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मंगलवार, 19 जून 2018

संघ, विहिप जैसे संगठनों के कारण भारत में अल्पसंख्यकों और दलितों की दशा खराब

अमरीकी सरकार द्वारा गठित एक आयोग ने अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अपनी नवीनतम रिपोर्ट में कहा है कि देश में जारी भगवाकरण अभियान के शिकार मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और दलित हिंदू हैं।
वाशिंगटन : अमरीकी सरकार द्वारा गठित एक आयोग ने आरोप लगाया है कि भारत में पिछले साल धार्मिक स्वतंत्रता की स्थितियों में गिरावट जारी रही और हिंदू राष्ट्रवादी समूहों ने गैर हिंदुओं और हिंदू दलितों के विरुद्ध हिंसा, धमकी और उत्पीड़न के माध्यम से देश के भगवाकरण की कोशिश की।
यूएस कमीशन फॉर इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ) ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में भारत को अफगानिस्तान, आजरबैजान, बहरीन, क्यूबा, मिस्र, इंडोनेशिया, इराक, कजाकिस्तान, लाओस, मलेशिया और तुर्की के साथ खास चिंता वाले टीयर टू देशों में रखा है।
यूएससीआईआरएफ ने कहा, ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), विश्व हिंदू परिषद जैसे हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों द्वारा गैर हिंदुओं और हिंदुओं के अंदर निचली जातियों को अलग-थलग करने के लिए चलाए गए बहुआयामी अभियान के चलते धार्मिक अल्पसंख्यकों की दशा पिछले दशक के दौरान बिगड़ी हैं।’
    उसने अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अपनी नवीनतम रिपोर्ट में कहा है कि इस अभियान के शिकार मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और दलित हिंदू हैं।
उसने कहा, ‘ये समूह अपने विरुद्ध हिंसक कार्रवाई, धमकी से लेकर राजनैतिक ताकत हाथ से चले जाने तथा मताधिकार छिन जाने की बढ़ती भावना से जूझ रहे हैं। भारत में 2017 में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थितियों में गिरावट जारी रही है।’
यूएससीआईआरएफ ने कहा, ‘बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक समाज के रूप में रहा भारत का इतिहास अब धर्म पर आधारित राष्ट्रीय पहचान की बढ़ती बहिष्कार करने की अवधारणा के खतरे से घिर गया है। इस साल के दौरान हिंदू राष्ट्रवादी समूहों ने गैर हिंदुओं और हिंदू दलितों के विरुद्ध हिंसा, धमकी और उत्पीड़न के माध्यम से देश का भगवाकरण करने की कोशिश की।’
उसने कहा कि करीब एक तिहाई राज्य सरकारों ने गैर हिंदुओं के विरुद्ध धर्मांतरण रोधी और  गोहत्या रोधी कानून लागू किए, भीड़ ने ऐसे मुसलमानों और दलितों के विरुद्ध हिंसा की जिनके परिवार पीढ़ियों से डेयरी, चमड़ा, बीफ के कारोबार में लगे हैं तथा उन्होंने ईसाइयों के विरुद्ध भी धर्मांतरण को लेकर हिंसा की।
रिपोर्ट के अनुसार, गोरक्षकों की भीड़ ने वर्ष 2017 में कम से कम 10 लोगों की हत्या कर दी। घर वापसी के माध्यम से गैर हिंदुओं को हिंदू बनाने की खबरें सामने आईं।
धार्मिक अल्पसंख्यक समूहों के खिलाफ भेदभाव के तौर पर विदेशी चंदा लेने वाले एनजीओ पर पंजीकरण नियमों का बेजा इस्तेमाल किया गया।
रिपोर्ट कहती है कि पिछले साल धार्मिक स्वतंत्रता की दशाएँ बिगड़ने के साथ ही कुछ सकारात्मक बातें हुईं। उच्चतम न्यायालय ने कई ऐसे निर्णय किए जिससे धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा हुई।

-अमरीकी रिपोर्ट
लोकसंघर्ष पत्रिका जून 2018 अंक में प्रकाशित

शनिवार, 3 सितंबर 2016

बदसलूकी-आखिर जवाब मिला


अमेरिकी राष्ट्रपतिऔर उनके व्यवस्थापकों को आज चीन ने  मुंहतोड़ जवाब दिया जिसके तहत आज जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा  हांगझोऊ पहुंचे तो वहां पर चीनी अधिकारीयों ने उनके साथ गए प्रतिनिधिमंडल के साथ वैसा ही व्यवहार किया जैसा की वह व्यवहार अपने देश में जाने वाले दुसरे देशों के महत्वपूर्ण व्यक्तियों के साथ करते रहे हैं.  जैसे ही उनका विमान उतरा एक चीनी अधिकारी उनके दल के सदस्यों पर बरस पड़ा। चीनी अधिकारी ने उनसे कहा, यह उसका देश और और हवाई अड्डा है।
इतना ही नहीं अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सुसेन राइस और व्हाइट हाउस के पत्रकारों को भी जांच से छूट नहीं दी गई। आमतौर पर, ओबामा के साथ यात्रा पर जाने वाले पत्रकार विमान उतरने के बाद बोइंग 747 के विंग के नीचे खड़े हो जाते हैं जिससे वे राष्ट्रपति के विमान से बाहर निकलने की तस्वीरें ले सके। लेकिन, हांगझोऊ में ओबामा के विमान के उतरने के बाद चीनी सुरक्षा अधिकारियों ने एक नीली रस्सी लगा दी और पत्रकारों को उसके पीछे धकेल दिया।
चीनी अधिकारी यहीं नहीं रुके। उनमे से एक व्हाइट हाउस के अधिकारियों पर चिल्लाने लगा। वह पत्रकारों को वहां से जाने के लिए कहने लगा। तब व्हाइट हाउस की एक महिला अधिकारी ने उससे कहा-यह अमेरिकी राष्ट्रपति का विमान है। इसके जवाब में चीनी अधिकारी ने अंग्रेजी में कहा,'यह हमारा देश है। यह हमारा हवाई अड्डा है।'
इसके अलावा राइस और व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारी बेन रोड्स ने जब नीली रस्सी उठाकर ओबामा के पास जाने की कोशिश की तो चीनी अधिकारी फिर नाराज हो गया। उसने राइस का रास्ता रोकने की भी कोशिश की। उसकी सीक्रेट सर्विस के एजेंटों से बहस हो गई। इस घटना के बाद ओबामा का काफिला हवाई अड्डे से रवाना हो गया। 
अमेरिका द्वारा कुछ भारतीयों के साथ की गयी बदसलूकी के उदहारण दिए जा रहे हैं. 
देवयानी प्रकरण में अमेरिका ने कूटनीतिक संरक्षण को आंशिक रूप से मानते हुए उनको वीजा 1 दे दिया और  अपने मुल्क से भगा दिया। जिस पर भारत ने अमेरिकी दूतावास के निदेशक स्तर के अधिकारी को संगीता रिचर्ड के अभिभावकों को अमेरिका ले जाने की प्रक्रिया में सहयोग करने के आरोप में भगा दिया और उसको भागने का समय 48 घंटे का दिया है। देवयानी को 12 दिसंबर को गिरफ्तार किया गया था। उन्हें 250,000 अमेरिकी डॉलर के बांड पर रिहा किया गया था। गिरफ्तारी के बाद कपड़े उतारकर देवयानी की तलाशी ली गयी थी और उन्हें नशेड़ियों के साथ रखा गया था जिससे भारत और अमेरिका के बीच तनातनी बढ़ गई। भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिकी राजनयिकों के विशेषाधिकार कम कर दिए।
                     आज़म खान साहब के साथ क्या-क्या हुआ वह भी पूरी तरीके से देश को बताया नही गया लेकिन जब देवयानी का मामला आया तो विडियो फुटेज से उनकी तलाशी का तरीका सामने आया। हरदीप पूरी, निरुपमा राव के साथ भी बदतमीजियां हुई थी। अब सवाल उठता है कि यह सब होने के बाद आप अमेरिका क्या करने जाते हैं निश्चित रूप से कुछ न कुछ व्यक्तिगत स्तर पर प्राप्ति की कामना अमेरिका यात्रा के लिए यह सब सहने को मजबूर करती है।
 शाहरुख खान को अमेरिका के न्यूयार्क हवाई अड्डे पर रोके रखने पर एसएम कृष्णा ने कहा था कि किसी भी हस्ती को रोके रखना, और बाद में माफी मांग लेने को अमेरिका ने आदत बना लिया है।
       इससे उनके राष्ट्रविरोधी देशविरोधी गतिविधियों पर तुरंत लगाम लगेगी। अमेरिका कभी भी भारत का स्वाभाविक मित्र नही रहा है और न हो ही सकता है क्यूंकि अमेरिका सम्राज्यवादी मुल्क है और आप साम्राजयवाद पीड़ित।
वे आए तो हमने सिर पे बैठाला हम गए तो लतियाया ......

हरदीप पुरी------------------मीरा शंकर

वे आए तो हमने सर पे बैठाला हम गए तो लतियाया इसी तर्ज पर अमेरिका हमारे देश से व्यवहार कर रहा है। क्या हमारा स्वभाव बन गया है, कि हम उनके लतियाने को भी अपना अहो भाग्य समझें और उलट कर उनके पैर की मालिश करने लगे कि सरकार चोट तो नहीं लगी।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा पहले  भारत की यात्रा पर आये अपने सुरक्षा गार्डों तथा सैन्य अधिकारियों  के साथ हमारे देश ने उनका स्वागत किया, स्वागत गीत गाये। प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया तक उनकी हर एक अदा को प्रमुखता से प्रचारित व प्रसारित किया वहीँ जब हमारे देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी जी गए तो उनके ऊपर अमेरिकी राष्ट्रपति ने शराब गिरा दी थी। तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज जब अमेरिका की यात्रा पर गए तो डलास एअरपोर्ट पर उनकी जामा तलाशी ली गयी और 2003 में रक्षा मंत्री जब ब्राजील जा रहे थे तब भी उनकी तलाशी ली गयी थी और हम आह भी नहीं कर पाए।
 संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के अस्थायी प्रतिनिधि शीर्ष राजनयिक हरदीप पूरी की ह्यूस्टन एअरपोर्ट पर पगड़ी की तलाशी देने के लिए कहा गया। तलाशी न देने पर उनके साथ बदसलूकी की गयी और एक कमरे में अघोषित रूप से कैद कर लिया गया। उनको तब रिहा किया गया जब उनके साथ चल रहे टी.एस.ए अधिकारीयों ने दखल दिया और अमेरिका में भारत की राजदूत मीरा शंकर की अपमानजनक तरीके से तलाशी ली गयी इन दोनों घटनाओ में हम सिर्फ विरोध दर्ज करा कर रह गए। इसके पूर्व भी भारत के नागरिक उड्डयन मंत्री श्री प्रफुल्ल पटेल से शिकागो के एअरपोर्ट पर बदतमीजी पूर्ण तरीके से पूछताछ की गयी थी।
चीन ने यह साबित कर दिया कि वह अमेरिका से किसी तरह से कमजोर नहीं है. अमेरिकियों ने भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम से भी बदसलूकी की थी और भारत नहीं बोला था. अब जब अमेरिका को जवाब मिला है तो उनको महसूस हुआ होगा कि सुरक्षा के नाम पर बदसलूकी जायज नहीं है.


सुमन
लो क सं घ र्ष !

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

मोदी ! अमेरिकी लड्डू खायेंगे

भारत को खतरा चीन से है या पकिस्तान से है या दोनों से है या किसी से नही है. यह बात अभी तक तय नहीं हो पायी है लेकिन हमारे देश के प्रधानमंत्री अमेरिकी लड्डू खाने के लिए बेताब हैं जिसे पाकिस्तानी सरकारें बहुत पहले से खा रही हैं. लड्डू खाने का परिणाम पाकिस्तान को देखने के बाद हमारा शासक वर्ग या मोदी सरकार नहीं समझ रही है और  मनोहर परिर्कर व एश्टन कार्टर ने ‘लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट’ पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. जिसके तहत भारत के सैनिक अड्डे, सामरिक सामान व अन्य रक्षा क्षेत्रों का प्रयोग अमेरिका कर सकेगा और अमेरिकी सैनिक अड्डों, सामरिक सामान व अन्य रक्षा क्षेत्र का उपयोग कर सकेंगे.  एशिया में जगह-जगह अमेरिकी सैनिक अड्डे हैं और जगह-जगह उसके युद्ध सम्बन्धी हथियार मौजूद हैं. फिर ऐसी क्या जरूरत पड़ी कि भारत के साथ उसको इस तरह की संधि करने की जरूरत है. 
           1947 में देश विभाजन के बाद धर्म पर आधारित पकिस्तान बना और धर्मनिरपेक्षता को आधार बना कर भारत का निर्माण हुआ और पाकिस्तान अपनी आजादी के बाद अमेरिका जैसी महाशक्ति के गोद में चला गया और उसके बाद अमेरिका ने पाकिस्तान में अपने कठपुतली सरकारें बनाने का काम शुरू कर दिया था और 1971 में उसका अमेरिकी महाशक्ति के साथ होने के बावजूद उसका विभाजन हो गया था और अमेरिकी महाशक्ति का सातवाँ बेडा अमेरिका से चलते-चलते बांग्लादेश के निर्माण तक नहीं पहुंचा. चीन या पकिस्तान से कोई युद्ध का मामला मुद्दा नहीं बनता है किन्तु हमारे देश के शासक वर्ग के लोग चीन के साथ छाया युद्ध या मीडिया युद्ध में लगे रहते हैं और तमाम सारी घटनाओं का विश्लेषण कर युद्ध की संभावनाओं या संभावित खतरों के नाम पर लाखों-लाख करोड़ रुपये की कबाड़ युद्ध सामग्री  खरीद कर इकठ्ठा करते रहते हैं. अमेरिका के साथ हो रहे समझौते अभी तक देश की विदेश नीति पलट कर एक नयी नीति अमेरिकी साम्राज्यवाद के समर्थन में बनायीं जा रही है. 
अमेरिका के साथ दुनिया के जो भी देश रहे हैं वह सभी मुल्क गृह युद्ध में फंसे हैं और उनके वहां अमेरिका ने हमेशा कभी सैनिक विद्रोह या कभी जन विद्रोह करा कर अपनी कठपुतली सरकारें बनायीं हैं. अमेरिका को सैनिक अड्डे इस्तेमाल करने का और तमाम सारा रक्षा सहयोग देश मे कठपुतली सरकारें बनाने का प्रयोग प्रारंभ नहीं करेगा ? 
वर्तमान सत्तारूढ़ दल प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर के समय में अमेरिकी विमानों को ईधन देने के सवाल पर अत्यधिक नाराज़ था और इसके नेतागण इसी मुद्दे पर सरकार का विरोध कर रहे थे और उसी अमेरिका से समझौता करना आम जनता की समझ से परे है.
               अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और आर्थिक मंदी से निपटने के लिए इस तरह की तैयारियां देश को करा कर भारतीय उपमहाद्वीप के आसपास युद्ध जोन तो नहीं निर्मित कर रहा है जिसकी सबसे ज्यादा आशंका है.  अमेरिका और भारत के बीच साजो-सामान से जुड़ा सैन्य समझौता होने के बाद ओबामा प्रशासन ने कहा है कि चीन को इन दोनों देशों के बीच के मजबूत संबंधों से डरने की कोई जरूरत नहीं है.

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

मानव जाति का हत्यारा टोनी ब्लेयर

भारत की जनता पर ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर इंग्लैंड सरकार ने जो अत्याचार किये थे. वह मानवजाति के लिए कलंक है और उसमें नर पिशाचों की आश्चर्यजनक भूमिका दिखाई देती है. दुनिया में अपने को उच्च समझने वाले यूरोपीय लोगों ने मानव जाति के ऊपर कैसे-कैसे अत्याचार किये. 
                ईराक में सद्दाम हुसैन को फांसी व जनता का नरसंहार इंग्लैंड, अमेरिका और उसकें दोस्त देशों ने किया और 6 लाख से अधिक लोगों को मार डाला था लेकिन जब चिलकॉट जांच समिति की रिपोर्ट आई है तो जिन आधारों के ऊपर ईराक में नरसंहार किया था. वह सब गलत पाए गए. आज भी लाखों विधवाएं बेसहारा हैं.
 इराक़ युद्ध में शामिल होने के फ़ैसले की जांच के लिए गठित चिलकॉट जांच समिति अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सरकार ने सद्दाम हुसैन की तरफ से दिख रहे ख़तरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया और अप्रशिक्षित सैनिकों को युद्ध में भेजा दिया गया.
रिपोर्ट में कहा गया है कि युद्ध में शामिल होने के फ़ैसले का एक कारण यह बताया गया कि इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के पास सामूहिक विनाश के अस्त्र है, जिनके चलते वह बड़ा खतरा पैदा कर सकते है लेकिन यह अनुमान पूरी तरह अतिरंजित था।
समिति की रिपोर्ट आने के बाद टोनी ब्लेयर के खिलाफ इंग्लैंड में जगह-जगह प्रदर्शन शुरू हो गए हैं तो वहीँ ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने 2003 के इराक़ युद्ध में मारे गए लोगों के परिवार से माफी मांगी है हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि वो परिवार उन्हें न कभी भूलेंगे और न माफ़ करेंगे. उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि खुफिया सूचनाएं ग़लत थीं और युद्ध के बाद की योजना खराब थी. इसी के बाद से दुनिया के अन्दर आतंकवाद की एक लहर आई जिसने भी इंसानी खून को बहा रहे हैं  लेकिन इसकी शुरुवात अमेरिकी साम्राज्यवाद ने शुरू की थी और पूरी दुनिया में आतंकवादी और नर पिशाच की भूमिका में पहले इंग्लैंड और अब अमेरिका और इंग्लैंड दोनों के चेहरे दिखाई देते हैं.इन देशों की खुशहाली का राज  मानव रक्त की नदियाँ बहा देने में छिपा हुआ है. साम्राज्यवाद का असली चेहरा एक खूनो दैत्य का चेहरा होता है जो पूरी दुनिया के अन्दर मानव जाति का रक्त पीने के लिए हमेशा लालायित रहता है और आज भी साम्राज्यवाद मानव रक्त को बहाकर मुनाफे को बढ़ा रहा है. दुनिया में आतंकवाद समाप्त करने के लिए ईराक युद्ध व सद्दाम हुसैन की फांसी के जिम्मेदार राष्ट्राध्यक्षों को  पकड़ कर युद्ध अपराधी की तरह मुकदमा चला कर सजा-ए-मौत देनी चाहिए जिससे दुनिया के अन्दर शांति कायम हो सके नहीं तो विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्ष जो हथियार सौदागरों के एजेंट की भूमिका में हैं वह अपने हतियारों का प्रदर्शन करने के लिए इसी तरह नरसंहार करते रहेंगे और उसके प्रतिशोध में आतंकवाद जारी रहेगा. 

सुमन
लो क सं घ र्ष !

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

डॉलर की मौत, नए मनुष्य का जन्म

डॉलरब्रिटिश साम्राज्यवाद की ताकत पौंड थी जिसकी बदौलत उसके राज्य का सूरज अस्त नहीं होता था जिसका सीधा अर्थ यह था कि इंग्लैंड के राज्य में सूरज कहीं न कहीं उसकी रोशनी से प्रकाशमय होता था. उसकी मुद्रा पौंड में गिरावट आई और डॉलर ने ताकत ली. इंग्लैंड से ताज अमेरिका चला गया. अमेरिकी साम्राज्यवाद का ताज आज दुनिया में शासन का एक प्रमुख अस्त्र है. बहुत सारी सरकारें उस ताज की बदौलत अपने-अपने देशों में राज कर रही हैं. उसकी चापलूसी में अपने देश में नागपुरी मुख्यालय उसके गीत गाने में लगा रहता है. गीत गुनगुनाता रहता है. आज कल जो मुख्य गीत गुनगुनाया जा रहा है 'आतंकवाद खत्म कर दो, आतंकवाद ख़त्म कर दो'.ये नकली गीत नए मुखौटों के साथ गाया जा रहा है. सभी जानते हैं की आतंकवाद का सरगना अमेरिका और उसका साम्राज्यवाद है. उसकी चेलाही नागपुर मुख्यालय करता है. पहले नागपुर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के गीत गाता था और अब अमेरिकी साम्राज्यवाद के गीत गाता है लेकिन वह नहीं भूला है अपने बाप एडोल्फ़ हिटलर को और उसकी मानवता को शर्मसार करने वाली कत्लेआम की घटनाएं.
           विश्व परिद्रश्य बदल रहा है. डालर दुनिया में अपना शासन स्थापित करने में असमर्थ हो रहा है. डॉलर के ख़त्म होने का मतलब है कि सम्पूर्ण मानवता के खिलाफ जारी एक युद्ध की समाप्ति. इस काम में चीन, ईरान सहित जो आर्थिक समझौते और मानवता को अमेरिकी साम्राज्यवाद से बचाए रखने के लिए जो रास्ते खोजे जा रहे हैं उसी के सन्दर्भ में अमेरिकी-जर्मन विद्वान, इतिहासकार और रणनीतिक जोखिम परामर्शदाता विलियम एंगडाह्ल ने ‘न्यू ईस्टर्न आउटलुक’ पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख में कहा है:
“कभी-कभी वैश्विक राजनीति में युगांतरकारी परिवर्तन ऐसी घटनाओं से आरम्भ होते हैं जिनकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता| चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की हाल ही की तेहरान यात्रा ऐसी ही एक घटना है| इन वार्ताओं के परिणाम यह दिखाते हैं कि शांतिपूर्ण आर्थिक विकास में विश्वास रखने वाले देशों के यूरेशियाई स्वर्ण त्रिकोण की जीवानाधारी तीसरी भुजा अब पा ली गई है|”  
                एंगडाह्ल ने यह निष्कर्ष व्यक्त किया है: “रेशम मार्ग की योजना में यह लक्ष्य निर्धारित है कि रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास इस तरह किया जाएगा ताकि इससे नए स्वर्ण-खनन कार्य को मदद मिले जो यूरेशियाई सदस्य देशों  की मुद्राओं की पीठ मजबूत करेगा| अब ईरान अपने अभी तक अछूते पड़े स्वर्ण-भंडारों के साथ भी इस योजना में शामिल हो जाएगा तो कर्ज में डूबी, अतिशय स्फीति से ग्रस्त डालर प्रणाली के लिए एक घातक सकारात्मक विकल्प पैदा हो जाएगा जो शांति और विकास के लिए कृतसंकल्प है|”
वह कहते हैं: “ईरान और चीन के बीच नवीनतम व्यापर समझौतों के बाद ‘चीन पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर’ का जीवनदायक महत्व और भी बढ़ गया है”|
डॉलर की मौत का मतलब है. सम्पूर्ण मानवता को नया जीवन. हमारे देश में डॉलर की मौत का मतलब है नागपुर मुख्यालय की मौत. इसका स्वभाव रहा है पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद के जूतों में पोलिश करना और अब अमेरिकी साम्राज्यवाद के जूतों की चमक को बढाने के लिए नरम ओठों से उसको चमकाना.

सुमन 

मंगलवार, 17 नवंबर 2015

आधुनिक कसाई कौन ? चेहरा पहचानने की ज़रुरत है

अपने बच्चों को IS की जद में जाने से बचाएं मुस्लिम: ओबामा , यह बयान अमेरिकी राष्ट्रपति का नितांत गलत है और यूज एंड थ्रो की नीति का परिचायक है और जब अमेरिका या साम्राज्यवादी मुल्क इस्तेमाल करने के बाद फेंकते हैं तो फेंकने के बाद वह चीज जब ज़ख्म देती है और फिर सेप्टिक बनकर उनके जिस्म निर्जीव बनाने लगती है तो वह तरह-तरह के सिद्धांत गढ़ने लगते हैं. कौन नहीं जनता है कि पश्चिमी देशों के दलाल बगदादी से पेट्रोलियम पदार्थ फ़ोकट दामों में खरीदते थे और फिर इन्ही देशों को बेच देते थे हथियारों की सप्लाई पेट्रोलियम पदार्थों के बदले में अमेरिकी व उसके मित्र देश कर रहे थे यही हालत अफगानिस्तान के सम्बन्ध में लादेन के साथ थे. अब वह चिल्ला रहे हैं कि मुस्लिम अपने बच्चों को आईएस की ज़द में जाने से बचाएँ. बगदादी को किसने पैदा किया था, लादेन को किसने पैदा किया था. इसका जवाब न ओबामा के पास है और न ही फ्रांस के राष्ट्रपति ओलंदे के पास है. यही लोग बगदादी के मेली-मददगार हैं और जब रूस ने बगदादी के ऊपर  बम्बार्ड करना शुरू किया तो यह लोग बगदादी का साथ छोड़ कर भाग खड़े हुए जिसकी प्रतिक्रिया स्वरूप बेरोजगार आतंकी पूरी दुनिया में मानवता के खिलाफ हमले करना शुरू कर दिया लेकिन अगर देखा जाए तो असली मानवता के दुश्मन कौन हैं तो मालूम चलेगा कि ओबामा और ओलंदे ही हैं. इस्लाम का चेहरा अगर शैतान के रूप में तब्दील किया है तो इन्ही साम्राज्यवादी देशों ने अपने नौकरों के माध्यम से किया है. इस्लाम तो शांति, करुणा और दया का दर्शन है. उसके पैगम्बर मोहम्मद साहब के ऊपर एक बुढ़िया रोज कूड़ा फेंकती थी और जब एक दिन उसने कूड़ा नहीं फेंका उनके ऊपर तो वह उसके घर जाकर मालूम करने गए थे. उस दर्शन का खौफनाक चेहरा मुनाफाखोर साम्राज्यवादी मुल्कों ने बदल दिया. इन साम्राज्यवादी देशों  की नकाब उतारते हुए रूस के राष्ट्रपति पुतिन का दावा महत्वपूर्ण है. उसने इनका मुखौटा उतार कर फेंक दिया है.
                               जिसका सबूत यह है कि आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट के पेरिस पर हुए हमले को लेकर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि आतंकी संगठन आईएस को कुछ देशों से पैसा पहुंच रहा है, जिसमें जी-20 से जुड़े देश भी शामिल हैं। उन्होंने दावा किया कि आईएस को फंडिंग करने की इस लिस्ट में कुल 40 देशों का नाम है। जिन देशों से पैसा पहुंच रहा है, उसे लेकर पुतिन ने खुफिया जानकारियां भी साझा कीं। पुतिन ने साथ ही कहा कि आईएस तेल का गैरकानूनी कारोबार करता है। इसे भी खत्म करने की जरूरत है।
 पेरिस हमले के बाद सीरिया के ऊपर आतंकवाद समाप्त करने के नाम पर जो साम्राज्यवादी मुल्क बम्बार्ड कर रहे हैं. क्या उनसे फूल झर रहे हैं. इन लोगों के हथियारों की प्रयोगशाला अफगानिस्तान, सीरिया, लीबिया है और यहाँ ये हथियारों का प्रयोग कर दुनिया के अन्दर अपने हथियार बेचने का सौदा करते हैं. युद्ध इनका जीवन है. शांति इनकी मौत है अगर यह जरा सा भी मानवतावादी हैं तो इनको चाहिए की अविलम्ब अपनी हथियार इंडस्ट्री को बंद करें. पूरी दुनिया में आतंकवादियों को हथियार सप्लाई करने का काम कौन कर रहा है यही सब अपने मुनाफे के लिए विभिन्न देशों को गुलाम बनाने का काम कौन कर रहा है, यही मुल्क. अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक वहां के मूल निवासियों को समाप्त करने का काम इन्ही साम्राज्यवादी ताकतों ने किया है. यह चाहते हैं कि दुनिया के अन्दर विभिन्न नस्लों के लोग, विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं इनको समाप्त किया जाए इसलिए समय समय पर विभिन्न सिद्धांत गढ़ते रहते हैं. कभी सभ्यताओं का युद्ध, कभी भाषा का युद्ध, कभी धर्म का युद्ध. युद्ध में मरता कौन है, इंसान और मुनाफा, लूट और खसोट कौन करता है यह सब.
हम ! कुछ नहीं कहते













सुमन 

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

अमेरिका को लाभ देने के लिए हथियारों की खरीद

गिरती हुई अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भारत द्वारा हथियारों की खरीद से नया जीवन मिलने की आशा है. भारत अब सऊदी अरबिया को भी पीछे छोड़ कर अमेरिकी हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार बन गया है. इससे पहले भारत सोवियत यूनियन से हथियारों की खरीद करता था और उनसे टेक्नोलॉजी लेकर फिर अपने वहां अपनी जरूरतों के अनुसार सुधार कर उत्पादन करता था. जिसका सबसे बढ़िया उदहारण ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल को भारत और रुस ने मिलकर उत्पादित किया, इस बात के लिए अमेरिका तैयार नहीं होता है.
    भारत के जो भी युद्ध हुए हैं वह मुख्यत: पाकिस्तान से ही हुए हैं. पाकिस्तान को अमेरिका हथियारों की सप्लाई करता रहा है और उसके हथियार बिकते रहे हैं किन्तु अब्दुल हमीद ने मात्र अपनी "गन माउन्टेड जीप" से उस समय अजेय समझे जाने वाले अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दिए "पैटन टैंकों" को नष्ट कर दिया था।
 बुधवार से शुरु हो रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे से पहले भारत ने अमेरिका से हथियार सौदे को मंजूरी दे दी है। अमेरिकी एविएशन कंपनी बोइंग से करीब 15800 करोड़ रुपए  के  सौदे  के तहत भारत 22 अपाचे और 15 शिनूक हेलिकॉप्टर खरीदेगा। कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्युरिटी ने इस सौदे को मंजूरी दे दी है . अमेरिका का कोई भी वादा नहीं है की वह पाकिस्तान को हथियार नहीं बेचेगा. एक तरफ वह पाकिस्तान को हथियार भी बेचेगा और युद्ध के समय उसका राजनैतिक समर्थन भी करेगा.
           नागपुर की प्रयोगशाला से निकले देश के प्रधानमंत्री बनने तक नरेन्द्र दामोदर मोदी की राजनीति, विदेश नीति का यह कौन सा प्रयोग है की दोनों पडोसी मुल्कों के पास युद्ध के हथियार एक ही मुल्क द्वारा निर्मित होंगे. एक तरफ तो पाकिस्तान से ही निपटने की बात संघ की राजनीती करती है तो दूसरी तरफ वह पकिस्तान के आका अमेरिका को फायदा पहुंचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है. स्तिथि यहाँ तक पहुँच चुकी है की प्रधानमंत्री मोदी व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ उसी आका के इशारे पर कार्य करने के लिए तत्पर रहते हैं और अमेरिका यात्रा के बहाने दोनों देशों के प्रधानमंत्री अपनी-अपनी निष्ठा अमेरिका में प्रदर्शित करेंगे. 
जहाँ तक हथियारों की बात है अमरीकी अस्त्र रूसी अस्त्रों से बेहतर नहीं हैं इसीलिए वियतनाम युद्ध में अमेरिकी हारे थे और विएतनाम के पास रुसी हथियार उसके जीतने का मुख्य कारक था. यह भी याद रखा जाना चाहिए कि अमरीकी अस्त्रों पर आश्रित पाकिस्तान ने कभी रूसी अस्त्रों से लैस भारत के खिलाफ युद्ध नहीं जीता है लेकिन यह बात अमेरिकी समर्थक संघ के नियंतागणों को समझ में नहीं आती है क्यूंकि देशभक्ति, राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र स्वत: उन्होंने जारी करने का अधिकार ले रखा है. 
   देश की अर्थव्यवस्था हथियारों की खरीद से मजबूत नहीं होगी और अमेरिका के इशारे पर भारत पाकिस्तान का छाया युद्ध दोनों देशों को हथियार खरीदने के लिए मजबूर करता है. अगर अमेरिका हमारा वास्तविक शुभ चिन्तक है तो वह पाकिस्तान को मदद रोककर छाया युद्ध को समाप्त कर सकता है दोनों अपने-अपने देश की जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सकते हैं. लेकिन हथियारों की बिक्री नहीं हो पायेगी और अमेरिका की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी. उस अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बचाए रखने के लिए तथा उसकी दादागिरी को दुनिया में कायम रखने के लिए यह हथियारों की खरीद उसको नया जीवन देगी.
सुमन 

बुधवार, 21 जनवरी 2015

मोदी की मेहरबानी से अमरीकियों के गुलाम

एक गुजराती (गाँधी) ने देश को आज़ादी दिलवाई ,दूसरे गुजराती (मोदी) ने पुनः देश को गुलामी की तरफ धक्का देने की शुरूआत कर दी -

पढ़िए कैसे-------------
अमेरिकी सीक्रेट सर्विस को ओबामा के प्रवास के मद्देनज़र निम्नाकित जो सुविधाए दी जा रही है इसे देख कर मुझे अपने आपको आजाद देश का भारतीय कहने में शर्म आ रही है !1) 24 और 25 जनवरी से कोई भी भारतीय सेन्ट्रल दिल्ली में प्रवेश नहीं कर सकेगा ,यहाँ के चप्पे चप्पे पर अमेरिकी सुरक्षा गार्ड ही रहेंगे! 

2) 24 जनवरी से सेन्ट्रल दिल्ली की हर सरकारी ईमारत को बंद रखा जायेगा इन सभी सरकारी इमारतों में अमेरिकी सुरक्षा अधिकारी और स्नाइपर्स तैनात रहेंगे ,मतलब हमारे देश के सरकारी नौकरों की भी अब कोई इज्ज़त नहीं रखा केंद्र सरकार ने!

3) 24 जनवरी से ही इंडिया गेट ,रफ़ी मार्ग ,जनपथ के सभी रास्तों को आम जनता के लिए बंद कर दिया जायेगा ,इन मार्गों पर विदेशी अमरीकीयों का कब्ज़ा होगा !

4) वायुमार्ग भी प्रभावित रहेंगे ,भारतीय थल के साथ इन तीन दिनों तक अमेरिकियो का कब्ज़ा भारतीय आकाश पर भी रहेगा जिससे की अगर ओबामा को आपातकालीन स्थिति में भागना पड़े तो अमेरिकी वायुसेना को कोई दिक्कत ना हो 

5)प्रस्तावित आगरा यात्रा को ध्यान में रखते हुए इस मार्ग पर रुकने खाने पीने के सभी होटल ढाबे बंद करवा दिए जायेंगे !

यानी की हम लोग अपने ही देश में इन तीन दिनों तक मोदी की मेहरबानी से अमरीकियों के गुलाम रहेंगे,  

अब आप थोडा जेहन पर जोर डालिए अब मोदी जी अमेरिका गए थे तो क्या वहां अमेरिका में भी ऐसा स्वागत और सुरक्षा का इन्तेजाम उनके लिए किया गया .....

1) मोदी को एरपोर्ट पर लेने ओबामा तो दूर की बात कोई बड़ा अमेरिकी नेता या अफसर तक नहीं आया....

2) मोदी की गाड़ी एयरपोर्ट से होटल तक बाकी आम अमेरिकी लोगो की गाडियों के बीच ट्राफिक में चल रही थी....


तो भगतों एक बार और ताली बजाओ ....
- यह फेसबुक साभार -

29 सितंबर २०११को जेएफके एयरपोर्ट पर करीब 2 बजे एयर इंडिया की फ्लाइट उड़ान भरने के लिए तैयार थी। उत्तेजित सुरक्षाकर्मियों ने क्रू को प्लेन का दरवाजा खोलने के लिए मजबूर कर दिया और बताया कि वे एक यात्री की तलाशी लेना चाहते हैं। उन्होंने जब प्लेन के भीतर कहा कि वे कलाम की तलाशी लेना चाहते हैं तो एयर इंडिया के अधिकारियों ने विरोध किया और बताया कि वह भारत के पूर्व राष्ट्रपति हैं। इसके बाद उन्होंने थोड़ी नरमी दिखाई, लेकिन कलाम के जूते और जैकेट लेकर चले गए।

देवयानी प्रकरण में अमेरिका ने कूटनीतिक संरक्षण को आंशिक रूप से मानते हुए उनको वीजा 1 दे दिया और  अपने मुल्क से भगा दिया। जिस पर भारत ने अमेरिकी दूतावास के निदेशक स्तर के अधिकारी को संगीता रिचर्ड के अभिभावकों को अमेरिका ले जाने की प्रक्रिया में सहयोग करने के आरोप में भगा दिया और उसको भागने का समय 48 घंटे का दिया है। देवयानी को 12 दिसंबर को गिरफ्तार किया गया था। उन्हें 250,000 अमेरिकी डॉलर के बांड पर रिहा किया गया था। गिरफ्तारी के बाद कपड़े उतारकर देवयानी की तलाशी ली गयी थी और उन्हें नशेड़ियों के साथ रखा गया था जिससे भारत और अमेरिका के बीच तनातनी बढ़ गई। भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिकी राजनयिकों के विशेषाधिकार कम कर दिए।

               आज़म खान साहब के साथ क्या-क्या हुआ वह भी पूरी तरीके से देश को बताया नही गया लेकिन जब देवयानी का मामला आया तो विडियो फुटेज से उनकी तलाशी का तरीका सामने आया। हरदीप पूरी, निरुपमा राव के साथ भी बदतमीजियां हुई थी। अब सवाल उठता है कि यह सब होने के बाद आप अमेरिका क्या करने जाते हैं निश्चित रूप से कुछ न कुछ व्यक्तिगत स्तर पर प्राप्ति की कामना अमेरिका यात्रा के लिए यह सब सहने को मजबूर करती है।
 शाहरुख खान को अमेरिका के न्यूयार्क हवाई अड्डे पर रोके रखने पर एसएम कृष्णा ने आज कहा कि किसी भी हस्ती को रोके रखना, और बाद में माफी मांग लेने को अमेरिका ने आदत बना लिया है।
       इससे उनके राष्ट्रविरोधी देशविरोधी गतिविधियों पर तुरंत लगाम लगेगी। अमेरिका कभी भी भारत का स्वाभाविक मित्र नही रहा है और न हो ही सकता है क्यूंकि अमेरिका सम्राज्यवादी मुल्क है और आप साम्राजयवाद पीड़ित।
वे आए तो हमने सिर पे बैठाला हम गए तो लतियाया ......

हरदीप पूरी-------------------------------------------- मीरा शंकर

वे आए तो हमने सर पे बैठाला हम गए तो लतियाया इसी तर्ज पर अमेरिका हमारे देश से व्यवहार कर रहा है। क्या हमारा स्वभाव बन गया है, कि हम उनके लतियाने को भी अपना अहो भाग्य समझें और उलट कर उनके पैर की मालिश करने लगे कि सरकार चोट तो नहीं लगी।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा पहले  भारत की यात्रा पर आये अपने सुरक्षा गार्डों तथा सैन्य अधिकारियों  के साथ हमारे देश ने उनका स्वागत किया, स्वागत गीत गाये। प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया तक उनकी हर एक अदा को प्रमुखता से प्रचारित व प्रसारित किया वहीँ जब हमारे देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी जी गए तो उनके ऊपर अमेरिकी राष्ट्रपति ने शराब गिरा दी थी। तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज जब अमेरिका की यात्रा पर गए तो डलास एअरपोर्ट पर उनकी जामा तलाशी ली गयी और 2003 में रक्षा मंत्री जब ब्राजील जा रहे थे तब भी उनकी तलाशी ली गयी थी और हम आह भी नहीं कर पाए।
 संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के अस्थायी प्रतिनिधि शीर्ष राजनयिक हरदीप पूरी की ह्यूस्टन एअरपोर्ट पर पगड़ी की तलाशी देने के लिए कहा गया। तलाशी न देने पर उनके साथ बदसलूकी की गयी और एक कमरे में अघोषित रूप से कैद कर लिया गया। उनको तब रिहा किया गया जब उनके साथ चल रहे टी.एस.ए अधिकारीयों ने दखल दिया और अमेरिका में भारत की राजदूत मीरा शंकर की अपमानजनक तरीके से तलाशी ली गयी इन दोनों घटनाओ में हम सिर्फ विरोध दर्ज करा कर रह गए। इसके पूर्व भी भारत के नागरिक उड्डयन मंत्री श्री प्रफुल्ल पटेल से शिकागो के एअरपोर्ट पर बदतमीजी पूर्ण तरीके से पूछताछ की गयी थी।


सुमन
लो क सं घ र्ष !

शनिवार, 5 अक्टूबर 2013

डॉलर की गुंडागर्दी ख़त्म करो

 अमेरिका में विपक्ष के विरोध के कारण अमेरिकी बजट पास नही हो पाया और वहां आवश्यक कर्मचारियों को छोड़ कर काम बंदी चल रही है। यह अमेरिकी बहाना हो सकता है जबकि वास्तविकता यह है कि वह पूरी तरीके से दिवालिया हो चुका है। बैंक, बीमा कम्पनियाँ पहले से ही दिवालिया चल रही हैं। युद्ध उद्योग के कारण उसकी मुद्रा डॉलर दुनिया में राज कर रही है अब जरूरत है भारत, रूस, चीन, ईरान सहित मजबूत देशों को डॉलर की उपयोगिता को समाप्त करें और आपस में सारा व्यापार अपनी अपनी मुद्रा में करें। अमेरिका की शोषणकारी और सम्राज्यवादी प्रवित्तियों से मुक्त हों। 
अमेरिका वित्तीय संस्थानों, बैंक, कॉर्पोरेशंस और विदेशी संस्थानों से कर्ज लेता है। इस पर वह ब्याज भी अदा करता है। जिन प्रमुख देशों के बैंकों, वित्तीय संस्थानों या विदेशी निवेशकों से वह कर्ज लेता है, उनमें प्रमुख रूप से हॉन्ग कॉन्ग, चीन, बेल्जियम, लक्जमबर्ग और ताइवान शामिल हैं। जरूरत पडऩे पर अमेरिका स्विस बैंक से भी कर्ज लेता है। आज वह कर्ज अदा करने की स्तिथि में नहीं है। 
साम्राज्यवादी शक्तियों के चंगुल से निकलने का सही समय यही है और मानवता को बचाए रखने के लिए अपने-अपने मुल्कों की जनता का शोषण रोकने के लिए डॉलर की दादागिरी ख़त्म करना आवश्यक है।  हम अमेरिका से कोई ऐसी वस्तु आयात नहीं करते हैं कि जिसके बगैर हमारा काम न चल सके और यह समस्त चीजें दुनिया के दुसरे देशों से भी लिया जा सकता है।  अमेरिका कभी भी हमारा स्वाभाविक मित्र ही नही हो सकता उसकी अर्थव्यवस्था लूट और गुंडागर्दी के ऊपर ही आधारित है और जब उनका विलाप प्रारंभ हुआ है।          
नेशनल इंटेलिजेंस के निदेशक क्लैपर ने रुवासे अंदाज में कहा कि यह केवल वॉशिंगटन का राजनीतिक मसला भर नहीं है बल्कि "इसकी वजह से हमारी अमरीकी सेनाओं, कूटनीतिज्ञों और नीति निर्माताओं की मदद करने की ताकत भी प्रभावित होती है. और इस तरह के हालात में हर बीतते दिन के साथ यह ख़तरा बढ़ रहा है."
क्लैपर ने कहा कि कर्मचारियों को वेतन ना देना, जबरन छुट्टी पर भेजना उन्हें आर्थिक दिक्कतों में डालता है और यह विदेशी गुप्तचर संस्थाओं के लिए बेहद मुफ़ीद है। यह विदेशी गुप्तचर संस्थाओं के लिए सपने सच होने जैसा है."
वहीँ, अमरीका की तकनीकी गुप्तचर संस्था के निदेशक जनरल कीथ एलेक्जैंडर ने कहा की उनकी संस्था ने हजारों गणितज्ञों और कंप्यूटर विशेषज्ञों को छुट्टी पर भेज दिया है जिसका उन्हें वेतन नहीं मिलेगा.
            आज जब अमेरिकी जो पूरी दुनिया में कत्लेआम करते हुए नजर आ रहे था, वह छाती पीट कर रो रहा है।  चापलूस मुल्क उनके आंसू कब तक पोछेंगे। आंसू उनके बंद नहीं हो सकते हैं चाहे तीसरी दुनिया के सारे नागरिकों का क़त्ल करके समस्त संपत्ति दे दी जाए।  अमेरिका ने सिर्फ इंसानों का कत्लेआम ही किया चाहे वह इराक हो, लीबिया हो, सीरिया हो, अफ्गानिस्तान हो।  वहीँ जो उसके साथ रहा उसकी स्तिथि सोमालिया जैसी कर दी कि जहाँ आज समुद्री डाकुओं को छोड़ कर कुछ बचा नहीं है।  इसीलिए ओबामा अपने कुनबे के साथ अमेरिका में विलाप कर रहे हैं और उनके सारे दौरे रद्द हो गए हैं।  

सुमन 

रविवार, 15 सितंबर 2013

अमेरिकी साम्राज्यवाद की दोगली नीतियों के दो शिकार मिस्त्र और सीरिया

पिछले दोतीन वर्षों से मिस्त्र में जो हालात बने और बिगड़े हैं, उनके चलते मिस्त्र अब पिरामिडों के देश के तौर पर कम और तानाशाही, बनतीमिटती फौजी सत्ताओं तथा फेसबुक क्रांति के लिए ज़्यादा जाना जा रहा है। हाल में वहाँ राष्ट्रपति मुहम्मद मोर्सी को हटा दिया गया और फिर एक बार पूरा देश असंतोष की लपटों से घिरा हुआ है। दूसरे मुल्कौं की उलझनों से ही अपना खादपानी हासिल करने वाले सी.आई.ए., पेंटागन और अमेरिकीयोरपीय साम्राज्यवादी पिट्ठू इन दिनों असंतोष से निपटने में बहुत ज़्यादा व्यस्त हैं।
मिस्त्र के हालात को समझने और भारत में इस बारे में लोगों के बीच सही राय कायम करने के मक़सद से जोशीअधिकारी इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज़ द्वारा ॔॔मिस्त्रः हालिया बदलाव और उनका दुनियावी असर’’ विषय पर पश्चिम एशिया, अरब देश व विदेश नीति के विद्वान साथी क़मर आग़ा के साथ बातचीतसंवाद का आयोजन 7 सितंबर 2013 को दिल्ली में एटक के राष्ट्रीय कार्यालय के हॉल में रखा गया था।

जब इस कार्यक्रम की योजना बनी थी तब मिस्त्र के हालात बहुत नाजुक और अस्थिर थे लेकिन तारीख़ नज़दीक आतओते सीरिया के हालात मिस्त्र से भी ज़्यादा विस्फोटक हो गए। ज़ाहिर है कि बदले हालात में विषय और बातचीत सिफ़र मिस्त्र तक महदूद नहीं रह सकते थे, और न रहे। सीरिया पर भी काफ़ी बातें हुईं। उनका ज़िक्ऱ भी आगे आया।

क़मर आग़ा ने पश्चिम एशियाई मुल्कौं की कुछ ख़ासियतों के ज़िक्ऱ से अपनी बात शुरू की और कहा कि ट्यूनीशिया व मिस्त्र में युवा लोागों की आबादी का प्रतिशत बहुत ब़ गया था और साथ ही बेरोज़गारी का भी। ट्यूनीशिया में तो यह नौजवान और बेरोज़गार लोग काफ़ी शिक्षित भी थे। फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट और इंटरनेट के इस्तेमाल से उन्होंने देश भर में मौजूद ग़ुस्से को एक सामूहिक शक्ल देने की कोशिश की। क़मर आग़ा ने कहा कि जब वहाँ के नौजवान लोगों से हमारी मुलाकात हुई और उन्होंने अपने मंसूबे बताये तो हमें बड़ा ताज्जुब भी लगा और यकीन तो खैर तब तक कैसे हो सकता था। लेकिन उन्होंने उसे इस्तेमाल किया।

दरअसल, पश्चिम एशिया के मुल्कौं के बारे में यह समझना ज़रूरी है कि जब तक साम्राज्यवाद ने वहाँ तोड़फोड़ शुरू नहीं की थी तब तक वे मुल्क काफ़ी हद तक एक जैसे ही थे। उनकी संस्कृति, उनके रिवाज एक जैसे थे, उनके पहनावे भी काफ़ी हद तक मिलतेजुलते थे। अब जो कुछ वहाँ ज़्यादा एक जैसा है, वह है जनता की बदहाली और शासकों की तानाशाही। यह तानाशाही कभी धर्म के नाम पर होती है तो कभी धर्मनिरपेक्ष।

पहले विश्वयुद्ध के भी पहले से तेल की वजह से अरब देश दुनिया के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण थे। उनमें भी मिस्त्र ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक दृष्टि से पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के बीच पुल की तरह मौजूद है। गमाल अब्देल नासेर के बाद से लंबे समय से जो सत्ताएँ मिस्त्र में आयीं, उन्होंने विश्व के दादा देशों के साथ एक तरह की यह नीति ही अपना ली कि उनकी सत्ताएँ लोगों के दिलों से नहीं, बल्कि ख़्षौफ़ से चलेंगी। ख़ौफ़ को कायम रखने के लिए उन्हें हथियारों की ज़रूरत होती थी जो अमेरिका और योरप के देश देने के लिए हमेशा तैयार रहे, क्योंकि उन्हें बदले में मिस्त्र के तेल पर अपना हक़ चाहिए होता था। यह हाल पश्चिम एशिया और अफ्रीका के उन सभी देशों में लगभग एक से ही रहे जहाँ तेल था। इन देशों ने अपनी कोई तकनीक भी विकसित करने की कोई ज़्यादा कोशिशें नहीं कीं क्योंकि विदेशी कंपनियाँ आकर अपनी तकनीक के सहारे तेल निकाल लेती हैं।

क़मर आग़ा ने कहा कि पिछले तीनचार दशकों तक लोग दमनकारी और अन्यायपूर्ण नीतियाँ झेलते रहे लेकिन फिर उनका ग़ुस्सा फट पड़ा। लोगों के इस ग़ुस्से को आगे कोई सही दिशा देने वाली ताक़तें मिस्त्र में मजबूत हालत में न होने की वजह से उसका फ़ायदा अपने आप ही मुस्लिम ब्रदरहुड को मिल गया। मुस्लिम ब्रदरहुड 1928 में मिस्त्र में ही पैदा हुआ और इस्लाम का सहारा लेकर आसपास के सभी देशों में पनपता गया। क़मर आग़ा ने इसका अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया कि ऐसा क्यों हुआ कि जहाँ मिस्त्र के गमाल अब्देल नासेर को दुनिया में तरक्कीपसंद और सरमायादारी के विरोध की ताकत माना जाता था, वहाँ जब जनविद्रोह फूटा तो प्रगतिशील ताक़तें गैरमौजूद दिखीं और कट्टरपंथ को ब़ावा और शह देने वाले ब्रदरहुड संगठन आगे ब़े। उन्होंने कहा मिस्त्र व उस तरफ़ के बाकी मुल्कौं में प्रगतिशील राष्ट्रवाद और इस्लाम की दोनों धाराएँ साथसाथ चली हैं। इसीलिए मिस्त्र के शिक्षक तालीम देने के लिए अनेक दूसरे देशों में भी गए। लेकिन शीत युद्ध के ख़त्म होने के बाद से तानाशाह हुकूमतों के असर में ये तरक्क़ीपसंद ताक़तें कमज़ोर पड़ती गईं और मज़हबी और दक्षिणपंथी ताक़तें या तो हुकूमत की शह पाकर पनपीं या फिर वे अंडरग्राउण्ड हो गईं। मज़हब का साथ होने की वजह से उनका दानधर्म का और मज़हबी तालीम के मदरसों का एक संस्थागत ाँचा मौजूद रहने की वजह से वे भीतर ही भीतर काम करती रह सकीं। यही वजह है कि मिस्त्र में ट्रेड यूनियन का पुराना काम मौजूद होने के बावजूद हम वहाँ से नेतृत्व निकलता नहीं देख पाते। क़मर ने ये भी कहा कि जिन लोगों ने तहरीर चौक के आंदोलन की भूमिका सोची थी, वे विश्व सामाजिक मंच (वर्ल्ड सोशल फ़ोरम) के असर में थे और वे 21वीं सदी में अरब दुनिया में गाँधी को नये सिरे से परिभाषित करने जैसी परिकल्पना के साथ आगे ब़ रहे थे। उसकी एक वजह यह भी थी कि हुस्नी मुबारक की बेतहाशा मज़बूत और तानाशाह निजाम वाली फौज से हथियारबंद जंग का नतीजा जनता के खून के सैलाब में निकलेगा, इसका उन्हें अंदाजा था। इसलिए उन्होंने सोचा कि नाराज़ लोगों का पूरा हुजूम ही हुक्मरान के खिलाफ़ हो जाए। मुबारक़ के चालीस बरस के शासन को ख़त्म करके मुहम्मद मोर्सी को सत्ता सौंपी गई जिसे मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन प्राप्त था। और कोई सामने था ही नहीं। और जनता फिर से फौज को सत्ता नहीं सौंपना चाहती थी। फौज के भीतर के भ्रष्टाचार और फौजी तानाशाही को वे काफ़ी भुगत चुके थे। मुल्क एक दोराहे पर था और दोनों ही रास्ते उस मंज़िल से दूर ले जाने वाले रास्ते थे जिसकी तरफ़ जनता जाना चाह रही थी।

मिस्त्र में एक तरफ़ पुराने लोकतांत्रिक अधिकारों के आंदोलनों की यादें और प्रेरणाएँ हैं तो दूसरी तरफ़ मज़हब का भी यह आलम है कि वहाँ जो लिबरल भी हैं, वे भी धर्म के दायरे से बाहर नहीं हैं। क़मर आग़ा ने बताया कि तहरीर चौक पर जब आंदोलनकारी आंदोलन कर रहे थे तो वहाँ भी ज़ुमे की नमाज़ अता की जाती थी। नब्बे फ़ीसदी मुसलमान होने के बावजूद वहाँ इस्लाम के शासन की कोई प्रबल आकांक्षा नहीं है। एक ज़माने में वहाँ महिलाओं का आंदोलन भी इतना उभार पर था कि ख़ुद नेहरू ने 1930 में मिस्त्र को उद्धृत किया था। सोवियत संघ की मदद से वहाँ उद्योगों का भी अच्छा विस्तार हुआ और राज्य स्वामित्व वाला पब्लिक सेक्टर खड़ा हुआ और अभी तक भी वहाँ प्राइवेट सेक्टर ज़्यादा नहीं घुस सका। वहाँ के लोग जानते हैं कि राज्य का मज़हब पर आधारित मॉडल अब काम नहीं करेगा। अफ़ग़ानिस्तान या पाकिस्तान में भी नहीं किया। मुस्लिम ब्रदरहुड के ख़यालात से भी सभी वाकिफ़ हैं कि वे शासन में आने पर क़ुरान को संविधान का और शरीयत को क़ानून का दर्जा देना चाहते हैं। उनके मुताबिक आधुनिकता बेहद ख़राब चीज़ है और वो समाज को सामंती युग में ले जाना चाहते हैं। इसलिए जनता उन्हें भी शासन नहीं सौंपना चाहती। इसके बावजूद जब मुस्लिम ब्रदरहुड के नेता मुहम्मद मोर्सी को शासन सौंपा गया तो यह समझौता जनता और ब्रदरहुड के बीच था कि वे अपना धार्मिक एजेंडा जनता पर थोपने की कोशिश न करें। शुरू में तो ब्रदरहुड ने वाकई यह जताया कि उनकी दिलचस्पी लोकतंत्र में है न कि शासन या धार्मिक शासन में। लेकिन 2013 में कुछ कदम ऐसे उठाये गए कि जनता ने ख़तरे को भाँपते हुए मोर्सी को कुर्सी से उतार दिया। इस दफ़ा सेना ने वहाँ एक अहम भूमिका निभायी और सेना प्रमुख ने देश के एक प्रमुख राजनीतिक पद की कमान अपने हाथ में ले ली।

इस मसले को अमेरिका की मौजूदगी और भी उलझा देती है। अमेरिका एक तरफ़ मिस्त्र में अपनी और इज़रायल की पसंद के फौजी जनरल को सत्तासीन करना चाहता है वहीं दूसरी तरफ़ लोकतंत्र की दुहाई देकर सीरिया में बशरअल-असद की सरकार को गिराना चाहती है। सीरिया की बात उठने पर सभा में मौजूद मेनस्ट्रीम पत्रिका के संपादक सुमित चक्रवर्ती ने कहा कि सीरिया और मिस्त्र के मसले में ख़ास फ़क़र यह है कि मिस्त्र में अमेरिका अपनी पसंद की सरकार बनाने के लिए भीतरी गुटों को लड़ा रहा है जबकि सीरिया में वह ख़ुद फौजी कार्रवाई के लिए उतावला है। इन दोनों का अर्थ एक ही नहीं है। इस पर आगे इंस्टीट्यूट के शोध प्रभाग से जुड़ीं अर्थशास्त्री जया मेहता ने सवाल किया कि मिस्त्र में आबादी के जिस हिस्से ने तख़्तापलट को मुमकिन किया, उनकी अमेरिकी साम्राज्यवाद विरोधी भावनाएँ कितनी तीव्र हैं। जवाब में क़मर आग़ा ने कहा कि बेशक अमेरिकी साम्राज्यवाद को लोग समझते हैं लेकिन अब मिस्त्र में चीज़ें इतनी सरल नहीं रह गईं। जो अमेरिकी साम्राज्यवाद का विरोध भी करते हैं वे धार्मिक कट्टरपंथ को भी सत्ता सौंपेंगे तो भी ग़लत होगा। धार्मिक कट्टरपंथ को सउदी अरब से भी पैसा आता है लेकिन सउदी अरब अमेरिका के साथ खड़ा होता आया है। वैसे भी मुस्लिम ब्रदरहुड का भर मसला नहीं है, सउदी अरब सहित अन्य अनेक अरब देशों के अपने हित भी पूरे क्षेत्र में काम कर रहे हैं, इज़रायल और फ़िलिस्तीन का मसला भी है और हमास, लेबनान, हिज्बुल्लाह, अल क़ायदा की मौजूदगी और आपसी समीकरण किसी तरह की शांति कायम होने की राह में अड़चनें बनेंगे। केवल साम्राज्यवाद विरोध लोगों को आपस में जुड़ने के लिए शायद आज की स्थितियों में काफ़ी न हो।

उन्होंने कहा कि इन सभी वजहों से मिस्त्र में निकट भविष्य में किसी तरह की स्थिरता की उम्मीद की कोई बुनियाद नज़र नहीं आती। यह अस्थिरता केवल उत्तरी अफ्रीका या पश्चिम एशिया के देशों तक रुकेगी नहीं। बल्कि इसके असर अभी भी साफ़ नज़र आ रहे हैं। तेल के दाम बते जा रहे हैं और हमारी सरकार अमेरिका के पक्ष में खड़ी रहकर उन देशों के मामलों से अपने आपको पूरी तरह दूर रखे है जिनसे हमारा सीधा वास्ता और व्यापार बरसों से रहा है। अमेरिका को नाराज़ न करने की वजह से हम ईरान से तेल नहीं ख़रीदते हुए दूसरी जगहों से महँगा तेल ख़रीद रहे हैं और उसका असर हमारे देश की आबादी पर साफ़ देखा जा सकता है। हमारे लाखों लोग इन देशों में काम करते हैं। काफ़ी लंबे वक़्त से अरब देशों के साथ हमारा सजीव संबंध रहा है। उन्होंने दिलचस्प बात बतायी कि सन 1964 में पाकिस्तान द्वारा रेल मार्ग बंद कर दिये जाने के पहले तक दिल्ली से लाहौर, क्वेटा और बलूचिस्तान होकर 1012 रुपये में लोग ईरान से भारत और भारत से ईरान आतेजाते थे। आज भी भारतीय अनेक अरब देशों के समाज व अर्थव्यवस्था के भी उतने ही अहम किरदार हैं जितने हमारे लिए। हमारा 30 करोड़ डॉलर का कारोबार इन देशों के साथ है लेकिन हमारी सरकार झुकती है अमेरिका की तरफ़। इस पर दिल्ली साइंस फोरम के जय प्रकाश एन. डी. ने कहा कि भारत को इन आसन्न युद्धों से इतना ख़तरा है तब भी हमारी संसद में चले हालिया सत्र में किसी भी पार्टी ने यह मुद्दा नहीं उठाया कि सीरिया या मिस्त्र में चल रही उथलपुथल में हम क्यों अमेरिका के पीछे चल रहे हैं जबकि न तो वह सही है और न ही यह किसी भी तरह देश के हित में है। केवल कुछ पार्टियों ने बयान जारी किए जो मसले की गंभीरता को देखते हुए नाकाफ़ी हैं। इसी कड़ी में जेएनयू की शोध छात्रा साना ने मिस्त्र व अरब देशों में महिलाओं की स्थिति पर संक्षिप्त जानकारी दी। इंडियन स्टेटिस्टिकल इंस्टीट्यूट में अध्ययनरत सौम्या जैन ने भी अमेरिकी मंशाओं के पीछे की वजहें और तेल व गैस की राजनीति के अंतर्संबंध जानने के लिए कुछ सवाल उठाये। शांति एवं एकजुटता संगठन के प्रो. सी. सदाशिव ने इराक़ पर हुए पहले अमेरिकी हमले के वक़्त 1991 में देश में हुए युद्ध विरोधी प्रदर्शनों को याद करते हुए कहा कि अब इस तरह के सवालों पर जनता में से कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं आती है। इसके कारणों को समझते हुए इन सवालों पर जनता के भीतर नये तरह से काम की ज़रूरत है।

सभा की शुरुआत में जोशीअधिकारी इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रो. अजय पटनायक ने विषय पर रोशनी डालते हुए कहा कि दस करोड़ की आबादी वाले इतने बड़े मिस्त्र में जो राजनीतिक घटनाएँ घटित हुई हैं, वे दरअसल हमें बताती हैं कि मिस्त्र में जन असंतोष को दक्षिणपंथी ताक़तें अपने हक़ में इस्तेमाल कर रही हैं। इंस्टीट्यूट के सह निदेशक प्रो. सुबोध मालाकार ने संक्षेप में मिस्त्र के राजनीतिक इतिहास व सामाजिक संरचना के बारे में बातें रखीं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय सचिव कॉमरेड अमरजीत कौर ने भारत व अरब देशों के संबंधों, अमेरिका की दोहरी नीतियों और भारतीय शासक वर्ग की अमेरिकापरस्त नीतियों के बारे में अपनी बातें रखीं। आभार व्यक्त करते हुए जोशीअधिकारी इंस्टीट्यूट के विनीत तिवारी ने कहा कि सच्चे लोकतंत्र की स्थापना की आकांक्षा में जिन परिवर्तनकामी शक्तियों ने कोशिशें की हैं, उनका समर्थन आधार ब़ाना और भारत सरकार पर युद्ध विरोधी भूमिका अपनाने के लिए दबाव डालने के कार्यक्रम को तीव्र करना ऐसा काम है जो भारत में रह रहे सभी संवेदनशील लोगों को मिलजुलकर संगठित व सुनियोजित रूप से ब़ाना होगा।

-विनीत तिवारी

रविवार, 16 दिसंबर 2012

कूका विद्रोह और उसके नायक रामसिंह ........भगत सिंह

शहीद भगत सिंह ने राष्ट्र के स्वतंत्रता आन्दोलन के नायको के जीवन और उनके क्रांतिकारी  क्रिया कलाप , त्याग व बलदान पर श्रृखलाबद्ध लेख लिखा था | कूका विद्रोह और उसके महानायक राम सिंह पर उन्होंने दो लेख लिखे थे | पहला लेख फरवरी 1928 में उन्होंने बी . ए. सिधु के नाम से दिल्ली से प्रकाशित '' महारथी '' और दूसरा लेख अक्तूबर 1928 में विद्रोही के नाम से किरति '' नामक पत्रिका में लिखा था | एक और बात -- कूका विद्रोह के महानायक राम सिंह से देश के धर्मज्ञो और धर्म गुरुओं से लेकर नए पुराने धर्म के अनुयायियों को भी सीख  लेनी चाहिए और वह भी वर्तमान राष्ट्रीय व सामाजिक संदर्भो में | आज विदेशी शक्तिया पुन: देश के हर क्षेत्र में अधिकाधिक व आधिकारिक रूप से घुसपैठ करती जा रही है | इसके फलस्वरूप देश के बहुसंख्यक जनसाधारण का जीवन निरंतर तबाही व बर्बादी की दिशा में बढ़ता जा रहा है | इस दिशा में उसे विदेशी साम्राज्यी शक्तियों के अलावा देश के हर धर्म सम्प्रदाय के धनाढ्य व उच्च हिस्सों द्वारा ढकेला जा रहा है | इसीलिए वर्तमान दौर में कूका विद्रोह और गुरु राम सिंह के बारे में भगत सिंह का लेख  पढने के लिए ही नही पढ़ा जाना चाहिए , बल्कि उसे अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसे देशो और उनकी पूंजी तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के चंगुल से राष्ट्र व समाज की मुक्ति संघर्ष के लिए भी पढ़ा जाना चाहिए ............................
आज हम पंजाब के तख्ता पलटने के आन्दोलन और राजनितिक जागृति का इतिहास पाठको के सामने रख रहे है | पंजाब में सबसे पहली राजनितिक हलचल कूका आन्दोलन से शुरू होती है | वैसे तो वह आन्दोलन साम्प्रदायिक -- सा नजर आता है , लेकिन जरा गौर  से देखे तो वह बढा भारी राजनैतिक आन्दोलन था , जिसमे धर्म भी मिला था जिस तरह कि सिक्ख आन्दोलन में पहले धरम और राजनीति मिली -- जुली थी | खैर हम देखते है कि हमारी आपस की साम्प्रदायिक और तंगदिली का यही परिणाम निकलता है कि हम अपने बड़े -- बड़े महापुरुषों को इस तरह भूल जाते है जैसे कि वे हुए ही न हो | यही स्थिति हम हम अपने बड़े भारी महापुरुष '' गुरु राम सिंह के सम्बन्ध में देखते है | हम '' गुरु नही कह सकते और वे गुरु कहते है , इसीलिए हमारा उनसे कोई सम्बन्ध नही -- आदि बाते कहकर हमने उन्हें दूर फेंक रखा है | यही पंजाब का सबसे बड़ा घाटा है | बंगाल के जितने भी बड़े -- बड़े आदमी हुए है , उनकी हर साल बरसिया मनाई जाती  है , सभी अखबारों में उन पर लेख दिए जाते है , यह समझा जाता है कि मौक़ा मिला तो इस पर विचार करेंगे |
पंजाब को सोए थोड़े ही दिन हुए थे , लेकिन नीद बड़ी गहरी आई | हालाकि अब फिर होश आने लगा है | बड़ा भारी आन्दोलन  उठा | उसे दबाने की कोशिश की गयी | कुछ ईश्वर ने स्थिति भी ऐसी ही पैदा कर दी --- वह आन्दोलन भी कुचल दिया गया | उस आन्दोलन का नाम था'' कूका आन्दोलन'' | कुछ ध्रामिक , कुछ सामाजिक रंग -- रूप रखते हुए भी वह आन्दोलन एक तख्ता पलटने का नही , युग पलटने का था | चूकी अब इन सभी आंदोलनों का इतिहास यह बताता है कि आजादी के लिए लड़ने वाले लोगो का एक अलग ही वर्ग बन जाता है , जिनमे न दुनिया का मोह होता है और न पाखंडी साधुओ -- जैसा दुनिया का त्याग ही | जो सिपाही तो होते थे लेकिन भाड़े के लिए लड़ने वाले नही , बल्कि सिर्फ अपने फर्ज के लिए या किसी काम के लिए कहे , वे निष्काम भाव से लड़ते और मरते थे | सिक्ख इतिहास यही कुछ था | मराठो का आन्दोलन भी यही कुछ बताता है | राणा प्रताप के साथी राजपूत भी इसी तरह के योद्धा थे | बुन्देलखंड के वीर छत्रसाल के साथी भी ऐसे थे |
ऐसे ही लोगो का वर्ग पैदा करने वाले बाबा रामसिंह ने प्रचार और संगठन शुरू किया | बाबा रामसिंह का जन्म 1824 में लुधियाना जिले के भैणी गाँव में हुआ | आपका जन्म बढ़ई घराने में हुआ था | जवानी में महाराजा रणजीत सिंह की सेना में नौकरी की | ईश्वर  -- भक्ति अधिक होने से नौकरी -- चाकरी छोड़कर गाँव जा रहे | नाम का प्रचार शुरू  कर दिया |
1857 के गदर में जो जुल्म हुए वे सब देखकर और पंजाब की गद्दारी देखकर कुछ असर जरुर हुआ होगा | किस्सा यह है कि बाबा रामसिंह जी ने उपदेश शुरू करवा दिया | साथ -- साथ बताते गये कि फिरंगियों से पंजाब की मुक्ति जरूरी है | उन्होंने तब उस असहयोग का  प्रचार किया , जैसे वर्षो बाद 1920 में महात्मा गांधी ने किया | उनके कार्यक्रम में अंग्रेजी राज की शिक्षा , नौकरी अदालतों आदि का और विदेशी चीजो का बहिष्कार तो था ही , साथ में रेल और तार का भी बहिष्कार किया गया |
पहले -- पहले सिर्फ नाम का ही उपदेश होता था | हां यह जरुर कहा जाता था कि शराब -- मांस का प्रयोग बिलकुल बंद कर दिया जाए | लडकिया आदि बेचने जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी प्रचार होता था , लेकिन बाद में उनका प्रचार राजनितिक रंग में रंगता गया |
पंजाब सरकार के पुराने कागजो में एक स्वामी रामदास का जिक्र आता है , जिसे कि अंग्रेजी सरकार एक राजनितिक आदमी समझती थी और जिस पर निगाह रखी जाती थी |  1857 के
बाद जल्द ही उसके रूस की ओर जाने का पता चला है | बाद में कोई खबर नही मिलती | उसी आदमी के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उसने एक दिन बाबा रामसिंह से कहा कि अब पंजाब में राजनितिक कार्यक्रम और प्रचार की जरूरत है | इस समय देश को आजाद करवाना बहुत जरूरी है | तब से आपने स्पष्ट रूप से अपने उपदेश में इस असहयोग को शामिल कर लिया
1863 में पंजाब सरकार के मुख्य सचिव रहे टी .डी. फार्सिथ ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि 1863 में ही मैं समझ गया था कि यह धार्मिक -- सा आन्दोलन किसी दिन बड़ा गदर मचा देगा | इसीलिए मैंने भैणी के उस गुरुद्वारे में ज्यादा आदमियों का आना -- जाना और इकठ्ठे होना बन्द कर दिया | इस पर बाबा जी ने भी अपना काम का ढंग बदल लिया | पंजाब प्रांत को 22 जिलो में बाट लिया | प्रत्येक जिले में एक -- एक व्यक्ति प्रमुख नियुक्त किया गया , जिसे '' सूबा  '' कहा जाता था | अब उन्होंने '' सूबों '' में प्रचार और संगठन का काम शुरू किया | गुप्त तरीको से आजादी का भी प्रचार जारी रखा | संगठन बढ़ता गया , प्रत्येक नामधारी सिक्ख अपनी आय का दसवा हिस्सा अपने धर्म के लिए देने लगा | बाहर का हंगामा बंद हो जाने से सरकार का शक दूर हो गया और 1869 में सभी बंदिशे हटा ली गयी | बंदिशे हटते ही खूब जोश बढ़ा |
एक दिन कुछ कूके अमृतसर में से जा रहे थे | पता चला कि कुछ कसाई हिन्दुओं को तंग करने के लिए उनकी आँखों के सामने गोहत्या करते है | गाय के तो वे बड़े भक्त थे | रातो -- रात सभी कसाइयो को मार डाला गया और रास्ता पकड़ा | बहुत से हिन्दू पकडे गये | गुरु जी ने पूरी कहानी सुनी | सबको लौटा दिया कि निर्दोष व्यक्तियों को छुडाये और अपना अपराध स्वीकार करे | यही हुआ और वे लोग फांसी चढ़ गये | ऐसी ही कोई घटना फिरोजपुर जिले में भी हो गयी थी | फांसियो से जोश बढ़ गया | उस समय उन लोगो के सामने आदर्श था पंजाब में सिख -- राज स्थापित करना और गोरक्षा को वे अपना सबसे बढ़ा धर्म मानते थे | \इसी आदर्श की पूर्ति के लिए वे प्रत्यन करते रहे |
13 जनवरी  1872 को भैणी में माघी को मेला लगने वाला था | दूर -- दूर से लोग आ रहे थे | एक कूका मलेर कोटला से गुजर रहा था | एक मुसलमान से झगड़ा हो जाने से वे उसे पकड़कर कोतवाली में ले गये और उसे बहुत मारा पिटा व एक बैल की हत्या उसके सामने की गयी | वह बेचारा दुखी हुआ भैणी पंहुचा | वह जाकर उसने अपनी व्यथा सुनाई | लोगो को बहुत जोश आ गया | बदला लेने का विचार जोर पकड गया | जिस विद्रोह का भीतर -- भीतर प्रचार किया गया था , उसे कर देने का विचार जोर पकड़ने लगा , लेकिन अभी मनचाही तैयारी भी नही हुई थी | बाबा रामसिंह ऐसी स्थिति में क्या करते ? यदि उन्हें मना करते है तो वे मानते नही और यदि  उनका साथ देते है तो सारा किया -- धरा तबाह होता है | क्या करे ? आखिर जब 150 आदमी चल ही पड़े तो आपने पुलिस को खबर भेज दी कि यह व्यक्ति हंगामा कर रहे है और शायद कुछ खराबी करे मैं जिम्मेदार नही हूँ | ख्याल था कि हजारो आदमियों के संगठन में से सौ---- डेढ़ सौ आदमी मारे गये और बाकी संगठन बचा रहे तो यह कभी तो पूरी हो जायेगी और जल्द ही फिर पूरी तैयारी होने से विद्रोह हो सकेगा | लेकिन हम यह देखते है कि परिणाम से तय होता है कि तरीके जायज थे या नाजायज का सिद्धांत राजनीति के मैदान में प्राय: लागू होता है | अर्थात यदि सफलता मिल जाए तब तो चाल नेकनीयती से भरी और सोच -- समझकर चली गयी कहलाती है और यदि असफलता मिले तो बस फिर कुछ भी नही | नेताओं को बेवकूफ , बदनीयत आदि खिताब मिलते है | यही बात यहाँ हम देखते है | जो चाल बाबा रामसिंह ने अपने आन्दोलन से बचने के लिए चली , वह कयोंकि सफल नही हुई , इसीलिए अब कोई उन्हें कायर और बुजदिल कहता है और कोई बदनीयत व कमजोर बताता है | खैर
हम तो समझते है कि वह राजनीति के एक चाल थी | उन्होंने पुलिस को खबर कर दी ताकि वे कोई ऐसा इलाज कर ले जिससे कोई बड़ी खराबी पैदा न हो , लेकिन सरकार उनके इस भारी आन्दोलन से डरती थी और उसे पीस देने का अवसर खोज रही थी | उसने कोई ख़ास कार्यवाही न की और उन्हें मर्जी अनुसार जाने दिया |
लेकिन 11 जनवरी के पात्र में डिप्टी  कमिश्नर लुधियाना मि कावन कमिशनर को लिख भेजी कि रामसिंह ने उन लोगो से अपने सम्बन्ध न होने की बात जाहिर की है और उनके सम्बन्ध में हमे सावधान भी कर दिया है | खैर वे 150 नामधारी सिंह बड़े जोश -- खरोश में चल पड़े |
जब वे 150 व्यक्ति वह से बदला लेने के विचार से चल पड़े तो पुलिस को पहले से बताया जा चुका था , लेकिन सरकार ने कोई इंतजाम नही किया | क्यों ? कयोकी वे चाहते थे कि कोई छोटी -- मोटी गड़बड़ हो जाए , जिससे कि वे उस आन्दोलन को पीस दे | सो वह अब मिल गया | वे कूके वीर उस दिन तो पटियाला राज्य की सीमा पर एक गाँव रब्बो में पड़े रहे | अगले दिन भी वही टिके रहे | 14 जनवरी 1872 की शाम को उन्होंने मलोध के किले पर धावा बोल दिया | यह किला कुछ सिक्ख सरदारों का था , लेकिन इस पर हमला क्यों किया ? इस सम्बन्ध में डिस्ट्रिक गजेटियर में लिखा है कि उन्हें उम्मीद थी कि मलोध सरकार उनके विरोध की नेता बनेगी , लेकिन उन्होंने मना कर दिया और इन्होने हमला कर दिया | बहुत संभव है कि बाबा रामसिंह की बड़ी भारी तयारी में मलोध सरकार ने मदद देने का वादा किया हो , लेकिन जब उन्होंने देखा कि विद्रोह तो पहले से ही हो गया है और बाबा रामसिंह भी साथ नही है और पूरी संगत भी नही बुलाई गयी है तो उन्होंने मना कर दिया होगा | खैर! जो भो वह लड़ाई हुई | कुछ घोड़े हथियार और तोपे ले वे वह से चले गये | दोनों ओर के दो -- दो आदमी मारे गये और कुछ घायल हुए |
अगले दिन सवेरे 7 बजे वे मलेर कोटला  पंहुचे गये |
अंग्रेजी सरकार ने मलेर कोटला सरकार को पहले सूचित कर रखा था | उपर बड़ी तैयारिया की गयी थी | सेना हथियार लिए कड़ी थी लेकिन इन लोगो ने इतने बहादुरी से हमला किया कि सेना और पुलिस में कुछ वश न रहा | हमला कर वे शहर में घुस गये और जाकर महल पर हमला कर दिया | वह भी सेना उन्हें नही रोक पायी | वे जाकर खजाना लूटने की कोशिश करने लगे | लूट ही लिया जाता , लेकिन दुर्भाग्य से वे एक और दरवाजा तोड़ते रहे जिससे कि उनका बहुत -- सा समय नष्ट हो गया और भीतर से कुछ भी न मिला | उधर से सेना ने बड़े जोर से धावा बोल दिया | आखिर लड़ते -- लड़ते वहा  से लौटना पडा | उस लड़ाई में उन्होंने 8 सिपाही मारे और 15 को घायल हो गये | उनके सात आदमी मारे गये | वहा  से भी कुछ हथियार और घोड़े लेकर भाग निकले | आगे -- आगे वे और पीछे -- पीछे मलेर कोटला की सेना |
वे भागते जा रहे थे | और लड़ते जा रहे थे | उनके और कई आदमी घायल हो गये और वे उन्हें भी साथ ही उठा ले जाते थे | आखिर कार पटियाला राज्य के रुड गाँव में ये पहुंचे और जंगल में छिप गये | कुछ घंटो के बाद शिवपुर के नाजिम ने फिर हमला बोल दिया | लड़ाई छिड़ गयी पर बेचारे कूके थके -- हारे थे | आखिर 68 व्यक्ति पकड लिए गये | उनमे  से दो औरते थी , वे पटियाला राज को दे दी गयी |
अगले दिन मलेर कोटला लाकर तोप  गाड दी गयी और एक -- एक कर 50 कूके वीर तोप के आगे बाँध -- बंद कर उड़ा दिए गये | हरेक बहादूरी से अपनी -- अपनी बारी पर  तोप के आगे झुक जाता और सतत श्री अकाल कहता हुआ तोप से  उड जाता | फिर कुछ पता नही चलता कि वह किस संसार में चला गया | इस तरह 49 व्यक्ति उड़ा दिए गये | पचासवा एक तेरह साल का लड़का था | उसके पास झुकर डीपटी   कमिशनर ने कहा कि बेवकूफ रामसिंह का साथ छोड़ दे , तुम्हे माफ़ कर दिया जाएगा | लेकिन वह बालक यह बात सहन  नही कर सका और उछलकर उसने कावन की दाढ़ी पकड ली और तब तक नही छोड़ी जब तक उसके दोनों हाथ न काट दिए गये | बाकी 16 आदमी अगले दिन मलोध जाकर फांसी पर लटका दिए गये | उधर बाबा रामसिंह को उनके चार सूबों के साथ गिरफ्तार करके पहले इलाहाबाद और बाद में रंगून भेज दिया गया | यह गिरफ्तारी ( रेगुलेशन  ) 1818 के अनुसार हुई |
जब यह खबर देश में फैली तो और लोग बहुत हैरान हुए कि यह क्या बना | विद्रोह शुरू करके बाबा जी  ने हमे भी क्यों न बुलाया और सैकड़ो  लोग  घर -- बार छोड़कर भैणी की ओर चल पड़े | एक गिरोह जिसमे १७२ आदमी थी , कर्नल वायली से मिला | वह अधीक्षक था | उसने झट उन्हें भी गिरफ्तार करवा लिया | उनमे से 120 को तो घरो को लौटा दिया , लेकिन 50 ऐसे थे कि कोई घरबार नही था | वे सब सम्पत्ति आदि बेचकर लड़ने -- मरने के लिए तैयार थे | उन्हें जेल में डाल  दिया | इस तरह वह आन्दोलन दबा दिया गया और बाबा रामसिंह का पूरा यत्न निष्फल हो गया | बाद में देश में जितने कूके थे वे सभी एक तरह से नजरबंद कर दिए गये | उनकी हाजरी ली जाती थी | भैणी साहिब में आम लोग का आना -- जाना बंद कर दिया गया | ये बंदिशे 1920 में आकर हटाई गयी | यही पंजाब की आजादी  के लिए दी गयी सबसे  पहली कोशिश  का संक्षित इतिहास है |



प्रस्तुती
-सुनील दत्ता
पत्रकार

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

आर्थिक सुधारों के नरमेध यज्ञ

धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते हुए संघ परिवार को सत्ता से दूर रखने के घोषित लक्ष्य के साथ मायावती और मुलायम के अंबेडकरवादी और समाजवादीए अनुसूचितए पिछड़े व अल्पसंख्यक सांसदो के वोट से केंद्र सरकार को आर्थिक सुधारों के नरमेध यज्ञ में पूर्णाहुति देने का मौका मिल गया है। सुधारों की सुनामी आने वाली है। बार बार भूकंप और सुनामी के शिकार जापान की जनता तो फिरभी बच जाती हैए पर इस सुनामी से​बचना मुश्किल ही नहीं एनामुमकिन है। सारे वित्तीय कानून पास होने हैं। खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश के लिए फेमा में जरुरी संसोधन को संसद की हरी झंडी मिल गयी है।अब कर्मचारियों की बीमा और पेंशन को शेयर बाजार में डालने की पूरी तैयारी है। बैंकिंग को फिर पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों के हवाले करने के लिए बैंकिंग संशोधन कानून आने वाला है। पेंशन और बीमा संशोधन कानून पास होने के रास्ते में मायावती और मुलायम के रहते कोई अड़चन  नहीं आनेवाली। भूमि अधिग्रहण संशोधन कानून भी पारित होगा। कंपनी बिल और कंपिटीशन बिल के​साथ जीएसटी को पास कराया जायेगा।जिस धर्मनिरपेक्षता और कानून के शासन की डंका बजाते थकते नहीं राजनेताए उसका यह हाल है कि गुजरात नरसंहारए बाबरी विध्वंसए सिख जनसंहारए भोपाल गैस त्रासदी समेत तमाम बड़े  अपराधों के अभियुक्त भारतीय राजनीति के भाग्यविधाता बने हुए हैं और किसी को सजा नहीं होती। इनमें से प्रधानमंत्रित्व के दावेदार भी हैए जिनके साथ यही राजनेता सत्ता की मलाई खायेंगे। मानवाधिकारए नागरिकता और नागरिक अधिकारों के हनन के मामले में कुछ नहीं होता। मणिपुरए पूर्वोत्तर ए कश्मीर और देश के आदिवासी इलाके गवाह है। सत्ता और विपक्ष उग्रतम हिंदुत्व की राह पर है।किसे बचाकर किसे रोक रहे हैंघ् और क्योंघ्
बहुब्रांड खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ;एफडीआईद्ध के मुद्दे पर शुक्रवार को राज्यसभा में भी जीत दर्ज कराकर केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ;सम्प्रगद्ध सरकार ने इस मुद्दे पर अंतिम जंग जीत ली। लेकिन विपक्ष ने यह कहकर सरकार की इस जीत को खारिज कर दिया कि सदन की व्यापक भावना एफडीआई के खिलाफ थी। सरकार ने लोकसभा में दो दिन पहले ही इस मुद्दे पर हुए मतदान में जीत हासिल कर ली थी।कयास लगाया जा रहा था कि ऊपरी सदन में सरकार को इस मुद्दे पर हार का मुंह देखना पड़ सकता है। लेकिन समाजवादी पार्टी ;सपाद्ध और बहुजन समाज पार्टी ;बसपाद्ध की मदद से सरकार ने यहां भी आसानी से जीत हासिल कर ली। सपा ने जहां सदन से बहिर्गमन कर सरकार की मदद कीए वहीं बसपा ने सरकार के पक्ष में मतदान किया। रिटेल में एफडीआई पर संसद की मुहर लग जाने के बाद आर्थिक सुधारों का सिलसिला रफ्तार पकड़ सकता है। सरकार को उम्मीद है कि इस फैसले से देश में निवेश का महौल बनेगा और रिटेल के साथ.साथ दूसरे क्षेत्रों पर भी असर पड़ेगा। वैसे आर्थिक सुधार से जुड़े कुछ अहम बिलों को संसद से पास करवानाए सरकार के लिए अब भी चुनौती बना हुआ है।

मनमोहन सरकार के कमजोर होते जाने की डुगडुगी के बीच अचानक उसकी ताकत के गीत सुनाई देने लगे। डगमगाते आर्थिक हालात और लचर होते वित्तीय प्रबंधन को पटरी पर लाने की कोशिश में लगी सरकार को रिटेल में एफडीआई के फैसले पर संसद की मुहर लग जाने से बड़ी राहत मिली है।इस फैसले के बाद सरकार को फिलहाल 55 हजार करोड़ रुपये के निवेश की उम्मीद बंधी है। स्वीडन की फर्नीचर निर्माता कंपनी आइकिया का 10 हजार 500 करोड रुपये के निवेश का प्रस्ताव सरकार के पास है। हालांकि अब तक वॉलमार्टए टेस्को या सेल्सबरी जैसी कंपनियों की ओर से कोई प्रस्ताव नहीं आया है।
डायरेक्ट टैक्स कोड लागू हो गयाए अब जीएसटी की बारी है।बड़ी रिटेल कंपनियों के एकाधिकार के लिए यूनिफार्म लाइसेंसिंग प्रणाली भी आने वाली है। खुदरा कारोबार में विदेसी निवेशके निर्मय की राज्यों की स्वतंत्रता इस कानून से स्वतः खत्म हो जाएगा क्योंकि खुदरा कारोबार की लाइसेंसिंग का केंद्रीयकरण हो जायेगा।केंद्रीय बिक्री कर ;सीएसटीद्ध और वस्तु एवं सेवा कर ;जीएसटीद्ध की अंतिम डिजाइन से राज्यों को होने वाले राजस्व नुकसान की भरपाई के विवादास्पद मुद्दों को सुलझाने के लिए आज वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने दो उप समितियां बनाने की घोषणा की। ये दोनों समितियां तेजी से काम करेंगी और 31 दिसंबर तक अपनी रिपोर्ट सौंपेंगी। उसके बाद जीएसटी पर राज्यों के वित्त मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति सिफारिशों पर विचार.विमर्श करेगी।जीएसटी अप्रैल 2010 में पेश किया गया थाए लेकिन इसने कई अंतिम समय सीमा पार किया है। सीएसटी का संग्रह केंद्र सरकार करती है और इसका बंटवारा राज्यों में किया जाता है। जीएसटी लागू करने के पहले केंद्र व राज्य सरकारों के बीच अप्रैल 2007 में सहमति बनी थी कि सीएसटी को चरणबद्ध तरीके से 3 साल के भीतर खत्म किया जाएगा। इसके तहत पहले सीएसटी दरें घटाकर 3 प्रतिशत और उसके बाद 2 प्रतिशत की गईं। केंद्र सरकार ने पहले ही राज्यों को 2010.11 तक हुए नुकसान का मुआवजा दे दिया है। केंद्र सरकार ने जीएसटी लागू करने में हो रही देरी की अवधि का मुआवजा राज्यों को देने से इनकार कर दिया।
अब खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश सकी वजह से महज पांच करोड़ व्यापारी ही नहीं मारे जायेंगेए जिन २० करोड़ किसानों की दुहाई दे रहे हैं समाजवादी मुलायमए उनकी भी आफत आने वाली है। न सिर्फ भूमि अधिग्रहण कानून बदलेगाए बल्कि कंपनी कानून और प्रतियोगिता कानून के तहत प्रकृतिक संसाधनों​ की खुली लूट के चाक चौबंद बंदोबस्त के तहत जल जंगल जमीन आजीविका से बेदखली हर मायने में जायज हो जायेगी। जमीन के इस्तेमाल संबंधी कानून भी बदला जाना हैए जिससे बंधुआ खेती के जरिये किसानों से बाजार की जरुरत और मांग के मुताबिक वालमार्ट जैसी कंपनियां उपज पैदा कर सकेंगी। खाद्यसुरक्षा कानून बेमतलब हो जायेगा क्योकि बंधुआ खेती के कारण नकद फसलों की उपज के लिए मजबूर हो जायेंगे किसान और खाद्यान्न उत्पादन में किसी की दिलचस्पी नहीं होगी। चौबीसों घंटे महा किराना शापिंग माल खुला रखने के मकसद से श्रम कानून बदला जा रहा है।राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र गुडगांव के निकट मानेसर में मारुति सुजूकी इंडिया लिमिटेड में हुई हिंसा के बाद उद्योग जगत ने देश के 44 श्रम कानूनों में संशोधन की सरकार से मांग की है। पेंशन बिल पास होने से पहले ही भविष्यनिधि कंपनियां जमा करायेए इसके जिम्मेदारी ईपीएफ बोर्ड ने वापस कर दी है।कैबिनेट द्वारा मंजूर पेंशन निधि नियामक एवं विकास प्राधिकरण विधेयक में पेंशन क्षेत्र में विदेशी निवेश का प्रावधान है। बीमा कानून ;संशोधनद्ध विधेयक बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा 26 से बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने का प्रस्ताव करता है। पहले ही भविष्य निधि बाजार में डालने का फैसला हो चुका है।सुधारों की दूसरी लहर चलाते हुए सरकार ने पेंशन क्षेत्र को विदेशी निवेश के लिए खोलने का प्रस्ताव मंजूर किया। जीवन बीमा का प्रीमियम शेयर बाजार में डालकर नौ करोड़ ग्राहकों को चूना लगाया गया हैए अब विश्वस्तरीय बैंकों के लिए कारपोरेट घरानों व पूंजीपतियों को इजाजात के साथ ही स्टेट बैंक आफ इंडिया का बाजा बजना तय है।बैंकों पर फिर राष्ट्रीयकरण से पहले की तरह पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों का ही कब्जा होगा। पर्यावरण कानून और स्थानीय निकाय कानून बदलकर लंबित परियोजनाओं को चालू किया जायेगा। नकद सब्सिडी के बहाने जनवितरण प्रणाली खत्म होगी। सुधारों के लिए जरुरी और नागरिकों की खुफिया निगरानी के लिए उससे भी जरूरी बायोमैट्रिक नागरिकता कानून और आधार कार्ड कारपोरेट योजना से किस पैमाने पर बेदखली होगीए इसका अंदाज ही नहीं है। अंबेडकरवादीए समाजवादी और वामपंथी जिस सर्वहारा बहुजनसमाज की बात करते हैंए मनुस्मृति अनुशासन के तहत वह संपत्ति और समान अवसर के अधिकारों से फिर वंचित हो जायेगा।फिलहाल ख्तम हो जायेगी जनवितरणप्रमणाली। कैश सब्सिडी से बढ़ेगा उपभोक्ता बाजार क्योंकि इससे क्रयशक्ति विहीन वंचितों में नकदी का प्रवाह होगा और जाहिर है कि वे बुनियादी जरुरतों या उत्पादके कार्यों के बजाय इसे उपभोक्ता बाजार में खर्च करेंगे।उपभोक्ता बाजार को बढ़ावा देने के लिएए कच्चा माल की निकासी के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास तेज होगा। खुदरा बाजार में एकाधिरकार के लिए शहरी संरचना भी बदलेगी और इसके लिए भी कानून आ रहा है।
जानकार भी मानते हैं कि इस फैसले से अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक सकारात्मक संदेश जाएगा। आईसीआईसीआई की सीईओ चंदा कोचर के मुताबिक इससे निवेश का माहौल बनेगा। वैसे सरकार का इम्तिहान अभी खत्म नहीं हुआ है। शीतकालीन सत्र के बाकी बचे दिनों में आर्थिक नीतियों से जुड़े कई अहम विधेयकों को पारित करना सरकार की प्राथमिकता होगी।
पेंशनए बीमा और बैंकिंग क्षेत्र में सुधार से जुड़े 3 विधेयक संसद में लंबे समय से अटके पड़े हैं। भूमि अधिग्रहण विधेयक को कैबिनेट की मंजूरी का इंतजार है। राष्ट्रीय निवेश बोर्ड का प्रस्ताव भी कैबिनेट में अटका पड़ा है। हालांकि सरकार ने आंकड़े दुरुस्त कर लिए हैंए लेकिन विपक्ष इतनी आसानी से हार नहीं मानेगा। सीपीएम नेता सीताराम येचुरी कहते हैं कि इन विधेयकों पर पहले से ही विरोध रहा है आगे भी विरोध करेंगे।
पिछले दिनों जिस तरह से आर्थिक विकास दर और औद्योगिक विकास दर में गिरावट आईए उससे देश की साख को नुकसान पहुंचा है। ऐसे में देखना होगा कि क्या सरकार आर्थिक सुधारों को राजनीतिक एजेंडा बना पाती है या नहीं।
केंद्र सरकार ने अब ‌निर्णय कर लिया है कि वह आर्थिक सुधारों के बूते अपना बेड़ा पार लगायेगी। विरोधी एवं सहयोगी दलों की परवाह किये बगैर कांग्रेस ने एक के बाद एक आर्थिक सुधारों संबंधी महत्वपूर्ण निर्णय लेने शुरू कर दिये हैं। बाजार भी इन निर्णयों को सकारात्मक ढंग से ले रहा है। कहना होगा कि कुछ हद तक सकरार की रणनीति सफल भी रही है क्योंकि पिछले काफी लंबे अरसे से भ्रष्टाचार एवं अन्य मुद्दों पर घिरी सरकार दबाव में और निराश.‌शिथिल नजर आ रही थी। लेकिन इन धड़ाधड़ फैसलों से चर्चा का केंद्र बिंदू बदल गया है और विरोधी दलों को भी भ्रष्टाचार के बजाय पहले इन मुद्दों पर सरकार का विरोध करके अपनी उपस्थिति का अहसास कराना पड़ा रहा है। दूसरी बात यह है कि पिछले दिनों हुए जनआंदोलनों के बाद सरकार की स्थिति यह हो गई है कि उसके पास गंवाने को कुछ नहीं। लोकचर्चा कभी की है कि आने वाले चुनावों में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए के लिये रास्ता बेहद कठिन है। ऐसे में इन सुधारों के बूते ही सही हो सकता है साल भर में आर्थिक मोर्चे पर देश की हालत सुधरे तो जोड़तोड़ की राजनीति के वर्तमान दौर में कांग्रेस का बेड़ा पार भी हो जाए।
भविष्य निधि खातों में गड़बड़ी के मामलों में नियोक्ताओं के खिलाफ जांच करना और मुश्किल होगा। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन ;ईपीएफओद्ध ने ऐसे मामलों में जांच पर सात साल की सीमा लागू कर दी है।
केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त ;सीपीएफसीद्ध आरसी मिश्रा द्वारा अपने कार्यकाल के आखिरी दिन ;30 नवंबरद्ध जारी परिपत्र में मामले खोलने पर समय की सीमा लागू करने का निर्णय लिया गया है। इसका आशय उन प्रावधानों में बदलाव करना है जिनके बारे में नियोक्ता और प्रतिष्ठानों की शिकायत रही है कि इनका इस्तेमाल उन्हें परेशान करने के लिए किया जाता है। हालांकि परिपत्र से नाखुश मजदूर संगठनों ने इसे वापस करने के लिए सरकार पर दबाव डालने का फैसला किया है।
ईपीएफओ ने इसी के साथ श्रमिकों के हित में इसी परिपत्र में भविष्य निधि अंशदान की गणना हेतु ष्मूल वेतनष् को पुनर्परिभाषित किया गया है। इसमें कहा गया हैए ष्कर्मचारियों को सामान्यतरूए अनिवार्यतरू और समान रूप से भुगतान की जाने वाले सभी भत्तों को मूल वेतन माना जाएगा।ष् जांच के बारे में इस परिपत्र में कहा गया है कि नियोक्ताओं के खिलाफ भविष्य निधि खातों में गड़बड़ी के मामले में तभी जांच शुरू की जाएगी जबकि अनुपाल अधिकारियों के पास कार्रवाई और जांच योग्य सूचना पेश की जाएगी।
इसमें कहा गया कि नियोक्ताओं के लिए अनुपाल अधिकारियों की मदद के लिए अपने प्रतिष्ठान का पूरा इतिहास उपलब्ध कराना होगा। इसमें जो सूचना मुहैया करानी उनमें जमा राशि और कर्मचारियों की संख्या शामिल है। जांच शुरू करने की अवधि के बारे में इसमें कहा गया ष्ष्कोई भी जांच सात साल से ज्यादा समय तक नहीं चलेगीए अर्थात इसमें गड़बड़ी पिछले सात साल के अंतद की होनी चाहिए।ष्
केंद्र सरकार ने कहा कि एक से अधिक एलपीजी गैस कनेक्शन रखने वाले जिन उपभोक्ताओं ने इस महीने के अंत तक अपने ग्राहक को जानिए कनेक्शन जमा नहीं कराया है ए उन्हें सब्सिडी पर एलपीजी सिलेंडर नहीं मिलेंगे और उन्हें बाजार दर वसूल की जाएगी।
सरकारी खजाने पर बढ़ते बोझ से परेशान सरकार बजट में टैक्स में बढ़ोतरी का फैसला ले सकती है। सूत्रों के मुताबिक वित्त मंत्रालय टैक्स वसूली में बढ़ोतरी के लिए इसे एक ठोस विकल्प के तौर विचार कर रही है। आम लोगों पर टैक्स का बोझ मगरदूरसंचार क्षेत्र पर गठित मंत्रिसमूह ने चार सर्किलों में 1800 मेगाहर्ट्ज बैंड में स्पेक्ट्रम के लिए आधार मूल्य 30 प्रतिशत तक घटा दिया। इससे सरकारी खजाने में 6ए200 करोड़ रुपये आ सकते हैं।ये चार सर्किल दिल्लीए मुंबईए कर्नाटक और राजस्थान हैं। पिछले महीने हुई स्पेक्ट्रम नीलामी में इन चारों सर्किलों के लिये कोई बोली नहीं मिली।
            सूत्रों का कहना है कि अगले बजट में एक्साइज ड्यूटी में 2 फीसदी की बढ़ोतरी की संभावना है। साथ ही सर्विस टैक्स में भी 2 फीसदी की बढ़ोतरी पर विचार मुमकिन है। फूड प्रोसेसिंग की चुनिंदा मशीनों पर बेसिक कस्टम ड्‌यूटी में बढ़ोतरी मुमकिन है। फुटवियर समेत कुछ आइटम पर एक्साइज ड्यूटी में छूट की सीमा घटाने पर विचार किया जा रहा है।
दरअसल चुनावी साल में सरकार की तरफ से भारी खर्चे की संभावना है। वहीं सरकार के इनडायरेक्ट टैक्स कलेक्शन में करीब 35ए000 करोड़ रुपये की कमी आने की आशंका है जिस कारण ही टैक्स दरों में बढ़ोतरी संभव है। लेकिन टैक्स दरें बढ़ाने से औद्योगिक विकास पर उल्टा असर पड़ सकता है।
राज्यसभा में मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई के मुद्दे पर यूपीए सरकार की जीत हो गई है। यूपीए ने राज्यसभा में भी रिटेल एफडीआई वोटिंग में बहुमत हासिल किया। राज्यसभा में भी रिटेल एफडीआई के खिलाफ विपक्ष का प्रस्ताव गिर गया। विपक्ष के मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई के मुद्दे पर वोट कराने का प्रस्ताव 123 के मुकाबले 109 वोटों से गिर गया है।
         राज्यसभा में मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई के मुद्दे पर सरकार के पक्ष में 123 वोट पड़ेए जबकि विपक्ष को 109 वोट हासिल हुए। इससे पहले राज्यसभा में समाजवादी पार्टी के 9 सांसदों ने मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई के मुद्दे पर वोटिंग से पहले सदन से वॉकआउट कर लिया था। लिहाजा सरकार को राज्यसभा में बहुमत हासिल करने के लिए 118 वोटों की जरूरत थी।
मायावती के गुरुवार को ऐलान के बाद सरकार की जीत पक्की लग रही थी। बहुजन समाज पार्टी के 15 सांसदों के समर्थन से ही सरकार को 123 सांसदों का जरूरी आंकड़ा मिला है। हालांकि समाजवादी पार्टी ने लोकसभा की तरह राज्यसभा में भी वॉकआउट किया।
राज्यसभा में मिली जीत से सरकार खुश है। सरकार के मंत्रियों ने अपनी पीठ तो थपथपाई हीए साथ ही विपक्ष को भी धोने की कोशिश की। वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा का कहना है कि विपक्ष को लगता है कि हम अल्पमत हैं तो वो अविश्वास प्रस्ताव लाए। वहीं कांग्रेस की वरिष्ठ नेता अंबिका सोनी ने कहा कि सरकार की मेहनत का ही नतीजा रहा कि संसद में रिटेल एफडीआई पर बहुमत हासिल हो पाया है।
योजना आयोग के उपाध्यक्षए मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा है कि अब भी इकोनामी का रिवाइवल नहीं हुआ है। लेकिन ग्रोथ मौजूदा स्तरों से और नहीं गिरेगी।मोंटेक सिंह अहलूवालिया के मुताबिक अगले 6 महीने में जीडीपी विकास दर 5ण्5 फीसदी से ज्यादा रहने की उम्मीद है।
वहींए दूसरी ओर वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा है कि वित्त वर्ष 2013 में बाजार से अतिरिक्त पूंजी जुटाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
              रिजर्व बैंक के गवर्नर डीण् सुब्बाराव ने आने वाले दिनों में मौद्रिक नीति में नरमी के संकेत दिए। उन्होंने कहा कि आर्थिक वृद्धि में काफी नरमी आई है और मौद्रिक नीति की मध्य तिमाही और तिमाही समीक्षा में इस पर गौर किया जाएगा। सुब्बाराव ने आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड की बैठक में कहा कि आर्थिक वृद्धि निश्चित तौर पर कम हुई है। जीडीपी वृद्धि पिछले दो साल में 8ण्5 फीसद और 6ण्5 फीसद से 5ण्5 फीसद और 5ण्3 फीसद ;पिछली दो तिमाही मेंद्ध पर आ गई है। उन्होंने कहा कि आरबीआई में हम हमेशा वृद्धि और मुद्रास्फीति के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश करते हैं।
बैंक ऑफ अमेरिका मेरल लिंच ने सेंसेक्स के लिए लक्ष्य बढ़ा दिया है। बैंक ऑफ अमेरिका मेरल लिंच के मुताबिक मार्च के अंत तक सेंसेक्स 21750 तक चढ़ सकता है।
बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच को उम्मीद है कि साल 2013 में आर्थिक सुधारए ब्याज दरों में कटौती और कंपनियों की अच्छी आय से बाजार को सहारा मिलने वाला है। वित्त वर्ष 2014 में जीडीपी ग्रोथ 6ण्5 फीसदी रहने की उम्मीद है। आरबीआई की ओर से प्रमुख ब्याज दरों में 1.1ण्25 फीसदी की कटौती संभव है।
बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच ने डीएलएफए आईसीआईसीआई बैंकए मारुति सुजुकी और ल्यूपिन जैसे शेयरों में खरीदारी की सलाह दी है। साथ ही मिडकैप शेयरों में हैवेल्स इंडियाए मदरसन सूमीए यस बैंकए बीईएल और ग्लेनमार्क फार्मा जैसे शेयरों में खरीदारी की सलाह दी है। हालांकि एचयूएलए हीरो मोटोकॉर्प और एनटीपीसी के शेयरों में दबाव देखने को मिलेगा।

.-पलाश विश्वास

रविवार, 5 अगस्त 2012

खेल में अमेरिकी गुंडागर्दी

विकास कृष्ण


अमेरिकी साम्राज्यवाद का दबदबा दुनिया के हर क्षेत्र में हो गया है। स्तिथि यहाँ तक ख़राब हो गयी है कि लन्दन ओलम्पिक में जीते हुए खिलाडियों को हरा दिया जा रहा है और हारे हुए खिलाडियों को विजयी घोषित किया जा रहा है। जिसका परिणाम भारत को भी भुगतना पड़ा है। जिसके दो उदहारण आ चुके हैं लंदन ओलिंपिक, 2012 में भारत के साथ गुंडागर्दी हुई है। 69 किलोग्राम वर्ग में भारत के बॉक्सर विकास कृष्ण की अमेरिकी मुक्केबाज एरोल स्पेंस पर जीत के फैसले को बदलते हुए बाद में उन्हें हारा हुआ बता दिया।
शुक्रवार देर रात खेले गए मैच में पहले विकास को 13-11 से जीता हुआ बताया गया था। लेकिन मैच खत्म होने के कुछ घंटों बाद मैच का नतीजा पलटते हुए विकास को 15-13 से हारा हुआ बता दिया गया।
भारत के बॉक्सर सुमित सांगवान की हार पर कमेंटेटर ने कहा था कि यह दिनदहाड़े डकैती है। जब भारत ने उस फैसले को लेकर विरोध जताया तो कोई सुनवाई नहीं हुई। लेकिन ताज़ा मामले में अमेरिका की अपील को मानते हुए मैच के फैसले को पलट दिया।
इन उदाहरणों से यह साबित होता है कि अमेरिका अपनी साम्राज्यवादी ताकत का इस्तेमाल खेल के मैदान में भी कर रहा है पूरी दुनिया को अप्रत्यक्ष रूप से गुलाम बनाने का उसका यज्ञ जारी है। वह अपनी गुंडागर्दी के बल पर सब कुछ अपने हिसाब से करवाने का आदि हो चुका है और गुलाम मानसिकता वाले लोगों की मजबूरी है कि उसकी चापलूसी में लगे रहें यही उनका स्वभाव है।













सुमित सांगवान


सुमन
लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 4 जून 2012

कश्मीर आगे का रास्ता


कश्मीरी युवाओं से बातचीत में सदैव उनका दुःख और व्यथाए उनकी कुंठाएं और उनके गृह प्रदेश की क्रूर व्यवस्था के प्रति उनका गुस्सा साफ झलकता है। कश्मीरी युवा देश के अलग.अलग हिस्सों में विभिन्न कार्यक्रमों बैठकों इत्यादि में भाग लेने आते रहते हैं। उनसे चर्चा करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि वे कश्मीर से जुड़े मुद्दों को गहराई से समझते हैं। वे बिना किसी लाग.लपेट के उनकी वर्तमान की परेशानियां और भविष्य के बारे में आशंकाओं को जाहिर करते हैं। वे बैचेन पीड़ित और परेशान हैं। वे स्वयं को असहाय महसूस करते हैं।
कश्मीरी प्रश्न जो वे बार.बार पूछते हैं वह यह है कि उन्होंने ऐसा क्या किया है कि उन पर आतंकवादी होने का लेबिल चस्पा कर दिया गया है। क्या कारण है कि कश्मीरियों को भारतीय सेना सहित कई हथियारबंद समूहों के हाथों प्रताड़ना झेलनी पड़ती है युवाओं कश्मीर घाटी में अतिवादियों व भारतीय सेना.दोनों की कारगुजारियों से दुःखी व नाराज नजर आते हैं।
से युवा कुंठाग्रस्त क्यों हैं और उन्हें इस कुंठा और अवसाद से उबारने के लिए क्या किया जाना चाहिए हाल में ;मई 2012द्ध दिलीप पडगांवकर राधा कुमार और एम. एम. बातचीत के वार्ताकारों के समूह की सिफारिशें सार्वजनिक की गईं। सरकार ने अब तक इन सिफारिशों को मानने या न मानने के बारे में कुछ नहीं कहा है। भाजपा ने वार्ताकारों की रपट को एक सिरे से खारिज कर दिया है। उसका कहना है कि अगर रपट में की गई सिफारिशों को मंजूर किया जाता है तो इससे कश्मीर का भारत में विलय कमजोर हो जाएगा और कश्मीर को अत्यधिक स्वायत्ता प्राप्त हो जाएगी। दूसरी ओर अलगाववादियों का मत है कि रपट में सुझाए गए उपाय अपर्याप्त हैं और कश्मीर मुद्दे के राजनैतिक समाधान के रास्ते में बाधक बनेंगे। मूलतः वार्ताकारों के समूह ने कश्मीर के मामले में सन् 1953 से पूर्व की स्थिति की बहाली की मांग को खारिज किया है परन्तु कश्मीर को अधिक स्वायत्ता दिए जाने की वकालत की है। रपट में यह सिफारिश की गई है कि संसद कश्मीर के मामले में कोई कानून न बनाए जब तक कि वह आंतरिक या बाहरी सुरक्षा से जुड़ा न हो। रपट ने संविधान के अनुच्छेद 370 को श्अस्थायीश् के स्थान पर मैं दर्जा देने पर जोर दिया है। यह भाजपा जैसे अति राष्ट्रवादियों को मंजूर नहीं है। समूह की यह सिफारिश महत्वपूर्ण है कि राज्य के प्रशासनिक तंत्र में शनैः।शनैः इस तरह बदलाव लाया जाना चाहिए कि उसमें स्थानीय अधिकारियों का अनुपात बढ़े। रपट में ऐसे क्षेत्रीय निकायों के गठन की सिफारिश भी की गई है जिन्हें वित्तीय अधिकार प्राप्त होंगे। हुरियत और पाकिस्तान सदैव से बातचीत करने और नियंत्रण रेखा के आसपास तनाव घटाने की बात भी कही गई है।
साफ है कि वार्ताकारों के समूह ने पूरे मुद्दे का अत्यंत गहराई से अध्ययन किया है। कश्मीर में व्याप्त असंतोष को तो ध्यान में रखा ही गया हैए पिछले 60 सालों में मैदानी स्तर पर हुए परिवर्तनों को भी नजरअंदाज नहीं किया गया है। इस रपट के आधार पर कश्मीर में शांति की पुनर्स्थापना के सार्थक प्रयास किए जा सकते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि कश्मीर के नागरिकों के मानवाधिकारों का खुल्लम.खुल्ला उल्लंघन हुआ है और हो रहा है। भारत के साथ हुई विलय की संधि में कश्मीर को पूर्ण स्वायत्ता दी गई थी परंतु धीरे.धीरे साम्प्रदायिक ताकतों के दबाव में स्वायत्ता का घेरा छोटा और छोटा होता गया। शुरूआत से ही दक्षिणपंथी तत्वों.विशेषकर जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुकर्जी ने साम्प्रदायिक संगठनों के सहयोग से . कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय किए जाने की मांग को लेकर आंदोलन चलाया। इन लोगों का कहना था कि भारत और कश्मीर के बीच हुए समझौते के अन्तर्गत राज्य को दी गई स्वायत्ता को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। साम्प्रदायिक तत्वों के दबाव और उभरते हुए कथित भारतीय राष्ट्रवाद के कारण भारत सरकार लगातार कश्मीर की स्वायत्ता संबंधी प्रावधानों को कमजोर करती गई। इस प्रक्रिया का चरम था कश्मीर के प्रधानमंत्री का दर्जा घटाकर उसे मात्र मुख्यमंत्री का कर दिया जाना।
स्वतंत्रता के तुरंत बाद महात्मा गांधी की हत्या और अल्पसंख्यकों को आतंकित करने के प्रयासों ने शेख अब्दुल्ला का भारत से मोहभंग कर दिया और उन्होंने कश्मीर के संबंध में अन्य विकल्पों पर विचार करना प्रारंभ कर दिया। इसके तुरंत बाद उन्हें जेल में डाल दिया गया ओर वे 17 सालों तक जेल में रहे। इससे कश्मीरियों और विशेषकर युवा कश्मीरियों में भारत के प्रति अलगाव का भाव तेजी से उभरने लगा। दूसरी ओर पाकिस्तान कश्मीर में लगातार हस्तक्षेप करता रहा। पाकिस्तान ने असंतुष्ट कश्मीरी युवाओं और घाटी में सक्रिय अतिवादियों को सहायता और संरक्षण दिया और इससे कश्मीर समस्या और गंभीर हो गई। इस मामले में पाकिस्तान को अमरीका का पूरा समर्थन मिला। अमेरिका अपनी साम्राज्यवादी नीतियों के अन्तर्गत इस क्षेत्र पर दबदबा कायम करना चाहता था। कश्मीर रणीनीतिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण इलाका है और इसलिए अमेरिका ने कश्मीर समस्या के शांतिपूर्ण हल में हर संभव बाधा डाली।
सन् 1980 के दशक में स्थिति और बिगड़ गई। इसका कारण था अल्कायदा और उसके जैसे अन्य संगठनों की कश्मीर में घुसपैठ। उन्होंने इस क्षेत्रीय समस्या का साम्प्रदायिकीकरण कर दिया। कश्मीरियत के मुद्दे का स्थान काफिरों के विरूद्ध जेहाद के नारे ने ले लिया। अल्कायदा के लड़ाके अमेरिका द्वारा स्थापित मदरसों में प्रशिक्षित थे जहां उनके दिमागों में जेहाद और काफिर जैसे शब्दों का तोड़ा.मरोड़ा गया अर्थ भर दिया गया था। जैसे.जैसे घाटी में आतंकवाद बढ़ता गया वहां के नागरिकों के प्रजातांत्रिक अधिकारों का दमन भी बढ़ता गया और अंततः कश्मीर की सरकार का दर्जा नगरपालिका के बराबर कर दिया गया। बड़ी संख्या में भारतीय सैनिकों को अतिवादियों से मुकाबला करने के लिए घाटी में भेजा गया और इससे समस्या और गंभीर हो गई। सेना बाहरी शत्रुओं से लड़ने के लिए प्रशिक्षित होती है और नागरिक क्षेत्रों में लंबे समय तक उसकी तैनाती से कई समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। सेना ने मुस्लिम युवकों को शारीरिक यंत्रणा देने के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। सेना ने घाटी में जमकर मनमानी की और वहां की सैकड़ों विधवाएं और अर्ध.विधवाएं ;जिनके पति लापता हैंद्ध सेना के कुकृत्यों का सुबूत हैं। कश्मीर के हर युवक को संदेह की नजर से देखा जाने लगा और इससे हजारों युवाओं का जीवन बर्बाद हो गया। कश्मीर मुद्दे के उनकी के कारण कश्मीरी पंडित स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगे और तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन की शह पर लाखों की संख्या में घाटी से पलायन कर गए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बंदूकों.चाहे वे किसी के भी हाथों में रही हों.से डरकर बड़ी संख्या में मुसलमानों ने भी घाटी से पलायन किया।
कुंठाएं कश्मीर में सामान्य स्थिति की बहाली में सबसे बड़ा रोड़ा है नागरिक इलाकों को सेना की बैरकों में बदल दिया जाना। पूरे राज्य में नागरिक प्रशासन तंत्र पर सेना हावी है। दूसरी ओर शेष भारत में साम्प्रदायिक तत्वों ने इसे हिन्दू.मुस्लिम संघर्ष का रूप दे दिया। शुद्ध रूप से नस्ल और क्षेत्र से जुड़े इस मुद्दे को धर्म के चश्मे से देखा जाने लगा। इससे मुसलमानों की मुसीबतें और बढ़ीं। आज कश्मीर में शांति की स्थापना के लिए कई कदम उठाए जाने जरूरी हैं। सबसे पहले तो घाटी में सेना की मौजूदगी को कम किया जाना चाहिए और इसके साथ ही असंतुष्ट कश्मीरियों और पाकिस्तान से बातचीत की जानी चाहिए। भारत और पाकिस्तान कश्मीर को केवल जमीन के एक टुकड़े के रूप में देख रहे हैं। कश्मीर को एक कीमती जायजाद की तरह देखने की बजाए कश्मीर के नागरिकों की समस्याओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वार्ताकारों के समूह की सिफारिशों पर कोई भी बहस या चर्चा इस प्रश्न पर केन्द्रित होनी चाहिए की क्या इन सिफारिशों को अमल में लाने से सभी कश्मीरियों और विशेषकर युवाओं की दुःख.तकलीफों में कमी आएगी या नहीं कश्मीरी युवाओं की दो पीढ़ियों ने अतिवादियों और सेना दोनों की ओर से परेशानियां व दुःख झेले हैं। अमेरिका और पाकिस्तान की सांठ.गांठ ने भी कश्मीर समस्या की गंभीरता में बढ़ोत्तरी की है। वार्ताकारों की रपट पर स्वस्थ बहस से कश्मीर में शान्ति की पुनर्स्थापना की राह प्रशस्त हो सकती है।
-राम पुनियानी
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