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बुधवार, 11 अप्रैल 2018

सामाजिक क्रांति के जनक व्लादिमीर लेनिन


    20वीं सदी के अग्रणी रूसी राजनेता विश्व इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली व्यक्ति थे। बोल्शेविक राजनैतिक दल के संस्थापक के रूप में वे एक सफल रूसी कम्युनिस्ट क्रांतिकारी, राजनीतिज्ञ और राजनैतिक सिद्धांतकार थे। व्लादिमीर लेनिन 1917 से 1924 तक सोवियत रूस की सरकार के प्रमुख थे। उनके प्रशासन के अंतर्गत, रूस और उसके बाद व्यापक सोवियत संघ रूसी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा नियंत्रित एक-पक्ष कम्युनिस्ट राज्य बन गया। 1893 से लेनिन ने रूस के साम्यवादी विचारधारा का प्रचार करना प्रारंभ किया था। लेनिन को कई बार जेल भेजा गया था तथा निर्वासित भी किया गया। ‘प्रलिटरि’ एवं ‘इस्क्रा’ के संपादन के अतिरिक्त 1898 में उन्होंने बोल्शेविक पार्टी की स्थापना की। 1905 की क्रांति के उसके प्रयास असफल रहे किन्तु 1917 में उन्होंने रूस के पुननिर्माण की योजना बनाई और सफल हुए। उन्होंने केरेन्सकी की सरकार पलट दी और 7 नवम्बर, 1917 को लेनिन की अध्यक्षता में सोवियत सरकार की स्थापना हुई। रूस का भाग्यविधाता बनने के बाद लेनिन ने अपने देश को विकसित करने का प्रयत्न किया था। कड़े अनुशासन के साथ देश पर नियंत्रण रखा।
लेनिन रूस के इतिहास में ही नहीं विश्व इतिहास के कर्णधारों में एक अग्रणी नाम है। उन्होंने रूस की काया पलट कर के सारे विश्व को ही आश्चर्य चकित कर दिया। उन्हीं के प्रयत्नों से रूस में समाजवाद की स्थापना हुई थी। मार्क्स के स्वप्न को साकार करने का श्रेय भी लेनिन को ही जाता है। 21 जनवरी, 1924 को इस क्रांतिकारी व्यवस्थापक का स्वर्गवास हो गया लेकिन सोवियत की जनता उनको आज भी अपने साथ मानती है, उनको सँजोकर रखा है उनको अंतिम संस्कार के बजाए पिरामिड की तरह सुरक्षित रखा है। आज भी लेनिन पूरे विश्व में सभी के दिलो में बसे हुए है, उनके सिद्धांतों व आदर्शां को मानते हैं और उनके रास्ते पर चल रहे हैं। लेनिन के सिद्धांतों व आदर्शों के प्रशंसकों की सम्पूर्ण विश्व में कमी नहीं है, अभी भी व्लादिमीर लेनिन सामाजिक क्रांति के प्रेरक है।
    मॉस्को के रेड स्क्वायर में रखा व्लादिमीर लेनिन का पार्थिव शरीर आज भी विश्वभर के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है।
     व्लादिमीर इल्यीच उल्यानोव (लेनिन) का जन्म 10 अप्रैल, 1870 में उल्यानोव्स्क नगर में हुआ था, यह नगर बोल्वा नदी के तट पर स्थित है। लेनिन 6 भाई बहन थे, इनके पिता का नाम इल्या निकोलायेविन और माता मरीया अलेक्सान्द्रोवना था। लेनिन बचपन से ही बहुत ही होनहार, मजाकिया, खुशमिजाज और साहसी थे। उन्हें तैराकी, स्केटिंग और जोशीले गेम बहुत प्रिय थे इसके अलावा दोस्तों के साथ दूर-दूर तक घूमना फिरना बहुत अच्छा लगता था। पढ़ाई के साथ ही रूस के प्रमुख स्थानों का भ्रमण कर चुके थे। लेनिन ने पाँच वर्ष की उम्र में पढ़ना-लिखना सीख लिया था, नौ साल की उम्र में हाई स्कूल में एडमीशन ले लिया था और 21 साल की अवस्था में कानून की डिग्री प्राप्त कर ली थी। वह बड़ी मेहनत और लगन से पढ़ाई करते थे इस कारण उन्हें हर साल योग्य छात्र होने का अवार्ड भी मिलता था वे अपने सहपाठियो की पढ़ाई लिखाई में हमेशा हेल्प करते थे। उन्हें बचपन से बहुत ज्ञान पिपासा थी, रूस के सभी महान लेखकों की किताबें और रचनाओं को लगातार अध्ययन करते रहते थे। प्रगतिशील रूसी साहित्य के अध्ययन और आस-पास के वातावरण का युवा लेनिन के चरित्र और विचारों के निर्माण पर बहुत प्रभाव पड़ा लेनिन का मन वकालत में नहीं लगता था, बहुत कम समय समारा की जिला कचहरी में देते थे, वे मुख्यतयः गरीब किसानो की ओर से ही अदालत में पेश होते थे उनका सारा समय और बल तो मार्क्सवाद के अध्ययन में लगा रहता और सर्वहारा मेहनतकश वर्ग की भलाई में रहता। लेनिन ने 1892 में मार्क्स और एंगेल की कृतियों के अध्ययन और प्रचार के लिए समारा में प्रथम मार्क्सवादी मंडल संगठित किया और क्रातिकारी विचार रखने वाले युवाओं को मंडल का सदस्य बनाया। 23 साल की उम्र में लेनिन में सरलता, सहृदयता, खुशमिजाजी और विनोद प्रियता तथा स्थिरता, अच्छा ज्ञान, कठोर तार्किक कर्मठता और स्पष्ट विचार अभिव्यक्ति की क्षमता का अद्भुत मिलाप था, लोग उनके भाषण सुनकर फॉलो करने लगते और उनके साथ जुड़कर क्रांति के लिए समर्पित हो जाते।

-डॉ. बाल गोविन्द वर्मा
मोबाइल : 7860778767
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित

बुधवार, 14 मार्च 2018

जिंदा शहीद पृथ्वी सिंह आज़ाद

जिंदा शहीद कहे जाने वाले व ग़दर पार्टी के संस्थापक सदस्यों में बाबा पृथ्वी सिंह आजाद साम्यवादी विचारधारा से ओत-प्रोत देश के प्रमुख क्रांतिकारियों में से एक रहे हैं. अंदमान की सेलुलर जेल से रिहा होने के बाद भी क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल रहे. वहीँ, अंडमान जेल से माफ़ी मांग कर सावरकर अंग्रेजी साम्राज्यवाद के लिए काम करने लगे थे. 
        शहीद भगत सिंह ने चंद्रशेखर आजाद से कहा था कि पृथ्वी सिंह आजाद से कहो कि वह आगे के प्रशिक्षण के लिए सोवियत यूनियन जाकर महान क्रांतिकारी लेनिन से मिलें और देश को आजाद कराने की लड़ाई को तेज़ किया जाए. बाबा पृथ्वी सिंह आजाद अफ़ग़ानिस्तान के रास्ते से पैदल सोवियत यूनियन गए और वहां प्रशिक्षण और वहां की समाजवादी व्यवस्था का अध्ययन करके स्वदेश वापस लौटे. अल्फ्रेड पार्क में जब चंद्रशेखर आजाद की मुठभेड़ ब्रिटिश सरकार से हो रही थी तब भी बाबा पृथ्वी सिंह आजाद उनके साथ थे और चंद्रशेखर आजाद के कहने पर वहां से चले गये थे. 
बाबा पृथ्वी सिंह आजाद को लाहौर षड्यंत्र केस में फांसी की सज़ा सुने गयी थी जिसे बाद में उम्र कैद में बदल दिया गया था. उन्हें आज़ादी की लड़ाई में कई बार जेल जाना पड़ा और वह जिंदा शहीद कहलाये. आज़ादी के बाद भारत सरकार ने पद्म भूषण से पुरस्कृत किया उनकी  'लेनिन के देश में' नामक पुस्तक बहु चर्चित पुस्तकों में से एक है. पृथ्वी सिंह आजाद आजादी के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय अजय भवन में जीवन पर्यंत रहे. 

रणधीर सिंह सुमन
लो क सं घ र्ष !

शनिवार, 10 मार्च 2018

संघी तालिबानियों ने लेनिन की मूर्ति को गिरा दिया


5 मार्च को त्रिपुरा में वाम दलों के गठबंधन के चुनाव में पराजित होने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने  मजदूरों और किसानों का राज्य स्थापित करने वाले तथा भारत के स्वतंत्रता संग्राम को समर्थन करने वाले दुनिया के महान क्रांतिकारी लेनिन की मूर्ति को भाजपा नेतओं ने बुलडोज़र लगा कर गिरा दिया. यह काम उसी तरह किया गया जिस तरह अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान ने अपने 25 कैदियों के माध्यम से 2 मार्च 2001 को पहले उन्होंने बुद्ध प्रतिमा पर टैंक और भारी गोलियों से हमला किया और जब वह नाकाम रहे तो उन्होंने उसे नष्ट करने के लिए उसमें विस्फोटक लगा कर गिरा दिया था. बामियान की बलुआ पत्थर की मशहूर प्राचीन बुद्ध प्रतिमा कभी विश्व भर में बुद्ध की सबसे ऊंची 56 मीटर ऊंची मूर्ति हुआ करती थी.
                तालिबान ने विश्व धरोहर बुद्ध प्रतिमा को विष्फोटक लगा कर उड़ा दिया था और संघी तालिबानियों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन को समर्थन देने वाले लेनिन की प्रतिमा को गिरा. अफगानिस्तान में लोकतंत्र नहीं था जबकि उसके विपरीत देश में लोकतांत्रिक सरकार के रहते हुए लेनिन की मूर्ति को गिरा दिया गया. इन दोनों घटनाओं में मुख्य समानता यह है कि अफगानिस्तान के तालिबानी अमेरिका द्वारा समर्थित थे और देश की सरकार भी अमेरिकी ट्रम्प से समर्थित है. 
                 बुद्ध प्रतिमा गिराए जाने के बाद मुल्ला मुहम्मद ओमार ने कहा था कि “मुसलमानों को इन प्रतिमाओं के नष्ट होने पर गर्व करना चाहिए। उसी तर्ज पर महाराष्ट्र में बीजेपी के वरिष्ठ नेता राज पुरोहित ने  कहा है कि वह लेनिन की मूर्ति गिराए जाने से बेहद खुश हैं। उन्होंने मूर्ति को पुतला बताते हुए कहा कि लेनिन का पुतला अपमान का प्रतीक है और उनके जितने भी पुतले हों, सभी गिरा देने चाहिए। बीजेपी नेता सुब्रमण्यन स्वामी ने मामले में प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, 'लेनिन तो विदेशी है, एक प्रकार से आतंकवादी है, ऐसे व्यक्ति की मूर्ति हमारे देश में क्यों?   बीजेपी नेता राम माधव और त्रिपुरा के राज्यपाल तथागत रॉय ने भी इसे जायज ठहरा दिया।  
महान क्रांतिकारी भगत सिंह के आदर्श लेनिन थे और जेल की अदालत में लेनिन दिवस के अवसर पर भगत सिंह समेत उनके साथी क्रांतिकारियों ने उन सभी को हार्दिक अभिनन्दन भेजते हैं जो महान लेनिन के आदर्शों को आगे बढ़ाने के लिए कुछ भी कर रहे हैं। हम रूस द्वारा किये जा रहे महान प्रयोग की सफलता की कमाना करते हैं। सर्वहारा विजयी होगा। पूँजीवाद पराजित होगा। साम्राज्यवाद की मौत हो।
             आजादी की लड़ाई में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ रहने वाले लोगों की विचारधारा को मानने वाले लोगों ने देश के अन्दर हर उस व्यक्ति की चरित्र हत्या का कार्य शुरू कर दिया है जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ था. गाँधी से लेकर नेहरु, टैगोर की चरित्र हत्या का कार्य संघी तालिबानी कर रहे हैं.

सुमन 

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

लेनिन की स्मृतियां संजोए एक अनूठा संग्रहालय

देश में जिस प्रकार  गांधीजी का अथवा नेहरूजी का नाम आदरभाव तथा आत्मीयता से लिया जाता है, उसी प्रकार श्रद्धा-भक्ति एवं गौरव से रूस के निवासी लेनिन का नाम लेते हैं। सारे देश में स्थान-स्थान पर लेनिन की मूर्तियां और चित्र लगे हैं। रूस में बच्चे-बच्चे की याद में आज भी लेनिन बसते हैं।
लेनिन के स्मारक मन पर गहरी छाप छोड़ते हैं। केंद्रीय लेनिन संग्रहालय एक विशाल भवन में है। इस भवन का निर्माण सन् 1892 में प्राचीन रूसी शैली में हुआ था। इस विशाल भवन में 19 बड़े-बड़े हाल है जिनमें वस्तुओं को देखते-देखते रूस के इतिहास के अनेक पृष्ठ आंखों के सामने खुल जाते हैं। लेनिन की जीवनी के साथ-साथ रूस के राजनीतिक, आर्थिक विकास की कहानी वहां की चीजें अपने आप कह देती हंै।
लेनिन ऐसी शासन व्यवस्था चाहते थे, जिसमें कोई भी किसी का शोषण करने की स्थिति में न रहे। गांधीजी भी भारत में ऐसे ही समाज की स्थापना करने के अभिलाषी थे, लेकिन दोनों के अन्तिम लक्ष्य एक होते हुए भी दोनों के साधनों में बड़ा अन्तर था। गांधीजी ने कभी हिंसा का समर्थन अथवा आह्वान नहीं किया लेकिन लेनिन ने अक्तूबर क्रांति के समय हिंसा की छूट दे दी थी। लेनिन की छोटी से लेकर बड़ी चीजें इस संग्रहालय में सुरक्षित हंै। लेनिन का जीवन बड़ा सादा था और वो अपने देश के करोड़ों किसान-मजदूरों की भांति रहते थे। तिथि क्रम से लेनिन की सारी जीवनी बचपन से लेकर अन्तिम समय तक की चित्रों में प्रस्तुत की गई है। लेनिन का जन्म कब और कहां हुआ, प्रारम्भिक तथा आगे की शिक्षा उन्होंने किस प्रकार पाई, वे क्रांतिकारी कैसे बने, जेल में उनका समय किस तरह बीता, किस तरह उन्होंने रूसी सोशलिस्ट-डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी को संगठित करने का प्रयत्न किया—ये सब चित्र एकदम आंखों के सामने घूम जाते हैं।
एक शीशे की अलमारी में लेनिन का ओवरकोट रखा है, देखने में मामूली-सा है, पर ध्यान से देखने पर पता चलता है कि उसका कितना ऐतिहासिक महत्व है। सन् 1918 में लेनिन के जीवन का अन्त करने के लिए जो गोली चलाई गई थी, वह उनके इसी ओवरकोट को पार करके शरीर में प्रविष्ट हुई थी।
गोर्की, जो मास्को से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर है, अपने अन्तिम 6 वर्षों में लेनिन यहीं पर रहे थे। सन् 1918 से 1924 में लेनिन यहीं पर रहे लेकिन विशेष अवसरों पर मास्को आते-जाते रहते थे। 11वीं कांग्रेस अन्तिम कांग्रेस थी, जिसमें लेनिन ने आखिरी बार भाग लिया। उसके बाद वे बहुत अस्वस्थ हो गये। सन् 1922 के दिनों में कुटुम्बी-जनों तथा राष्ट्र के विशिष्ट व्यक्तियों के साथ लिए गये कुछ चित्र बड़े भावपूर्ण हंै। सन् 1919 में उन्होंने लालसेना के समक्ष जो भाषण दिया उसका रिकार्ड भी सुरक्षित है।
एक पत्र वहां आज भी देखने को मिलता है जिसमें एक मजदूर ने लिखा था, ‘मैं आपको कुछ कपड़ा भेंट करना चाहता हूं। उसमें से आप अपने पहनने के लिए कपड़े बनवा लें।’ उसका आभार मानते हुए बड़ी विनम्रतापूर्वक लेनिन ने वह कपड़ा लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने लिखा कि अपनी निजी आवश्यकता की पूर्ति के लिए वह कोई भेंट स्वीकार नहीं करते।
20 नवम्बर, 1922 को लेनिन ने अन्तिम भाषण दिया। इस भाषण के साथ-साथ उनका कोट, कमीज, जूते, बन्दूक आदि सब ज्यों की त्यों रखे हैं।
एक कमरे में लेनिन की छोटी-सी लाइबे्ररी है, जिसमें अन्य पुस्तकों के बीच कुछ पुस्तकें तुर्गनेव तथा शेक्सपियर की हैै। आखिरी दिनों में वे गोर्की की ‘मेरे विश्वविद्यालय’ पुस्तक पढ़ रहे थे, वह उनकी बड़ी प्रिय कृति थी।  21 जनवरी, 1924 को सायंकाल लगभग 7 बजे लेनिन का देहांत हुआ। चारों तरफ प्रिय नेता के लिए शोक प्रदर्शित किया गया। लेनिन के शव पर मजदूरों ने जो मालाएं अर्पित की थीं, वे भी सुरक्षित रखी हैं।
लेनिन को गए आज इतने वर्ष हो चुके हैं, लेकिन उनके निवास तथा उनकी वस्तुओं को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो वे कहीं किसी सभा में गये हंै, और शीघ्र आ जाएंगे।
- वीणा भाटिया
साभार





रविवार, 22 अप्रैल 2012

मजदूर आंदोलनों की दिशा -दशा-लेनिन के जन्मदिन पर




19 वी शताब्दी के उत्तर्राद्ध में आठ घन्टे की कार्य दिवस की प्रमुख माँग को लेकर यूरोप में ,फिर अमेरिका में आंदोलनों का दौर बढ़ता रहा |अन्तराष्ट्रीय स्तर पर इस माँग को 1866 में इंटरनेशनल लेबर संगठन के जेनेवा कांग्रेस में उठाया गया |इस इंटरनेशनल लेबर संगठन को गठित करने का प्रमुख दायित्व मार्क्स अगेल्स ने निभाया था |जिनेवा कांग्रेस में यह प्रस्ताव सर्व समिति में दर्ज है "काम के दिन की वैध सीमा तय करना ,मजदूर वर्ग की स्थिति में सुधार की पहली शर्त है "|
1880 के दशक में अमेरिकी मजदूर यूनियन अपने आंदोलनों में आठ घन्टे के कार्य दिवस को अपना प्रमुख माँग ,मुद्दा बनाकर आगे बढ़ी |1885 के बाद पूरे अमेरिका में मजदूर आदोलानो हडतालो का तांता लग गया |शिकागो इन हडतालो का केंद्र था पहली मई 1886 को ,शिकागो में कई मजदूर यूनियनों के संयुक्त मोर्चे में मजदूर यूनियनों का एक विशाल समूह आठ घन्टे के कार्य दिवस तथा अन्य मांगो को लेकर आंदोलित हो उठा |मजदूर आन्दोलन के आव्हान पर शहर की सारी फैक्टरिया ठप्प हो गयी |उन फैक्टरियों के मालिको और शिकागो के प्रशासन ने मजदूरों की सभा पर पुलिस बल का हमला करवा दिया |मजदूरो की मार -पिटाई के साथ अग्रणी मजदूर लीडरो और तमाम मजदूरों को गिरफ्तार कर लिया गया |पुलिस की इस कार्यवाही के विरोध में 3 मई को हे मार्केट स्क्वायर पर इकठ्ठा मजदूरों के बड़े समूह ने पुन: हमला कर दिया |भयंकर रक्तपात हुआ |कई मजदूर मारे गये |चार मजदूर लीडरो पार्सन्स ,स्पेस ,फिशर ,और एंजेल को गिरफ्तार करने के बाद फांसी दी गयी |शिकागो के अन्य मजदूर नेताओं की भी गिरफ्तारिया की गयी फिर उन्हें सजा भी दी गयी |
अमेरिका व यूरोप के मजदूर आठ घन्टे के काम की माँग को लेकर शिकागो के पहली मई के आन्दोलन व संघर्ष को अन्तराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मान्यता प्रदान कर दी |सारी मजदूर यूनियनों ने इसे अपना समर्थन दिया |1890 का -मई -दिवस अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशो में मनाया गया |कार्ल मार्क्स की 1883 में मृत्यु के बाद उनके अनन्यतम मित्र ,मजदूर वर्ग के महान शिक्षक एवं अग्रदूत फेडरिक एंगेल्स ने 01 मई 1890 को कम्युनिस्ट घोषणा पत्र के चौथे जर्मन संस्करण की भूमिका में लिखा है कि ....."यह पहला मौक़ा है जब सर्वहारा वर्ग ,एक झण्डे के तले ,एक तात्कालिक लक्ष्य के वास्ते ,एक सेना के रूप में गोलबंद हुआ है |मुख्यत: आठ घन्टे के कार्यदिवस को कानून द्वारा स्थापित कराने के लिए |काश !मार्क्स भी इस शानदार दृश्य को देखने के लिए मेरे साथ होते |"
पहली मई 1886 का संघर्ष यूरोप और फिर अमेरिका में चलते रहे संघर्षो की एक कड़ी थी |पहली मई उन संघर्षो का एक पडाव है |उस पड़ाव से मजदूर आन्दोलन की दशा व दिशा का मूल्याकन करना और आन्दोलन का कार्यभार था और है |जहा तक मजदूर आन्दोलन की भावी दिशा का उसके तात्कालिक और दूरगामी उद्देश्य का सवाल है तो , मजदूर वर्ग के महान दार्शनिक ,महान शिक्षक और महान क्रांतिकारी अग्रदूत मार्क्स ,एंगेल्स ने 1848 में कम्युनिस्ट घोषणा पत्र में इसे स्पष्ट कर दिया था " मजदूर वर्ग और उसकी पूर्ण मुक्ति से भिन्न कम्यूनिस्टो का अलग से कोई दुसरा लक्ष्य नही होता |इसीलिए कम्युनिस्ट घोषणा -पत्र दर असल मजदूर वर्ग का घोषणा -पत्र है |उसकी मुक्ति का पथ -प्रदर्शक है |
इसी घोषणा पत्र में मजदूर वर्ग के महान अग्रदूतो ने आज से लगभग 160 साल पहले यह घोषणा कर दी थी की अब मजदूर वर्ग ही समाज का क्रांतकारी वर्ग है |...........कि मजदूर की मुक्ति का कार्यभार मजदूर वर्ग का ही कार्यभार है |
॥कि उसे अपनी मुक्ति के लिए मानव समाज के अभी तक के विकास से ,उसमे चले क्रांतिकारी वर्ग संघर्षो से सीख लेने की जरूरत है |.....कि आधुनिक युग में उत्पादन के साधनों का धनाढ्य मालिक ,पूंजीपति वर्ग ,सामन्ती वर्ग से संघर्ष करके उससे धन ,सत्ता का मालिकाना छीनकर हर राष्ट्र का और समूचे विश्व का सर्वाधिक धनाढ्य व सर्वाधिक प्रभुत्व वर्ग बन गया है |....कि आधुनिक राष्ट्रों की राज व्यवस्था वहा के धनाढ्य पूंजीपति वर्ग की प्रबंधकारी कमेटी ही है |साथ ही वह मजदूर वर्ग के दमन उत्पीडन का यंत्र भी है |अपनी पूंजी व राज्य की ताकत से पूंजीपति वर्ग अपने शोषण लूट को अपने लाभ व मालिकाने को निरंतर बढाता जा रहा है
समाज के टूटपुजिया हिस्सों की भी संपत्तिया छीनते हुए उसे मजदूर वर्ग की पंक्ति में धकेलता जा रहा है |.........आधुनिक पूंजीवादी समाज लगातार दो विशाल शत्रु शिविरों में बटता जा रहा है |एक तरफ देश दुनिया के धनाढ्य पूंजीपति वर्ग और उनके उच्च हिमायती वर्ग और उनके उच्च हिमायती समर्थक सेवक वर्ग है |दूसरी तरफ मजदूर वर्ग और लगातार टूटता हुआ और टूटकर सर्वहारा बनता हुआ टूटपुजिया वर्ग है |
की धनाढ्य पूंजीपति वर्ग मेहनतकश वर्ग हितो में न हल किया जा सकने वाला विरोध मौजूद है और वह निरंतर बढ़ता जा रहा है |.पूंजीपति वर्ग अपने दासो को यानी सम्पत्ति हीन होते जा रहे लोगो मजदूरों को खिलाने -जिलाने में अधिकाधिक अक्षम साबित होता जा रहा है |इसीलिए अब उसे समाज का शासन वर्ग बने रहने ,समाज के संसाधनों का मालिक बने रहने का कोई अधिकार नही रह गया है |अब मजदूर वर्ग के सामने अपनी मांगो ,संघर्षो को आगे बढाते हुए सब से पहला लक्ष्य राष्ट्र का शासक बर्ग बनना है |मजदूर तानाशाही राज्य निर्माण करना है |
फिर उनका अगला महत्वपूर्ण कार्य मजदूर तानाशाही सत्ता के जरिये धनाढ्य वर्गो के मालिकाने व प्रभाव को लगातार घटाते हुए अंतत: निजी मालिकाने को समाप्त कर देना है |
"मजदूर वर्ग की मुक्ति का कोई दुसरा रास्ता नही है |वर्ग संघर्ष के इस रास्ते के अलावा बाकी सारे रास्ते व उपाय धनाढ्य वर्गो का सहयोग करने के रास्ते व उपाय है |उसकी मुक्ति के नही बल्कि उस पर सम्पत्तिवान वर्गो की गुलामी को लादने ,बढाने के उपाय है |
इसलिए उसे पूंजीवादी या उनके हिमायतियो के झांसे में आने की जरूरत नही है |बल्कि उसे मजदूर वर्ग की अपनी पार्टी बनाकर इस लक्ष्य पर आगे बढने की आवश्यकता है |
मजदूर पार्टी के जरिये पूंजीवांन वर्गो तथा अन्य नये पुराने सम्पत्तिवान वर्गो के विरुद्ध संघर्ष को निरंतर बढाने की आवश्यकता है |उन्हें सत्ताच्युत करने और स्वंय सत्तासीन वर्ग बनने ,समाज के साधनों पर अपना सामाजिक ,सामूहिक मालिकाना स्थापित करने की आवश्यकता है |व्यापक समाज की आवश्यकता पूर्ति के साथ -साथ पूरे समाज को श्रमशील कमकर समाज बनाए जाने की आवश्यकता है |
ये सारे लक्ष्य मजदूर वर्ग के संगठित संघर्षो से लगातार चलाए जाने वाले वर्ग संघर्ष से ही हासिल किये जा सकते है |परन्तु इन संघर्षो में देश -दुनिया के धनाढ्य वर्गो द्वारा मजदूर आंदोलनों ,संगठनों को तोड़ने का खतरा हर वक्त मौजूद है |देश -दुनिया का वर्तमान दौर भी उसी भारी टूटन का दौर है ,लेकिन मजदूर वर्ग के पास अपनी मुक्ति का रास्ता जानने और पुन:ताकत बटोर कर संघर्ष के रास्ते पर आगे बढने के सिवा कोई दुसरा रास्ता नही बचा है |
फिर लोहे के गीत हमे गाने होंगे
दुर्गम यात्राओं पर चलने के संकल्प जगाने होंगे |
फिर से पूँजी के दुर्गो पर हमले करने होंगे |
नया विश्व निर्मित करने के सपने रचने होंगे |
श्रम की गरिमा फिर से भाल करनी होगी |
फिर लोहे के गीत हमे गाने होंगे |
सत्ता के महलो से कविता बाहर लानी होगी |
मानवात्मा के शिल्पी बनकर आवाज उठानी होगी |
मरघटी शान्ति की रुदन भरी प्रार्थना रोकनी होगी |
आशाओं के रणराग हमे रचने होंगे |
फिर लोहे के गीत हमे गाने होंगे |
शशिप्रकाश का यह गीत हमे संबल दे रहा है की फिर हमे एक बार मुखर होकर पूंजीवाद के खिलाफ जंग का ऐलान करना होगा |
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..सुनील दत्ता
पत्रकार
आभार
चर्चा आजकल की

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

परिवर्तन होगा, तब होगा इस सिस्टम में जगह बना ले


ऊब गया है बैठे ठाले
चल थोडा सा नीर बहा ले

शर्ट पहन चे गुएवरा की
उसका सपना राम हवाले

जब भी सुख से मन उकताए
गीत सर्वहारा के गा ले

कमरे में ए.सी के ऊपर
लेनिन की तस्वीर लगा ले

परिवर्तन होगा, तब होगा
इस सिस्टम में जगह बना ले

-अमर ज्योति 'नदीम'
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