संघ परिवार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
संघ परिवार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 20 जून 2014

मोदी सरकार: आने वाली घटनाओं की सूचक

संघ परिवार से असंबद्ध अनेक लोग आशा व्यक्त करते रहे हैं कि केंद्रीय सत्ता हासिल करने के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार कोई विभाजक मुद्दा नहीं उठाएगी। चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने भी यह कह कर आश्वस्त किया कि भारतीय संविधान सर्वोपरि है और उनकी सरकार किसी के साथ भेदभाव नहीं बरतेगी। मोदी सरकार  के गठन के मुश्किल से 24 घंटे हुए थे कि प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने संविधान के अनुच्छेद 370 के वजूद पर सवालिया निशान लगा दिया। अगर किसी और मंत्री ने बयान दिया होता तो शायद इतनी गंभीरता से न लिया जाता। जितेंद्र सिंह साधारण मंत्री नहीं हैं। वह अच्छी खासी मेडिकल  प्रैक्टिस छोड़कर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के रास्ते बीजेपी में आए। वह बीजेपी के गहरे प्रभाव वाले, जम्मू क्षेत्र की ऊधमपुर सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं और पीएमओ में प्रधानमंत्री का विश्वासपात्र ही मंत्री हो सकता है। उनके बयान पर बवाल स्वाभाविक था।
    जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की तरफ से सख्त प्रतिक्रिया आई। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अनुच्छेद 370 खत्म किया गया तो कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं रहेगा। चुनाव में बीजेपी की सहयोगी, महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रैटिक पार्टी ने भी जितेंद्र सिंह के बयान पर एतराज किया। संघ परिवार ने उमर अब्दुल्ला के बयान को सही संदर्भ में समझने के बजाए और कठोर बयान दे डाला-कुछ भी रहे न रहे, कश्मीर भारत का अभिन्न अंग रहेगा। संघ परिवार को
विरोध का अंदाजा नहीं रहा होगा। शुरू की वीरोचित घोषणाओं के बाद बीजेपी नेता नरम पड़ने लगे। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अनुच्छेद 370 पर विचार-विमर्श की बात कही तो कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि मोदी सरकार उचित समय पर अपनी राय जाहिर करेगी। क्या जितेंद्र सिंह के जरिए पानी की थाह ली जा रही थी? लगता ऐसा ही है।  अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार संघ के नेताओं ने 370 पर बहस का इशारा किया था। खुद मोदी की सोच क्या है? मोदी की अब तक की सबसे प्रामाणिक जीवनी ‘नरेंद्र मोदी रूद मैन’ द टाइम्स के लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय के अनुसार मोदी ने उनसे कहा ‘‘लोग विचारधारा को कार्यक्रम मान बैठकर प्रायः भ्रमित हो जाते हैं। विचारधारा कार्यक्रम नहीं है और कार्यक्रम विचारधारा नहीं है। हमारी विचारधारा बिलकुल सीधी है-भारत सर्वोपरि। बाकी सब कार्यक्रम और परियोजनाएँ हैं। हम दो तिहाई बहुमत के बगैर उद्देश्य को कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
        हम अनुच्छेद 370 को कैसे समाप्त कर सकते हैं? तो सबसे पहले हमें दो तिहाई बहुमत हासिल करना चाहिए। हमें लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनानी चाहिए। अगर आप के पास दो तिहाई बहुमत नहीं है तो आप किसी खास एजेंडे को कैसे अख्तियार कर सकते हैं? काल-परिस्थिति की विशेष अवस्था में कार्यक्रम तय किए जाते हैं। बीजेपी अच्छे बहुमत से सत्ता में आई है। सहयोगी दलों को मिलाकर भी उसे लोकसभा में दो तिहाई बहुमत नहीं प्राप्त है। लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों की कुल संख्या देखें तो बीजेपी कोई विभाजक संविधान संशोधन करने की स्थिति में नहीं हैं। तब फिर 370 का विवादास्पद विषय क्यों उठाया गया? उत्तर एक ही निकलता है। मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को विजय दिलाने के लिए संघ ने पूरी ताकत झोंक दी। अब मोदी और उनके सहयोगी गुरुदक्षिणा से भाग नहीं सकते। उन्हें संघ को भरोसा दिलाना है कि एजेंडे को भुलाया नहीं गया है। यह मुद्दे को जिंदा रखने की राजनीति है। अगर अगले चुनाव में या कभी भविष्य में संविधान संशोधन भर की सीटें बीजेपी को मिल गईं तो मान कर चलिए कि अनुच्छेद 370 को खत्म करने की पुरजोर कोशिश की जाएगी। जब
विचारधारा स्थाई और अपरिवर्तनीय हो और कार्यक्रम समय के अनुरूप तय किए जाते हों तो राजनीति की यह गति अनिवार्य और अवश्यम्भावी हो जाती है। संघ परिवार के लिए कुछ नहीं बदला है। 1947 में उसने जो कश्मीर नीति तय की थी, उसमें परिवर्तन की जरूरत नहीं महसूस की जाती। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में नारा दिया गया था, एक देश में दो प्रधान, दो विधान, दो निशान नहीं चलेंगे। संघ परिवार आज भी उनके महान बलिदान का गर्व से उल्लेख करता है। वे कहते नहीं थकते कि जवाहर लाल नेहरू का सब बिगाड़ा हुआ है, अगर सरदार पटेल के हाथ में कश्मीर मसला होता तो कोई समस्या ही नहीं होती। सच यह है कि हिंदुत्ववादियों की चलती तो कश्मीर भारत में आता ही नहीं। शेरे कश्मीर शेख अब्दुल्ला ने श्रीनगर के लाल चैक से ऐलान किया था, हम महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू के भारत में कश्मीर का विलय कर रहे हैं। मौजूदा पीढ़ी के लिए शेख अब्दुल्ला का अर्थ समझना जरूरी है। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना को शेख पसंद नहीं करते थे। कश्मीरी मुसलमानों के एकछत्र और निर्विवाद नेता शेख अब्दुल्ला ने पाकिस्तान आंदोलन में मुस्लिम लीग का साथ देने से इनकार कर दिया था।
    भारत-पाकिस्तान में राज्यों के विलय या स्वतंत्रता का जो फार्मूला बना था, उसके अनुसार मुस्लिम बहुल जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान के  साथ जाना चाहिए था या वह स्वतंत्र रह सकता था। रियासत के राजा हरि सिंह एशिया के स्विट्जरलैंड के रूप में कश्मीर रियासत को स्वतंत्र रखना चाहते थे। इसी बीच पाकिस्तान ने हमला कर दिया। हमलावर श्रीनगर के नाके तक पहुँच चुके थे। राज परिवार जान बचाकर श्रीनगर से भागा था। जम्मू में पड़ाव डालने के बाद राजा ने अपने एडीसी से कहा था, अगर पाकिस्तानी हमलावर रात में यहां तक आ जाएँ तो मुझे शैय्या पर ही गोली मार देना। उन हालात में लाल चैक में शेख अब्दुल्ला ने मोर्चा संभाला था। अगर हमलावर बारामूला में लूट और बलात्कार के घिनौने खेल में न फँसे होते तो भारतीय सेना के पहुँचने से पहले श्रीनगर पर पाकिस्तान का कब्जा हो चुका होता। शेख अब्दुल्ला होने का मतलब यह है कि उन्होंने भारत में विलय के लिए कश्मीर घाटी और जम्मू के मुसलमानों की सहमति जुटाई। उस शेख पर उँगली उठाना बहुत घटिया दर्जे की अहसान फरामोशी होगी।
    कश्मीर मसले को हिंदू-मुस्लिम चश्मे से देखने वालों को याद रखना चाहिए कि कश्मीर भारत में आया शेरे कश्मीर की बदौलत और कश्मीर की खातिर पहली शहादत हुई एक मुसलमान की। वह थे भारतीय सेना के ब्रिगेडियर उस्मान। इलाहाबाद में उनकी समाधि बनी हुई है, उपेक्षित, भुलाई हुई।
    उमर अब्दुल्ला के बयान का भी गलत अर्थ निकाला गया। मानों वे कश्मीर को भारत से अलग करने की बात कर रहे हों। अनुच्छेद 370 दरअसल भारत से कश्मीर के रिश्ते को स्थापित और परिभाषित करता है। वह एक तरह की नाभिनाल है। अगर कश्मीर का मुसलमान तय कर ले 370 की अब जरूरत नहीं है, तो उसकी समाप्ति बेशक संभव हो सकती है। लेकिन मौजूदा स्थितियों में वह मुमकिन नहीं है। बीजेपी की सरकार को महसूस करना चाहिए कि सुलझे हुए मसलों को उलझाना विनाशक आग से खेलने से कम नहीं होता। पहले से बारूद के ढेर पर बैठे कश्मीर पर दहकते कोयले नहीं फेंके जाने चाहिए।
    नेहरू-अब्दुल्ला सोच के दायरे में बनी राष्ट्रीय सहमति को पलट कर हिंदुत्ववादी एजेंडे को थोपने की कोशिशों से भारत निःसंदेह कमजोर होगा। अगर लाठी और बंदूक से कश्मीर में स्थायी शांति संभव होती, तो वह कब की कायम हो चुकी होती। उम्मीद की जाए कि दो विधान की तरह  370 भी कश्मीर सहित पूरे भारत में शांति के लिए बना रहेगा।
 -प्रदीप कुमार
मोबाइल: 09810994447
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

बुधवार, 26 मार्च 2014

सत्ता पाने के लिए शीर्षासन

आरएसएस के अनुवांशिक संगठन भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आने के लिए पुरजोर कोशिश कर रही है।  इसके लिए कॉर्पोरेट सेक्टर द्वारा जनित चेहरा नरेंद्र मोदी का है।  नरेंद्र मोदी ने कॉर्पोरेट सेक्टर के इशारे पर भाजपा के पुराने नेताओं को अप्रासंगिक घोषित कर उनको अलग थलग करने का कार्य बड़ी तेजी से किया है। इसमें काफी हद तक उन्हें सफलता भी मिली है। लाल कृष्ण अडवाणी को अपनी मनचाही सीट से लड़ने नहीं दिया तो जसवंत सिंह जैसे नेताओं को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ने के लिए मजबूर कर दिया।  लाल जी टंडन, केसरीनाथ त्रिपाठी, कल्याण सिंह जैसे सैकड़ों दिग्गज नेताओं को चुनाव मैदान से बाहर कर दिया है।  टिकट वितरण में रुपया, गुटबाजी, जिस्मफरोशीका भी योगदान रहा है।  जिसका एक उद्धरण यह भी है टिकट के लिए भाजपा नेता ने अपनी बेटी को बेचा, दामाद ने की हत्या
दिल्ली के निकट साहिबाबाद में भाजपा नेता धर्मवीर चौधरी की उन्हीं के दामाद ने गोली मारकर हत्या कर दी। गिरफ्तार आरोपी ने बताया कि मृत नेता अपनी बेटी को दूसरे नेताओं के साथ सोने के लिए मजबूर करते थे। साहिबाबाद के रहने वाले धर्मवीर चौधरी पार्टी के वार्ड अध्यक्ष भी थे।
उन्हें गोली मारने के बाद दामाद सुनील ने साहिबाबाद थाने में जाकर सरेंडर कर दिया। आरोपी ने बताया कि उसकी शादी 18 साल पहले मृत नेता की बेटी से हुई थी। लेकिन पिछले 8 महीने से मेरी बीवी मेरे साथ ना रहकर अपने पिता के घर में रहने लगी थी। पिता ने मेरी पत्नी को जबरदस्ती अपने घर में रखा हुआ था। वह पार्टी की ओर से टिकट पाने के लालच में नेताओं को अपनी बेटी और मेरी पत्नी को उनके घरों में गंदे काम के लिए भेजा करता था।
इलाके में रसूख होने के कारण कोई इससे उलझना नहीं चाहता था। मैं अपने ससुर की इन हरकतों से बहुत परेशान हो गया था, इस कारण आज मैंने उसे गोली मार दी। पुलिस ने बताया कि सुनील की 4 लड़कियां और 2 लड़के हैं। 
इस तरह के कितने उदहारण मिल सकते हैं यह जांच का विषय है। वहीँ पर भाजपा ने अपने पुरानी पीढ़ी के नेताओं को बेइज्जत कर वाणी से पूरी तरह पंगु बना दिया है।  वहीँ, सत्तारूढ़ दल के पुराने नेताओं को राजनितिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना प्रारम्भ किया है।  स्वप्नदर्शी नेहरू को इस वजह से भी बदनाम किया जा रहा है कि उनसे जुड़े हुए लोग सत्ता पर काबिज हैं।  दूसरे के पितामह को अपना पितामह घोषित करना और अपने पितामह को बेइज्जत करना इस चुनाव की मुख्य विशेषता भी है। जनसत्ता ने लिखा है "आज देश में संघ परिवार और उसके ‘शो ब्वॉय’ नरेंद्र मोदी, सरदार पटेल के कंधे का इस्तेमाल करते हुए नेहरू के चरित्र पर अवांछित हमले कर रहे हैं। उनकी राय में जवाहरलाल ने लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे सिद्धांतों को भारतीय संविधान में गूंथ कर कोई अपराध कर दिया है। यह संयोग है कि नेहरू के उत्तराधिकारी लगातार भारतीय राजनीति के केंद्र में रहे हैं। जिस विचारधारा ने आजादी की लड़ाई में खुद को महफूज रखा, वह इस बात से खौफजदा है कि नेहरू-गांधी परिवार राजनीति के शिखर पर कब तक काबिज रहेगा। इसलिए उसने कांग्रेस के सभी हिंदुत्व समर्थक नेताओं को अपने पूर्वज होने का प्रमाणपत्र जारी कर दिया है "
  यह सब इसलिए हो रहा है कि गुजरात में टाटा से लेकर सभी प्रमुख उद्योगपतियों को एक तरह से निशुल्क जमीन दी गयी है।  प्राकृतिक सम्पदाओं को उपहार स्वरूप सौंपा गया है।  बैंक ऋण एक तरह से ब्याज मुक्त है इसलिए उस लाभ को पूरे देश में प्राप्त करने के लिए नरेंद्र मोदी को मीडिया द्वारा प्रचारित किया जा रहा है कि वह विकास पुरुष हैं और एक मिथ्या लहर कि बात कही जा रही है।  हाँ यह जरूर है कि मीडिया एक सम्मोहन की स्तिथि पैदा कर रही है कि मत देने तक मतदाता भ्रमित रहे। और उस भ्रम का लाभ नरेंद्र मोदी को हो और पूरे देश में कॉर्पोरेट सेक्टर को मुक्त लूट का अवसर मिल सके। 

सुमन
लो क सं घ र्ष ! 
 

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

स्टेच्यु आफ यूनिटी और अस्थिकलश यात्रा



अक्टूबर के अंतिम और नवंबर के प्रथम सप्ताह के बीचए दो परस्पर विरोधाभासी घटनाएं हुईं। एक ओर भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की विशालकाय मूर्ति जिसे स्टेच्यु आफ यूनिटी कहा जा रहा हैए का गुजरात में शिलान्यास हुआ तो दूसरी ओर बिहार में भाजपा ने पटना बम धमाकों में मारे गए लोगों की अस्थिकलश यात्रा निकाली। ये लोग मोदी की हुंकार रैली में हुए धमाकों में मारे गए थे। जहां पटेल ने भारत को एक कर, उसे राष्ट्र का स्वरूप दिया, वहीं भाजपा ने अस्थिकलश यात्रा निकालकर भारत को बांटने की कोशिश की। संघ परिवार देश को बांटने की नई.नई तरकीबें खोजने में माहिर है। जाहिर है, ये सभी तरकीबें भारतीय संविधान में निहित बंधुत्व के मूल्य के विरूद्ध हैं।
मूल प्रश्न यह है कि भारत की एकता को हम किस रूप में देखें। भारत का एकीकरण शुरू हुआ अंग्रेज़ों के आने के बाद से। उसके पहले, उपमहाद्वीप ने आदिम सभ्यता से लेकर राजशाही तक की यात्रा पूरी कर ली थी। पशुपालक समाज का ढांचा एकदम अलग था। गरीब किसान कमरतोड़ मेहनत कर अनाज उगाता था, जिसका बड़ा हिस्सा जमींदारों के जरिए राजाओं द्वारा हड़प लिया जाता था। निर्धन किसान जमींदारों के गुलाम भर थे। आज की युवा पीढ़ी, उस दौर की जिंदगी की एक झलकए महान साहित्यकारों, विशेषकर मुंशी प्रेमचंद, के साहित्य में देख सकती है। अंग्रेजों ने इस देश को लूटने के लिए फूट डालो और राज करो  की नीति अपनाई। और इसके लिए उन्होंने सबसे पहले इतिहास का साम्प्रदायिकीकरण किया। राजाओं, नवाबों और बादशाहों को धर्म के चश्मे से देखा जाने लगा। यहां तक कि इतिहास के जिस दौर में भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ हिस्से पर मुस्लिम राजाओं का शासन था, उसे मुगलकाल का नाम दे दिया गया। मुस्लिम राजा यहीं जिए और यहीं मरे, जबकि अंग्रेजों ने लंदन से भारत पर शासन किया और देश को जमकर लूटा खसोटा। राजाओं के काल में राष्ट्र.राज्य की अवधारणा नहीं थी। ढेर सारे राजा और बादशाह थे, जो अनवरत एक दूसरे से युद्धरत रहते थे और तलवार के दम पर अपने.अपने राज्यों की सीमाओं को बढ़ाने की जुगत में लगे रहते थे।
देश को लूटने में उन्हें सुविधा होए इसके लिए ही अंग्रेजों ने रेलवे, संचार माध्यमों और आधुनिक शिक्षा की नींव रखी। अंग्रेजों का असली इरादा चाहे जो भी रहा हो परन्तु रेलवे, संचार माध्यमों और आधुनिक शिक्षा के कारण देशए भौगोलिक दृष्टि से एक हुआ। आज हम भारत को जिस स्वरूप में देख रहे हैं उसका निर्माण, अंग्रेजों के राज में ही शुरू हुआ था। परंतु अनवरत युद्धरत बादशाहों के देश से भारतीय राज्य बनने की प्रक्रिया को अन्य कारकों से भी बल मिला। अंग्रेजों की नीतियों ने देशवासियों में असंतोष को जन्म दिया और ब्रिटिश शासन प्रणाली ने इस असंतोष को स्वर देने के रास्ते भी खोले। राजशाही के दौर के विपरीत, साम्राज्यवादी दौर में उद्योगपतियों, श्रमिकों और नए उभरते वर्गों के कई संगठन अस्तित्व में आए। इस तरह के संगठन, देश में पहले कभी नहीं थे। इनमें से कुछ थे मद्रास महाजन सभा, पुणे सार्वजनिक सभा व बाम्बे एसोसिएशन। उसी दौर में नारायण मेघाजी लोखण्डे और सिंगार वेल्लू ने श्रमिकों को संगठित करना शुरू किया। ये संगठन धर्म पर आधारित नहीं थे। इनका आधार था पेशा या व्यवसाय। इन संगठनों के सदस्य देश के सभी क्षेत्रों और सभी धर्मों के हमपेशा लोग थे। अंग्रेजों द्वारा डाली गई इस नींव पर  भारतीय पहचान ने आकार लेना शुरू किया और आगे चलकर, भौगोलिक एकताए भावनात्मक एकीकरण में बदल गई।
इस एकीकरण को मजबूती दी साम्राज्यवाद.विरोधी व ब्रिटिश.विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन ने। राष्ट्रीय आंदोलन में सभी धर्मोंए क्षेत्रों व जातियों के नागरिकोंए विभिन्न भाषा.भाषियों, महिलाओं व पुरूषों ने हिस्सेदारी की। और  शनैः शनैः भारतीय पहचान, हमारी मानसिकता और नागरिक जीवन का हिस्सा बन गई। भारत को राष्ट्र में बदलने वाला यह आंदोलन, दुनिया का सबसे बड़ा जनांदोलन थाए जिसकी नींव स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों पर रखी गई थी.और यही मूल्य आगे चलकर भारतीय संविधान का हिस्सा बने। अतः हम कह सकते हैं कि ब्रिटिश शासन के विरोध में चले आंदोलन ने देश को एक किया। इस एकता के पीछे थी धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक भारत के निर्माण की परिकल्पना.एक ऐसे भारत केए जिसकी सांझा संस्कृति हो। हम स्वतंत्र हुए परन्तु साथ में आई विभाजन की त्रासदी। इस प्रकार देश एक हुआ परन्तु कुछ काम अभी भी बाकी थे।
स्वतंत्रता के बाद लगभग 650 राजे.रजवाड़ों को यह तय करना था कि वे भारत का हिस्सा बनें, पाकिस्तान का या फिर स्वतंत्र रहें। इस मामले में सरदार पटेल ने भारत को एक करने में महती भूमिका निभाई। एक तरह से उन्होंने देश की एकता रूपी दीवार पर प्लास्टर किया। उन्होंने जिस राष्ट्रीय एकता को मजबूती दी, उसका चरित्र भावनात्मक, नागरिक और राष्ट्रीय था। इसमें सभी धर्मों के लोगों की हिस्सेदारी थी। और यही कारण था कि अपनी एकदम अलग पृष्ठभूमियों और भारतीय राष्ट्र के चरित्र के बारे मे अपने वैचारिक विभिन्नताओं के बावजूदए गांधी, नेहरू, पटेल व मौलाना आजाद एक टीम के रूप में काम कर सके। मोदी कुछ ऐसी टिप्पणियां करते रहे हैं जिनसे ऐसा ध्वनित होता है कि पटेलए मुसलमानों के साथ अलग तरह का व्यवहार करते। परंतु उनकी यह सोच गलत है। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के महान नेताओं में इस विषय पर मतविभिन्नता नहीं थी। पटेल ने ही अल्पसंख्यकों को उनकी शैक्षणिक संस्थाएं स्थापित करने का अधिकार दिया था। पटेल के बारे में गांधी जी ने कहा था, ष्मैं सरदार को जानता हूं हिन्दू.मुस्लिम और कई अन्य मुद्दों पर उनकी सोच और तरीके, मेरे और पंडित नेहरू से अलग हैं। परंतु उन्हें मुस्लिम विरोधी बतानाए सत्य की हत्या करना होगा।
समाज के विभिन्न तबकों के संगठनों के निर्माण से शुरू हुई भावनात्मक और नागरिक एकीकरण की प्रक्रिया को आजादी के आंदोलन ने मजबूती दी और इसकी अंतिम परिणति थी भारत में राजे.रजवाडों का विलय। उस समय भी एक छोटा.सा तबका समाज को बांटने की साजिशें रचता रहता था। देश को बांटने की शुरूआत हुई मुस्लिम लीग व हिन्दू महासभा.आरएसएस के धार्मिक राष्ट्रवाद से। देश को बांटने वालों में शामिल थे जमींदार और नवाब और इनका नेतृत्व कर रहे थे ढाका के नवाब और काशी  के राजा। बाद में षिक्षित मध्यम वर्ग के कुछ लोग भी इनके साथ हो लिए। इनमें शामिल थे जिन्ना, सावरकर व आरएसएस के संस्थापक। जहां गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन लोगों को एक कर रहे थे वहीं साम्प्रदायिक संगठन एक.दूसरे के खिलाफ नफरत फैला रहे थे। इसी नफरत से उपजी साम्प्रदायिक हिंसा, जिसके कारण कलकत्ता और नोआखली जैसे स्थानों पर भयावह खून खराबा हुआ। वे गांधी ही थे जो राजकाज को नेहरू और पटेल के हवाले कर, साम्प्रदायिकता की आग बुझाने के लिए अकेले ही निकल पड़े थे।
स्वाधीनता के बाद, कुछ वर्षों तक साम्प्रदायिकता का दानव सुप्तावस्था में रहा। सन् 1961 में उसने अपना सिर फिर उठाया और जबलपुर में साम्प्रदायिक हिंसा भड़क उठी। साम्प्रदायिक हिंसा की जड़ में है दूसरे के प्रति घृणा, जिसे संघ की शाखाओंए स्कूली पाठ्यपुस्तकों और मुंहजबानी प्रचार के जरिए हवा दी जाती है। इससे एक सामूहिक सामाजिक सोच उपजती है, जिसमें धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति नकारात्मकता का भाव निहित होता है। दंगे शुरू करवाने के लिए कई तरीके विकसित कर लिए गए हैं। कभी मस्जिद में सुअर का मांस फेंक दिया जाता है तो कभी मंदिर में गौमांस कभी गौहत्या की अफवाह फैलाई जाती है तो कभी मस्जिदों के सामने बैंड बजाए जाते हैं। हमारी महिलाओं  के साथ दुव्र्यवहार की अफवाहए दंगें भड़काने के अचूक तरीकों में से एक है।
अब एक नया तरीका भी सामने आ रहा है। बाबरी मस्जिद पर अक्टूबर 1990 में कारसेवकों के हमले को रोकने के लिए पुलिस ने गोलियां चलाईं, जिसमें कई कारसेवक मारे गए। विहिप ने इन कारसेवकों की अस्थिकलश यात्रा निकाली और यह यात्रा जहां जहां से गुजरी, वहां.वहां खून खराबा हुआ। गोधरा में ट्रेन में आग लगने की घटना के बाद भी इसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया। कारसेवकों के शव विहिप को सौंप दिए गए, जिसने उनका जुलूस निकाला। इस जुलूस से समाज में उन्माद भड़क उठा। इसके बाद जो कुछ हुआ, वह हम सब अच्छी तरह से जानते हैं। आज भी हमारा समाज धार्मिक आधार पर बंटा हुआ है। हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच अविश्वास की खाई है। गुजरात जैसे कुछ प्रदेशों में यह खाई बहुत चौड़ी  और बहुत गहरी है।
अब हम कंधमाल की बात करें। स्वामी लक्ष्मणानंद मारे गए। इस बात से किसी को मतलब नहीं था कि उन्हें किसने मारा। विहिप ने उनके मृत शरीर का जुलूस निकाला। उसके बाद ईसाईयों के खिलाफ हिंसा शुरू हो गई। ठीक यही तकनीक पटना बम धमाकों के बाद इस्तेमाल में लाई गई। वहां अस्थिकलश यात्रा निकाली गई जो अलग.अलग रास्तों से निकली। क्या इसका उद्देश्य उन गरीब, निर्दोष लोगों को श्रद्धांजली देना था, जो बम धमाकों के शिकार बने?यदि ऐसा था तो फिर धमाकों में लोगों की मौत के बाद भी रैली जारी क्यों रही? उसे श्रद्धांजलि सभा में परिवर्तित क्यों नहीं किया गया? सच यह है कि इस नाटक का उद्देश्य समाज को धर्म के आधार पर बांटना था। सरदार पटेल ने देश को एक किया। भाजपा और उसके साथी देश को बांट रहे हैं। यहां संघ परिवार का दोगलापन एकदम साफ नजर आता है। वे सरदार की स्मृति को अक्षुण्ण रखना चाहते हैं। सरदार ने केवल राजे.रजवाडों का देश में विलय कराकर, देश को एक नहीं किया था। उन्होंने उस स्वाधीनता आंदोलन में असरदार भूमिका अदा की थी जो देश को एक करने वाला आंदोलन था। केवल राजे.रजवाड़ों को देश में मिला देने से देश एक नहीं हो जाता। वह तो देश के एकीकरण की प्रक्रिया का अंतिम चरण था। दूसरी ओरए पटेल के तथाकथित भक्त, अस्थिकलश यात्रा निकालकर समाज और देश को बांट रहे हैं। क्या हमारे राजनेता, सत्ता की अपनी लिप्सा को पूरा करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं?
.-राम पुनियानी
Share |