्त को आजाद इस सभा सदस्य बनाने का काम सौपा गया| आजाद सदस्य बनना स्वीकार करलिए | शीघ्र ही वे अपनी योगता के कारण अन्तरंग समिति के सदस्य भी बना लिए गये |
चंदशेखर आजाद ने इस संस्था में नए कार्यकर्ताओं को जोड़ा | इस संस्था काउद्देश्य न केवल स्वतंत्रता प्राप्त करना था , अपितु शोषण रहित प्रजातंत्रकी स्थापना करना भी था | संगठन का विस्तार हो रहा था पर धन की कमी का संकट बढ़ता जा रहा था | संगठन के सारे खर्च थोड़े -- से चंदे के भरोसे कैसे चलते | इस लिए डकैती आवश्यक लगने लगी | 1925 में दल के नेताओं की बैठक में राम प्रसाद बिस्मिल ने लखनऊ जाने वाले पैसेंजर ट्रेन में रक्खे सरकारी खजाने को लुटने का प्रस्ताव रखा | 9 अगस्त 1925 को योजना को मूर्त रूप देने का निश्चय हुआ | गाडी को लखनऊ से पहले काकोरी स्टेशन के समीप रोककर लुटने की योजना बनी | योजनानुसार राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी व शचीन्द्रनाथ बख्शी ने द्दितीय श्रेणी व चन्द्रशेखर आजाद , केशव चक्रवर्ती , मुरैलाल , मुकुंदीलाल , बनवारी लाल , रामप्रसाद बिस्मिल व मंथन नाथ गुप्त ने तृतीय श्रेणी के टिकट लिए | राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी व शचीन्द्रनाथ बख्शी काकोरी स्टेशन से चदे | गाडी छूटते ही उन्होंने जंजीर खीचकर गाडी रोक दी | क्रान्तिकारियो ने 20 -- 25 मिनट में गाडी में रखा खजाना लूट लिया | रामप्रसाद बिस्मिल , अशफाकउल्ला खा और चन्द्रशेखर आजाद समेत कुल 10 लोगो ने इसमें भागीदारी की |
सरकार ने सुरागो के जरिये क्रान्तिकारियो को पकड़ना शुरू किया | फिर कई लोगो के मुखबिर हो जाने से सरकार का काम आसान हो गया | 25 क्रान्तिकारियो पर मुकदमा चला | इसमें चन्द्रशेखर आजाद का नाम था | पर चन्द्रशेखर आजाद काकोरी केस के अकेले ऐसे क्रांतिकारी थे , जो अन्त तक पकडे नही जा सके फरवरी 1931 में अंतिम सहादत से पहले कभी पुलिस उनकी छाया तक नही छू पाई | उन्होंने कोर्ट ले जाते समय पुलिस की सशस्त्र व सज्जित गाडी पर आक्रमण करने जैसी साहसी योजनाये बनाई | परन्तु दुर्भाग्य से वे सफल नही हो सके |संगठन को काकोरी काण्ड की धर -- पकड से जबर्दस्त झटका लगा | आजाद काफी समय अज्ञात वास में रहे | झांसी और ओरछा रियासत के जंगलो में भटकते रहे | अब वे हरीशंकर ब्रम्हचारी थे | झांसी में उन्होंने क्रान्ति दल की एक शाखा भी स्थापित की| भगत सिंह , सुखदेव , राजगुरु , भगवानदास माहौर , सदाशिव राव मलकापुरकर विश्वनाथ राव , शिव वर्मा , जयदेव कपूर , प्रो. नंदकिशोर निगम , विजय कुमार सिन्हा , यशपाल , कुंदन लाल , काशीराम , राजेन्द्रपाल , सुरेन्द्र पाण्डेय , भगवती चरण बोहरा , दुर्गा भाभी , शुशीला दीदी , डाक्टर गया प्रसाद हंसराज वायरलेस सुखदवराज प्रकाशवती महावीर सिंह , बटुकेश्वरदत्त विमल प्रसाद जैन आदि अनेक इस नव गठित क्रांतिकारी दल के सदस्य थे |अब इस दल का नाम हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशंन एंड आर्मी रखा गया | दल की 7 सदस्यी केन्द्रीय समिति के प्रमुख चन्द्रशेखर आजाद थे | वही इस आर्मी ( सेना ) के सेनापति थे | उन्होंने अनेक स्थानों पर अपनी सेना के केंद्र स्थापित किए | साइमन कमिशन के विरोध में पूरे प्रदर्शन के अवसर पर लाला लाजपत राय की पुलिस की मार के कारण मृत्यु हो गयी | जिसके प्रतिशोध के लिए सांडर्स की हत्या की योजना रची गयी | इस योजना का नेतृत्त्व चन्द्रशेखर के हाथो में था | सांडर्स हेड कांस्टेबल चानन सिंह के साथ मोटरसाइकिल पर पुलिस थाने से निकला | निकलते ही दो क्रान्त्रिकारियो ने गोली चलाकर उसे नीचे गिरा दिया | चानन सिंह ने भागते हुए सायकिल सवारों का पीछा किया | वे दयानंद आर्ट्स कालेज हास्टल के दरवाजे से अंदर घुसे | उन्होंने चानन सिंह से पीछा न करने की प्रार्थना की | उसके न मानने पर चन्द्रशेखर ने उसे गोली से उड़ा दिया | जिस समय भगत सिंह और राजगुरु पुलिस थाने पर हमला कर रहे थे | चन्द्रशेखर भी थोड़ी दूरी पर खड़े थे | पुलिस ने छात्रावास को चारो तरफ से घेर लिया | सम्पूर्ण लाहौर में गुप्तचर फैला दिया | रेलवे स्टेशन पर पुलिस का गुप्तचरों का जाल बिछा हुआ था इतने सख्त बन्दोबस्त के वावजूद दूसरे दिन लाहौर शहर में स्थान -- स्थान पर दीवारों पर पर्चे चिपके हुए थे | जिन पर लाल स्याही से लिखा हुआ था की ''सांडर्स मारा गया '' '' लाला जी का बदला ले लिया गया '' क्रान्ति चिरायु हो | सांडर्स -- वध के लिए अंग्रेजी शासन किसी को भी नही पकड सका | भगत सिंह और राजगुरु दुर्गा भाभी के साथ लाहौर से निकलकर कलकत्ता पहुच गये | आजाद भी लाहौर से बाहर आ गये ||
9 अप्रैल 1929 को केन्द्रीय विधान सभा में बम -- विस्फोट की ऐतिहासिक घटना घटित हुई | यह साहसी कार्य सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने किया था | बम -- विस्फोट के विषय में दल में पूर्ण विचार - विमर्श हुआ था | दल का प्रत्येक व्यक्ति जानता था की दोनों पकडे जायेंगे और उन्हें फांसी होगी |
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने स्वंय गिरफ्तारी दी | क्योंकि वे न्यायालय को क्रान्ति के प्रचार माध्यम बनाना चाहते थे | इस संदर्भ में सरकार चन्द्रशेखर आजाद को पकड़ने का पूर्ण प्रयत्न किया परन्तु आजाद व यशपाल तथा अन्य 7 साथी फरार ही रहे |क्रान्तिकारियो द्वारा 23 दिसम्बर 1929 को गवर्नर इरविन की विशेष गाडी के नीचे बम विस्फोट किया गया | गांधी ने '' कल्ट आफ द बम '' नामक लेख लिखकर इसका विरोध किया | जिसके उत्तर में 26 जनवरी 1930 को '' फिलासफी आफ द बम '' पर्चा बाटा गया इसके लेखक यशपाल व भगवती चरण बोहरा थे | परन्तु सारी व्यवस्था चन्द्रशेखर आजाद की थी | जीवन के आखरी दिनों में उनका मन कुछ बेचैन -- सा रहने लगा था | उनके मित्र गिरफ्तार हो गये थे और जो शेष थे , वे विशवास पात्र नही रहे | उनके ऐसे ही मित्रो में एक थे वीरभद्र तिवारी जिनके विश्वासघात से 27 फरवरी 1931 का दिन भारत के क्रांतिकारी आन्दोलन के लिए काला दिन बनकर आया | उसी दिन इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश साम्राज्यशाही से सशत्र टक्कर लेते हुए अजेय सेनानी आजाद ने अपनी प्राण आहुति दी |27 फरवरी को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में आजाद की मौजूदगी की सूचना क्रांतिकारी से पुलिस मुखबिर बने वीरभद्र ने पुलिस को दी पुलिस अधीक्षक नाट बाबर ने पुलिस दल के साथ पार्क के चारो ओर से घेरा डाल दिया दोनों तरफ से जबर्दस्त गोली चली आजाद का निशाना अचूक था | इन्ही की गोली से डी. एस . पी . विशेश्वर सिंह का जबड़ा भी टूट गया | आजाद पर चारो ओर से गोली की बौछार होने लगी | तब भी लगभग 20 मिनट तक वे साहस से लड़ते रहे |
इतने सिपाही और इतना असलहा होने के वावजूद वे उन्हें पकड नही सके | अनेक गोलिया उनके शरीर में घुस चूकि थी और वे जमीन पर गिर पड़े | तब उन्होंने स्वंय एक गोली अपने सीने में दाग ल़ी | '' आजाद हमेशा कहा करते थे '' मैं जीते -- जी अंग्रेजी हुकूमत के हाथ नही लगूंगा | और उन्होंने अपनी यह प्रतिज्ञा पूर्ण की | शहादत के बाद शोक सभा में पुरुषोत्तम दास , कमला नेहरु मंगलदेव सिंह , शिव बिनायक मिश्र , श्रीमती प्रतिभा शचीन्द्रनाथ सान्याल आदि के भाषण हुए | अमर क्रान्ति कारी शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी श्रीमती प्रतिभा ने भाषण में कहा '' खुदीराम बोस की भस्म लोगो ने तावीज में रखकर अपने बच्चो को पहना दी थी | उसी भावना से मैं आजाद की भस्म लेने आई हूँ
जनता का आदर और उत्साह देखकर सरकार ने शहीद स्थल के उस वृक्ष को काट डाला स्वतंत्रता के पश्चात बाबा राघवदास ने उसी जगह पुन: पेड़ लगा दिया | डा. भगवानदास माहौर लिखते है -- हमारे दल में कुछ लोग प्रेमगीत लिखा और गाया करते थे | उस पर चिडकर आजाद ने कहा , इस जीवन में कहा है प्रेम -- वेम ? मेरी कविता सुनो ------
दुश्मन की गोलियों का
हम सामना करंगे |
आजाद ही रहे है ,
आजाद ही रहेंगे |
और सचमुच वे जीवन भर आजाद ही रहे आजाद रहकर उन्होंने देश की आजादी का मार्ग प्रशस्त किया .

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672
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