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बुधवार, 16 अप्रैल 2014

तब तो कश्मीर भारत में होता ही नहीं

  संघ परिवार के ‘‘राष्ट्रवादी’’ आख्यान में कश्मीर का सदैव महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इसका केंद्र बिंदु यह है कि जवाहर लाल नेहरू की वजह से कश्मीर समस्या पैदा हुई और संघ परिवार एवं उसके नायकों की चलती तो यह मसला कब का हल हो चुका होता। सच यह है कि नेहरू का सेक्युलर-लोकतांत्रिक नेतृत्व न होता, तो कश्मीर भारत में होता ही नहीं। मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर-यह भी याद रखें, उस समय जम्मू में 61 प्रतिशत मुसलमान था  और कश्मीर में हिंदुओं की आबादी सिर्फ 7.8 फीसदी थी-नई दिल्ली में किसी गैर सेक्युलर, मुस्लिम विरोधी सरकार के साथ विलय का समझौता करता ही नहीं।
    संघ परिवार इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने में उस्तादों का उस्ताद है, फिर भी कुछ सच ऐसे होते हैं, जिन पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। यह जानना जरूरी है कि कश्मीर के सर्वमान्य  और निर्विवाद नेता शेख मुहम्मद अब्दुल्ला ने नेहरू की कठिनाइयों और भारत में विलय की स्थितियों का किस प्रकार वर्णन किया। 10 जुलाई 1950 को नेहरू के नाम पत्र में शेख  ने लिखा, ‘‘यह स्पष्ट है कि आप की कश्मीर नीति और भारतीय संघ को वास्तविक सेक्युलर राज्य बनाने के आप के आदर्श से असहमत शक्तिशाली तत्व भारत में सक्रिय हैं। यह तत्व आप को कमजोर करने की लगातार कोशिश कर रहे हैं और इसे हासिल करने लिए वे यह जरूरी मानते हैं कि आप के प्रति निष्ठावान  लोगों को धराशाई कर दिया जाए। मैं आप के लिए अपने को कुर्बान करने को तैयार हूँ, लेकिन 40 लाख कश्मीरियों के संरक्षक के नाते मैं उनके अधिकारों का सौदा नहीं कर सकता।’’
    पत्र का अगला भाग बड़ा मार्मिक है। शेख ने लिखा, ‘‘मैं कई बार कह चुका हूँ कि हमने भारत में कश्मीर का विलय किया, क्योंकि हमने गांधी जी और आप के रूप में आशा और आकांक्षा के दो चमकते सितारे देखे। पाकिस्तान के साथ कई नजदीकियों के बावजूद हम उसके साथ नहीं गए, क्योंकि हमारे कार्यक्रम उसकी नीतियों में फिट नहीं बैठते थे। लेकिन मैं नतीजा निकाल रहा हूँ कि हम अपनी मेधा के अनुरूप राज्य का निर्माण नहीं कर सकते। मैं अपने अवाम को क्या जवाब दूँ?’’

    शेख अब्दुल्ला का मोह भंग होने की शुरुआत हो चुकी थी। कारण क्या था? कारण था संघ की सहधर्मिणी संस्था, प्रजा परिषद का जम्मू में शुरू किया गया आंदोलन। नेहरू ने अपने मित्र और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बिधान चंद्र राय को पत्र में लिखा, ‘‘कश्मीर घाटी के लोग  जम्मू और शेष भारत के सांप्रदायिक तत्वों से भयभीत हैं। आज हालत यह है कि जनमतसंग्रह हो तो कश्मीरी मुसलमानों का भारी बहुमत हमारे खिलाफ जाएगा। प्रजा परिषद के आंदोलन का लक्ष्य भारत में कश्मीर का अधिकाधिक एकीकरण है, लेकिन हो रहा है उल्टा। प्रजा परिषद के आंदोलन के कारण हम कश्मीर घाटी को खो बैठने के कगार पर पहुँच चुके हैं। यह सब प्रजा परिषद के आंदोलन की वजह से हुआ है।’’
1 जनवरी 1952 को कोलकाता में एक सभा में नेहरू ने चेतावनी दी, ‘‘अगर कल शेख अब्दुल्ला यह तय कर लें कि कश्मीर को पाकिस्तान के साथ जाना है, न तो मैं और न भारत की पूरी ताकत इसे रोक पाएँगे क्योंकि अगर नेता ऐसा चाहता है तो यह होकर रहेगा। इसलिए जनसंघ और आर.एस.एस. पाकिस्तान के हाथों में खेल रहे हैं। जरा कल्पना करें, अगर जनसंघ या अन्य किसी सांप्रदायिक पार्टी का भारत में राज होता तो कश्मीर में क्या होता। कश्मीर के लोग कह रहे हैं कि वे इस फिरकापरस्ती से आजिज आ चुके हैं। जिस देश में जनसंघ और आर.एस.एस. उन्हें लगातार परेशान कर रहे हों, वहाँ वह क्यों रहना चाहेंगे?’’
    नेहरू की चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। छह दशक से अधिक समय में भारत में कश्मीर का विलय बेशक मजबूत हुआ है, लेकिन संघ परिवार की खतरनाक सांप्रदायिक नीतियाँ यथावत हैं। आज जब भाजपा के नेता कश्मीर को लेकर कांग्रेस को कोसते हैं, तो यह खतरा और रेखांकित हो जाता है। कांग्रेस को कोसने के पीछे दरअसल वही पुराना सांप्रदायिक एजेंडा है।
 -प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

भगवान बुद्ध को क्यों भूल गए मोदी जी?

कुछ अरसा पहले नरेंद्र मोदी से पूछा गया था कि स्वामी विवेकानंद की तरह क्या भगवान बुद्ध का भी प्रभाव आप पर पड़ा। यह वह दौर था जब मोदी के ट्विटर पर स्वामी जी का एक उद्धरण प्रतिदिन आया करता था। मोदी का उत्तर था, ‘‘मैं बहुत भाग्यशाली हूँ कि जिस गाँव में मेरा जन्म हुआ था, उस पर बौद्ध प्रभाव था। ह्वेन सांग ने मेरे गाँव का भ्रमण किया था। उन्होंने लिखा था कि मेरे गाँव में दस हजार बौद्ध भिक्षुओं के आवास की व्यवस्था थी। मेरा सपना है कि गुजरात में बुद्ध का एक विशाल मंदिर बनवाऊँ।’’
    23 जनवरी को मोदी ने गोरखपुर में भाजपा की सभा को संबोधित किया। मतलब की अर्थात राजनैतिक लाभ की शायद ही ऐसी कोई बात हो जो मोदी ने न की हो। कांग्रेस और सपा पर एक से एक जहरीले तीर छोड़े। बसपा पर घुमा-फिरा कर चोट की। उन्हें डर रहा होगा कि सीधी चोट से बसपा के अधिकतर मतदाता कहीं नाराज न हो जाएँ। इसलिए दलित वर्ग से अपनी पार्टी की दोस्ती का बखान किया। होम वर्क इस तरह करके आए थे कि गोरखपुर के बंद कारखानों का उल्लेख करना भी नहीं भूले। लेकिन बुद्ध को वह भूल गए। बुद्ध का गोरखपुर से घनिष्ठ संबंध रहा है। गोरखपुर से सिर्फ 52 किलोमीटर दूर कुशीनगर है। यहाँ बुद्ध ने परिनिर्वाण प्राप्त किया था। दुनिया भर से लाखों बौद्ध और अन्य लोग यहाँ आते हैं। बुद्ध की स्मृति में यहाँ स्मारक बना हुआ है।
    गोरखपुर से करीब सौ किलोमीटर दूर नेपाल में लुंबिनी है, जहाँ बुद्ध का जन्म हुआ था। पाँचवे-आठवें दर्जे तक बच्चे पढ़ चुके होते हैं किउनकी माता का नाम रानी मायादेवी और पिता का नाम का  राजा शुद्धोधन था। लुंबिनी इधर कुछ वर्षों से बड़ी चर्चा में है, क्योंकि कई देशों के आर्थिक सहयोग से वहाँ पर्यटन स्थल का विकास किया जा रहा है। इसमें चीन की सक्रियता पर विवाद भी उठ चुका है। आशा थी कि मोदी गोरखपुर की सभा में भगवान बुद्ध का पवित्र स्मरण  करेंगे और कुशीनगर के विकास के लिए कुछ योगदान की भी घोषणा कर डालेंगे। मोदी की जुबान पर बुद्ध का नाम ही नहीं आया।
    कहा जा सकता है कि संघ परिवार के जीवनदायिनी विषय, राममंदिर पर जब मोदी कुछ नहीं बोले तो बुद्ध की याद क्यों दिलाई जा रही है। मोदी नहीं बोले तो क्या हुआ, अरुण जेटली और अन्य कई नेताओं पर राम मंदिर का मुद्दा छोड़ दिया गया है। वह तो सरेआम कह रहे हैं कि राममंदिर का मुद्दा न तो छोड़ा है और न छोड़ेंगे। एक और फर्क है। अयोध्या में मंदिर का निर्माण एक विवादास्पद विषय है। बुद्ध और कुशीनगर पर तो कोई विवाद ही नहीं है। मोदी अपने गुजरात में बुद्ध का विशाल मंदिर जब बनवाएँगे तब, बनवाएँ भी या नहीं, कुशीनगर के लिए तो कुछ घोषणा कर ही सकते थे।
    मोदी अपने इतिहास ज्ञान की कई बार खिल्ली उड़वा चुके हैं, जैसे तक्षशिला बिहार में है। लेकिन जब उन्हें यह मालुम है कि चीनी विद्वान और यात्री हवेन सांग सातवीं शताब्दी में भारत आया था और बुद्ध का मंदिर भी बनवाने की इच्छा व्यक्त कर चुके हैं तो कुशीनगर और लुंबिनी के बारे में भी जरूर मालूम होगा। उन्होंने भगवान बुद्ध और उनके जीवन से जुड़े इन पवित्र स्थलों का स्मरण शायद इसीलिए नहीं किया कि इससे वोटों का फायदा नहीं होने वाला। सेक्युलरिज्म का विरोध कर धर्म और राजनीति के घालमेल में यही होता है कि धर्मों और अवतारों की याद फायदे के लिए मौके-मौके पर ही की जाती है।
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

कैसे किया एन.डी.ए. ने राष्ट्रीय सुरक्षा पर समझौता

  आज जब बी.जे.पी. के नेता राष्ट्रीय सुरक्षा पर घडि़याली आँसू बहाते हैं, हँसी नहीं आती, बल्कि चिंता होती है। चिंता इसलिए कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अहम मुद्दे पर भी वह दुष्प्रचार से बाज नहीं आते। देखते हैं ‘‘राॅ’’  के एक बड़े अधिकारी की गैरकांग्रेसी सरकारों के बारे में राय। ‘‘राॅ’’ के अतिरिक्त निदेशक बी. रमन ने रिटायरमेंट के बाद लिखा, ‘‘आतंकवादियों के सामने दयनीय आत्मसमर्पण के केवल दो उदाहरण हैं। एक 1989 में जब वी.पी. सिंह (इस सरकार का समर्थन भाजपा बाहर से कर रही थी) प्रधानमंत्री थे और मुफ्ती मुहम्मद सईद गृहमंत्री। दो, 1999 में जब भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार तीन आतंकवादियों की रिहाई के लिए सहमत हुई।’’
    रमन लिखते हैं, ‘‘भाजपा ने चुनाव से पहले वादा किया था कि आई.एस.आई. के प्रॉक्सी वार पर श्वेतपत्र जारी करेगी और पाकिस्तान को आतंकवाद का संचालक घोषित करवाएगी। दोनों वादों पर अमल में वह विफल रही। इससे भी ज्यादा यह हुआ कि इस सरकार ने प्रच्छन्न कार्रवाई की क्षमता समाप्त करने के गुजराल सरकार के फैसले को भी नहीं पलटा। इससे सुरक्षा तंत्र को बहुत आश्चर्य हुआ।
    इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और नरसिंह राव की, पाकिस्तान से पेश आने की नीति  में दृढ़ता की निरंतरता थी। वाजपेयी सरकार की नीति में इसका अभाव था। अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर यात्रा या जनरल मुशर्रफ को शिखर वार्ता के लिए आगरा आमंत्रित करने से पहले खुफिया तंत्र से राय नहीं ली गई। नतीजा यह हुआ कि ये दोनों यात्राएँ विफल रहीं।’’
    प्रधानमंत्री वाजपेयी की सरकार  कश्मीरी अलगाववादियों और आतंकवादियों से बात करने की बहुत इच्छुक थी।  इस हद तक कि वाजपेयी ने कहा, ‘‘इंसानियत के दायरे में तो बात हो सकती है।’’ रमन इस बारे में हकीकत बयान करते हैं, ‘‘अटल सरकार 2001 में हिजबुल मुजाहिदीन के एक वर्ग की ओर से वार्ता के
संबंध में उचित कदम नहीं उठा सकी। इससे पाकिस्तान स्थित हिजबुल मुजाहिदीन के नेतृत्व को, इस वर्ग की पहचान करने और उसे खत्म कर देने में कामयाबी मिल गई।’’
    रमन ने इसका खुलासा नहीं किया है। लेकिन अंदर की कहानी यह है कि हिजबुल मुजाहिदीन के इस वर्ग से संपर्कों के दौरान सतर्कता नहीं बरती गई। इस अहम पहलू की अनदेखी कर दी गई कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. उग्रवादियों, अलगाववादियों के नरम पड़ रहे खेमे को सफल नहीं होने देगी। अगर उनकी सफलता की गुंजाइश रहे, तब तो कश्मीर में पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद के खत्म होने की भी संभावनाएँ पैदा हो जाएँगी। यहाँ यह सवाल उठता है कि राजनैतिक नेतृत्व ने भारत की खुफिया एजेंसियों को विश्वास में क्यों नहीं लिया? सम्भावित उत्तर यही हो सकता है कि आज भाजपा नेता जिस सरकार को एक आदर्श बताकर पेश कर रहे हैं, वह पाकिस्तान के फौजी जनरलों पर बहुत भरोसा करने लगी थी। कारगिल का विश्वासघात एक स्वाभाविक परिणाम था।
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

तो यह थी उनकी मजबूत सरकार!

इन दिनों नरेंद्र मोदी से लेकर उनके आगे-पीछे चलने वाले बी.जे.पी. नेता यह कहते नहीं अघाते कि वह देश को मजबूत सरकार देंगे, राष्ट्रीय सुरक्षा की गारंटी करेंगे और न जाने क्या-क्या करेंगे। उन्हें गलतफहमी है कि जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है।
    एन.डी.ए. की सरकार में कैसे-कैसे समझौते हुए और देश की इज्जत को बट्टा लगा, इसकी कई मिसालें हैं। फिलहाल सबसे शर्मनाक घटना का उल्लेख।
    दिसंबर 1999 में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी भारतीय यात्री विमान का अपहरण
कर कंधार ले गए थे। सक्षम और दृढ़ संकल्प सरकार अमृतसर हवाई अड्डे पर अपहृत विमान का रास्ता अवरुद्ध कर सकती थी। वीरोचित मुद्राएँ दिखाने वालों को कुछ नहीं सूझा। विमान के कंधार पहुँच जाने के बाद तो वीरों के हाथ-पैर फूल गए। मोदी और अन्य नेता कांग्रेस का मजाक यह कह कर उड़ाते हैं कि अजमल कसाब को बिरियानी खिलाई गई। दुष्प्रचार तो दुष्प्रचार ही ठहरा। उन्हें कौन बताए कि खाना-पीना जेल मैनुअल के हिसाब से होता है। काला सच यह है कि भाजपा के विदेशमंत्री जसवंत सिंह तीन कुख्यात आतंकवादियों को साथ लेकर
कंधार गए होंगे और उनका खाना-पीना जेल मैनुअल देख कर नहीं हुआ था।
    छोटे सरदार (अब पूर्व छोटे सरदार कहें, क्योंकि वर्तमान छोटे सरदार तो मोदी हैं) यानी तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी और कंधार गए विदेशमंत्री जसवंत सिंह सत्ता से हटने के बाद मोटी-मोटी किताबें लिख चुके हैं। लेकिन ईमानदारी से यह नहीं बताया कि पर्दे के पीछे हुआ क्या था। आडवाणी और जसवंत कई इंटरव्यू भी दे चुके हैं। फिर भी सच सामने नहीं आया है। जसवंत का कहना है, ‘‘मैं रहस्योद्घाटन नहीं कर सकता। वक्त आने पर करूँगा।’’ यह मान कर चलते हैं कि बाद में भारत पर आतंक का कहर बरपा करने वाले तीन आतंकवादियों की रिहाई का फैसला सारे वीरों का सामूहिक फैसला था।
    बस एक शख्स ने आतंकवादियों की रिहाई का कड़ा विरोध किया था। संघ परिवारियों को सुन कर अच्छा नहीं लगेगा, क्योंकि वह संविधान के अनुच्छेद 370 की स्थाई उपस्थिति पर कोई समझौता नहीं कर सकता और मुसलमान भी है। इस समय केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला उस समय जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री थे। बकौल फारूक, ‘‘मैंने आडवाणी को फोन करके कहा था कि हम मसूद अजहर और मुश्ताक जरगर जैसे आतंकवादियों को रिहा नहीं कर सकते, उन पर कोर्ट में केस चल रहे हैं। इसलिए रिहा नहीं किया जा सकता।
    आडवाणी ने जवाब दिया कि यह केंद्रीय कैबिनेट का फैसला है, आप मदद करें। ‘‘यह बताना भी प्रासंगिक होगा कि फारूक ने किन परिस्थितियों में आडवाणी को फोन किया था। फारूक के अनुसार उस समय जम्मू में उनके राजकीय आवास पर ‘‘राॅ’’ के चीफ ए.एस. दुलात के नेतृत्व में एजेंसी की टीम पहुँच चुकी थी। अर्थात, आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले राज्य के मुख्यमंत्री से सलाह-मशविरा किए बगैर कश्मीर की जेल में बंद (तीसरा शेख उमर शेख दिल्ली की तिहाड़ जेल में था ) दो आतंकवादियों की रिहाई का फैसला कर लिया गया था। आडवाणी, जसवंत या एन.डी.ए. सरकार के किसी भी मंत्री ने आज तक फारूक के बयान का खंडन नहीं किया है। 
     एक मिसाल, देखें कांग्रेस आतंकवाद से कैसे निपटती है। 1984 में कांग्रेस की सरकार थी। प्रधानमंत्री थीं इंदिरा गांधी। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के आतंकवादियों ने बर्मिंघम (ब्रिटेन) में भारतीय राजनयिक रवींद्र हरेश्वर म्हात्रे का अपहरण कर हत्या कर दी। वह तिहाड़ जेल में बंद लिबरेशन फ्रंट के नेता मकबूल भट की रिहाई की माँग कर रहे थे। अपहरण के तीसरे दिन म्हात्रे का शव बरामद हुआ। इसके बाद तिहाड़ जेल में ही भट को फाँसी दे दी गई। एन.डी.ए. के शासन में राष्ट्रीय सुरक्षा में ढिलाई और कांग्रेसी शासन में राष्ट्रीय हितों पर अडिग रहने और समझौतावादी नीति न अपनाने के अनेक उदाहरण हैं ,जिनके बारे में फिर। 

        -प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

विकास पुरुष का चेहरा सुप्रीम कोर्ट की नजरों में

   बी.जे.पी. के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय विकास के लिए काम करते हैं या कुनबाई विकास के लिए? विकास कार्य में वह कितनी पारदर्शिता बरतते हैं? वह कितने विश्वसनीय हैं? यह सारे सवाल सुप्रीम कोर्ट के हाल के एक फैसले के संदर्भ में उठ रहे हैं।
    मोदी की नजदीकी, राजस्व मंत्री आनंदी बेन पटेल ने एक कंपनी, इंडीगोल्ड रिफाइनरी को कच्छ में प्लांट लगाने के लिए 40 एकड़ जमीन अलाट कर दी। यह कंपनी प्लांट नहीं लगा पाई, तो उसे 1.20 करोड़ रुपये में यह जमीन अलुमीना रिफाइनरी प्रा. लि. के हाथ बेचने की इजाजत दे दी गई। नियमों के तहत यह नहीं हो सकता था। संबंधित अधिकारियों ने एतराज भी किया। लेकिन उनकी सुनी नहीं गई।
    एक स्थानीय कांग्रेसी नेता ने इस सौदे के खिलाफ गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दायर की। वहाँ याचिका रद्द हो जाने पर वह सुप्रीम कोर्ट गए। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए फैसले में कहा कि यह डील पूर्णतया मनमाने ढंग से हुई ,राज्य या सार्वजनिक प्राधिकरण के पास संपत्ति जनता के ट्रस्टी के नाते होती है, उसे न्यायपूर्ण और तर्कसंगत ढंग से काम करना चाहिए। सार्वजनिक पद पर विराजमान व्यक्ति अंततोगत्वा जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं, क्योंकि संप्रभु वही हैं। फैसले में कहा गया कि इस सौदे से संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन हुआ। नियम यह कहता था कि प्लांट लगाने में इंडीगोल्ड की असमर्थता के बाद यह जमीन राज्य सरकार के पास वापस आ जाती, क्योंकि यह कृषि भूमि थी। औद्योगिक इस्तेमाल के लिए किसी और कंपनी को देने का उसे अधिकार नहीं था। इस पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी है, ‘‘भूमि के हस्तांतरण की इजाजत दी गई, क्योंकि इंडीगोल्ड ने सीधे मुख्यमंत्री और उसके बाद राजस्व मंत्री से संपर्क किया। विशेष रियायत में मनमानेपन की बू आ रही है। राजस्व मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि इसे एक विशेष केस के रूप में लिया जाए, लेकिन इसका आधार उन्होंने नहीं बताया।’’
    जस्टिस एचएल गोखले और जस्टिस चेलामेश्वर की यह टिप्प्णी बड़ी सारगर्भित है, ‘‘स्पष्ट है, इस मामले में कलेक्टर ने कर्तव्य अपरायणता और मंत्री ने अधिनायकवाद  दिखाया, जिससे सिर्फ सत्ता का अहंकार दिखता है।’’ सत्ता का अहंकार ! अगर उसमें 56 इंची सीने का अहंकार मिल जाए तो क्या होगा!
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

सेना के हिंदूकरण पर जवाब दें मोदी

  भारतीय सेना की यह शानदार परंपरा है कि उसमें धर्म, जाति रंग या नस्ल पर कभी कोई विचार नहीं होता। हर तरह का विभाजक विचार वहाँ वर्जित है। बस देश की रक्षा का सैनिक धर्म होता है। कोई किसी भी धर्म का अनुयाई हो, देश की इज्जत के लिए जान न्योछावर करने के लिए सभी तैयार रहते हैं, लेकिन अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चली, तो यह सब खतरे में पड़ सकता है। तब देश की सुरक्षा के पूरे तंत्र के सामने  गंभीर स्थिति पैदा हो जाएगी।
    संघ के मासिक पत्र ‘राष्ट्र धर्म’ के संपादक आनंद मिश्र ‘अभय’ ने संघ के साप्ताहिक पत्र ‘पाञ्चजन्य’ में लिखा है, ‘वीर विनायक दामोदर सावरकर ने भी राष्ट्र रक्षा के लिए एक बहुआयामी मंत्र दिया था-हिंदू का सैनिकीकरण और सेना का हिंदूकरण। इस राष्ट्र रक्षा मंत्र का प्रयोग करने का अवसर आसन्न है। पर इसकी सिद्धि के लिए हमें पहले दिल्ली विजय करनी होगी। रणभेरी बज रही है, सुनें और समझें तथा समझ-बूझ कर प्रजातंत्र के सबसे बड़े हथियार का उपयोग करें। ‘ इसका एकमात्र भाष्य यह हुआ कि आगामी लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को प्रबल बहुमत से विजयी बनाएँ। बहुमत इतना भारी हो कि संघ के सिद्धांतों और विचारों के अनुरूप कानून बनाए जा सके और संविधान में संशोधन भी किया जा सके। हिंदू के सैनिकीकरण और सेना के हिंदूकरण के मंत्र का प्रयोग तभी संभव हो सकेगा।
    संघ परिवारी सदैव अपने को इस लाभदायक स्थिति में रखते हैं कि सुविधानुसार जब जो चाहें स्वीकार या अस्वीकार कर लें। लेकिन वैचारिक निरंतरता की आधारशिला एक ही रहती  है। जैसे मोदी संघ की पाठशाला में कूट-कूट कर शिक्षित और संस्कारित हुए। उनका संपूर्ण विचार-व्यक्तित्व संघ की देन है। आज वह संघ के पोलिटिकल फ्रंट, बी.जे.पी. के नेता हैं। पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार वह संघ की कृपा से ही बन पाए। इसलिए यह मान कर चला जा सकता है कि ‘पाञ्चजन्य’ में जो छपा है, उससे मोदी और उनके सहयोगी अवश्य सहमत होंगे। अगर यह तर्क दिया जाए कि वह एक पत्र में व्यक्त किए गए विचार हैं, तो वह छल-कपट होगा। बी.जे.पी. सत्ता की दावेदार है, इसलिए उसे राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़े इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण देना चाहिए।
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से


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