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रविवार, 22 मार्च 2015

‘लक्षित आक्रमण’ से पैदा होता अविश्वास का वातावरण

  धर्मनिरपेक्षता तथा सहिष्णुता से लिए दुनिया में अपनी अलग पहचान रखने वाला हमारा देश भारतवर्ष इन दिनों अल्पसंख्यक  समुदाय विशेष·कर ईसाई समुदाय से  चर्च,मिशनरी स्कूलों तथा नन आदि पर होने वाले लक्षितआक्रमण को लेकर एक  बार फिर चर्चा में है। हालांकि देश मेें ऐसे धर्मस्थलों पर होने वाले हमलों का  इतिहास कोई नया नहीं है। परंतु इस बात से भी इंकार नहीं किया  जा सकता कि देश में नरेंद्र मोदी सरकार के  सत्ता में आने के  बाद दक्षिणपंथी उग्र विचारधारा रखने वाली शक्तियों के  हौसले काफ़ी बढ़ गए हैं। और शायद यही वजह है कि केवल राजधानी दिल्ली में दिसंबर 2014 सेलेकर अब तक  ऐसे 6 हादसे घटित हो चुके  हैं जिनमें विभिन्न चर्चों व कान्वेंट स्कूलों पर हमले किए गए। पहला हादसा दिसंबर में सेंट सिबेसटियन चर्च, दिलशाद गार्डन में घटित हुआ जिसमें आसामाजिक तत्वों द्वारा चर्च में तोड़फोड़ की गई। केंद्रीय गृहमंत्रालय ने इस हादसे की जांच के लिए एसआईटी भी गठित की  है। दूसरी घटना इसके  बाद जसेला क्षेत्र में हुई जिसमें एक चर्च पर पत्थरबाज़ी की गई। तीसरी घटना में रोहिणी के  एक  चर्च में क्रिसमस  का  पालना जला दिया गया। इसी प्रकार विकासपुरी में कुछ लोगों द्वारा एक चर्च पर आक्रमण किया गया तथा तोड़फोड़की गई। इसके पश्चात वसंतकुंज के  एक चर्च में तोड़फोड़ व हमला किए जाने का  समाचार आया। और अभी ताज़ातरीन घटना में वसंतकुंज  के एक ईसाई  स्कूल में भी अवांछित तत्वों द्वारा लूटपाट की घटना अंजाम दी गई है। हालांकि इनमें से कई घटनाओं को दिल्ली पुलिस सांप्रदायिकतापूर्ण अथवा लक्षित हिंसा के दृष्टिकोण से नहीं देखना चाह रही है। परंतु कुछ ही समय के अंतराल में एक ही समुदाय के धर्मस्थलों व  स्कूल पर होने वाली इस प्रकार की घटनाओं ने अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय के लोगों के दिलों में भय व दहशत का माहौल ज़रूर पैदा कर दिया है। दिल्ली में ईसाई धर्मस्थलों पर हुए हमलों के विरोध में ईसाई समुदाय के लोगों को गुहमंत्री राजनाथ सिंह के  निवास पर प्रदर्शन तक  करना पड़ा है।

                उपरोक्त घटनाओं की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने भी पिछले दिनों अपने एक सार्वजनिक संबोधन में इन्हीं घटनाओं के परिपेक्ष्य में देश के अल्पसं यकों को पूर्ण सुरक्षा का भरोसा भी दिलाया। इसके अतिरिक्त भाजपा शासित राज्य हरियाणा के हिसार में एक निर्माणधीन चर्च को कुछ उपद्रवियों द्वारा गिरा दिया गया तथा कथित रूप से इसमें हनुमानजी की मूर्ति  उग्र भीड़ द्वारा स्थापित कर दी गई। ऐसे ही एक लक्षित  आक्रमण में पश्चिम बंगाल -में कोलकाता से मात्र 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित रानाघाट टाऊन में गत् 14 मार्च को एक 72 वर्षीय नन के साथ कुछ लोगों द्वारा सामूहिक बलात्कार किया गया। कान्वेंट स्कूल में काम ·रने वाली इस नन ने हालांकि अपराधियों को सार्वजनिक रूप से माफ किए जानेकी घोषणा तो ज़रूर कर दी है परंतु पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने अपराधियों की गिरफ़तारी हेतु तथा मामले  की   तह तक जाने के लिए इस घटना को सीबीआई के  सुपुर्द कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हरियाणा व पश्चिम बंगाल में घटी इन दोनों घटनाओं पर संज्ञान लेते हुए घटनाओं  की रिपोर्ट तलब की  है। दूसरी ओर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने हिसार की घटना के पीछे ईसाई समुदाय द्वारा धर्म परिवर्तन कराए जाने के चलते लोगों के आक्रोशित होने का  अंदेशा जताया है। वहीं विश्व हिंदू परिषद के कुछ जिम्मेदार नेता भी  आक्रमणकारियों का बचाव करते दिखाई दे रहे हैं। हद तो यह है कि विश्व हिंदू परिषद के एक नेता ने 72 वर्षीय नन के साथ हुई बलात्कार की घटना को  भी ईसाई संस्क्रतिका एक  हिस्सा बताकर अपराध की गंभीरता को ·मकरने की कोशिश की  है। सवाल यह है कि अल्पसं यक समुदायके प्रति होने वाले इस प्रकारके दुरव्यहार,उनके  विरुद्ध होने वाली आपत्तिजनक बयानबाजि़यां,धर्मस्थलों व उनकी शिक्षण संस्थाओं पर होने वाले हमले आखिर क्या संकेत दे रहे हैं? ऐसी शक्तियों के  हौसले आखिर ऐसी शक्तियों के  हौसले आखिर नेरंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद ही  क्योंकर बुलंद हो गए हैं? और क्या वर्ग विशेष के लोगों में भय तथा अविश्वास की भावना पैदा होना या इसका बढ़ना देशकी प्रगति तथा विकास अथवा इसकीअंतर्राष्ट्रीय छवि के लिए हानिकारक नहीं है?

                जूलियो रिबैरो भारतीय पुलिससेवा का  एक  ऐसा वरिष्ठतम नाम है जिनकी सेवाओं के लिए राष्ट्र हमेशा उनका कृतग रहेगा। उन्होंने मुंबई पुलिस कमिश्रनर के रूप में अपनी सेवाएं दीं। पंजाब तथा गुजरात में भी वे पुलिस महानिदेशक रहे तथा उनके बेहतरीन सेवा रिकार्ड व बेदाग छवि के मद्देनज़र उन्हें रोमानिया का राजदूत भी नियुक्तकिया गया। इस समय श्री रिबेरो 86 वर्ष की आयु के हो चुके हैं। गत् दिनों देश के एक प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी दैनिक में उन्हें एक लेख लिख·र अपनी पीड़ा को सार्वजनिक करने के लिए मजबूर होना पड़ा। वे देश में लगातार बढ़ रहे ऐसे लक्षित आक्रमण व हिंसा की  घटनाओं से   चिंतित हैं कि वे स्वयं को अपने ही देश में एक परदेसी सा महसूस करने लगे हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह सारी घटनाएं हिंदू दक्षिण पंथियों द्वारा अंजाम दी जा रही हैं जो बेहद खतरनाक हैं। उन्होंने पाकिस्तान में जनरल जि़या उल हक के शासनकाल के बाद पाकिस्तान के   बिगड़े हालात का उदाहरण देते हुए कहा है कि जिस प्रकार पाकिस्तान आज इतने बुरे दौर से इन्हीें सांप्रदायिकता पूर्ण विचारों के चलते पहुंच गया है वैसी स्थिति हमारे देश में पैदा नहीं होनी चाहिए। उनका भी यही मानना है कि पिछले 9 महीने से इस प्रकार की घटनाओं में तेज़ी से इज़ाफा हुआ है तथा सांप्रदायिक शक्तियों का सशक्तीकरण हुआ है। आखिर देश के इतने जि़म्मेदार तथा दबंग व बेदाग छवि के पुलि अधिकारी द्वारा जिसकी अपनीकई पुश्तें भारत में ही पैदा हुईं,पलीं-बढ़ी तथा देश की सेवा करती रहीं उन्हें स्वयं को  परदेसी समझने के ज़रूरत  आखिर क्यों महसूस हुई? क्या यह हमारे देश के लिए,यहां की शासन व्यवस्था,सरकार तथा संविधान के लिए यह चिंता का विषय नहीं है? क्या ऐसे लोगों ·ी व्यथा दृुनिया में देश का  सिर झुकाने के लिए काफी नहीं है?

                   ईसाईयों अथवा उनके धर्मस्थलों पर होने वाले हमलों अथवा उनके साथ किए जा रहे बलात्कार अथवा अन्य हिंसक घटनाओं को यह कहकर कतई जायज़ नहीं ठहराया जा सकता कि यह उस समुदाय के लोग हैं जो धर्म परिवर्तन कराते रहते हैं। हां इस विषय को  उछालकर तथा उन पर यह आरोप मढ़कर राजनीति ज़रूर की जा सकती है। गुजरात,छत्तीसगढ़ तथा मध्यप्रदेश जैसे भाजपा शासित राज्यों में ही जा·र यह बखूबी देखा जा सकता है कि दूर-दराज़  के क्षेत्रों में जहां आदिवासी व जनजातीय समुदाय के लोग रहते हैं तथा जहां सरकार की ओर से सुविधायुक्त अस्पताल तथा पाठशालाओं की व्यवस्था नहीं हो सकी  है वहां ईसाई मिशनरीज़ द्वारा स्वास्थय केंद्र भी खोले गए हैं तथा स्कूल भी संचालित किए जा रहे हैं। ज़रा सोचिए कि एक बीमार व्यक्ति अपने इलाज हेतु क्या किसी ईसाई स्वास्थय केंद्र पर जाने से इंकार ·रेगा जबकि वहां सरकार अथवा उसके अपने धर्म की ओर से कोई दूसरा सवास्थयकेंद्रर संचालित न किया जा रहा हो? यही हाल शिक्षा का भी है। जहां सरकारी स्कूल नहीं है वहां ईसाईयों ने मिशनरीज़ द्वारा संचालि स्कूल खोल रखे हैं। अब यदि धर्म परिवर्त रोकना है तो सर्वप्रथम उन कारणों की तलाश की जानी चाहिए जिसके चलते दूसरे समाज के लोग ईसाई समुदाय की ओर आकर्षित होने के लिए मजबूर होते हैं। असमानता व ऊंच-नीच व जात-पात की भावना भी इनमें एक महत्वपूर्ण कारण है। अभी इसी वर्ष जनवरी के दूसरे सप्ताह में बिहार के सारण व गया जि़लों में 1700 हिंदू,दलित व महादलित समुदाय के लोगों द्वारा बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया गया। इनमें बारह सौ लोग सारण जि़ले के बैंकथपुर व कुदारबाघा गांव के थे जबकि पांच सौ लोगों गया में बौद्ध धर्म अपनाया। इन लोगों का     कहना था कि उन्हें रोज़मर्रा में जीवन में सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ रहा था। और उन्होंने बौद्ध धर्म इसलिए अपनाया कि इसमें एकता पर ज़ोर दिया जाता है तथा वहां आपस में भेदभाव का कोई स्थान नहीं है।

                   बाबा साहब भीमराव अंबेडकर से लेकर अब तक लाखों लोग भारतवर्ष में बौद्ध धर्म अपना चुके हैं। बौद्ध धर्म के धर्मगुरुओं द्वारा तो किसी प्रकार की लालच दिए जानेकी भी कोई खबर नहीं आती। ऐसे में क्या बौद्धधर्म सथलों पर या उनके शिक्षण संस्थानों पर आक्रमणकर दिया जाना चाहिए? या फिर इस समुदाय के लोगों के साथ भी हिंसा से पेश आना चाहिए? या फिर इनके लिए भी कथित घरवापसी की मुहिम छेड़े जाने की ज़रूरत है? दरअसल नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के  बाद सांप्रदायिकतावादी सोच रखने वाले संगठनों तथा इनके नेताओं के हौसले सातवें आसमान पर पहुंच गए हैं। कोई गांधीजी को अपमानित कर रहा है तो कोई गोडसे की  मूर्ति स्थापित करने पर तुला है। कोई घर वापसी के मिशन में लगा हुआ है तो कहीं हिंदुओं कोई जनसंख्या कम होने का भय दिखाया जा रहा है। कोई भाजपा नेता मस्जिदों को तोड़े जाने को जायज़ ठहरा रहा है तो कोई  देश को हिंदू राष्ट्र घोषित किए बैठा है।कई सांसद ऐसे हैं जो सार्वजन· रूप से धर्म विशेष के लोगों को अपमानित ·रते व उनके विरुद्ध ज़हर उगलते देखे जा रहे हैं। और यही हालात ऐसे है जिनकी वजह से गणतंत्र दिवस पर भारत पधारे अमेरिकी राष्ट्र्रपति बराक ओबामा को एकता व धार्मिक सहिष्णुताका पाठ पढ़ाना पड़ा। संभव है कि ऐसी परिसिथतियां चंद सांप्रदायिकतावादी लोगों केलिए संतोष अथवा प्रसन्नता का कारण बनती हों अथवा इस प्रकार होने वाले धु्रवीकरण का लाभ उन्हें सत्ता के रूप में मिल जाता हो। परंतु इस प्रकार के हालात देश की अंतराष्ट्रीय छवि तथा भारत की धर्मनिरपेक्ष वैश्विक पहचान पर धब्बा ज़रूर हैं। -तनवीर जाफरी

शनिवार, 5 अक्टूबर 2013

डॉलर की गुंडागर्दी ख़त्म करो

 अमेरिका में विपक्ष के विरोध के कारण अमेरिकी बजट पास नही हो पाया और वहां आवश्यक कर्मचारियों को छोड़ कर काम बंदी चल रही है। यह अमेरिकी बहाना हो सकता है जबकि वास्तविकता यह है कि वह पूरी तरीके से दिवालिया हो चुका है। बैंक, बीमा कम्पनियाँ पहले से ही दिवालिया चल रही हैं। युद्ध उद्योग के कारण उसकी मुद्रा डॉलर दुनिया में राज कर रही है अब जरूरत है भारत, रूस, चीन, ईरान सहित मजबूत देशों को डॉलर की उपयोगिता को समाप्त करें और आपस में सारा व्यापार अपनी अपनी मुद्रा में करें। अमेरिका की शोषणकारी और सम्राज्यवादी प्रवित्तियों से मुक्त हों। 
अमेरिका वित्तीय संस्थानों, बैंक, कॉर्पोरेशंस और विदेशी संस्थानों से कर्ज लेता है। इस पर वह ब्याज भी अदा करता है। जिन प्रमुख देशों के बैंकों, वित्तीय संस्थानों या विदेशी निवेशकों से वह कर्ज लेता है, उनमें प्रमुख रूप से हॉन्ग कॉन्ग, चीन, बेल्जियम, लक्जमबर्ग और ताइवान शामिल हैं। जरूरत पडऩे पर अमेरिका स्विस बैंक से भी कर्ज लेता है। आज वह कर्ज अदा करने की स्तिथि में नहीं है। 
साम्राज्यवादी शक्तियों के चंगुल से निकलने का सही समय यही है और मानवता को बचाए रखने के लिए अपने-अपने मुल्कों की जनता का शोषण रोकने के लिए डॉलर की दादागिरी ख़त्म करना आवश्यक है।  हम अमेरिका से कोई ऐसी वस्तु आयात नहीं करते हैं कि जिसके बगैर हमारा काम न चल सके और यह समस्त चीजें दुनिया के दुसरे देशों से भी लिया जा सकता है।  अमेरिका कभी भी हमारा स्वाभाविक मित्र ही नही हो सकता उसकी अर्थव्यवस्था लूट और गुंडागर्दी के ऊपर ही आधारित है और जब उनका विलाप प्रारंभ हुआ है।          
नेशनल इंटेलिजेंस के निदेशक क्लैपर ने रुवासे अंदाज में कहा कि यह केवल वॉशिंगटन का राजनीतिक मसला भर नहीं है बल्कि "इसकी वजह से हमारी अमरीकी सेनाओं, कूटनीतिज्ञों और नीति निर्माताओं की मदद करने की ताकत भी प्रभावित होती है. और इस तरह के हालात में हर बीतते दिन के साथ यह ख़तरा बढ़ रहा है."
क्लैपर ने कहा कि कर्मचारियों को वेतन ना देना, जबरन छुट्टी पर भेजना उन्हें आर्थिक दिक्कतों में डालता है और यह विदेशी गुप्तचर संस्थाओं के लिए बेहद मुफ़ीद है। यह विदेशी गुप्तचर संस्थाओं के लिए सपने सच होने जैसा है."
वहीँ, अमरीका की तकनीकी गुप्तचर संस्था के निदेशक जनरल कीथ एलेक्जैंडर ने कहा की उनकी संस्था ने हजारों गणितज्ञों और कंप्यूटर विशेषज्ञों को छुट्टी पर भेज दिया है जिसका उन्हें वेतन नहीं मिलेगा.
            आज जब अमेरिकी जो पूरी दुनिया में कत्लेआम करते हुए नजर आ रहे था, वह छाती पीट कर रो रहा है।  चापलूस मुल्क उनके आंसू कब तक पोछेंगे। आंसू उनके बंद नहीं हो सकते हैं चाहे तीसरी दुनिया के सारे नागरिकों का क़त्ल करके समस्त संपत्ति दे दी जाए।  अमेरिका ने सिर्फ इंसानों का कत्लेआम ही किया चाहे वह इराक हो, लीबिया हो, सीरिया हो, अफ्गानिस्तान हो।  वहीँ जो उसके साथ रहा उसकी स्तिथि सोमालिया जैसी कर दी कि जहाँ आज समुद्री डाकुओं को छोड़ कर कुछ बचा नहीं है।  इसीलिए ओबामा अपने कुनबे के साथ अमेरिका में विलाप कर रहे हैं और उनके सारे दौरे रद्द हो गए हैं।  

सुमन 

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

अमरीका में वाल स्ट्रीट कब्जा करो आंदोलन स्वर्ण किले पर दावेदारी भाग 2


इस प्रदर्शन के प्रति पुलिस का रवैया काफी कड़ा है। अब तक हजारों लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। सैकड़ों लोग पुलिस के बल प्रयोग से बुरी तरह घायल हुए हैं। इस अभियान में शामिल प्रदर्शनकारी महिलाओं के खिलाफ पुलिस अत्यंत हिंसक और यौन उत्पीड़क व्यवहार कर रही है। यह अमरीका में अपने ही लोगों के खिलाफ किए जा रहे व्यवहार का भिन्न तरह का नमूना है, जो बताता है कि वहाँ की राजसत्ता किस तरह अपना नकाब उतार कर फेंक चुकी है। अमरीका में चल रहा आंदोलन यूरोप में चल रहे मजदूर आंदोलन का विस्तारित रूप है। यह ऊपर से देखने पर अरब में उभरकर आए जनांदोलन जैसा दिख सकता है। यह रूप की समानता भले ही हो, पर अंतर्वस्तु में एकदम भिन्न है। यह आंदोलन एक भिन्न देश व सन्दर्भ में उभरकर आया है। जिसकी काफी हद तक समानता यूरोप में उठ रहे असंतोष, मजदूर व आम लोगों के द्वारा किए जा रहे हड़ताल प्रदर्शन के साथ है। दरअसल यह पूँजी के साम्राज्य का उतरता हुआ आवरण है, जो बुरी तरह झीना हो चुका है। बमुश्किल चार साल पहले- 2008 में मंदी की मार से एशियाई व यूरोपीय देश बुरी तरह तबाह थे। उस समय यह दावा किया गया कि मंदी खत्म हो चुका है और पूँजीवादी अर्थव्यवस्था एक बार फिर पटरी पर है। पर न तो उस समय मंदी की मार खत्म हुई और न ही उससे निपटने के शिगूफे सफल हो पाए। जापान का विकास दर .05 प्रतिशत के आसपास बना। यूरोपीय देशों में जर्मनी, स्वीडेन जैसे कुछ देशों को छोड़कर वहाँ के हालात बद से बदतर बने रहे। अमरीका में 1947 से 2011 की शुरुआत तक औसत विकास दर 3.80 प्रतिशत रहा है, वह 2011 के मध्य में आकर 1.30 प्रतिशत रह गया है। आमतौर पर मैन्यूफैक्चरिंग यूनिटों में विकास दर गिरने का अर्थ बड़े पैमाने पर मजदूरों की छँटनी होना होता है। जब यह आम बीमारी की तरह फैलने लगता है तब इसका सीधा असर बैंकिंग या वित्तीय पूँजी पर होता है। पूँजीवादी व्यवस्था पर खड़ी सरकार के आय व व्यय पर पड़ने वाले इसके असर से न केवल विभिन्न संस्थान संकट में आ जाते हैं बल्कि यदि संकट गंभीर हो तो खुद सरकार के होने का ही संकट खड़ा हो जाता है। मध्यम आयवर्ग के लोगों की आय में या तो सीधी कटौती की जाती है या उनकी खरीद क्षमता को ही गिराकर उनसे अधिक वसूल किया जाने लगता है। मध्यम व उच्च आय के लोग अपनी जरूरतें पूरा करने के लिए कर्ज का सहारा भी लेते हैं जिसे आय न होने के चलते पर पाना मुश्किल होता है। वित्तीय बाजार में यह संकट बचत से अधिक खर्च के रूप में प्रकट होता है। वैश्वीकरण के दौर में पूँजीवादी साम्राज्यवाद ने जिस वृहद एकाकार होते वैश्विक पूँजी के राज का चित्र खींचा था वह एक देश में अपने विशिष्ट संकटों के साथ दूसरे देशों के आम संकट से मिलकर एक वृहद संकट का चित्र खड़ा कर रहा है। वैश्वीकरण के दौर में जिस वित्तीय पूँजी के सहारे गैर उत्पादक कार्य के माध्यम से अर्थव्यस्था को फूँककर फुलाया गया, वह आज अपनी वास्तविक जमीन को खोजते हुए नीचे आ रहा है। आज भारत व चीन में जो विकास दर दिख रहा है उसके पीछे भागकर आ रही वित्तीय पूँजी का निवेश है जो अमरीकी संकट के दौरान कमाई का जरिया खोजने में लगी है। वैश्विक मुद्रा की दावेदारी करने वाले डालर को राजनैतिक जोर जबरदस्ती के बदौलत उसकी साख को अमरीका बचाने में लगा है। वास्तविक उत्पादन विनिमय में मुद्रा की यह भूमिका पहले से कहीं अधिक जटिल व आक्रामक होकर उभरा है। वैश्वीकरण जिस पूँजीवादी साम्राज्यवाद को बचाने के लिए युद्ध व विŸा की व्यवस्था के साथ उभरी आज वह तबाही का मंजर खड़ा करते हुए अंततः खुद अपने ही देश में बन रहे दलदल में फँस गया है। वॉल स्ट्रीट पर कब्जा आंदोलन यह बता रहा है कि मंदी 2008 के बाद भी खत्म नहीं हुआ बल्कि वह बढ़ता गया है। आज इस मंदी की बाढ़ से लोगों का दम घुट रहा है। यह मीडिया ही है जो संकट की तस्वीर देने के बजाय यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि मंदी तो बस ग्रीस तक है और वह भी उबर ही जाएगा जबकि अमरीकी अर्थव्यवस्था अपने ही पैरों पर गिरने को हो रही है। यहाँ यह जरूर याद कर लेना ठीक होगा कि मंदी से धनिकों की संपत्ति में इजाफा होना नहीं रुकता और न ही उनके सी0इ0ओ0 की तनख्वाहों में कमी आती है। हाँ, धनिकों का एक हिस्सा तबाह हो जाता है और संचित निधि का बँटवारा चंद पूँजीपति अपनी ताकत के अनुसार कर लेते हैं। पूँजीवाद जब तक है वह अपने राजनीति व अर्थनीति में धनी होने का सिद्धांत है। इसकी सबसे बड़ी मार आम जन व श्रमिक समुदाय पर पड़ता है। आज अमरीका के आम लोग व श्रमिक समुदाय जिस वॉल स्ट्रीट कब्जा आंदोलन के साथ आगे आए हैं वह अमरीकी पूँजीवादी साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत है। यह आंदोलन धनिकों पर नियंत्रण रखने, सरकार की नीतियो में फेर बदल कर जन के पक्ष में ले आने, बेरोजगार व नौकरी खो रहे लोगों को सामाजिक सुरक्षा देने व मजदूरों को उनके यूनियन बनाने के अधिकार के साथ सामने आया है। यदि हम इसे अमरीका के श्रमिक आंदोलन के इतिहास के सामने रखकर देखें तो यह बेहद कमजोर दिखेगा। पर यदि हम इसे आज के सन्दर्भ में रखें तो निश्चय ही इसके विभिन्न मायने निकलेंगे।

-अंजनी कुमार
समाप्त
-साभार

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

अमरीका में वाल स्ट्रीट कब्जा करो आंदोलन स्वर्ण किले पर दावेदारी भाग १


वैश्वीकरण के दौर में बुद्धिजीवियों के एक हिस्से ने अमरीका को इम्पायर यानी महान सम्राट के नाम से सम्बोधित किया था। यह नाम उसकी अपराजेयता और उसका खात्मा होने पर साम्राज्य के पहले जैसे बने रहने के लिए दिया गया था। इस बात में कितनी सच्चाई है यह अब भविष्य के गर्भ में है, पर यह भी सच है कि आज यूरोपीय साम्राज्यवाद अपने ही भार से जिस तरह भहरा रहा है उससे अमरीकी साम्राज्यवाद अछूता नहीं रह गया है। ग्रीस का बजट घाटा और बाजार में देनदारी व खुद सरकार की वैश्विक बाजार में गिर चुकी साख की बीमारी पड़ोसी देशों में इस कदर फैलती जा रही है कि उसने महज दो सालों में अमरीका की वित्तीय साख में भी बट्टा लगा दिया है। बजट घाटा की अध्यक्षा ने साफ घोषित कर दिया कि यदि इस तरह के हालात बने रहे तो मुद्रा कोष इस तबाही को सँभाल नहीं पाएगा। अब तक कुल 160 बिलियन डॉलर ग्रीस में झोंक देने के बाद भी संप्रभू साख यानी सरकार चलाने के लिए जरूरी आय को हासिल करने की क्षमता हासिल नहीं हो पा रही है।
चंद दिनों पहले सरकारी खर्च की कटौती के लिए 30 हजार लोगों को नौकरी से बाहर कर दिया गया। यही हालत इटली, स्पेन, फ्रांस आदि देशों की भी है। अमरीका में त्रिस्तरीय उच्च ग्रेड के एक हिस्से के ए से बी हो जाने का असर यह हुआ है कि लाखों लाख लोग सड़क पर फेंक दिए गए। आय को बचाने के लिए सामाजिक कटौती करने की नीति पर चर्चा होने लगी। बावजूद इसके वॉल स्ट्रीट पर हालात नहीं सुधरे। बोइंग कंपनी से निकाले जाने वालों की संख्या में कमी नहीं आई। ओबामा ने एक तरफ रोजगार के अवसर बनाने का आश्वासन दिया, तो दूसरी ओर वित्तीय साख को हासिल करने के लिए हर संभव प्रयास करने का आश्वासन भी, पर सूचकांक की गिरावट में कभी-कभार के चंद सुधारों के बाद भी हालात बिगड़ते ही गए। आज खुद अमरीका में स्थितियाँ इतनी जटिल होती गई हैं और कारपोरेट व वित्तीय संस्थानों की पकड़ इतनी मजबूत हो चुकी है कि वहाँ कींस के सिद्धांत पर अमल की बात करना भी एक क्रांतिकारी काम हो गया है। अमरीका में इस इम्पायर के स्वर्ण किला वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करने का अभियान चल रहा है। वॉल स्ट्रीट पर कब्जा यानी वित्तीय संस्थानों की घेराबंदी। वॉल स्ट्रीट के सूचकांकों के ऊपर या नीचे होने से सिर्फ कंपनियों के शेयर खरीदने वालों की ही तबाही नहीं होती, इससे सीधा बाजार भाव व आय और रोजगार जुड़ा होता है। यहाँ प्रति मिनट अरबों डालर हवा की तरह भले उड़कर जाता या आता हुआ न दिखे, पर रोजमर्रा की जिंदगी में यह बेहद ठोस रूप में आता-जाता है। सितंबर 2011 के मध्य में अमरीका में नौकरी खोजने वाले युवा, नौकरी खो देने वाले कर्मचारी, श्रम करने वाले विभिन्न विभागों के लोग, मध्यम आय वर्ग के बुजुर्गों आदि ने एक लंबे सुगबुगाहट, सोशल नेटवर्क पर एक दूसरे के साथ संपर्क बनाने के बाद विभिन्न जुटानों, चैराहों पर बहस-मुबाहिसों के बाद 17 सितंबर को न्यूयार्क की सड़कों पर मार्च किया। 18 सितंबर को न्यूयार्क के एक चैराहे- 12 स्ट्रीट, जिसे अब ‘लिबर्टी चैराहा’ कहा जा रहा है, पर आम सभा (जनरल एसेंबली) बुलाई गई। न्यूयार्क पुलिस ने वहाँ किसी भी तरह का टेंट आदि लगाने पर रोक लगा दी। बावजूद इसके मेडिकल, भोजन उपलब्ध कराने वाले गु्रप व मीडिया खुलकर सहयोग में आ गए। यहाँ विभिन्न समूहों के बीच चली घंटों बहस के बाद नारा तय किया आक्यूपाई वॉल स्ट्रीट यानी वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करो। 18 सितंबर की सुबह वॉल स्ट्रीट की ओर हजारों लोगों ने मार्च किया। इसके बाद अमरीका के विभिन्न शहरों में इस तरह के जुटान व वित्तीय और पुलिस संस्थानों के खिलाफ प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो गया। वाशिंगटन, लॉस ऐजेंल्स, शिकागो, बोस्टन मियामी, पोर्टलैंड, ओरेगों, सीएटल, देनेवर आदि शहरों में हजारों की संख्या में लोग इकठ्ठा होकर वॉल स्ट्रीट कब्जा करो के अभियान में लग गए। विभिन्न टेड यूनियनों ने इसमें भागीदारी का खुलकर समर्थन किया है। अमरीका की सबसे बड़ी यूनियन ए0एफ0एल0, सी0आई0ओ0 ने कलिन पुल पर कब्जा करने की रणनीति को समर्थन देते हुए इसके अध्यक्ष ने कहा कि वॉल स्ट्रीट हमारे नियंत्रण से बाहर हो गया है। इस पर कब्जा करने की नीति से हमारी ओर इनका ध्यान खींचना आसान होगा। सैनफ्रांसिस्को लेबर काउंसिल ने इस प्रदर्शन को समर्थन देते हुए नारा दिया संपत्ति की असमानता को खत्म करो, बेघरों को घर दो, गरीबी खत्म करो, भ्रष्टाचार खत्म करो। आॅक्यूपाई वॉल स्ट्रीट मूवमेंट ने 13 माँगों को सामने रखा है-जीने के लिए वेतन, बीमार होने पर दवा करा सकने की मेडिकल सुरक्षा, बेरोजगारी भत्ता, मुफ्त शिक्षा, तेल की तबाह करने वाली अर्थव्यवस्था को खत्म करने के लिए ऊर्जा के अन्य साधनों का अनिवार्य प्रयोग, अधिसंरचना विकास के लिए एक ट्रिलियन डालर का निवेश, नस्ल व लैंगिक बराबरी को लागू करना, प्रवास पर रोक का खात्मा, चुनाव को पारदर्शी बनाना, सभी तरह के कर्ज का खात्मा, देनदारी सूचकांक एजेंसी का खात्मा, यूनियन बनाने व मजदूरों को अपना यूनियन चुनने का अधिकार। 12 लाख की सक्रिय सदस्यता वाली यूनियन अमेरिकी स्टील वक्र्स ने इस आंदोलन में हिस्सेदारी करने का निर्णय लिया है। न्यूयार्क की 40 हजार सदस्यता वाली ट्रांसपोर्ट वर्कर्स यूनियन, जिसमें रिटायर लोग भी शामिल हैं, ने इसमें भागीदारी व जरूरत पड़ने पर हड़ताल पर जाने का निर्णय लिया है। आज अमरीका में एक करोड़ लोग सामान्य जीवन जीने की सुविधाओं से वंचित हो चुके हैं। यहाँ 20 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं। प्रतिवर्ष लाखों लोग नौकरी से बाहर किए जा रहे हैं। दूसरी ओर उतनी ही तेजी से धनाढ्यता के टापू खड़े हो रहे हैं। इस आंदोलन को नोअमी क्लेन, नोम चोम्सकी, माइकेल मूर, एनी रैंड, जोसेफ स्टील्ज, जार्ज सोरोस आदि ने खुला समर्थन दिया है व इसमें भागीदारी की है। इसमें विभिन्न वैचारिक धाराओं, अराजकतावादी, लिबरल, समाजिक जनवादी जैसे लोग शामिल हा रहे हैं।

-अंजनी कुमार
क्रमश:
साभार

बुधवार, 29 जून 2011

ओबामा की ‘जीत’ के लिए लादेन का मरना जरूरी था

अमरीका ने एलान कर दिया है कि ‘दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी’ और अलकायदा का नेता ओसामा बिन लादेन मारा गया। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की मानें तो अमरीकी फौजियों की एक इलीट टुकड़ी ने ओसामा बिन लादेन को एक आपरेशन में इस्लामाबाद के पास एबटाबाद में मार गिराया है। ओबामा के मुताबिक, यह एक अमरीकी आपरेशन था जो सीधे उनके निर्देशन में चला।
अमरीकी टी.वी. चैनलों और समाचार माध्यमों के मुताबिक, इस खबर के बाद से अमरीका में जश्न का माहौल है। यही नहीं, ब्रिटेन से लेकर आस्ट्रेलिया तक के प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों की ओर से खुशी और बधाई के सन्देश चैनलों पर गूँज रहे हैं।
भारतीय न्यूज चैनल भी अमरीकी प्रतिष्ठान के हवाले से आ रही खबरों को पूरे उत्साह के साथ दोहराने में लगे हैं। हमेशा की तरह विजेता के बतौर अमरीकी वीरता और पराक्रम की कहानियाँ मिर्च मसाला लगाकर सुनाई जा रही हैं। इस सबके बीच सिर्फ अब यही बाकी बच गया है कि मारे गए ओसामा की छाती पर पैर रखे और हाथों में बंदूक लिए ओबामा की तस्वीरें नहीं दिखाई गई हैं।
लेकिन सच बात यह है कि कहानी बहुत सरल और सीधी है। न्यूज चैनलों पर मत जाइए, उनका तो काम है कि कहानी में सनसनी, सस्पेंस और ड्रामा डालने के लिए एक से एक पेंच और ट्विस्ट घुसाएँ।
यह ठीक है कि ओसामा बिन लादेन मारा गया, लेकिन उसका यह अंत पहले दिन से ही तय था। सच तो यह है कि अगर वह अब तक जिन्दा था तो इसकी वजह भी यह थी कि उसे और उससे भी ज्यादा उसके नाम के आतंक को खुद अमरीका ने जिन्दा रखा था। आखिर यह “जिहादी आतंकवाद” के खिलाफ “वैश्विक युद्ध” का सवाल था।
अमरीका को ओसामा के नाम और आतंक की जरूरत कई कारणों से थी। ओसामा को पकड़ने और अल कायदा को खत्म करने के नाम पर अफगानिस्तान पर हमला किया गया। इसके लिए उसे बहुत बहाना नहीं बनाना पड़ा। साथ ही, पाकिस्तान में घुसपैठ बढ़ाने का मौका मिला। इसके साथ ही मध्य एशिया में पैर जमाने को जगह मिली। इराक पर हमले के लिए जमीन तैयार करने में बहुत कसरत नहीं करनी पड़ी।
साफ है कि इस सबके लिए ओसामा का जिन्दा रहना बहुत जरूरी था। वैसे भी अमरीका बिना एक वैश्विक दुश्मन के नहीं रह सकता है। इस दुश्मन के नाम पर ही अमरीकी सैन्य औद्योगिक गठजोड़ का खरबों डालर का कारोबार चलता है। आश्चर्य नहीं कि अमरीका ने शीत युद्ध के बाद ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ की फर्जी सैद्धांतिकी के आधार पर ओसामा बिन लादेन के रूप में एक वैश्विक दुश्मन खड़ा किया।
अन्यथा यह सच किससे छुपा है कि ओसामा और उसके साथियों को जेहाद के नारे के साथ खड़ा करने में अमरीका की सबसे बड़ी भूमिका थी? लेकिन अब अमरीका को ओसामा की जरूरत नहीं रह गई थी। न सशरीर और न ही आतंक के एक प्रतीक के रूप में, कारण यह कि अब अमरीका अफगानिस्तान से सम्मानजनक तरीके से निकलना चाहता है। वह यह लड़ाई नैतिक रूप से ही नहीं बल्कि सैन्य तौर पर भी हार रहा था।
ओबामा ने बहुत पहले ही घोषित कर दिया था कि उनकी प्राथमिकता अफगानिस्तान की लड़ाई को जल्दी से जल्दी जीतकर वहाँ से बाहर निकलना है। लेकिन पिछले तीन सालों में यह साफ हो चुका था कि अमरीका अफगानिस्तान में जीतने नहीं जा रहा है। उल्टे उसे और खासकर नाटो के सैनिकों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा था। सबसे बड़ी बात अमरीका को यह भी लगने लगा था कि अफगानिस्तान से कुछ खास मिलने वाला भी नहीं है। मतलब न वहाँ तेल है और न ही कोई और बेशकीमती खनिज, फिर वहाँ रुकने से क्या फायदा? लेकिन अमरीका को वहाँ से निकलने के लिए ‘जीत’ जरूरी थी। यह ‘जीत’ इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि अगले साल अमरीका में राष्ट्रपति के चुनाव हैं। यह भी किसी से छुपा नहीं है कि पिछले कुछ महीनों से ओबामा की लोकप्रियता लगातार ढलान पर थी। उनके दोबारा जीत के लिए कुछ ड्रामैटिक होना जरूरी था। इसके लिए ओसामा बिन लादेन से उम्दा प्रत्याशी और कोई नहीं था।
जाहिर है कि ओबामा की ‘जीत’ के लिए लादेन का मरना जरूरी था, और लादेन मारा गया। कहानी खत्म, बच्चों बजाओ ताली!

-आनन्द प्रधान
मो0:- 09818305418

सोमवार, 27 जून 2011

यह ‘न्याय’ नहीं न्याय का ढकोसला है श्रीमान ओबामा!

इसे इतिहास की एक भारी विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे कि जो अमरीकी ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद न्यूयार्क के ‘ग्राउंड जीरो’ पर एकत्रित होकर ‘थैंक यू ओबामा’ का उन्मादपूर्ण नारा लगा रहे थे उन्हीं अमरीकियों को यह भरोसा दिलाने के लिए कि वह भी शुद्ध ‘अमरीकी’ हैं, राष्ट्रपति ओबामा को कुछ ही समय पूर्व अपना जन्म प्रमाणपत्र पेश करना पड़ा था। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी ओबामा की ख्याति ओसामा की हत्या के पूर्व तक कितनी गिरी हुई थी इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत सहित कुछ ही देशों में खेले जाने वाले क्रिकेट के हमारे धुरंधर धोनी के बराबर भी वह खड़े दिखाई नहीं देते थे। लेकिन अब स्थिति यह है कि ओसामा की हत्या की उनकी अपनी योजना की कामयाबी के बाद अमरीका के दो पूर्व राष्ट्रपतियों क्लिंटन तथा बुश सहित दुनिया के ढेर सारे राष्ट्राध्यक्षों/राजनेताओं की ओर से राष्ट्रपति ओबामा की प्रशंसा में कसीदे पढ़े जा रहे हैं।
आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जिस सर्वशक्तिमान अमरीकी राष्ट्रपति को अपनी अमरीकी नागरिकता तक को साबित करने के लिए मशक्कत करनी पड़ रही थी और जो लोकप्रियता के मामले में धोनी से भी नीचे के पायदान पर खड़ा था, वह कितने बुरे दिनों और शर्मनाक स्थिति का सामना कर रहा था और अपनी इन्हीं गिरी हुई स्थितियों में राष्ट्रपति ओबामा को तकरीबन आठ माह बाद होने वाले अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए भी अपने को तैयार रखना था। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन भारी दुष्वारियों की कीचड़ में गहरे धँसे राष्ट्रपति ओबामा को इससे उबरने के लिए किसी ‘जादू की छड़ी’ की कितनी सख्त आवश्यकता थी? और, देखा जाए तो अपने नेवी सील्स कमांडो द्वारा निहत्थे ओसामा की हत्या का लाइव दृश्य देखे जाने के तुरंत बाद राष्ट्रपति ओबामा ने दंभपूर्वक जो वाक्य कहे-‘‘न्याय हो गया’’- वह ठीक उसी जादू की छड़ी की प्राप्ति की एक तरह से अभिव्यक्ति थी। अन्यथा, अमरीकी राष्ट्रपति की नजर में ‘न्याय’ की अवधारणा कैसी है, इसका क्रूरतम् और निर्लज्जतम मिसाल तो उसने उसी पाकिस्तान की धरती पर ओसामा की हत्या किए जाने के कुछ माह पूर्व ही दे दिए थे। गुप्तचर सेवा के दो दुस्साहसिक अमरीकियों द्वारा दो पाकिस्तानी नागरिकों को सरेआम गोली मार कर हत्या किए जाने की जघन्य घटना से पूरा पाकिस्तानी जनमानस स्तब्ध था। यह किसी भी देश की संप्रभु सरकार की नैसर्गिक न्याय प्रक्रिया का स्वाभाविक तकाजा है कि वह अपने नागरिकों के हत्यारे चाहे वे विश्व के सबसे ताकतवर देश के नागरिक ही क्यों न हों, को कानून के कटघरे में लाकर न्यायोचित सजा दिलाने के अपने अधिकार का दृढ़तापूर्वक पालन करे। दुनिया ने देखा कि पाकिस्तान की सरकार उन दो हत्यारे अमरीकी नागरिकों के साथ ठीक यही तो कर रही थी। लेकिन न्याय का दंभ भरने और दुनिया को सभ्यता का पाठ पढ़ाने वाले ओबामा प्रशासन को यह कतई मंजूर न हुआ। उसने पाकिस्तान सरकार के हाथों को इस नंगई और निर्ममता के साथ मरोड़ना शुरू कर दिया कि उसे दोनों हत्यारों को अपनी न्याय प्रक्रिया से गुजारे बिना छोड़ देना पड़ा।
यह ठीक है कि अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी ओसामा बिन लादेन एक नहीं, दो नहीं, सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों अमरीकियों तथा विश्व व अन्य कई देशों के नागरिकों की जघन्य हत्या का कसूरवार था- वह मौत की सजा पाने से कम का हकदार नहीं था। लेकिन पूरे विश्व ने जब यह जाना, स्वयं अमरीकी प्रशासन की स्वीकारोक्ति द्वारा, कि धावा बोलने वाले अमरीकी सैनिक यदि चाहते तो बिल्कुल निहत्था और नितांत प्रतिरोधविहीन ओसामा को बड़ी आसानी से बंदी बनाया जा सकता था, बजाय इसके उन्होंने उसे वहीं ढेर कर दिया तो यह समस्त न्यायप्रिय लोगों के मन में एक तरह से जुगुप्सा जगा देने वाली बात थी। यह तो आधुनिक इतिहास में मानवता के सबसे बड़े अपराधी हिटलर के लापता हत्यारे सहयोगियों को पकड़े जाने पर भी न हुआ था। उन्हें उनके पनाहगाहों में धावा बोलकर ढेर नहीं किया गया था बल्कि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के कटघरे में उन्हें घसीट लाया गया और न्याय प्रक्रिया की लंबी अवधि से गुजरते हुए अंततः उन्हें फाँसी के तख्ते तक पहुँचाया गया।
लेकिन अपने समय के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा को ओसामा बिन लादेन के साथ ऐसा करना था भी क्या? पहली बात तो यह कि आतंकवादी ओसामा हिटलर की तरह किसी देश का कोई स्वायत्त शासक नहीं था। वह अफगानिस्तान में सोवियत फौजों के खिलाफ अमरीकी लड़ाई में स्वयं अमरीका द्वारा खड़े किए गए भाड़े के सैनिकों के एक गिरोह का तथाकथित धार्मिक उन्मादी सरदार था। दूसरी बात यह कि अमरीकी धन और हथियारों से सींच कर ही वह तैयार किया गया और अंततः अमरीकियों के ही खून का प्यासा बन बैठा। जिस लापता भस्मासुर अर्थात् ओसामा बिन लादेन को वर्षों से अमरीकी प्रशासन तलाश रहा था वह दरअसल लापता था ही नहीं। जैसा कि लादेन के खिलाफ 4 ‘हेलिकाप्टरों, 40 मिनट और 25 सैन्य कमांडो की इस दुर्दांत अमरीकी कार्रवाई- जिसका कूटनाम दिया गया जेरोनिमो ई0के0आई0ए0, की पूरी अन्र्तवस्तु को बारीकी से देखने से साफ जाहिर है। कहा जाता है कि पाकिस्तान के अत्यंत सामरिक महत्व के शहर एबटाबाद में जिस आलीशान हवेली में धावा बोल कर ओसामा की हत्या की गई थी, धावा बोलने वाले अमरीकी कंमाडों वैसी ही हवेली का निर्माण कर काफी दिनों तक ‘आपरेशन ओसामा’ का रिहर्सल करते रहे थे। यह बात स्वयं अमरीकी पक्ष की तरफ से जाहिर की गई है। लेकिन जो बात छिपा ली गई है क्या लगता नहीं है कि वह ठीक वही बात है जो इस पूरी कार्रवाई से अपने आप साफ झलकती नजर आती है।
2001 में वल्र्ड ट्रेड सेंटर को जमींदोज किए जाने के बाद अमरीका को अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन की तकरीबन 10 वर्षों से तलाश थी। इस तलाश में उसके साथ पाकिस्तान भी साझीदार था। इसके एवज में अमरीका को अपनी अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी लड़ाई में इस तथाकथित विश्वस्त सहयोगी को प्रतिवर्ष अकूत धन देने पड़ते थे। कहते हैं कि इस वर्ष ही पाकिस्तान अपनी इस सहयोगी भूमिका के लिए 3 अरब डालर अमरीका से वसूलने वाला था। पूरे दो दशक बीतने के बाद ओसामा रविवार की आधी रात को जब मार गिराया गया तो अफगानिस्तान के राष्ट्रपति करजई के ये शब्द खासे मायने रखते हैं, ‘‘अमरीकियों ने लादेन को लोगान में नहीं पाया और न ही वह उन्हें कंधार में मिला या काबुल में, उन्हें वह पाकिस्तान के एबटाबाद में मिला।’’ और बेहद तड़प के साथ उन्होंने आगे यह भी कहा, ‘‘पिछले दस वर्षों से हम जो कह रहे थे, नाटो व दुनिया ने उसे कभी नहीं माना। हम झुलसते रहे और अब ओसामा एबटाबाद में मारा गया।’’
करजई के इस तड़प भरे वक्तव्य के गहरे निहितार्थ हैं। यानी अमरीका को चाहिए था एक ऐसा सबल बहाना जिसका वास्ता देकर वह अफगानिस्तान में अपनी फौजी उपस्थिति और आए दिन तथाकथित आतंकवादी अड्डों के सफाया के नाम पर ड्रोन हमलों में निरीह नागरिकों की हत्या के अपने घिनौने कृत्य को जायज ठहरा सके। पाकिस्तान को भी चाहिए था एक ऐसा हथियार जिसका आतंक दिखाकर अपने दिवालिया अर्थतंत्र के लिए अकूत अमरीकी धन के निरंतर आमद की व्यवस्था को बनाए रख सके। जाहिर है, अमरीका और पाकिस्तान दोनों के अत्यंत पाप भरे इन स्वार्थों की पूर्ति के लिए सबसे अचूक उपाय था ओसामा बिन लादेन के अस्तित्व को लंबे समय तक बनाए रखना। अपनी-अपनी सरकारों के निर्देश पर सी0आई0ए0 तथा आई0एस0आई0 के चतुर नक्शानवीसों ने मिलकर ही ओसामा के लिए वह नक्शा बनाए होंगे जिसके घेरे में अपने मारे जाने के दिन तक सुरक्षित पनाह पाता रहा था। करजई का इशारा भी कि ‘‘पिछले दस वर्षों से हम जो कह रहे थे, नाटो व दुनिया ने उसे कभी नहीं माना, और अब ओसामा एबटाबाद में मारा गया है’’, इसी नापाक नक्शे को बेपर्दा करता जान पड़ता है। ओसामा तो लगता है सर्वशक्तिमान अमरीका को हिला देने वाले 9/11 कांड के बाद से ही सी0आई0ए0 तथा आई0एस0आई0 के इस संयुक्त नक्शे के घेरे में आ चुका था और जिसकी अफगानिस्तान के राष्ट्रपति करजई को अच्छी तरह से भनक मिल चुकी थी।
यह तो कहिए कि विश्व में आई आर्थिक सुनामी में अमरीकी अर्थतंत्र के ढहने के साथ-साथ राष्ट्रपति ओबामा की लोकप्रियता भी तेजी से लुढ़कने लगी थी और इस खास कारण ने ओबामा को भारी बेचैनी मंे डाल दिया। जैसा कि बताया जा चुका है, संसार का यह सबसे ताकतवर राष्ट्रपति धोनी जैसे शख्स से भी लोकप्रियता के मामलों में पिट गया था तो फिर ऐसी अपमानजनक स्थिति में बने रहकर ओबामा पुनः अगला राष्ट्रपति चुने जाने का ख़्वाब क्या खाक देखते! यहीं पर चाहिए थी ओबामा को अभी और इसी वक्त एक ऐसी ‘जादू की छड़ी’ जो उनकी लुढ़कती लोकप्रियता पर चमत्कारिक रूप से रोक तो लगा ही दे आगामी राष्ट्रपति चुनाव में उनकी जीत की गारंटी भी दिला सके। फिर क्या था, यहीं से उस रंगमंच और उस पर खेले जाने वाले नाटक के निर्माण की कथा शुरू हो जाती है जिसके घोर घिनौने प्रदर्शन के स्तब्धकारी रोमांच से दुनिया अभी भी उबर नहीं पाई है।
कथा यह गढ़ी गई कि नाटक के अंतिम प्रदर्शन अर्थात् ‘आॅपरेशन ओसामा’ के मामले में बेचारे पाकिस्तान को बिल्कुल नामालूम सी स्थिति में रखा गया था। यह इसलिए भी जरूरी था कि यदि यह जरा भी उजागर हो जाय कि इस नाटक के कथानक की तैयारी में सी0आई0ए0 तथा आई0एस0आई0 दोनों की बराबर की भागीदारी थी तो पाकिस्तानी सत्ता केन्द्र को तो अपने ही नागरिकों के प्रचंड क्रोध की ज्वाला में भस्म हो जाना तय था। अगर यह सच नहीं होता तो अमरीकी नेवी सील्स कमांडो के वीर बाँकुरों की उस अत्यंत सुरक्षित और आई0एस0आई0 द्वारा संरक्षित एबटाबाद की हवेली में सीधे उतरते नानी मर गई होतीं। और, अमरीकी प्रशासन भला इस भारी जोखिम में अपने सैनिकों को डालता ही क्यों जिसके लिए अफगानिस्तान की धरती पर बेपनाह ड्रोन हमलों में अनगिनत बेगुनाह लोगों की हत्या एक सामान्य घटना से अधिक शायद ही और कुछ रह गया हो! यहाँ तो मामला ओसामा जैसे दुनिया के सबसे घिनौने आतंकवादी का था जिसके पनाहगाह पर सीधे ड्रोन हमला करके उसे मारने की कार्रवाई पर शायद ही कोई भारी हंगामा खड़ा होता और यदि इस ड्रोन हमले में ओसामा के साथ-साथ उसके आसपास के मकानों में रहने वाले भी मारे गए होते तो भी अमरीका के लिए यह कोई भारी शर्मिंदगी की बात नहीं होती।
लेकिन यहाँ तो पर्दा उठने के पहले रंगमंच के एक-एक कोने को मानो प्रशिक्षित कुत्तों की तरह अमरीकी कमांडो को सुंघा दिया गया था और आॅपरेशन ओसामा के कई-कई रिहर्सल भी करा दिए गए थे। ऐन वक्त पर पाकिस्तान की तरफ से ‘मैदान साफ है’ की हरी झंडी दिखा दी गई थी। पाकिस्तानी पक्ष का अरज तो बस इतना ही था कि ‘माई बाप’! इस पूरे कांड में पाकिस्तान के गायब रहने के ढोंग को फैलाने में कोई चूक न होने पाए।’ अमरीकी प्रशासन ने सचमुच इस ढोंग को प्रचारित/प्रसारित करने में कोई कोताही नहीं बरती।
अंततः राष्ट्रपति बराक ओबामा के शब्दों में ‘न्याय हो गया।’ इसी के साथ दुनिया ने यह भी देख लिया कि जो अमरीकी ओबामा नाम से आजिज आने लगे थे आज वे ही न्यूयार्क की सड़कों पर ‘थैंक यू ओबामा’ का उन्मादपूर्ण नारा लगा रहे थे। अर्थात् कहना यह पड़ेगा कि ओबामा का ‘आॅपरेशन जादू की छड़ी’ पूरी तरह कामयाब रहा। मगर दुनिया के समस्त न्यायप्रिय लोगों के मन-मस्तिष्क को बुरी तरह से मथ रहे इस प्रचंड प्रश्न का ओबामा क्या जवाब देंगे कि निहत्थे ओसामा को न्याय के कटघरे में खड़ा करके उससे उसके गुनाहों की स्वीकृति सुनने और अंततः उसे सभ्य तरीके से फाँसी तक ले जाने के बजाय उसे वहीं ढेर कर देने की कायरतापूर्ण कार्रवाई क्यों की गई? किस ‘न्याय’ के तहत, पाकिस्तानी सत्ता केन्द्र, साथ ही उसकी पूरी न्याय प्रणाली की बाँह निर्ममतापूर्वक मरोड़ते हुए अपने दो हत्यारे अमरीकी नागरिकों को उड़ा ले जाया गया, राष्ट्रपति ओबामा से दुनिया भर के न्यायप्रिय लोगों का एक सवाल यह भी है और जब तक इन बातों का ठोस जवाब नहीं मिल जाता तब तक कहना यह पड़ेगा कि ‘‘श्रीमान ओबामा यह न्याय नहीं न्याय का ढकोसला है!’’

-सुमन्त
मो0:- 09835055021

सोमवार, 2 मई 2011

हाय ! ओबामा तूने अपने अब्बा हुजूर को मार डाला


अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने 1979 में अफगानिस्तान में साम्यवादी सरकार को उखाड़ फेकने के लिये बहुत सारे मुस्लिम नवजवानों को गुमराह करके धार्मिक युद्ध का नाम देकर लड़ने के लिये प्रेरित किया था। अमेरिकी कुख्यात खुफिया एजेंसी सी.आई.ए ने हथियार ट्रेनिंग रुपया देकर नवजवानों को आतंकवाद के रास्ते पर जाने के लिये शिक्षित दीक्षित किया था। 1989 में अफगानिस्तान से सोवियत फौजों की वापसी हो गयी। जिससे सी.आई.ए द्वारा भावनात्मक रूप से गुमराह किये युद्धरत जवान बेरोजगारी में आना शुरू हो गए। इन नवजवानों के पास आतंक फैलाने के अतिरिक्त कोई दूसरा हुनर नहीं था। सी.आई.ए ने हथियारों की सप्लाई के बदले में व धन प्राप्त करने के लिये अवैध रूप से अफीम की खेती भी शुरू करवाई अफीम की खेती के पश्चात अफीम से मार्फीन व हेरोइन का निर्माण व तस्करी को भी संरक्षण दिया।
उन्ही युद्धरत नवजवानों में सउदी अरबिया निवासी ओसामा बिन लादेन भी था। ओसामा बिन लादेन ने अमेरिकी शोषण तंत्र को समझा और अमेरिका के भयंकर विरोध में चला गया और उसने वही हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए जो अमेरिकी दूसरे देशों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से करते हैं। चाहे वर्ल्ड ट्रेड सेण्टर पर बम गिराने के बाद 9/11 की घटना हो जिसमें लगभग 3000 लोग मारे गए थे कि घटना को अंजाम देने का आरोप भी ओसामा बिन लादेन पर आया।
सोमवार (2 मई) की रात एक बजे अमेरिकी सरकार व सी.आई.ए ने पकिस्तान सरकार को बगैर सूचना दिए इस्लामाबाद से 60 किलोमीटर दूर एबदाबाद में ओसामा बिन लादेन सहित चार लोगों को मार डाला। ओसामा की दो पत्नियों सहित 6 बच्चों को गिरफ्तार कर लिया ओसामा की लाश को अमेरिकी प्रचार एजेंसियों के अनुसार इस्लामिक रीति-रिवाजों के अनुसार समुद्र में दफना दिया गया है। दो अमेरिकी हेलीकाप्टर ने इस ऑपरेशन में भाग लिया जिसमें एक हेलीकाप्टर को मार गिराए जाने की बात आई है वहीँ यह भी कहा जा रहा है कि अमेरिकियों ने स्वयं ही इसे नष्ट किया है। ओसामा के सिर में गोली मारी गयी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के समय से ओसामा अमेरिकियों के नजदीक रहा है इस रिश्ते से बराक हुसैन ओबामा का अब्बा हुजुर हो सकता है और 1989 से जब ओसामा अमेरिकियों के लिये अनुपयोगी हो गया और प्रतिरोध पर उतर आया तो उसकी हत्या उसके घर में जाकर कर दी गयी है। ओसामा के पकिस्तान में रहने की सूचना वहां की सरकार, आई.एस.आई और उनके आकाओं को भी रही होगी आज जब अमेरिकी मध्य एशिया में फंसे हैं तो ओसामा का वध करके दुनिया के विरोधी राष्ट्राध्यक्षों को भी एक नया सन्देश जारी किया जा रहा है। रहने सबसे ज्यादा दिक्कत पकिस्तान की सर्व भौमिक तथा संप्रभु सरकार की है जिसकी बगैर जानकारी के राजधानी इस्लामाबाद के नजदीक ऑपरेशन हो रहा हो और उनको सूचना न हो। अब आप इस बात से अंदाजा लगा लीजिये कि पकिस्तान में कैसी संप्रभु सरकार है। सी.आई.ए की उपशाखा आई.एस.आई को भी इस ऑपरेशन की भनक नहीं लगी। अमेरिकन साम्राज्यवादी शक्तियों के आगे संप्रभुता नाम की चीज नहीं है। उसके हित ही महत्वपूर्ण है। मुंबई आतंकी घटना के समय हमारे देश से भी अमेरिका की कुख्यात खुफिया एजेंसी एफ.बी.आई ने चश्मदीद गवाह अनीता उददैया को सरकार की जानकारी के बगैर अमेरिका लेकर चले गए थे और बाद में वापस छोड़ गए थे। अमेरिकी और खुफिया एजेंसी सी.आई.ए पाकिस्तान समेत अधिकांश देशों को अपना उपनिवेश बना रखा है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

आधुनिक सभ्यता में गांधी


गांधी और बराक ओबामा: संबंध् की पड़ताल
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा गांधी के भारी प्रशंसक हैं। हाल की अपनी
भारत की यात्रा के दौरान उन्होंने गांधी और विशेषकर उनके अहिंसा दर्शन की प्रशस्ति की।
साथ ही गांधी के प्रति अपनी निष्ठा का इजहार किया। वे मुंबई और दिल्ली दोनों जगह
गांधी स्थलों पर गए। संसद में दिए गए अपने भाषण में उन्होंने यहां तक कहा कि गांध्ी
नहीं होते तो वे अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं हो सकते थे। ओबामा गांध्ी को अपना रोल
माॅडल बताते रहे हैं। वे गांध्ी से इस कदर अभिभूत हैं कि पिछले साल वर्जीनिया प्रांत के
के अरलिंगटन शहर में वेपफील्ड हाई स्कूल में एक छात्रा द्वारा पूछे जाने पर कि वे किस
जीवित अथवा दिवंगत हस्ती के साथ डिनर करना चाहेंगे तो ओबामा ने गांधी का नाम
लिया। अपने एक भाषण में यह कह कर कि ‘‘अमेरिका की जड़ें महात्मा गांधी के भारत
में हैं’’, वे अपने देश की नियति को भी गांध्ी के साथ जोड़ चुके हैं। गांधी को अपने और
अमेरिका के साथ जोड़ने के बाद वे विश्व के साथ जोड़ते हुए कहते हैं, ‘‘महात्मा गांधी ने
पूरी दुनिया में पिछली कई पीढ़ियों से लोगों को प्रेरित किया है।’’ ओबामा गांधी की
सार्वभौमिक सार्थकता देखते हैं और उन्हें मानवता का मसीहा मानते हैं।
कहना न होगा कि गांध्ी को पूरी दुनिया में नाम का यश खूब मिला है। इस मामले
में वे शायद आधुनिक युग के किसी भी चिंतक और नेता से ज्यादा खुशनसीब हैं। उन्हें
दुनिया में सामान्य से लेकर हर क्षेत्रा के विशिष्ट नागरिकों तक प्रायः सभी जानते हैं। बीसवीं
शताब्दी के शुरुआत से उन पर लिखा जाना शुरू हो गया था जो अभी तक जारी है।
हालांकि, जैसा कि अक्सर सभी प्रसिद्धि पाने वालों के साथ होता है, गांधी की प्रशस्ति के
महाकाव्य में एक अध्याय गांधी की निंदा का भी शुरू से रहा है। इस अध्याय में भारत से
लेकर पाकिस्तान और दक्षिण अप्रफीका से लेकर यूरोप-अमेरिका तक गांध्ी को पाखंडी
;प्रफाडद्ध बताने के ‘प्रमाण’ दिए जाते हैं। गांध्ी के क्रूर और कामी आचरण से लेकर उन्हें
नस्लवादी और यु( भड़काने वाला ‘सि(’ किया जाता है। गांधी को दलितों को गुलाम
बनाने की साजिश रचने वाला मान कर दलित अस्मिता के उन्नायकों में गांधी-निंदा का
सतत पाठ चलता है। भारत के हिंदूवादियों को गांधी से इस कदर घृणा है कि उनकी हत्या
को वे वध् ;जो राक्षस का किया जाता हैद्ध कहते हैं।
नीयत निंदा करने की हो तो तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा और उनका एकतरपफा इस्तेमाल
किया जाता है। महत्ता पाने वाली सभी हस्तियों के साथ ऐसा होता है। निंदक ईश्वर और
उनके पुत्रों-पैगंबरों को भी नहीं छोड़ते हैं। निंदकों को कितने ही सुस्पष्ट और सशक्त
ज्ञानात्मक तथा संवेदनात्मक तर्क दे दिए जाएं, वे हठपूर्वक अपने पक्ष पर डटे रहते हैं। उसी
तरह जैसे प्रशंसक कमियां और कमजोरियां बताए जाने के बावजूद प्रशंसा-पात्रा की प्रशंसा
से तनिक भी विरत नहीं होते हैं। किसी भी हस्ती की प्रशस्ति और निंदा के बीच गंभीर
आलोचना भी सामने आती है। आलोचना जरूरी है, आधुनिक काल के विचारकों और
विचारों के बारे में और भी जरूरी, ताकि व्यक्तित्व और विचारों में अकाल जड़ता न आ
जाए। गांध्ी की भी समय-समय पर कुछ अच्छी आलोचना सामने आती रही है, जिसमें
उनकी शक्ति और सीमा दोनों का आकलन होता है। यह हो सकता है कि एक आलोचक
केवल शक्ति की बात करता हो और दूसरा केवल सीमाओं की और तीसरा दोनों पक्षों को
सामने लाए। कहना न होगा कि आलोचनात्मक उद्यम में आलाचकों की शक्ति और सीमा
भी प्रकट होती है। गांध्ी के आलोचकों को प्रशंसक निंदक और निंदक प्रशंसक समझते हैं।
इसीलिए दोनों आलोचित गांध्ी में से अपने काम की सामग्री ही निकालते हैं। ऐसा न करके
वे तथ्यों की जानकारी और विश्लेषण की रोशनी में प्रशंसक और निंदक की कोटि से बाहर
आकर खुद गांधी के आलोचक बन सकते हैं। आधुनिकता का यही तकाजा है।
आधुनिकता के तकाजे को अनदेखा करके प्रशसंक और निंदक अपने-अपने ‘ध्र्म’
पर डटे रहते हैं तो देखना होगा कि प्रशंसक और निंदक में किसका महत्व ज्यादा है? हमें
लगता है कि प्रशंसक के मुकाबले निंदक का महत्व ज्यादा होता है। संतों ने निंदक को
नजदीक रखने को कहा है। किशन पटनायक ने अपने एक लेख का शीर्षक ‘गांध्ी की
निंदा अवश्य होनी चाहिए’ दिया तो हम चैंके थे। लेख 1994 में ‘सामयिक वार्ता’ में छपा
था और अब उनके लेखों की पुस्तक ‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ ;राजकमल प्रकाशन,
2000द्ध में संकलित है। इस लेख में मायावती द्वारा की गई गांध्ी-निंदा से कुछ आलोचना
निकालने की कोशिश की गई है। उसी पुस्तक में उनका एक और लेख ‘गांध्ी का पाखंड’
संकलित है जो 1977 में लिखा गया था। इस लेख में गांध्ी-निंदकों द्वारा प्रचलित पाखंड
शब्द में से आलोचना के कुछ सूत्रा निकालने की कोशिश है। यहां हम लेखों पर चर्चा नहीं
कर रहे हैं। हमने हवाला इसलिए दिया है कि प्रशंसा से ज्यादा निंदा में आलोचना की
सामग्री हो सकती है।
पाकिस्तान से प्रकाशित ‘संडे मेल’ अखबार ने 5 नवंबर 2010 के संपादकीय में
‘प्रमाण’ सहित गांध्ी-निंदा की है। अखबार ने यह संपादकीय अमेरिका के राष्ट्रपति बराक
ओबामा की भारत यात्रा के दौरान गांधी-प्रशंसा की प्रतिक्रिया में लिखा है। हम यहां उन
प्रमाणों का उल्लेख नहीं कर रहे हैं, न ही स्पष्टीकरण दे रहे हैं जो अखबार ने उ(ृत किए
हैं। अखबार ने चिंता जताई है कि ओबामा भी गांधी को महान बताने के भारत के प्रचार
का शिकार हो गए हैं। हालांकि अखबार को यह पता नहीं है कि ओबामा लंबे समय से
गांध्ी के प्रशंसक हैं और उसका आधर, जैसा कि हम आगे देखेंगे, भारत का प्रचार नहीं
है। अखबार यह भी नहीं जानता कि भारत गांधी-निंदा का सबसे बड़ा गढ़ है। बहरहाल,
अखबार गांध्ी के मुकाबले जिन्ना को लेकर आया है। अखबार की नीयत कुछ रही हो,
इससे कुछ लोगों को गांध्ी और जिन्ना दोनों को जानने-समझने की प्रेरणा मिल सकती है।
कम से कम उन ‘प्रमाणों’ की जांच की इच्छा हो सकती है जो अखबार ने दिए हैं। उस
कवायद में गांधी और जिन्ना का कोई अच्छा आलोचक बन सकता है। कुछ पाठक ओबामा
के गांधी-प्रेम की तह में भी जाने की कोशिश कर सकते हैं।
आइए बराक ओबामा की गांधी-प्रशंसा का अर्थ निकालने का प्रयास करें। कसौटी
वही रखते हैं - क्या ओबामा की भूरि-भूरि गांधी-प्रशंसा उन्हें गांध्ी का अच्छा आलोचक
बनाती है, बना सकती है? क्या ओबामा की गांधी-प्रशंसा पर पफूल बरसाने वाले भारत के
नेता, मीडिया वाले, बुद्धिजीवी, गांधीवादी गांधी के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि अपना सकते
हैं? उनमें वैसी इच्छा उत्पन्न हो सकती है? ओबामा की गांधी-प्रशंसा की पड़ताल में हम
गांधी के सिद्धांतो की कसौटी नहीं लगाने जा रहे हैं। हालांकि यह ध्यान दिलाना चाहते हैं
कि गांधी सामाजिक-राजनीतिक काम करते हुए यह ध्यान रखते थे कि लोगों पर ताम-झाम
भारी न पड़े। अपने काफिले सहित ओबामा और भारत में उनकी अगवानी करने वाले
शासक वर्ग का ताम-झाम मिल कर लोगों पर इस कदर भारी था कि उसमें कुछ बहुत बड़े
लोग ही दिख पा रहे थे।
ओबामा की गांध्ी-प्रशंसा का एक निश्चित ऐतिहासिक आधर है। ऐसा नहीं है कि
उन्होंने बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति भारत आने पर गांध्ी-प्रशंसा की रूढ़ि निभाई हो। पहले का
तो हम ज्यादा नहीं जानते लेकिन राष्ट्रपति चुनाव के दौरान और बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति
उन्होंने गांधी के व्यक्तित्व और अहिंसक दर्शन की कई अवसरों पर प्रशंसा की है। कारण
है कि अमेरिका में अश्वेतों के नागरिक अध्किारों के लिए किए गए आंदोलन पर गांध्ी के

सत्याग्रह का प्रभाव रहा है। शुरू में उल्लिखित स्कूल के छात्रों से वार्तालाप करते हुए
ओबामा कहते हैं, ‘‘मुझे उनसे बड़ी प्रेरणा मिलती है। उन्होंने डॉ. मार्टिन लूथर किंग को
प्रेरित किया, अगर भारत में अहिंसक आंदोलन नहीं हुआ होता तो हो सकता है आप लोग
नागरिक अध्किारों के लिए चला वैसा ही अहिंसक आंदोलन संयुक्त राज्य में नहीं देख
पाते।’’
हालांकि ओबामा ने उल्लेख नहीं किया है लेकिन डाॅ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर के
पहले बीस के दशक के एक अप्रफीकी-अमरीकी असा रेंडोल्पफ पिफलिप पर गांध्ी के
सत्याग्रह का प्रभाव था। वे नागरिक अध्किार आंदोलन और मजदूर आंदोलन के नेता थे
जिन्हें अप्रफीकी-अमरीकी गांध्ी भी कहा गया था। उनके बाद डाॅ. किंग पर गांध्ी का प्रभाव
रहा ही है। ओबामा अप्रफीकी-अमरीकी दास समुदाय से नहीं हैं, उनकी पत्नी मिशेल दास
समुदाय से आती हैं, लेकिन उनके राष्ट्रपति चुने जाने में नागरिक अध्किार आंदोलन की
विरासत का योगदान है। इस लिहाज से उनका यह कहना सही ठहरता है कि उनका
अमेरिका का राष्ट्रपति चुने जाने में गांध्ी की निर्णायक भूमिका है। एक दशक पहले
अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भी भारतीय संसद को संबोध्ति करते हुए कहा था कि
गांध्ी के अहिंसा दर्शन ने अमेरिका में नस्ली भेदभाव की समस्या को शांतिपूर्वक सुलझाने
में मदद की।
कहने का आशय यह है कि पिता की तरपफ से अश्वेत समुदाय का होने के नाते
ओबामा पर भी गांध्ी का प्रभाव पड़ा है। वे अपने को गांध्ी का कर्जदार मानते प्रतीत होते
हैं। ऐसा लगता है गांध्ी के मामले में उनकी प्रभाव-प्रवणता श्र(ा की हद तक जा पहुंची
है। हो सकता है राष्ट्रपति बन जाने पर यह श्र(ाभाव उमड़ कर आया हो। लेकिन गांध्ी के
प्रति श्र(ाभाव के बावजूद वे गांध्ी के अनुयायी नहीं हैं। वे डाॅ. किंग के अनुयायी भी नहीं
हैं। गांध्ी या डाॅ. किंग का अनुयायी अमेरिका का राष्ट्रपति नहीं हो सकता। डाॅ. किंग केवल
अश्वेतों के नागरिक अध्किारों के लिए लड़ने वाले अप्रफीकी-अमरीकन नहीं थे। वे
अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरोध्ी थे, यह हम ओबामा के चुनाव जीतने के वक्त ‘समय
संवाद’ में लिख चुके हैं।
ओबामा से गुरु गांध्ी का शिष्य होने की अपेक्षा करना गलत होगा। ओबामा पर
गांध्ी का प्रभाव परोक्ष रूप से है। गांध्ी के साथ रहने वाले नेहरू उनके शिष्य नहीं हो
पाए। किसी राजपुरुष का गांध्ी का शिष्य होना अभी बाकी है और मानवता के सामने
दरपेश बड़ी चुनौती है। ओबामा के गांध्ी-प्रेम की आलोचना करने वाले गांध्ी के स्वराज्य,
राज्य, सत्ता, सरकार, विकास आदि विचारों और प्रतिरोध् की अहिंसक कार्यप्रणाली की
कसौटी लागू करते हैं। यह निरर्थक कवायद है जो कुछ हद तक ओबामा पर अपने पहले
लेखों में हमने भी की है। यह उस आध्ुनिक पूंजीवादी औद्योगिक सभ्यता का दौर है जिसे
गांध्ी ने शैतानी कहा था और उसका विकल्प पेश किया था। जब उस विकल्प को ओबामा
के आलोचक मौका देने को तैयार नहीं हैं, भले उनमें माक्र्सवादी से लेकर गांध्ीवादी तक
हों, तो अमेरिकी साम्राज्यवादी प्रतिष्ठान के शीर्ष पर बैठे ओबामा से कैसे अपेक्षा की जा
सकती है कि वे गांध्ीवादी कसौटी पर खरे उतरेंगे?
अपने चुनाव में ओबामा ने गांध्ी का उल्लेख किया। लेकिन उन्होंने वोट मांगते वक्त
गांध्ीवादी सि(ांतों अथवा मूल्यों का जिक्र नहीं किया। उन्होंने अमेरिकावासियों को मंदी से
निकाल कर उन्हें उनका पहले-सा जीवन-स्तर प्रदान करने का वादा किया। सादगी न चुनाव
प्रचार में थी, न विचार में। राज्य के केंद्रीकृत विशाल ढांचे को गांध्ी स्वराज्य यानी मनुष्य
की स्वतंत्राता के लिए दमनकारी मानते थे। ओबामा यह जानते होंगे, लेकिन उन्होंने
शक्तिशाली अमेरिकी राज्य की शक्ति को वैसा ही बनाए रखने का प्रण नागरिकों से किया।
आज भी वे वही कर रहे हैं। अपफगानिस्तान और इराक में जो पहले से चल रहा है वह
और ताकत से जारी है ही, हाल में नेटो कमांडरों ने पाकिस्तान की सीमा में घुस ड्रोन
हमले बढ़ाने का निर्णय किया है।
ओबामा ने ‘अमेरिका के शत्राुओं’ के खिलापफ अहिंसक संघर्ष चलाने की बात कभी
नहीं चलाई। वह उनके दिमाग में भी शायद ही कभी आती हो। भारत की संसद में दिए
भाषण में ओबामा ने गांध्ी के आखिरी आदमी का कोई जिक्र नहीं किया। उनका भाषण
मनमोहन सिंह के लोगों को संबोध्ति था जिनका प्रगाढ़ संबंध् वे अमेरिका के साथ बनाना
चाहते हैं। गांध्ी से प्रभावित कोई व्यक्ति डरा हुआ नहीं हो सकता। ओबामा के साथ उनकी
सुरक्षा के लिए आया लाव-लश्कर उनके गांध्ीवादी नहीं होने की हकीकत को बच्चों के
सामने भी जाहिर कर देता है।
कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति गांध्ी के अहिंसा दर्शन में विश्वास नहीं कर सकता। न
विचार के स्तर पर न अमल के स्तर पर। बल्कि हथियार और बाजार के दो पहियों पर
हांकी जाने वाली आज की दुनिया में किसी राष्ट्राध्यक्ष से गांधी के सिद्धांतो के पालन की
अपेक्षा नहीं की जा सकती। उसके लिए मानवता को अभी लगता है लंबा इंतजार करना
होगा। अफ़सोस यह है कि तब तक मानवता का, और बाकी जीवधरियों का भी, बड़ा
हिस्सा तबाह और समाप्त हो चुका होगा।
यहीं से एक बारीक धगा निकलता नजर आता है। विशेष ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के
अलावा ओबामा का गांध्ी को बड़ा मान देने का एक अन्य कारण पूंजीवादी साम्राज्यवाद
की बलि चढ़ने वाले मानवता के समूहों के प्रति उनके बचे सदस्यों की रिणशोध् की भावना
लगती है जो उन्हें गांध्ी तक खींच ले जाती है। ओबामा, हो सकता है गांध्ी की मापर्फत,
यानी उनके प्रति प्रेम और श्र(ा रख कर, अपने उन असंख्य पुरखों का कर्ज उतारते हों
जिन्हें पूंजीवादी साम्राज्यवाद ने पशुवत प्रताड़ित किया और विरोध् करने पर मौत के घाट
उतार दिया। लोहिया ने लिखा है कि दुनिया के सताए गए लोग गांध्ी की हत्या पर रोए
और शोकाकुल हुए थे। गांधी ओबामा की भावनात्मक जरूरत हैं।
ओबामा की गांधी-प्रशंसा का ऐतिहासिक आधर और जेनुइन कारण होने के बावजूद
वे न अपने तईं, न अमेरिकी सत्ता-प्रतिष्ठान में गांध्ी का उपयोग कर सकते हैं। ओबामा की
गांधी-प्रशंसा प्रसवित नहीं हो सकती। यहां तक कोई समस्या नहीं है। दरअसल, गांध्ी
आधुनिक सभ्यता में एक ऐसी उपस्थिति हैं जो सत्ता के गलियारों के बाहर पीड़ित मानवता
को आज भी सांत्वना देती भटकती है। यह कहती हुई कि जीत अंत में सत्य की होती है,
होगी। समस्या यह है कि ओबामा की गांधी-प्रशंसा गांधी को उसी आधुनिक सभ्यता की
वैधता का हथियार बना देती है जिसके खिलापफ गांधी का संघर्ष था। ओबामा साम्राज्यवादी
प्रतिष्ठान के शीर्ष पुरुष हैं। उनकी प्रशंसा सामान्य गांधी-प्रशंसकों से कहीं ज्यादा
गांधी-विनाशक हो सकती है। ‘‘अमेरिका की जड़ें गांधी के भारत में हैं’’ कह कर राष्ट्रपति
यह संदेश देने में सपफल होते हैं कि अमेरिका और भारत एक-दूसरे के सगे हैं। यह भारत
के मौजूदा शासक वर्ग के लिए महानतम अभीप्सित संदेश है। लेकिन इसमें आधुनिक
सभ्यता के विद्रूप उत्तराध्किारी अमेरिका के साथ गांधी को जोड़ा गया है। यह तथ्य और
विचार दोनों स्तर पर गलत है। गांधी का आधुनिक सभ्यता में समायोजन आधुनिक सभ्यता
को मजबूत और गांधी को कमजोर करता जाता है।
अब थोड़ी चर्चा भारत के शासक वर्ग की करते हैं। अकेले पफारवर्ड ब्लाक के
सांसदों ने ओबामा के संसद में दिए गए भाषण का बहिष्कार किया। वे बधई के पात्र हैं।
हालांकि ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता है कि उनके अमेरिकी साम्राज्यवाद विरोध् की
विचारधरा में गांध्ी का कोई स्थान है। एक बसपा सांसद ने ओबामा को अंबेडकर की
‘व्हाट गांधी एंड कांग्रेस हेव डन फॉर अनटचेबल्स’ किताब दी। वे ओबामा द्वारा कतिपय
भारतीय हस्तियों के साथ अंबेडकर का नाम लेने से भी उत्साहित हुए होंगे। किताब देने के
पीछे उनकी मंशा रही होगी कि ओबामा पर चढ़ा गांधी-प्रेम का भूत उतर कर
अंबेडकर-प्रेम का भूत चढ़ जाए। हो सकता है ओबामा वह किताब कभी पढ़ लें। उससे
निश्चित ही उनका गांध्ी के प्रति भारतीय संदर्भ में एक आलोचनात्मक रवैया विकसित हो
सकता है। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि किताब देने वाले सांसद पर ओबामा की
गांधी-प्रशंसा का कोई प्रभाव पड़ा होगा? यानी वे गांधी-निंदक से गांध्ी के आलोचक बनने
की दिशा में बढ़ने की सोचते होंगे? कम्युनिस्ट सांसदों ने ओबामा का भाषण सुना और
सराहा। उनमें से एक नेता ने गांधी-प्रशंसा के संदर्भ में भाषण की प्रशंसा की। देखना होगा
कि उनकी तरपफ से गांधी की नई आलोचना कब और किस रूप में सामने आती है? ज्यादा
संभावना यही है कि भाषण पर अपनी प्रतिक्रिया के बाद वे भूल गए होंगे।
हमें ये कुछ सकारात्मक संदर्भ लगे जिनका हमने जिक्र कर दिया। बाकी शासक वर्ग
के नुमाइंदों, जिन्हें ओबामा से इंटरेक्ट करने का मौका मिला, और सरकारी व मठी
गांध्ीवादियों के व्यवहार में हमें ओबामा की गांधी-प्रशंसा के संदर्भ में विशेष उल्लेखनीय
कुछ नहीं लगता है। बहुतों के लिए, गांधी-निंदकों समेत, गांधी-प्रशंसा ओबामा द्वारा की
जाने के चलते स्वीकार्य थी। मनी भवन के अध्किारी कामदार की बातें सुन कर ऐसा लगा
कि वे न गांध्ी को सही जानते हैं, न ओबामा को।
हमको लिख्यो है कहा ...
जगन्नाथदास रत्नाकर की रचना ‘उद्धव शतक’ में उ(व कृष्ण की पाती लेकर
गोकुल में आते हैं तो कृष्ण के विरह में तड़पती गोपियों उन्हें घेर लेती हैं। सभी एक साथ
जानना चाहती हैं कि उद्धव उनके लिए मथुरा से क्या संदेश लेकर आए हैं। गोपियों की
उत्कंठा की एक बानगी देखिए: ‘उझकि उझकि पद कंजन के पंजन पै, पेखि पेखि पाती
छाती छोहन छबै लगी। हमको लिख्यो है कहा हमको लिख्यो है कहा, हमको लिख्यो है
कहा कहन सबै लगी’।। एशिया के दौरे पर निकले ओबामा के पहले भारत आने के
समाचार से शासक वर्ग उद्धव की गोपियों से भी ज्यादा बेहाल हो उठा। आखिर, दूत नहीं,
साक्षात कृष्ण चले आए! चारों तरपफ ओबामा-ओबामा की पुकार मच गई। सभी पूछने लगे,
‘ओबामा की झोली में हमारे लिए क्या है, हमारे लिए क्या है?’
जनता की नजर से यह सच्चाई छिपा ली गई कि ओबामा झोली भरने आए हैं। यह
सच्चाई केवल इसलिए नहीं छिपाई गई कि ओबामा जो झोली भर कर जाएंगे उसमें से यहां
के शासक वर्ग को हिस्सा-पत्ती लेना है, बल्कि इसलिए भी कि जनता को यह न पता चल
जाए कि अपने देश के नागरिकों को मंदी और बेरोजगारी से उबारने के लिए वहां का
राष्ट्रपति किस कदर दुनिया में भागा घूम रहा है। अगर उसने नागरिकों की समस्याएं दूर
नहीं की तो सत्ता से उसका पत्ता सापफ हो जाएगा।
पुराने जमानों में किसी चक्रवर्ती राजा की ऐसी धक और धज नहीं होती होगी जैसी
अमेरिका के राष्ट्रपति की होती है। ओबामा की कुछ ज्यादा ही रही। अमेरिका में उनकी
यात्रा पर खर्च को लेकर विवाद उठ गया। यह आरोप लगा कि ओबामा की यात्रा पर 2008
मिलियन डालर का भारी-भरकम खर्च किया गया है। व्हाइट हाउस ने इस आंकड़े को
अशियोक्तिपूर्ण बताया। जो भी हो, दुनिया का ध्न-संसाध्न खींचना है और रौब-दाब कायम
रखना है तो कापिफला भारी-भरकम और शानो-शौकत वाला होना चाहिए। ओबामा की खूबी
यह रही कि इस सबके साथ गांधी-प्रशंसा का राग भी निभा ले गए।
भारत का शासक वर्ग ओबामा के प्रति संपूर्ण समर्पित हो गया। जो मंत्री-मुख्यमंत्री
नागरिक जीवन में शासन का आतंक पफैलाते हुए नागरिक जीवन को रौंदते चले जाते हैं,
उन्हें समर्पण से पूर्व ओबामा के अमलों को अपना पहचान-पत्रा दिखाना पड़ा। व्यापारियों,
नेताओं, जनरलों, नौकरशाहों, पत्राकारों, बु(िजीवियों, सेलीब्रेटियों - सबको ओबामा में सब
कुछ उच्च कोटि का लगा। कमी बस पाकिस्तान को खरी-खोटी नहीं सुनाने की महसूस की
गई। वह ओबामा ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट दिए जाने की वकालत करके पूरी कर
दी। सारा शासक वर्ग जैसे नशे में झूमने लगा। हालांकि विकीलीक्स के खुलासे से पता
चला कि अमेरिका की विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन कहती हैं कि भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा
परिषद में स्थायी सीट पाने का स्वनियुक्त दाावेदार है। यानी अमेरिका ने इस विषय में अभी
निर्णय नहीं किया है। लेकिन भारत का ‘आशावादी’ शासक वर्ग विकीलीक्स के खुलासे से
अर्थ निकाल लेगा कि अब तो बराक ओबामा अपनी बाम रखने के लिए सीट सुनिश्चित
करेंगे ही। बहरहाल, इस बार सांसदों ने ओबामा से हाथ मिलाने के लिए बिल क्लिंटन के
वक्त जैसी आपा-धपी नहीं मचाई। इसमें शायद रंग का कुछ भेद रहा हो!
पूरे सत्ता प्रतिष्ठान ने एकमुश्त एक संदेश दिया: जो करेगा अमेरिका करेगा। और
अमेरिका सब भला करेगा। अमेरिका हमेशा भला करता है। किसी को अमेरिका का किया
कहीं कुछ बुरा लगता है तो उसे जानना चाहिए कि वह बुरा भले के लिए ही होता है।
भारत का भला न जाने कब का हो जाता, अगर वह रूस के चक्कर में नहीं पड़ता। कोई
बात नहीं। अमेरिका बड़ा कृपानिधन है। देर से आने का बुरा नहीं मानता। परिस्थितियां पूरी
तरह पक चुकी हैं। भला भी पूरा होगा।
इस परिदृश्य का समाजशास्त्राीय विवेचन करें तो कह सकते हैं कि शासक वर्ग में
जो अगड़ा सवर्ण है वह पूरा गुलाम बन चुका है और शूद्र पूरा पिछलग्गू। दलित दोनों को
पीछे छोड़ने की दौड़ लगा रहा है। ऐसे माहौल में नवउदारवादी संपादक-पत्राकार, बु(िजीवी,
कलाकार, खिलाड़ी कोई पीछे नहीं रहना चाहते। अमेरिका का नाम आते ही नवउदारवादी
पत्राकार पूरे रंग में आ जाते हैं। यहां तो साक्षात अमेरिका आया हुआ था। ‘इंडियन एक्सप्रैस’
ने ओबामा के गांध्ी-प्रेम को सबसे ज्यादा विज्ञापित किया। ऐसा नहीं है कि अखबार की
टीम को गांधी से कोई प्रेम है। उसके एक लेखक भानुप्रताप मेहता दो साल पहले तीस
जनवरी के अंक में लिख चुके हैं कि गांधी चुक चुका था, लिहाजा उनकी हत्या नहीं होती
तो छिछालेदर होती। अखबार में ओबामा के गांधी-प्रेम का विज्ञापन समाजवाद की निंदा के
लिए किया गया। अखबार का संपादक, जो एक ब्रोकर भी है, मुखपृष्ठ पर निकल आता है
और बताता है, ‘अमेरिका के साथ बराबर का सौदा हुआ है।’ गुलाम दिमाग बराबर हो जाता
है!
जो सौदे और दावतें हुईं, कोई कह सकता है यह उसी गांध्ी का देश है, ओबामा ने
जिनके गुणगान की झड़ी लगाए रखी? हमें स्कूल के बच्चों के साथ ओबामा का वह
वार्तालाप याद आ रहा था जिसमें ओबामा ने गांधी के साथ खाना खाने की इच्छा व्यक्त
की थी। गांधी का चुनाव बताने के बाद उन्होंने बच्चों से हंस कर कहा, ‘‘भोजन सचमुच
में थोड़ा-सा होगा, वे ढेर सारा नहीं खाते थे।’’ कोई कह सकता है इस देश के संविधन
की प्रस्तावना में समाजवादी शब्द लिखा हुआ है और सरकारों के लिए कुछ नीति-निर्देशक
तत्व हैं? सौदों, दावतों और मौजमस्ती को देख कर कोई कह सकता है इस देश की अस्सी
प्रतिशत गरीब जनता बीस रुपया रोज पर गुजारा करती है? लोकतंत्रा का गुणगान और उस
पर विमर्श करने वाले नहीं पूछते तो गरीब क्या पूछ पाएगा कि यह कौन-सी नीति है और
कैसा लोकतंत्रा? लेकिन वे तो ज्यादातर ‘विमर्श-विनोद’ में मगन हैं।
भूख है, बेरोजगारी है, बीमारी है, कुपोषण है, मृत्यु है, आत्महत्याएं हैं - लेकिन
गुलाम और पिछलग्गू दिमाग अमेरिका के पीछे कमर कस कर खड़ा हो चुका है। पूछ रहा
है, ‘हमारे लिए क्या, हमारे लिए क्या’? उसके लिए दुनिया माने अमेरिका है। भारत माने
भी अमेरिका है। भारत को अमेरिका बनना ही होगा। अमेरिका बनते ही सबके लिए सब
ठीक हो जाएगा। यकीन न हो तो जिनके लिए बन चुका है, उन्हें देख लो। आंखों के
सामने हैं। वृ(ि दर और नरेगा मिल कर सब और सबको पार लगा देंगे। कहने का आशय
यह है कि ओबामा के गांध्ी-प्रेम का एक वास्तविक आधर है, लेकिन भारत का शासक
वर्ग गांध्ी को लेकर निपट पाखंडी है। इस स्थिति और चरित्रा को बयान करने के लिए लिए
कम से कम हमारे पास कोई शब्द नहीं है।
हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे
ध्यान दिया जा सकता है जो लोग ओबामा आगमन पर भारत को अमेरिका बना रहे
थे, अपने भ्रष्टाचारी चरित्रा और व्यवस्था को बिल्कुल भूले हुए थे। हालांकि ओबामा के
आने के पहले राष्ट्रमंडल खेलों में खुला भ्रष्टाचार हो चुका था। वह होता रहा और सरकार
देखती रही। जैसा कि हमने आपको बताया था, प्रधानमंत्री कार्यालय ने राष्ट्रमंडल खेलों के
भ्रष्टाचार के मामले को दबाने की कोशिश की थी। हाल के 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले में तो
देश के सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को दबाने के आरोप में प्रधनमंत्राी को ही तलब कर
लिया है। हाल में ग्लोबल पफाइनांसियल इंटेग्रिटी संस्था की एक रपट आई है कि आजादी
के समय से 2008 तक देश 462 बिलियन डालर काला धन बाहर जा चुका है। रपट यह
भी बताती है कि उसमें से 68 प्रतिशत राशि 1991 यानी नई आर्थिक नीतियां लागू होने के
बाद बाहर गई है।
लेकिन आपने देखा होगा ‘ईमानदार’ प्रधनमंत्राी के चेहरे पर कोई भाव नहीं रहता।
शिकन का तो सवाल ही नहीं। वे निरपेक्ष भाव से वृद्धि-दर का मंत्रा बोलते रहते हैं।
भ्रष्टाचार पर उनका मुंह कभी नहीं खुलता। अलबत्ता राजा की पीठ वे जरूर थपथपाते हैं।
हर्षद मेहता से लेकर अब तक उन्हें भ्रष्टाचारियों से कोई परेशानी नहीं होती। बल्कि उनके
साथ वे सबसे ज्यादा सुविध अनुभव करते हैं। हमने आपको कहा था कि मनमोहन सिंह
अभी तक के सबसे क्रूर प्रधानमंत्री हैं। वे अभी तक के सबसे भ्रष्ट वित्तमंत्री जमा
प्रधानमंत्री भी सिद्ध होंगे, अगर कोई अभी तक का सारा ब्यौरा जुटा कर सामने रखे। कल
आवास रिण घोटाला सामने आया है। देश के संसाध्नों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बेचने
और हथियारों की खरीद में जो वारे-न्यारे होते है, उसकी बानगी बीच-बीच में मिलती
रहती है। यह भी सामने आ चुका हे कि देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायध्ीश बड़ी
संख्या में भ्रष्टाचार में लिप्त हैं।
जो तर्क पहले गरीबी के लिए दिया जाता था, अब भ्रष्टाचार के लिए दिया जाता है।
प्रधानमंत्री कहते हैं भ्रष्टाचार और क्रोनी पूंजीवाद पूरी दुनिया को परेशान किए है। गरीबी
स्थायी और स्वीकृत हो गई है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में शासक वर्ग का रवैया भ्रष्टाचार को
स्थायी और स्वीकृत बनाने का है। सुब्रमण्यम स्वामी प्रधानमंत्री को कौरवों के पाप छिपाने
वाला भीष्म पितामह कहते हैं। यह शासक वर्ग की आपसी शब्दावली है। वरना वे कहते
कि प्रधानमंत्री देश में भ्रष्टाचार के नए अध्याय के लेखक हैं।
माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का कहना है कि प्रधानमंत्री भ्रष्टाचारियों के साथ खड़े
हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी कहती है प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार के लिए नैतिक रूप से जिम्मेदार
हैं। मुख्यधरा पार्टियों का कहा मीडिया में छपता है। जबकि प्रधनमंत्राी भ्रष्टाचार के जनक
और भ्रष्टाचारियों के नेता हैं। रतन टाटा का गुस्सा समझ में आता है जो कहते हैं कि
प्रधानमंत्री को कोई दोष नहीं देना चाहिए और हर सौदे में घोटाला नहीं देखना चाहिए,
वरना राष्ट्र का निर्माण कैसे होगा? लेकिन कम से कम वामपंथी पार्टियों की जिम्मेदारी
बनती है कि वे देश की मेहनतकश जनता को सच्चाई बताएं।
जब प्रधनमंत्राी कहते हैं कि यह कड़ी चुनौती का समय है तो इसी अर्थ में कि
गरीबी के साथ भ्रष्टाचार को भी साथ लेकर चलना कड़ी चुनौती का काम है। उन्हें इस
चुनौती को पूरा करने का पूरा विश्वास है। संदेश सापफ है। आगे-आगे देश में भ्रष्टाचार और
गहरा पैठेगा। इसलिए करने के लिए कमर कस लो। संकेत पर्याप्त स्पष्ट हो चुके हैं। शिक्षा
और स्वाथ्य सहित किसी क्षेत्रा में विदेशी पूंजी के खिलापफ मत बोलो, बहुराष्ट्रीय कंपनियों
के संसाध्न लुटाने के खिलापफ मत बोलो, पिफर चाहे जितना भ्रष्टाचार करो। बल्कि अब
छोटे भ्रष्टाचार गिनती में नहीं आएंगे।
मनमोहन सिंह के ‘आदर्श’ भारत का यह नक्शा है। सोनिया के सेकुलर सिपाही
उसमें रंग भरने का काम करते हैं। सोनिया के सेकुलर सिपाहियों को मनमोहन सिंह के
वारिस और अपने भावी नेता पर भरोसा जरूर होगा जो कहता है युवा राजनीति में आएं तो
भ्रष्टाचार खत्म होगा। लेकिन उन्हें अपने नेता से उदारीकरण के पहले सबसे बड़े भ्रष्टाचारी
हर्षद मेहता की उम्र पूछनी चाहिए। स्टैंप घोटाले का नायक तेलगी, सत्यम कंप्यूटर घोटाले
का नायक रामलिंगम, 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले का नायक राजा और करोड़ों रुपया झोंक कर
चुनाव जीतने वाले ‘युवा तुर्क’ भ्रष्टाचार की कला में भले ही वरिष्ठ हों, उम्र में युवा हैं।
आध्ुनिक सभ्यता का यह मलबा है जो भारत के शासक वर्ग ने पिछले 60 सालों
में जमा किया है। पिछले 20 सालों में देश के मलबाकरण में अत्यंत तेजी आई है। शासक
वर्ग ने गांधी को इस मलबे में मिलाने की शुरू से कोशिश है। इध्र के वर्षों में यह
कोशिश तेज हुई है। यह परिघटना गांध्ी की ताकत और कमजोरी दोनों को दर्शाती है।
लगता यही है अभी लंबे समय तक गांधी की एक दुर्निवार उपस्थिति बनी रहेगी। गांधी की
आलोचना बड़ती जाएगी तो आधुनिक सभ्यता के मलबे से मुक्ति की संभावना बनी रहेगी,
एक वैकल्पिक सभ्यता की भी।

प्रेम सिंह
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