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शनिवार, 10 मार्च 2018

संघी तालिबानियों ने लेनिन की मूर्ति को गिरा दिया


5 मार्च को त्रिपुरा में वाम दलों के गठबंधन के चुनाव में पराजित होने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने  मजदूरों और किसानों का राज्य स्थापित करने वाले तथा भारत के स्वतंत्रता संग्राम को समर्थन करने वाले दुनिया के महान क्रांतिकारी लेनिन की मूर्ति को भाजपा नेतओं ने बुलडोज़र लगा कर गिरा दिया. यह काम उसी तरह किया गया जिस तरह अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान ने अपने 25 कैदियों के माध्यम से 2 मार्च 2001 को पहले उन्होंने बुद्ध प्रतिमा पर टैंक और भारी गोलियों से हमला किया और जब वह नाकाम रहे तो उन्होंने उसे नष्ट करने के लिए उसमें विस्फोटक लगा कर गिरा दिया था. बामियान की बलुआ पत्थर की मशहूर प्राचीन बुद्ध प्रतिमा कभी विश्व भर में बुद्ध की सबसे ऊंची 56 मीटर ऊंची मूर्ति हुआ करती थी.
                तालिबान ने विश्व धरोहर बुद्ध प्रतिमा को विष्फोटक लगा कर उड़ा दिया था और संघी तालिबानियों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन को समर्थन देने वाले लेनिन की प्रतिमा को गिरा. अफगानिस्तान में लोकतंत्र नहीं था जबकि उसके विपरीत देश में लोकतांत्रिक सरकार के रहते हुए लेनिन की मूर्ति को गिरा दिया गया. इन दोनों घटनाओं में मुख्य समानता यह है कि अफगानिस्तान के तालिबानी अमेरिका द्वारा समर्थित थे और देश की सरकार भी अमेरिकी ट्रम्प से समर्थित है. 
                 बुद्ध प्रतिमा गिराए जाने के बाद मुल्ला मुहम्मद ओमार ने कहा था कि “मुसलमानों को इन प्रतिमाओं के नष्ट होने पर गर्व करना चाहिए। उसी तर्ज पर महाराष्ट्र में बीजेपी के वरिष्ठ नेता राज पुरोहित ने  कहा है कि वह लेनिन की मूर्ति गिराए जाने से बेहद खुश हैं। उन्होंने मूर्ति को पुतला बताते हुए कहा कि लेनिन का पुतला अपमान का प्रतीक है और उनके जितने भी पुतले हों, सभी गिरा देने चाहिए। बीजेपी नेता सुब्रमण्यन स्वामी ने मामले में प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, 'लेनिन तो विदेशी है, एक प्रकार से आतंकवादी है, ऐसे व्यक्ति की मूर्ति हमारे देश में क्यों?   बीजेपी नेता राम माधव और त्रिपुरा के राज्यपाल तथागत रॉय ने भी इसे जायज ठहरा दिया।  
महान क्रांतिकारी भगत सिंह के आदर्श लेनिन थे और जेल की अदालत में लेनिन दिवस के अवसर पर भगत सिंह समेत उनके साथी क्रांतिकारियों ने उन सभी को हार्दिक अभिनन्दन भेजते हैं जो महान लेनिन के आदर्शों को आगे बढ़ाने के लिए कुछ भी कर रहे हैं। हम रूस द्वारा किये जा रहे महान प्रयोग की सफलता की कमाना करते हैं। सर्वहारा विजयी होगा। पूँजीवाद पराजित होगा। साम्राज्यवाद की मौत हो।
             आजादी की लड़ाई में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ रहने वाले लोगों की विचारधारा को मानने वाले लोगों ने देश के अन्दर हर उस व्यक्ति की चरित्र हत्या का कार्य शुरू कर दिया है जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ था. गाँधी से लेकर नेहरु, टैगोर की चरित्र हत्या का कार्य संघी तालिबानी कर रहे हैं.

सुमन 

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

बुद्धि की झोरिया : कहाँ टांग दिहो

आज कल घटित हो रही घटनाओ से यह लग रहा है कि अफवाहबाजों तथा कट्टरपंथियों की हरकतों से देश की एकता और अखंडता को जबरदस्त खतरा है। महाराष्ट्र सहित दक्षिण भारत में रह रहे पूर्वोत्तर राज्यों के नागरिकों को जिस तरह अफवाहबाजों की हरकतों के कारण पलायन करना पड़ा वह अद्भुद है इससे यह कहीं भी नहीं प्रतीत हुआ की हमारे समाज में वैज्ञानिक सोच का भी कहीं विकास हुआ है। समय-समय पर कथित धार्मिक कट्टरवादी अफवाहों के माध्यम से गणेश को दूध पिलाने से लेकर तरह-तरह के प्रयोग करते रहते हैं और सरकारी तंत्र जबतक चले चलाये जाओ वाली स्तिथि में मूक रहता है। समाज के जिम्मेदार प्रबुद्ध लोग इस वजह से चुप रहते हैं कि कहीं उनके बोलने से उनकी शरीफाना छवि को धक्का न लग जाये। शरीफाना का मतलब यह होता है कि जो व्यक्ति न गलत को गलत कह सके और न सही को सही वही सबसे शरीफ व्यक्ति होता है। जर्मन नाजीवाद से प्रेरित विचारधारा के लोग इन्टरनेट से लेकर मीडिया तक में जाति, धर्म, प्रांतीयता, क्षेत्रिययता, भाषा के सवाल को लेकर नफरत फ़ैलाने के अलावा कोई कार्य नहीं करते हैं और आज कल यही लोग अमेरिकन साम्राज्यवाद की विचारधारा की सेवा में हैं जो इस देश की एकता और अखंडता को नष्ट करना चाहते हैं।
मुंबई में असाम व म्यांमार की दुर्भाग्यशाली घटनाओ को लेकर धरना प्रदर्शन होता है और उसके बाद तोड़ फोड़ की घटनाएं शुरू हो जाती हैं। यह इस बात का प्रतीक है की तालिबानी तबका भारतीय समाज में अपना घर मजबूत बना रहा है और हद की सीमाएं टूट जाती हैं कि सरकारी तंत्र चुप चाप उनकी गुंडागर्दी को बर्दाश्त करता रहता है और पिटता भी है। लखनऊ में अलविदा की नमाज पढ़कर लोग निकले उनके हाथ में तलवारे थीं और जेबों में पत्थर थे और उन्होंने गौतम बुद्ध की मूर्ति तोड़ दी, आग लगनी शुरू कर दी, कई हजार पुलिस के जवान और प्रशासनिक अफसर चुपचाप तमाशा देखते रहे। सवाल यह उठता है कि अलविदा की नमाज पढने गए लोग ऊपर वाले से प्रार्थना करने गए थे या तलवार, पत्थर, व चाकू लेकर युद्ध करने की तैयारी के साथ गए थे। इस बात का कोई भी जवाब इन लोगों के पास नहीं है। वहीँ राजनीतिक लोगों की स्तिथि यह है कि वोट बैंक गड़बड़ाने न पाए इस वजह से वह कुछ भी बोलने की स्तिथि में नहीं रहते हैं। अभी कुछ दिन पूर्व मायावती की मूर्ती तोड़ दी गयी थी जिस पर मायावती की पार्टी ने आन्दोलन खड़ा कर दिया जिस पर 24 घंटे के अन्दर उनकी नयी मूर्ती स्थापित कर दी गयी किन्तु गौतम बुद्ध की कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है इसलिए न उनकी मूर्ति पुन: स्थापित हो पाई और न ही अखिलेश यादव की सरकार ने कोई नोटिस ही लिया और सरकार उन अराजक तत्वों को बचाने की कोशिश में है।
इन सब घटनाओ से यह पता लगता है कि समाज में हिन्दुवत्व वादी व तालिबानी संस्कृति की जडें कितनी गहरी हो गयी हैं कि वह देश की एकता और अखंडता के लिये खतरा हैं और आम जनता की बुद्धि की झोरिया कहाँ खो गयी है यह मालूम ही नहीं देता है या कहाँ टांग दी गयी है कि जो वैज्ञानिक चीजों को भी समझ नहीं पाती है। हमें सावधान रहना चाहिए अफवाहबाजों से इन कट्टर पंथियों से।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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