लीबिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लीबिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

सोशल साइट्स से पनपती मोहब्बत या नफरत

आधुनिक युग में सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है। जिसके द्वारा हम समाज के सभी पहलुओं को उठाने का कार्य करते हैं। चाहे वह आर्थिक हो, सामाजिक या फिर राजनैतिक सभी प्रकार की गतिविधियों को सोशल मीडिया ने अपने अंदर समा लिया है । किसी भी लोकतंत्र के सबसे महत्त्वपूर्ण स्तंम्भ होते हंै न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और पत्रकारिता। वर्तमान समय में पत्रकारिता ने देश के अधिकतर मनुष्यों को अपने कार्य में परोक्ष रूप से भागी बनाया है। क्योंकि उसका सबसे  बड़ा कारण है-सोशल साइट्स, सोशल साइट्स ही वर्तमान मीडिया का आधुनिक रूप है। इसलिए बहुत से विद्वान सोशल मीडिया को पत्रकारिता की माता भी स्वीकार करते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है, सोशल साइट्स पर हैश टैग करके किसी भी मुद्दे को इलेक्ट्रॉनिक या प्रिंट मीडिया को मुहैया कराना, इसके बाद उस मुद्दे पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संज्ञान लेती भी है, या नहीं उसका भी एक कारण है ज्त्च्!! यदि किसी चैनल विशेष को ऐसा प्रतीत होता है कि मुद्दा उनकी विचारधारा के अनुकूल है, तो उस पर बहस होती है, अन्यथा उसको ठंडे बस्ते में डालकर छोड़ दिया जाता है, लेकिन सबसे सशक्त माध्यम सोशल मीडिया पर हैश टैग करके मुद्दों को आगे बढ़ाया जाता है, कभी-कभी मुद्दा केवल सोशल मीडिया से ही आगे बढ़ता है और राजनेताओं तक पहुँच जाता है, जिससे कोई भी सांसद उस मुद्दे को संसद में उठाकर पक्ष या विपक्ष पर वार करता है। सोशल मीडिया का यदि हम विश्लेषण करें तो लगभग 200 साइट्स हैं, मुख्यतः हमारे मस्तिष्क में फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, ब्लॉग और व्हाट्सएप्प आदि का नाम सर्वप्रथम आता है, क्योंकि इन माध्यमों से कोई भी सूचना माइक्रोसैकेण्ड के अनुसार देश-विदेश में पहुँच जाती है और क्रिया प्रतिक्रिया भी तुरंत प्राप्त हो जाती है। सोशल मीडिया की लोकप्रियता का अंदाजा इस वैश्विक परिवेश में अमरीका के यूनाइटेड साइबर स्कूल से लगाया जाता है। विभिन्न संचार माध्यमों को जन-जन तक पहँुचने में काफी समय लगा जैसे रेडियो को अड़तीस साल, टी.वी. को तेरह साल तथा इन्टरनेट को चार साल और फेसबुक जैसी साइट्स को सौ मिलियन लोगों तक पहुँचने में मात्र नौ महीने लगे। उसके बाद आवश्यक्तानुसार सोशल साइट्स आती रही और कम समय में अपनी प्रसिद्धि को प्राप्त होती रही। सोशल साइट्स केवल युवाओं को ही नहीं पसंद है, बल्कि अमरीका के साठ से अस्सी साल तक के बुजुर्ग इस पर सक्रिय रहते हैं। अब यह संख्या भारत में भी बहुत तेज गति से आगे बढ़ रही है।
    सोशल साइट्स ने आम लोगों को अभिव्यक्ति का ऐसा स्वतंत्र माध्यम दिया है, जिसके जरिए वह अपनी बात दुनिया के किसी भी व्यक्ति को पलक झपकते ही पहुँचा सकता है और उसका परिणाम पॉजिटिव या नेगेटिव चिह्न में प्राप्त कर सकता है। वर्तमान समय में युवा जानकारी के लिए अधिकतर सोशल मीडिया पर ही निर्भर रहता है। यह बात दूसरी है कि जानकारी का स्रोत प्रामाणिक है या अप्रामाणिक। संयुक्त राष्ट्र अमरीका में पचहत्तर प्रतिशत लोग अपनी जानकारी को बढ़ाने के लिए ब्लॉग का प्रयोग करते हैं। एक तरह से सूचनाओं, जानकारियों का विकेंद्रीकरण हुआ है। क्योंकि अब लोग किसी सूचना के लिए व्यक्ति या संस्था पर आश्रित नहीं हैं, बल्कि बस एक क्लिक करके सूचनाओं का भण्डार आपके समक्ष खुल जाता है और आप उपयोगी जानकारियों का संग्रह करके उसका आवश्यकतानुसार प्रयोग भी कर सकते हैं तथा कुछ सेकण्ड में अपनी प्रतिक्रिया पक्ष या विपक्ष में भी व्यक्त कर सकते हैं जबकि पारम्परिक मीडिया में आप अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर सकते, जो खबर आपको  प्रसारित की गई है उसकी प्रामाणिकता में भी संशय रहता है। यदि हम सूचनाओं और आंदोलनों का अवलोकन करें, तो हम देखते हैं कि अनेक आंदोलनों का मुख्य सूचना का माध्यम सोशल साइट्स ही था जैसे अरब क्रांति, वाल स्ट्रीट, लीबिया, मिश्र और ट्यूनीशिया आदि देशो में भी आंदोलनों को मुखर रूप देने का कार्य सोशल साइट्स ने ही किया जिससे सत्ता पक्ष की चूलें हिलती हुई नजर आईं और युवाओं ने अपनी अभिव्यक्ति से वहाँ की तानाशाही सरकारों को सत्ता से बाहर कर दिया। यदि हम भारत के परिप्रेक्ष्य में दृष्टिपात करें तो हम देखते हैं कि अन्ना हजारे का आन्दोलन हो या फिर बाबा रामदेव का आन्दोलन हो, सबको मुख्यतः सोशल मीडिया ने ही रंग दिया और उस आन्दोलन ने सफल होते हुए तत्कालीन सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया, जिससे आगामी चुनाव में उसको सत्ता से हाथ धोना पड़ा और युवाओं को तत्कालीन सरकार की  भ्रष्टाचारी नीतियों से भी अवगत कराया गया।
    वर्तमान सरकार का यदि हम मूल्यांकन करें तो हम देखते हैं कि प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अधिकतर सत्ता के गलियारों से संचालित होती है, जिससे सत्ता के षड्यंत्र और दमनकारी नीतियों का लोगों को पूर्णतया पता नहीं चल पाता, जो हल्की फुलकी खबरें भी मालूम होती हैं उसमें कुछ खास जनता को जागरूक करने के लिए नहीं होता। सोशल मीडिया ने सत्ता की सभी दमनकारी नीतियों और षड्यंत्रकारी कार्यों का विश्लेषण तर्कपूर्ण करके उसको बहुत हद तक बैकफूट पर लाकर खड़ा कर दिया है, जैसे शिक्षा नीति हो या फिर धर्म से षड्यंत्र की नीति, नित्य रोज नए-नए शगूफों के माध्यम से वर्तमान सरकार बहुसंख्यक को रिझाने के लिए धार्मिक उन्माद, मानसिकता, साम्प्रदायिकता, लव जिहाद, गोमांस प्रकरण, रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या या फिर कन्हैया कुमार और उनके साथियों को देशद्रोही साबित करने का षड्यंत्र हो, इन सब काले कारनामों को युवाओं ने सोशल मीडिया के ही माध्यम से हैश टैग किया और अपने आन्दोलन को देशभर के लोगों तक पहुँचाया, जो बाद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी कुछ प्रसारित किया। मुख्यतः सोशल मीडिया ने इन सब आंदोलनों को सबसे अधिक कवरेज दिया और यह जन आन्दोलन के रूप में परिवर्तित हो पाया।
    जिस प्रकार से सोशल साइट्स को लोग अपने धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक कार्यों के लिए प्रयोग करते हैं, ठीक उसी प्रकार कुछ सांप्रदायिक ताकतंे भी इसका प्रयोग करके अपनी कुंठाग्रस्त इच्छाओं की भी पूर्ति करती हैं, जैसे असम हिंसा में लोगों को भयभीत करके उनको पलायन के लिए मजबूर किया गया। आजकल भारत में भी वीडियो या मैसेज के माध्यम से देश में घृणा का माहौल उत्पन्न करके राजनैतिक लाभ साधा जाता है, जैसे मुजफ्फरनगर दंगे से पहले कुछ राजनेताओं ने वहाँ की जनता को उलटी सीधी वीडियो दिखाकर एक धर्म विशेष के खिलाफ आक्रोशित करके मानवता का कत्ल कराया, जिससे पूरी मानवता उसके लिए शर्मशार हुई। दूसरी तरफ आजकल साइबर आतंकवाद भी इसका दुरुपयोग धड़ल्ले से कर रहा है। आम लोगों की  तरह आतंकवादी भी इसका उपयोग अपने नापाक इरादों को अंजाम देने के लिए कर रहे हैं, जिसमें छद्म नामों से फेसबुक, ट्वीटर आदि पर अपनी फेक आईडी बनाकर मासूम नौजवानों को अपने चंगुल में फंसाकर और धन का लालच देकर उनका दोहन करके अपनी कुंठाग्रस्त इच्छाओं की पूर्ति कर रहे हैं। आजकल फेसबुक और व्हाट्सएप्प के माध्यम से नफरत फैलाने का कार्य चरम सीमा पर है। इसमें कार्य करने वाले कुछ ऐसे लोग हैं, जिनको राजनैतिक पार्टियाँ अपने हित को साधने के लिए धर्म की मखमली चादर में लपेटे हुए हैं। पार्टियाँ यह कार्य मैसेज, फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर अपने किराए के यूजर से कराती हैं, जिससे समाज में तर्कहीन और तथ्यहीन जानकारी पहुँचती है, जिससे सामज को तोड़कर अपने वोट बैंक की पॉलिटिक्स को साधा जाता है। ऐसे आरोप देश की अनेक राजनैतिक पार्टियों को लग चुके हैं जैसे-कांग्रेस, बीजेपी और आप।
    इसकी सच्चाई जानने के लिए आप फेसबुक के हिंदी या अंग्रेजी न्यूज चैनल के आधिकारिक फेसबुक पेज पर जाएँ, तो देखेंगे कि हर तीसरा कमेंट एक जैसा होगा तथा उसमें तथ्यहीन, कुतर्क सम्मत जानकारी होगी, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि यह कमेंट किसी एक व्यक्ति ने प्रचारित किया है अपनी पार्टियों की राजनैतिक महत्वाकांक्षा को पूर्ण करने के लिए। सोशल साइट्स को आजकल कुछ पारंगत लोग आईडी, ईमेल हैक करके उसका दुष्प्रयोग कर रहे हैं, जैसे विकिलीक्स ने बहुत सारे खुलासे विभिन्न देशों के सन्दर्भ में किए। जिसमें पूँजीपति देशों की मंशा और उनके राजनैतिक कूटनीति का पता चलता है। सोशल साइट्स को कम उम्र के बच्चे ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं, जो कि अभी किशोरावस्था में हैं जिससे उनके ऊपर मानसिक, शारीरिक और व्यावहारिक तौर पर असर देखने को मिल रहा है कुछ वयस्क और अवयस्क लोग सोशल साइट्स पर आपत्तिजनक वीडियो और फोटो शेयर करते हैं, जिससे टीनेजर में कामुकता और समय से पहले वयस्क होने की प्रवृत्ति को वे महसूस करने लगते हैं जो कि सभ्य समाज के लिए अत्यंत घातक है तथा मनोवैज्ञानिक तौर पर भी बच्चे का व्यवहार माता-पिता और समाज के लिए सही नहीं होता है। एक शोध से मालूम हुआ है कि फेसबुक का प्रयोग करने वाले एक करोड़ से ज्यादा सदस्य चैदह साल से कम आयु के हैं।
    आजकल सोशल साइट्स सिर्फ अपनी बात और विचार रखने भर का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह रिश्तों को जोड़ने का भी माध्यम है, जिस प्रकार से सोशल साइट्स पर केवल नफरत ही नहीं परोसी जाती हैं बल्कि मोहब्बत के भी रंग भरे जाते हंै जहाँ पर बहुत से नए मित्र बनते है, वहीं दूसरी तरफ पुराने मित्र भी मिलते हैं और अपने व्यक्तिगत जीवन को एक-दूसरे से शेयर करते हैं, जिसके माध्यम से देश-विदेश में बैठे पुराने या नए मित्रों से बात पल भर में हो जाती है। वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो देश-विदेश में बैठे रिश्तेदारों से आजकल पल भर में अनेक सोशल साइट्स के माध्यम से वीडियो कालिंग हो जाती है, जिससे रिश्तों में एक अलग मिठास का अनुभव होता है और रिश्ते मजबूत बने रहते हैं।
    वर्तमान समय में हम सोशल मीडिया का सही उपयोग करके समाज को कुछ बेहतर प्रस्तुत कर सकते हैं, यदि देश और राज्य की सरकारों ने इस पर समय रहते काबू नहीं पाया तो आए दिन बढ़ती मानसिक साम्प्रदायिकता और नफरत का माहौल नहीं रुक पाएगा, जो इस सभ्य समाज के लिए हानिकारक है। अर्थात हम कह सकते हैं कि यदि सही प्रयोग किया गया तो सोशल मीडिया, सोशल मीडिया ही रहेगा, वरना शोषण मीडिया बनकर समाज को अनेक प्रकार से ठगता रहेगा। इसके सही प्रयोग से हमारी पहचान देश ही नहीं विश्व स्तर पर बनेगी और हम वसुधैव कुटुम्बकम् का सही मतलब दुनिया को समझा पाएँगे।
 -अकरम हुसैन
मोबाइल - 08791633435
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2016 में प्रकाशित

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

साम्राज्यवादी शक्तियों का निशाना बने गद्दाफी - 2

इस पूरे घटनाक्रम में पश्चिमी ताकतों का साथ पश्चिमी मीडिया द्वारा पूर्ववत दिया गया। इराक व अफगानिस्तान युद्ध की ही तरह लीबिया को भी दुनिया ने पश्चिमी मीडिया की नज़रों से ही देखा व समझा है। सी0एन0एन0 तथा अन्य कुछ प्रमुख पश्चिमी मीडिया संगठन दुनिया को जो दिखाना व सुनाना चाहते हैं, दुनिया वही देखती व सुनती है। इराक की ही तरह यही लीबिया में भी हुआ है। गद्दाफी द्वारा लीबिया के विकास के लिए किए गए कार्यों को कभी भी विश्व मीडिया ने प्रचारित नहीं किया। जबकि गद्दाफी द्वारा ाए गए ज़ुल्मोसितम को कई गुना ब़ाचढ़ा कर हमेशा पेश किया जाता रहा। वर्तमान विद्रोह के हालात में भी गद्दाफी समर्थक सेना द्वारा विद्रोहियों पर किए जा रहे हमलों को कई गुना ब़ाकर बताया जा रहा था। परंतु गद्दाफी की मौत होने तक उनके द्वारा लीबिया के विकास के लिए किए गए कामों का इसी मीडिया ने कहीं कभी कोई ज़िक्र नहीं किया। हाँ गद्दाफी की मौत के बाद अब यह ज़रूर सुना जा रहा है कि गद्दाफी को मारने वाले व्यक्ति को सज़ा दी जाएगी।
कर्नल गद्दाफी कट्टरपंथी व रूविदी विचारधारा के सख्त विरोधी थे। वे एक अरबअफ्रीकी कबीलाई मुस्लिम तानाशाह होने के बावजूद एक धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के व्यक्ति थे। पश्चिमी देश भी शायद दुनिया में ऐसे ही धर्मनिरपेक्ष शासक चाहते हैं परंतु अपने पिट्ठू रूविदी शासकों को छोड़कर। ऐसे में गद्दाफी के शासन के अंत के बाद अब लीबिया में अभी से इस प्रकार के स्वर बुलंद होने लगे हैं गोया
आधुनिकता की राह पर आगे ब़ता हुआ लीबिया इस सत्ता परिवर्तन के बाद धार्मिक प्रतिबद्धताओं की गिरफ्त में भी आता दिखाई दे रहा है। यदि ऐसा हुआ तो यह रास्ता अफगानिस्तान व पाकिस्तान जैसी मंज़िलों की ओर ही आगे ब़ता है और यदि लीबिया उस रास्ते पर आगे ब़ा तो लीबिया का भविष्य क्या होगा? इस बात का अभी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है। सवाल यह है कि क्या अमरीका अथवा नाटो देश लीबिया के इन ज़मीनी हालात से वाकिफ नहीं हैं। या फिर किसी दूरगामी रणनीति के तहत जानबूझ कर इस सच्चाई से आँखें मूँदे बैठे हैं। दूसरी स्थिति लीबिया में सत्ता संघर्ष की भी पैदा हो सकती है। कर्नल गद्दाफी का अंत तो ज़रूर हो गया है मगर उस कबीलाई समुदाय का अंत नहीं हुआ जिससे कि गद्दाफी का संबंध था तथा जो लीबिया में अपनी मज़बूत स्थिति रखते हैं। आने वाले समय में गद्दाफी समर्थंक ये शक्तियाँ चुनाव में हिस्सा ले सकती हैं तथा सत्ता पर अपने वर्चस्व के लिए सभी हथकंडे अपना सकती हैं। यदि ऐसी स्थिति में लीबिया को गृह युद्ध का सामना करना पड़ा तो निश्चित रूप से पश्चिमी शक्तियाँ ही इसकी ज़िम्मेदार होंगी।
गोया साफतौर पर यह नज़र आता है कि लीबिया को गद्दाफी की तानाशाही व उसकी क्रुरता का बहाना लेकर तबाह व बर्बाद करने की एक सुनियोजित साज़िश रची गई और इराक के घटनाक्रम की ही तरह लीबिया के तेल भंडारों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने की चालें पश्चिमी देशों द्वारा बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से चली जा रही हैं। इराक की ही तरह लीबिया भी दुनिया के दस प्रमुख तेल उत्पादक देशों में एक है। लिहाज़ा पश्चिमी देशों को अपने दुश्मन राष्ट्राध्यक्ष की मुट्ठी में लीबिया की तेल संपदा का होना अच्छा नहीं लगा। नतीजतन इन साम्राज्यवादी देशों ने बैठेबिठाए कर्नल गद्दाफी को दुनिया का सबसे क्रुर तानाशाह तथा मानवाधिकारों का हननकर्त्ता बताते हुए उसे मौत की मंज़िल तक पहुँचा दिया। परंतु अंत में यह कहना भी गलत नहीं होगा कि सद्दाम हुसैन रहे हों अथवा कर्नल गद्दाफी इन सभी तानाशाहों को भी यह ज़रूर सोचना चाहिए था कि साम्राज्यवादी पश्चिमी देशों की गिद्ध दृष्टियाँ चूँकि इन देशों की प्राकृतिक तेल संपदा पर टिकी हुई हैं लिहाज़ा उन्हें इन पर नियंत्रण करने हेतु कोई न कोई बहाना तो अवश्य चाहिए। नि:संदेह इन तानाशाहों ने अपने स्वार्थपूर्ण व क्रुरतापूर्ण कारनामों के चलते इन शक्तियों को अपनेअपने देशों में घुसपैठ करने व देश को तबाह करने का सुनहरा अवसर प्रदान किया है। प्रश्न यह है कि अमरीका व पश्चिमी देशों की छलपूर्ण नीतियों का यह सिलसिला कभी समाप्त भी होगा या फिर उनकी इस प्रकार की मनमानी भविष्य में भी यूँही चलती रहेगी?

तनवीर जाफरी
मो. 09896219228
समाप्त

सोमवार, 2 जनवरी 2012

साम्राज्यवादी शक्तियों का निशाना बने गद्दाफी - 1

पश्चिमी देशों द्वारा लिखी गई एक और स्क्रिप्ट के अनुसार लीबिया को स्वतंत्र लोकतांत्रिक राष्ट्र घोषित किया जा चुका है। लीबिया में गत फरवरी से शुरु हुआ जनविद्रोह आखिरकार आठ महीनों के संघर्ष के बाद पिछले दिनों तानाशाह कर्नल मोअम्मर गद्दाफी की मौत के पश्चात अपने पहले चरण को पूरा कर चुका है। पश्चिमी प्रभुत्व वाले विश्व मीडिया के सुनियोजित प्रोपेगंडे के मुताबिक लीबिया को एक क्रुर तानाशाह से मुक्त किया गया है। अब लीबिया को लेकर भी वही प्रश्न उठने लगे हैं कि क्या गद्दाफी व उनके परिवार के चंगुल से लीबिया के मुक्त होने के बाद वहाँ अमन, शांति व लोकतांत्रिक सरकार का वातावरण शीघ्र बन पाएगा? या फिर भविष्य में लीबिया का हश्र भी इराक अथवा अफगानिस्तान जैसा ही होने की संभावना है? नि:संदेह लीबिया के राजा इदरीस का 1969 में तख्ता पलटने के बाद मात्र 27 वर्ष की आयु में लीबिया के प्रमुख नेता के रूप में स्वयं को स्थापित करने वाले कर्नल मोअम्मर गद्दाफी ने अपने लगभग 40 वर्ष के तानाशाह शासन काल के दौरान अपने तानाशाही स्वभाव के अनुसार जमकर मनमानी की। अपने विरोधियों को बुरी तरह प्रताड़ित किया। उनके शासनकाल में कई बार सामूहिक हत्याकांड जैसी घटनाएँ उनके विरोधियों के साथ घटीं, कई बार उन्होंने अपने विरोधियों को कुचलने के लिए बड़े ही अमानवीय व क्रुरतापूर्ण आदेश भी दिए। निश्चित रूप से यही कारण था कि लीबियाई नागरिकों के एक बड़े वर्ग में उनके प्रति नफरत तथा विद्रोह की भावना घर कर गई थी। परिणाम स्वरूप लीबिया की प्रगति के लिए तथा वहाँ की जनता की सुखसुविधाओं हेतु किए गए तमाम विकास संबंधी कार्यों के बावजूद वहाँ की जनता में उनके प्रति विद्रोह की भावना पनप रही थी। ज़ाहिर है लीबिया के इस राजनैतिक वातावरण पर पश्चिमी देशों की गिद्ध दृष्टि काफी लंबे समय से टिकी हुई थी और ये शक्तियाँ केवल मुनासिब वक्त का इंतज़ार कर रही थीं।
पश्चिमी देशों की मुँहमाँगी मुराद उस समय पूरी हो गई जबकि ट्यूनीशिया से शुरू हुए जनविद्रोह ने इसी वर्ष फरवरी में लीबिया को भी अपनी चपेट में ले लिया। सत्ता पर अपना कब्ज़ा बरकरार रखने के लिए उस समय भी गद्दाफी ने अपने ही देश के अपने विरोधियों को कुचलने के लिए सैन्यशक्ति का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया था। गद्दाफी द्वारा की जा रही सैन्य कार्रवाई को एक बार फिर पश्चिमी शक्तियों ने पश्चिमी मीडिया के सहयोग से ब़ाचढ़ा कर प्रचारित किया। साम्राज्यवादी शक्तियों को गद्दाफी व उसकी सेना द्वारा उठाया जाने वाला यह कदम विश्व में मानवाधिकारों का अब तक का सबसे बड़ा उल्लंघन नज़र आया। परिणाम स्वरूप नाटो की वायुसेना ने लीबिया में सीधा हस्तक्षेप किया और आखिरकार आठ महीने तक चले इस संघर्ष में जीत नाटो की ही हुई। ताज़ा हालात के मुताबिक लीबिया में राजनैतिक कामकाज सँभालने के लिए अस्थाई रूप से बनी राष्ट्रीय अंतरिम परिषद ने देश में अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया तथा शीघ्र ही चुनाव कराए जाने की घोषणा भी कर दी गई है। दुनिया को लीबिया के विषय में यही बताया जा रहा है कि एक क्रुर तानाशाह के साथ जो कुछ भी होना चाहिए था लीबिया में वही देखने को मिला। इराक में सद्दाम हुसैन के शासन के पतन के समय भी लोकतांत्रिक विचारधारा के समर्थकों की ऐसी ही राय थी। परंतु क्या पश्चिमी देशों के विशेषकर अमरीका के सहयोगी राष्ट्रों को दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में सत्ता पर काबिज़ वही तानशाह, क्रुर व अमानवीय प्रवृति के तानाशाह नज़र आते हैं जो अमरीका या अन्य पश्चिमी देशों की मुट्ठी में रहना पसंद नहीं करते? बारबार यह प्रश्न उठता है कि तेल उत्पादक देशों के वे तानाशाह जिनके अमरीका के साथ मधुर संबंध हैं वहाँ अमरीका लोकतंत्र स्थापित करने की बात क्यों नहीं करता?
अमरीकी पिट्ठू तमाम ऐसे देश हैं जहाँ मानवाधिकारों का इस क़दर हनन होता है कि महिलाओं को घर से बाहर निकलने तक की इजाज़त नहीं है, वे सार्वजनिक कार्यक्रमों व खेलकूद में हिस्सा नहीं ले सकतीं, स्कूलकॉलेज नहीं जा सकतीं, जहाँ बादशाह के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करने वालों के मुंँह बलपूर्वक बंद कर दिए जाते हैं, जहाँ कभी लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया के दौर से देश की जनता न गुज़री हो वहाँ आखिर लोकतंत्र स्थापित करने की बात अमरीका व अन्य पश्चिमी देशों द्वारा क्यों नहीं की जाती? परंतु इन सब नकारात्मक व अलोकतांत्रिक परिस्थितियों के बावजूद ऐसे देशों के शासक चूँकि अमरीका के पिट्ठू हैं लिहाज़ा ऐसे देशों में इन्हें तानाशाही स्वीकार्य है और यदि यही तानाशाह सद्दाम अथवा गद्दाफी की तरह अमरीका की आँखों में आँखें डालकर देखने का साहस रखते हों तो गोया दुनिया में इनसे बुरा व क्रुर तानाशाह कोई भी नहीं? इन हालात में स्थानीय विद्रोह को हवा देने में यह पश्चिमी देश देर नहीं लगाते। गद्दाफी के तमाम तानाशाहीपूर्ण रवैयों तथा मनमानी के बावजूद एक सच्चाई यह भी है कि लीबिया के विकास के लिए विशेष सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा तथा उद्योग के क्षेत्र में लीबिया की जो हकीकत बयान की जाती है वह वास्तव में किसी विकसित राष्ट्र जैसी ही प्रतीत होती है। हाँ गद्दाफी के क्रुर स्वभाव को लेकर लीबिया की जनता में ज़रूर गद्दाफी के प्रति विरोध की भावना पनप रही थी। जनता की इस भावना का पहले तो गद्दाफी के स्थानीय राजनैतिक विरोधियों ने लाभ उठाया और बाद में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गद्दाफी से खुश न रहने वाली पिश्चमी ताकतों ने गद्दाफी के विरुद्ध छिड़े विद्रोह को ही अपना मज़बूत हथियार बनाया। नाटो की दखल अंदाज़ी से गद्दाफी को मौत की दहलीज़ तक पहुँचा दिया। पश्चिमी देशों की दखल अंदाज़ी ने गद्दाफ़ी से लीबिया को भले ही मुक्त करा दिया हो परंतु लीबिया के भविष्य को लेकर ज़बरदस्त खतरा भी मँडराने लगा है।

तनवीर जाफरी
मो. 09896219228
( क्रमश: )

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

लीबिया में जनतंत्र की स्थापना या साम्राज्यी तेल कम्पनियों की तानाशाही की स्थापना


यह लीबियाई राष्ट्र में गद्दाफी की शासन सत्ता को हटाकर जनतंत्र की स्थापना करना नही है , बल्कि लीबिया की राष्ट्रवादी रुझानो वाली सरकार को हटाकर लीबियाई राष्ट्र पर साम्राज्यी ताकतों , कम्पनियों की तानाशाही स्थापित करना है | उन्हें लीबिया और उसके तेल पेट्रोल की लूट की मनमानी छुट देना तथा उनकी धुर हिमायती या कहिये पिठ्ठू सत्ता सरकार को स्थापित करना है।

अब तक लीबिया के शासक कर्नल गद्दाफी लीबिया के विद्रोहियों द्वारा साम्राज्य वादी ताकतों ने मरवा दिया | त्रिपोली और अन्य तमाम क्षेत्रो पर विद्रोहियों की ;राष्ट्रीय अस्थाई कौसिल ' की नयी अंतरिम सरकार का कब्जा हो चुका है | हालाकि ' राष्ट्रीय 'नाम की यह कौसिल और उसकी सरकार पूर्णतया अन्तराष्ट्रीय नाटो सेना के नियंत्रण में है और उस पर पूरी तरह से निर्भर भी है | वह फ्रांस , इंग्लैण्ड जैसे साम्राज्यी नाटो देशो के प्रभुत्व में है | नाटो देशो ने खासकर फ्रांस और ब्रिटेन ने विद्रोहियों की मदद क्यों की ? क्या कर्नल गद्दाफी के बहुप्रचारित 40 साल तक तानाशाही राज्य की जगह लीबिया के लोगो के जनतांत्रिक शासन की स्थापना के लिए ? क्या फरवरी 2011 से आज तक नाटो सेनाओं के हवाई हमलो से लेकर उनके हथियारों से लड़ रहे विद्रोही सैनिक दरअसल लीबियाई जनता के लोग है ? क्या कर्नल गद्दाफी के शासन को बचाने के लिए लड़ रहे लोग लीबियाई जनता नही है ? क्या वे मात्र कर्नल गद्दाफी के विश्वास पात्र सैनिक व उनके कबीले के लोग है ? जैसा की प्रचार होता रहा है | अगर उपरोक्त प्रचार सच होते तो 65 लाख की आबादी वाले देश लीबिया में यह युद्ध बहुत पहले ही खत्म हो जाना चाहिए था | कहा एक तरफ विद्रोही बताई जाने वाली लीबियाई जनता और फ्रांस , ब्रिटेन व अन्य नाटो देशो के आधुनिकतम हवाई व जमीनी हमले और कहा लीबिया के कबीले के लोग और गद्दाफी के विश्वस्त सैनिक ! दोनों में कही कोई समानता ही नही बैठती | फिर भी यह युद्ध महीनों खीचा और खीच रहा है | अभी भी कर्नल गद्दाफी के सेना लड़ रही है | युद्ध के दौरान नाटो सेना और उससे मदद लेते विद्रोहियों को कई जगह पीछे भी धकेलती और हराती भी रही है | यह स्थिति इस बात की सूचक है की नाटो सेनाओं के बूते लड़ने वाले लोग लीबिया की आम जनता नही है , बल्कि वे मुख्यत:फ्रांस व ब्रिटेन के तरफदार लीबियाई व गैर लीबियाई लोग है | हो सकता है की उनके प्रचारों , प्रभावों से बहकी हुयी लीबियाई जनता का भी एक हिस्सा हो , परन्तु व्यापक लीबियाई जनता उनके साथ नही है और न ही नाटो देश लीबियाई जनता के जनतंत्र के लिए वहा लड़ने ही पहुचे है |
वे वहा किसलिए पहुचे है ? जैसे - जैसे यह युद्ध आगे बढ रहा है और यह लग रहा है कि , फिलहाल वहा के तेल - पेट्रोल भण्डार पर गद्दाफी की सत्ता का नियंत्रण नही रह पायेगा , वैसे - वैसे इसका खुलासा भी होने लगा है | हमले के पीछे छिपे उद्देश्यों के तथ्यगत - यह गोपनीय समझौता अब सामने आ रहा है , की, फ्रांस ने विद्रोहियों से यह करार पहले से ही कर रखा है की लीबिया अपने तेल का 35 % हिस्सा फ्रांसीसी तेल कम्पनियों को दे देगा | इसी तरह से विद्रोहियों के दुसरे बड़े मददगार साम्राज्यवादी ब्रिटेन की तेल कम्पनियों के लिए ब्रिटेन सरकार द्वारा लीबिया में किये जा रहे प्रयासों की भी खबरे आ रही है | इस काम में ब्रिटिश पेट्रोलियम कम्पनियों ने ब्रिटिश सरकार के इन्टरनेशनल डेवलपमेंट मंत्री एलन डकन को ऐसे समझौतों के लिए आगे किया हुआ है श्री डकन के वहा की तेल कम्पनियों के साथ पहले से ही घनिष्ठ सम्बन्ध रहे है | ब्रिटिश तेल कम्पनियों के इसी उद्देश्य के मद्देनजर ब्रिटिश सरकार और उसकी नाटो सेना युद्ध के दौरान विद्रोहियों को पेट्रोल सप्लाई करने और कर्नल गद्दाफी की सेना को सप्लाई रोकने की जिम्मेदारी सभालती रही है | इनके अलावा अमेरिकी तेल कम्पनिया भी इसी प्रयास में जुटी है | अमेरिकी लीबिया पर नाटो सैन्य हमले की अगुवाई नही कर रहा था | संभवत: वह ईराक और अफगानिस्तान के बाद लीबिया में अगुवाई करके फसना और अपने मौजूदा दौर के कर्ज़ संकट को बढाना नही चाहता है | लेकिन लीबिया के तेल - पेट्रोल में अपनी हिस्सेदारी बनाने में अमेरिकी तेल कम्पनिया पीछे भी नही रहना चाहती | इसलिए अमेरिकी सरकार लीबिया की बर्बाद हो चुकी नागरिक सेवाओं को चुस्त - दुरुस्त करने के नाम पर लीबिया में घुसपैठ करके तेल डील करने में लगी हुई है | जहा तक कर्नल गद्दाफी के शासन के दौर में तेल कम्पनियों के अधिकारों का मामला है , तो गद्दाफी ने साम्राज्यी तेल कम्पनियों को पहले तो लगभग देश से बाहर कर दिया था , लेकिन' लाक हीड़ बमबारी 'के बाद लीबिया पर लगे संयुक्त राष्ट्र के सालो - साल के प्रतिबंधो को हटाये जाने के उपरान्त उन्होंने
साम्राज्यी तेल कम्पनियों को देश में दुबारा आने का निमंत्रण दे दिया था | लेकिन इस निमंत्रण में विदेशी कम्पनियों को पूरी स्वतंत्रता के साथ नही बल्कि खासे प्रतिबंधो व शर्तो के साथ ही बुलावा दिया गया था | कयोंकि गद्दाफी व उनकी बाथ सोशलिस्ट पार्टी अपनी तमाम कमजोरियों के वावजूद अपने राष्ट्रीय हितो को लेकर साम्राज्यी ताकतों व साम्राज्यी कम्पनियों की विरोधी रही है | सउदी अरब , कुवैत , जैसी शेखशाही सत्ता सरकारों की तरह की तरह अमेरिका व दूसरी हिमायती या पिठ्ठू सरकार नही रही है | वर्तमान दौर के वैश्वीकरण में अमेरिका , इंग्लैण्ड व फ्रांस जैसी साम्राज्यी ताकतों और साम्राज्यी कम्पनिया ख़ास कर उन देशो कि महाताकतवर पेट्रोल कम्पनिया अपने उपर किसी हद तक कोई भी प्रतिबन्ध लगाने वाली किसी राष्ट्रवादी ताकत को बर्दाश्त नही कर सकती है | इसीलिए सद्दाम हुसैन के बाद कर्नल गद्दाफी का नम्बर तो लगना ही था और वह लगा भी | ताकि साम्राज्यवादी ताकतों और उनकी पेट्रोल कम्पनियों को पूरा - पूरा अधिकार व छूट मिले | विश्व में लीबिया के अव्वल दर्जे के पेट्रोल पर उनका एकाधिकार स्थापित हो | विद्रोहियों का ' राष्ट्रीय कौसिल ' नाम का नया सत्ताधारी संगठन लीबियाई राष्ट्र के विरोध में यही काम कर रहा है | यह लीबियाई राष्ट्र में गद्दाफी की शासन सत्ता को हटाकर जनतंत्र कि स्थापना करना नही है ,बल्कि लीबिया कि राष्ट्रवादी रुझानो वाली सरकार को हटाकर लीबियाई राष्ट्र पर साम्राज्यी ताकतों , कम्पनियों की तानाशाही स्थापित करना है | उन्हें लीबिया और उसके तेल पेट्रोल के लूट की मनमानी छूट देना तथा उनकी धुर हिमायती या कहिये पिठ्ठू सत्ता सरकार को स्थापित करना है | ताकि साम्राज्यी ताकतों और उनकी तेल पेट्रोल कम्पनियों को लीबिया के तेल पेट्रोल के लूट की पूरी छूट मिले और उस पर उनका नियंत्रण स्थापित हो जाए | दुनिया के अन्य देशो में और हमारे देश में भी साम्राज्यी हितो के अनुसार ऐसे ही परिवर्तन एकदम शांतिपूर्ण तरीके से हो रहे है | साम्राज्यी पूंजी और साम्राज्यी कम्पनियों की बढती अधिकारपूर्ण घुसपैठ के साथ उनके सहयोगी व हिमायती बने इन देशो के धनाढ्य व उच्च हिस्सों की छूटे व अधिकार भी निरन्तर बढ़ते जा रहे है | जबकि जनसाधारण के अधिकार व छूटो में लगातार कटौतिया बढती जा रही है | यह परिवर्तन देश के बहुसख्यक जनता के जनतंत्र का द्योतक नही है , बल्कि लोकतंत्र के नाम पर जनसाधारण पर अमेरिका जैसी साम्राज्यी ताकतों के साथ देश की धनाढ्य कम्पनियों और उच्च हिस्सों की तानाशाही का द्योतक है | लीबिया में यही काम युद्ध के जरिये हो रहा है | कर्नल गद्दाफी के राष्ट्रवादी जनतांत्रिक सत्ता की जगह साम्राज्यी ताकतों , साम्राज्यी तेल पेट्रोल कम्पनियों की तानाशाही सत्ता पिठ्ठुओं , हिमायतियो कि तानाशाही सत्ता स्थापित की जा रही है और वह भी जनतंत्र की स्थापना के नाम पर |

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

रविवार, 26 जून 2011

संयुक्त राष्ट्र की राजनीति: अमरीकी साम्राज्यवाद का खेल

इराक के बाद लीबिया
सुरक्षा परिषद ने एक ओर तो बहरीन में विदेशी सेनाओं के प्रवेश को अनदेखा किया परन्तु दूसरी ओर लीबिया में उसके तेल भण्डार पर कब्जे़ हेतु अरबलीग के इशारे से नो फ्लाई मिलिट्री जोन लागू किया।
इस बार लीबिया में वही सब हो रहा है जो प्रथम खाड़ी युद्ध के बाद के वर्षों में इराक में घटित हुआ था। याद होगा कि इराक पर जो हमला और कब्जा किया गया उसका मुख्य उद्देश्य वहाँ के तेल स्रोतों पर कब्जा जमाना तथा वहाँ के बजट एवं तेल की आमदनी को हाथ में लेना था। यह इसलिए कि बड़ी आर्थिक शक्तियों को अपनी गिरती हुई आर्थिक स्थिति को सँभालना था। इस हेतु उन्हें रूस एवं चीन के सहारे आगे बढ़ना था ताकि इराकी जनता के प्रतिरोध का मुकाबला उन पर सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव द्वारा प्रतिबंध लगा कर, किया जाय। लीबिया में अब संयुक्त राष्ट्र ने ‘नो फ्लाई जोन’ तथा अन्य प्रतिबंधों को अपने प्रस्ताव द्वारा लागू कर दिया है, जो एक बड़ा तेल उत्पादक देश है।
यह ध्यान देने योग्य बात है कि सुरक्षा परिषद के एक भी स्थाई सदस्य ने ‘वीटो’ का प्रयोग नहीं किया। रूस एवं चीन द्वारा वोट का बहिष्कार तथा वीटो के
अधिकार का प्रयोग न करने का अर्थ तो यही निकला कि उन्होंने प्रस्ताव का समर्थन किया। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि ये शक्तियाँ लीबिया में वही सब हरकते करेंगी जो वह इराक में कर चुकी हैं। नागरिकों एवं सभी जमीनी जीवों आदि पर बम वर्षा, यहाँ तक की लीबिया के उन सच्चे राजनैतिक आन्दोलन कर्ताओं पर भी जो किसी कठपुतली सरकार को लाने का विरोध कर सकते थे। संसार एक नए प्रकार का उपनिवेशवाद देख रहा है- एक ऐसा सार्वभौमिक नेटवर्क जो अपने आर्थिक एवं भौगोलिक स्वार्थों की पूर्ति हेतु आर्थिक एवं कार्पोरेट शक्तियों के साथ-साथ नाटो एवं सुरक्षा परिषद के गठजोड़ का प्रयोग करता है।
इस प्रस्ताव का प्रभाव दूर तक जाता है। लीबिया में एक राजनैतिक आन्दोलन चल रहा है जो लीबिया के तेल पर बाहरी शक्तियों के कब्जे का विरोध करताहै तथा कर्नल गद्दाफी का भी विरोधी है, उन्हें भी अलग-थलग करने की रणनीति है। अब यह देखिए कि जिसे चतुराई से ‘उड़ान निषिद्ध क्षेत्र’ घोषित किया गया वहाँ नाटो के सैनिक विमान बराबर उड़ रहे हैं, क्योंकि ‘प्रस्ताव’ वहाँ बाहरी शक्तियों को सैनिक कार्यवाही की स्वीकृति देता है।
सुरक्षा परिषद के इस प्रस्ताव का उद्देश्य निश्चित रूप से यह नहीं है कि कर्नल गद्दाफी के वास्तविक या कथित अत्याचारों पर रोक लगाई जाए या यह कि वहाँ की आन्तिरिक अशान्ति का मामला सैनिक कार्यवाही द्वारा हल किया जाय। वास्तविकता यह है कि ये शक्तियाँ स्वयं अपनी आंतरिक, आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक अशान्ति एवं समस्याआंे से बचने के लिए ऐसा करती हैं, जैसा कि उन्होंने इराक में किया था। वे इस प्रस्ताव की सहायता से लीबिया के तेल भण्डारों पर पूर्ण नियंत्रण एवं कब्जा भी चाहते हैं। जो जन-आन्दोलन चल रहे हैं, उनसे उन साम्राज्यवादियों को खतरा है जो अरब के पैसों से मौज उड़ा रहे हैं। वहाँ की कामकाजी जनता को जीविकोर्पाजन एवं सुरक्षा से वंचित कर दिया गया है अतः उनकी अशान्ति ने वहाँ के बादशाहों की नींद हराम कर दी है तथा उनके बाहरी समर्थकों के तेल के फायदे को भी नुकसान पहुँचाया है जो अभी तक शेखों के शोषण सिस्टम को समर्थन देते रहे हैं।
वित्तीय एवं कार्पोरेट जगत नाटो तथा रूस एवं चीन के साथ मिलकर ‘उड़ान निषिद्ध क्षेत्र’ को इसलिए लागू कर रहे हैं कि लीबिया में ऐसा कोई विकल्प न निकले जो इन सबके स्वार्थ के विपरीत हो। यह एक राजनैतिक तथ्य है कि सभी अरब देशों में तेल का अथाह पैसा है, फिर भी उन्होंने उसको अपनी जनता के कल्याण के लिए खर्च नहीं किया। दूसरी ओर अरब लीग के सदस्य होते हुए भी कई देशों ने इसराईल से संबंध स्थापित कर लिए।
वहाँ की जनता जो पहले नहीं जानती थी अब सुरक्षा परिषद की दोगली नीति को जान गई है। तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के कुवैत पर अचानक सैनिक आक्रमण की भत्र्सना सुरक्षा परिषद एवं अरब लीग ने की परन्तु दूसरी ओर कपटपूर्ण ढंग से इराक में अमरीकी राजदूत ने इसे उकसाया। इसी प्रकार इराक-ईरान की युद्ध रचना इस क्षेत्र को कमजोर करने हेतु की गई। कुवैत जो कि उस क्षेत्र की उपनिवेश संरचना से पूर्व ईराक का एक हिस्सा था उस पर आक्रमण की योजना इस हेतु बनवाई गई ताकि यू0एस0-यू0के0 को उस क्षेत्र में सैनिक आक्रमण एवं कब्जे का मौका मिल जाए। इराकी जनता पर यह युद्ध जबरदस्ती थोपा गया था, यद्यपि इराक, कुवैत से हट गया था तथा युद्ध विराम हेतु प्रस्ताव दिया था, परन्तु वहाँ यूरेनियम हथियारों के छिपे होने का बहाना बनाया गया। जो लोग हथियार डालने को तैयार थे उन्हें अमानवीय तौर पर बालू में जीवित दफन कर दिया गया और उन्हें सामूहिक रूप से भी मार डाला गया। क्षेत्र में हमले के लिए कुवैत मिलिट्री बेस बना लिया गया, जहाँ से अब तक इराक पर बम वर्षा जारी है। इसी तरह लीबिया पर ‘‘उड़ान निषिद्ध क्षेत्र’’ घोषित करने का प्रयास किया जा रहा है जबकि कर्नल गद्गाफ़ी उनके पुत्र तथा इंग्लैण्ड और अमरीकी सरकारों के बीच घनिष्ठ सम्बंधों के राज़ सामने आ रहे हैं। यहाँ तक कि प्रतिष्ठित ‘लंदन स्कूल आॅफ इकोनाॅमिक्स’ अब संदेह के घेरे में है जो लीबिया से गुप्त रूप से आर्थिक सहायता प्राप्त कर रहा है।
इराक, उत्तरी कोरिया, ईरान तथा अन्य स्थानों पर सुरक्षा परिषद ने इतने प्रतिबंध लगाए हैं कि अब इनका समर्थन कोई नही करता। यह तो दरअसल वहाँ की जनता के खिलाफ युद्ध की घोषणा है। संयुक्त राष्ट्र संघ जो दुनिया में हर जगह अपने आकाओं के फायदे के लिए अपना हुक्म चलाता है, अब सऊदी अरब की सेनाओं के बहरीन मंे दाखिल हो जाने पर भत्र्सना क्यों नही करता? कि यह एक पड़ोसी देश में खुली हुई सैनिक घुसपैठ है। संयुक्त राष्ट्र संघ लगता है कि एक सार्वभौमिक माफिया है जो भौगोलिक एवं राजनैतिक सीमाओं का खयाल किए बगैर अपने विŸाीय नेटवर्क के इशारे पर काम करता है। पेट्रो-डालर की दुनिया में ऐसी सरकारें बाहरी शक्तियों के भरोसे ही जिन्दा हैं। अब ट्युनेशिया, मिस्र, और बहरीन की अरब जनता में एक उफान आ गया है तथा इनकी बदलाव की हवा अन्य देशों की ओर बढ़ रही है, परन्तु साथ ही दूसरी ओर एक रणनीति ऐसी तैयार की जा रही है कि इस उफान को रोक दिया जाए तथा इसकी दिशा को बदल दिया जाए।
इसी सुरक्षा परिषद की ओर से कोई प्रयास आज तक इस बात का नहीं किया गया कि इसराईल पर ‘नो फलाई जोन’ लागू होता तथा इराक, अफगानिस्तान पर आक्रमण करने वाली शक्तियों पर कोई कार्यवाही की जाती। यहाँ पर कर्नल गद्दाफी की सरकार के पक्ष में बात नहीं की जा रही है। वास्तविकता यह है कि कोई ऐसी नैतिक विवशता भी नहीं है कि लीबिया में सुरक्षा परिषद के नेतृत्व वाले ‘नो फ्लाई जोन’ या किसी ऐसे सैनिक घुसपैठ का समर्थन किया जाए जो अरब लीग के इशारे से हुआ। इसने तो आम जनता की कभी बात ही नहीं की, इसने क्षेत्र में हमेशा शाहों के स्वार्थ का समर्थन किया।
अरब दुनिया की जनता को ही केवल यह हक होना चाहिए कि वे अपने भाग्य का फैसला स्वयं करें। ‘मानवीय हस्तक्षेप’ का बहाना बनाकर सुरक्षा परिषद, नाटो या उसके संबंधी को, (अरब लीग में या कहीं भी) अपनी मनपंसद सरकार या डिक्टेटर हेतु सैनिक कार्यवाही करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। बातें नव औपनिवेशिक व्यवस्था के तौर पर एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र, एक देश से दूसरे देश में बराबर देखी जा रही है। मुख्य स्वार्थों का एक नेटवर्क है जो सुरक्षा परिषद, नाटो अरब लीग आदि के साथ मिल कर एशिया अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका की कभी एक सोसायटी पर सैनिक हवाई जहाजों या ड्रोन से पक्षियों के समान लोगों पर लक्ष्य साधकर निशाना बनाते हैं तथा अंधाधुंध बम वर्षा करके लोगों को मार डालते हैं। नाटो में जो सरकारें शामिल हैं वे युद्ध अपराधी हैं।
संयुक्त राष्ट्र के चार्टर (जो अरब दुनिया के मामले में पुर्जे-पुर्जे करके हवा में उड़ा दिया गया) के अनुसार किसी देश के नागरिक ही अपनी राजनैतिक पसंद का निर्धारण करेंगे, इनमें किसी औपनिवेशिक शक्ति, बन्दूक या विदेशी हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है।
इसमें कोई शंका नहीं कि तानाशाहों ने औपनिवेशिक सरकारों, उनके वित्तीय एवं कार्पोरेट स्वार्थी तत्वों से साठगाँठ करके अरब दुनिया के संसाधनों को ख्ूाब लूटा है, यह लूट अब भी जारी हैं, इस बात को ट्युनेशिया, मिस्र आदि की अरब जनता खूब जानती है। अरब जगत की कोई भी सरकार अपने नागरिकों की वफादारी का दैवीय
अधिकार प्राप्त करने का दावा कैसे कर सकती है जब कि वह अपनी जनता का शोषण कर रही है, अपने कामकाजी आमजन को बेरोजगार बनाए हुए है, वह सामाजिक तकलीफें उठा रहे हैं तथा राजनैतिक प्रक्रिया में उन्हें भाग लेने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। लगता है कि वहाँ कोई स्पष्ट राजनैतिक समझौता है कि सुरक्षा परिषद, नाटो या अरब लीग अथवा अन्य किसी संगठन की मदद से औपनिवेशिक सैनिक हस्तक्षेप के द्वारा अरब जनता के आन्दोलनों को अपहृत करना है तथा उनके रुख को मोड़ देना है। वास्तव में अरब भू भागों में स्थापित प्रत्येक बादशाहत को इन्हीं उपनिवेशवादियों ने ही थोपा था तथा वही उन पर अभी तक अपना आधिपत्य जमाए हुए हैं। राजनैतिक या कानूनी तौर से इस्लाम में बादशाहत या डिक्टेटर शिप की या फिरके बंदी ‘सुन्नी’ या ‘शिया’ की कोई मान्यता नहीं है। जब कि हम वहाँ धर्म के दुरुपयोग को बराबर देख रहे हैं, वे सरकारें चाहती हैं कि उन्हें आस्था की नजर से देखा जाए जबकि उन्होंने अपनी जनता को तथा दूसरे क्षेत्रों में भी लोगों को गुलाम बना रखा है तथा जाली संगठनों को विŸाीय सहायता इसलिए दे रहे हैं कि वे अपने उपनिवेशवादियों के सहयोग से दुनिया में इस्लाम की अलग ढंग से व्याख्या करें ताकि वहाँ के स्रोतों के दोहन करने का अवसर प्राप्त रहे।
भूत के समान ‘अलकायदा’ तथा इसी प्रकार के अन्य संगठन कभी दिखते हैं तथा कभी गायब हो जाते हैं, वे धार्मिक उकसाहरों से जब इशारे पाते हैं तो रणनीति के अनुसार यहाँ वहाँ मार काट व खून खराबा करते हंै।
अगर वास्तव में सुरक्षा परिषद नाटो और अरब लीग गम्भीर हैं और उन्हें लीबिया में सरकार एवं विद्रोहियों द्वारा बमबारी की चिंता है तो उन्हें पहले इन बातों पर ध्यान देना होगा कि वे कब्जा किए गए देशों- फिलिस्तीन, कांगो, इराक, अफगानिस्तान के भू भागों से अपने सैनिक वापस लें।
यूगोस्लाबिया की फेडेरल रिपब्लिक को पुनस्र्थापित करें, रवान्डा में पाल कागमे की सरकार को गद्दी से उतरने को कहें, लेबनान व सीरिया के कब्जे वाले भू भागों को खाली करवाएँ, तथा इस्राईल द्वारा कब्जे वाले क्षेत्रों को भी खाली करें। अफगानिस्तान पाकिस्तान क्षेत्र में बम वर्षा रोकें। संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंम्बली के प्रस्ताव के अनुरूप निर्धारित सीमाओं सहित फिलिस्तीन राज्य को मान्यता दें तथा इस्राईल व फिलिस्तीन की राजनैतिक सीमाओं को स्पष्टतः निर्धारित करके दोनों राज्यों की स्थापना करें। सऊदी अरब से बहरीन भेजी गई सेनाओं को तुरन्त वापस बुलाएँ। हैती में दूसरे अन्य अर्जेन्ट उपायों के अतिरिक्त स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराएँ। संयुक्त राष्ट्र, नाटो एवं अरब लीग को अपने खून खराबा करवाने की आगे की छवि को दुरुस्त बनाने हेतु इससे कम की अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे दुनिया के सामने अपना स्पष्टीकरण दें। यद्यपि ये बातें ऐसी हैं जैसे कि सुईं के सूराख से हाथी का पार होना फिर भी ‘नो फलाई जोन’ के मामले में इससे कम तर कुछ भी विचार नही किया जा सकता।

-नीलोफर भागवत
अनुवादक -डॉ0 एस0एम0 हैदर

शनिवार, 25 जून 2011

लोकतंत्र का हमदर्द नहीं, तेल का लुटेरा

पिछले करीब चार महीने से पश्चिम एशिया में चल रही उथल-पुथल से दो नतीजे निकल रहे हैं। एक यह कि अरब देशों की जनता परिवर्तन चाहती है, खुद मुख्तारी की चाहत उसे बार-बार सड़कों पर आने के लिए प्रेरित कर रही है। दूसरा यह कि अमरीका अपनी और अपने क्षेत्रीय सूबेदारों की पूरी ताकत से अरब जनता की आकांक्षाओं को कुचल रहा है। इसी से जुड़ा निष्कर्ष यह भी है कि लोकतंत्र, मानवाधिकारों और मानवीय सहायता का अमरीकी राग भेडि़ए के मुँह से राम-राम से अधिक कुछ नहीं।
पिछले फरवरी में ट्यूनीशिया में जनअसंतोष की आग जिस तरह भड़की, और उसके बाद एक के बाद एक अरब देशों में फैलने लगी, उसे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझना होगा। उसके लिए 1500 साल पीछे चलते हैं। पैगम्बर मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) के काल में और खासतौर से 632 में उनके निधन के बाद जिस तरह इस्लाम फैला, उससे पहले या बाद में किसी धर्म का फैलाव उस गति से नहीं हुआ। महज दो साल में येरूशलम पर मुसलमानों का कब्जा हो गया। विराट और वैभवशाली फारसी साम्राज्य ध्वस्त हो गया। 639 और 642 के बीच मिस्र पर इस्लाम का झण्डा फहराने लगा। आने वाले वर्षों में उत्तरी अफ्रीका, स्पेन, पुर्तगाल, इटली, फ्रांस और यूनान के बड़े इलाके पर मुसलमान छा गए। उस समय के पतनशील समाज इस्लाम की चुम्बकीय शक्ति से खिंचे बिना नहीं रह सके।
उसके बाद अब परिवर्तन की हवाएँ अरब वादियों और रेगिस्तानों में चल रही हैं। शाहों, सुल्तानों और तानाशाहों की कुर्सियाँ हिलने लगी हैं। इसकी शुरुआत हुई फरवरी में त्यूनीशिया से। एक फल विक्रेता के आत्मदाह की घटना ने जंगल में चिनगारी का काम किया। प्रायः इस्लाम को तलवार से जोड़ने का प्रचार होता है, लेकिन त्यूनीनिशया की जनता ने नितांत गांधीवादी तरीके से बेनअली का तख्ता पलट दिया। त्यूनीशिया की देखा-देखी मिस्र की जनता भी सड़कों पर आ गई। निहत्थी, अहिंसक मिस्री जनता ने अमरीका, इस्राइल ओर यहूदी धन कुबेरों की लाॅबी के चहेते मुबारक को उखाड़ फेंका। जनशक्ति का सैलाब इतना प्रचंड था कि अमरीकी इशारे पर चलने वाले फौजी कमांडर मुबारक के पक्ष में हस्तक्षेप का साहस नहींे कर पाए। मुबारक को भागना पड़ा और अब मिस्री इस्टैबलिशमेंट अपनी खाल बचाने के लिए उन्हें सजाए मौत देने पर विचार कर रहा है। मुबारक तो गए, जिन्हें अली बाबा कहा जा रहा है। 40 चोरों की हुकूमत बदस्तूर बनी हुई है। मिस्र पर फौज का राज चल रहा है और फौज की निष्ठा अमरीका के साथ है। जिस लोकतंत्र और सामाजिक-आर्थिक न्याय के लिए लाखों मिस्री सड़कों पर आए, वह फिलहाल पीछे छूट चुका है। चुनाव हुए भी तो उसके नतीजे पूर्व निर्धारित होंगे।
त्यूनीशिया और मिस्र के बाद यमन, बहरीन और लीबिया में सुगबुगाहट शुरू हुई। यमन मंे कम, बहरीन और लीबिया में अमेरिका का गंदा खेल खुलकर सामने आया। पहले यमन करीब दो दशक पहले तक यमन दो संप्रभु देशों उत्तरी और दक्षिणी यमन में बँटा हुआ था। दक्षिणी यमन पर अंग्रेजों का अधिकार लम्बे समय तक रहा। उससे पहले उत्तरी यमन आजाद हुआ। उत्तरी यमन पर सऊदी अरब, ब्रिटेन और अमरीका का प्रभाव रहा। दक्षिणी यमन ने माक्र्सवादी रास्ता अख्तियार किया। वहाँ सोवियत संघ और अन्य कम्युनिस्ट देशों से सहायता आने लगी। एक-एक कर यूरोपीय देशों में कम्युनिस्ट सरकारों का पतन होने लगा और सोवियत संघ स्वयं विघटित हो गया तो यमन कहाँ तक बचता। विलय के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। यमन के राष्ट्रपति सालेह की अलोकप्रियता जग जाहिर है। एक-दो बार कुर्सी छोड़ देने का संकेत भी वे दे चुके हैं, लेकिन वास्तव में उनके हटने के आसार नहीं है। यमन में अलकायदा की खासी मौजूदगी बताई जा रही है। यह सालेह के लिए आॅक्सीजन सिद्ध हो रही है। सऊदी अरब और अमरीका चाहते हैं कि सालेह बने रहें। सालेह के बाद उत्पन्न होने वाली स्थिति उन्हें परेशान कर रही है। असुरिक्षत सऊदी शाह और उनका संरक्षक अमरीका अलकायदा से निपटने में जनता का सहयोग नहीं लेना चाहते हंै। सच्चाई यह है कि उन्हें अलकायदा से ज्यादा जनता से भय है।
अमरीकी पाखण्ड का वीभत्सतम चेहरा दिखाई पड़ा बहरीन में, हालाँकि बहरीन शिया बहुल है और उस पर सरकार है सुन्नियों की, लेकिन जब बहरीनी जनता ने प्रदर्शन शुरू किया तब शिया-सुन्नी विवाद जैसी कोई चीज नहीं थी। कभी इशारे से कभी खुलकर ये भावनाएँ बाद में भड़काई गईं। सेक्युलर आन्दोलन को शिया-सुन्नी के चश्मे से देखा जाने लगा। हालत बिगड़ने लगी तो सऊदी अरब ने बहरीन में सेना तैनात कर दी। सऊदी अरब और अमरीका ने बहरीन में लोकतंत्र को पहले राउण्ड में पराजित कर दिया। सऊदी अमरीकी एकजुटता का कारण यह है कि दोनों देश लोकतंत्र के लिए यथास्थिति नहीं तोड़ना चाहते। सऊदी निजाम लोकतंत्र का, सिद्धांत के तौर पर विरोध करता है और अमरीका की लोकतंत्र की परिभाषा सुविधानुसार बनती-बिगड़ती रहती है। बहरीन में अमरीका का नौसैनिक अड्डा है। वहाँ की पुलिस और सेना में पाकिस्तानियों की अच्छी-खासी संख्या है।
बहरीन की शाही सरकार को भरोसा है कि वह करीब 10 लाख की आबादी में 70 फीसदी शियों को नियंत्रित करने मंे सफल रहेगी। सऊदी सैनिक हस्तक्षेप ने अल्पसंख्यक सरकार को मजबूती प्रदान की है। बहरीनी सेना की निष्ठा जनता नहीं, सरकार के प्रति है। मिस्र और त्यूनीशिया की सेनाओं में आम नागरिक था और इस तरह वे जनता के दबाव में थीं।
बहरीन में सऊदी अरब को खतरा जनता से है। वह नहीं चाहता कि सऊदी जनता भी अपने शाहों के खिलाफ उठ खड़ी होने के लिए प्रेरित हो। अगर बहरीन में लोकतंत्र आया तो सरकार शियों की बनेगी। वह सरकार सऊदी प्रभाव को नहीं स्वीकार करने वाली। बल्कि उस पर शिया ईरान का वर्चस्व कायम हो सकता है। दूसरा परिणाम यह हो सकता है कि बहरीन में शियों की जीत से सऊदी अरब के शियों का हौसला बढ़े। यह तय है कि लोकतंत्र की लड़ाई फतह करने के बाद बहरीनी अवाम बहुत सारे फैसले अपनी मर्जी से करेंगे। अमरीकी नौसैनिक अड्डे का वजूद खतरे में पड़ सकता है। कर्नल नासिर का मिस्र हो या कद्दाफी का लीबिया, अरब देशों में जब-जब पश्चिम परस्त शाहों, तानाशाहों का राज खत्म हुआ है, ब्रिटिश अमरीकी अड्डे भी खत्म हुए है। अमरीका लोकतंत्र की खातिर बहरीन में अपने अड्डे को खतरे में नहीं पड़ने देगा।
अमरीका और उसके साथी देशों का सबसे हिंसक रूप दिखाई पड़ा लीबिया में। उसकी मदद कर रहे हैं क्षेत्रीय सूबेदार। सबसे पहले 22 सदस्यीय अरब लीग ने प्रस्ताव पास किया कि कद्दाफी के विरोधियों तक मानवीय सहायता पहुँचाने और नागरिकों को नुकसान से बचाने के लिए लीबिया पर कद्दाफी की वायुसेना की उड़ाने रोकी जाएँ। बहरीन में जनता को फौजी बूटों से कुचलने वालों के दिल में लीबियाई जनता के लिए इस कदर प्यार पैदा हो गया। जिन अरब शासकों के हाथ अपनी ही जनता के खून से रँगे हुए है, उन्होंने लीबिया के अवाम को बचाने के लिए ‘नो फ्लाई जोन’ घोषित करने का अभियान चला दिया। इसी के आधार पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव नं0 1793 पास किया, जिसमें कद्दाफी के नियंत्रण से बाहर वाले इलाकों के नागरिकों की लीबियाई वायुसेना से रक्षा के लिए ‘नो फ्लाई जोन’ स्थापित करने का निश्चय व्यक्त किया गया। यह प्रस्ताव एक राय से नहीं पास हुआ। दो स्थाई सदस्यों रूस और चीन के साथ भारत, जर्मनी और ब्राजील ने भी अनुपस्थिति दर्ज कराई।
इस आपत्तिजनक प्रस्ताव का एजेण्डा सीमित था- नागरिकों की रक्षा के लिए ‘नो फ्लाई जोन’ की स्थापना। अर्थात अगर लीबियाई सरकार के विमान पूर्वी क्षेत्र में जमे कद्दाफी विरोधियों पर बमबारी करेंगे या मानवीय सहायता पहुँचने से रोकेंगे तो उन्हें ऐसा नहीं करने दिया जाएगा। लेकिन प्रस्ताव पास होने के तुरन्त बाद अमरीका, फ्रांस और ब्रिटेन ने ‘मानवीय सहायता’ की नकाब उतार फेंकी और कुछ दिन बाद ही कद्दाफी के ठिकानों पर बमबारी शुरू हो गई। ‘नो फ्लाई जोन‘ से बढ़ कर राजधानी त्रिपोली में कद्दाफी के आवास और अन्य स्थानों पर बम गिराए जाने लगे और अब सत्ता परिर्वतन पर जोर दिया जा रहा है। यह सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव में नहीं था। यह लक्ष्य है अमरीका और उसके पिछलग्गुओं का। इन पिछलग्गुओं के चेहरे देखिए। सबसे पहले जिन 6 सदस्यों वाली जी0सी0सी0 (गल्फ कोआपोशन कौंसिल) ने कद्दाफी के खिलाफ झण्डा उठाया था, उसके सदस्य हैं सऊदी अरब, बहरीन, कतर, ओमान और संयुक्त अरब अमीरात। अमरीका के इन संरक्षित देशों का लोकतंत्र और मानवाधिकारों से दूर दराज का कोई रिश्ता नहीं है। जी0सी0सी0 के बाद अरब लीग ने प्रस्ताव पास किया। उसमें एकता नहीं थी। अरब लीग के महासचिव मूसा सऊदी लाइन पर नहीं चल रहे थे। उन्हें डरा धमका कर खामोश कर दिया गया।
लीबिया में सामरिक हितों ने मानवाधिकारों और निर्दाेष नागरिकों के लिए चिंता पैदा की। लीबिया दुनिया का 16वाँ सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। अफ्रीकी उत्पादकों में उसका स्थान तीसरा है। अफ्रीकी महाद्वीप मंे तेल का सबसे बड़ा भण्डार लीबिया के पास है। उसके कुल तेल का 85 प्रतिशत निर्यात यूरोप को होता है। तेल के ज्यादातर स्रोत पूर्वी लीबिया मंे हैं, जहाँ कद्दाफी विरोधियों का प्रभाव है। ये दौलत मानवाधिकारों के लिए प्रेम पैदा कर रही है। अमरीकी प्रतिनिधि सभा की प्राकृतिक संपदा समिति के प्रभावशाली सदस्य एडवर्ड मर्की ने एक इण्टरव्यू में कहा, ‘‘हम तेल की वजह से लीबिया मंे हैं।’’ सीनेटर जेम्स बेब भी इसी तरह की बात कह चुके हैं। लीबिया मंे कद्दाफी की जगह किसी कठपुतली शासक को बहाल करने की कोशिशों का सबब यह है कि कद्दाफी सऊदी अरब के वर्चस्व को स्वीकार नहीं करते। कद्दाफी अरब जगत में सऊदी शासकों के नेतृत्व में चल रहे अमरीकी शतरंजी खेल को बाधित करते रहें हैं। सऊदी रियालों की मोहताजी से पूरी तरह मुक्त, स्वतंत्र आर्थिक आधार वाले कद्दाफी की सिफत ही यह है कि वह अमरीका व सऊदी अरब का मोहरा नहीं बन सकते।
एक नया नासिर या सालादीन बनने की महत्वाकांक्षाओं ने कद्दाफी को आयरिश रिपब्लिकन आर्मी, जर्मनी की रेड आर्मी, उग्रवादियों और क्रान्तिकारी फलस्तीनियों का संरक्षक बनने, मिस्र, सीरिया और त्यूनीशिया के साथ महासंघ बनाने और परमाणु ताकत हासिल करने के लिए प्रेरित किया। जिसके लिए उन्होंने अपनी ही तरह के लफ्फाज जुल्फिकार अली भुट्टो और फिर बेनजीर भुट्टो से दोस्ती की, अमरीका व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं वाले स्वप्नजीवियों को पसंद नहीं करता।
लोकतंत्र और मानवाधिकारों के लिए अमरीका की कपटपूर्ण अविश्वसनीय नीति अरब जगत मंे कई बार सामने आ चुकी है। इराक पर प्रथम अमरीकी आक्रमण के बाद सद्दाम हुसैन ने हजारों कुर्दों को रासायनिक अस्त्रों से मार डाला। तब कुर्दों के लिए कोई नहीं तड़पा। सी0आई0ए0 ने सद्दाम हुसैन को पाला-पोसा, उसका ईरान के खिलाफ इस्तेमाल किया और फिर फाँसी दे दी। इराक में भी तेल के कुओं पर काबिज होने की साजिश थी। एक दिलचस्प वाकि़या याद आता है। इराक की राजधानी बगदाद में अमरीकी सेना के पहुँचने के समय लूट-पाट का दौर चल रहा था। अमरीका ने उसे नहीं रोका। अमरीकी सेना ने सबसे पहले तेल मंत्रालय पर नियंत्रण स्थापित किया। इराक से लगे ईरान में भी अमरीका यही खेल खेल रहा था। मुसद्दिक का तख्ता पलट दिया गया क्योंकि उन्होंने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था। मुसद्दिक की जगह शाह पहलवी को पदस्थ किया गया। करीब 25 साल तक ईरान मंे शाह की अमरीका परस्त सरकार रही। 1979 में अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में हुई इस्लामी क्रान्ति उस सरकार को लील गई।
कथित इस्लामी आतंकवाद का चर्चा अक्सर होता है। पिछले 30 वर्षों में इसका मुख्य पोषणकर्ता अमरीका ही है। लोकतंत्र की तरह आतंकवाद के प्रति भी अमरीका नाकाबिले एतबार है। जिस ओसामा बिन लादेन को मार कर अमरीका फूला नहीं समा रहा, वह अफगानिस्तान में सोवियत विरोधी फौजी कार्रवाई में अमरीका का ही हमसफर था। यकीन नहीं होता कि आतंकवाद को शिकस्त देने के लिए अमरीका ने ओसामा को खत्म किया।
ओसामा सी0आई0ए0 और आई0एस0आई0 के बीच रिश्तों की पूरी कहानी तभी सामने आ पाएगी, जब वुडवर्ड जैसा कोई अमरीकी पत्रकार गोपनीय दस्तावेजों तक पहुँच जाए, मियाद पूरी होने पर सभी दस्तावेज प्रकाशित कर दिए जाएँ या विकीलीक्स कुछ कमाल कर दें। क्या आई0एस0आई0 का ओसामा की मौजूदगी से नावाकि़फ रहना वाकई मुमकिन है? क्या सी0आई0ए0 को अभी तक नहीं मालूम था कि ओसामा कहाँ छिपा हुआ है? राष्ट्रपति ओबामा को पुनर्निर्वाचन में मदद करने के लिए अब ओसामा को मारा गया? ओबामा की अफगान नीति पर अमल के रास्ते को आसान करने के लिए यह कार्रवाई की गई? अमरीका नाक बचा कर अफगानिस्तान से निकल सके, इसलिए यह महान उपलब्धि प्रदर्शित की गई? क्या आई0एस0आई0 ने वास्तव में कार्रवाई में सी0आई0ए0 की सहायता नहीं की?
ये सारे सवाल इसलिए उठ रहें हैं कि 11 सितम्बर 2001 को अमरीका पर हमले के पहले अमरीका को एक मौका मिला था, जब वह ओसामा को मार या पकड़ सकता था। लेकिन वह खामोश रहा। पाकिस्तानी पत्रकार अमीर-मीर अपनी किताब ‘द ट्रू फेस आॅफ जेहादीज: इनसाइड पाकिस्तान्स नेटवर्क ऑफ़ टेरर’’ में लिखते हैं, ‘पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों को हैरत है कि 11 सितम्बर 2001 के हमले के एक साल पहले जब सुनहरा मौका आया, तब सी0आई0ए0 ने ओसामा को क्यों नहीं पकड़ा। तब अलकायदा का बीमार चीफ आपरेशन कराने क्वेटा से दुबई स्थित अमरीकी हास्पिटल गया था। वहाँ ओसामा ने एक सी0आई0ए0 अधिकारी से भी भेंट की थी। फ्रांसीसी दैनिक ‘ ल फिगारो’ में छपी एक रिपोर्ट को उद्धृत करते हुए पाकिस्तानी खुफिया सूत्रों का कहना है कि तब तक ओसामा दुनिया के सबसे वाण्टेड आतंकवादियों की सूची में आ चुका था। ओसामा 4 से 14 जुलाई 2000 तक दुबई के अस्पताल में रहा।
‘ल फिगारो’ की रिपोर्ट के मुताबिक क्वेटा से दुबई पहुँचने के बाद बिन लादेन को अस्पताल ले जाया गया। उनके साथ व्यक्तिगत डाक्टर और वफादार सहयोगी (यह अमन अलजवाहिरी हो सकते हैं, लेकिन सूत्र पूरे भरोसे से यह नहीं कह रहे), चार बाडीगार्ड और एक पुरूष, अल्जीरियाई नर्स को अस्पताल ले जाया गया। बिन लादेन के अस्पताल में रहने के दौरान उनके पारिवारीजन और प्रमुख सऊदी उनसे मिलने आए। एक स्थानीय सी0आई0ए0 एजेंट को, जिसे दुबई में अनेक लोग जानते हैं, हाॅस्पिटल के लिफ्ट से ओसामा के रूम की ओर जाते देखा गया। कुछ दिन बाद सी0आई0ए0 एजेंट ने कुछ दोस्तों के सामने डींग मारी कि मैं तो ओसामा से मिल कर आ रहा हूँ, अधिकृत सूत्रों का कहना है कि 15 जुलाई को ओसामा के क्वेटा रवाना होने के बाद इस सी0आई0ए0 एजेंट को मुख्यालय बुला लिया गया।
इस सवाल का जवाब अभी तक नहीं मिल पाया है कि अमरीका ने मोस्ट वाण्टेड ओसामा पर तब हाथ क्यों नही डाला? अमरीका इस आतंकवादी सरगना को छुट्टा छोड़े रख कर किन सामरिक उद्देश्यों की पूर्ति करना चाहता था? अब जब उसे मार दिया गया है, क्या वे उद्देश्य पूरे हो चुके हैं?
आज अमरीका सुप्रीम पावर है। उसके अतंर्राष्ट्रीय व्यापारिक और सामरिक हित हैं। दुनिया भर में उसकी फौजी मौजूदगी है। उसकी कंपनियों का साम्राज्य है। लोकतंत्र, मानवाधिकार आतंकवाद, अंतर्राष्ट्रीय शान्ति और सहयोग की परिभाषा इन हितों के अनुरूप की जाती है।

-प्रदीप कुमार
मो0 09810944447

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

अमेरिका के पिट्ठू क्रूर तानाशाहों ने लाखों की जान ली

अमरीका, फ्रांस व इंग्लैंड ने लीबिया में “नो फ्लाई जोन“ (हवाई उड़ान प्रतिबंधित क्षेत्र) घोषित करने संबंधी संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव को लागू करने में जो तत्परता दिखाई, वह इन देशों के साम्राज्यवादी लक्ष्यों के अनुरूप है। ये तीनों देश पुरानी साम्राज्यवादी ताकतें हैं जिन्होंने 19वीं व 20वीं सदी में लगभग आधी दुनिया को अपना गुलाम बनाया था। इंग्लैंड व फ्रांस ने यह काम प्रत्यक्ष ढंग से किया था और अमेरिका ने अप्रत्यक्ष ढंग से।
हर बार, इन देशों ने “नागरिकों की जान बचाने“ को अन्य देशों में सैन्य हस्तक्षेप करने का बहाना बनाया परंतु सारी दुनिया यह जानती है कि इन देशों ने लाखों नागरिकों को मौत के घाट उतारा है। इन देशों ने भारत सहित अल्जीरिया, वियतनाम व कई अन्य देशों में खून की होली खेली है। इन साम्राज्यवादी देशों ने एशिया, अफ्रीका व लातिन अमेरिका में तानाशाहों को समर्थन व सहयोग दिया। इन क्रूर तानाशाहों ने हजारों-लाखों नागरिकों की जान ली। इजराईल ने लेबनान को बरबाद कर दिया और हजारों निर्दोष नागरिकों को मौत की नींद सुला दिया परंतु अमरीका ने इजराईल को रोकना तो दूर, उसकी बेज़ा आक्रामक कार्यवाहियों का विरोध तक नहीं किया। वह सिर्फ इसलिए क्योंकि यह अमरीका के हित में था। महिलाओं व बच्चों सहित बड़ी संख्या में नागरिकों को “आतंकवादी“ करार देकर मार डाला गया और इस कुत्सित खेल में अमरीका ने इजराईल का पूरा साथ दिया।
जिस समय इज़राईल, गाजा पट्टी में घरों व अस्पतालों पर बमबारी कर बीमारों, महिलाओं व बच्चों को मार रहा था तब अमरीका, ब्रिटेन व फ्रांस ने चुप्पी साध रखी थी। आखिर, इन असहाय, निर्दोष लोगों की जान लेना, इजराईल की “सुरक्षा“ के लिए जरूरी था। उस समय कुछ लोगों की सोच थी कि अमरीका की यह चुप्पी, तत्कालीन सतारूढ़ रिपब्लिकन पार्टी व राष्ट्रपति बुश की विचारधारा व नीतियों के अनुरूप है। परंतु राष्ट्रपति चाहे बुश हों, क्लिंटन या फिर ओबामा, अमरीका का रूख वही था और है।
बुश सरकार ने ईराक पर यह झूठा आरोप लगाकर आक्रमण किया था कि उसके पास “महासंहारक अस्त्र“ हैं। उस समय भी यह सोचा गया कि शायद यह बुश की व्यक्तिगत मानसिकता का नतीजा है। लिहाजा, जब ओबामा ने रिपब्लिकन उम्मीदवार के विरूद्ध चुनाव लड़ा तब हम सभी ने ओबामा को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जो अमरीका की नीतियों में आमूल-चूल परिवर्तन करेगा। हम सबने ओबामा की विजय के लिए दुआ की। जब वे राष्ट्रपति चुन लिए गए, तब हमारी खुशी का पारावार न रहा। ओबामा को अफगानिस्तान व ईराक पर आक्रमण का “विरोध“ करने के लिए नोबेल शान्ति पुरस्कार से भी नवाजा गया। क्या उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जाना था? सच तो यह है कि किसी भी शासक को नोबेल पुरस्कार नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि शासक अक्सर आदर्शों की बजाय अपने या अपनी पार्टी या अपने देश के हितों से प्रेरित होते हैं। यहां यह कहना समीचीन होगा कि नोबेल पुरस्कार हमेशा से यथास्थितिवादी व स्थापित तंत्र का पोषक रहा है।
ब्रिटेन, फ्रांस व अमरीका का तर्क है कि लीबिया पर उनका संयुक्त हमला इसलिए उचित है क्योंकि अरब लीग ने भी संयुक्त राष्ट्र संघ के उस प्रस्ताव का अनुमोदन किया था, जिसमें गद्दाफी द्वारा नागरिकों पर की जा रही बमबारी बंद करने की बात कही गई थी। यह तर्क केवल तकनीकी रूप से सही है क्योंकि लीबिया पर पश्चिमी देशों के त्वरित व विनाशकारी सैनिक आक्रमण के बाद, अरब लीग ने अपने रूख में परिवर्तन कर लिया था।
वैसे भी, अरब लीग के समर्थन को बहुत महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। अरब लीग के अधिकाँश सदस्य देश, अमरीका के पिट्ठू तानाशाहों व बादशाहों द्वारा शासित हैं। इन देशों के शासकों को हमेशा अपनी जनता के विद्रोह का डर सताता रहता है और किसी भी संभावित विद्रोह को कुचलने के लिए उन्हें अमरीका के समर्थन की दरकार रहती है। अतः अरब देशों की आम जनता की निगाहों में उनके देशों द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव का समर्थन किए जाने की न तो कोई वैधता है व न ही महत्व।
यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि इन पंक्तियों के लेखक को गद्दाफी से कोई सहानुभूति या प्रेम नहीं है। इस क्रूर तानाशाह ने पिछले 41 वर्षों से लीबिया को अपने खूनी पंजों में जकड़ रखा है। गद्दाफी के शासन का जितनी जल्दी अंत हो, उतना ही बेहतर होगा। लीबिया की जनता ने उसके खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजा दिया है और अब चाहे वह उन पर गोलियाँ बरसाए या बम गिराए, जनता का गुस्सा खत्म होने वाला नहीं है। परंतु समस्या यह है कि पश्चिमी देशों के हस्तक्षेप से गद्दाफी को अपनी सत्ता बचाने का एक बहाना मिल गया है।
अरब के निवासियों के मन में यह संदेह उपजना स्वभाविक है कि कहीं यह हमला लीबिया के कच्चे तेल के भंडार पर कब्जा करने का पश्चिमी षड़यंत्र तो नहीं है? पश्चिमी देशों के हस्तक्षेप ने गद्दाफी को सहानुभूति का पात्र बना दिया है। अब गद्दाफी के समर्थक अधिक जोशो-खरोश से लडे़ंगे। वास्तविकता तो यह है कि पश्चिमी देश, लीबिया के मामले में अपनी टांग फँसाने के लिए काफी उत्सुक और बहुत जल्दी में थे। उनके लिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो रहा था कि ऊँट किस करवट बैठेगा। लीबिया के ताजे विद्रोह का नेतृत्व प्रजातांत्रिक ताकतों के हाथों में है और पश्चिमी देशों को डर था कि लीबिया में प्रजातंत्र के आगाज से वहाँ के तेल भंडारों तक उनकी पहुँच खत्म हो जाएगी।
क्यूबन नेता फिडेल कास्त्रो ने अपने एक आंखे खोल देने वाले लेख में बताया है कि लीबिया पर अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए साम्राज्यवादी ताकतें इतनी लालयित क्यों हैं। कास्त्रो के अनुसार, साम्राज्यवादी देशों की नजरें, दरअसल, लीबिया के अकूत तेल भंडारों पर गड़ी हैं। वे लिखते हैं, “लीबिया के 95 प्रतिषत क्षेत्रफल में रेगिस्तान है। तक्नालाजी के उपयोग से इस विषाल रेगिस्तान के नीचे दबे उच्च दर्जे के कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडारों तक मानव की पहुँच बन गई है। लीबिया का वर्तमान तेल उत्पादन 800 करोड़ बैरल प्रतिदिन है। इस तेल की बिक्री से लीबिया को करोड़ों डालर की आमदनी होती है और इस धन ने उस देष की तस्वीर ही बदल दी है। वहाँ के रहवासियों की औसत आयु 75 वर्ष है। लीबिया की प्रति व्यक्ति आय, अफ्रीका के सभी देशों में सबसे ज्यादा है। उसके सूखे रेगिस्तान के नीचे पीने योग्य भूजल का खजाना है। यह पानी इतना है कि क्यूबा के कुल क्षेत्रफल से तिगुने क्षेत्र को ढंक सकता है। इस पानी को पाईप लाईनों का जाल बिछाकर देश के कोने-कोने तक पहुंचा दिया गया है“।
इस तरह, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस पर निर्भर, अमरीका व अन्य पश्चिमी देशों के लिए लीबिया के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे इन संसाधनों पर अपना वर्चस्व किसी हालत में खत्म नहीं होने देना चाहते। आष्चर्य नहीं कि साम्राज्यवादी देशों ने नागरिकों की जान बचाने के नाम पर लीबिया पर हमला करने में जरा भी देरी नहीं की। इस हमले में अब तक सैकड़ों नागरिक मारे जा चुके हैं और यह हमला कब तक जारी रहेगा, यह कोई नहीं जानता।
गद्दाफी आसानी से हार नहीं मानेगा। उसने स्पष्ट कर दिया है कि वह लंबी लड़ाई के लिए तैयार है। परंतु ईराक व अफगानिस्तान के कटु अनुभव के बाद, इंग्लैंड, फ्रांस व अमरीका की जनता अपने-अपने देशों के किसी लंबी लड़ाई में फँसने का षायद ही समर्थन करेंगी। इसके अलावा, जनता के सामने यह असलियत आने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा कि इस हमले का मकसद नागरिकों की जान बचाना नहीं वरन् लीबिया के प्राकृतिक संसाधनों पर काबिज होना है। स्पष्टतः, पश्चिमी देशों के लिए लड़ाई को लंबे समय तक खींचना बहुत मुष्किल होगा।
ईराक और अफगानिस्तान की यादें अभी लोगों के मन में ताजा हैं और पश्चिमी देशों की सरकारों को उनके नागरिकों का समर्थन मिलते रहना संदिग्ध है। रूस, चीन, भारत और ब्राजील ने लीबिया के आंतरिक मामलों में सैनिक हस्तक्षेप को अपना समर्थन देने से इंकार कर दिया है। जर्मनी ने भी इस हमले में हिस्सेदारी नहीं की। सारी दुनिया को अब यह समझ में आ गया है कि किसी न किसी आदर्शवादी लक्ष्य की प्राप्ति के नाम पर, अमरीका केवल उन देशों पर हमला करता है जहाँ या तो तेल हो या जहाँ इजराईल के हित प्रभावित हो रहे हों। इन दोनों में से कोई भी एक, अमरीका के लिए सैन्य आक्रमण करने का पर्याप्त कारण रहा है।
अब इन कारणों में एक कारण और जुड़ गया है। और वह है किसी भी देश में चल रहा ऐसा शांतिपूर्ण आंदोलन, जिसका लक्ष्य तानाशाह या बादशाह को अपदस्थ कर, प्रजातंत्र की स्थापना करना हो। इन आंदोलनों ने प्रो. सैम्युल हटिंगटन के “सभ्यताओं के टकराव“ के सिद्धांत की हवा निकाल दी है और इस मान्यता को गलत सिद्ध कर दिया है कि इस्लाम व प्रजातंत्र में कभी सामंजस्य नहीं हो सकता। सभ्यताओं के टकराव के सिद्धांत का प्रतिपादन इसलिए किया गया था ताकि साम्यवाद का स्थान लेने के लिए एक नए शत्रु-इस्लाम-को खड़ा किया जा सके और अरब देशों के तानाशाहों और बादशाहों को समर्थन देने की अमरीकी नीति को औचित्यपूर्ण ठहराया जा सके। ये दोनों अमरीका के हित में हैं और उसकी विदेष नीति के महत्वपूर्ण अंग हैं।
ओसामा के आतंकवाद-जिसे जाहिर कारणों से इस्लामिक आतंक की संज्ञा दी गई-का इस्लाम व मुसलमानों की छवि बिगाड़ने में जमकर इस्तेमाल किया गया। अगर अरब देशों में तानाशाहों का शांतिपूर्ण विरोध जारी रहता है तो इससे यह मान्यता गलत सिद्ध हो जावेगी कि इस्लाम, आतंकी धर्म है व यह कि इस्लाम का प्रजातंत्र से कोई लेना-देना नहीं है। अगर ऐसा हो जाता है तो अमरीका के लिए झूठे बहाने बनाकर तेल उत्पादक क्षेत्रों में सैन्य हस्तक्षेप करना मुश्किल हो जावेगा और इस क्षेत्र में अपना वर्चस्व बनाए रखना असंभव।
लीबिया में अमरीकी हस्तक्षेप के कुछ अन्य कारण भी हैं। अरब तानाशाह अपनी रक्षा के लिए अमरीका की ओर ताकते रहे हैं। उन्हें अपना राज चलाते रहने के लिए ओसामा के नेतृत्व वाले आतंकवाद की आवश्यकता है। अरब देषों में उभरे शांतिपूर्ण आंदोलनों ने न केवल वहां के तानाशाहों की नींद हराम कर दी है वरन् ओसामा-छाप आतंकवाद की रीढ़ तोड़ दी है। यह बात गलत सिद्ध हो गई है कि केवल हिंसा व आतंक के रास्ते ही परिवर्तन लाया जा सकता है।
अरब देशों के करोड़ों नागरिकों को उम्मीद है कि उनके देषों में बरसों से छाया तानाशाही का अंधेरा दूर होगा और प्रजातंत्र का सूरज उगेगा। परंतु पश्चिमी देश, अरब नागरिकों को गलत और ओसामा को सही सिद्ध करना चाहते हैं।
सच तो यह है कि अमरीका को ओसामा की जरूरत है और ओसामा को अमरीका की। दोनों एक-दूसरे के खिलाफ घृणा फैलाकर व हिंसा कर अपना-अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।

-डाॅ। असगर अली इंजीनियर

(लेखक मुंबई स्थित सेंटर फार स्टडी आफ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म के संयोजक हैं, जाने-माने इस्लामिक विद्वान हैं और कई दशकों से साम्प्रदायिकता व संकीर्णता के खिलाफ संघर्ष करते रहे हैं।)

मंगलवार, 22 मार्च 2011

नाटो भारत पर भी हमला करेगा.............?

मानवता की रक्षा हेतु

विश्व में साम्राज्यवादी शक्तियां बड़ी बेशर्मी के साथ एशिया के मुल्कों को गुलाम बनाने का कार्य कर रही हैं। जब इनकी कठपुतली संयुक्त राष्ट्र संघ ने किसी देश के ऊपर हमला करने की बात होती है। तो भारत, चीन, रूस, ईरान सहित कई मुल्क संयुक्त राष्ट्र संघ में अनुपस्थित हो जाते हैं और जब नाटो की सेनायें कार्यवाई शुरू कर देती हैं तो यह घडियाली आंसू बहाने शुरू कर देते हैं। चीन लीबिया में जारी घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं और लीबिया में जो हो रहा है उसपर अफसोस जाहिर करता है। चीन ने अपने बयान में लीबिया में विद्रोहियों और गद्दाफी सेनाओं के बीच जारी संघर्ष के सीज फायर की मांग भी नहीं की है और कहा है कि चीन उत्तरी अफ्रीका के स्वतंत्र राष्ट्र लीबिया की स्वतंत्रता, स्वप्रभुता और एकता का सम्मान करता है। बयान में कहा गया है कि हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही लीबिया में जारी संघर्ष थम जाएगा और नागरिकों को सुरक्षा प्रदान की जाएगी। ईरान ने इन हमलों की निंदा करते हुए कहा है कि लीबिया के तेल पर कब्जा करने का पश्चिमी देशों का यह घिनौना अपराध है। हालांकि ईरान ने लीबिया में गद्दाफी के विरोध में हो रहे प्रदर्शन का समर्थन करते हुए कहा है कि यह गद्दाफी के खिलाफ इस्लामिक क्रांति है। ईरान ने यह भी कहा है कि लीबिया के लोगों को पश्चिमी देशों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। वो अपने खास मकसदों को हल करने के लिए उनके साथ होने का दिखावा कर रहे हैं।
रूस ने भी लीबिया पर हुए मिसाइल हमलों की निंदा करते हुए कहा दोनों ओर से तुरंत संघर्ष विराम होना चाहिए। रुस ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र के बल प्रयोग के संकल्प को जल्दबाजी में अपनाया गया है। रूस के विदेश मंत्रालय ने द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि हम लीबिया और लीबिया पर हमला कर रहीं गठबंधन सेनाओं से अपील करते हैं कि वो शांति बहाली के लिए प्रयास करें।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा,''लीबिया में जारी संघर्ष की स्थिति को लेकर भारत चिंतित है. जैसा कि हमने पहले कहा था इस तरह के प्रयास स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश करें न कि आम नागरिकों के लिए मुश्किलें और बढ़ाएं.''
पूर्व में ईराक में कल्पित रासायनिक हथियारों की आड़ लेकर ईराक पर हमला किया गया। मीडिया ने नाटो सेनाओं को मित्र सेना की संज्ञा देकर ईराक पर कब्ज़ा करा दिया। अफगानिस्तान पर भी कब्ज़ा कर लिया गया। हजारो लाखो लोग मारे गए। घर-बेघर हो गए उस समय भी साम्राज्यवाद विरोधी तथाकथित शक्तियां घडियाली आंसू बहाती रहीं। आज लीबिया में कई दिनों से नाटो सेनायें कल्पित मानवीय आध्जारों को लेकर बम वर्षा कर रही हैं। मानवता की सबसे ज्यादा चिंता फ्रांस, इंग्लैंड, अमेरिका को है। जापान में दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है उस त्रासदी में ये देश विशेष कुछ नागरिकों की मदद नहीं कर रहे हैं उसका मुख्य कारण है जापान उनका अघोषित गुलाम देश है। इन देशों को सबसे ज्यादा नागरिक अधिकारों की चिंता लीबिया में है क्योंकि लीबिया का तेल भंडार सबके लिये सुलभ है। उस पर कब्ज़ा करने के लिये नागरिक अधिकारों का बहाना लेकर हमला किया जा रहा है और फिर लीबिया पर कब्ज़ा कर लिया जाएगा। यमन, बहरीन, सौदी अरबिया जैसे मुल्कों में भी आन्दोलन चल रहे हैं उनमें दखालान्जादी इसलिए नहीं होती है क्योंकि वे साम्राज्यवादियों के पिट्ठू मुल्क हैं। फ्रांस से लेके यूरोप के बड़े-बड़े देशों में महंगाई, बेरोजगारी को लेकर बड़े-बड़े धरना प्रदर्शन हो रहे हैं और यदि आन्दोलन ही संप्रभुता दरकिनार कर हस्ताक्षेप का आधार है तो इन देशों में कौन हस्ताक्षेप करेगा।
भारत में कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक सेना कमान संभाले हुए है। बराबर कोई न कोई प्रथक्तावादी आन्दोलन जारी है। भारत के उपभोक्ता बाजार तथा प्राकृतिक सम्पदा पर कब्ज़ा करने के लिये नाटो सेनाओ को अच्छा आधार मिल सकता है और संयुक्त राष्ट्र संघ इन प्रदेशों में लोकतंत्र मानव अधिकार स्थापित करने के लिये सैनिक हस्ताक्षेप की अनुमति भी दे सकता है ? हमारे देश में अमेरिकन व ब्रिटिश साम्राज्यवादी एजेंटो की कमी नहीं है वह शक्तियां सिर्फ वाह वाही में सब कुछ करने के लिये तैयार बैठी रहती हैं जो साम्राज्यवादी शक्तियां चाहती हैं। तभी तो भारत इंग्लैंड, फ्रांस, पुर्तगाल जैसे साम्राज्यवादी देशों का गुलाम रहा है। विश्व आर्थिक संकट के कारण साम्राज्यवादी मुल्कों की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं रह गयी है। आर्थिक संकट से उभरने के लिये यह साम्राज्यवादी शक्तियां कुछ भी कर सकती हैं। शांति इनकी मौत है युद्ध इनकी जिंदगी है। हमारे देश को चाहिए कि अपनी अस्मिता के लिये दुनिया के छोटे छोटे देशों की अस्मिता के लिये अपनी गुटनिरपेक्ष निति को जारी रखे। साम्राज्यवादी शक्तियों से दूरी आवश्यक है।
चाइना में अमेरिका और उसके साम्राज्यवादी मित्र बहुदलीय व्यवस्था लागू करने के नाम पर नोबेल पुरस्कार चाइना विरोधियों को देते रहते हैं। ईरान में अमेरिका व उसके पिट्ठू देशों द्वारा कई बार अपनी पिट्ठू सरकार बनाने की कोशिश की जा चुकी है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

रविवार, 20 मार्च 2011

रंगों की होली समाप्त-शांति के पुजारियों की खून की होली प्रारंभ

फ्रांस द्वारा लीबिया में खेली जा रही खून की होली का एक द्रश्य
भारत में बहुसंख्यक आबादी का रंगों का त्योहार होली। होली आपसी भाईचारे समाज में समृद्धि का प्रतीक है। भारतीय जनमानस एक दूसरे के ऊपर रंग व गुलाल, अबीर लगा कर आपसी भाईचारे को मजबूत बनाता है। हमारे समाज में यह भी मान्यता है कि इस त्योहार में विरोधियों से भी बैर भाव समाप्त कर लेना चाहिए।
शांति के पुजारियों के महानायक अमेरिका और उसके पिछलग्गू फ्रांस व इंग्लैंड ने शांति स्थापित करने के लिये लीबिया में टोमाहॉक मिसाइलें 112 रक्षा ठिकानो पर दागी हैं। वहीँ लीबिया ने फ्रांस के एक लड़ाकू विमान को मार गिराया है लेकिन फ्रांस ने उसका खंडन किया है। अमेरिकन साम्राज्यवादियों ने इसके पूर्व ईराक, अफगानिस्तान सहित पकिस्तान में भी शांति स्थापित कर रहे हैं। पाकिस्तान में ड्रोन हमलों में हजारो लोग मारे जा चुके हैं। शांति स्थापित नहीं हो पा रही है। मिस्र, ट्युनेसिया , बहरीन में अमेरिकन साम्राज्यवादी का पहले से कब्ज़ा है। उस परीक्षेत्र में लीबिया अमेरिकन साम्राज्यवाद का विरोध करता था। लीबिया को सबक सिखाने के लिये इन देशों ने पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत पहले अलकायदा के माध्यम से अशांति फैलवायी। और जब पूर्वी लीबिया पर हथियारबंद विद्रोहियों का कब्ज़ा हो गया। लीबियाई सरकार ने विद्रोहियों से पुन: पूर्वी लीबिया को मुक्त करा लिया तो खिसियाये साम्राज्यवादी मुल्कों ने सैनिक कार्यवाई शुरू कर दी। साम्राज्यवादी हमलों में अब तक 50 लोग मारे जा चुके हैं व्यापक रूप से नुकसान हुआ है। इस युद्ध का मुख्य उद्देश्य लीबिया के तेल पर कब्ज़ा करना है। शांति लोकतंत्र न्याय विश्व बंधुत्व से इन शांति के पुजारियों का कोई लेना देना नहीं है। मानव रक्त से ही इनकी प्यास बुझती है। खून की होली खेलने का कार्य इन देशों का मुख्य शगल रहा है। हमारे देश को भी ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने जिस तरह से लूटा है उस इतिहास को पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों ने भी हमारे देश के कुछ हिस्से को काफी अरसे तक गुलाम बनाये रखा था। शांति के नाम पर खून की होली जारी है। दुनिया का कोई भी मुल्क इस होली को रोकने में समर्थ नहीं है और न ही किसी देश की संप्रभुता का कोई मतलब इन देशों की नजर में है। संयुक्त राष्ट्र संघ अपने निर्माण काल से ही इन देशो की कठपुतली रहा है और आज भी है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
Share |