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शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

मोदी की अर्धविक्षिप्तता: इतिहास की मनमानी व्याख्या

इतिहास केवल अतीत नहीं होता, जिसे भुला दिया जाए। इतिहास का इस्तेमाल, विभिन्न राजनैतिक एजेण्डों को लागू करने के लिए किया जाता है। इस समय हिन्दू और मुसलमान, दोनों समुदायों के दक्षिणपंथी, इतिहास का इस्तेमाल अपने-अपने हितसाधन के लिए कर रहे हैं। भारत में हिन्दुत्ववादी राजनीति का बोलबाला है और  हिन्दुत्ववादी षक्तियों द्वारा इतिहास के दुरूपयोग के अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं। सन् 1981 में जब तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में बड़ी संख्या में दलितों ने इस्लाम को अंगीकार कर लिया तब यह कहा गया कि भारत में तेजी से फैलता इस्लाम, देश  के लिए खतरा है। राममंदिर आंदोलन के उदय के साथ, इस बात पर जोर दिया जाने लगा कि मुस्लिम राजाओं द्वारा हिन्दू मंदिरों का विध्वंस किया गया और हिन्दू धर्म का अपमान भी। उसी समय यह नारा भी सामने आया ‘‘मुसलमान के दो ही स्थान-कब्रिस्तान या पाकिस्तान’’। इस नारे का अर्थ यह था कि भारत केवल हिन्दुओं का है।
सन् 2002 के गुजरात कत्लेआम के पहले और उसके तुरंत बाद, मुसलमानों को आतंकवाद से जोड़ा जाने लगा और मियां मुशर्रफ को भारतीय मुसलमानों के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करने के योजनाबद्ध प्रयास हुए। महाराष्ट्र में शिवाजी की जीवनगाथा को बार-बार दोहराकर, मुस्लिम राजाओं की आक्रांता और क्रूर शासक की छवि बनाने की भरपूर कोषिश की गई। इस समय भी ‘‘भारत के महान सपूत राणाप्रताप’’ और ‘‘जोधा अकबर’’ जैसे टीवी सीरियल यही संदेश दे रहे हैं।
हाल के कुछ महिनों से, साम्प्रदायिक ताकतों ने भारत के आधुनिक इतिहास को अपनी राजनैतिक लड़ाई का अस्त्र बना लिया है। सरदार पटेल का महिमामंडन किया जा रहा है और बार-बार यह दोहराया जा रहा है कि पटेल, नेहरू-विरोधी थे। इस काल के बारे में कई मिथक प्रचारित किए जा रहे हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने ‘‘विभाजन को सुगम बनाने’’ में कोई कसर बाकी नहीं रखी (खेड़ा, गुजरात में बोलते हुए नरेन्द्र मोदी)। यह वक्तव्य न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है वरन् इसके पीछे सोची समझी चाल है।  उस दौर में कांग्रेस की तरफ से वार्ताओं में भाग ले रहे थे पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल। जिन्ना पर जसवंत सिंह की पुस्तक में नेहरू व पटेल को देश के विभाजन के लिए दोषी ठहराया गया है। यह पुस्तक जसवंत सिंह की एकतरफा सोच को प्रतिबिंबित करती है। मोदी ने गुजरात में इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया था क्योंकि वे सरदार पटेल की जरा सी भी आलोचना सुनने को तैयार नहीं हैं। संघ परिवार इन दिनों दो जुबानों में बात कर रहा है। एक ओर सरदार पटेल की  शान में कसीदे काढ़े जा रहे हैं तो दूसरी और विभाजन के लिए कांग्रेस को दोषी ठहराया जा रहा है। ये बातें करने वाले यह भूल रहे हैं कि विभाजन के मामले में भारत की सोच का प्रतिनिधित्व, नेहरू और पटेल दोनों ने किया था।
दरअसल, भारत के विभाजन की त्रासदी एक बहुत बड़े कैनवास की तरह है। विभिन्न टिप्पणीकार इस कैनवास के केवल उस हिस्से को देखते हैं, जो उनकी राजनीति के अनुरूप व अनुकूल हो और उसे ही सबसे महत्वपूर्ण बताने लगते हैं। कैनवास के केवल एक हिस्से पर फोकस करना, इन टिप्पणीकारों के राजनैतिक इरादों और समझ को इंगित करता है। परंतु अगर हम इस पूरी प्रक्रिया को समग्र रूप से देखें तब एक नई कहानी हमारे सामने आएगी।
विभाजन की त्रासदी केवल ब्रिटिष  शासकों, मुस्लिम लीग व कांग्रेस के बीच अंतिम दौर में चली वार्ताओं की उपज नहीं थी। यह एक लंबी प्रक्रिया का नतीजा थी, जिसकी शुरूआत सन् 1857 की क्रान्ति से हुई थी। विभाजन के पीछे के मूल कारकों में से एक थी ब्रिटिश सरकार की फूट डालो और राज करो की नीति, जिसके अंतर्गत इतिहास का साम्प्रदायिकीकरण किया गया। दूसरा कारक था औद्योगिकरण व आधुनिक षिक्षा के बावजूद, सामंती तत्वों का बोलबाला बना रहना। ये सामंती तत्व, जो डूबते हुए सामाजिक वर्ग के थे, को प्रजातांत्रिक राष्ट्रवाद के उभार से खतरा महसूस हो रहा था। इस राष्ट्रवाद के उभार के प्रतीक थे उद्योगपतियों, श्रमिकों और षिक्षित वर्गों के नए गठित हो रहे संगठन और अंततः, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अस्तित्व में आना। डूबते हुए ये दोनों वर्ग, जिनमें हिन्दू और मुसलमान जमींदार और राजा षामिल थे, पहले एक साथ थे। उनके बीच विभाजन के बीज बोये लाॅर्ड एल्फिंसटोन ने-मुस्लिम जमींदारों और नवाबों को प्रोत्साहन देकर। लाॅर्ड एल्फिंसटोन ने जमींदारों और नवाबों को मुसलमानों के प्रतिनिधि के रूप में मान्यता दी। इसका नतीजा था सन् 1906 में मुस्लिम लीग का गठन। इसके बाद, 1909 मंे पंजाब हिन्दू सभा बनी, 1915 में हिन्दू महासभा और 1925 में आरएसएस। इन साम्प्रदायिक संगठनों को षिक्षित श्रेष्ठि वर्ग के एक हिस्से के अलावा, ऊँची जातियों और खानदानी व्यवसायियों से भी समर्थन मिलने लगा। ये साम्प्रदायिक संगठन, प्रजातांत्रिक राष्ट्रवाद के विरूद्ध थे और धार्मिक राष्ट्रवाद के पैरोकार।
विभाजन का तीसरा और प्रमुख कारण था हिन्दू महासभा के विनायक दामोदर सावरकर का यह कथन कि भारत में दो राष्ट्र हैं-हिन्दू राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्र। मुसलमानों के लिए अलग देश के निर्माण की मांग सबसे पहले चैधरी रहमत अली ने सन् 1930 में उठायी थी। इस मांग ने षनैः षनैः राजनीतिक स्वरूप ग्रहण कर लिया और सन् 1940 में जिन्ना ने पाकिस्तान (पष्चिमी व पूर्वी) नाम से मुसलमानों के लिए एक अलग देश की मांग कर दी। एक चैथा महत्वपूर्ण कारक यह था कि ब्रिटिश साम्राज्यवादी भी चाहते थे कि देश का विभाजन हो जाए। उन्हंे दक्षिण एषिया में अपने लिए एक अड्डे की जरूरत थी। पूर्वी यूरोप में साम्यवाद तेजी से जड़ें पकड़ रहा था और ये देश उन्नति कर रहे थे। साम्यवाद और सोवियत संघ ने कई राष्ट्रीय आंदोलनों के नेताओं को प्रेरणा दी। इनमंे चीन और वियतनाम षामिल हैं। साम्राज्यवादी चाहते थे कि कम्युनिस्टों का मुकाबला करने के लिए उनके पास दक्षिण एषिया में एक सुरक्षित अड्डा उपलब्ध रहे। भारत में नेहरू, जयप्रकाश नारायण सहित कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी-जो कि कांग्रेस के अंदर एक संगठन था-के नेताओं पर समाजवादी विचारधारा के गहरे प्रभाव को देखते हुए साम्राज्यवादी ताकतों की कतई यह इच्छा नहीं थी कि भारत एक बना रहे। उन्हें पता था कि अगर भारत एक रहा तो यहां के नेता, स्वतंत्रता के बाद, साम्राज्यवादियों को उनकी जमीन का इस्तेमाल अपने अड्डे बनाने के लिए नहीं करने देंगे। अतः उन्होंने पाकिस्तान के निर्माण की मांग को प्रोत्साहित किया।
कांग्रेस के लिए एक तरफ कुंआ था तो दूसरी ओर खाई। एक ओर राष्ट्रीय आंदोलन के गांधी व मौलाना आजाद जैसे नेता विभाजन का कड़ा विरोध कर रहे थे तो दूसरी ओर नेहरू और पटेल ने अंतरिम सरकार के संचालन में मुस्लिम लीग द्वारा अटकाए गए रोड़ों को देखा-भोगा था। उनके पास दो ही रास्ते थे, या तो वे क्रिप्स मिशन को स्वीकार कर लेते, जिसके अन्तर्गत अविभाजित भारत की केन्द्र सरकार के पास बहुत सीमित अधिकार रहते या फिर विभाजन को मंजूरी देकर एक मजबूत केन्द्र वाले भारत के निर्माण की राह को प्रशस्त करते। नेहरू का सोचना यह था कि बिना केन्द्रीयकृत अर्थव्यवस्था के देश  प्रगति नहीं कर सकेगा। उद्योगपतियों द्वारा देष के औद्योगिकरण के लिए तैयार की गई योजना, जिसे ‘बाम्बे प्लान’ का नाम दिया गया था, की भी राज्य से यह अपेक्षा थी कि भारी उद्योगों की स्थापना राज्य करे। उद्योगपतियों को यह ज्ञात था कि वे भारी उद्योगांे की स्थापना करने में सक्षम नहीं हैं। नेहरू भू-सुधारों और औद्योगिकरण के जरिए देश को आगे ले जाना चाहते थे। सरदार पटेल मजबूत केन्द्र के हामी थे और क्रिप्स मिशन द्वारा प्रस्तावित ढीला-ढाला संघीय ढांचा उन्हें कतई पसंद नहीं था।
भारत के विभाजन के लिए कांग्रेस को दोष देना, तथ्यों के साथ खिलवाड़ करना है। यह सचमुच चिंताजनक है कि राजनैतिक हितसाधन के लिए इतिहास-यहां तक कि आधुनिक इतिहास-को तोड़ा मरोड़ा जा रहा है। हमारे साम्प्रदायिक नेताओं को सत्य की बलि चढ़ाकर भी सत्ता हासिल करने में कोई गुरेज नहीं है।

-राम पुनियानी

रविवार, 24 जून 2012

अमरीका की साम्राज्यावादी गतिविधियाँ और नया विश्व परिदृश्य भाग 1


सोवियत संघ के अस्तित्व तक अमरीका अपनी गतिविधियों के लिए उसे ज़िम्मेदार ठहराता था। अमरीका के अनुसार उसे सोवियत ख़तरे का सामना करने के लिए सारे विश्व में सैनिक अड्डे स्थापित करना तथा नएनए अत्याधुनिक हथियारों का उत्पादन करना और बेचना ज़रूरी था। सोवियत संघ के पतन के बाद इस तर्क का आधार ख़त्म हो गया और हथियारों की होड़ और सारी दुनिया में सैनिक अड्डे बनाने का कोई औचित्य नहीं रह गया। कई लोग यह आशा और अपेक्षा करने लगे कि कम से कम अब तो अमरीका युद्धों की तैयारियों और दूसरे देशों में अड्डे बनाने तथा उनमे सैनिक हस्तक्षेप करने या आक्रमण करने से बाज आएगा।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पिछले दो दशकों के अनुभव बताते हैं कि इसके विपरीत अमरीका ने दुनिया में अपनी सैनिक गतिविधियाँ और भी अधिक ब़ाई हैं। यह समझा जाता है कि सोवियत पतन के बाद अब तो दुनिया उसके लिए खुला मैदान बन गई है जहाँ वह कुछ भी कर सकता है, कहीं भी अपनी फ़ौजें भेज सकता है, किसी को भी डराधमका सकता है और अन्य कई प्रकार से कमजोर देशों को दबा सकता है। उसे मालूम है कि अब सोवियत संघ के नहीं रहने से डरने वाली कोई बात नहीं रह गई और उसे अब कोई रोक नहीं सकता है। उसने एक ध्रुवीय दुनिया की घोषणा तक कर डाली अर्थात अब दुनिया में एक ही महाशक्ति रह गई है जिसके आगे सबको झुकना पड़ेगा। अब खुलकर हथियारों और युद्धों का खेल खेला जा सकता है। लेकिन उसकी सारी महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ पूरी नहीं हुई हैं, यहाँ रुक कर हम कुछ बातों पर विचार करेंगे।

साम्राज्यवाद का चरित्र?

दुनिया तेज़ी से बदल रही है। इसे नहीं समझने का ख़ामियाजा सोवियत संघ तथा कुछ अन्य देशों को भुगतना पड़ा था। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि शक्तिशाली साम्राज्यवादी देश इस भ्रम से मुक्त हैं. वे भी बदलती दुनिया को नहीं समझ रहे हैं और अपनी पुरानी नीतियों पर ही चलने की कोशिश जारी रखे हुए हैं। हम यह कह सकते हैं की दुनिया बदल गई लेकिन साम्राज्यवादी सोच या दृष्टि नहीं बदली है।
किसी जमाने में अमरीका, इंग्लैंड, जर्मनी इत्यादि देश दूसरे देशों को गुलाम बनाए रखते थे और जब चाहे तब अपनी फ़ौजें उन देशों में भेज दिया करते थे। विश्व साम्राज्यवादी अर्थ व्यवस्था का जन्म हुआ और दुनिया के बहुत सारे देशों को गुलाम बना लिया गया।
आज दुनिया में बहुत सारे परिवर्तन हो गए हैं। ना सिर्फ़ सोवियत एवं कुछ अन्य देशों का पतन हो सकता है बल्कि एक वैज्ञानिक और तकनीकी क्रांति या एस0टी0आर0 चल रही है जो लोगों के सामने विकास की नई संभावनाएँ खोल दे रही है।
इसे सम्राज्यवाद नियंत्रित करना चाहता है और वह नहीं चाहता कि इसका फायदा आम लोगों और कमजोर देशों को मिले। इससे भी ब़कर वह अकूत तेल भंडारों, खनिज क्षेत्रों, हथियारों के बाज़ारों, तथा अन्य कई प्रकार के मुनाफ़े के स्रोतों का भरपूर लाभ उठना चाहता है। साम्राज्यवाद के कई स्वरूप ज़रूर बदले हैं लेकिन उसका मूल चरित्र नहीं बदला है। दुनिया के तेल भंडारों पर कब्जा करने के लिए उसने अपनी सेनाओं को लामबंद किया है और उन्हें अत्याधुनिक हथियारों से लैस किया है। इराक़ में जिस तरह उसने दखलंदाजी की और फिर बड़े पैमाने पर हमला किया उससे उसका साम्राज्यवादी चरित्र ही उजागर होता है।
अमरीका तेल की राजनीति कुछ उसी तरह चला रहा है जैसे औपनिवेशिक साम्राज्यवादी युग में, खास तौर पर प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों के युग में साम्राज्यवादी चलाया करते थे। पहले यह देश किसी ना किसी बहाने अपनी सेना अरब और एशिया के देशों में भेज कर उन देशों और उनके तेल भंडारों पर कब्जा कर लेते थे और फिर वहाँ पर उनकी कठपुतली या सीधी खुद की सरकारें स्थापित कर दी जाती थीं।
हाल में अमरीका ऐसे ही तरीके अपनाने की कोशिश कर रहा है। उसने इराक़ में 2003 में पूर्व नियोजित तरीके से अपनी फौजें भेजीं। उसने बहाने पहले से तैयार करके रखे, यह जानते हुए कि इनका कोई आधार नहीं और ये पूरी तरह झूठ है। उसने चारो ओर यह ढिंोरा पीटा कि इराक़ बड़े पैमानें पर अत्याधुनिक न्यूक्लियर हथियार या डब्लू.एम.डी. बना रहा है जिसकी जानकारी उसे सी.आई.ए. से मिली, ऐसा बताया। वास्तव में सी.आई.ए. और अन्य को ऐसी झूठी तथा फर्जी रिपोर्टें तैयार करने को कहा गया। प्रेस और टी.वी तथा सारी दुनिया में उच्च दबाव का प्रचार चलाया गया। यू.एन. जाँच कमीशन ने बारबार कहा कि वह जाँच कर रहा है और उसे इसके कोई सबूत अभी नहीं मिले हैं, और यह कि अभी वार्ता के ज़रिए समस्या का हल निकाला जाना चाहिए, सैनिक हस्तक्षेप सही नहीं होगा।
ज्यादातर विश्व जनमत और सरकारों के मत भी इराक़ में सैनिक आक्रमण के विरोध में थे। खुद कई पिश्चमी देशों की सरकारें इस अमरीकी रुख़ के विरोध में और शांतिपूर्ण वार्तालाप तथा अधिक से अधिक आर्थिक नाकेबंदी के हक में थीं। इनमें से एक फ्रांस था जिसने अंत तक अमरीकी कार्रवाई का तीखा विरोध किया था। विकासमान देशों की सरकारें और जनता तो विरोध में थी ही। लेकिन अमरीका ने पहले ही मन बना लिया था और उसी के अनुसार सैनिक तैयारियाँ भी कर रहा था। उसे तो सिर्फ़ कोई बहाना चाहिए था और बहाना नहीं मिलने पर खुद ही कुछ बना लेता। उसे इराक़ में डाका डालने की जल्दी थी और सारे विश्व जनमत तथा स्वयं यू.एन. के नियम क़ानूनों और विश्व संबंधों को नियंत्रित करने वाले तौर तरीकों और क़ानूनों का खुलकर उल्लंघन करते हुए उसने बड़े पैमाने पर इराक़ की जनता और उसकी आज़ादी पर हमला बोल दिया। उस समय की घटनाओं को यदि हम याद करें तो स्मरण होगा कि लगभग सभी चाहते थे अमरीका की हार हो और इराक़ी जनता जीते। मीडिया भी इसी विचार का था। लेकिन कई कारणों से इराक की हार हो गई, जिसमें अमरीका के अत्याधुनिक हथियार और इराक़ के राजनैतिक ढांचे का तानाशाही चरित्र मुख्य कारणों में शामिल था।

-अनिल राजिमवाले

क्रमश:

सोमवार, 2 मई 2011

हाय ! ओबामा तूने अपने अब्बा हुजूर को मार डाला


अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने 1979 में अफगानिस्तान में साम्यवादी सरकार को उखाड़ फेकने के लिये बहुत सारे मुस्लिम नवजवानों को गुमराह करके धार्मिक युद्ध का नाम देकर लड़ने के लिये प्रेरित किया था। अमेरिकी कुख्यात खुफिया एजेंसी सी.आई.ए ने हथियार ट्रेनिंग रुपया देकर नवजवानों को आतंकवाद के रास्ते पर जाने के लिये शिक्षित दीक्षित किया था। 1989 में अफगानिस्तान से सोवियत फौजों की वापसी हो गयी। जिससे सी.आई.ए द्वारा भावनात्मक रूप से गुमराह किये युद्धरत जवान बेरोजगारी में आना शुरू हो गए। इन नवजवानों के पास आतंक फैलाने के अतिरिक्त कोई दूसरा हुनर नहीं था। सी.आई.ए ने हथियारों की सप्लाई के बदले में व धन प्राप्त करने के लिये अवैध रूप से अफीम की खेती भी शुरू करवाई अफीम की खेती के पश्चात अफीम से मार्फीन व हेरोइन का निर्माण व तस्करी को भी संरक्षण दिया।
उन्ही युद्धरत नवजवानों में सउदी अरबिया निवासी ओसामा बिन लादेन भी था। ओसामा बिन लादेन ने अमेरिकी शोषण तंत्र को समझा और अमेरिका के भयंकर विरोध में चला गया और उसने वही हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए जो अमेरिकी दूसरे देशों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से करते हैं। चाहे वर्ल्ड ट्रेड सेण्टर पर बम गिराने के बाद 9/11 की घटना हो जिसमें लगभग 3000 लोग मारे गए थे कि घटना को अंजाम देने का आरोप भी ओसामा बिन लादेन पर आया।
सोमवार (2 मई) की रात एक बजे अमेरिकी सरकार व सी.आई.ए ने पकिस्तान सरकार को बगैर सूचना दिए इस्लामाबाद से 60 किलोमीटर दूर एबदाबाद में ओसामा बिन लादेन सहित चार लोगों को मार डाला। ओसामा की दो पत्नियों सहित 6 बच्चों को गिरफ्तार कर लिया ओसामा की लाश को अमेरिकी प्रचार एजेंसियों के अनुसार इस्लामिक रीति-रिवाजों के अनुसार समुद्र में दफना दिया गया है। दो अमेरिकी हेलीकाप्टर ने इस ऑपरेशन में भाग लिया जिसमें एक हेलीकाप्टर को मार गिराए जाने की बात आई है वहीँ यह भी कहा जा रहा है कि अमेरिकियों ने स्वयं ही इसे नष्ट किया है। ओसामा के सिर में गोली मारी गयी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के समय से ओसामा अमेरिकियों के नजदीक रहा है इस रिश्ते से बराक हुसैन ओबामा का अब्बा हुजुर हो सकता है और 1989 से जब ओसामा अमेरिकियों के लिये अनुपयोगी हो गया और प्रतिरोध पर उतर आया तो उसकी हत्या उसके घर में जाकर कर दी गयी है। ओसामा के पकिस्तान में रहने की सूचना वहां की सरकार, आई.एस.आई और उनके आकाओं को भी रही होगी आज जब अमेरिकी मध्य एशिया में फंसे हैं तो ओसामा का वध करके दुनिया के विरोधी राष्ट्राध्यक्षों को भी एक नया सन्देश जारी किया जा रहा है। रहने सबसे ज्यादा दिक्कत पकिस्तान की सर्व भौमिक तथा संप्रभु सरकार की है जिसकी बगैर जानकारी के राजधानी इस्लामाबाद के नजदीक ऑपरेशन हो रहा हो और उनको सूचना न हो। अब आप इस बात से अंदाजा लगा लीजिये कि पकिस्तान में कैसी संप्रभु सरकार है। सी.आई.ए की उपशाखा आई.एस.आई को भी इस ऑपरेशन की भनक नहीं लगी। अमेरिकन साम्राज्यवादी शक्तियों के आगे संप्रभुता नाम की चीज नहीं है। उसके हित ही महत्वपूर्ण है। मुंबई आतंकी घटना के समय हमारे देश से भी अमेरिका की कुख्यात खुफिया एजेंसी एफ.बी.आई ने चश्मदीद गवाह अनीता उददैया को सरकार की जानकारी के बगैर अमेरिका लेकर चले गए थे और बाद में वापस छोड़ गए थे। अमेरिकी और खुफिया एजेंसी सी.आई.ए पाकिस्तान समेत अधिकांश देशों को अपना उपनिवेश बना रखा है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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